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मिडिल ईस्ट संकट पर पाकिस्तान की मुरीद हुई कॉन्ग्रेस, भारत सरकार की कोशिशों पर मूँद ली आँखें: जानें- क्यों ईरान युद्ध में घुसना PAK के लिए मजबूरी?

ईरान युद्ध में भारत की भूमिका पर कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने आँखें मूद ली हैं, लेकिन उन्हें पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की भागीदारी दिखाई दे रही है, जिसे कोई नहीं पूछ रहा। उसकी मुरीद होकर वह सरकार से सवाल करती हैं। तो उन्होंने यह बताना होगा कि कैसे भारत युद्ध के शुरुआत से सक्रिय भूमिका में है और पाकिस्तान डर के मारे आगे आने का नाटक का रहा है।

फिलहाल दुनिया भर में जिस मामले पर प्राथमिकता से बात हो रही है, वह अमेरिका, इजरायल और ईरान का युद्ध है। भारत में भी आपको सड़क-मोहल्ले तक में इस युद्ध के बारे में चर्चा सुनाई देती है। युद्ध के प्रभाव से निजात के लिए भी सरकार आए दिन बयान जारी कर रही है कि भारत अलग-अलग देशों से बातचीत भी कर रहा है। यानी भारत की भूमिका तो है। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत को शायद आँखें मूँद ली हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की भागीदारी दिखाई दे रही है, जिसे कोई नहीं पूछ रहा।

यह हम नहीं वह खुद कह रही हैं। सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान और अमेरिका के युद्ध के समय पाकिस्तान एक अहम देश बनकर सामने आ रहा है, लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? यह कहते हुए कॉन्ग्रेस नेता सरकार से सवाल करती हैं, इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही? अगर यह हमारी विदेश नीति की बड़ी नाकामी नहीं है, तो फिर क्या है?

पाकिस्तान के हित में सुप्रिया श्रीनेत का बयान

दरअसल, सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर सुप्रिया श्रीनेत ने ईरान युद्ध को लेकर सरकार से सवाल करते हुए एक वीडियो जारी किया। वीडियो में सरकार से सवाल करने तक तो ठीक था, लेकिन पाकिस्तान के हित में बोलते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने कॉन्ग्रेस की राजनीति की पोल खोलकर रख दी।

सुप्रिया श्रीनेत ने भारत सरकार पर सवाल उठाते हुए और पाकिस्तान के हित में बोलते हुए कहा, “मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने में मदद कर रहे हैं। सोचिए, पाकिस्तान जैसा देश इस समय ईरान से जुड़े ट्रंप के संकट में अहम देश बनकर सामने आ रहा है। लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही?”

इतना ही नहीं वह भारत को पाकिस्तान से कमतर आँकते हुए यह तक कहती हैं, “यह समझना मुश्किल है कि पाकिस्तान जैसा देश, जिसे अक्सर आतंकवाद से जोड़ा जाता है, इन अहम बातचीतों का हिस्सा है, जबकि भारत नहीं। यह स्थिति बिल्कुल भी सही नहीं लगती।”

मिडिल ईस्ट तनाव पर भारत की भूमिका

जैसा कि सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान युद्ध में भारत की कोई भूमिका नहीं दिखाई दे रही है। तो या तो वे भारतीय मीडिया की खबरों को फॉलो नहीं करती हैं, या वो लोगों को सच्चाई दिखाने के बजाए अपना नैरेटिव को आगे लाने की कोशिश कर ही हैं। क्योंकि सच्चाई ये नहीं है।

सच्चाई है कि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से ही भारत लगातार मिडिल ईस्ट के देशों से संपर्क बनाए हुए है। 03 मार्च 2026 को ही मिडिल ईस्ट के ओमान, कुवैत और कतर के प्रमुखों से फोन पर बात की। इसी दिन प्रधानमंत्री ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी फोन पर बात की, जिसे लेकर नेतन्याहू ने भी खुशी जाहिर की थी।

यहाँ तक ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से भी प्रधानमंत्री मोदी की फोन पर बातचीत हुई। इस बातचीत में ईरानी राष्ट्रपति ने भारत की भूमिका को सराहा भी है और कहा कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं। और दोनों नेताओं के बीच ये बातचीत ईद के मौके पर भी हुई, तब भी पीएम मोदी ने जल्द से जल्द मिडिल ईस्ट में तनाव खत्म होने के प्रयास जाहिर किए। युद्ध में अहम भूमिका निभा रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक खुद प्रधानमंत्री मोदी को फोन कर संकट पर चर्चा कर रहे हैं।

24 मार्च 2026 को राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों के राष्ट्रध्यक्षों के साथ दो राउंड फोन पर बातचीत हो चुकी है और भारत गल्फ के सभी देशों के साथ संपर्क में है। इसी के साथ भारत ईरान, इजरायल और अमेरिका के भी संपर्क में है। पीएम मोदी ने यह भी दोहराया कि भारत का लक्ष्य संवाद और कूटनीति के माध्यम से क्षेत्र में शांति की बहाली करना है।

इतना ही नहीं युद्ध से भारत पर कोई बड़ा प्रभाव न पड़े, इसकी भी सरकार पूरी तैयारी कर रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार ईरान और खाड़ी देशों से बात कर रहे हैं। जिस तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हार्मुज’ को युद्ध के चलते बंद कर दिया गया है, भारत के अच्छे रिश्ते ही हैं जो वहाँ से दो भारतीय टैंकर मार्ग बंद होने के बावजूद गुजर चुके हैं। संकट की शुरुआत में ही मिडिल ईस्ट में रहने वाले भारतीय नागरिकों को सुरक्षित भारत वापस लाया गया।

ये सरकार के प्रयास ही हैं, जो वे जनता पर युद्ध का असर पढ़ने नहीं दे रहे हैं। बावजूद सरकार के प्रयासों का आभार जताने की जगह उल्टा धनुष और तीर लेकर निशाना बनाने में लगे हुए है। तर्क यही है कि भारत मिडिल ईस्ट से लेकर इजरायल और अमेरिका तक के संपर्क में है और आगे भी रहेगा। यहाँ भारत का रुख भी साफ होता है कि वह युद्ध नहीं चाहता, और शांति की बहली चाहता है। और इस युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल करने वालों को भी प्रधानमंत्री मोदी जवाब दे चुके हैं- हम सिर्फ भारत और उसके हितों के साथ हैं। तो सवाल तो बनता ही नहीं है कि भारत की इस युद्ध में कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।

ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भागीदारी कितनी और क्यों है?

रही पाकिस्तान की बात, तो ईरान युद्ध में पाकिस्तान क्यों घुसा पड़ा है? ये उसकी मजबूरी है। क्योंकि ईरान से जुड़ा कोई भी तनाव हो, पाकिस्तान उससे दूर रह ही नहीं सकता। क्योंकि मामला यहाँ सिर्फ वैश्विक राजनीतिक का नहीं, बल्कि उसकी खुद की सुरक्षा का भी है। वह खुद पर होने वाले हमले से डरा बैठा है।

वजह साफ है कि पाकिस्तान की सीधी सीमा ईरान से लगती है और अगर वहाँ हालात बिगड़ते हैं तो उसका असर सीधे पाकिस्तान पर पड़ता है। इसीलिए पाकिस्तान चाहे जितना तटस्थ दिखने की कोशिश करे, उसे हर समयय सतर्क रहना पड़ता है और मौके पर एक्टिव होना ही पड़ता है।

इस ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भूमिका को और तेज बनाते हैं उसके रिश्ते, खासकर सऊदी अरब के साथ। सऊदी और ईरान की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है और पाकिस्तान अक्सर सऊदी के करीब नजर आता है। ऐसे में जब भी ईरान के खिलाफ माहौल बनता है, पाकिस्तान पर दबाव अपने आप बढ़ जाता है कि वह किस तरफ खड़ा है। वह चाहकर भी खुद को इससे अलग नहीं कर सकता।

मुल्क के अंदर के हालात भी उसे मजबूर करते हैं। पाकिस्तान में शिया और सु्न्नी दोनों समुदाय रहते हैं और ईरान शिया देश है। अगर ईरान से जुड़ा बड़ा टकराव होता है, तो पाकिस्तान के अंदर भी माहौल भड़कता है। यही डर उसे हर कदम सोच-समझकर चलने पर मजबूर करता है, लेकिन चुप बैठना उसके लिए ऑप्शन ही नहीं है।

लेकिन सच्चाई ये है कि बड़े फैसले लेने वाली ताकतें जैसे अमेरिका, ईरान या खाड़ी के बड़े देश पाकिस्तान को इस मुद्दे में कोई खास अहमियत नहीं देते। पाकिस्तान न तो इतना ताकतवर है कि वह खेल पलट दे और न ही उसके पास ऐसा प्रभाव है कि कोई उसे निर्णायक भूमिका दे। इसलिए उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, चाहे वह कितना भी एक्टिव क्यों न दिखे।

इसके बावजूद पाकिस्तान खुद को इस मामले में दिखाने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे अपनी इंटरनेशनल इमेज मजबूत करनी होती है और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते भी निभाने होते हैं। लेकिन असलियत यही है कि वह साइडलाइन पर खड़ा खिलाड़ी है, जिसे मैदान में जगह खुद बनानी पड़ती है।

सीधी बात ये है कि पाकिस्तान इस पूरे मामले में घुसा जरूर पड़ा है, लेकिन उसे कोई खास पूछ नहीं रहा। उसकी भागीदारी ज्यादा मजबूरी और दिखावे की है, जबकि असली खेल बड़े देश अपने हिसाब से खेल रहे हैं।

निष्कर्ष: फिर भी कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीद बन सरकार से कर रहे सवाल

वैश्विक राजनीति में पाकिस्तान की अहमियत कितनी है यह पूरी दुनिया जानती है। पाकिस्तान डर के मारे इधर-उधर फोन घुमा रहा है, लेकिन उखाड़ फिर भी कुछ नहीं पा रहा है। जबकि भारत की भूमिका पर दुनियाभर के नेता आभार जता रहे हैं। बावजूद भारत में कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीदन बन सरकार पर सवाल उठा रहे हैं।

चलो एक बार को सोचते हैं कि देश में विरोधी पार्टी होने के नाते कॉन्ग्रेस का सरकार से हर वो सवाल करना बनता है, जो वो चाहे। लेकिन सवालों में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और उसके हित में बातें करना कहाँ तक ठीक है। या तो कॉन्ग्रेस धुरंधर 2 जैसी काल्पनिक फिल्म के दावों को सही मानकर बैठ गई है, जिसमें दावा किया गया है कि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान से चलती है, क्योंकि सुप्रिया श्रीनेत और कॉन्ग्रेस के आए दिन पाकिस्तान के प्रति प्रेम से तो यही झलकता है।

सुप्रिया श्रीनेत को समझना होगा कि भारत की पाकिस्तान से कभी तुलना नहीं की जा सकती है। कहाँ एक वो देश, जिसका दुनियाभर में आतंकवाद गतिविधियों में नाम सामने आ रहा है। और कहाँ भारत, जो युद्ध जैसे संकट में भी स्थिर है और आगे भी हर संकट से लड़ने का जज्बा रखता है।

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पूजा राणा
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