अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत ने बड़े स्तर पर हवाई ढाँचे के विस्तार की योजना शुरू कर दी है। इस योजना का मकसद एक ओर पर्यटन और विकास को बढ़ावा देना है, तो दूसरी ओर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का जवाब देना भी है। द्वीप समूह के प्रशासक एडमिरल डीके जोशी ने शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस पूरी योजना की टाइमलाइन और उद्देश्य को स्पष्ट किया।
ग्रेट निकोबार में बनेगा नया हवाई अड्डा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नया हवाई अड्डा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी हिस्से ग्रेट निकोबार द्वीप पर बनाया जाएगा। यह स्थान मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) से करीब 40 समुद्री मील (Nautical Miles) की दूरी पर है। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और यहाँ से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन के अधिकतर ऊर्जा आयात भी इसी मार्ग से आते हैं।
करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाला यह हवाई अड्डा 2 रनवे वाला होगा और यहाँ बड़े सैन्य और नागरिक विमान उतर सकेंगे। एडमिरल जोशी ने कहा कि योजना के अनुसार लगभग 3 साल में यहाँ से पहली उड़ान शुरू हो जाएगी। यह परियोजना रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई जा रही है।
2 मौजूदा सैन्य हवाई पट्टियों का होगा विस्तार
नई परियोजना के साथ-साथ द्वीप समूह में मौजूद दो नौसैनिक हवाई अड्डों के रनवे को भी बढ़ाया जा रहा है। इनमें उत्तरी अंडमान द्वीप के डिगलीपुर स्थित INS कोहासा और ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे के पास स्थित INS बाज शामिल हैं। ये दोनों अड्डे द्वीप समूह के उत्तरी और दक्षिणी छोर पर स्थित हैं और लगभग 750 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में फैले हुए हैं।
एडमिरल जोशी ने बताया कि इन दोनों हवाई पट्टियों को जल्द ही लगभग 3 किलोमीटर लंबा बना दिया जाएगा ताकि भारी सैन्य विमान भी आसानी से उतर सकें। इनका उपयोग सैन्य और कमर्शियल दोनों तरह की उड़ानों के लिए किया जाएगा।
श्री विजय पुरम एयरपोर्ट का होगा विस्तार
एडमिरल जोशी का कहना है कि द्वीप समूह की राजधानी श्री विजय पुरम (पहले पोर्ट ब्लेयर) के हवाई अड्डे पर अभी कई बाधाएँ हैं। वहाँ अभी केवल एक दिशा से ही विमान उतर और उड़ान भर सकते हैं। इस समस्या को देखते हुए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने मौजूदा हवाई अड्डे के दक्षिण में एक नया स्थान चुना है।
इसमें 2-3 किलोमीटर लंबे रनवे और एक समानांतर टैक्सी ट्रैक बनाया जाएगा। इसके चलते इसकी संचालन क्षमता काफी बढ़ जाएगी। इसके अलावा ग्रेट निकोबार में बनने वाला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा भी 2 रनवे वाला होगा। हालाँकि, पहले चरण में केवल एक 3 किलोमीटर लंबा रनवे बनाया जाएगा।
पर्यावरणीय और कानूनी पहलू
ग्रेट निकोबार परियोजना एक पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। चिंगेनह में जहाँ यह हवाई अड्डा विकसित किया जाना है वो उन गाँवों में से एक है जिन्हें 2004 की सुनामी के बाद खाली कराया गया था।
इस परियोजना को लेकर मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा था। अधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं और हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इसके बाद परियोजना को स्वीकृति मिल गई थी।
चीन पर काबू पाने में मिलेगी मदद
मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। यह संकरा समुद्री रास्ता हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और इसी के जरिए एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
भौगोलिक दृष्टि से यह मलक्का जलडमरूमध्य, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर केवल 2.8 किलोमीटर तक रह जाती है, जिससे यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील बन जाता है। यदि किसी कारणवश यह मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला पर तत्काल और गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखती हैं।
पिछले एक दशक में चीन ने अपनी समुद्री शक्ति में उल्लेखनीय विस्तार किया है। चीन की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और अफ्रीका से आता है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते ही चीन पहुँचता है। इस निर्भरता को कई विश्लेषक ‘मलक्का दुविधा‘ (Malacca Dilemma) के रूप में देखते हैं यानि अगर इस मार्ग पर नियंत्रण या अवरोध हो जाए तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर संकट आ सकता है।
भारत के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य की पश्चिमी एंट्री के निकट स्थित हैं। भौगोलिक रूप से देखें तो भारत इन द्वीपों के माध्यम से उस समुद्री मार्ग के बेहद करीब मौजूद है, जहाँ से एशिया का विशाल व्यापारिक यातायात गुजरता है।
भारत ने इन द्वीपों पर पहले से ही त्रि-सेवा कमान (Andaman and Nicobar Command) स्थापित कर रखी है जो सेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमांड है। अब यदि यहाँ हवाई पट्टियों का विस्तार और लॉजिस्टिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा तो यह भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को कई गुना तक बढ़ा सकता है।
अंडमान-निकोबार में सैन्य ढाँचे के विस्तार से भारत की समुद्री निगरानी, पनडुब्बी-रोधी क्षमता, त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया और रणनीतिक प्रतिरोध (Deterrence) की क्षमता में वृद्धि हो सकती है। इससे भारत न केवल चीनी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रख सकेगा बल्कि हिंद महासागर में अपनी भूमिका को भी अधिक सशक्त और निर्णायक बना पाएगा।
इसके साथ ही, समुद्र के नीचे बिछी कम्युनिकेशन केबलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए भी यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे भारत को क्षेत्र में संतुलन कायम रखने वाली ताकत के रूप में देखते हैं।
हवाई अड्डों के साथ-साथ द्वीप के समग्र विकास की योजना
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सिर्फ हवाई अड्डे ही नहीं बनाए जा रहे हैं बल्कि पूरे द्वीपों को विकसित करने की बड़ी योजना चल रही है। एडमिरल जोशी ने बताया कि यहाँ बंदरगाहों को बेहतर बनाया जा रहा है, तेल की खोज पर काम हो रहा है, दूरसंचार यानी मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन मजबूत किए जा रहे हैं और पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन सभी कामों का मकसद है कि द्वीप आर्थिक रूप से मजबूत बनें और देश की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकें। यहाँ हवाई अड्डों और सैन्य अड्डों का विस्तार भारत की सेना को आधुनिक और मजबूत बनाने की योजना का हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात को देखते हुए यह कदम भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ाने में मदद करेगा।
अगले 3 साल में जब नई उड़ानें शुरू होंगी तो इससे न सिर्फ इलाके का विकास होगा बल्कि देश की सुरक्षा भी और मजबूत होगी। यह परियोजना भविष्य में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है।


