Homeविचारमीडिया हलचलन सबूत, न तर्क… सिर्फ मनगढ़ंत कहानियाँ: जानिए कैसे न्यूजलॉन्ड्री ने एक 'ट्रक' को...

न सबूत, न तर्क… सिर्फ मनगढ़ंत कहानियाँ: जानिए कैसे न्यूजलॉन्ड्री ने एक ‘ट्रक’ को दिखाकर दिल्ली पुलिस को किया बदनाम, उपद्रवियों को लेकर नहीं पूछे सवाल

डंपर ट्रक को लेकर कहानी साफ थी कि एक गंभीर एक्सीडेंट के बाद गाड़ियाँ पुलिस कस्टडी में ली गईं। लेकिन न्यूजलॉन्ड्री ने कुछ एक्सक्लूजिव देने की चाह में अपनी रिपोर्ट को ऐसे पेश किया कि लोग नियम-कानून पर ही सवाल उठा दें और पुलिस पर ही संदेह करने लगें।

सच्ची खोजी पत्रकारिता की पहचान यह होती है कि वह लोगों के सामने छिपे हुए तथ्य लेकर आती है। इसके विपरीत, किसी खास एजेंडे के तहत की जाने वाली पत्रकारिता की पहचान यह है कि वह पहले से ही एक नतीजा तय कर लेती है और फिर अपनी बात को सही साबित करने के लिए सामान्य घटनाओं और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट-‘CJP के प्रदर्शन के पास पत्थरों से भरा ट्रक कहाँ से आया? हमने पता लगाया’ इसी तरह के एजेंडा को सिद्ध करने वाली पत्रकारिता का एक सटीक उदाहरण है।

साभार: न्यूजलॉन्ड्री

न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी इस रिपोर्ट में शब्दों का ऐसा हेर-फेर किया, जिससे पाठकों को ये लगे कि दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर पत्थरों से भरा डंपर ट्रक संसद मार्ग थाने के पास खड़ा किया था।

रिपोर्ट बिना कोई सबूत पेश किए, यह दिखाने की कोशिश करती है कि पुलिस का मकसद 20 जुलाई को होने वाले CJP के प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाना था या फिर उन्हें झूठे मामलों में फँसाना था।

दिलचस्प बात यह है कि न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में साजिश को साबित करने के लिए जो बिंदु दिए हैं वही उनकी पूर कहानी को खारिज करते हैं।

सामान्य पुलिस कार्रवाई को न्यूजलॉन्ड्री ने दिखाया सनसनीखेज

न्यूजलॉन्ड्री की अपनी ही रिपोर्ट के मुताबिक, 16 जुलाई की सुबह करीब 4:15 बजे फिरोजशाह रोड और कस्तूरबा गाँधी मार्ग के चौराहे पर इस डंपर ट्रक ने एक मारुति ईको गाड़ी को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में ईको सवार सात लोग घायल हुए थे और केस भी दर्ज हुआ था। हादसे के बाद क्षतिग्रस्त ईको और टक्कर मारने वाले डंपर ट्रक-दोनों को जब्त करके संसद मार्ग थाने लाया गया था।

अब यहाँ ये समझने की जरूरत है कि सड़क हादसों से जुड़े किसी भी आपराधिक मामले में पुलिस की कार्रवाई ठीक इसी तरह होती है।

जिन गाड़ियों से एक्सीडेंट होता है और लोग घायल होते हैं, उन्हें पुलिस सबूत के तौर पर ज़ब्त करती है। और, जब तक कानूनी औपचारिकताएँ, गाड़ियों की जाँच, बीमा की कागजी कार्रवाई और कोर्ट की प्रक्रियाएँ पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे गाड़ियाँ पुलिस की हिरासत में ही रहती हैं।

ऐसे में जब न्यूजलॉन्ड्री जैसे संस्थान बार-बार ट्रक को हाईलाइट करते हैं कि चार दिन बाद भी डंपर संसद मार्ग के पास क्यों खड़ा था और मारुति ईको कहाँ थी?

तो, क्या साफ तौर पर वह सवाल नहीं उठा रहे कि दिल्ली पुलिस ने ही प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने पर मजबूर किया…?

गाड़ियों की दुर्दशा बयां करती हैं असली कहानी

हकीकत यह है कि 16 जुलाई को जो टक्कर हुई थी ऐसी भयावह घटना थी कि उसमें गाड़ी का पिछला हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया था। दोनों गाड़ियाँ इस मामले में अहम सबूत थीं। उन्हें पुलिस हिरासत में रखना कोई अनोखी बात नहीं थी बल्कि यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा थी। अगर दिल्ली पुलिस इनमें से किसी भी गाड़ी को छोड़ देती तो उलटा उनकी जाँच करने के ढंग पर ही सवाल खड़े होते।

बावजूद इस तथ्य के न्यूजलॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में बार-बार ‘पत्थरों से भरा ट्रक’ शब्द इस्तेमाल किया ताकि लोगों के मन में छवि बने कि दंगे जैसी स्थिति पैदा करने में पुलिस का हाथ था।

ट्रक में पत्थर नहीं है असली सच्चाई

खोजी पत्रकारिता की आड़ में की गई ये रिपोर्ट खुद बताती है कि एक्सीडेंट के वक्त डंपर ट्रक ‘निर्माण सामग्री’ लेकर जा रहा था और एक्सीडेंट के कारण उसे जब्त करके वहाँ खड़ा किया गया।

खुद ट्रक के पुराने मालिक और हादसे में घायल पीड़ितों ने इस बात की पुष्टि की है कि एक्सीडेंट के समय डंपर में क्या था।

इसके अलावा ये बताने की जरूरत नहीं है कि निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले डंपर का काम ईंट-बजरी और पत्थर ले जाना होता है। ऐसे में अगर जब्त किए गए ट्रक में पत्थर मिला तो यह कोई हैरान करने वाली घटना नही है।

न्यूजलॉन्ड्री ने बस इसे सनसनीखेज बनाकर ऐसे पेश किया है कि लोगों के मन में संदेह खड़ा हो और वो पुलिस की भूमिका पर शक करने लगें।

पुलिसकर्मियों के अलग-अलग बयानों को पेश किया साजिश की तरह

न्यूजलॉन्ड्री की पूरी रिपोर्ट इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि अलग-अलग पुलिस अधिकारियों ने ट्रक को खाली करने या उसे खड़ा करने की जगह को लेकर थोड़े अलग-अलग बयान दिए।

अब ये समझने की जरूरत है कि प्रशासनिक अधिकारियों के अलग-अलग बयानों पर स्पष्टीकरण तो माँगा जा सकता है लेकिन इससे किसी आपराधिक साजिश के सबूत नहीं मिल जाते।

भारत के पुलिस थानों में जगह की कमी, जाँच की ज़रूरत, अदालत के निर्देशों या प्रशासनिक सहूलियत के हिसाब से ज़ब्त गाड़ियों को हटाना या दूसरी जगह पार्क करना एक आम बात है।

संसद मार्ग पुलिस स्टेशन दिल्ली के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक है, जहाँ गाड़ियों के लिए अनगिनत पार्किंग की जगह नहीं होती।

इसके बावजूद, न्यूजलॉन्ड्री ने पुलिस के इस सामान्य-से प्रशासनिक फैसले को एक बड़ी और गहरी साजिश का रूप देने की कोशिश की है।

रिपोर्ट में सिर्फ मनगढ़ंत बातें और इशारे हैं, लेकिन सबूत का एक भी अंश नहीं है।

क्या चाहता था न्यूजलॉन्ड्री

न्यूजलॉन्ड्री की बनाई इस कहानी पर विश्वास करने के लिए पाठकों को एक सिर्फ काल्पनिक बातें सोचनी पड़ेगी। जैसे- दिल्ली पुलिस को एक्सीडेंट के दिन ही बात पहले से पता होगी कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट के नाम पर इकट्ठा हो रही भीड़ चार दिन बाद यानी 20 जुलाई को अचानक हिंसक रूप ले लेगी। या सीजेपी प्रदर्शनकारी खुद आकर उस जब्त डंपर से पत्थर उठाएँगे और पुलिस पर ही हमला कर देंगे, ताकि पुलिस का बनाया प्लान कामयाब हो सके!

यह कोई खोजी पत्रकारिता नहीं बल्कि सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जिसके जरिए पाठकों को इस दिशा में भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है कि वो हर चीज को आपस में जोड़ें और ये समझें कि इनका पत्थरों से भरे ट्रक का संसद मार्ग पर दिखना और फिर पत्थरबाजी होने के बीच कुछ तो कनेक्शन जरूर है।

मनगढ़ंत कहानियाँ बनाईं, नहीं पूछा असली सवाल

न्यूजलॉन्ड्री ने अपने एजेंडे को फैलाने के लिए ट्रक में रखे पत्थरों, गुमनाम सूत्रों और मनगढ़ंत दावों पर पूरी रिपोर्ट कर डाली लेकिन वो असली सवाल पूछना भूल गए।

अपनी रिपर्ट में उन्होंने एक भी बार ये पूछना उचित नहीं समझा कि प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस के जवानों के ऊपर किसने और क्यों हमला किया।

क्या उनके इस रवैये से ये साफ नहीं होता कि वो सिर्फ ये साबित करने की जुगत में है किसी भी तरह सीजेपी प्रदर्शन में हिंसा करने वाले उपद्रवियों का अपराध कम दिखाई दे और सवाल खड़े हो तो सिर्फ पुलिस पर।

डंपर ट्रक को लेकर कहानी साफ थी कि एक गंभीर एक्सीडेंट के बाद गाड़ियाँ पुलिस कस्टडी में ली गईं। न्यूजलॉन्ड्री ने केवल कुछ एक्सक्लूजिव देने की चाह में अपनी रिपोर्ट को ऐसे पेश किया कि लोग नियम-कानून पर ही सवाल उठा दें।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Jinit Jain
Jinit Jain
Jinit Jain is a journalist and commentator covering politics, national security, law, and socio-cultural issues, with a focus on in-depth reporting and fact-based analysis. His work examines public policy, governance, and current affairs, bringing complex developments into clear and accessible context for readers.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

IIT से इंजीनियरिंग, विदेशी कंपनियों में काम, RSS से पुराना जुड़ाव… जानें कौन हैं जगदीश आफले, जिन्हें राम मंदिर ट्रस्ट का पहला सचिव किया...

राम मंदिर में चंदा चोरी विवाद को लेकर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे थे, जिसके बाद जगदीश आफले को पहला सचिव नियुक्त किया गया।

‘समरसता संकल्प अभियान’ चलाएगी BJP, जालंधर से वाराणसी के बीच निकलेगी भव्य यात्रा: जानिए पंजाब-UP चुनाव में रविदासिया समुदाय को कैसे साध रही भारतीय...

बीजेपी का 'समरसता संकल्प अभियान' (सामाजिक समरसता और संकल्प के लिए अभियान) 29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक लगभग सात महीनों तक चलेगा।
- विज्ञापन -