सेबी ने हिंडनबर्ग के आरोपों की जाँच के बाद कहा कि अडानी की संस्थाओं के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। इसलिए अडानी ग्रुप पर कोई जुर्माना नहीं लगेगा। सेबी ने गौतम अडानी, राजेश अडानी, अडानी पावर, अडानी पोर्टस के खिलाफ जाँच को भी बंद कर दिया।
सेबी ने इस बात को खारिज किया कि जानबुझ कर अडानी ग्रुप ने लेन देन को छुपाया था। हालाँकि ग्रुप ने कुछ कंपनियों जैसे माइलस्टोन और रेहवार के साथ पैसों का लेन-देन किया, लेकिन सभी मूलधन, ऋण और ब्याज चुकाए गए थे। इसके अलावा उस वक्त आरपीटी की एलओडीआर परिभाषा में ऐसे अप्रत्यक्ष लेनदेन शामिल नहीं थे। इसलिए इस नियम को पहले से लागू करना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
सेबी से क्लीन चिट मिलने के बाद, कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार और अडानी ग्रुप पर अपना ‘मोदानी’ हमला फिर से शुरू कर दिया है। पार्टी नेता जयराम रमेश ने शुक्रवार को एक बयान जारी कर 2023 में पूछे जाने वाले अपने 100 सवालों को दोहराया, जिसका शीर्षक था ‘हम अडानी के हैं कौन।’
इस बयान में कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार पर कई आरोप लगाए। इसमें कहा गया है कि अडानी समूह को फायदा पहुँचाने के लिए सरकारी एजेंसियों और कानूनों का दुरुपयोग किया गया।
कॉन्ग्रेस का आरोप है कि ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग जैसी एजेंसियों का दुरुपयोग करके कंपनियों को अपनी संपत्तियाँ अडानी समूह को बेचने के लिए मजबूर करना। कंपनियों द्वारा अपनी संपत्तियां अडानी समूह को बेचने के लिए हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की संपत्तियों का निजीकरण, केवल अडानी समूह के लाभ के लिए हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की संपत्तियों का एकतरफा निजीकरण करना।
कॉन्ग्रेस ने ये भी कहा है कि विभिन्न देशों में विशेष रूप से पड़ोस में अडानी समूह को अनुबंध दिलाने के लिए राजनयिक संबंधों का दुरुपयोग, अहली और चांग द्वारा अधिक बिल वाले कोयले का आयात, जिसने गुजरात में अडानी बिजली स्टेशनों से मिलने वाली बिजली की कीमतों को बढ़ाया, भारत में सौर ऊर्जा अनुबंधों को हासिल करने के लिए कथित तौर पर 2,000 करोड़ ($250 मिलियन) की रिश्वतखोरी योजना, जिसे गौतम अडानी और उनके सात सहयोगियों ने किया।
Our statement on the continued need to investigate the Modani Scam in all its dimensions. The questions we raised in the 100-question-series Hum Adani Ke Hain Kaun (HAHK) remain unanswered.
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) September 19, 2025
The link to the HAHK series can be found here – https://t.co/5j2qFsChU2 pic.twitter.com/XjeIed7xJP
हालाँकि मोदी सरकार पर ये गंभीर आरोप हैं, लेकिन ये सभी निराधार हैं और ज़्यादातर पहले ही खारिज किए जा चुके हैं।
सरकारी दबाव का आरोप
कॉन्ग्रेस का दावा है कि सरकार ने अडानी को संपत्तियाँ बेचने के लिए केंद्रीय जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग किया। हालाँकि उन्होंने अपने बयान में किसी कंपनी का नाम नहीं लिया, लेकिन जयराम रमेश ने 2014 में अडानी पोर्ट्स द्वारा एलएंडटी और टाटा स्टील से ओडिशा में धामरा पोर्ट खरीदने का ज़िक्र किया। इस पोर्ट का निर्माण एलएंडटी और टाटा ने 2011 में किया था और उन्होंने इसे 2014 में अडानी को बेच दिया था। इस सौदे की घोषणा मई 2014 में हुई थी। इस महीने में ही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे।
चूँकि यह सौदा मई 2014 में पूरा हुआ था, इसलिए यह स्पष्ट है कि इस सौदे पर बातचीत कई महीनों से चल रही थी, क्योंकि ऐसे कॉर्पोरेट सौदे कुछ ही दिनों में नहीं होते। इसका मतलब है कि यह पूरा सौदा डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए हुआ था। यदि एलएंडटी और टाटा पर अडानी को बंदरगाह बेचने के लिए सरकारी एजेंसियों की ओर से कोई दबाव था, तो इसका मतलब यह होगा कि ऐसा दबाव कॉन्ग्रेस सरकार की ओर से आया होगा।
इसके अलावा, एलएंडटी और टाटा स्टील भारत के प्रमुख कॉर्पोरेट घराने हैं और उनके पास पर्याप्त कानूनी ताकत है। अपनी ईमानदारी के लिए वे सबसे सम्मानित कंपनियों में से एक हैं। अगर उन पर कोई दबाव होता, तो वे झुकने के बजाय उसका विरोध करते। मोदी सरकार और अडानी समूह पर आरोप लगाकर, कांग्रेस टाटा स्टील और एलएंडटी पर भी महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा न करने का आरोप लगा रही है।
इससे पहले कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया था कि जीवीके को मुंबई हवाई अड्डे में अपनी हिस्सेदारी अदानी एयरपोर्ट्स को बेचने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवीके भारी कर्ज के बोझ तले दबी थी और उसे मुंबई हवाई अड्डा बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। संसद में राहुल गांधी द्वारा कंपनी पर सरकार द्वारा दबाव डालने के आरोपों का जवाब देते हुए, जीवीके ने ऐसे किसी भी दबाव से इनकार किया था।
कंपनी ने एक बयान में कहा था, “जीवीके प्रबंधन द्वारा मुंबई हवाई अड्डे में अपनी हिस्सेदारी अदानी को बेचने का फैसला लिया गया था और हम पर किसी भी तरह के बाहरी दबाव का कोई सवाल ही नहीं उठता।”
जीवीके समूह के उपाध्यक्ष संजय रेड्डी ने कहा था, “हमने जो कुछ भी किया, वह कंपनी और उन कर्जदाताओं के हित में था। हमें अदानी के साथ लेनदेन किया, क्योंकि दूसरे निवेशकों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।”
बंदरगाहों और हवाई अड्डों के निजीकरण को लेकर आरोप
इसके बाद कॉन्ग्रेस ने ‘हवाई अड्डों और बंदरगाहों जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी संपत्तियों के निजीकरण’ का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि देश के कई बंदरगाहों और हवाई अड्डों के संचालन के लिए लगाई गई बोली अडानी समूह ने जीत ली, क्योंकि इसमें कथित तौर पर गड़बड़ी हुई। जयराम रमेश चाहते हैं कि लोग यह मान लें कि ऐसे हवाई अड्डों और बंदरगाहों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से गौतम अडानी को सौंप दिया था।
लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे सभी निजीकरण की लंबी प्रक्रिया होती है। इनमें कई कंपनियाँ बोली लगाती है। बंदरगाहों का निजीकरण राज्य स्तर पर किया जाता है, जबकि हवाई अड्डों का आवंटन बोली के आधार पर किया जाता है। हवाई अड्डों के मामले में, हर यात्री की सुरक्षा, सहुलियत को लेकर सबसे अधिक बोली लगाने वाली कंपनी या संस्थान हवाई अड्डे का संचालन करती है।
अडानी समूह ने भारतीय यात्रियों के लिए सबसे अधिक बोली लगाई इसलिए ग्रुप को संचालन का जिम्मा मिला। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी को इससे समस्या है, तो इसका मतलब है कि वह नहीं चाहती कि निजी कंपनियाँ हवाई अड्डों पर भारतीय यात्रियों के लिए सबसे अधिक मूल्य चुकाएँ।
केंद्र सरकार ने नवंबर 2018 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर आधारित 6 हवाई अड्डों के संचालन को स्वीकृति दी। ये हवाई अड्डों हैं- अहमदाबाद, गुवाहाटी, जयपुर, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और लखनऊ हवाई अड्डा। इन छह हवाई अड्डों के संचालन के लिए 10 कंपनियों से 32 बोलियाँ लगाई थी।
अडानी एयरपोर्ट्स को 50 साल की लीज़ के लिए सभी छह सरकारी हवाई अड्डों के संचालन का अधिकार मिला। अडानी समूह ने अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम, मंगलुरु और गुवाहाटी हवाई अड्डों के लिए ₹177, ₹174, ₹171, ₹168, ₹115 और ₹160 की बोली लगाई थी। ये इन सभी के लिए सबसे अधिक बोली थी।
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि बोली जीतने से कंपनी हवाई अड्डे की मालिक नहीं बन जाती, बल्कि उसे केवल एक निश्चित अवधि के लिए हवाई अड्डे के संचालन का अधिकार मिलता है।
हवाई अड्डे के सौदों पर कॉन्ग्रेस पार्टी के आरोप नए नहीं हैं। वे उन आरोपों को दोहराते आ रहे हैं, जिसका खंडन किया जा चुका है। अपने 100 सवालों में, कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि अडानी को हवाई अड्डे चलाने का कोई अनुभव न होने के बावजूद 6 हवाई अड्डे दिए गए। लेकिन जब मनमोहन सिंह सरकार के दौरान जीएमआर और जीवीके को क्रमशः दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डे दिए गए, तो इन कंपनियों के पास भी हवाई अड्डे का कोई अनुभव नहीं था।
राजनयिक दबाव का दावा गलत
कॉन्ग्रेस ने ये भी दावा किया है कि मोदी सरकार ने विदेशी सरकारों पर अडानी समूह को परियोजनाएँ सौंपने के लिए राजनयिक दबाव डाला। यह सोचना भी काफी हास्यास्पद और बेमानी है कि मजबूत अर्थव्यवस्थाओं वाली संप्रभु देश की सरकारें राजनयिक दबाव में आकर आर्थिक फैसले लेंगी।
इसके अलावा, जयराम रमेश शायद यह भूल गए हैं कि जब अडानी समूह ने ऑस्ट्रेलिया में खनन की बोली जीती थी, तब उनकी ही पार्टी सत्ता में थी। क्वींसलैंड स्थित कारमाइकल कोयला खदान 2011-12 में अडानी समूह को सौंपी गई थी, जब डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार सत्ता में थी।
अडानी पोर्ट ने 2022 में, इजराइल की कंपनी गैडोट समूह के साथ मिलकर इजराइल के हाइफा पोर्ट के अधिग्रहण की बोली जीती थी। इसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण और रणनीतिक डील माना गया। अडानी-गैडोट ने स्थानीय और वैश्विक कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद यह डील जीती। यह इजराइल सरकार द्वारा किए गए सबसे बड़े निजीकरणों में से एक था। ऐसी स्थिति में मोदी सरकार पर आरोप लगाना कि उसने अडानी ग्रुप की मदद की, सरासर गलत है।
इसके अलावा, अगर किसी भी गड़बड़ी का कोई संकेत होता, तो बोली लगाने वाली दुनियाभर की दूसरी बड़ी कंपनियाँ कोर्ट जातीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत में कंपनी द्वारा जीती गई बोलियों के संबंध में भी यही बात सही है। बोलियाँ हारने वाली कंपनियों ने बोली को लेकर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया।
उल्लेखनीय है कि हाइफ़ा बंदरगाह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे के आवागमन का अहम पोर्ट होगा। इस बंदरगाह का भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व है। ऐसे में बंदरगाह का स्वामित्व किसी भारतीय कंपनी के पास है। ये देशहित में है। इस सौदे पर सवाल उठाकर, कॉन्ग्रेस पार्टी वैश्विक मंच पर भारत को रणनीतिक बढ़त मिलने का ही विरोध कर रही है।
बिजली की कीमतें बढ़ाने का दावा
जयराम रमेश ने दावा किया कि गुजरात में अडानी पावर स्टेशनों द्वारा आपूर्ति की जाने वाली बिजली की कीमतें कोयले की कथित रूप से अधिक कीमत वसूलने के कारण बढ़ी हैं। यह एक और निराधार आरोप है, क्योंकि यदि किसी बिजली संयंत्र की कीमत दूसरों की तुलना में बहुत अधिक है, तो उसे कोई खरीदार नहीं मिलेगा।
बिजली वितरण कंपनियाँ बिजली उत्पादकों के साथ बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करती हैं, जहाँ कीमत निर्धारित होती है। बिजली उत्पादक कीमत तय नहीं कर सकते, जैसा कि कॉन्ग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है। हालाँकि अडानी पावर भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी है, लेकिन देश में अधिकांश बिजली का उत्पादन एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ करती हैं। इसलिए निजी क्षेत्र के बिजली उत्पादक मनमाने ढंग से कीमतें नहीं वसूल सकते।
अडानी पावर ने कॉन्ग्रेस सरकारों वाले कई राज्यों को बिजली की आपूर्ति की है। इसका मतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी ही राज्य सरकारों पर अडानी पावर से ऊँची कीमतों पर बिजली खरीदने का आरोप लगा रही है।
सौर ऊर्जा रिश्वतखोरी का आरोप
कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह भी आरोप लगाया कि अडानी समूह ने भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) के साथ बिजली खरीद समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कई राज्यों के अधिकारियों को करीब ₹2,000 करोड़ की रिश्वत दी। एक अमेरिकी कोर्ट द्वारा कंपनी के खिलाफ आरोप लगाए जाने के बाद ये आरोप सामने आए थे।
हालाँकि अमेरिका में लगे आरोप के अलावा , इस तरह की रिश्वतखोरी का कोई और आरोप कंपनी पर नहीं लगे हैं। ₹2,000 करोड़ बहुत बड़ी रकम है, और जब तक जाँच में सच सामने नहीं आ जाता, ये एक आरोप ही रहेगा।
अडानी समूह ने आरोपों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र कानूनी फर्म नियुक्त की थी। फर्म ने समीक्षा बैठक की। इसमें सामने आया कि अडानी ग्रीन और दूसरी कंपनियाँ सभी लागू कानूनों और नियमों का पालन कर रही थीं। आंध्र प्रदेश सरकार भी उन राज्य सरकारों में शामिल हैं, जिन पर रिश्वत लेने के आरोप हैं। हालाँकि इन आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला।
गौरतलब है कि अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) की फाइलिंग के अनुसार, गौतम अडानी ने 2021 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआरसीपी प्रमुख वाईएस जगन मोहन रेड्डी थे। दरअसल, 2021 से 2022 के बीच जिन राज्यों पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया है, उनमें से कोई भी उस दौरान भाजपा शासित नहीं था, बल्कि उन सभी राज्यों में भाजपा विरोधी दल सत्ता में थे।
इसलिए, कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा लगाए गए सभी आरोप झूठे, निराधार और अजीब हैं। भारत और विदेशों में अडानी समूह ने टेंडर अपने नाम किया। उन बोलियों पर मोदी सरकार द्वारा अनुचित दबाव डालने के कोई सबूत या आरोप भी नहीं हैं। यह आरोप लगाना भी हास्यास्पद है कि मोदी सरकार ऑस्ट्रेलिया और इजराइल जैसी विदेशी सरकारों के फैसले को प्रभावित कर सकती है।
ये कोई नए आरोप नहीं हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी वर्षों से ये आरोप लगाती रही है। इन सभी का पहले खंडन किया जा चुका है। फिर भी, आर्थिक मामलों को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी न केवल मोदी सरकार पर हमला कर रही है, बल्कि भारत की विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश कर रही है।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


