ऑपइंडिया ने एक शोध पत्र (रिसर्च पेपर) तैयार किया है जो पश्चिम बंगाल में सामने आ रहे वोटर लिस्ट की दिक्कतों की पड़ताल करता है। वोटर लिस्ट से जुड़ा यह संकट उस समय सामने आया है, जब चुनाव आयोग (ECI) देशभर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चला रहा है। यह एक बड़ी और कानूनी रूप से अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके तहत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों की गहन समीक्षा शुरू की गई है।
राष्ट्रीय स्तर पर SIR लागू करने का फैसला बिहार में हुए SIR के बाद लिया गया। बिहार में इस अभ्यास के दौरान वोटर लिस्ट में गंभीर संरचनात्मक गड़बड़ियाँ सामने आई थीं जैसे बिना मिलान वाली प्रविष्टियाँ, डुप्लीकेट वोटर और संदिग्ध विदेशी नागरिकों के नाम। हालाँकि, पश्चिम बंगाल में सामने आई तस्वीर इससे कहीं ज्यादा गंभीर और चौंकाने वाली साबित हो रही है।
चुनाव आयोग की मैपिंग प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में भारी विसंगतियाँ पहले ही सामने आ चुकी हैं। SIR के दौरान लगभग 24.16 लाख वोटरों को मृत पाया गया है। वहीं, UIDAI (आधार प्राधिकरण) ने चुनाव आयोग को जानकारी दी है कि राज्य में करीब 34 लाख आधार कार्ड धारकों को मृत घोषित किया जा चुका है। इसके अलावा 13 लाख ऐसे मृत व्यक्ति भी सामने आए हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं था, यह जानकारी प्रक्रिया के दौरान साझा की गई है।
SIR कुछ मामलों में स्वतः सुधार करने वाला भी साबित हुआ है। जैसे ही वोटर लिस्ट की गहन जाँच शुरू हुई, कई अवैध घुसपैठिए डर के कारण खुद ही देश छोड़कर अपने मूल देश लौटने लगे। खास तौर पर बांग्लादेश जाने वालों की संख्या बढ़ी है। सीमा सुरक्षा बलों ने पुष्टि की है कि कुछ ही हफ्तों में करीब 1,600 अवैध प्रवासी बांग्लादेश भाग गए।
पश्चिम बंगाल में प्रशासनिक कामकाज हमेशा से मुश्किल रहा है, क्योंकि यहाँ राजनीतिक दबाव, धमकी और हिंसा की घटनाएँ सामने आती रही हैं। उदाहरण के तौर पर, 28 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के मामले में स्थिति रिपोर्ट न देने पर ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार के सहयोग न करने और जमीन उपलब्ध न कराने की वजह से सीमा पर बाड़ लगाने का काम रुका हुआ है। ममता बनर्जी पर अवैध बांग्लादेशियों को संरक्षण देने के आरोप भी लगे हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि NRC जैसे कदम से राज्य में खून-खराबा और गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
SIR के दौरान भी कई जगहों पर गंभीर रुकावटें आईं। राजनीतिक समर्थन प्राप्त समूहों के विरोध, धमकी और सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा बाधा डालने की खबरें सामने आईं, जिससे यह साफ होता है कि मतदाता सूची को साफ करने का काम कितने तनावपूर्ण माहौल में हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भी SIR की वैधता को मजबूती मिली है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बिहार में SIR के दौरान बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने की आशंका सही साबित नहीं हुई और किसी भी नागरिक ने गलत तरीके से मताधिकार छीने जाने की शिकायत नहीं की।
पश्चिम बंगाल में SIR को चुनावी गड़बड़ियों के लंबे इतिहास के संदर्भ में देखना जरूरी है। अवैध बांग्लादेशियों के वोटर आईडी बनवाने से लेकर उत्तर 24 परगना, नदिया और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों में फर्जी वोटर नेटवर्क के मामलों तक, यह साफ है कि ये समस्याएँ नई नहीं हैं। ये सालों की लापरवाही, राजनीतिक दखल और सीमावर्ती इलाकों की कमजोर व्यवस्थाओं का नतीजा हैं।
फिलहाल चल रहा SIR अभियान राज्य में चुनावी व्यवस्था को सुधारने की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश है। साथ ही, यह उन गहरी गड़बड़ियों को भी उजागर कर रहा है, जो अब तक सतह के नीचे छिपी हुई थीं। यह अध्ययन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़ों और मामलों के आधार पर बताता है कि पश्चिम बंगाल में SIR क्यों जरूरी है।
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