ओडिशा टीवी की रिपोर्ट के अनुसार दारा सिंह के वकील ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 अगस्त 2026 तक दारा सिंह को रिहा करने का आदेश दिया है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “हम इस मामले को 19 अगस्त तक के लिए स्थगित करना उचित समझते हैं। इस बीच, हम उम्मीद करते हैं कि समिति (समय पूर्व रिहाई पर) अपना निर्णय लेगी।”
सुनवाई में सरकारी वकील योगेश्वरन ने अदालत को बताया कि रिहाई की समीक्षा करने वाली समिति को जिला अदालत से कुछ दस्तावेजों की आवश्यकता थी, जिन्हें जल्द ही व्यवस्थित कर समिति के पास भेज दिया जाएगा।
दारा सिंह के बीते 27 साल
60 वर्ष की उम्र में जब दारा सिंह के जेल की सलाखों से बाहर आने की खबर हर ओर है तो ये मालूम हो कि अब उस व्यक्ति के पास अपनी हिंदू पहचान के अलावा कुछ नहीं बचा है।
इन 27 सालों में उन्होंने अपने माता-पिता, बहन सबको खो दिया है। मगर, मेनस्ट्रीम मीडिया को ये चीजें खबर में जोड़ने वाली नहीं लग रहीं। खबरों की हेडलाइन्स में दारा सिंह को इस तरह पेश किया जा रहा है कि पाठक उनकी रिहाई की खबरों पर सवाल उठाने लगें।
रिपोर्ट्स में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके परिवार की पीड़ा तो बताई जा रही है, लेकिन दारा सिंह के मानवाधिकारों के हनन पर और उनके जीवन की बर्बादी पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई है।
इस एकतरफा नैरेटिव के उलट, ऑपइंडिया लगातार दारा सिंह के मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहा है। साल 2024 में हमने आपको उनके घर के हालात, परिजनों के इंतजार और प्रशासन की ढिलाई से रूबरू करवाया था।
आज जब ऐसा मौका आया है कि उनके जेल से छूटने की आस जगी है तो ये चर्चा जरूरी है कि आखिर दारा सिंह को इतनी लंबी सजा क्यों भुगतनी पड़ी?
क्यों ईसाई मिशनरियों की नजर में खटके दारा सिंह
दारा सिंह तो उत्तर प्रदेश के ओरैया से निकलकर नोएडा और फिर ओडिशा में बच्चों को हिंदी पढ़ाने आए थे फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें 27 साल जेल की कोठरी में रहना पड़ा।
क्या एक स्कूल में हिंदी भाषा पढ़ाते समय धर्म और संस्कृति से जुड़ी बातें करना गुनाह था? क्या बजरंग दल से जुड़कर सनातन धर्म के लिए काम करना अपराध था? क्या जनजातीय समाज को अपने मूल धर्म के प्रति जागरूक करना कोई ऐसा पाप था जिसके लिए 27 साल की सजा दी जाए?
जवाब साफ है- नहीं। ये सब करना कोई गुनाह नहीं था, लेकिन ये सारी चीजें ऐसी जरूर थीं जो उस समय में ओडिशा में फैलते ईसाई मिशनरिययों के मिशन में रोड़ा बनतीं… हो सकता है जनजातीय जागरूक हो जाते तो वो धर्मांतरित नहीं होते और जो होते वो दोबारा सनातन में आ जाते।
यही कारण था कि उस समय हिंदुत्व विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को दबाने के लिए हर प्रयास किए गए। लेख लिखकर हिंदूवादी कार्यकर्ताओं को आतंकी बताते हुए कहा गया कि ये लोग ईसाइयों को दोबारा से हिंदू बनाना चाहते हैं!
दारा सिंह ने ईसाई मिशनरियों से लोहा ले लिया था और पूरे रैकेट का अंत करने की लड़ाई लड़ रहे थे। लोगों को जागरूक करना उनका काम था। वहीं दूसरी तरफ ग्राहम स्टेंस का काम था गाँव के गाँवों को ब्रेनवॉश करके ईसाई बनाना।
जब ये दोनों विचारधाराएँ साथ में टकराईं तो लोग समझने लगे कि ईसाई मिशनरियाँ उनके साथ क्या खेल कर रही हैं।
बताया जाता है सनातन के प्रति जागरूकता और ईसाई मिशनरियों के कुत्सित प्रयास ने स्थानीयों के मन में गुस्सा भर दिया। ग्राहम स्टेंस चूकि इलाके में मिशनरी का प्रमुख चेहरा था इसलिए लोग उसके खिलाफ भड़के हुए थे।
नतीजा एक रात जब उसने एक गाँव में अपनी गाड़ी रुकने के लिए लगाई तो वहाँ की भीड़ भड़क उठी। लोग तेजी से मशाल लेकर उसकी ओर बढ़े और स्टेंस पर अपना गुस्सा दिखाने में उन्होंने उसे गाड़ी में ही बच्चों के साथ जला डाला।
कौन था ग्राहम स्टेंस
आप विकीपीडिया जैसे जगहों पर ग्राहम स्टेंस को लेकर सर्च करेंगे ये मिलेगा कि वो भारत में लेप्रोसी से पीड़ित लोगों की सेवा के लिए आया थे। हालाँकि, हकीकत क्या है ये जानने के लिए आपको सालों से गढ़े गए नैरेटिव से ऊपर मामले को समझना होगा।
ग्राहम स्टेंस का असल काम लोगों का ब्रेनवॉश करने से लेकर गाँव के गाँव को ईसाई बनाना था। उसकी पैठ उड़ीसा के मयूरभंज और केयोनझार जैसे इलाकों में मजबूत हो चुकी थी। जिलों में 20 से 25 चर्च बनकर तैयार हो गए थे। जनजातीय उसके इस बहकावे में आ रहे थे कि उनकी बीमारी भगवान का श्राप है और उन्हें ठीक होने के लिए ईसाई बनना होगा। ‘जंगल कैंप’ के नाम पर वह महिलाओं का यौन शोषण करता था। उसका मिशन इतना तीव्र था कि वो एक गाँव को ईसाई बनाकर दूसरे गाँव में ठहरने चला जाता था।

22 जुलाई 1999 की रात भी बताते हैं वह इसी मिशन पर था। वह लोगों को ठीक करने की आड़ में अपने मकसद के लिए केओनझार जिले के मनोहरपुर गाँव में गाड़ी लेकर पहुँचा था। लोगों को जरा देर नहीं लगी ये समझने में कि वो किस मकसद से वहाँ आया है और गुस्से में एक भीड़ उसकी गाड़ी के आगे बढ़ी और ग्राहम को गाड़ी में ही 2 बच्चों के साथ खाक कर दिया गया।
क्या कहता है दारा सिंह का पक्ष
आज इस रिपोर्ट को लिखते हुए हम उन हत्याओं को जायज नहीं ठहरा रहे और न ही भीड़ के आक्रोश दिखाने के तरीके को सही कह रहे हैं। लेकिन इस मामले में एक पक्ष ये भी है कि 22 जुलाई 1999 की इस घटना के बाद जब दारा सिंह का नाम इन हत्याओं में आया तो अलग-अलग बातें फैलीं। कुछ ने कहा कि दारा सिंह भीड़ का हिस्सा थे और कुछ ने बताया कि जिस वक्त हत्या को अंजाम दिया गया था उस समय वह उस जगह मौजूद ही नहीं थे।
दारा सिंह के समर्थक तो ये भी कहते हैं कि यह पूरी कवायद उस समय की सरकार और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में की गई थी, ताकि राष्ट्रवादियों और सनातन के लिए काम करने वालों के बीच एक कड़ा संदेश भेजा जा सके- यदि कोई भी ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खेल के आड़े आएगा, तो उसका हश्र दारा सिंह जैसा ही होगा।
इस खबर के चलते इतने नैरेटिव गढ़े गए कि दारा सिंह की रिहाई मुश्किल होती गई। जिस पुलिस के आगे उन्होंने खुद सरेंडर किया था उसी के हवाले से खबरें चलीं कि उन्हें तो गिरफ्तार किया गया है।
इसके बाद समय बीता, कोर्ट में सुनवाई चलीं और केस में आरोपित बनाए गए 51 में से 49 को रिहाई मिली लेकिन दारा सिंह और महेंद्र हेम्ब्रम को दोषी मानकर आजीवन कारावास सुनाई गई।
साल 2019 में प्रिया मुंडा जैसे सामाजिक कार्यकर्ता दोबारा एक्टिव हुए। उन्होंने याचिकाएँ लगाईं, रिहाई की माँग की। लेकिन ईसाई मिशनरियों ने उनके रास्ते में भी कम मुश्किलें पैदा नहीं कीं। उन लोगों को भी तमाम केसों का सामना करना पड़ा मगर कोशिश जारी रही।
नतीजा- 2023 में महेंद्र भी रिहा हुए, लेकिन उस वक्त भी दारा सिंह को लेकर कोई सुनवाई नहीं हुई। उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2024 को दोषी दारा सिंह की रिहाई को लेकर दायर याचिका पर ओडिशा सरकार और CBI से जवाब माँगा था। हालाँकि, इस पर कोई निर्णय हुआ है।
ऑपइंडिया की दारा सिंह के भाई से बात
साल 2024 में जब साल 2024 में हमारी टीम दारा सिंह के पैतृक निवास ओरैया पहुँची तो घर में टूटे बर्तन, फूटे शीशे, बरसात का आता पानी ये गवाही दे रहे थे कि उनकी माली स्थिति ठीक नहीं है, पर बावजूद इसके दारा सिंह के परिजनों ने यह दोहराया था कि उनके लिए उनका धर्म ही धरोहर है। 24-25 साल से केस लड़ते हुए उनके घर के गहने और बाकी संपत्ति बिक गई है लेकिन फिर भी वह कानूनी लड़ाई को अंत तक जारी रखेंगे।
दारा सिंह के भाई अरविंद से मिले तो उनकी बातें सुनकर हमें इस मामले में प्रशासनिक क्रूरता का भी पता चला। अरविंद पाल ने हमें कागजी सबूतों के साथ बताया कि यूपी प्रशासन की तरफ से बार-बार दारा सिंह को रिहा करने की रिपोर्ट भेजे जाने के बाद उन्हें नहीं छोड़ा गया। उड़ीसा की तत्कालीन सरकार उनकी हर फाइल को दबाकर बैठी रही। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जब इस पत्र पर ओडिशा सरकार से जवाब तलब किया गया तो उधर से बस मामले को टालने जैसे जवाब मिलते रहे।
न उन्हें जब छोड़ा गया जब उनकी बहन खत्म हुई और न ही तब जब उनके माता-पिता को मुखाग्नि देनी थी। उनकी हर अर्जी को बिना किसी ठोस सुनवाई के खारिज कर दिया गया।
दारा सिंह को जेल और स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या: ईसाई मिशनरियों से लड़ने की सजा
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दारा सिंह का मामला उस दौर में ठंडे बस्ते में रहा जब एक तरफ हमारे देश में आतंकियों के रोना रोया जा रहा था, उनकी फाँसी पर मानवाधिकारों की दुहाई दी जा रही थी। दूसरी तरफ बीवी को गोली मारकर उसे टुकड़ों में काटकर तंदूर में भूनने वाले तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सुशील कुमार को अच्छे आचरण हाईकोर्ट से रिहाई मिल रही थी लेकिन दारा सिंह के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं था।
आज 27 साल बाद जब कोर्ट ने उनकी रिहाई की बात उठी है, तो यह मालूम रहे कि ये केवल एक कैदी की रिहाई नहीं है, बल्कि उस दमनकारी तंत्र का पर्दाफाश है जिसने एक व्यक्ति की पूरी जवानी, उसका परिवार और उसका जीवन सिर्फ इसलिए छीन लिया क्योंकि वह मिशनरियों के एजेंडे के खिलाफ खड़ा था।
दुखद यह है कि आज हम महिलाओं का शोषण करने वाले ग्राहम स्टेंस को हीरो बनाकर पढ़ने पर गौर देते हैं, कॉन्ग्रेस द्वारा उनकी बीवी को दिए गए पद्म पुरस्कार को अधिकार समझते हैं, लेकिन हमें दारा सिंह के साथ हुई नाइंसाफी का कुछ नहीं पता होता और न ही हम उन स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या से जुड़ा कुछ जानते हैं, जिन्हें ओडिशा में ही साल 2008 में ईसाई मिशनरी से लड़ने पर जन्माष्टमी के दिन ही मौत के घाट उतार गया था।


