केरल के मावेलिक्कारा की एक एडिशनल सेशंस कोर्ट ने मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को साल 2012 के चर्चित विशाल कुमार हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में नामजद सभी 20 आरोपितों को बरी कर दिया है। जज पीपी पूजा ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) आरोपितों के खिलाफ लगे आरोपों को बिना किसी शक के साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। ऑपइंडिया के पास इस केस के फैसले की कॉपी मौजूद है।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात से इनकार नहीं किया कि ABVP कार्यकर्ता विशाल कुमार की हत्या हुई थी, लेकिन कानूनी तौर पर यह साफ नहीं हो सका कि असल में यह हत्या किसने की। कोर्ट के मुताबिक, सबूतों के अभाव में इतनी बड़ी भीड़ को इस अपराध के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, दूसरी ओर सरकारी पक्ष ने कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
A Kerala court on Tuesday (December 30) acquitted all 20 accused individuals, reportedly workers of the Campus Front, in the 2012 murder case of ABVP activist Vishal Kumar in Alappuzha.
— Republic (@republic) December 30, 2025
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यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए किसी गहरे जख्म की तरह है। ऐसा इसलिए नहीं कि कोर्ट से बिना सबूत सजा देने की उम्मीद थी, बल्कि इसलिए क्योंकि बरी करने के जो कारण बताए गए, उन्होंने पूरी व्यवस्था की नाकामी को उजागर कर दिया। कोर्ट के फैसले से साफ हुआ कि जिस दिन विशाल की हत्या हुई, उसी दिन से शुरू हुई जाँच में बुनियादी कमियाँ थीं। पुलिस न तो शुरुआती बयान को ठीक से दर्ज कर पाई, न ही समय पर कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई। इसके अलावा, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे और पहचान की प्रक्रिया व हथियारों की बरामदगी में भी भारी गड़बड़ी थी।
सिस्टम की इन लापरवाहियों की वजह से मामले में इतने छेद और विरोधाभास पैदा हो गए कि एक भीड़भाड़ वाले कैंपस में हुई हत्या का कानूनी नतीजा यह निकला कि किसी को सजा नहीं दी जा सकी। अंत में यह मामला एक ऐसी दुखद सुर्खी बनकर रह गया कि 13 साल पहले एक युवा ABVP कार्यकर्ता की सरेआम चाकू मारकर हत्या कर दी गई, लेकिन कानून की नजर में उसे ‘किसी ने नहीं मारा’।
जुलाई 2012 का कैंपस हत्याकांड
यह घटना जुलाई 2012 की है, जब विशाल कुमार सिर्फ 19 साल के थे। वह चेंगनूर के रहने वाले थे और कोन्नी के एनएसएस (NSS) कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष के छात्र होने के साथ-साथ ABVP के एक्टिव कार्यकर्ता भी थे। 16 जुलाई की सुबह, वह नए छात्रों का स्वागत करने के लिए क्रिश्चियन कॉलेज पहुँचे थे। सरकारी पक्ष के अनुसार, वहाँ ‘कैंपस फ्रंट’ के कुछ सदस्य आए और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के साथ गाली-गलौज और बहस करने लगे।
देखते ही देखते यह बहस हिंसक झड़प में बदल गई, जिसमें चाकू और अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया गया। विशाल बीच-बचाव कर मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे थे, उन पर ही चाकू से हमला कर दिया गया। इस हमले में विशाल के अलावा विष्णुप्रसाद और श्रीजीत नाम के दो अन्य ABVP कार्यकर्ता भी घायल हुए थे।
हमले के तुरंत बाद विशाल को चेंगन्नूर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें कोट्टायम मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन अगले दिन तड़के विशाल ने दम तोड़ दिया। यह कोई ऐसी घटना नहीं थी जो किसी सुनसान जगह या अकेले में हुई हो। यह सब कुछ एक कॉलेज के गेट के बाहर हुआ, जहाँ राजनीति की वजह से माहौल पहले से ही गरमाया हुआ था और उस वक्त वहाँ सैकड़ों छात्र मौजूद थे।
यह जानकारी बेहद अहम है क्योंकि कोर्ट के फैसले में बार-बार एक ही बात सामने आई- ऐसी स्थिति में, जहाँ घटना सैकड़ों लोगों के सामने हुई हो, सरकारी पक्ष (Prosecution) को या तो बहुत मजबूत और स्वतंत्र सबूत पेश करने चाहिए थे या फिर अपने मुख्य गवाहों के जरिए एक ऐसी कहानी रखनी चाहिए थी जिसमें कोई बदलाव या शक की गुंजाइश न हो। लेकिन, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष की दलीलों में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया जिससे आरोपितों का दोष पक्का हो सके।
कौन थे आरोपित और क्यों गहराया सियासी साया?
अदालत ने जिन 20 लोगों को बरी किया है, उन्हें ‘कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया’ (CFI) का सदस्य बताया गया था। यह संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (PFI) की छात्र शाखा थी, जिस पर भारत सरकार ने सितंबर 2022 में प्रतिबंध लगा दिया था। इस मामले में एक अन्य आरोपित घटना के समय नाबालिग था, इसलिए उसका केस अलग कर दिया गया और उसकी सुनवाई अलाप्पुझा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) में चल रही है।
कोर्ट द्वारा बरी किए गए लोगों की सूची में आशिक, शफीक, अंसार फैसल, आसिफ मोहम्मद, नसीम, सानुज, अल्थाज, समीर राऊथर, सफीर, अफजल, अब्दुल वहाब, शिबिन हबीब, शाहजहां मौलवी, नवाज शरीफ, समीर, सजीव और सलीम जैसे नाम शामिल थे।
इन सभी पर हत्या, घातक हथियारों के साथ गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा होने, दंगा भड़काने, बंधक बनाने और साजिश रचने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगे थे। कुछ लोगों पर आरोपितों को शरण देने का भी आरोप था। दूसरी ओर, बचाव पक्ष (डिफेंस) का तर्क था कि मामले को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया ताकि राजनीति के चलते ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसमें फँसाया जा सके। उनका कहना था कि हमला सिर्फ एक व्यक्ति ने किया था, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए बाकी लोगों को भी इस ट्रायल में घसीट लिया गया।
निष्कर्ष के तौर पर, अदालत का फैसला बचाव पक्ष के तर्कों के काफी करीब रहा। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि कोर्ट ने बचाव पक्ष की हर बात मान ली, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि सरकारी पक्ष (Prosecution) सजा दिलाने के लिए जरूरी कड़े कानूनी मापदंडों और सबूतों को पेश नहीं कर पाया।
यहीं पर पीड़ित के नजरिए से मामले को देखना जरूरी हो जाता है। भले ही सबूतों की कमी होने पर अदालतों को आरोपितों को बरी करना पड़ता है, लेकिन असली सवाल यह है कि सबूत इतने कमजोर क्यों रह गए? कोर्ट के फैसले ने जाँच में उन कमियों की ओर इशारा किया है जिनसे बचा जा सकता था। ये कमियाँ सीधे तौर पर पुलिस और सरकारी पक्ष की उन नाकामियों को उजागर करती हैं, जिन्हें अगर समय रहते सुधारा जाता तो शायद नतीजा कुछ और होता।
तेरह साल की यात्रा और देरी की कीमत
शुरुआत में इस मामले की जाँच स्थानीय पुलिस ने की थी, जिसे बाद में क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। पुलिस ने नाबालिग सहित कुल 20 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। पूरे ट्रायल के दौरान सरकारी पक्ष ने 55 गवाहों और 205 दस्तावेजों को अदालत के सामने पेश किया और समय-समय पर कई अधिकारियों ने इस केस की कमान संभाली।
अक्सर देखा जाता है कि जब केस सालों तक खिंचता है, तो गवाह अपनी बात से मुकरने लगते हैं और पुरानी यादें धुंधली हो जाती हैं, जिसका असर केस पर पड़ता है। लेकिन इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि केस की कमजोरियाँ केवल समय बीतने की वजह से नहीं थीं। जाँच में कई बड़ी खामियाँ तो पहले दिन से ही मौजूद थीं, जैसे शुरुआती जानकारी (FIR) को सही ढंग से दर्ज न करना, गवाहों की पहचान की सही प्रक्रिया का पालन न करना और बरामद किए गए सबूतों को दस्तावेजों में ठीक से पेश न कर पाना।
अदालत के इस फैसले को एक सबक की तरह देखा जाना चाहिए कि कैसे कानूनी प्रक्रिया में ‘संदेह का लाभ’ पैदा होता है। यहाँ अपराध तो साफ था, लेकिन पुलिस ने केस को कानूनी कसौटी पर इतनी मजबूती से खड़ा नहीं किया कि वह अदालत की जिरह का सामना कर पाता।
पहली खामी: केस का शुरुआती वर्जन ही निकला कमजोर
अदालत के फैसले में सरकारी पक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कोर्ट ने माना कि केस की शुरुआती जानकारी (FIR) और उससे जुड़े दस्तावेजों के साथ हेरफेर की गई थी। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पुलिस का यह दावा भरोसे के लायक नहीं है कि घटना की रिपोर्ट सुबह 11:45 बजे लिखनी शुरू कर दी गई थी।
बचाव पक्ष की दलीलों में दम पाते हुए कोर्ट ने नोट किया कि दस्तावेजों को असली समय से पहले का दिखाने की कोशिश की गई (Antitimed) और शायद तारीखें भी पीछे की डाली गई थीं। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि ये कागजात घटना के अगले दिन, यानी 17 जुलाई 2012 को सुबह 10:45 बजे कोर्ट पहुँचे थे। कोर्ट ने साफ कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि पुलिस ने कागजी कार्रवाई में जानबूझकर समय और तारीखों का खेल किया था।
यह कोई छोटी-मोटी तकनीकी गलती नहीं थी। किसी भी आपराधिक मामले में, शुरुआत में दी गई जानकारी (FIR) जितनी जल्दी और भरोसेमंद तरीके से दर्ज होती है, केस उतना ही मजबूत होता है। लेकिन जब शुरुआती कहानी ही शक के घेरे में आ जाए, तो पूरी जाँच ऐसी लगने लगती है जैसे उसे बाद में अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ा गया हो। खासकर तब, जब बाद में दिए गए बयानों में नए नाम, भूमिकाएँ और मकसद जोड़ दिए जाते हैं जो शुरुआत में कहीं थे ही नहीं।
कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि पुलिस स्टेशन में सूचना कब मिली और उसे कैसे दर्ज किया गया, ये दावे भी भरोसे लायक नहीं हैं। कानून का सीधा सा नियम है- अगर अदालत शुरुआती कहानी को ही संदिग्ध मान ले, तो बाद में गवाहों द्वारा जोड़े गए नए तथ्यों को ‘कहानी में मिर्च-मसाला’ मानकर खारिज करना बहुत आसान हो जाता है।
दूसरी बड़ी बात: पुलिस ने आधी-अधूरी और एकतरफा कहानी सुनाई
अदालत के फैसले का एक अहम हिस्सा उस टकराव की वजह और वहाँ मौजूद अन्य छात्र संगठनों से जुड़ा था। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) ने यह छिपाया कि असल में विवाद शुरू कैसे हुआ था। उन्होंने सिर्फ ABVP सदस्यों के पक्ष को ही सामने रखा, जिससे पुलिस की पूरी कहानी शक के घेरे में आ गई।
अदालत की यह टिप्पणी बेहद गंभीर है क्योंकि यह सिर्फ किसी गवाह के बयान बदलने का मामला नहीं था। जज ने माना कि पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में पूरी सच्चाई पेश नहीं की- जैसे कि विवाद की असली जड़ क्या थी, वहाँ कौन-कौन लोग मौजूद थे और वह झड़प वास्तव में कैसे शुरू हुई थी। इस अधूरे सच की वजह से पूरा केस कानूनी तौर पर कमजोर साबित हुआ।
कॉलेज कैंपस जैसे राजनीतिक माहौल में हुई घटनाओं के मामले में अदालतें निष्पक्षता और ठोस सबूतों की उम्मीद करती हैं। अगर मौके पर कई अलग-अलग गुट मौजूद थे, तो कोर्ट यह उम्मीद करता है कि पुलिस या तो स्वतंत्र गवाह पेश करे या कम से कम पूरी घटना का एक निष्पक्ष और साफ मंजर अदालत के सामने रखे। कोर्ट की सख्ती यह इशारा करती है कि इस केस की जाँच और सुनवाई के दौरान इन बुनियादी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया, जिससे पूरी कहानी एकतरफा नजर आई।
जब चश्मदीद ही नहीं जीत पाए कोर्ट का भरोसा
सरकारी पक्ष ने अपना पूरा भरोसा घायल चश्मदीदों पर टिकाया था, जो घटना के वक्त विशाल के साथ थे। आमतौर पर अदालतों में घायल गवाहों की बात को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि वे मौके पर मौजूद थे और असली हमलावरों को छोड़कर किसी निर्दोष को फँसाने का उनका कोई इरादा नहीं होगा।
लेकिन, कोर्ट फिर भी गवाहों की सच्चाई, उनकी बातों में तालमेल और कानूनी प्रक्रिया की बारीकी से जाँच करता है। इस मामले में, कोर्ट ने बार-बार पाया कि शुरुआती बयानों में बहुत सी बातें गायब थीं, जिन्हें बाद में जोड़कर सुधारने की कोशिश की गई। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या गवाह आरोपितों को पहले से जानते थे? कोर्ट ने कहा कि अगर मुख्य गवाह आरोपितों को पहले से जानता था, जैसा कि उसने बाद में दावा किया, तो यह बात पहली रिपोर्ट (FIR) में ही होनी चाहिए थी। शुरू में इन जानकारियों का न होना आरोपितों की पहचान, वहाँ उनकी मौजूदगी और उनकी भूमिका पर गहरा शक पैदा करता है।
यहीं पर जाँच में देरी और लचर दस्तावेजीकरण का खामियाजा भुगतना पड़ा। नियम यह है कि अगर गवाह हमलावरों को पहले से जानता है, तो वह बात तुरंत रिकॉर्ड होनी चाहिए। और अगर वह उन्हें नहीं जानता, तो पुलिस को कानूनी तरीके से ‘शिनाख्त परेड’ (Identification Procedure) करानी चाहिए थी। पुलिस और सरकारी पक्ष दोनों ही मोर्चों पर फेल रहे। उन्होंने न तो शुरू में आरोपितों की पहचान दर्ज की और न ही बाद में अनजान हमलावरों की सही तरीके से पहचान करवाई। इसी उलझन और लापरवाही की वजह से पूरा केस कोर्ट में टिक नहीं पाया।
बड़ी कानूनी चूक: पहचान परेड न होने से मिला आरोपितों को फायदा
अदालत के फैसले में बार-बार एक ही बड़ी कमी सामने आई- आरोपितों की पहचान से जुड़े सबूतों की कमजोरी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले के हालात को देखते हुए, बिना ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (शिनाख्त परेड) के केवल गवाहों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब गवाहों ने समय के साथ अपने बयानों में बदलाव किए हों, जिससे उनकी विश्वसनीयता कम हो गई हो।
कम से कम एक आरोपित के मामले में तो यह नोट किया गया कि किसी भी गवाह ने शिनाख्त परेड के जरिए उसकी पहचान नहीं की थी। असल में, सरकारी पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार ही नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि कई आरोपितों की पहचान सही कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई थी।
यह कोई छोटी चूक नहीं थी। जब आरोपित पहले से परिचित न हों, तो ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह गवाह की याददाश्त और पहचान की शुद्धता को तब सुरक्षित कर लेती है जब यादें ताजा होती हैं और गवाह ने मीडिया या पुलिस के जरिए आरोपितों की तस्वीरें न देखी हों।
जब पुलिस इस कदम को छोड़ देती है, तो बरसों बाद अदालत में खड़े होकर आरोपित की तरफ उंगली उठाना बेअसर हो जाता है, क्योंकि तब बचाव पक्ष आसानी से कह सकता है कि गवाह सिर्फ उसी व्यक्ति की तरफ इशारा कर रहा है जिसे पुलिस ने ‘आरोपित’ बताया है।
भीड़ द्वारा किए गए हमले के मामलों में पहचान और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति की मौके पर मौजूदगी ही पुख्ता तरीके से साबित नहीं हो पाती, तो पूरे समूह को दोषी ठहराने का कानूनी आधार ही ढह जाता है।
असली मकसद पर सवाल: शुरू में गायब था ‘लव जिहाद’ का दावा
सरकारी पक्ष ने दलील दी थी कि विशाल की हत्या का एक कारण यह भी था कि वह ‘लव जिहाद’ जैसी गतिविधियों का विरोध कर रहा था। लेकिन अदालत के फैसले ने इस दावे की पोल खोल दी। जज ने नोट किया कि शुरुआती बयानों में इस तरह की किसी भी बात का जिक्र तक नहीं था। यहाँ तक कि गवाहों ने भी खुद यह माना कि जाँच के शुरुआती दौर में उन्होंने ऐसा कोई बयान पुलिस को नहीं दिया था।
कानून की नजर में, जब किसी घटना का मकसद काफी समय बाद बताया जाता है, तो अदालतें उसे संदेह की दृष्टि से देखती हैं। हालाँकि, प्रत्यक्ष सबूत होने पर मकसद बताना हमेशा जरूरी नहीं होता, लेकिन जब चश्मदीदों की गवाही कमजोर पड़ने लगे, तो ‘मकसद’ ही वह कड़ी होती है जो पूरी कहानी को जोड़कर रखती है। और अगर यह कड़ी ही बाद में जोड़ी गई महसूस हो, तो पूरा केस और भी कमजोर हो जाता है।
यहाँ मुद्दा यह नहीं था कि ‘लव जिहाद’ का दावा हकीकत में सच था या झूठ। मुद्दा यह था कि पुलिस ने केस को कैसे तैयार किया। अगर पुलिस चाहती थी कि अदालत इस मकसद को गंभीरता से ले, तो उसे इसे शुरुआत में ही दर्ज करना चाहिए था और इसके पक्ष में ठोस सबूत जुटाने चाहिए थे। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं किया गया।
कमजोर कड़ियाँ: देरी से कागजी कार्रवाई और गवाहों का गायब होना
अदालत के फैसले में तलाशी और सबूतों की बरामदगी के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। विशेष रूप से उस आरोपित के घर की तलाशी को लेकर, जिस पर चाकू मारने का आरोप था। कोर्ट ने गौर किया कि जिस अधिकारी ने उस आरोपित के घर की तलाशी ली थी, न तो उसका नाम गवाहों की सूची में शामिल किया गया और न ही उसे गवाही के लिए बुलाया गया। इसके अलावा, तलाशी का मेमो (दस्तावेज) 17 जुलाई 2012 को तैयार किया गया बताया गया, लेकिन वह कोर्ट में 25 जुलाई को पहुँचा।
किसी भी गंभीर मुकदमे में तलाशी के कागजात का देरी से पहुँचना और तलाशी लेने वाले अधिकारी को पेश न करना, बचाव पक्ष के लिए किसी तोहफे से कम नहीं होता। इससे यह तर्क देने का मौका मिल जाता है कि सबूतों के साथ बाद में छेड़छाड़ की गई है या कागजी कार्रवाई मनगढ़ंत है। अदालत को सबूतों को सीधे तौर पर ‘झूठा’ घोषित करने की जरूरत नहीं होती। साबित करने के तरीके में इतनी देरी और लापरवाही ही उस सबूत को अविश्वसनीय बनाने के लिए काफी होती है।
कोर्ट का साफ कहना: फॉरेंसिक रिपोर्ट से भी नहीं मिली मदद
जब चश्मदीदों के बयानों पर विवाद छिड़ता है, तो अक्सर फॉरेंसिक जाँच ही पुलिस के डूबते हुए केस को बचाती है। लेकिन इस मामले में, कोर्ट के फैसले ने साफ कर दिया कि फॉरेंसिक से भी कोई खास मदद नहीं मिली। अदालत ने गौर किया कि बरामद किए गए सबूतों (हथियार और कपड़े) पर खून तो था, लेकिन वह इतनी कम मात्रा में था कि उसकी उत्पत्ति या ब्लड ग्रुप का पता लगाना नामुमकिन था। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कपड़ों पर इंसान का खून मिलना ही किसी को दोषी साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि यह पक्का न हो जाए कि वह खून पीड़ित का ही था।
अक्सर नाकाम साबित होने वाले मुकदमों में यही पैटर्न देखा जाता है। जब हथियार या कपड़ों का पीड़ित से कोई पुख्ता वैज्ञानिक कनेक्शन नहीं जुड़ पाता, तो अदालतें उसे ठोस सबूत नहीं मानतीं- खासकर तब, जब गवाहों की बातें पहले से ही शक के घेरे में हों। इसका मतलब यह नहीं है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पुलिस की कहानी को गलत साबित किया, बल्कि इसका मतलब यह है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट इतनी मजबूत नहीं थी कि वह आरोपितों को सजा दिलाने के लिए जरूरी ‘कानूनी मानक’ को पार कर पाती।
नाकाम कोशिश: जब हत्या ही साबित न हुई, तो साजिश का आरोप भी फेल
जब अदालत ने पाया कि हत्या का मुख्य मामला ही संदेह से परे साबित नहीं हो सका, तो साजिश और अपराधियों को पनाह देने जैसे अतिरिक्त आरोपों के टिकने की गुंजाइश बहुत कम रह गई। कोर्ट के फैसले ने इशारा किया कि पुलिस यह ठोस तरीके से साबित नहीं कर पाई कि आरोपितों ने हमलावरों को शरण दी थी या कानून के मानकों के अनुसार उनके बीच कोई साजिश रची गई थी।
यह सिर्फ कोई तकनीकी नतीजा नहीं था, बल्कि इससे यह पता चला कि सरकारी पक्ष ने एक बहुत बड़ा जाल तो बुना, लेकिन उसकी बुनियाद को मजबूत करना भूल गया। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अक्सर यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि मामले की गंभीरता दिखाने के लिए बहुत से लोगों पर साजिश और सामूहिक हमले की धाराएँ लगा दी जाती हैं। लेकिन इसका जोखिम यह है कि अगर आरोपितों की पहचान और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह पुख्ता न हो, तो यही फैलाव केस की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। हर नया आरोपित संदेह का एक नया बिंदु बन जाता है, जिससे बचाव पक्ष को केस में छेद करने का मौका मिल जाता है और आखिरकार अदालत को फैसला सुनाने में झिझक होने लगती है।
अब आगे क्या?
सरकारी पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है। अब हाई कोर्ट यह देखेगा कि क्या निचली अदालत ने सबूतों को समझने में कोई गलती की, क्या कानूनी सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू किया गया और क्या बरी करने के फैसले को पलटा जा सकता है। हालाँकि, बरी किए गए आरोपितों के खिलाफ अपील जीतना आसान नहीं होता, क्योंकि ऊपरी अदालतें तब तक दखल नहीं देतीं जब तक कि फैसले में कोई बहुत बड़ी और साफ गलती न दिखे।
लेकिन इन कानूनी उलझनों के बीच एक कड़वा सच नहीं बदलता। विशाल कुमार सिर्फ 19 साल का था। कॉलेज के गेट के बाहर हुए हमले में चाकू लगने से उसकी जान चली गई और वह कभी घर नहीं लौटा। उसके परिवार ने 13 साल तक इंसाफ का इंतजार किया, लेकिन जो फैसला आया उसने उनके जख्मों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया।
अगर हमारा सिस्टम भविष्य में ऐसे नतीजों से बचना चाहता है, तो उसे इस फैसले से सबक लेना होगा। इसके लिए कोर्ट पर उंगली उठाने के बजाय उन जाँच अधिकारियों और वकीलों की जवाबदेही तय करनी होगी जो शुरू से ही जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में नाकाम रहे। जब शुरुआती रिपोर्ट संदिग्ध हो, पहचान परेड न हुई हो, गवाह अपनी बातें बदलें और फॉरेंसिक रिपोर्ट साथ न दे, तो अदालत का फैसला पहले से ही तय हो जाता है। ऐसे में आरोपित आजाद हो जाते हैं, पीड़ित की यादें एक बार फिर दफन हो जाती हैं और समाज के सामने एक खौफनाक जुमला सच बनकर रह जाता है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए सामान्य नहीं होना चाहिए।
विशाल कुमार को किसी ने नहीं मारा। ऐसा इसलिए नहीं कि कत्ल नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए क्योंकि सरकार और पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि कातिल कौन था।
कोर्ट का फैसला आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


