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‘80% हिंदुओं के पिछड़ेपन के लिए रामायण-मनुस्मृति जिम्मेदार’: क्या MP की BJP की सरकार ने दाखिल किया है हिंदू विरोधी हलफनामा, जानिए पूरा मामला

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जारी किए स्पष्टीकरण में साफ किया कि ये टिप्पणियाँ उनके हलफनामें का हिस्सा नहीं है। सरकार ने बताया कि विवादित कन्टेन्ट रामजी महाजन की अध्यक्षता वाले मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट से लिया गया है, जिसका गठन 17 नवंबर 1980 को कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था।

सोशल मीडिया पर कुछ स्क्रीनशॉट्स वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार हिंदू-विरोधी है। वायरल स्क्रीनशॉट्स सुप्रीम कोर्ट में चल रहे OBC आरक्षण के हलफनामा के बताए गए, जिनमें कुछ ऐसे विवादित बयान थे जो हिंदू सभ्यता को निशाना बनाने वाले विवादित दावों से जुड़े थे।

इन स्क्रीनशॉ्टस के सोशल मीडिया पर वायरल होने के कुछ घंटों बाद ही 1 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने ‘हिंदू-विरोधी’ आरोपों पर फैक्ट-चेक जारी कर दिया।

ट्विटर पर वायरल कुछ स्क्रीनशॉट्स में और भी अजीब बातें लिखी दिखीं। एक जगह दावा किया गया था कि रामायण में ‘ऋषि शंबूक’ की हत्या जाति उत्पीड़न का उदाहरण है। लेकिन सच्चाई ये है कि श्रीराम ने शंबूक को उसकी जाति की वजह से नहीं मारा था बल्कि उसके इरादे माता पार्वती के प्रति गलत थे, इसलिए उसे दंड दिया गया।

एक और दावे में कहा गया कि मनुस्मृति में शूद्रों की जानवरों से तुलना करके उन्हें अपमानित किया है। इसमें ये भी लिखा था कि अंग्रेजों के सुधार और पेरियार की ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की वजह से जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ। यहाँ तक कि इस दस्तावेज में ये दावा भी किया गया कि हिंदू समाज को जानबूझकर सदियों तक बँटा हुआ रखा गया ताकि ऊँची जातियों का वर्चस्व बना रहे।

मनुस्मृति को लेकर अक्सर हिंदुओं पर आरोप लगाए जाते हैं लेकिन जो लोग मनुस्मृति की सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद हिंदू कोड बिल बनाते समय मनुस्मृति का हवाला दिया था और उससे मदद ली थी।

आलोचना का दूसरा बड़ा हिस्सा पेरियार को लेकर है। कहा जाता है कि जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ करने का श्रेय ई.वी. रामास्वामी यानी पेरियार को जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि पेरियार खुले तौर पर हिंदू-विरोधी विचारों वाले व्यक्ति थे। इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक उनसे नाराज रहते थे।

नेहरू ने 5 नवंबर 1957 को मद्रास के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कामराज को लिखे एक पत्र में साफ लिखा था, “मैं ई.वी. रामास्वामी नायकर द्वारा लगातार चलाए जा रहे एंटी-ब्राह्मण अभियान से बेहद दुखी हूँ। मैंने पहले भी आपको इस बारे में लिखा था और मुझे बताया गया था कि इस मामले पर विचार किया जा रहा है।”

नेहरू ने अपने पत्र में और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने लिखा, “मुझे लगता है कि रामास्वामी नायकर बार-बार वही बातें दोहरा रहे हैं और लोगों को उकसा रहे हैं कि वे मौका आने पर छुरा भोंकें और हत्या करें। ऐसी बातें केवल कोई अपराधी या पागल व्यक्ति ही कह सकता है।”

प्रधानमंत्री नेहरू ने मद्रास के मुख्यमंत्री से कहा, “मैं उन्हें ठीक से नहीं जानता कि तय कर सकूँ वे असल में क्या हैं, लेकिन एक बात साफ है कि इस तरह की बातें देश पर बहुत ही बुरा असर डाल रही हैं। तमाम असामाजिक और आपराधिक तत्व यह मानने लगते हैं कि वे भी इसी तरह की हरकतें कर सकते हैं।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का मानना ​​था कि पेरियार जैसे ब्राह्मण-विरोधी ‘कार्यकर्ताओं’ को पागलखाने में रखा जाना चाहिए जहाँ उनके ‘विकृत दिमागों’ का इलाज किया जा सके।

इस पूरे मुद्दे ने सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़का दिया। खासकर हिंदू संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने अदालत के हलफनामे में कथित तौर पर ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ का समर्थन करके अपनी वैचारिक जड़ों से गद्दारी की है। कई घंटों तक ‘एंटी-हिंदू’ कहकर सरकार के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड होते रहे, जिसे विपक्षी दलों ने और हवा दी।

हलफनामा नहीं, कॉन्ग्रेस-कालीन आयोग की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जारी किए स्पष्टीकरण में साफ किया कि ये टिप्पणियाँ उनके हलफनामें का हिस्सा नहीं है। सरकार ने बताया कि विवादित कन्टेन्ट रामजी महाजन की अध्यक्षता वाले मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट से लिया गया है, जिसका गठन 17 नवंबर 1980 को कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था। आयोग ने 22 दिसंबर 1983 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

महाजन रिपोर्ट और कई अन्य आयोगों की रिपोर्टें लंबे समय से सरकारी रिकॉर्ड्स का हिस्सा रही हैं। चूँकि OBC आरक्षण का मामला दशकों से न्यायिक जाँच के दायरे में है, इसलिए ये दस्तावेज पहले ही हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके थे और इसी कारण वे खुद ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल केस फाइल का हिस्सा बन गए।

राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि ऐसी रिपोर्टों को न्यायिक फाइल में शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि वर्तमान सरकार उनके निष्कर्षों का समर्थन करती है। बल्कि यह एक पूरी प्रक्रियात्मक जरूरत है क्योंकि आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सभी प्रासंगिक पुरानी रिपोर्टें नियमित रूप से अदालत के समक्ष रखी जाती हैं।

सरकार ने बताया कि महाजन रिपोर्ट के साथ-साथ सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की 1994 से 2011 तक की वार्षिक रिपोर्टें और राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग की 2022 की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की थीं। यह स्पष्टीकरण इसीलिए दिया गया ताकि यह साफ हो सके कि जो पन्ने वायरल हुए हैं, वे बीजेपी सरकार द्वारा तैयार किए गए हलफनामे का हिस्सा नहीं है बल्कि कॉन्ग्रेस शासनकाल की एक रिपोर्ट है जो न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा रही है।

आरक्षण के आँकड़ों की तुलना

बीजेपी सरकार ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि महाजन आयोग ने OBC के लिए 35% आरक्षण की सिफारिश की थी। जबकि वर्तमान राज्य सरकार 27% आरक्षण की माँग पर कायम है। सरकार ने कहा कि यही बात साबित करती है कि बीजेपी महाजन रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं मानती। इसके बजाए राज्य ने अपने नीति-निर्णयों को संवैधानिक मानकों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर तय किया है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो महाजन आयोग के सुझावों को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। बीजेपी का तर्क था कि अगर वह 1983 की रिपोर्ट से सहमत होती तो 35% OBC कोटा लागू करती। लेकिन उसके बजाए उसने कम संख्या पर ही समझौता कर लिया।

राज्य सरकार ने बताया दुर्भावनापूर्ण अभियान

सरकार के बयान में इन वायरल स्क्रीनशॉट्स को ‘झूठा, मनगढ़ंत, भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रेरित’ बताया गया। बयान में कहा गया कि शैक्षणिक या आयोग रिपोर्टों के चुनिंदा अंशों को अलग-थलग पेश करना राज्य के खिलाफ ‘दुष्प्रचार अभियान’ का हिस्सा है।

बयान में यह भी जोर देकर कहा गया कि मध्य प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक समरसता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और वह कभी भी ऐसे किसी नैरेटिव का समर्थन नहीं करेगी जो हिंदू परंपराओं या ग्रंथों को बदनाम करने का प्रयास करे। सरकार ने चेतावनी भी दी कि यह जाँच की जाएगी कि भ्रामक स्क्रीनशॉट्स कैसे प्रसारित हुए और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया पर आक्रोश

इस विवाद ने राजनीतिक क्षेत्र में काफी नुकसान पहुँचाया है। बीजेपी के आलोचकों ने पार्टी पर लापरवाही का आरोप लगाया। यह कहते हुए कि ऐसी रिपोर्टों को सिस्टम में बने रहने देना गंभीर चूक है। कुछ लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि इन दस्तावेजों का आधिकारिक रिकॉर्ड्स में मौजूद होना इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस शासनकाल का प्रोपेगेंडा सरकारी तंत्र में गहराई तक समा चुका है।

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार को तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। एक एक्स यूजर ने लिखा, “बीजेपी सक्रिय रूप से सामान्य वर्ग के खिलाफ विभाजन और नफरत फैला रही है।”

एक अन्य यूजर ने कहा, “यह सिर्फ विश्वासघात नहीं है। यहा बीजेपी का उन लोगों पर थूकना है जो हर अच्छे-बुरे समय में उसके साथ खड़े रहे। और विडंबना? तथाकथित ‘हिंदुत्व पार्टी’ अब पेरियारवादियों और अंग्रेजों की तरह वोट बैंक के लिए गंदा काम कर रही है।”

लंबे समय तक चलने वाले सवाल

हालाँकि, पर भ्रामक कन्टेन्ट पर मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने स्पष्टीकरण जारी कर दिया है लेकिन यह अब भी चिंता का विषय है कि सरकार बदलने के बावजूद वामपंथी प्रोपेगेंडा से प्रेरित दस्तावेज सिस्टम और रिकॉर्ड्स का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई की अगली तारीख 08 अक्टूबर 2025 तय की गई है। अब यह देखना बाकी है कि क्या यह विवाद कोर्ट की बहस का हिस्सा बनेगा।

फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने जोर देकर कहा है कि उनके हलफनामें में किसी भी प्रकार का हिंदू-विरोधी बयान नहीं दिया गया है और जो लोग मनगढ़ंत सामग्री फैला रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सरकार का कहना है, “प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक सद्भाव के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। दोहराया जाता है कि जो वायरल कंटेंट है, वह न तो सरकार के हलफनामे का हिस्सा है और न ही किसी अधिकृत या आधिकारिक नीति या निर्णय से जुड़ी है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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