पाकिस्तान में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न सिर्फ वहाँ की जाँच एजेंसियों को, बल्कि पूरी दुनिया के मेडिकल और कॉस्मेटिक सेक्टर को हैरान कर दिया है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने देश की राजधानी इस्लामाबाद में एक बेहद बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है।
इस गिरोह पर आरोप है कि यह स्थानीय अस्पतालों से नवजात बच्चों की ‘प्लेसेंटा‘ यानी गर्भनाल को अवैध रूप से खरीदता था, फिर उसे गुपचुप तरीके से प्रोसेस करके महँगे एंटी-एजिंग इंजेक्शन और कॉस्मेटिक उत्पाद बनाने के लिए वियतनाम तस्करी कर रहा था।
यह कार्रवाई इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अस्पतालों से निकलने वाले जिस जैविक हिस्से को सामान्य तौर पर कचरा मानकर नष्ट कर दिया जाता है, उसे ये लोग करोड़ों रुपए के काले कारोबार में तब्दील कर चुके थे। इस पूरे मामले ने मेडिकल वेस्ट के मैनेजमेंट और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैसे हुआ इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश?
यह पूरी कार्रवाई पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में खुफिया सूचनाओं के आधार पर की गई। FIA को खबर मिली थी कि शहर के रिहायशी इलाकों में मानव अंगों और जैविक सामग्रियों की अवैध प्रोसेसिंग की जा रही है।
इसके बाद जाँच एजेंसी ने सबसे पहले इस्लामाबाद के बेहद पॉश इलाके F-7/1 में एक घर पर निगरानी रखने के बाद छापा मारा। वहाँ अधिकारियों को कोई सामान्य घर नहीं, बल्कि एक पूरी तरह से काम कर रहा अवैध प्रोसेसिंग प्लांट मिला, जहाँ मानव प्लेसेंटा को साफ करने, सुखाने और पैक करने की पूरी व्यवस्था थी।
गिरफ्तार किए गए आरोपितों से पूछताछ के आधार पर इस्लामाबाद के ही E-11 सेक्टर में एक और घर पर छापा मारा गया, जहाँ भारी मात्रा में रेफ्रिजरेटर, प्रोसेसिंग मशीनें और कच्चा जैविक सामान बरामद हुआ।
ठीक उसी दिन इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर वियतनाम भेजे जा रहे 100 किलोग्राम प्लेसेंटा के एक बड़े कंसाइनमेंट को भी अधिकारियों ने जब्त कर लिया। इस पूरी कार्रवाई में कुल पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन चीनी नागरिक ली गेंगकई, वांग बाओ और पेंग फेई गुआ और दो पाकिस्तानी नागरिक वकास और कासिम हनीफ शामिल हैं।
शुरुआत में इन लोगों ने दावा किया था कि यह भेड़ का प्लेसेंटा है, लेकिन कड़ाई से पूछताछ करने पर उन्होंने कुबूल किया कि यह इंसानी गर्भनाल है।
आखिर प्लेसेंटा (गर्भनाल) क्या होता है?
आम बोलचाल में हम जिसे गर्भनाल या अपरा कहते हैं, वह गर्भावस्था के दौरान महिला के गर्भाशय में विकसित होने वाला एक अस्थायी अंग है। यह माँ और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच एक जीवन रेखा की तरह काम करता है।
इसी के जरिए माँ के शरीर से बच्चे तक ऑक्सीजन, जरूरी पोषक तत्व, फैट और हार्मोन पहुँचते हैं। साथ ही यह बच्चे के खून से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम भी करता है।
जब बच्चे का जन्म होता है, तो उसके तुरंत बाद प्लेसेंटा भी माँ के शरीर से बाहर आ जाता है। इसके बाद इसका काम खत्म हो जाता है। सामान्य और कानूनी तौर पर इसे ‘बायो-मेडिकल वेस्ट’ यानी जैव-चिकित्सीय कचरा माना जाता है और अस्पतालों द्वारा इसे सुरक्षित तरीके से नष्ट कर दिया जाता है।
800 रुपए की खरीद और 7 लाख का इंजेक्शन: मुनाफे का गणित
इस अवैध धंधे के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंधाधुंध मुनाफा था। FIA और पाकिस्तान की ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट अथॉरिटी की जाँच में सामने आया है कि यह गिरोह इस्लामाबाद और रावलपिंडी के सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों के कर्मचारियों से भी साँठगाँठ करके बेहद सस्ते दामों पर इसे खरीद लेता था।
अस्पतालों से प्रति पीस प्लेसेंटा को मात्र 800 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग ढाई डॉलर) की मामूली कीमत पर खरीदा जाता था। इसके बाद इन अवैध फैक्ट्रियों में इसे सुखाकर पाउडर या अर्क के रूप में तैयार किया जाता था।
जब इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार जैसे वियतनाम या चीन में एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट के लिए भेजा जाता था, तो इससे तैयार होने वाले एक सिंगल इंजेक्शन की कीमत 7,00,000 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग 2530 डॉलर) तक पहुँच जाती थी। इसी भारी मुनाफे के लालच में अस्पतालों के कचरा प्रबंधन विभाग से लेकर ऊपरी स्तर के लोग भी इस रैकेट में शामिल थे।
तस्करी का पैमाना: हर महीने 200 किलो की खपत
जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई शुरुआती या छोटा नेटवर्क नहीं था, बल्कि यह गिरोह लंबे समय से इंडस्ट्रियल स्तर पर काम कर रहा था। यह गिरोह हर महीने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के अलग-अलग अस्पतालों से लगभग 200 KG मानव प्लेसेंटा इकट्ठा कर रहा था।
दोनों अवैध फैक्ट्रियों से जाँच टीम ने कुल 500 KG से अधिक संदिग्ध मानव प्लेसेंटा और उससे तैयार उत्पाद बरामद किए हैं। जाँच एजेंसी द्वारा साझा की गई तस्वीरों में देखा जा सकता है कि एक आलीशान घर के कमरों को बकायदा कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट में बदल दिया गया था, जहाँ ट्रॉलियों पर बड़ी-बड़ी ट्रे में मानव प्लेसेंटा को सुखाने के लिए रखा गया था।
अब FIA को शक है कि इस गिरोह के तार सिर्फ इस्लामाबाद तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि लाहौर, पेशावर और रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में भी फैले हुए हैं। इस बात की भी गहन जाँच की जा रही है कि कैसे एयरपोर्ट के इमिग्रेशन और कस्टम अधिकारियों की आँखों के सामने से ‘She Placenta’ के फर्जी कमर्शियल लेबल के तहत इतने संवेदनशील जैविक कचरे को विदेश भेजा जा रहा था।
कॉस्मेटिक और वेलनेस इंडस्ट्री में इसकी माँग क्यों है?
आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर इस जैविक कचरे से ऐसा क्या बनता है जिसके लिए लोग लाखों रुपए देने को तैयार हैं। दरअसल प्लेसेंटा प्राकृतिक रूप से प्रोटीन, आयरन, विटामिन, स्टेम सेल्स और ग्रोथ फैक्टर्स से भरपूर होता है।
वैश्विक स्तर पर वेलनेस, कॉस्मेटिक और वैकल्पिक चिकित्सा के कुछ बाजारों में यह दावा किया जाता है कि मानव या पशु प्लेसेंटा के अर्क से बनी क्रीम, सीरम और इंजेक्शन का इस्तेमाल इंसानी त्वचा को दोबारा जवान कर सकता है। इसे झुर्रियों को मिटाने, स्किन को टाइट करने और ऊतकों के पुनर्निर्माण के लिए एक जादुई दवा की तरह प्रचारित किया जाता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि कॉस्मेटिक उत्पादों या एंटी-एजिंग में मानव प्लेसेंटा के फायदों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सीमित और विवादास्पद हैं और कई देशों में इसके इस तरह के व्यावसायिक उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध है।
हालाँकि कानूनी तौर पर दुनिया के कई देशों में प्लेसेंटा का इस्तेमाल बेहद कड़े नियमों के तहत होता है। जब कोई माँ लिखित सहमति देती है, तो उसके प्लेसेंटा का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के इलाज, घावों को भरने और आँखों की कुछ विशेष सर्जरी के लिए किया जाता है। लेकिन यह सब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ऑर्गन प्रोक्योरमेंट संस्थाओं के जरिए ही हो सकता है, किसी गुप्त रिहायशी विला में नहीं।
कानून और स्वास्थ्य के लिहाज से यह कितना खतरनाक है?
अब सवाल उठता है की अस्पतालों से निकलने वाले प्लेसेंटा को सख्त नियमों के तहत नष्ट करना क्यों जरूरी है, इसके पीछे दो बड़े कारण हैं जिनमें पहला कानून और दूसरा जानलेवा संक्रमण का खतरा है।
पाकिस्तानी डॉक्टर के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा को सामान्य कचरा नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सीधे इंसानी खून और शारीरिक द्रव्यों के संपर्क में रहता है।
इस वजह से इसमें हेपेटाइटिस, HIV या अन्य संक्रामक बीमारियाँ फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया मौजूद हो सकते हैं। अगर इसे सही तापमान पर वैज्ञानिक तरीके से डिस्पोज न किया जाए या इसकी अवैध प्रोसेसिंग बिना सुरक्षा उपकरणों के हो, तो यह समाज में बड़ी महामारी या गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकता है।
अगर कानूनी पहलू की बात करें तो पाकिस्तान में मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 2010 के तहत किसी भी मानव अंग या जैविक हिस्से का व्यावसायिक इस्तेमाल या उसकी खरीद-फरोख्त पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों को 10 साल तक की जेल और 10 लाख पाकिस्तानी रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। फिलहाल पकड़े गए पाँचों आरोपितों पर इसी कानून के तहत सख्त धाराएँ लगाई गई हैं।
पाकिस्तान में अँगों की तस्करी का पुराना इतिहास
मानव बायोलॉजिकल मटेरियल की तस्करी पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि इससे पहले भी वहाँ अवैध रूप से किडनी निकालने और बेचने वाले कई बड़े गिरोहों का पर्दाफाश हो चुका है।
अक्सर गरीब मजदूरों या लाचार लोगों को पैसों का लालच देकर या उनका अपहरण करके अवैध बेसमेंट और निजी क्लीनिकों में उनकी किडनी निकाल ली जाती थी और उसे अमीर स्थानीय या विदेशी मरीजों को बेच दिया जाता था।
मानव भ्रूण (Human Embryo) की तस्करी और इसके पीछे का सच
प्लेसेंटा तस्करी के इस बड़े खुलासे के बीच चिकित्सा और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान एक और बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय की ओर गया है, जिसे ‘ह्यूमन एम्ब्रियो’ यानी मानव भ्रूण की तस्करी कहा जाता है।
भ्रूण दरअसल गर्भावस्था के शुरुआती चरण का वह रूप होता है जिससे आगे चलकर बच्चा विकसित होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की जैविक सामग्रियों की तस्करी के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें मानी जाती हैं, जिनमें पहली IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक और दूसरी स्टेम सेल रिसर्च है।
दुनिया के कई अमीर देशों में ऐसे संपन्न जोड़े जो प्राकृतिक रूप से माता-पिता नहीं बन पाते, वे संतान सुख के लिए अवैध सरोगेसी या बिना रिकॉर्ड वाले एम्ब्रियो की भारी माँग करते हैं।
इस माँग को पूरा करने के लिए तस्कर गिरोह विकासशील या गरीब देशों की लाचार महिलाओं को पैसों का लालच देकर उनके अंडे (Eggs) हासिल करते हैं और फिर लैब में भ्रूण तैयार कर उन्हें विदेशों में ऊँचे दामों पर बेच देते हैं।
इसके अलावा वैज्ञानिक जगत में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर हो रहे शोध भी इसकी माँग बढ़ाते हैं, क्योंकि शुरुआती भ्रूण में मौजूद स्टेम कोशिकाओं में इंसानी शरीर के किसी भी अंग को दोबारा विकसित करने की क्षमता होती है।
कॉस्मेटिक और चिकित्सा के कुछ बाजारों में मानव भ्रूण के अर्क (Embryo Extract) को लेकर भी कई तरह के भ्रामक दावे किए जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि भ्रूण के तत्वों से बने उत्पाद त्वचा को हमेशा के लिए जवान रखने, असाध्य बीमारियों को ठीक करने और बढ़ती उम्र के असर को पूरी तरह रोकने में कारगर होते हैं।
वही चीन में लोग अपनी सेक्स क्षमता को बढ़ाने के लिए ह्यूमन एम्ब्रियो को कहते है, ऐसा ही साल 2000 की एक तस्वीर में देखने को मिलता है की एक चीनी नागरिक ह्यूमन एम्ब्रियो को कहा रहा है।
हालाँकि चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने इस बात को पूरी तरह खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि कॉस्मेटिक या एंटी-एजिंग उत्पादों में मानव भ्रूण के इस्तेमाल का कोई भी पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।
दुनिया के अन्य देशों में भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
मानव प्लेसेंटा की अवैध खरीद-फरोख्त और चोरी का यह संकट सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य कोनों में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।
चीन में समय-समय पर ऐसे कई ब्लैक मार्केट नेटवर्क पकड़े गए हैं जो आधिकारिक स्वास्थ्य चेतावनियों के बावजूद पारंपरिक दवाओं और हेल्थ सप्लीमेंट्स के लिए अस्पतालों से अवैध रूप से प्लेसेंटा खरीदते थे।
इसके अलावा अफ्रीका में ट्रेडिशनल मेडिसिन मार्केट, केन्या में आध्यात्मिक मान्यताओं और नाइजीरिया में पारंपरिक रीति-रिवाजों या आर्थिक लाभ के चलते अस्पतालों से प्लेसेंटा चोरी होने और उनकी अवैध बिक्री के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
वैश्विक स्वास्थ्य अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि प्लेसेंटा का उपयोग केवल स्वीकृत चिकित्सा अनुसंधान या फार्मास्युटिकल उद्देश्यों के लिए ही कानूनी माना जाता है, जिसके लिए मरीज की लिखित सहमति, नैतिक मंजूरी और कड़े सरकारी नियमों का पालन अनिवार्य है।
इसके विपरीत, बिना अनुमति के मानव प्लेसेंटा को इकट्ठा करना, बेचना या एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पूरी दुनिया में गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर मानव ऊतकों की चोरी, मेडिकल वेस्ट का अवैध प्रबंधन, धोखाधड़ी, जालसाजी और मानव जैविक सामग्री की तस्करी जैसे गंभीर आपराधिक मामलों के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है।


