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सायमा के लिए ‘CRPF’ लिखकर मुस्लिम नाम छिपाना सही, पर आतंकी का वीडियो सामने आना ‘निंदनीय’: एजेंडाधारी वामी-कामी ‘गैंग’ की मानसिकता समझिए

ग्रेटर नोएडा में बच्ची पर हुए अत्याचार पर RJ सायमा ने अपराधी का नाम छिपाकर 'CRPF' पर फोकस किया। यह वही सायमा है, जिसको दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी का वीडियो प्रसारित होना नामंजूर था। लेकिन अब वह खुद CRPF का नाम लेकर प्रोपेगेंडा चला रही हैं।

हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक रूह कँपा देने वाला मामला सामने आया है। CRPF जवान तारिक अनवर और उसकी बेगम रिम्पा खातून ने रिश्तेदारी में 10 साल की बच्ची के साथ बेरहमी से मारपीट की। इतना प्रताड़ित किया कि उसकी पसलियाँ टूट गईं, दाँत टूट गए, पूरे शरीर पर जख्म हैं। आज वह बच्ची अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए लड़ रही है। यहाँ सवाल इंसानियत का है, बच्ची के साथ हुए जुल्म का है और न्याय का है।

लेकिन इस जघन्य अपराध पर रेडियो मिर्ची RJ सायमा की टिप्पणी ने इसे एजेंडा बना दिया। सायमा ने मामले को इंसानियत के नजरिए से देखने के बजाए अपने तयशुदा एजेंडे के तहत पेश किया। सायमा ने सिर्फ ‘CRPF’ को फोकस में रखा और आरोपित का नाम छिपा लिया। और अंत में ‘जय हिंद’ जोड़ दिया।

RJ सायमा का ट्वीट (फोटो साभार: X)

यही RJ सायमा की असली पहचान है। वो हर मामले को इंसान नहीं, पहचान के चश्में से देखती हैं। अगर आरोपित मुस्लिम हो तो नाम छिपाओ। शब्द तौलो। और अपने नैरेटिव के अनुसार तोड़-मरोड़कर सामने रख दो। जिससे अपराधी नहीं, बल्कि वर्दी बदनाम हो और सरकार घेरे में आए।

सायमा ने यहाँ भी यही किया। मुस्लिम नाम छिपाकर ‘CRPF’ को उछाला और वर्दी को कठघरे में लाया गया। सायमा के लिए अपराध मैटर नहीं करता। मैटर करता है अपराधी की पहचान। और फिर आता है सबसे घिनौना हिस्सा- टिप्पणी के आखिर में ‘जय हिंद’। यह कोई देशभक्ति दिखाने को लिए तो यहाँ नहीं ही लिखा गया है, बल्कि यह सेना को ‘मॉक’ करने के इरादे से जरूर लिखा प्रतीत हो रहा है।

RJ सायमा के पुराने बयानों को देखें तो यह तस्वीर और साफ होती है। हिजाब पर सवाल हो, तो ‘इस्लाम में जबरदस्ती नहीं‘ की लाइन तैयार रहती है। कुरान पर आलोचना हो, तो तुरंत उसे गलत समझ और इस्लामोफोबिया बता दिया जाता है। लेकिन जब बात देश की सुरक्षा संस्था से जुड़ी CRPF की हो, तो वही संतुलन गायब हो जाता है। वहाँ पूरी वर्दी को दोषी ठहराने में देर नहीं लगती।

यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बल किसी धर्म के नहीं होते। वे देश के होते हैं। अगर किसी वर्दी वाले ने अपराध किया है, तो उस व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूरी वर्दी को कठघरे में खड़ा करने की साजिश। लेकिन जब ऐसे मामलों में आरोपित की पहचान धुँधली रखी जाए और सेना को टारगेट किया जाए, तो शक होना लाजमी है।

निष्कर्ष साफ है। RJ सायमा को न बच्ची से मतलब है, न इंसाफ से। उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका सेना को कठघरे में खड़ा करने का। मौका अपने तयशुदा एजेंडे को आगे बढ़ाने का। अगर यह मामला किसी आम मुस्लिम व्यक्ति का होता और उसमें पुलिस या सेना का नाम नहीं जुड़ा होता, तो सायमा शायद चुप रहतीं। जैसे वो लाल किले के पास फिदायीन हमला करने वाले उमर नबी के मामले में रही थीं। उमर नबी का वीडियो लीक होना उन्हें नामंजूर था, जिसमें वह खुद इस्लाम में फिदायीन बनने को अच्छा बता रहा था। तब एक आतंकी की पहचान उजागर होना सायमा के लिए निंदनीय था।

लेकिन अब जैसे ही सायमा देश की सुरक्षा संस्था CRPF दिखा, तो उनका ट्वीट तैयार हो गया। साथ में लिखा गया- जय हिंद। इसमें भी शब्द चुने गए। नाम गायब किया गया। और अपने एजेंडा के मुताबिक परोसा गया।

यह वही पुरानी चाल है। पहले अपराध को पहचान की आड़ में छुपाओ। फिर देश की सुरक्षा करने वाली वर्दियों को बदनाम करो। और अंत में ‘जय हिंद’ लिखकर खुद को बचा लो। यह सीधा-सीधा जहर है, जो हर बार अलग मुद्दे के बहाने परोसा जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार एक मासूम बच्ची वेंटिलेटर पर है और सायमा का एजेंडा यहाँ भी ऑन ही है।

देश अब यह समझने लगा है कि कौन इंसाफ की बात कर रहा है और कौन इंसाफ का इस्तेमाल कर रहा है। RJ सायमा जैसे लोगों का पर्दाफास होना जरूरी है, क्योंकि ये लोग अपराधी से ज्यादा खतरनाक होते हैं। अपराधी एक होता है, लेकिन ऐसे लोग पूरे सिस्टम को शक के घेरे में डाल देते हैं। वर्दी को बदनाम करते हैं और फिर उसी वर्दी के नाम पर ‘जय हिंद’ लिखकर इंसाफ का ढोंग करते हैं।

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पूजा राणा
पूजा राणाhttps://hindi.opindia.com/
एक मामूली लड़की! असलियत से वाकिफ होने की खोज में

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