हाल ही में पत्रकार मंदीप पुनिया के यूट्यूब चैनल पर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन का एक इंटरव्यू आया है। इस इंटरव्यू में निवेदिता ने छात्र आंदोलनों और शिक्षा के मुद्दों की आड़ लेकर भारत राष्ट्र, देश की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे हमले करते हुए भारत को ‘मनहूस’ देश बताया है।
JNU जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में बैठकर लंबे समय तक पठन-पाठन से जुड़ी रहीं एक प्रोफेसर द्वारा सार्वजनिक मंचों से इस तरह के वक्तव्य देना केवल असहमति व्यक्त करना नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने पर किया गया एक सोची-समझी रणनीति का प्रहार है।
पूरे साक्षात्कार के दौरान बोले गए उनके शब्द यह साफ उजागर करते हैं कि वामपंथी-कट्टरपंथी इकोसिस्टम किस हद तक भारत के प्रति द्वेष और घृणा से भरा हुआ है।
भारत को ‘मनहूस’ बताकर किया देश का अनादर, हिंदुओं पर भी की घटिया टिप्पणी
निवेदिता मेनन ने अपने इस इंरव्यू में देश में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन, विभिन्न छात्र आंदोलनों और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए भारत राष्ट्र के प्रति अपनी अंतर्निहित घृणा को जगजाहिर कर दिया। उन्होंने भारत जैसे महान, सहिष्णु और लोकतांत्रिक देश के लिए ‘मनहूस’ जैसे अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया।
देश के भीतर चल रहे CJP के अभियानों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब जुनैद जैसे बच्चे को ट्रेन में मार के फेंक दिया जाता है और पूरा देश सन्नाटे में रहता है, मुझे लगता है कि पिछले 12 साल में ऐसे उनको मतलब बार-बार एहसास दिलाया जा रहा है कि तुम यहाँ के नहीं हो। तुम्हें बुलडोज करेंगे हम, तुम्हें हम कुछ भी करेंगे और तुम चू तक नहीं कर सकते। CJP का प्रोटेस्ट जो है वह थोड़ा साँस लेने की जगह दी और मुसलमानों को शायद लगने लगा कि शायद इस मनहूस देश में हमारे लिए भी कोई जगह है।”
भारत जैसे महान राष्ट्र, जहाँ करोड़ों नागरिक अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संप्रभुता पर गर्व करते हैं, उसी राष्ट्र को एक ‘मनहूस’ ढाँचा बताकर पेश करना यह साबित करता है कि तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के पास रचनात्मक आलोचना के नाम पर केवल राष्ट्र-विरोधी जहर उगलने का काम बचा है।
इस प्रकार की भ्रामक भाषा का प्रयोग करके वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि को एक अत्याचारी राष्ट्र के रूप में चित्रित करने का प्रयास करती हैं।
CJP और अराजक आंदोलनों का महिमामंडन: संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की साजिश
निवेदिता का पूरा जोर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शनों को सही ठहराने और उनका महिमामंडन करने पर रहा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के भेष में तमाम उपद्रवियों के संसद में घुसने की साजिशों और उपद्रव में शामिल वामंपथी और कट्टरपंथी संगठनों व पुलिस पर हमले करने वाले गुंडो को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
मेनन ने इन आंदोलनों को ‘लोकतांत्रिक जीत’ का नाम दिया। उन्होंने कह, “यह अकाउंटेबिलिटी शब्द जो CJP के प्रोटेस्ट ने इतना आम बनाया कि हर कोई अकाउंटेबिलिटी और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। एक स्टूडेंट ने आपको याद होगा एनसीआरटी की टेक्स्ट बुक से डेमोक्रेसी का वर्णन पढ़ते हुए बताया कि अकाउंटेबिलिटी है डेमोक्रेसी का फीचर। तो यह इस मूवमेंट का सबसे बड़ा की सबसे बड़ी बड़ी जीत यह है कि अकाउंटेबिलिटी शब्द हमारे शब्दकोश में हमारे आम बोलचाल में यह शब्द आ गया है।”
आंदोलन के नेतृत्व और उसके स्वरूप पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, “CJP के कॉल पे जिस तरह के लोग निकल के आए तो एक तरह से मैं सुन रही हूँ यह शब्द ऑर्गेनिक बहुत ज्यादा कि यह ऑर्गेनिक हो गया। अब ऑर्गेनिक तो हो गया लेकिन ऑर्गेनिक अपने आप में उभर के नहीं आता है। कहीं न कहीं एक कॉल देने वाला एक केंद्र होना चाहिए और इसमें अभिजीत दीपके का नाम और अभिजीत दीपके की भूमिका जो है हम कभी नहीं भूल सकते। उनको रिड्यूस नहीं कर सकते।”
उन्होंने यह दावा भी किया कि इस तरह के आंदोलनों ने पिछले 12 वर्षों के सन्नाटे को तोड़ा है और विभिन्न वामपंथी समूहों को एक मंच पर लाया है। उन्होंने कहा, “लेकिन वह जो बिल्कुल एक 12 साल से घना सन्नाटा छाया हुआ था, इन 12 सालों में जो कुछ भी हुआ है, एक तरह से अभिजीत ने इसीलिए लेफ्ट ग्रुप्स उनके साथ जुड़ सके। इसीलिए इतने सारे लोग दुनिया देश भर में, दुनिया भर में एक्चुअली दुनिया भर में भी सपोर्ट हुआ है।”
RSS, केंद्र सरकार और शैक्षणिक व्यवस्था पर जहरीले प्रहार
इंटरव्यू के दौरान केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति निवेदिता मेनन का राजनीतिक विद्वेष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उन्होंने देश के नए शिक्षा मंत्री, नवगठित टास्क फोर्स और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) पर तीखी और अमर्यादित टिप्पणियाँ कीं। साथ ही आरोप लगाया कि इनकी मानसिकता महिलाओं को लेकर भी बहुत घटिया है।
उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, “धर्मेंद्र प्रधान निकल गए लेकिन जो एजुकेशन मिनिस्टर बन के आए वह उनसे भी कट्टर संघी हैं और भी कट्टर RSS के मतलब प्रचारक हैं। उन्होंने बिलकिस बानो के बलात्कारियों के बारे में बहुत ही सपोर्टिवली बात की। तो ऐसे शख्स को एजुकेशन मिनिस्टर बनाया है जो हमने सोचा होगा कि धर्मेंद्र प्रधान से खराब कोई नहीं होगा, लो उन्होंने एक और अपने बट से निकाला।” मेनन ने नए शिक्षा मंत्री पर कई तरह के अन्य घटिया आरोप लगाए और हिंदू समाज पर अभद्र टिप्पणी की।
सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए बनाई गई टास्क फोर्स के गठन और उसमें शामिल सदस्यों का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा, “उन्होंने जो सो कॉल्ड हाई पावर टास्क फोर्स बनाया है उसमें देख लीजिए किस तरह के लोग हैं। उसमें IAS के ब्यूरोक्रेट्स हैं, उसमें इंफोसिस के चीफ हैं और इंफोसिस एजुकेशन के बारे में क्या बताएगा हमको? फिर एक और हैं जिन्होंने गोमूत्र के बारे में बहुत प्रशंसा की है कि गोमूत्र के जरिए बहुत सारी बीमारियाँ ठीक होती हैं। तो इस तरह का एक टास्क फोर्स बनाया है जिससे हमें मतलब कोई उम्मीद ही नहीं।”
देश के राजनीतिक ढाँचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह से नकारते हुए उन्होंने आरोप लगाया, “12 साल से हिंदू राष्ट्र ही रहा है हमारे यहाँ, हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की गई है और एक तरह से हिंदू राष्ट्र बन भी गया है। हम सब हिंदू राष्ट्र की छाया में रह रहे हैं।”
CAA विरोधी प्रदर्शनों, उमर खालिद और अलगाववादी निरंतरता का समर्थन
इंटरव्यू में निवेदिता मेनन ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों के संदिग्धों का खुलकर बचाव किया। उन्होंने उमर खालिद जैसे जेल में बंद आरोपितों द्वारा फैलाए गए आख्यानों का महिमामंडन किया और इसे एक बड़े क्रांतिकारी सफर के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा, “जो बीज बोए गए एंटी-सीएए और फार्मर्स प्रोटेस्ट में जो बीज बोए गए और उनको दबाया गया एक तरह से, लेकिन उसमें से जो वो सीड्स उमर खालिद जैसे नौजवानों ने जो बीज बोए थे, वो पौधे बनकर उभरे। और अब तो वो एक कंटिन्यूटी है, एक कंटिन्यूटी है एंटी-सीएए से लेके यहाँ तक।”
इसके अलावा उन्होंने देश की चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर पूर्ण अविश्वास व्यक्त करते हुए कहा, “इस तरह का जो व्यवहार है किसी सरकार का दिखाता है हमें कि उनका कोई इरादा नहीं है एक चुनाव जीतने का, इसका मतलब यह है ना कि उनको चुनाव से डर नहीं है क्योंकि हर लेवल पर उन्होंने EVM, ECI, SIR, डीलिमिटेशन ये सारी चीजों को लेके अब उनको लगता है कि चुनाव हमें जीतने की जरूरत ही नहीं है।”
PM मोदी को दी गई गालियों को बताया ‘प्रतिरोध’, ‘एंटी-पेट्रियारकल’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’
छात्र आंदोलनों के दौरान प्रधानमंत्री और देश की संवैधानिक हस्तियों को दी जाने वाली अभद्र और अमर्यादित गालियों को सही ठहराने के लिए निवेदिता मेनन ने फेमिनिस्ट और ‘क्वीर’ थ्योरी का सहारा लिया। उन्होंने इसे युवाओं का ‘क्रांतिकारी प्रतिरोध’ करार देते हुए कहा, “जब कोई भी ग्रुप पे एक गाली बार-बार मारी जाती है, उस गाली को उठा के एक फूलों का गुलदस्ता बनाना और बैज ऑफ ऑनर बनाना, यह भी ऐतिहासिक प्रोसेस है।”
उन्होंने आगे गालियों का बचाव करते हुए कहा, “ज्यादातर जो गालियाँ हैं वो एक्चुअली एंटी-पेट्रियारकल हैं, मुझे गालियाँ सुनके लगा कि यह भी वो जो रेजिस्टेंस का एक पोक, दिस इज अ काइंड ऑफ रेजिस्टेंस जो व्हिच आवर जनरेशन, तो मुझे लगता है गालियाँ सुनके लगा कि यह भी रेजिस्टेंस का हिस्सा है।”
एक पूर्व विश्वविद्यालय प्रोफेसर द्वारा युवाओं की अशिष्टता, अमर्यादित भाषा और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के प्रति गालियों को ‘बैज ऑफ ऑनर’ और ‘फूलों का गुलदस्ता’ बताकर बढ़ावा देना वामपंथी बौद्धिक वर्ग के नैतिक पतन की चरम सीमा को दर्शाता है।
JNU के मंच का दुरुपयोग और युवाओं के मन में जहर घोलने का प्रयास
इंटरव्यू के अंत में निवेदिता मेनन ने यह खुलकर स्वीकार किया कि वे किस प्रकार युवाओं की इन अराजक कार्यशैली से सीख रही हैं और इसे बढ़ावा देना चाहती हैं।
उन्होंने कहा, “यह RSS और BJP वाले जब प्रोपेगेंडा करते हैं, उनसे सीखूँगी मैं, उनसे सीखूँगी कैसे जब कीचड़ उछाला जाता है आप कीचड़ को उठा के उनके ऊपर नहीं, उसको एक तरह से गुब्बारा या गुलदस्ता बना के वापस उछाल रहे हैं।”
एक प्रोफेसर का यह दायित्व होता है कि वह छात्रों को अध्ययन, अनुशासित बहस, राष्ट्रनिर्माण और संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति जागरूक करे। लेकिन इसके विपरीत, निवेदिता मेनन जैसे वामपंथी विचारक युवाओं के मन में देश की राज्य व्यवस्था, न्यायपालिका और सीमाओं के प्रति आक्रोश और अलगाववाद की भावना को भड़काने में लगे रहते हैं।
निवेदिता मेनन का पुराना ‘कच्चा-चिट्ठा’: विवादित बयानों की पूरी लिस्ट
भारत को ‘मनहूस देश’ बताना या भारतीय सेना व संवैधानिक व्यवस्था पर हमले करना निवेदिता मेनन की किसी नई सोच का नतीजा नहीं है। अगर उनके पिछले करियर और रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका पूरा इतिहास ही भारत विरोधी बयानों, सेना के अपमान, अलगाववादियों के समर्थन और हिंदू विरोधी एजेंडे से भरा पड़ा है।
भारत ने कश्मीर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है: निवेदिता का विवादित बयान
मार्च 2016 में, JNU परिसर में ‘आजादी’ के नारों को लेकर जारी विवाद के दौरान निवेदिता मेनन ने ‘व्हाट नेशनहुड मीन्स टू मी’ (मेरे लिए राष्ट्रवाद का क्या अर्थ है) विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया था। इस भाषण में उन्होंने खुले तौर पर कहा था, “हम सभी जानते हैं कि कश्मीर पर भारत का कब्जा अवैध है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि भारत ने कश्मीर पर गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है (India is illegally occupying Kashmir)।”
JNU Prof Nivedita Menon is the same Urban naxal who claimed that India illegally occupies Kashmir.
— Rishi Bagree (@rishibagree) November 30, 2025
This is the kind of poison these Urban Naxals like her fill in young minds, which is detrimental to our Nation. https://t.co/slmKFSDCUK pic.twitter.com/HUPYdDriq4
उन्होंने टाइम और न्यूजवीक जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के विवादित नक्शों का संदर्भ देकर यह तर्क दिया था कि यदि पूरा विश्व भारत को कश्मीर में एक आक्रामक शक्ति मानता है, तो घाटी में ‘आजादी’ के नारे लगना पूरी तरह से जायज और प्राकृतिक है। उनके इस वक्तव्य से देश भर में भारी आक्रोश पैदा हुआ था।
भारतीय सैनिकों का अपमान और ‘रोजी-रोटी के लिए काम करने’ का आरोप
फरवरी 2017 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में निवेदिता मेनन मुख्य वक्ता थीं। वहाँ उन्होंने न केवल भारत का विवादित नक्शा प्रदर्शित किया, बल्कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले भारतीय सेना के जवानों का घोर अपमान किया।
उन्होंने कहा था, “सैनिक देश की रक्षा या देशभक्ति के लिए सीमाओं पर नहीं खड़े हैं, बल्कि वे केवल अपनी आजीविका (रोजगार) चलाने और अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए सेना में काम करते हैं।” उन्होंने आगे यह भी कहा था कि भारत को सियाचिन जैसे क्षेत्रों से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए और उस पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।
इस राष्ट्र-विरोधी बयान के बाद जोधपुर में विश्वविद्यालय परिसर से लेकर सड़कों तक विरोध प्रदर्शन हुए थे, मेनन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी और संगोष्ठी की आयोजक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था।
भारत के आधिकारिक मानचित्र और अखंडता पर सवाल उठाना
निवेदिता मेनन ने अपने कई व्याख्यानों और लेखों में भारत के भौगोलिक मानचित्र की वैधता को खारिज किया है। ‘हिमालयन मैगजीन’ और विदेशी प्रकाशनों के विवादित नक्शों का हवाला देकर उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया है कि भारत एक ‘कृत्रिम राष्ट्र-राज्य’ है।
वे उत्तर-पूर्व भारत और कश्मीर के भारत में विलय को एक ‘सैनिक जबर्दस्ती’ के रूप में पेश करती हैं, जो सीधे तौर पर भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला रुख है।
‘लव जिहाद’ पर वामपंथी-इस्लामी साँठगाँठ: आरफा खानम और निवेदिता मेनन द्वारा पीड़ित हिंदुओं का मजाक
निवेदिता मेनन और ‘द वायर’ की प्रोपेगैंडिस्ट आरफा खानम शेरवानी की एक पुरानी बातचीत का विश्लेषण यह साफ उजागर करता है कि किस तरह वामपंथी और इस्लामी मिलकर हिंदू समाज की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों का मजाक उड़ाते हैं।
अपने एक पॉडकास्ट में आरफा खानम और निवेदिता मेनन ने ‘लव जिहाद’ जैसे संगठित सामाजिक अपराध को वामपंथी चालाकी से न केवल पूरी तरह खारिज किया, बल्कि पीड़ित हिंदू परिवारों और हिंदू पुरुषों पर बेहद शर्मनाक टिप्पणियां कीं।
जब आरफा खानम ने अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हुए सवाल पूछा कि ‘हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’, तो निवेदिता मेनन ने ठहाके लगाते हुए बेहद गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा, “मुस्लिम मर्द होंगे इतने अट्रैक्टिव और उनको अपने ही धर्म में वो नहीं मिलता होगा।”
आरफा और निवेदिता की इस जोड़ी ने लव जिहाद के पीछे की उस गहरी कड़वी सच्चाई को छिपाने की कोशिश की, जहाँ मुस्लिम युवक अपनी मजहबी पहचान छिपाकर हाथ में कलावा बाँधते हैं, फर्जी हिंदू नाम रखकर हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं और बाद में यौन शोषण व धर्मांतरण का दबाव बनाते हैं।
आरफा खानम द्वारा पूछे गए इस दुर्भावनापूर्ण सवाल पर निवेदिता का ठहाके लगाना यह साबित करता है कि तथाकथित लिबरल-फेमिनिस्ट चोला ओढ़ने वाली ये महिलाएँ कट्टरपंथियों को बौद्धिक संरक्षण देने के लिए हिंदू समाज को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़तीं।
भारतीय संविधान, हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर अनर्गल टिप्पणियाँ
प्रोफेसर मेनन अपने भाषणों में लगातार हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और हिंदुत्व की अवधारणा पर तीखे हमले करती रही हैं। वे हिंदुत्व को एक उग्र, हिंसक और महिला-विरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करती हैं, जबकि अन्य धर्मों में मौजूद कड़े कट्टरपंथ और कुरीतियों पर वे पूरी तरह मौन धारण कर लेती हैं।
हिंदू धर्म की मान्यताओं को निशाना बनाकर बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ असंतोष फैलाना उनकी रणनीतिक बयानबाजी का मुख्य हिस्सा रहा है।
देश की न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की साख पर प्रहार
मेनन का यह रिकॉर्ड रहा है कि वे भारत की किसी भी संवैधानिक संस्था पर भरोसा नहीं करतीं। कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए अलगाववादियों या आतंकवादियों के समर्थकों के मामले में वे हमेशा न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल उठाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए जाँच के आदेशों को वे ‘राज्य का दमन’ बताती हैं और पुलिस द्वारा की जाने वाली कानूनी कार्रवाइयों को ‘राजनीतिक उत्पीड़न’ का नाम देती हैं। इस प्रकार वे युवाओं के मन में भारतीय राज्य व्यवस्था के प्रति पूर्ण अविश्वास पैदा करने का काम करती हैं।
वैचारिक अराजकता और राष्ट्र-विरोधी आख्यान का वास्तविक आईना
निवेदिता मेनन के इस हालिया इंटरव्यू और उनका पुराना विवादित इतिहास यह साफ उजागर करता है कि उनका पूरा आख्यान केवल किसी राजनीतिक दल या सरकार का विरोध नहीं है, बल्कि भारत के राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और संवैधानिक ढाँचे पर किया गया एक गहरा प्रहार है।
भारत जैसे विविध और सहिष्णु देश को ‘मनहूस’ बताना, देश की रक्षा करने वाली भारतीय सेना के शौर्य को मात्र ‘रोजी-रोटी का जरिया’ करार देना, कश्मीर पर भारत के संप्रभु अधिकारों को अवैध बताना और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपितों को ‘क्रांति का बीज’ कहना- यह सब एक सुनियोजित वामपंथी-अलगाववादी सोच का हिस्सा है।
JNU जैसे देश के प्रतिष्ठित और जन-साधारण के करदाताओं के पैसों से चलने वाले शिक्षण संस्थानों के मंचों का उपयोग यदि युवाओं में राष्ट्र, सीमाओं, पुलिस और न्यायपालिका के प्रति नफरत भरने के लिए किया जाएगा, तो यह देश की जड़ों को कमजोर करेगा।
लोकतंत्र में असहमति और वैचारिक आलोचना का हमेशा स्वागत है, लेकिन जब असहमति के नाम पर राष्ट्र के अस्तित्व को नकारा जाने लगे, गालियों को ‘सम्मान का पदक’ (Badge of Honor) बनाकर पेश किया जाने लगे और अराजकता को बढ़ावा दिया जाए, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं बल्कि ‘वैचारिक आतंकवाद’ कहा जाएगा।
निवेदिता मेनन का यह पूरा कच्चा-चिट्ठा देश के जागरूक समाज और युवाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि बौद्धिक आवरण में छिपे इस राष्ट्र-विरोधी एजेंडे को पहचानना और इसका तार्किक रूप से खंडन करना अत्यंत आवश्यक है।


