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शोभायात्रा पर पथराव-दुर्गा प्रतिमा खंडित, आस्था के पर्व पर दिखा इस्लामी कट्टरपंथियों का आतंक: गरबा पंडाल में नाम बदलकर घुसे मुस्लिम युवक, हिंदू युवतियों से की छेड़खानी

हिंदुओं की आस्था से जुड़े पर्वों पर आतंक फैलाना जिहादियों की आदत बनती जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी नवरात्रि के मौके पर आयोजित दुर्गा पूजा और गरबा पंडालों को इस्लामी कट्टरपंथियों का कहर देखने को मिला। कुछ जगहों पर मुस्लिम युवकों ने जबरन घुसकर महिलाओं से छेड़खानी की तो कहीं मजहब के नाम पर दंगे फैलाए गए।

वहीं, दूसरी ओर सनातन संस्कृति की रक्षा को लेकर भी इस बार कुछ खास पहलें देखने को मिलीं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कई आयोजनों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बोर्ड लगाए गए। इसके साथ ही गरबा पंडालों में लव जिहाद और धर्मांतरण के खिलाफ जागरूकता संदेश प्रसारित किए गए।

‘आई लव मोहम्मद’ स्टेटस पर गरबा पंडाल में पथराव

गुजरात के गाँधीनगर में ‘आई लव मोहम्मद’ का स्टेटस लगाने के बाद हिंसा हुई थी। इसके लगाने को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों ने गरबा पंडाल और दुकानों पर हमला कर पथराव और आगजनी की गई। पुलिस ने कड़ा एक्शन लेते हुए 70 आरोपितों को गिरफ्तार किया।

महाराष्ट्र में मुस्लिम छात्रों की आपत्तिजनक व्हाट्सऐप चैट लीक

महाराष्ट्र के विरार शहर में VIVA कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों की व्हाट्सऐप चैट लीक हुई। शाहिद और फैज नाम के दो छात्र के बीच गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने की प्लानिंग कर रहे थे। इन छात्रों ने अपनी चैट में लिखा था कि ‘एक भी हिंदू लड़की को नहीं छोड़ना है’।

इसी कॉलेज में डांडिया कार्यक्रम के दौरान छात्राओं के वीडियो Discord App पर डालकर अश्लील कमेंट भी किए गए।

16 साल का मुस्लिम लड़का ‘आरव त्रिवेदी’ बन गरबा पंडाल में घुसा

कई जगहों पर मुस्लिम युवकों ने तमाम कोशिशों के बाद भी फर्जी नाम के सहारे गरबा पंडाल में एंट्री ले ली। राजस्थान के बांसवाड़ा में 16 साल का मुस्लिम लड़का ‘आरव त्रिवेदी’ बनकर गरबा पंडाल में घुसा आया। यहाँ उसने 17 वर्षीय हिंदू लड़की से छेड़छाड़ की और उसपर अपने साथ जाने का दबाव भी बनाया। हिंदू संगठन ने मुस्लिम लड़के को पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया।

गरबा पंडाल में घुसकर महिलाओं से छेड़खानी, पथराव

राजस्थान के बीकानेर से एक और ऐसा मामला सामने आया। यहाँ बेनीसर बाड़ी इलाके में गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम युवकों ने जबरदस्ती में पंडाल में घुसकर महिलाओं से छेड़छाड़ की। युवक जबरन महिलाओं के साथ डांस करने लगे। बाकी लोगों ने रोकने की कोशिश की तो पथराव तक किया गया।

इस दौरान पुलिस की एक जीप और मोटरसाइकिल को नुकसान पहुँचा जबकि करीब 5 लोग घायल हो गए। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 12 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।

कानपुर में गरबा पंडाल में घुसे सुहैल सिद्दीकी-सैफ

कानपुर में नवरात्रि के दौरान हुए डांडिया कार्यक्रम में दो मुस्लिम युवक सुहैल सिद्दीकी और सैफ घुसपैठ करते पकड़े गए। आयोजन स्थल पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था फिर भी दोनों अंदर पहुँच गए और युवतियों पर अश्लील टिप्पणियाँ करने लगे। एक महिला पुलिसकर्मी की शिकायत पर दोनों के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

छत्तीसगढ़ में मुस्लिम युवक की पंडाल में घुसपैठ

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में नवरात्रि के गरबा कार्यक्रम के दौरान एक मुस्लिम युवक के पकड़े जाने के बाद खूब विवाद हुआ। जानकारी के मुताबिक, हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने युवक को गरबा खेलते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। बताया गया कि यह युवक गलत नाम बताकर पंडाल में घुसा था। इसके बाद हिंदू संगठन के सदस्यों ने उससे माता की मूर्ति के सामने दंडवत प्रणाम करवाया, प्रसाद खिलाया और माता के जयकारे भी लगवाए।

मक्का-मदीना की AI जेनरेटेड फोटो पर बवाल, नवरात्रि पंडाल तोड़ा

गुजरात के वडोदरा में 19 सितंबर 2025 को मक्का-मदीना का मजाक उड़ाती एक AI जेनरेटेड तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई। इस पोस्ट पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने जूनीगढ़ी और पानीगेट स्थिति पुलिस थाने के बाहर जमकर हंगामा किया। कट्टरपंथियों की भीड़ ने नवरात्रि पंडाल में तोड़फोड़ की।

भीड़ ने इलाके में जमकर पत्थरबाजी की और वाहनों को नुकसान पहुँचाया। इस घटना में कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। भारी पुलिसबल ने स्थिति को काबू में किया। वडोदरा DCP के मुताबिक तुरंत कार्रवाई करते हुए 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया।

दुर्गा प्रतिमा खंडित कर जानलेवा हमला भी किया

मुंबई के मानखुर्द इलाके में 21 सितंबर 2025 को सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए दुर्गा प्रतिमा को खंडित कर दिया गया। दरअसल, हिंदू समुदाय के लोग नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा करने के लिए धूमधाम से मूर्ति लेकर जा रहे थे। तभी यात्रा मस्जिद के सामने से गुजरी तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने ढोल बजाने पर आपत्ति जताई और गाली-गलौज की।

इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों ने दुर्गा प्रतिमा को खंडित कर दिया। प्रतिमा का हाथ टूटा हुआ मिला। इतना ही नहीं इस्लामी कट्टरपंथियों ने धारदार हथियार और रॉड से हिंदुओं पर हमला किया। मौके पर पहुँची पुलिस ने 7 लोगों को गिरफ्तार किया।

दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर पथराव

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के नयाखेड़ा गाँव में बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को हुए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान जुलूस के मस्जिद के पास से गुजरते समय विवाद हो गया। वहाँ कुछ लोगों ने DJ के शोर पर आपत्ति जताई, जिसके बाद दो पक्षों में ज्यादा बहस और फिर पथराव हुआ। इसमें एक युवक को गंभीर चोटें आईं और एक छोटी प्रतिमा क्षतिग्रस्त हो गई।

दुर्गा पूजा पंडाल में ईसा मसीह की तस्वीरें

झारखंड के राँची में दुर्गा पूजा का पंडाल वेटिकन सिटी की थीम पर बनाया गया, जिसमें दीवारों पर ईसा मसीह, मरियम और ईसाई धर्म से जुड़ी तस्वीरे लगाई गई। हिंदू संगठन ने इसका विरोध किया तब जाकर ये थीम बदली गई। इसकी जगह श्रीराम, श्रीकृष्ण और अन्य हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें लगाई गई।

गरबा कार्यक्रम पर मोहसिन खान ने अंडे फेंके

मुंबई के मीरा रोड पूर्व की जेपी नॉर्थ गार्डनर सिटी सोसायटी में गरबा कार्यक्रम के दौरान मोहिसन खान ने इमारत की 16वें मंजिल से अंडे फेंके। इसके बाद कार्यक्रम में विवाद हो गया। पुलिस ने मोहसिन खान के खिलाफ FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी। यह भी सामने आया कि उसने पहले भी पुलिस को फोन कर कई बार कार्यक्रम रुकवाने की कोशिश की थी।

गरबा पंडाल में हिंदुओं को किया जागरूक, गैर-हिंदुओं की नो-एंट्री

इस साल गरबा पंडाल में तमाम तरीकों के संदेशों के साथ हिंदुओं को जागरूक करने का प्रयास भी किया गया। कहीं लव जिहाद और धर्मांतरण को लेकर तरह-तरह के मैसेज लिखे गए। तो वहीं पिछले सालों में देखी गई सांप्रदायिक घटनाओं के चलते मध्य प्रदेश और राजस्थान में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक भी लगा दी गई।

ऐसे ही मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले के एक गरबा पंडाल में ‘लव जिहाद’ को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई। यहाँ पोस्टर में लिखा गया, “बहन, तू दुर्गा बन, काली बन या फिर झाँसी की रानी बन, पर कभी लव जिहाद की शिकार मत बन।” इस पंडाल में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया गया।

नागपुर में नवरात्र के दौरान गरबा कार्यक्रम के आयोजको ने सख्त आदेश जारी किए। इसके तहत सिर्फ हिंदुओं को नवरात्र के कार्यक्रम में प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए आधार कार्ड दिखाना और तिलक लगाना जरूरी कर दिया गया। साथ ही पंडाल में भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने झुकना भी जरूरी कर दिया गया।

इसके साथ पंडाल में प्रवेश करने वालों को रक्षासूत्र (कलावा) बाँधना होगा और उनपर ‘गौमूत्र’ भी छिड़का जाएगा। ये नियम विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं से बचने के लिए लागू किए गए।

मध्य प्रदेश के एक गरबा पंडाल को ‘लव जिहाद’ के खतरे को उजागर करने वाले जागरूक संदेश से भरा केंद्र बनाया गया। इस पंडाल में लव जिहाद से जुड़े कुछ मामलों की तरह पीड़ित हिंदू लड़कियों को सूटकेस और फ्रिज में प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया। पंडाल को हिंदू संगठनों ने ‘हिंदू बेटी बचाओ अभियान’ के तहत प्रदर्शित किया।

‘याद रहे, कराची का रास्ता सर क्रीक से होकर गुजरता है’: जानें इस ‘दलदली खाड़ी इलाके’ का इतिहास और भूगोल जिसे बदलने की राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को दी चेतावनी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को सरक्रीक को लेकर चेताया है। पाकिस्तान ने यहाँ सैन्य गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं और बुनियादी ढाँचे का निर्माण कर रहा है। सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण यह क्षेत्र पश्चिमी समुद्री सीमा पर है। भारत के कच्छ और पाकिस्तान के सिंध से लगी 96 किलोमीटर की इस खाड़ी में भारत ने अपने क्षेत्र में नौसेना की तैनाती की है। साथ ही तटरक्षक बल इसकी चौकसी करते हैं।

इतिहास-भूगोल दोनों बदल देंगे- राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह ने कहा, “भारत की सेना और बीएसएफ पूरी तरह चौकस हैं। पाकिस्तान को याद रहे, कराची तक जाने का एक रास्ता इसी क्रीक से गुजरता है। सर क्रीक में कोई भी दुस्साहस किया गया, तो भारत का जवाब ऐसा होगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएगा।”

उन्होंने कहा, “सरक्रीक को लेकर भारत ने कई बार बातचीत के रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान के मन में खोट है। 1965 के युद्ध में, भारतीय सेना ने लाहौर तक पहुँचने की क्षमता का प्रदर्शन किया था। रक्षा मंत्री ने कहा कि आज 2025 में, पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि कराची जाने का एक रास्ता सर क्रीक से होकर गुजरता है।”

रक्षा मंत्री ने ये भी खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त पाकिस्तान ने सरक्रीक से लेकर लेह तक भारत की रक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। भारतीय जवानों के जवाबी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह तहस-नहस हो गई।

दशहरा के मौके पर (2 अक्टूबर 2025) गुजरात के भुज में सैनिकों के बीच ‘शस्त्र पूजा’ के मौके पर राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को सर क्रीक को लेकर चेतावनी दी है।

क्या है सर क्रीक खाड़ी विवाद

भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा को निर्धारित करने वाला ये इलाका शुरुआत से ही विवादों में रहा है। गुजरात के कच्छ और सिंध प्रांत के बीच 96 किलोमीटर का ये दलदली खाड़ी इलाका है, जो अरब सागर से मिलता है। पानी का स्तर यहाँ अरब सागर में उठने वाली ऊँची-ऊँची लहरों की वजह से बदलता रहता है।

सर क्रीक खाड़ी में हाइड्रोकार्बन और प्राकृतिक गैस के भंडार हैं और मछली पकड़ने से लेकर समुद्री व्यापार तक में इसका अहम रोल है। पाकिस्तान पर समुद्र से निगरानी रखने का ये अहम केन्द्र भी है। पाकिस्तान के कराची पोर्ट तक पहुँचने का यह एक समुद्री मार्ग है। सीमा तय करना भी यहाँ मुश्किल रहा है, इसलिए शुरू से विवाद रहा।

सर क्रीक खाड़ी विवाद को सुलझाने के लिए कई प्रयास किए गए। 1965 के युद्ध के बाद, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन ने मामले में हस्तक्षेप किया। भारत- पाकिस्तान के बीच न्यायाधिकरण की स्थापना करवाई, ताकि विवाद का स्थाई समाधान किया जा सके। 1968 में इसने कहा कि पाकिस्तान को उसके दावे का 10 फीसदी हिस्सा दे दिया जाए, लेकिन पाकिस्तान नहीं माना।

1997 में दोनों देशों के बीच कई मुद्दों के साथ सर क्रीक पर भी बात हुई। 2005-07 के बीच दोनों देशों ने मिलकर सर्वेक्षण भी किया, लेकिन हल नहीं निकला। इस इलाके में कई मछुआरों को पाकिस्तान इसलिए पकड़ लेता है, क्योंकि गलत से वह उनकी सीमा की ओर चले जाते हैं।

भारत का कहना है कि इस खाड़ी के बीच से बॉर्डर होनी चाहिए, जबकि पाकिस्तान अधिक क्षेत्र की माँग करता रहा है। भारत इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत से हल करना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान अक्सर उकसावे की कार्रवाई करता है। ताजा मामला भी उसके सैन्य गतिविधियों के बढ़ने और तटीय क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे के निर्माण की वजह से पैदा हुआ है।

सर क्रीक विवाद की शुरुआत

सर क्रीक के विवाद की जड़ 1914 में मुंबई प्रेसिडेंसी और सिंध के बीच समझौते से माना जाता है। उस वक्त सर क्रीक को सीमा माना गया था।
भारत-पाकिस्तान बँटवारे के समय कच्छ भारत का क्षेत्र बना जबकि सिंध पर पाकिस्तान का अधिकार हो गया। लेकिन पाकिस्तान शुरू से ही सर क्रीक के पूरे क्षेत्र पर अपना हक जताता है।

भारत 1925 के उस नक्शे को भी आधार मानता है, जिसमें इस इलाके के बीच में सीमा रेखा बनाई गई थी। साथ ही एक साल पहले यानी 1924 में खाड़ी के बीच में स्तंभ बनाए गए थे।

भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून के ‘थलवेग सिद्धांत’ के अनुरूप सीमा निर्धारण की बात भी कहता है। इसके मुताबिक समुद्री सीमा नौकाओं के आवागमन चैनल से मुताबिक तय होगी। लेकिन पाकिस्तान इसे खारिज करता है। उसका कहना है कि ये नियम नौका जलमार्ग चैनल के लिए लागू होती है। सर क्रीक के लिए इसे लागू नहीं किया जा सकता। जबकि भारत कहता है कि जब समुद्री में ऊँची ज्वार-भाटा उठता है तो इस क्षेत्र में नौकाएँ आसानी से पहुँचती हैं।

‘मैं काशी में ही रहना चाहती हूँ’ : 260 साल पहले जब माँ दुर्गा ने बनारस छोड़ने से किया इनकार, 15 ग्वाले मिलकर भी नहीं हिला पाए मूर्ति; जानें बंगाली टोले की पौराणिक परंपरा, आज भी पूजी जाती है वही प्रतिमा

“ई ना हटत हौ!” यह शब्द 1767 की विजयादशमी के दिन वाराणसी के मदनपुरा इलाके के 15 मजबूत यादव ग्वालों ने थक-हार कर कहे थे। उस दिन हर साल की तरह बंगाली टोला के मुखोपाध्याय (अब मुखर्जी) परिवार ने अपने घर में स्थापित दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाने की कोशिश की थी पर वह मिट्टी, भूसे, बाँस और जुट से बनी माँ दुर्गा की मूर्ति अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।

कई कोशिशों के बाद भी मूर्ति नहीं हिली तो कहा जाता है, उसी रात परिवार के मुखिया काली प्रसन्न मुखोपाध्याय के सपने में माँ दुर्गा आईं और बोलीं, “मैं शिव की नगरी काशी में ही रहना चाहती हूँ। मुझे विसर्जित मत करो।” यह स्वप्न केवल एक सपना नहीं, बल्कि माँ की आज्ञा मानी गई। तब से लेकर आज तक यानी लगभग 260 वर्षों से वही मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन विसर्जन नहीं किया जाता।

260 सालों से एक ही मूर्ति की पूजा

माँ की यह प्रतिमा वाराणसी के बंगाली टोला, मदनपुरा इलाके की पुरानी दुर्गा बाड़ी में स्थापित है। यहाँ की दुर्गा प्रतिमा करीब 6 फीट ऊँची है और साथ में हैं माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय। यह मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन कभी विसर्जित नहीं की जाती। मिट्टी, बाँस, पुआल और जूट से बनी यह मूर्ति आज भी वैसी ही है, जैसी 1767 में थी। हर साल बस हल्की-फुल्की मरम्मत की जाती है।

मुखोपाध्याय परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले थे। एक पारिवारिक झगड़े के बाद, वे वाराणसी आकर बस गए, जहाँ पहले से ही बंगाली संस्कृति का गहरा असर था। काली प्रसन्न मुखोपाध्याय ने अपने घर पर बंगाल की परंपरा से दुर्गा पूजा शुरू की। उस समय (1700 के दशक में) दुर्गा पूजा बंगाल में भी घरेलू, पारिवारिक होती थी। भव्य पंडालों और सार्वजनिक आयोजनों की बात तब दूर थी।

हर साल की तरह, 1767 में भी गंगामाटी (गंगा की मिट्टी) से बनी मूर्ति बजरा नाव से बंगाल से वाराणसी लाई गई। पूरे नवरात्र में पूजा हुई, लेकिन विजयदशमी के दिन जब विसर्जन का समय आया, तो मूर्ति ने मानो खुद को जड़ कर लिया। जितनी भी ताकत लगाई गई, मूर्ति हिली नहीं। तब माँ दुर्गा के सपने के बाद, मूर्ति को वहीं रहने देने का निर्णय लिया गया। तभी से, इसी प्रतिमा की हर साल पूजा होती है, लेकिन विसर्जन नहीं होता।

यह मूर्ति केवल दुर्गा पूजा के नौ दिनों में ही नहीं, पूरे साल पूजी जाती है। हर दिन 20 मिनट की आरती होती है और दुर्गा पूजा में ये बढ़कर 45 मिनट की हो जाती है। दुर्गा पूजा के समय फल, मटर, मूँग, और पंचमी को 51 नारियल से बनी नारियल नारू (पहले 151 से बनती थी) का विशेष भोग लगता है।

यहाँ कोई भव्य पंडाल नहीं लगता, लेकिन रिश्ते, स्मृतियाँ और आस्था का संगम होता है। देशभर से लोग यहाँ आते हैं, खासकर वे लोग जिनकी जड़ें कभी बंगाली टोला में थीं। यह पूजा सिर्फ मुखर्जी परिवार की नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और काशी की है।

यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा मान्यता प्राप्त मूर्ति है। प्रतिमा का चेहरा विशेष है, वह माँ दुर्गा को युवावस्था में दर्शाता है, जो बहुत दुर्लभ है।

आज जहाँ अमेरिका, कनाडा, यूरोप जैसे देशों में रहने वाले भारतीय माँ दुर्गा की फाइबरग्लास की मूर्तियाँ मँगवाते हैं जो विसर्जित नहीं होतीं, वहीं काशी की यह मूर्ति हर मायनों में अनोखी है। विदेशों में मूर्तियाँ दोबारा इस्तेमाल होती हैं सुविधा और खर्च के कारण। लेकिन काशी में यह मूर्ति माँ के आदेश के कारण स्थायी है।

मंदिर का रखरखाव और परिवार की भूमिका

परिवार के सदस्य मूर्ति को छू नहीं सकते, केवल पुजारी ही पूजन करते हैं। भट्टाचार्य परिवार पुजारी का कार्य करते हैं। वहीं दत्ता परिवार मूर्ति की सजावट और रंग-रोगन का कार्य करता है। इंद्रनील मुखर्जी, जो अब इस परंपरा को सँभाल रहे हैं, कहते हैं, “हमारे लिए यह मूर्ति माँ के रूप में यहीं काशी में हमेशा के लिए है। यह विसर्जन की नहीं, स्थायित्व की देवी हैं।”

जब देशभर में विजयादशमी पर माँ को विदा किया जाता है, “आश्चे बोछोर आबार होबे” (अगले साल फिर होगी), काशी की यह माँ हमेशा के लिए यहीं रह गईं। यह सिर्फ मूर्ति की बात नहीं, बल्कि विश्वास की नींव पर टिकी एक विरासत की कहानी है।

‘हम सौभाग्यशाली हैं, हमें ये महान अवसर को देखने को मिला’ : RSS के शताब्दी वर्ष पर PM मोदी ने दी शुभकामनाएँ, बोले- विकसित भारत में संघ का होगा योगदान

100 वर्ष पूर्व विजयदशमी के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई थी। ये हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनर्स्थापन था, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर उस युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए, नए-नए अवतारों में प्रकट होती है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। ये हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है।

मैं इस अवसर पर राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित कोटि-कोटि स्वयंसेवकों को शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं संघ के संस्थापक, हम सभी के आदर्श…परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए हैं।

जिस तरह विशाल नदियों के किनारे मानव सभ्यताएँ पनपती हैं, उसी तरह संघ के किनारे भी सैकड़ों जीवन पुष्पित-पल्लवित हुए हैं। जैसे एक नदी जिन रास्तों से बहती हैं, उन क्षेत्रों को अपने जल से समृद्ध करती हैं, वैसे ही संघ ने इस देश के हर क्षेत्र, समाज के हर आयाम को स्पर्श किया है। जिस तरह एक नदी कई धाराओं में ख़ुद को प्रकट करती है, संघ की यात्रा भी ऐसी ही है। संघ के अलग-अलग संगठन भी जीवन के हर पक्ष से जुड़कर राष्ट्र की सेवा करते हैं।

शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, आदिवासी कल्याण, महिला सशक्तिकरण, समाज जीवन के ऐसे कई क्षेत्रों में संघ निरंतर कार्य करता रहा है। विविध क्षेत्र में काम करने वाले हर संगठन का उद्देश्य एक ही है, भाव एक ही है….राष्ट्र प्रथम।

अपने गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएँ। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएँ…व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं।

राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति यही संघ की सौ वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं।

संघ जब से अस्तित्व में आया…संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही। आज़ादी की लड़ाई के समय परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए। आजादी की लड़ाई में कितने ही स्वतन्त्रता सेनानियों को संघ संरक्षण देता रहा…उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता रहा।

आजादी के बाद भी संघ निरंतर राष्ट्र साधना में लगा रहा। इस यात्रा में संघ के खिलाफ साजिशें भी हुईं, संघ को कुचलने का प्रयास भी हुआ। ऋषितुल्य परम पूज्य गुरु जी को झूठे केस में फँसाया गया। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने कभी कटुता को स्थान नहीं दिया। क्योंकि वो जानते है, हम समाज से अलग नहीं हैं, समाज हमसे ही तो बना है। समाज के साथ एकात्मता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आस्था ने संघ के स्वयंसेवकों को हर संकट में स्थित प्रज्ञ रखा है…समाज के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है।

प्रारंभ से संघ… राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। जब विभाजन की पीड़ा ने लाखों परिवारों को बेघर कर दिया, तब स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा की। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना…ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं।

अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया…स्वाभिमान जगाया। संघ देश के उन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है..जो दुर्गम हैं…जहाँ पहुँचना सबसे कठिन है। संघ…दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाज, आदिवासी मूल्यों को सहेजने-संवारने में अपना सहयोग देता रहा है…अपना कर्तव्य निभा रहा है। आज सेवा भारती…विद्या भारती, एकल विद्यालय…वनवासी कल्याण आश्रम…आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का स्तंभ बनकर उभरे हैं।

समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियाँ हैं, जो ऊँच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएँ हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है।

परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर ‘न हिन्दू पतितो भवेत्’ की भावना को आगे बढ़ाया। पूज्य बाला साहब देवरस जी कहते थे- छुआछूत अगर पाप नहीं, तो दुनिया में कोई पाप नहीं! सरसंघचालक रहते हुए पूज्य रज्जू भैया जी और पूज्य सुदर्शन जी ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाया। वर्तमान सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने भी समरसता के लिए समाज के सामने एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान का स्पष्ट लक्ष्य रखा है।

जब 100 साल पहले संघ अस्तित्व में आया था तो उस समय की आवश्यकताएँ, उस समय के संघर्ष कुछ और थे। लेकिन आज 100 वर्षों बाद जब भारत विकसित होने की तरफ बढ़ रहा है तब आज के समय की चुनौतियाँ अलग हैं, संघर्ष अलग हैं। दूसरे देशों पर आर्थिक निर्भरता, हमारी एकता को तोड़ने की साजिशें, डेमोग्राफी में बदलाव के षड़यंत्र, हमारी सरकार इन चुनौतियों से तेजी से निपट रही है। मुझे ये खुशी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस रोडमैप भी बनाया है।

संघ के पंच परिवर्तन, स्व बोध, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार और पर्यावरण ये संकल्प हर स्वयंसेवक के लिए देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को परास्त करने की बहुत बड़ी प्रेरणा हैं।

स्व बोध की भावना का उद्देश्य गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत पर गर्व और स्वदेशी के मूल संकल्प को आगे बढ़ाना है। सामाजिक समरसता के जरिए वंचित को वरीयता देकर सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रण है। आज हमारी सामाजिक समरसता को घुसपैठियों के कारण डेमोग्राफी में आ रहे बदलाव से भी बड़ी चुनौती मिल रही है। देश ने भी इससे निपटने के लिए डेमोग्राफी मिशन की घोषणा की है। हमें कुटुम्ब प्रबोधन यानी परिवार संस्कृति और मूल्यों को भी मजबूत बनाना है। नागरिक शिष्टाचार के जरिए नागरिक कर्तव्य का बोध हर देशवासी में भरना है। इन सबके साथ अपने पर्यावरण की रक्षा करते हुये आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है।

अपने इन संकल्पों को लेकर संघ अब अगली शताब्दी की यात्रा शुरू कर रहा है। 2047 के विकसित भारत में संघ का हर योगदान, देश की ऊर्जा बढ़ाएगा, देश को प्रेरित करेगा। पुन: प्रत्येक स्वयंसेवक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

Wikipedia के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी में एलन मस्क, लाएँगे Grokipedia: क्या वामपंथी प्रोपेगेंडा को खत्म कर पाएगा नया ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया

दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया ‘विकिपीडिया’ (Wikipedia) के दबदबे को ध्वस्त करने की तैयारी शुरू कर दी है। वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात विकिपीडिया को टक्कर देने के लिए मस्क ‘ग्रोकिपीडिया’ (Grokipedia) बनाने जा रहे हैं। यह मस्क की कंपनी एक्सएआई (xAI) द्वारा विकसित किया जाएगा।

xAI के संस्थापक मस्क ने घोषणा की है कि यह एक ओपन-सोर्स ज्ञान का भंडार होगा जो विकिपीडिया का विकल्प बनने की दिशा में काम करेगा। मस्क ने कहा है कि यह विकिपीडिया से बेहतर होगा और इसके इस्तेमाल के लिए कोई लिमिट नहीं होगी। मस्क ने लोगों से xAI से जुड़कर ग्रोकिपीडिया बनाने में मदद करने की अपील भी की है।

एलन मस्क ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में कहा, “हम ग्रोकिपीडिया बना रहे हैं। यह विकिपीडिया से बहुत बड़ा सुधार होगा। वास्तव में, यह एक्सएआई के ब्रह्मांड को समझने के लक्ष्य की दिशा में एक आवश्यक कदम है।”

इससे पहले मस्क ने विकिपीडिया को अपना नाम बदलने के लिए $1 बिलियन की पेशकश की थी। मस्क ने बुधवार को इससे जुड़ा एक पोस्ट भी रिपोस्ट किया है, जिसमें लिखा है, “विकिपीडिया को एलन मस्क से 1 बिलियन डॉलर का प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए था, अब बहुत देर हो चुकी है, प्रतिद्वंद्वी आ रहा है- ग्रोकिपीडिया!”

मस्क द्वारा यह घोषणा 30 सितंबर 2025 को की गई, जब मस्क ने डेविड सैक्स के एक पोस्ट का जवाब दिया, जिसमें विकिपीडिया की पूर्वाग्रही होने की आलोचना की गई थी।

कैसे काम करेगा ग्रोकिपीडिया?

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, एक्सएआई की टीम द्वारा विकसित किया जाएगा, जिसमें एआई विशेषज्ञ और डेवलपर्स शामिल होंगे। मस्क ने लोगों को आमंत्रित किया है। यह ओपन-सोर्स होगा, अर्थात इसका कोड और सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होगी, जिससे कोई भी व्यक्ति इसमें सुधार कर सकेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नवंबर 2023 में लॉन्च किया गया ग्रोक नामक एआई चैटबॉट इस प्लेटफॉर्म का मुख्य इंजन होगा। ग्रोकिपीडिया में एआई का उपयोग जानकारी को सत्यापित करने, गलतियों को सुधारने और रीयल-टाइम अपडेट्स देने के लिए किया जाएगा। साथ ही, एक्स प्लेटफॉर्म से प्राप्त रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जानकारी हमेशा अपडेट रहे।

मस्क के मुताबिक, ग्रोकिपीडिया का लक्ष्य विकिपीडिया की तुलना में अधिक सटीक, पारदर्शी और विविध जानकारी लोगों तक पहुँचाना है। मस्क लंबे समय से विकिपीडिया की आलोचना करते रहे हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने X पर ही एक पोस्ट किया था कि विकिपीडिया पर अति-वामपंथी एक्टिविस्ट्स का नियंत्रण है। मस्क ने लिखा था, “लोगों को उन्हें दान देना बंद कर देना चाहिए।”

विकिपीडिया का एंटी हिंदू और वामपंथ प्रेमी प्रोपेगेंडा

Wikimedia Foundation बेशक यह दावा करता रहा हो कि विकिपीडिया एक स्वतंत्र, संपादकीय हस्तक्षेप-रहित विश्वकोश है लेकिन हकीकत इससे अलग है। वामपंथियों की टूलकिट बने विकिपीडिया का खुलासा करते हुए ऑपइंडिया ने 186 पन्नों का डोजियर तैयार किया था।

विकिपीडिया में असामान्य शक्ति वाले संपादक और प्रशासक सुनिश्चित करते हैं कि ‘दक्षिणपंथी’ (गैर-वामपंथी) स्रोतों को खारिज या ब्लैकलिस्ट कर दिया जाए। मस्क या ऑपइंडिया छोड़िए खुद Wikipedia के सह-संस्थापक लैरी सेंगर भी यह साफ-साफ कह चुके हैं कि विकिपीडिया में स्पष्ट वामपंथी पूर्वाग्रह है।

हमारे शोध में सामने आया कि खुद को ओपन सोर्स बताना का दावा करने वाले विकिपीडिया की संरचना स्वयं कुछ व्यक्तियों को पूर्ण शक्ति देती है जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है। पूरे विश्व में केवल 435 सक्रिय प्रशासक हैं जिनके पास संपादकों को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं को प्रतिबंधित करने और लेखों पर संपादन करने या पलटने का अधिकार है।

नवंबर 2024 में मोदी सरकार ने भी विकिपीडिया को नोटिस भेजकर इस पर प्रकाशित भ्रामक और पक्षपाती जानकारी पर सवाल पूछे थे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I&B) द्वारा जारी इस नोटिस में जिक्र किया गया था कि किस तरह विकिपीडिया की सामग्री पर एक छोटे समूह के संपादकों का नियंत्रण है, जो इसमें हेरफेर करने में सक्षम होते हैं और एकपक्षीय जानकारियाँ उपलब्ध कराते हैं।

Wikimedia Foundation की पूर्व CEO कैथरीन माहेर ने अगस्त 2021 में एक TED टॉक में अनजाने में यह खुलासा किया कि विकिपीडिया के माध्यम से फैलाई गई जानकारी सत्य पर आधारित नहीं होती।

कैथरीन माहेर ने अपने TED टॉक और अन्य सार्वजनिक भाषणों में स्पष्ट किया कि विकिपीडिया पर लिखने वाले लेखक ‘सत्य’ पर ध्यान केंद्रित नहीं करते। उन्होंने कहा, “जो लोग इन लेखों को लिखते हैं, वे सत्य पर नहीं, बल्कि वर्तमान समय में जो सबसे अच्छा संभव ज्ञान है, उस पर ध्यान केंद्रित करते हैं।”

विकिपीडिया के हिंदू विरोध को कुछ उदाहरणों से समझें तो इसने ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दिया जिसे संभल के मुस्लिम पत्थरबाजों को बचाने की कोशिश हुई और ‘जय श्रीराम’ के नारों को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार गया।

इसके अलावा विकिपीडिया ने छत्रपति संभाजी महाराज पर विवादित कंटेंट हटाने से मना कर दिया था। साथ ही, RSS के विकिपीडिया पेज से छेड़छाड़ कर उसे इस्लामी यूजर द्वारा ‘हिंदू आतंकी संगठन’ लिखे जाने का केस भी सामने आया है। हाल ही काे उदाहरण को देखें तो विकिपीडिया में वामपंथी एडिटर ‘द बंगाल फाइल्स’ को ‘प्रोपेगेंडा’ फिल्म बताने पर तुले नजर आए थे।

विकिपीडिया की फंडिंग पर भी हैं सवाल

Wikimedia Foundation का वित्तीय जुड़ाव Tides Foundation से है, जिस पर अमेरिका में हमास समर्थक प्रदर्शनों और जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठनों को फंड देने के आरोप हैं। ये दोनों मिलकर कई ऐसे समूहों को सहायता देते हैं जो भारत विरोधी एजेंडा चलाते हैं। इनमें Hindus for Human Rights, Equality Labs, Art+Feminism, Access Now और हिंडेनबर्ग जैसे संगठन शामिल हैं।

2019 से Wikimedia Foundation की भारत में कोई औपचारिक मौजूदगी नहीं है, फिर भी यह भारत से भारी डोनेशन लेता है और उन्हें उन एनजीओ तक पहुँचाता है जो उसके व्यावसायिक और भारत-विरोधी हितों को मजबूत करते हैं।

विकिपीडिया के एकछत्र और एक आयामी राज को खत्म कर एलन मस्क की यह पहल एक ऑनलाइन विश्वकोश से आगे बढ़कर सूचना की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव बन सकती है। विकिपीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर जो पक्षपात, अधूरी जानकारी और विवादास्पद संदर्भ होने की समस्याओं के उल्ट ग्रोकिपीडिया पारदर्शी और भरोसेमंद ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया बन सकता है।

बच्चों के ‘वोक ट्रांसजेंडर’ शो को लेकर निशाने पर Netflix, एलन मस्क समेत बड़ी संख्या में लोग कैंसल कर रहे सब्सक्रिप्शन: शो के क्रिएटर ने चार्ली किर्क पर दिया विवादित बयान

अमेरिका में नेटफ्लिक्स के खिलाफ एक बड़े पैमाने पर सब्सक्रिप्शन कैंसिल अभियान शुरू हो गया है। आरोप है कि नेटफ्लिक्स जेंडर आइडियोलॉजी (लैंगिक विचारधारा) को बढ़ावा दे रहा है। इस अभियान को टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने आगे बढ़ाया है।

इस विरोध की वजह नेटफ्लिक्स के एनिमेटेड शो ‘Dead End: Paranormal Park’ के क्रिएटर हैमिश स्टील का विवादित बयान माना जा रहा है। उन्होंने कंजरवेटिव एक्टिविस्ट चार्ली किर्क की हत्या पर आपत्तिजनक टिप्पणी की।

सोशल मीडिया पर वायरल एक स्क्रीनशॉट के मुताबिक, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने चार्ली किर्क के परिवार के लिए शोक संदेश लिखा था। इसके जवाब में हैमिश स्टील ने किर्क को रैंडम नाजी कहा है।

स्टील ने कथित तौर पर लिखा, “आप उन परिवारों के लिए संवेदना नहीं जताते जिनकी हत्या आपके हथियारों से हो रही है, लेकिन एक रैंडम नाजी मारा गया तो आप सार्वजनिक बयान देते हैं।”

एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर हैमिश स्टील के खिलाफ नाराजगी जताई, क्योंकि स्टील ने अपने नेटफ्लिक्स शो में बच्चों के लिए ट्रांस आइडियोलॉजी को बढ़ावा दिया। यह शो सिर्फ 7 साल के बच्चों के लिए भी बनाया गया है।

मस्क ने बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उन्होंने अपनी नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिया है। उन्होंने यह कदम तब उठाया जब एक एक्स यूजर ने भी ऐसा करने की बात कही। एक अन्य पोस्ट में मस्क ने ‘बच्चों के लिए’ नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने का आह्वान किया है।

डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के न्यूक्लियर वैज्ञानिक रहे मैट वैन स्वोल ने नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने की स्क्रीनशॉट शेयर कर लिखा, “मैंने अभी अपना नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिया है। अगर आप ऐसा कोई व्यक्ति रखते हैं जिसने चार्ली किर्क की हत्या का जश्न मनाया और मेरे बच्चों के लिए प्रो-ट्रांस सामग्री बनाता है… तो आप मेरी एक भी पैसा नहीं पाएँगे। बस इतनी सी बात है।”

इस पोस्ट को फिर से शेयर करते हुए, एलन मस्क ने लिखा, “वही।”

एक्स के मालिक ने भी हैमिश स्टील के शो में ट्रांसजेंडर थीम की आलोचना करते हुए एक पोस्ट को फिर से शेयर किया। यह शो 7 साल के बच्चों के लिए प्रमोट किया गया था। एलन मस्क ने लिखा, “यह ठीक नहीं है।”

स्टील की आलोचना करने वाले एक अन्य पोस्ट के जवाब में मस्क ने कहा, “वह एक ग्रूमर हैं”।

एलन मस्क लंबे समय से ट्रांस आइडियोलॉजी और जेंडर अफ़र्मिंग सर्जरी पर अपनी आलोचना व्यक्त करते रहे हैं। अपने इंटरव्यू में मस्क ने इसे ‘वोक माइंड वायरस’ कहा और अपने बेटे विवियन जेना के महिला में ट्रांज़िशन का जिक्र करते हुए इस पर आपत्ति जताई।

एलन मस्क द्वारा नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन रद्द करने के बाद नेटफ्लिक्स और हैमिश स्टील के खिलाफ नाराजगी और बढ़ गई। इसके तुरंत बाद सब्सक्रिप्शन रद्द करने का बड़ा अभियान शुरू हो गया। कई एक्स यूज़र्स ने अपना सब्सक्रिप्शन रद्द करने के स्क्रीनशॉट्स भी साझा किए हैं।

इस बीच, कई एक्स यूजर्स ने Dead End: Paranormal Park का एक क्लिप शेयर किया है, जिसमें मुख्य किरदार बार्नी गुटमैन कहता है कि वह ट्रांस है। इसके बाद से हैमिश स्टील ने अपना एक्स प्रोफाइल प्राइवेट कर लिया है।

ध्यान देने वाली बात है कि Dead End: Paranormal Park के आगे कोई एपिसोड रिलीज नहीं होंगे, क्योंकि नेटफ्लिक्स ने जनवरी 2023 में दो सीजन के बाद यह शो रद्द कर दिया था। यह शो हैमिश स्टील के हॉरर-कॉमेडी ग्राफिक नॉवल DeadEndia: The Watcher’s Test पर आधारित था।

इस सीरीज में, दो ऐम्यूसमेंट पार्क के कर्मचारी, बार्नी गुटमैन और नॉरमा खान, राक्षस कोर्टनी के साथ मिलकर पैरानॉर्मल एक्टिविटी की खोज और जाँच करते हैं।

दो सीजन के बाद, एनिमेटेड सीरीज रद्द कर दी गई, यह जानकारी हैमिश स्टील ने जनवरी 2024 में अपने एक्स पोस्ट में दी। उन्होंने बताया कि तीसरे सीजन की स्क्रीनप्ले और कहानी की रूप रेखा पहले ही राइटर्स रूम में पूरी हो चुकी थी और क्रू इस बात के लिए तैयार नहीं था कि Dead End: Paranormal Park को बंद कर दिया जाएगा।

हैमिश स्टील के वोक नेटफ्लिक्स शो और चार्ली किर्क के खिलाफ उनके कथित बयान के चलते नाराजगी के बीच, कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने यह भी बताया कि नेटफ्लिक्स पर Parental Guidance (PG) रेटेड एक डॉक्यूमेंट्री स्ट्रीम हो रही है।

इस डॉक्यूमेंट्री में एक ट्रांस एक्टिविस्ट के बारे में दिखाया गया है, जिसने बचपन में हार्मोन ब्लॉकर्स लिए और 18 साल की उम्र में जेनिटल म्यूटिलेशन कराया। नेटिज़ेंस का दावा है कि यह डॉक्यूमेंट्री बच्चों को ट्रांसजेंडर बनने के लिए प्रोत्साहित करती है और रासायनिक और शल्य चिकित्सा से नपुंसक बनाने को बढ़ावा देती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी सामग्री सभी उम्र के लोगों के लिए कैसे उपयुक्त मानी जा सकती है।

नेटिज़ेंस ने कई एनिमेटेड नेटफ्लिक्स शो के बारे में जानकारी साझा की है, जिनका 6 से 7 साल के बच्चों को लक्ष्य दर्शक माना गया है और जो वोक ट्रांस आइडियोलॉजी को बढ़ावा देते हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। जिसे इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

क्या है नेपाल की ‘कुमारी देवी’ परंपरा, कैसे चुनते हैं ‘तलेजु देवी’ का अवतार: जानिए किन कठिन परीक्षाओं के बाद 2 साल की आर्यतारा बनीं नई ‘जीवित देवी’

नेपाल के काठमांडू में दो साल आठ महीने की आर्यतारा शाक्य को नेपाल की नई कुमारी यानि नई ‘जीवित देवी’ के रूप में चुना गया। मंगलवार (30 सितंबर 2025) को आर्यतारा को उनके घर से तलेजु भवानी मंदिर में ले जाया गया। इस दौरान बच्ची के माता-पिता भावुक हो गए क्योंकि अब देवी घर से दूर मंदिर में विराजमान रहेंगी।

आर्यतारा ने पूर्ववर्ती कुमारी, तृष्णा शाक्य का स्थान लिया। परंपरा के अनुसार, मौजूदा कुमारी जैसे ही किशोरावस्था में प्रवेश करती है तो उन्हें सामान्य मनुष्य माना जाने लगता है। देवी चुने जाने वाले दिन आर्यतारा को उनके पिता गोद में उठाकर कुमारी घर लेकर आए। इस दौरान भव्य समारोह आयोजित किया गया। जहाँ हजारों लोग कुमारी की एक झलक पाने के लिए कतार में खड़े रहे।

अष्टमी तिथि को हुए इस समारोह में आर्यतारा कुमारी की औपचारिक पूजा की गई। कुमारी को आशीर्वाद के साथ घर से विदा कर काठमांडू के ऐतिहासिक कुमारी घर में स्थायी रूप से बैठाया गया। यह परिवार के लिए सम्मान की बात मानी जाती है क्योंकि कुमारी का परिवार समाज में प्रतिष्ठित हो जाता है।

कौन है ‘जीवित देवी’?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई कुमारी का पूरा नाम आर्यतारा शाक्य है, जिनकी उम्र केवल दो साल आठ महीने है। वे शाक्य वंश के नेवार समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। ये वही समुदाय है, जो कुमारी परंपरा से जुड़ा माना जाता है। आर्यतारा के पिता का नाम अनंत शाक्य, माता का नाम प्रतिष्ठा शाक्य है। उनकी एक बहन भी है, जिसका नाम पारमिता शाक्य है।

कैसे चुनी जाती हैं ‘जीवित देवी’?

नेपाल की इस परंपरा में कुमारी का सार्वजनिक रूप से चयन किया जाता है। इनमें नेवार समुदाय के शाक्य वंश की बालिकाओं का ही चयन होता है और यहा भी जरूरी है कि वे काठमांडू की मूल निवासी हो।

कुमारी बनने के लिए बालिकाओं में 32 गुण होने जरूरी हैं। इनमें 12 मानदंडों पर परीक्षा सफल करनी होती है। इनमें शारीरीक मानदंड में सुंदरता पर खास ध्यान दिया जाता है, जैसे चेहरा, दाँत, आँखें और त्वचा पर किसी प्रकार के दाग-धब्बे नहीं होने चाहिए या बच्ची के शरीर पर कोई घाव का निशान न हो।

आध्यात्मिक और व्यवहार संबंधी मानदंड पूरा करने के लिए बच्ची में निडर, शांत स्वभाव, दैवीय गुण होने जरूरी हैं। पारंपरिक अनुष्ठानों और ज्योतिष परीक्षणों के जरिए भी योग्य लड़की चुनी जाती है। आमतौर पर 2 से 4 साल की आयु की बच्ची का ही चयन कुमारी के रूप में किया जाता है। कुमारी बनने के बाद मासिक धर्म तक पहुँचने पर वह ‘देवी’ का रूप त्याग देती हैं और सामान्य जीवन में लौट आती हैं।

कुमारी चुने जाने के लिए ये मानदंड सदियों से चले आ रहे हैं। हालाँकि, आधुनिक समय में कुछ बदलाव और चर्चाएँ रही हैं, जिसमें कुमारी चुने जाने पर निजी शिक्षा लेने, टीवी देखने और कुछ आधुनिक सुविधाएँ पाने का अधिकार मिला है।

‘जीवित देवी’ बनने की परीक्षा

बच्ची को ‘जीवित देवी’ बनने के लिए कठिन परीक्षा से गुजरना होता है। इससे बच्ची की देवी के रूप में साहस और अन्य गुणों को परखा जाता है। परीक्षा के दौरान बच्ची को बलि दिए गए भैंसो और रक्त में नाचते हुए नकाबपोश पुरुषों को दिखाया जाता है। इस दौरान अगर डर का कोई भी लक्षण बच्ची में दिखता है तो उसे अयोग्य माना जाता है। चूँकि बच्ची को तलेजु का अवतार माना जाएगा इसीलिए बच्ची का साहसी होना महत्वपूर्ण है।

कुमारी चुने जाने के बाद बच्ची को माता-पिता का घर छोड़ना होता है। देवी का रूप बने रहने तक बच्ची को मंदिर में स्थायी रूप से विराजित किया जाता है, यहाँ खास कुमारी घर की व्यवस्था की जाती है। जहाँ देवी आम लोगों को दर्शन देती हैं। कुमारी के परिवार को बेटी से मिलने की अनुमति नहीं होती है। केवल साल में 13 बार सार्वजनिक आयोजनों में जाने के वक्त माता-पिता उनसे मिल सकते हैं।

‘जीवित देवी’ का रूप

कुमार तलेजु देवी का रूप मानी जाती हैं। इसीलिए कुमारी चुने जाने पर उन्हें हमेशा लाल वस्त्र पहनने हैं। बच्ची पूरी तरह से देवी धारण कर रहेंगी। बालों में चोटी बाँधती है और उनके माथे पर तीसरी आँख बनी होती है। नई जीवित देवी की पूजा हिंदू और बौद्ध धर्म के लोग करते हैं।

यह परंपरा 500 से 600 वर्ष पुरानी है जो मल्ल राजाओं के समय शुरू हुई। हालाँकि, सदियों से चली आ रही परंपरा में समय-समय पर बदलाव होते गए हैं। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल सरकार ने अब सेवानिवृत्त कुमारियों को लगभग 110 डॉलर (भारतीय रुपए में 9765.80) की छोटी मासिक पेंशन भी प्रदान करनी शुरू कर दी है, जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से थोड़ा अधिक है।

पूर्व ‘जीवित देवी’ कौन हैं?

मंगलवार (30 सितंबर 2025) को ही पूर्व कुमारी जीवित देवी के रूप से सेवानिवृत्त हुई हैं। इस दौरान भव्य यात्रा निकालकर उन्हें वापस घर ले जाया गया। पूर्व कुमारी का नाम तृष्णा शाक्य है, जो साल 2017 में जीवित देवी चुनी गई थीं। अब 11 साल की आयु में तृष्णा शाक्य ने आम मनुष्य के जीवन में लौट गई हैं।

हिमाचल का तीन महादेवियों का मंदिर, जिसका मुख्य द्वार हमेशा के लिए हो गया बंद: जानें क्यों 400 वर्ष पुराने टारना माता धाम में सामने से नहीं होते हैं दर्शन

शारदीय नवरात्रि के समापन में हम आपको हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर (जिसे ‘छोटी काशी’ भी कहते हैं) के एक अनोखे मंदिर के बारे में बता रहे हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहाँ माता रानी के दर्शन सामने से नहीं होते हैं, बल्कि साइड से किए जाते हैं। मंदिर का सामने वाला दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। भक्तों को केवल बगल के दरवाजे से ही दर्शन करने की अनुमति है।

मंदिर निर्माण और दर्शन का तरीका

इस मंदिर का नाम टारना माता मंदिर है, जिसे 16वीं शताब्दी में राजा श्याम सेन ने बनवाया था। मान्यता है कि राजा को एक दिन टारना की पहाड़ी पर तीन कन्याएँ दिखाई दी थीं, लेकिन पास जाने पर वहाँ कोई नहीं मिला। इसके बाद राजा को स्वप्न में माता रानी ने दर्शन दिए और मंदिर बनाने का आदेश दिया।

उस जगह पर जब खुदाई की गई तो वहाँ तीन पिंडी स्वरूपा मूर्तियाँ प्राप्त हुईं, ये मूर्तियाँ थी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की। शुरुआत में मंदिर का दरवाजा पिंडियों के ठीक सामने था। लेकिन, जब लोग सामने से दर्शन करते थे, तो कई श्रद्धालु माता के तेज (शक्ति) के कारण बेहोश हो जाते थे।

इसके बाद माता रानी ने राजा को फिर से स्वप्न में दर्शन देकर अपने तेज के बारे में बताया और कहा कि अब सामने का दरवाजा बंद कर बगल से नया दरवाजा बनवाया जाए। तभी से आज तक माता के दर्शन केवल बगल के दरवाजे से ही होते हैं।

बगल से होते है दर्शन

मंदिर के पुजारी हर्ष शर्मा ने बताया कि तभी से उत्तर दिशा वाले दरवाजे से दर्शन किए जाते हैं और पश्चिमी दिशा वाले दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। खास बात यह है कि माता के शेर की प्रतिमा आज भी बंद दरवाजे के सामने ही है।

‘श्यामाकाली’ नाम की कहानी

कुछ लोगों का मानना है कि राजा श्याम सेन ने सुकेत राज्य के खिलाफ युद्ध पर जाने से पहले इस मंदिर में पूजा की थी। राजा ने अपने अंगूठे से रक्त निकालकर जीत की प्रतिज्ञा ली थी। इसके बाद मंडी और सुकेत राज्यों के बीच बल्हघाटी के लोहारा मैदान में युद्ध हुआ। इस युद्ध में मंडी की सेना ने जीत हासिल की और सुकेत का राजा जीतसेन मैदान छोड़कर भागने लगा, लेकिन मंडी के सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

जब एक सैनिक उसे मारने लगा तो राजा श्याम सेन ने उसे रोक दिया और जीतसेन को छोड़ दिया। युद्ध जीतने के बाद, राजा श्याम सेन ने टारना की पहाड़ियों में माँ श्यामाकाली (टारना माता) का भव्य मंदिर बनवाने का आदेश दिया।

यही वजह है कि टारना माता को श्यामाकाली नाम से भी पूजा जाता है। माता को टारना माता या तारना माता इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि वे अपने भक्तों को हर संकट से तार देती हैं (बचाती हैं)।

मंदिर की प्रसिद्धि

टारना माता मंदिर अपनी अनोखी मान्यता और रहस्यमयी परंपरा के कारण मंडी के सभी मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। नवरात्रि और शिवरात्रि महोत्सव में यहाँ बहुत भीड़ लगती है। शिवरात्रि के दौरान मंडी के प्रमुख देवता कमरूनाग भी इसी मंदिर में विराजमान होते हैं। इस मंदिर की प्रसिद्धि के कारण राज्यपाल, मुख्यमंत्री और सभी बड़े VIP लोग भी यहाँ माता रानी के दर्शन करने जरूर आते हैं।

‘80% हिंदुओं के पिछड़ेपन के लिए रामायण-मनुस्मृति जिम्मेदार’: क्या MP की BJP की सरकार ने दाखिल किया है हिंदू विरोधी हलफनामा, जानिए पूरा मामला

सोशल मीडिया पर कुछ स्क्रीनशॉट्स वायरल हुए, जिनमें दावा किया गया कि मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार हिंदू-विरोधी है। वायरल स्क्रीनशॉट्स सुप्रीम कोर्ट में चल रहे OBC आरक्षण के हलफनामा के बताए गए, जिनमें कुछ ऐसे विवादित बयान थे जो हिंदू सभ्यता को निशाना बनाने वाले विवादित दावों से जुड़े थे।

इन स्क्रीनशॉ्टस के सोशल मीडिया पर वायरल होने के कुछ घंटों बाद ही 1 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने ‘हिंदू-विरोधी’ आरोपों पर फैक्ट-चेक जारी कर दिया।

ट्विटर पर वायरल कुछ स्क्रीनशॉट्स में और भी अजीब बातें लिखी दिखीं। एक जगह दावा किया गया था कि रामायण में ‘ऋषि शंबूक’ की हत्या जाति उत्पीड़न का उदाहरण है। लेकिन सच्चाई ये है कि श्रीराम ने शंबूक को उसकी जाति की वजह से नहीं मारा था बल्कि उसके इरादे माता पार्वती के प्रति गलत थे, इसलिए उसे दंड दिया गया।

एक और दावे में कहा गया कि मनुस्मृति में शूद्रों की जानवरों से तुलना करके उन्हें अपमानित किया है। इसमें ये भी लिखा था कि अंग्रेजों के सुधार और पेरियार की ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की वजह से जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ। यहाँ तक कि इस दस्तावेज में ये दावा भी किया गया कि हिंदू समाज को जानबूझकर सदियों तक बँटा हुआ रखा गया ताकि ऊँची जातियों का वर्चस्व बना रहे।

मनुस्मृति को लेकर अक्सर हिंदुओं पर आरोप लगाए जाते हैं लेकिन जो लोग मनुस्मृति की सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने खुद हिंदू कोड बिल बनाते समय मनुस्मृति का हवाला दिया था और उससे मदद ली थी।

आलोचना का दूसरा बड़ा हिस्सा पेरियार को लेकर है। कहा जाता है कि जाति व्यवस्था में भेदभाव कम हुआ करने का श्रेय ई.वी. रामास्वामी यानी पेरियार को जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि पेरियार खुले तौर पर हिंदू-विरोधी विचारों वाले व्यक्ति थे। इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक उनसे नाराज रहते थे।

नेहरू ने 5 नवंबर 1957 को मद्रास के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कामराज को लिखे एक पत्र में साफ लिखा था, “मैं ई.वी. रामास्वामी नायकर द्वारा लगातार चलाए जा रहे एंटी-ब्राह्मण अभियान से बेहद दुखी हूँ। मैंने पहले भी आपको इस बारे में लिखा था और मुझे बताया गया था कि इस मामले पर विचार किया जा रहा है।”

नेहरू ने अपने पत्र में और भी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था। उन्होंने लिखा, “मुझे लगता है कि रामास्वामी नायकर बार-बार वही बातें दोहरा रहे हैं और लोगों को उकसा रहे हैं कि वे मौका आने पर छुरा भोंकें और हत्या करें। ऐसी बातें केवल कोई अपराधी या पागल व्यक्ति ही कह सकता है।”

प्रधानमंत्री नेहरू ने मद्रास के मुख्यमंत्री से कहा, “मैं उन्हें ठीक से नहीं जानता कि तय कर सकूँ वे असल में क्या हैं, लेकिन एक बात साफ है कि इस तरह की बातें देश पर बहुत ही बुरा असर डाल रही हैं। तमाम असामाजिक और आपराधिक तत्व यह मानने लगते हैं कि वे भी इसी तरह की हरकतें कर सकते हैं।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का मानना ​​था कि पेरियार जैसे ब्राह्मण-विरोधी ‘कार्यकर्ताओं’ को पागलखाने में रखा जाना चाहिए जहाँ उनके ‘विकृत दिमागों’ का इलाज किया जा सके।

इस पूरे मुद्दे ने सोशल मीडिया पर गुस्सा भड़का दिया। खासकर हिंदू संगठनों और उनसे जुड़े लोगों ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने अदालत के हलफनामे में कथित तौर पर ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ का समर्थन करके अपनी वैचारिक जड़ों से गद्दारी की है। कई घंटों तक ‘एंटी-हिंदू’ कहकर सरकार के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड होते रहे, जिसे विपक्षी दलों ने और हवा दी।

हलफनामा नहीं, कॉन्ग्रेस-कालीन आयोग की रिपोर्ट

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने जारी किए स्पष्टीकरण में साफ किया कि ये टिप्पणियाँ उनके हलफनामें का हिस्सा नहीं है। सरकार ने बताया कि विवादित कन्टेन्ट रामजी महाजन की अध्यक्षता वाले मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की अंतिम रिपोर्ट से लिया गया है, जिसका गठन 17 नवंबर 1980 को कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था। आयोग ने 22 दिसंबर 1983 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

महाजन रिपोर्ट और कई अन्य आयोगों की रिपोर्टें लंबे समय से सरकारी रिकॉर्ड्स का हिस्सा रही हैं। चूँकि OBC आरक्षण का मामला दशकों से न्यायिक जाँच के दायरे में है, इसलिए ये दस्तावेज पहले ही हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके थे और इसी कारण वे खुद ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल केस फाइल का हिस्सा बन गए।

राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि ऐसी रिपोर्टों को न्यायिक फाइल में शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि वर्तमान सरकार उनके निष्कर्षों का समर्थन करती है। बल्कि यह एक पूरी प्रक्रियात्मक जरूरत है क्योंकि आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सभी प्रासंगिक पुरानी रिपोर्टें नियमित रूप से अदालत के समक्ष रखी जाती हैं।

सरकार ने बताया कि महाजन रिपोर्ट के साथ-साथ सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की 1994 से 2011 तक की वार्षिक रिपोर्टें और राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग की 2022 की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की थीं। यह स्पष्टीकरण इसीलिए दिया गया ताकि यह साफ हो सके कि जो पन्ने वायरल हुए हैं, वे बीजेपी सरकार द्वारा तैयार किए गए हलफनामे का हिस्सा नहीं है बल्कि कॉन्ग्रेस शासनकाल की एक रिपोर्ट है जो न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा रही है।

आरक्षण के आँकड़ों की तुलना

बीजेपी सरकार ने इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि महाजन आयोग ने OBC के लिए 35% आरक्षण की सिफारिश की थी। जबकि वर्तमान राज्य सरकार 27% आरक्षण की माँग पर कायम है। सरकार ने कहा कि यही बात साबित करती है कि बीजेपी महाजन रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं मानती। इसके बजाए राज्य ने अपने नीति-निर्णयों को संवैधानिक मानकों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर तय किया है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो महाजन आयोग के सुझावों को कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया। बीजेपी का तर्क था कि अगर वह 1983 की रिपोर्ट से सहमत होती तो 35% OBC कोटा लागू करती। लेकिन उसके बजाए उसने कम संख्या पर ही समझौता कर लिया।

राज्य सरकार ने बताया दुर्भावनापूर्ण अभियान

सरकार के बयान में इन वायरल स्क्रीनशॉट्स को ‘झूठा, मनगढ़ंत, भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण इरादे से प्रेरित’ बताया गया। बयान में कहा गया कि शैक्षणिक या आयोग रिपोर्टों के चुनिंदा अंशों को अलग-थलग पेश करना राज्य के खिलाफ ‘दुष्प्रचार अभियान’ का हिस्सा है।

बयान में यह भी जोर देकर कहा गया कि मध्य प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक समरसता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और वह कभी भी ऐसे किसी नैरेटिव का समर्थन नहीं करेगी जो हिंदू परंपराओं या ग्रंथों को बदनाम करने का प्रयास करे। सरकार ने चेतावनी भी दी कि यह जाँच की जाएगी कि भ्रामक स्क्रीनशॉट्स कैसे प्रसारित हुए और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सोशल मीडिया पर आक्रोश

इस विवाद ने राजनीतिक क्षेत्र में काफी नुकसान पहुँचाया है। बीजेपी के आलोचकों ने पार्टी पर लापरवाही का आरोप लगाया। यह कहते हुए कि ऐसी रिपोर्टों को सिस्टम में बने रहने देना गंभीर चूक है। कुछ लोगों ने इससे भी आगे बढ़कर कहा कि इन दस्तावेजों का आधिकारिक रिकॉर्ड्स में मौजूद होना इस बात का संकेत है कि कॉन्ग्रेस शासनकाल का प्रोपेगेंडा सरकारी तंत्र में गहराई तक समा चुका है।

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार को तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। एक एक्स यूजर ने लिखा, “बीजेपी सक्रिय रूप से सामान्य वर्ग के खिलाफ विभाजन और नफरत फैला रही है।”

एक अन्य यूजर ने कहा, “यह सिर्फ विश्वासघात नहीं है। यहा बीजेपी का उन लोगों पर थूकना है जो हर अच्छे-बुरे समय में उसके साथ खड़े रहे। और विडंबना? तथाकथित ‘हिंदुत्व पार्टी’ अब पेरियारवादियों और अंग्रेजों की तरह वोट बैंक के लिए गंदा काम कर रही है।”

लंबे समय तक चलने वाले सवाल

हालाँकि, पर भ्रामक कन्टेन्ट पर मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने स्पष्टीकरण जारी कर दिया है लेकिन यह अब भी चिंता का विषय है कि सरकार बदलने के बावजूद वामपंथी प्रोपेगेंडा से प्रेरित दस्तावेज सिस्टम और रिकॉर्ड्स का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई की अगली तारीख 08 अक्टूबर 2025 तय की गई है। अब यह देखना बाकी है कि क्या यह विवाद कोर्ट की बहस का हिस्सा बनेगा।

फिलहाल मध्य प्रदेश सरकार ने जोर देकर कहा है कि उनके हलफनामें में किसी भी प्रकार का हिंदू-विरोधी बयान नहीं दिया गया है और जो लोग मनगढ़ंत सामग्री फैला रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सरकार का कहना है, “प्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ और सामाजिक सद्भाव के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। दोहराया जाता है कि जो वायरल कंटेंट है, वह न तो सरकार के हलफनामे का हिस्सा है और न ही किसी अधिकृत या आधिकारिक नीति या निर्णय से जुड़ी है।”

अपने घर में ही घिरे डोनाल्ड ट्रंप, सीनेट में बजट बिल पास ना होने से अमेरिका में लागू हुआ ‘शटडाउन’: नॉन-एसेंशियल सेवाएँ बंद, जानें कैसे ‘ठप’ हो जाएगा US

पूरी दुनिया का ठेका लेकर नोबेल की आस लगाए बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ही देश में एक बिल भी पास ना करा सके। जिसके बाद अमेरिका में एक बार फिर से सरकारी ‘शटडाउन’ लग गया है। मंगलवार (30 सितंबर 2025) को सीनेट में सरकार को खर्चे के लिए फंड देने वाला बजट बिल पास नहीं हो पाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को सीनेट में अस्थायी फंडिंग बिल पास कराने के लिए कम से कम 60 वोटों की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में सिर्फ 55 वोट मिले। अब अमेरिकी सरकार का कामकाज ठप हो गया है और बुधवार (1 अक्टूबर 2025) से ‘नॉन-एसेंशियल’ यानी कम जरूरी सेवाएँ बंद कर दी गई हैं। इसका असर एयर ट्रैवल से लेकर आर्थिक रिपोर्ट्स, पर्यावरण सुरक्षा, छोटे व्यापारों के लोन और वैज्ञानिक रिसर्च तक पड़ेगा।

जानिए क्या है ‘शटडाउन’?

दरअसल, अमेरिका में हर साल सरकार को चलाने के लिए बजट पास करना होता है। अगर संसद समय पर खर्च के बिल को मंजूरी नहीं देती, तो सरकारी दफ्तरों को फंडिंग नहीं मिलती। ऐसे में सरकार ‘शटडाउन’ मोड में चली जाती है। यानी जिन सेवाओं को जरूरी नहीं माना जाता, उन्हें रोक दिया जाता है।

लाखों सरकारी कर्मचारी बिना वेतन के घर भेज दिए जाते हैं, जिसे ‘फरलो’ कहा जाता है और जो कर्मचारी जैसे सैनिक, बॉर्डर गार्ड्स या पुलिस जैसे जरूरी काम में हैं, वो ड्यूटी पर रहते हैं लेकिन सैलरी बाद में मिलती है।

इस बार का झगड़ा सिर्फ बजट पर नहीं बल्कि हेल्थकेयर सब्सिडी को लेकर भी है। डेमोक्रेट्स पार्टी चाहती है कि बजट में ओबामाकेयर के तहत मिलने वाली सब्सिडी को स्थायी कर दिया जाए ताकि 24 मिलियन यानी 2.4 करोड़ लोगों का इलाज सस्ता बना रहे लेकिन रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि बजट और हेल्थकेयर को अलग-अलग देखा जाए। इसी टकराव में कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट को और भड़का दिया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि अगर सरकार बंद होती है, तो और कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जाएगा और वो ‘डेमोक्रेट’ होंगे।

पहले ही इस हफ्ते 1.5 लाख कर्मचारी स्वेच्छा से नौकरी छोड़ चुके हैं, जो पिछले 80 सालों में सबसे बड़ा सरकारी एक्सोडस है। इसके अलावा हजारों कर्मचारियों को पहले ही निकाला जा चुका है। ट्रंप सरकार ने कुछ एजेंसियों को आदेश दिए हैं कि वे डेमोक्रेट्स को शटडाउन का दोष दें, जो आमतौर पर सरकारी नियमों के खिलाफ होता है।

क्या होगा ‘शटडाउन’ का असर?

अब बात ये है कि असर कितना बड़ा होगा। एयरलाइंस ने कहा है कि इससे उड़ानों में देरी होगी। लेबर डिपार्टमेंट बेरोजगारी की रिपोर्ट जारी नहीं करेगा। स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन लोन नहीं देगा। एनवायरनमेंट एजेंसी प्रदूषण की सफाई पर काम रोक देगी।

वहीं, सोशल सिक्योरिटी और जस्टिस डिपार्टमेंट जैसे अहम विभागों ने भी शटडाउन प्लान तैयार कर लिया है। दो यूनियनों ने कोर्ट में याचिका दी है कि जब तक मामला साफ न हो, तब तक कर्मचारियों को निकाला न जाए, लेकिन कोर्ट ने ट्रंप को काम जारी रखने की छूट दी है।

सीनेट में रिपब्लिकन लीडर जॉन थ्यून ने कहा है कि बुधवार (1 अक्टूबर 2025) को एक और वोट होगा। लेकिन डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स में कोई समझौते के संकेत नहीं हैं। डेमोक्रेट नेता चक शूमर ने कहा कि हम अमेरिकियों की हेल्थ के लिए लड़ रहे हैं और इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर रिपब्लिकन्स का आरोप है कि डेमोक्रेट्स बजट को राजनीति के लिए रोक रहे हैं, ताकि 2026 के चुनावों से पहले अपने वोटर्स को खुश किया जा सके।

लंबा है शटडाउन का इतिहास

बता दें कि यह पहली बार नहीं हो रहा, अमेरिका में 1981 से अब तक 15 बार शटडाउन हो चुका है। ज्यादातर शटडाउन कुछ घंटों या एक-दो दिन में खत्म हो जाते हैं, लेकिन 2018-19 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में शटडाउन 35 दिन तक चला था, जो अब तक का सबसे लंबा था।

उस समय अमेरिका को करीब 3 बिलियन डॉलर यानी लगभग 25,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। इस बार दाव पर सिर्फ एक बजट बिल नहीं, बल्कि देश की 1.7 ट्रिलियन डॉलर की सरकारी मशीनरी है, जो पूरे अमेरिका के बजट का करीब एक-चौथाई हिस्सा है।

बाकी का बजट पेंशन, स्वास्थ्य योजनाएँ और कर्ज के ब्याज में जाता है। यानी अगर ये शटडाउन लंबा चला, तो असर सिर्फ कर्मचारियों तक नहीं, बल्कि पूरे अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

साफ है कि ये सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं, ये राजनीति और पब्लिक सर्विस के बीच खिंचती रस्साकशी है, जिसमें नुकसान जनता का हो रहा है। अब सबकी निगाहें बुधवार (1 अक्टूबर 2025) की वोटिंग और दोनों दलों की जिद पर टिकी हैं।

अमेरिका के इस शटडाउन का असर भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास पर भी पड़ना शुरू हो गया है। दूतावास ने 1 अक्टूबर से अपने X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट अपडेट करने बंद कर दिए हैं।