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फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी के बाद भारत के सामने रबी सीजन की परीक्षा: जानिए खेती की चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने की है कैसी तैयारी

खाद्य सुरक्षा बनाए रखना केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर आपूर्ति तंत्र को दुरुस्त रखना उतना ही अनिवार्य है।

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी मजबूत ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ (उर्वरक कूटनीति) के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी खाद्य संकट से अपनी कृषि व्यवस्था को सुरक्षित रखा है। Chapter1Mag की खास सीरीज के पार्ट-I में बताया गया है कि भारत ने रूस, मोरक्को और मध्य पूर्व के देशों के साथ रणनीतिक करार और ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक के भारी-भरकम सब्सिडी आवंटन के जरिए कैसे देश में खाद की कमी नहीं होने दी। अब इस सीरीज के दूसरे भाग में Chapter1Mag ने यह विश्लेषण किया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को साधने के बाद भारत साल 2026 के आगामी रबी फसल सीजन की घरेलू और जमीनी चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह खुद को तैयार कर रहा है।

भारत में रबी का मौसम देश की खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय खाद्यान्न भंडार (Buffer Stocks) की रीढ़ माना जाता है। गेहूँ, सरसों, चना और जौ जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन पूरी तरह से सही समय पर मिलने वाले उर्वरक, पर्याप्त सिंचाई और उन्नत किस्म के बीजों पर टिका होता है। साल 2026 के इस रबी सीजन में भारत सरकार का मुख्य फोकस देश में कृषि उत्पादन के रिकॉर्ड लक्ष्य को हासिल करने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मानसूनी पैटर्न से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने पर है। कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों ने इसके लिए संयुक्त रूप से बहुस्तरीय कार्ययोजना तैयार की है।

रबी सीजन की बुआई के लिए डीएपी (DAP) और यूरिया की माँग सबसे अधिक होती है। पिछले सीजन के अनुभवों और अंतरराष्ट्रीय बाधाओं को देखते हुए इस बार केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर बुआई शुरू होने से पहले ही उर्वरकों की अग्रिम बफरिंग (Advance Buffering) शुरू कर दी है। देश भर के प्रमुख कृषि राज्यों में लगभग 55 लाख टन डीएपी और यूरिया का अग्रिम स्टॉक सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि किसानों को बुआई के एन वक्त पर लंबी लाइनों और किल्लत (Shortage) का सामना न करना पड़े। इसके अलावा, तरल नैनो यूरिया (Nano Urea) और नैनो डीएपी के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम किया जा सके।

उर्वरकों के साथ-साथ सिंचाई और जलाशयों का जलस्तर रबी फसलों की पैदावार में निर्णायक भूमिका निभाता है। हाल के मानसूनी सत्रों के बाद देश के मुख्य जलाशयों की भंडारण क्षमता और भूजल स्तर को ध्यान में रखते हुए सरकार ने जल प्रबंधन के विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सेंट्रल वाटर कमीशन (CWC) के आंकड़ों के मुताबिक, रबी सीजन की शुरुआत में प्रमुख जलाशयों में जल स्तर को 80% से ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और ड्रिप इरिगेशन के दायरे को बढ़ाया जा रहा है, जिससे कम पानी में भी फसलों की सिंचाई को सुरक्षित रखा जा सके।

तीसरा और सबसे अहम स्तंभ है उच्च गुणवत्ता वाले जलवायु-सहनशील बीजों (Climate-Resilient Seeds) की उपलब्धता। तापमान में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव और असमय बारिश के खतरे से फसलों को बचाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित गेहूँ और सरसों की नई किस्मों के बीजों का वितरण शुरू किया गया है। वर्ष 2026 के रबी सीजन के लिए देश में लगभग 165 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों (Certified Seeds) की व्यवस्था की गई है। इसमें गर्मी सहन करने वाली गेहूँ की विशेष प्रजातियों (जैसे HD-3385 और DBW-303) के बीजों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि मार्च में अचानक बढ़ने वाली गर्मी से गेहूँ का दाना प्रभावित न हो।

Chapter1Mag की यह स्पेशल रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि खाद्य सुरक्षा बनाए रखना केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर आपूर्ति तंत्र को दुरुस्त रखना उतना ही अनिवार्य है। उर्वरक कूटनीति के जरिए वैश्विक झटकों से बचने के बाद, अब सही समय पर खाद, पानी और बीजों का यह त्रिस्तरीय प्रबंधन भारत को 2026 के रबी सीजन में कृषि आत्मनिर्भरता और रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की ओर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार कर रहा है।

मूल रिपोर्ट विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working.

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