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हैशटैग लगाओ, दुनिया बदलो… कितना आसान है न? क्या सोशल मीडिया लोकतंत्र को बर्बाद कर रहा है?

लोकतंत्र इंसान की कमियों को स्वीकार कर समझौतों से चलता है। लेकिन सोशल मीडिया का अनियंत्रित दौर हर छोटी कमी को भ्रष्टाचार बताकर लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट कर रहा है। कैसे आज का सोशल मीडिया और डिजिटल यूटोपियनवाद हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

सदियों से इंसान एक ही खूबसूरत लेकिन शायद असंभव सपने के पीछे भागता आया है, एक ऐसे समाज का सपना, जहाँ सब कुछ आदर्श हो। प्राचीन दार्शनिकों की कल्पनाओं से लेकर प्रबुद्धता काल के बड़े-बड़े विचारों और बीसवीं सदी के खतरनाक सामाजिक प्रयोगों तक, इंसान बार-बार इस भ्रम में पड़ता रहा है कि समाज से हर तरह का तनाव, संघर्ष और दुख हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।

आज इसी पुराने सपने को डिजिटल दुनिया ने एक नया ठिकाना दे दिया है।

सोशल मीडिया और उससे जुड़े डिजिटल एक्टिविस्ट सिर्फ दुनिया की कमियाँ नहीं गिनाते। कई बार वे एक ऐसी दुनिया का सपना भी बेचते हैं, जहाँ सब कुछ बिल्कुल सही हो, पूरी तरह न्याय हो, हर किसी के साथ बराबरी हो और हर व्यक्ति नैतिक रूप से सही हो।

लेकिन समस्या ये है कि ऐसी पूर्ण दुनिया कोई भी सरकार नहीं बना सकती। चाहे सरकार कितनी भी अमीर हो, कितनी भी सक्षम हो या कितनी भी दूरदर्शी क्यों न हो। यही आधुनिक Perfectionism यानी पूर्णतावाद असल में खतरनाक हो सकता है। क्योंकि ये धीरे-धीरे लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर सकता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि इंसान परफेक्ट नहीं है। इसलिए लोकतंत्र ऐसा सिस्टम है जो लोगों के मतभेदों और कमियों के बावजूद उन्हें साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। ये कोई परफेक्ट या तेज़ सिस्टम नहीं है। बल्कि ये जानबूझकर ऐसा बनाया गया है कि बड़े से बड़ा मतभेद भी गृहयुद्ध में न बदले।

लेकिन जब सोशल मीडिया लोगों को ये उम्मीद दिलाने लगे कि हर नीति बिल्कुल सही होनी चाहिए, हर संस्था पूरी तरह ईमानदार होनी चाहिए और हर समस्या का तुरंत समाधान हो जाना चाहिए, तब लोकतंत्र की सामान्य कमियाँ भी लोगों को असहनीय लगने लगती हैं।

फिर सरकार की कोई गलती सिर्फ एक गलती नहीं रह जाती। उसे पूरे सिस्टम के भ्रष्ट होने का सबूत मान लिया जाता है। और फिर मांग उठती है कि पूरे सिस्टम को ही जड़ से बदल दिया जाए। यानी जिस शासन व्यवस्था को इंसान की कमियों और मतभेदों को संभालने के लिए बनाया गया था, उसी के खिलाफ़ अब एक ऐसी ‘पूर्णता’ की उम्मीद को हथियार बनाया जा रहा है, जिसे हासिल करना असल में संभव ही नहीं है।

आज के डिजिटल दौर के इस खतरे को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर इतिहास को देखना होगा। हमें समझना होगा कि समय-समय पर बड़ी-बड़ी आदर्शवादी कल्पनाएँ कैसे टूटती रही हैं, पश्चिमी और यूरोपीय सभ्यताओं में बार-बार कौन-सी कमजोरियाँ सामने आती रही हैं, और सबसे जरूरी बात- आज के सोशल मीडिया का पूरा ढांचा किस तरह लोकतंत्र के लिए एक नए तरह का संकट पैदा कर रहा है।

भ्रम की कहानी: काल्पनिक आदर्श समाज बार-बार क्यों असफल हुए?

‘यूटोपिया’ शब्द 1516 में सर थॉमस मोर ने बनाया था। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना था- ‘अच्छी जगह’ और ‘ऐसी जगह जो कहीं है ही नहीं’। यानी मोर अपने समय में ही समझ गए थे कि एक बिल्कुल परफेक्ट समाज, असल में, शायद सिर्फ कल्पना में ही हो सकता है।

लेकिन इसके बावजूद इंसान ने सदियों तक इस कल्पना को हकीकत बनाने की कोशिश की। और जब-जब ऐसा करने की कोशिश हुई, नतीजे अक्सर बेहद विनाशकारी रहे।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान देखने को मिलता है। क्रांतिकारी इस विचार से प्रभावित थे कि अगर समाज की पुरानी व्यवस्थाओं को पूरी तरह बदल दिया जाए, तो इंसान और उसका स्वभाव भी बदला जा सकता है। इसलिए उन्होंने सदियों पुरानी परंपराओं, धर्म और संस्थाओं को तेजी से खत्म करने की कोशिश की।

शुरुआत में नारा था- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व। लेकिन कुछ ही समय में यही क्रांति ‘आतंक के शासन’ में बदल गई। रोबेस्पिएर और उसके साथियों का मानना था कि एक आदर्श गणराज्य बनाने के लिए ‘सद्गुण’ के साथ ‘आतंक’ का इस्तेमाल भी जरूरी है। समस्या यही थी, जब आप एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ कोई भ्रष्टाचार या असहमति हो ही नहीं, तो जो भी आपके आदर्श से असहमत होगा, वह आपको दुश्मन नजर आने लगेगा।

और फिर वही हुआ। जिस क्रांति ने एक बेहतर समाज का सपना दिखाया था, उसी ने अपने ही लोगों को गिलोटिन पर चढ़ाना शुरू कर दिया।

यही वह बात थी जिसकी ओर ब्रिटिश विचारक एडमंड बर्क ने इशारा किया था, जब इंसान खुद को ईश्वर की तरह समाज को पूरी तरह गढ़ने वाला समझने लगता है, तो उसके फैसले कई बार राक्षसी रूप ले लेते हैं। उन्नीसवीं सदी में भी ऐसे आदर्श समाज बनाने की कोशिशें जारी रहीं। हालांकि इस बार उनका रूप थोड़ा नरम था।

ब्रिटेन और अमेरिका में रॉबर्ट ओवेन और फ्रांस में चार्ल्स फूरियर जैसे विचारकों ने औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई गरीबी और असमानता का समाधान एक नए तरह के समाज में खोजने की कोशिश की। उन्होंने ऐसे समुदाय बनाने की कोशिश की जहाँ प्रतिस्पर्धा, लालच और सामाजिक ऊँच-नीच को खत्म किया जा सके।

रॉबर्ट ओवेन ने अमेरिका के इंडियाना में न्यू हार्मनी नाम की एक ऐसी ही सामुदायिक व्यवस्था बनाई। लेकिन कुछ ही सालों में वह टूट गई। आपसी वैचारिक मतभेद, खराब प्रबंधन और सबसे बड़ी बात, इंसानी स्वभाव का किसी तय खांचे में फिट न होना; इसके पीछे बड़ी वजहें थीं।

चार्ल्स फूरियर ने भी ऐसे सहकारी समुदायों की कल्पना की थी जिन्हें उन्होंने ‘फैलनस्टेरी’ कहा। उनका मानना था कि अगर समाज को सही तरीके से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो काम भी इंसान के लिए आनंद का अनुभव बन सकता है। लेकिन ये प्रयोग भी बड़े स्तर पर सफल नहीं हो सके।

इन सभी उदाहरणों में एक बात कॉमन थी। इन विचारों में इंसान को एक जटिल और स्वतंत्र प्राणी मानने के बजाय ऐसी चीज़ समझ लिया गया जिसे किसी भी मनचाहे साँचे में ढाला जा सकता है। और जब असली दुनिया उस कल्पना के मुताबिक नहीं चलती, तो समस्या विचार में नहीं, इंसानों में खोजी जाती है।

फिर दबाव बढ़ाया जाता है। नियम और सख्त किए जाते हैं। विरोध को दबाया जाता है। और आखिरकार आदर्श समाज बनाने की कोशिश, लोगों को मजबूर करने की कोशिश बन जाती है।

बीसवीं सदी में यह प्रवृत्ति अपने सबसे खतरनाक रूप में दिखाई दी। यूरोप के अधिनायकवादी शासन, खासकर सोवियत साम्यवाद और नाज़ीवाद, दोनों ने समाज को एक बिल्कुल नए आदर्श के मुताबिक ढालने का दावा किया।

मार्क्सवाद-लेनिनवाद ने एक ऐसे वर्गहीन और अंततः राज्यहीन समाज का सपना दिखाया जिसमें पुराने ‘बुर्जुआ’ ढाँचे का पूरी तरह अंत हो जाएगा। लेकिन इस सपने को लागू करने की कोशिशों में जबरन सामूहिकीकरण, अकाल, गुलाग और राजनीतिक सफाए जैसी भयावह घटनाएँ हुईं, जिनमें करोड़ों लोगों की जान गई।

दूसरी तरफ नाज़ीवाद ने नस्ल और राष्ट्र के पुनरुत्थान का सपना दिखाया। उसका अंत होलोकॉस्ट के औद्योगिक पैमाने पर किए गए नरसंहार और पूरे यूरोप को तबाह करने वाले युद्ध में हुआ। इतिहास से एक बात बहुत साफ दिखाई देती है- जब कोई समाज पूर्णता हासिल करने के नाम पर इंसानी स्वभाव और उसकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह अक्सर सुधार के बजाय विनाश की तरफ बढ़ने लगता है।

ये आदर्शवादी प्रयोग सिर्फ संयोग से असफल नहीं हुए। उनके भीतर ही एक बुनियादी समस्या थी, उन्होंने इंसान को वैसा स्वीकार नहीं किया जैसा वह वास्तव में है। इंसान जटिल है। उसमें स्वार्थ भी है और परोपकार भी, अच्छाई भी है और बुराई भी, तर्क भी है और भावनाएँ भी। और शायद इसी वजह से एक परफेक्ट समाज बनाने की कोशिश, बार-बार एक ही गलती करती है, वह इंसान को बदलने से पहले इंसान को समझना भूल जाती है।

यूरोप का अनुभव: उत्थान, पतन और हमेशा टिके रहने का भ्रम

अगर हम यूरोप के इतिहास को देखें, तो आधुनिक ‘आदर्श समाज’ की कल्पनाओं को लेकर सावधान रहने की वजह और साफ दिखाई देती है। यूरोपीय सभ्यता का इतिहास लंबे समय से एक जैसे चक्रों से गुजरता रहा है, बड़े सपने, बड़ी महत्वाकांक्षाएँ, ताकत और विस्तार… और फिर किसी न किसी मोड़ पर भारी गिरावट।

रोमन साम्राज्य हो, पवित्र रोमन साम्राज्य, पुनर्जागरण के दौर के अलग-अलग यूरोपीय राजतंत्र या उन्नीसवीं सदी की साम्राज्यवादी ताकतें, इन सभी को कभी न कभी लगा कि उनकी व्यवस्था लंबे समय तक चलती रहेगी।

लेकिन इतिहास ने बार-बार दिखाया कि कोई भी व्यवस्था हमेशा के लिए नहीं चलती। संस्थाएँ कितनी भी मजबूत और विकसित क्यों न हों, बाहरी संकट, अंदर का भ्रष्टाचार और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास धीरे-धीरे उन्हें कमजोर कर सकते हैं। बीसवीं सदी में यूरोप ने इसका सबसे भयानक उदाहरण देखा। दो विश्व युद्धों ने यूरोप को बुरी तरह तबाह कर दिया और दुनिया में उसकी पुरानी ताकत और पकड़ लगभग खत्म हो गई। जिस यूरोप को अपनी तकनीकी और सभ्यतागत श्रेष्ठता पर बहुत भरोसा था, वही यूरोप अनजाने में ऐसी तबाही की तरफ बढ़ गया जिसकी कीमत करोड़ों लोगों ने चुकाई।

लेकिन 1945 के बाद यूरोप ने फिर खुद को खड़ा किया। युद्ध के खंडहरों से एक नई व्यवस्था निकली; कल्याणकारी राज्य, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ और बाद में यूरोपीय संघ जैसी व्यवस्थाएँ।

यह मॉडल पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया। विचार ये था कि पूंजीवाद से पैदा होने वाली असमानताओं और समस्याओं को सामाजिक सुरक्षा के जरिए कम किया जाए और साथ ही फासीवाद और साम्यवाद जैसी चरम विचारधाराओं को दोबारा मजबूत होने से रोका जाए।

लेकिन आज यूरोप और बड़े पैमाने पर पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया फिर से कई तरह के दबावों का सामना कर रही है।

अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, घटती आबादी, यूरोपीय एकीकरण को लेकर मतभेद और अपनी सभ्यता को लेकर बढ़ता आत्मविश्वास का संकट, इन सबने युद्ध के बाद बनी उस व्यवस्था को फिर सवालों के घेरे में ला दिया है।

यहीं से एक पुराना विचार फिर सुनाई देने लगता है कि यूरोपीय समाज धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ता है।

लेकिन पतन का मतलब हमेशा कोई अचानक आने वाली हॉलीवुड फिल्म जैसी तबाही नहीं होता।

कई बार सभ्यताएँ धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। उनका सामाजिक मेल-जोल कम होने लगता है, लोग अलग-अलग वैचारिक खेमों में बंटने लगते हैं और वे साझा कहानियाँ और मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं जो कभी पूरे समाज को एक साथ जोड़ते थे।

आज इन मुश्किलों का सामना करने के लिए व्यावहारिक और धीरे-धीरे होने वाले सुधारों की जरूरत है।

लेकिन इसके बजाय सार्वजनिक बहस में डिजिटल आदर्शवाद का असर बढ़ता जा रहा है।

सोशल मीडिया पर जटिल समस्याओं के आसान समाधान पेश किए जाते हैं।

खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था हो, अलग-अलग विचारों और पहचानों वाला समाज हो या कोई गहरा सामाजिक संकट; इन सबका समाधान कभी-कभी ऐसे बताया जाता है मानो बस कुछ लोगों को ‘गलत’ घोषित कर दो, सही हैशटैग चला दो या अपनी संस्थाओं की नैतिकता पर लगातार सवाल उठाते रहो… और फिर समाज अपने आप एक आदर्श स्थिति में पहुँच जाएगा।

यानी असली दुनिया की जटिल समस्याओं के लिए भी डिजिटल दुनिया एक बेहद सरल जवाब देती है, सही लोगों को दोष दो, सही नारा लगाओ और मान लो कि समस्या हल हो गई।

सोशल मीडिया और नया यूटोपियनवाद

पहले के दौर में जब लोग एक आदर्श समाज बनाने का सपना देखते थे, तो उसके पीछे कोई बड़ा नेता, कोई क्रांतिकारी संगठन या कोई राजनीतिक आंदोलन होता था।

आज ऐसा नहीं है।

आज का नया यूटोपियनवाद सिलिकॉन वैली के सर्वर और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम से चलता है और दुनिया भर में फैले डिजिटल एक्टिविस्टों के नेटवर्क के जरिए फैलता है।

सोशल मीडिया का पूरा ढांचा लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस तरीके से काफी अलग है, जिसमें धीरे-धीरे बातचीत, समझौते और सहमति से फैसले लिए जाते हैं।

सोशल मीडिया कंपनियों का कारोबार इस बात पर टिका है कि लोग ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताएँ और ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया दें। और लोगों को सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया किस चीज़ पर होती है? भावनाओं पर; खासकर गुस्से, नैतिक आक्रोश और किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से भड़कने पर।

इसलिए सोशल मीडिया पर राजनीति भी धीरे-धीरे सरल और ज्यादा आक्रामक होती चली गई है।

जटिल नीतिगत बहसों को अक्सर ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की लड़ाई में बदल दिया जाता है। आपको बस ये तय करना होता है कि कौन सही है और कौन गलत।

बीच की कोई जगह नहीं।

इसी माहौल में डिजिटल एक्टिविस्ट खुद को नैतिकता के नए पहरेदार की तरह पेश करने लगते हैं।

वे समाज से ऐसी वैचारिक और नैतिक पूर्णता की उम्मीद करने लगते हैं, जिसे कोई इंसान तो क्या, कोई सरकार भी कभी पूरी तरह हासिल नहीं कर सकती।

X, TikTok और Instagram जैसे प्लेटफॉर्मों पर अक्सर ऐसी मांगें तेजी से फैलती हैं जो बेहद कठोर और चरम (बोलचाल की भाषा में इसे ‘एक्ट्रिमिस्ट’ कहा जाने लगा है) होती हैं।

बारीकियों और संदर्भ की कोई खास जगह नहीं बचती। अगर आप थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हैं, तो आपको गलत व्यवस्था का समर्थक मान लिया जाता है। अगर आप समझौता करते हैं, तो आपको अपने ही विचारों से विश्वासघात करने वाला बता दिया जाता है।

अब जरा सोचिए कि इसका असर सरकार और नीतियों पर कैसे पड़ता है।

एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए कानून बनाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार को अलग-अलग लोगों और समूहों के हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बजट सीमित होता है, संसाधन सीमित होते हैं और हर फैसले के कुछ फायदे तो कुछ नुकसान होते हैं।

मान लीजिए सरकार को परिवहन व्यवस्था सुधारनी है, स्वास्थ्य सेवा बेहतर करनी है या प्रवासन की समस्या संभालनी है। उसे कई अलग-अलग हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। और कई बार उसे ऐसी कमियाँ भी स्वीकार करनी पड़ेंगी जिन्हें तुरंत दूर करना संभव नहीं है।

लेकिन सोशल मीडिया की राजनीति इस पूरी प्रक्रिया को ‘पूर्णता’ के पैमाने पर परखती है।

कोई कानून पूरी तरह आदर्श नहीं है, तो वह भ्रष्टाचार का सबूत है।

किसी सरकारी संस्था में कमी है, तो मान लिया जाता है कि यह जानबूझकर की गई गड़बड़ी है।

किसी नीति में समझौता हुआ है, तो उसे कमजोरी या विश्वासघात समझ लिया जाता है।

और यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।

डिजिटल एक्टिविस्टों को सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती। उन्हें देश का बजट संतुलित नहीं करना होता, सीमाओं की सुरक्षा नहीं करनी होती, दूसरी सरकारों से बातचीत नहीं करनी होती और न ही हर दिन ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनमें किसी न किसी पक्ष को निराश होना ही है।

इसलिए वे वैचारिक रूप से पूरी तरह ‘शुद्ध’ रहने का दावा कर सकते हैं।

यहीं से समस्या शुरू होती है।

जब लोगों को इंटरनेट पर हर मुद्दे का एकदम साफ, नैतिक और आदर्श जवाब दिखाई देता है, तो लोकतंत्र की असली प्रक्रिया, जो धीमी है, उलझी हुई है और जिसमें लगातार समझौते करने पड़ते हैं, बहुत निराशाजनक लगने लगती है।

और यही अंतर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

इंटरनेट हमें जिस दुनिया की उम्मीद दिखाता है और राजनीति जिस दुनिया में वास्तव में काम करती है, उनके बीच की दूरी जितनी बढ़ती जाती है, लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा उतना ही कमजोर होता जाता है।

बारीक समझ का अंत और लोकतंत्र की कमजोरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह किसी ‘परफेक्ट समाज’ का सपना बेचने के बजाय इस बात को स्वीकार करता है कि इंसान और समाज दोनों अपूर्ण हैं।

दार्शनिक कार्ल पॉपर ने अपनी किताब The Open Society and Its Enemies में इसी तरह के विचारों के खिलाफ तर्क दिया था। वे इस सोच के विरोधी थे कि इतिहास किसी तय दिशा में आगे बढ़ रहा है और हम पूरे समाज को एक झटके में नए सिरे से बना सकते हैं।

इसके बजाय पॉपर ने ‘क्रमिक सामाजिक बदलाव’ (Piecemeal social engineering) की बात की।

मतलब ये कि समाज की किसी खास समस्या; जैसे- गरीबी, बीमारी या अन्याय को पहचानो, उसका धीरे-धीरे समाधान निकालो और फिर देखो कि उस समाधान से कोई नई समस्या तो पैदा नहीं हो गई। अगर हुई है, तो उसे भी धीरे-धीरे ठीक करो।

यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

लोकतंत्र इसलिए काम करता है क्योंकि वह धरती पर स्वर्ग बनाने का वादा नहीं करता। वह हमें इससे कहीं ज्यादा व्यावहारिक चीज़ देता है; बिना हिंसा के सरकार बदलने का रास्ता, लोगों के अधिकारों की रक्षा और ऐसा मंच जहाँ अलग-अलग हितों और विचारों के बीच कानून और बातचीत के जरिए रास्ता निकाला जा सके।

लेकिन सोशल मीडिया इस लोकतांत्रिक संस्कृति को कई तरीकों से कमजोर कर रहा है।

1. साझा सच्चाई पर भरोसा कम होना

लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि लोग कम से कम कुछ बुनियादी तथ्यों पर सहमत हों। लेकिन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर व्यक्ति को उसकी पसंद के हिसाब से अलग-अलग जानकारी दिखाते हैं।

नतीजा ये है कि लोग सिर्फ नीतियों पर एक-दूसरे से असहमत नहीं हैं। कई बार दोनों पक्षों के पास दुनिया को देखने के लिए बिल्कुल अलग-अलग ‘तथ्य’ होते हैं।

जब समाज के पास सच को परखने का कोई साझा आधार ही नहीं बचता, तो लोकतांत्रिक बहस धीरे-धीरे विचारों की बहस न रहकर गुटों की लड़ाई बन जाती है।

2. कैंसल करने और डर का माहौल

सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना या ‘कैंसल’ होने का डर लोगों को खुलकर बोलने से रोक सकता है।

राजनेता, शिक्षक, पत्रकार और आम लोग भी कई बार सिर्फ इसलिए अपनी बात कहने से बचते हैं कि कहीं सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान न शुरू हो जाए।

और जब लोग अपनी बात कहने से डरने लगें, तो खुली बहस कैसे होगी?

3. राजनीति का बहुत तेजी से अस्थिर होना

सोशल मीडिया को तेजी चाहिए। नया मुद्दा, नया विवाद, नया ट्रेंड और कुछ ही घंटों में पूरा ध्यान उस पर चला जाता है।

इसका असर राजनीति पर भी पड़ता है। लंबे समय की योजनाओं और मुश्किल समस्याओं पर लगातार काम करने के बजाय सरकारों पर भी हर नए ट्रेंडिंग मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ता जाता है।

नतीजा ये होता है कि सरकारें कई बार किसी समस्या को जड़ से हल करने के बजाय एक ट्रेंडिंग मुद्दे से दूसरे ट्रेंडिंग मुद्दे की तरफ भागती रहती हैं।

और जब ये तीनों चीजें एक साथ आती हैं, तो लोकतंत्र का सबसे जरूरी हिस्सा, मध्यमार्ग और संतुलन, कमजोर पड़ने लगता है।

जो लोग बातचीत, समझौते और धीरे-धीरे बदलाव की बात करते हैं, उनकी आवाज़ अक्सर उन ज्यादा उग्र लोगों के बीच दब जाती है जो मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह तोड़कर ही एक नई और बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है।

यही लोकतंत्र के लिए असली खतरा है; जब सुधार की जगह क्रांति, समझौते की जगह पूर्णता और बातचीत की जगह वैचारिक युद्ध हावी होने लगे।

राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना

अगर राहुल गांधी ये चेतावनी दे रहे हैं कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उनकी बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया जिस तरह आज काम करता है, वह लोकतंत्र की सोच और उसकी संस्थाओं के लिए सचमुच एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

डिजिटल दुनिया लोगों को लगातार एक ऐसी ‘आदर्श व्यवस्था’ की तस्वीर दिखाती रहती है, जो असल जिंदगी में संभव ही नहीं है। इससे लोग अपनी सरकार, संस्थाओं और पूरी राजनीतिक व्यवस्था से हमेशा असंतुष्ट रहने लगते हैं।

राजनीति भी धीरे-धीरे ऐसी हो जाती है जहाँ हर विवाद पर तुरंत प्रतिक्रिया चाहिए, हर समस्या का तुरंत समाधान चाहिए और हर समाधान बस एक नए सोशल मीडिया कैंपेन की दूरी पर दिखाई देने लगता है।

इस डिजिटल दौर में लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए हमें अपनी सोच और अपनी संस्थाओं, दोनों में कुछ बदलाव करने होंगे।

सबसे पहले हमें इंटरनेट से पैदा होने वाली इन अवास्तविक उम्मीदों को थोड़ा कम करना होगा और राजनीतिक यथार्थवाद को फिर से समझना होगा।

इसके लिए नागरिकों में जागरूकता जरूरी है। लोगों को ये समझना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर आक्रोश स्वाभाविक नहीं होता, कई बार एल्गोरिदम ही उसे बढ़ा रहे होते हैं।

हमें अपने नेताओं से भी ये उम्मीद करनी होगी कि वे हर ट्रेंडिंग मुद्दे के पीछे भागने के बजाय लंबी अवधि की समस्याओं पर ध्यान दें।

और सिर्फ सोशल मीडिया पर बहस करने के बजाय लोगों को स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के वास्तविक काम में भी हिस्सा लेना होगा।

इतिहास हमें एक और महत्वपूर्ण बात सिखाता है।

समाज सिर्फ बाहरी दुश्मनों के हमले से नहीं टूटते। कई बार वे तब भी कमजोर पड़ने लगते हैं जब उनके अपने लोग ही अपनी व्यवस्था पर भरोसा खो देते हैं।

डिजिटल आदर्शवाद हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाता है जिसमें सब कुछ परफेक्ट हो। लेकिन इतिहास बार-बार बता चुका है कि ऐसा समाज बनाना लगभग हमेशा एक भ्रम ही साबित हुआ है।

इसलिए आज लोकतंत्र की असली रक्षा इस बात में नहीं है कि हम उसे परफेक्ट बनाने की कोशिश करें।

उसकी असली रक्षा इस बात में है कि हम उसकी कमियों को स्वीकार करें, उसकी गलतियों को सुधारते रहें और फिर भी उस व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखें।

क्योंकि एक ऐसा समाज जो स्वतंत्र है, जटिल है और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता रखता है, वह किसी भी सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले ‘परफेक्ट समाज’ के सपने से कहीं ज्यादा कीमती है।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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