इसमें कोई दो मत नहीं है कि लड़का गायब था। केशव सक्सेना को सांप्रदायिक हिंसा के तीन दिन बाद तक भी उसके माँ-बाप ने नहीं देखा था। यह लड़का आखिरकार तीन तारीख की शाम को अपने घर पहुँचा, यानी तनाव के चौथे दिन। यदि हौज काजी में हालात सामान्य होने का न्यूजलॉन्ड्री का दावा सही भी है (जैसा है नहीं), तो भी क्या लड़के के गायब होने की खबर को अन्य मीडिया संस्थानों की तरह ऑपइंडिया को भी दबा देनी चाहिए थी?
यह चुप्पी केवल आज की नहीं है, केवल मंगरू के मामले में नहीं है। यह हर उस मामले में ओढ़ा गया सन्नाटा है, जब 'डरा हुआ शांतिप्रिय' कोई अपराध करता है, और भुक्तभोगी कोई हिन्दू होता है।
अब ये कातिलों से लेकर गबन के आरोपियों का बचाव केवल इस आधार पर करना चाहते हैं कि फलाना मोदी के खिलाफ बोला था, ‘एंटी-RSS’ था, तो अगर इसे जेल भेजा गया तो सरकार के खिलाफ बोलने वालों में ‘डर का माहौल’ बन जाएगा।
केवल कोहली और भगवा जर्सी पर नाराज़गी जताने से मन नहीं भरा तो लिबरल गिरोह ने 'समय-यात्रा' कर के मोदी के भगवाकरण प्लान में गांगुली का 2001 में टी-शर्ट लहराना शामिल कर लिया। उनके हिसाब से गांगुली के लॉर्ड्स में टी-शर्ट लहराते समय उनके शरीर पर मौजूद गंडे-ताबीज़ आदि धार्मिक और आस्था के प्रतीक-चिह्न 'शर्मनाक' और 'अंधविश्वासी' थे!
अभिषेक उपाध्याय ने यह भी जोड़ा कि बच्चे को गोद लेना एक शांत प्रक्रिया होती है, ताकि बड़े होकर बच्चे को अपने गोद लिए हुए होने को लेकर किसी असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। अतः अगर कापड़ी दम्पति का सच में बच्ची को गोद लेने का इरादा होता, तो वे इतना शोर-शराबा न करते।
प्रोपेगेंडा-पर-प्रोपेगेंडा फैलाते रहना, बार-बार पकड़े जाते रहना, शर्मिंदा होना- अगर यही बिज़नेस मॉडल है तो बात दूसरी है, वरना वायर वालों को बाज आ जाना चाहिए।
यहाँ एक निश्चित पैटर्न उभर रहा है। ये उनमें से केवल दर्जन भर घटनाएँ हैं। 'हेट-ट्रैकर’ के माध्यम से नकली 'हेट क्राइम' के निर्माण के लिए मीडिया गिरोह और लिबरल पूरी तरह समर्पित हैं। ये डेटा और फैक्ट को तोड़-मरोड़कर, मुसलमानों को बारहमासी पीड़ित और हिंदुओं को निर्दयी हमलावर बताने की फिराक में रहते हैं।
ऐसी घटनाएँ, जिनमें कट्टरपंथियों के अपराधी होने की ख़बर आई और पीड़ित दलित या हिन्दू थे। लेकिन, किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। कोई नया नैरेटिव नहीं गढ़ा गया। पढ़िए ऐसी 50 घटनाओं का विवरण, जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा प्रमुखता से नहीं उठाया गया।
जब दलितों और मुस्लिमों में झड़प होती है, तो यही दलित हिन्दू हो जाते हैं। जब एएमयू SC-ST को आरक्षण नहीं देता, तब ये चूँ तक नहीं करते। लेकिन, जहाँ बात भारत को असहिष्णु साबित करें की आती है, 'दलितों और मुस्लिमों' पर अत्याचार की बात कर दलितों को हिन्दुओं से अलग दिखाने के प्रयास होते हैं।