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हमारा मकसद देश को ‘विश्वगुरु’ बनाना, 100 साल पूरे होने का सार ‘भारत माता की जय’: मोहन भागवत ने बताया हिंदू राष्ट्र का असली मतलब, कहा- हमें खुद ही बनना होगा राम-शिव, मिलकर करना होगा काम

आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारा मकसद भारत को एक 'विश्वगुरु' बनाना है। 100 साल के सफर का सार सिर्फ एक ही वाक्य में है- 'भारत माता की जय'। यह वाक्य सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि पूरे देश को एकजुट करने का एक संकल्प है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत अक्सर अपने बयानों से चर्चा में रहते हैं, और इस बार उन्होंने एक ऐसा संदेश दिया है जिस पर चर्चा होनी तय है। अपने संगठन के 100 साल पूरे होने के मौके पर उन्होंने साफ कहा कि लोग आरएसएस को अटकलों और सुनी-सुनाई बातों पर नहीं, बल्कि सच्चाई और तथ्यों के आधार पर जानें।

मोहन भागवत ने कहा कि संघ का मकसद भारत को एक ‘विश्वगुरु’ बनाना है। उनके अनुसार, संघ के 100 साल के सफर का सार सिर्फ एक ही वाक्य में है- ‘भारत माता की जय‘। यह वाक्य सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि पूरे देश को एकजुट करने का एक संकल्प है।

संघ प्रमुख ने हिंदू की एक नई और उदार परिभाषा देते हुए कहा कि हिंदू वह है जो अपने रास्ते पर चलता है, लेकिन दूसरों के अलग-अलग विचारों और मान्यताओं का भी सम्मान करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब हम ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करते हैं, तो इसका मतलब किसी का विरोध करना नहीं है, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है। इस बयान से भागवत ने संघ की छवि को और अधिक समावेशी बनाने की कोशिश की है।

हिंदू राष्ट्र का मतलब: सबको साथ लेकर चलना

RSS पर अक्सर ये आरोप लगते हैं कि वो सिर्फ हिंदुओं की बात करता है और बाकी मजहबों को किनारे करता है। लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने खुद इस बात को लेकर सफाई दी है। उन्होंने साफ कहा कि हिंदू राष्ट्र का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हम किसी का विरोध कर रहे हैं या सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं।

उनका कहना है कि ‘हिंदू’ वो होता है जो अपने रास्ते पर चलता है और साथ ही दूसरों के रास्तों का भी इज्जत से सम्मान करता है। यानी जो खुद भी अपने धर्म, संस्कृति से जुड़ा हो और दूसरों को भी उनके तरीके से जीने दे- वही असली हिंदू है। भागवत ने यहाँ तक कहा कि अगर कोई खुद को हिंदू नहीं मानता, तब भी वो हमारे अपने ही हैं। उनका मकसद साफ है- समाज को बाँटना नहीं, जोड़ना।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत की असली ताकत इसकी विविधता में है। कई मत, कई विचार, फिर भी सब एक साथ चलें- यही संघ की सोच है। और इसी सोच से देश को एकजुट करना ही संघ का असली मकसद है।

संघ का उद्देश्य: भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाना

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ का असली मकसद देश को ताकतवर बनाना है, ताकि भारत दुनिया में अपना हक का मुकाम पा सके। उन्होंने साफ कहा कि संघ किसी के खिलाफ खड़ा नहीं हुआ, बल्कि समाज को जोड़ने और एकजुट करने के लिए खड़ा हुआ है। भागवत ने स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए कहा कि हर देश का दुनिया के लिए एक योगदान होता है और अब वक्त आ गया है कि ‘भारत अपना योगदान दे, अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचाए।’

मोहन भागवत ने उन लोगों का भी जिक्र किया जो कभी संघ के खिलाफ थे लेकिन आज उसके साथ खड़े हैं। इस पर उन्होंने बड़ी ही सहज बात कही, “वो पहले भी हमारे अपने थे और आज भी अपने ही हैं।” मोहन भागवत ने बताया कि ‘संघ का काम है समाज में एकता लाना, चाहे किसी की सोच, मान्यता या धर्म कुछ भी हो। और यही रास्ता है जिससे भारत फिर से उस ऊँचाई तक पहुँच सकता है, जहाँ वो कभी था- एकं विश्वगुरु की तरह।

क्रांतिकारियों और कॉन्ग्रेस पर विचार

मोहन भागवत ने अपने भाषण में देश की आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक दौर था जब देश में क्रांतिकारियों की एक जबरदस्त लहर उठी थी। उस दौर के लोग देश के लिए जीते थे, मरते थे, और उन्हीं में से एक चमकता हुआ नाम था ‘सावरकर‘। उन्होंने कहा कि ‘सावरकर जैसे लोग उस दौर की प्रेरणा थे’, लेकिन अफसोस कि आजादी मिलने के बाद वो जोश धीरे-धीरे गायब हो गया।

भागवत ने कहा कि 1857 की क्रांति के बाद कुछ लोगों ने राजनीति को आजादी पाने का जरिया बनाया और फिर वही आंदोलन धीरे-धीरे ‘कॉन्ग्रेस’ के रूप में सामने आया। उस आंदोलन से देश को आजादी तो मिली, लेकिन अगर आजादी के बाद भी वही भावना और सोच जारी रहती, तो ‘शायद आज देश की तस्वीर कुछ और होती।’

भागवत ने ये भी साफ कहा कि ‘वो किसी पर उंगली नहीं उठा रहे, बस इतिहास की सच्ची बात रख रहे हैं।’ उनका मकसद दोष देना नहीं, बल्कि ये याद दिलाना है कि हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ खड़े हैं।

‘ठेका’ लेने की आदत छोड़ें, सब मिलकर काम करें

मोहन भागवत ने एक बड़ी और सोचने वाली बात कही- देश को सुधारने या बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ किसी एक नेता या संगठन की नहीं है। ये सोच कि कोई आएगा और सब ठीक कर देगा, अब छोड़नी होगी। मोहन भागवत ने साफ-साफ कहा, “राम या शिवाजी कब तक आएँगे? अब हमें खुद ही राम या शिव बनना होगा।”

मोहन भागवत का मतलब ये था कि अगर हम चाहते हैं कि देश आगे बढ़े, मजबूत बने, तो हर एक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी। सिर्फ नेताओं या संस्थाओं को दोष देकर कुछ नहीं होगा। देश हम सबका है और इसकी जिम्मेदारी भी हम सबकी है।

इस तरह, भागवत ने ये दिखाने की कोशिश की कि संघ सिर्फ नारेबाज़ी या राजनीति नहीं करता, बल्कि समाज को जोड़ने और जिम्मेदारी का भाव जगाने की कोशिश करता है। उनका ये संदेश लोगों से सीधा जुड़ता है- क्योंकि बदलाव कहीं और नहीं, हमारे अपने अंदर से शुरू होता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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