उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाला राज्य बन गया है। ₹37,000 करोड़ के रेवेन्यू सरप्लस के साथ इसने देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। ये तब हुआ है, जब यहाँ पेट्रोलियम पर सबसे कम टैक्स लिया जाता है। एक वक्त था जब उत्तर प्रदेश बीमारू राज्यों में गिना जाता था। लेकिन अब देश का सबसे ‘उत्तम प्रदेश’ बन गया है।
सबसे ज्यादा रेवेन्यू सरप्लस वाला राज्य बना उत्तर प्रदेश
नियंत्रक महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022-23 के दौरान देश के 16 राज्यों में रेवेन्यू सरप्लस थे, जिसमें उत्तर प्रदेश 37,263 करोड़ रुपए के साथ सबसे ऊपर था, उसके बाद गुजरात और ओडिशा का स्थान आता है।
CAG Report
UP is the top revenue surplus state!
Crazy fiscal management by the state.
UP also tops the list of states with highest capital expenditure while having the lowest taxes on petroleum. pic.twitter.com/rfbqfaXvKi
15वें वित्त आयोग ने राज्यों के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व निर्धारित किए थे। इसमें राज्यों को 2022-23 के दौरान राजस्व घाटा खत्म करने और राजस्व सरप्लस पर जोर दिया गया था उत्तर प्रदेश ने योगी सरकार के दौरान राजस्व संग्रह सिस्टम और प्रबंधन के क्षेत्र में काफी सुधार किए हैं। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है।
सीएजी के मुताबिक, “31 मार्च 2023 तक, कुल 28 राज्यों में से 16 राज्य राजस्व अधिशेष में थे और 12 राजस्व घाटे में थे।”
जिन 16 राज्यों की राजस्व अधिशेष उनके राजस्व व्यय से ज्यादा थे, उनमें उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात का नंबर आता है, जहाँ 19,865 करोड़ रुपए के राजस्व अधिशेष रहा। इसके बाद ओडिशा (19,456 करोड़ रुपये), झारखंड (13,564 करोड़ रुपये), कर्नाटक (13,496 करोड़ रुपये), छत्तीसगढ़ (8,592 करोड़ रुपये), तेलंगाना (5,944 करोड़ रुपये), उत्तराखंड (5,310 करोड़ रुपये), मध्य प्रदेश (4,091 करोड़ रुपये) और गोवा (2,399 करोड़ रुपये) का स्थान है। पूर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, सिक्किम और मणिपुर भी राजस्व अधिशेष वाले राज्य है।
घाटे वाले 12 राज्यों का संयुक्त राजस्व घाटा 2,22,648 करोड़ रुपए था। 2022-23 में राज्यों के राजस्व घाटे को पाटने के लिए वित्त आयोग ने 86,201 करोड़ रुपए का अनुदान दिया, जो कुल राजस्व घाटे का 39 % था। सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 राज्य ऐसे थे जिनका राजस्व व्यय उन्हें मिलने वाले राजस्व से अधिक था।
राजस्व घाटे वाले राज्य आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, मेघालय, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल थे। बिहार, केरल, मेघालय और महाराष्ट्र में राजस्व की प्राप्ति राजस्व व्यय का 90-100 फीसदी रहा। यानी राजस्व घाटा 0-10 फीसदी तक रहा।
12 राज्यों को अभी भी हो रहा घाटा
असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में राजस्व प्राप्तियाँ राजस्व व्यय का 80-90 प्रतिशत थीं। यानी राजस्व घाटा 10-20 फीसदी रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश और पंजाब ऐसे राज्य रहे, जहाँ राजस्व की प्राप्ति राजस्व व्यय का 75-80 प्रतिशत थीं। राजस्व घाटा 20-25 फीसदी था
रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 में राजस्व घाटा अनुदान राज्यों को दिए गए कुल वित्त आयोग अनुदान का 50 प्रतिशत था।
अनुदान पाने वाले राज्यों में बंगाल अव्वल
राजस्व घाटा अनुदान का सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल को मिला। उसे कुल अनुदान का 15.76 फीसदी दिया गया, ताकि वह अपने राजस्व घाटे को पाट सके। दूसरे नंबर पर केरल है, जिसे कुल अनुदान का 15.28 प्रतिशत मिला। इसके बाद आंध्र प्रदेश (12.24 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (10.88 प्रतिशत), पंजाब (9.60 प्रतिशत), उत्तराखंड (8.28 प्रतिशत), असम (5.67 प्रतिशत), राजस्थान (5.64 प्रतिशत), नागालैंड (5.26 प्रतिशत) और त्रिपुरा (5.13 प्रतिशत) का स्थान आता है।
बंगाल- केरल समेत 10 राज्यों को वित्त आयोग राजस्व घाटा अनुदान का लगभग 94 प्रतिशत दिया गया।
हरियाणा के टैक्स सिस्टम में जबरदस्त सुधार
सीएजी की रिपोर्ट में कुछ ऐसे राज्य भी चर्चा की गई है जिसने अपने टैक्स सिस्टम को मजबूत किया है। इससे उनकी अर्थव्यवस्था पहले से मजबूत हुई है। इसमें पहले नंबर पर हरियाणा है, जो कुल आय का 80 फीसदी हिस्सा खुद कमाता है। दूसरे नंबर पर तेलंगाना है और फिर महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और गोवा का नंबर आता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ दिन पहले ही H1-B वीजा की फीस ₹88 लाख कर दी थी। इसके बाद, न्यूयॉर्क में सोमवार (22 सितंबर 2025) को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच एक अहम मुलाकात हुई। मुलाकात में मार्को रूबियों ने ‘अमेरिका के लिए भारत को काफी अहम’ बताया है।
मुलाकात के दौरान विभिन्न मुद्दों पर चर्चा
मार्को रूबियो ने कहा कि भारत अमेरिका के लिए ‘बेहद महत्वपूर्ण’ देश है। मार्को रूबियो ने भारत की व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स और महत्वपूर्ण खनिजों में भागीदारी की सराहना की। मार्को रूबियों ने यह भी कहा कि दोनों देशों को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुले वातावरण को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, विशेष रूप से क्वाड के माध्यम से।
Met with Indian External Affairs Minister @DrSJaishankar at UNGA. We discussed key areas of our bilateral relationship, including trade, energy, pharmaceuticals, and critical minerals and more to generate prosperity for India and the United States. pic.twitter.com/5dZJAd85Za
रूबियो और जयशंकर पहले भी मिल चुके हैं। जुलाई 2025 में वे ‘क्वाड’ (QUAD) की बैठक में मिले थे। क्वाड में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि क्वाड के माध्यम से स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देना जरूरी है।
एस जयशंकर ने भी इस मुलाकात को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि कई द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की गई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्राथमिक मुद्दों पर प्रगति के लिए निरंतर सहयोग की आवश्यकता है।
Our conversation covered a range of bilateral and international issues of current concern. Agreed on the importance of sustained engagement to progress on priority areas.
बता दें, कि भारत H-1B वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला देश है। पिछले साल, अमेरिका ने जितने भी H-1B वीजा दिए, उनमें से 71% भारतीयों को मिले थे। डोनाल्ड ट्रंप के वीजा फीस बढ़ोतरी के बाद नए शुल्क से भारतीय आईटी कंपनियों की लागत में तेजी से बढ़ोतरी होगी। इससे छोटे-छोटे बिजनेस और स्टार्टअप को भी मुश्किलें आ सकती हैं। भारत सरकार और तकनीकी कंपनियाँ इस फैसले पर अपनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह भारतीय पेशेवरों के अमेरिका जाने के रास्ते को कठिन बना सकता है।
भारत और अमेरिका के रिश्ते पहले से अधिक जटिल हो चुके हैं, लेकिन इन व्यापारिक और वीजा विवादों के बावजूद दोनों देश सहयोग को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। दोनों पक्षों ने यह संदेश दिया है कि चाहे चुनौतियाँ बढ़ें, वे संवाद और सहयोग को जारी रखेंगे।
हर साल 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को इस बात के लिए जागरूक करना है कि धरती के सबसे प्राचीन और प्रतीकात्मक जीवों में से एक गैंडे का संरक्षण कितना जरूरी है।
यह दिवस इस बात पर भी जोर देता है कि गैंडे की आबादी को बचाए रखना पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक धरोहर और जंगलों के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह पूरी दुनिया से गैंडे की रक्षा की मुहिम में हाथ मिलाने की अपील है।
विश्व गैंडा दिवस की शुरुआत 2010 में हुई, जब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-साउथ अफ्रीका (WWF-South Africa) ने इसे एक एक्शन डे के रूप में घोषित किया। इसके अगले ही साल 2011 में इसे वैश्विक पहचान मिली। इसका श्रेय वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं लिसा जेन कैंपबेल और रिश्जा को जाता है, जिन्होंने इसे पूरी दुनिया तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।
A memorable visit to Kaziranga. I invite people from all over the world to come here. pic.twitter.com/N1yW4XKRyx
ब्लैक, व्हाइट, ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (भारतीय), जावन और सुमात्रन ये गैंडे की आखिरी बची हुई पाँच प्रजातियाँ हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि ये सभी विलुप्ति के कगार पर हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, सींगों के लिए शिकार (Poaching), गैरकानूनी वन्यजीव व्यापार और वनों की कटाई व मानव बस्तियों के फैलाव से आवास का नष्ट होना।
विश्व में गैंडों की पांच प्रजातियां (फोटो साभार : बेबी राइनो रेस्क्यू)
विश्व गैंडा दिवस मनाकर दुनिया इन खतरों पर रोशनी डालती है और ठोस कदम उठाने की अपील करती है, चाहे वह शिकार पर रोक अभियान हों, आवास संरक्षण हो या फिर कड़े कानूनों का सख्ती से पालन।
इन्हीं अंतरराष्ट्रीय कहानियों के बीच भारत की धरती पर एक अलग ही अध्याय लिखा गया है। वो अध्याय है काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का, जहाँ गैंडों ने वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय वापसी (Turnaround) की मिसाल पेश की है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान: 12 गैंडों से बढ़कर 3,000 से अधिक
20वीं सदी की शुरुआत में असम के काजीरंगा की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। 1908 में यहाँ ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (एक सींग वाले) गैंडों की संख्या घटकर सिर्फ 12 रह गई थी। सदियों से चले आ रहे मनोरंजन के लिए शिकार, अवैध शिकार (Poaching) और आवास के विनाश ने इस प्रजाति को विलुप्ति की कगार पर पहुँचा दिया था।
(फोटो साभार – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)
खतरा इतना गंभीर था कि 1986 में भारतीय गैंडों को संकटग्रस्त (Endangered) घोषित कर दिया गया। उनका विशिष्ट एकल सींग, जिसे काले बाजार में स्टेटस सिंबल माना जाता था और उनका प्रागैतिहासिक रूप हमेशा उन्हें खतरे में डालता रहा।
रिपोर्टों के अनुसार, औपनिवेशिक काल में खासकर 1800 के आकीर समय में और 1900 के शुरुआती दशकों में असम में ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने मनोरंजन के लिए 200 से अधिक गैंडों का शिकार किया।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की सफलता की कहानी पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि असम में गैंडों की संख्या 600 से बढ़कर 4,000 से अधिक हो चुकी है।
उन्होंने कहा “#WorldRhinoDay पर हम गैंडे के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। ऑप फाल्कन (Op Falcon), आवास विस्तार और उन्नत मॉनिटरिंग जैसी पहलों के जरिए असम ने गैंडे की आबादी 600 से बढ़ाकर 4,000 से अधिक की है और हम इस दिशा में और आगे बढ़ने के लिए संकल्पित हैं।”
On #WorldRhinoDay, we re-affirm our commitment to the conservation of Rhino.
Through initiatives such as Op Falcon, habitat expansion, and advanced monitoring, Assam has successfully increased rhino population from 600 to over 4,000 and is committed to do more in this direction. pic.twitter.com/WJqXmX4Wa7
यह परिवर्तन विश्व के सबसे बड़े वन्यजीव संरक्षण सफलताओं में से एक माना जाता है। काजीरंगा में गैंडे अब विलुप्ति के कगार पर नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह फल-फूल रहे हैं। असम आज इस प्रजाति के लिए वैश्विक मजबूत केंद्र (Global Stronghold) बन चुका है।
वैश्विक स्तर पर गैंडे के शिकार (poaching) के खिलाफ एक भावनात्मक और प्रभावशाली संदेश देने के लिए असम सरकार ने 2022 में ‘दहा संस्कार’ यानी मृत गैंडों का पूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया।
यह संदेश देने के लिए कि गैंडे असम में परिवार के समान हैं, सरकार ने दशकों से जब्त किए गए 2479 गैंडे के सींगों का दाह संस्कार भी किया, जो शिकार मामलों की कानूनी कार्रवाई के दौरान संग्रहित थे। इस संस्कार का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि गैंडे के सींगों का कोई औषधीय मूल्य नहीं है, बल्कि ये असम के बच्चों के अवशेष हैं, जिनका जीवन शिकारियों के कारण समय से पहले समाप्त हो गया।
On the occasion of World Rhino Day, Assam Govt burned 2,479 horns of greater one-horned rhinoceros in Golaghat today to "send a strong message to poachers that the horn is of no medicinal value" pic.twitter.com/KEYl4LksoD
असम में गैंडों की आबादी में गिरावट का मुख्य कारण मनोरंजन के लिए शिकार (Sport Hunting) था। राजघरानों और ब्रिटिश अधिकारियों ने गैंडों का निरंतर शिकार किया और उन्हें अपने ट्रॉफी के रूप में रखा। 1908 तक काजीरंगा में केवल कुछ ही गैंडे बचे थे।
साथ ही सींगों के लिए शिकार (Rhino Horn Poaching) भी एक लगातार बनी रहने वाली समस्या रही है। 20वीं सदी की शुरुआत में भी शिकारियों ने गैंडों को मारने के विभिन्न तरीके ढूँढ निकाले, ताकि उनके सींगों को काले बाजार में बेचा जा सके, यह झूठा माहौल बनाते हुए कि उनके औषधीय या सजावटी मूल्य हैं।
ग्राफ – PIB
1980 से 1993 के बीच भारत में अकेले 692 गैंडे शिकारियों का शिकार बने। हालाँकि हाल के वर्षों में कड़े कानून लागू होने के बावजूद शिकार की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। 2008 से 2019 के बीच भारत में 102 गैंडे शिकार किए गए, जिनमें अधिकांश असम में थे।
आवास का नाश (Habitat Loss) भी एक बड़ी समस्या थी। जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ी, गैंडों द्वारा उपयोग किए जाने वाले घास के मैदान कम होने लगे। गैंडों को भोजन की तलाश में गाँवों में आना पड़ता, जिससे ग्रामीणों के साथ संघर्ष होता और कई गैंडों की मौत हो गई।
जनसंख्या घनत्व (Population Density) भी समस्या बन गया। जैसे ही काजीरंगा और पोबितोरा वाइल्डलाइफ सेंचुरी जैसी छोटी जगहों में गैंडों की संख्या बढ़ी, संसाधनों की कमी और प्रजनन अनुपात पर असर पड़ा। यही कारण था कि बाद में संरक्षण कार्यकर्ताओं ने गैंडों को अन्य उद्यानों में स्थानांतरित किया, ताकि उन्हें अधिक विशाल और सुरक्षित आवास मिल सके।
भारत ने विश्व स्तर पर कैसे एक उदाहरण स्थापित किया
अब भारत को गैंडों के संरक्षण की दुनिया की सबसे सफल कहानी के रूप में वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, लेकिन यह सफलता एक दिन में हासिल नहीं हुई। इसके पीछे कानूनों का निर्माण, उनका सख्ती से पालन, लोगों की सक्रिय भागीदारी और वैश्विक सहयोग जैसी मुख्य कोशिशें रही हैं, जिन्होंने गैंडों के संरक्षण में मूलभूत बदलाव लाए हैं।
India is a world leader when it comes to rhino conservation! I’ve seen it with my own eyes. And it’s no surprise when your PM tweets celebrating World Rhino Day. If only he could influence the SA president to do the same. ??
असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन एक्ट 1891 और बंगाल राइनोप्रेसर्वेशन एक्ट 1932 गैंडों के संरक्षण के लिए पहली कानूनी पहल थीं। ये प्रारंभिक नियम गैंडों के औपचारिक संरक्षण की शुरुआत थे। इन कानूनों ने विभिन्न वन संबंधी अपराधों को परिभाषित किया, जैसे वन में अवैध प्रवेश, आग लगाना या वनस्पति का विनाश और इनके लिए सजा का प्रावधान किया गया। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि इन कानूनों ने गैंडों को मारने, घायल करने या पकड़ने पर रोक लगा दी, सिवाय आत्मरक्षा या विशेष अनुमति के मामलों को छोड़कर।
गैंडे को बचाने के लिए सरकार के प्रयास (फोटो -पीआईबी)
वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट 1972 सबसे प्रभावशाली कानून साबित हुआ, जिसने शिकार (Poaching) के खिलाफ एक मजबूत कानूनी ढाँचा दिया। असम में 2009 में इस कानून में संशोधन किया गया, जिससे यह और भी सख्त हो गया और बार-बार अपराध करने वालों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया। इन कानूनों ने स्पष्ट संदेश दिया कि गैंडे के शिकार को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
लेकिन केवल कानून ही पर्याप्त नहीं थे। असम सरकार को स्थानीय समुदायों के साथ भी मिलकर काम करना पड़ा, जो गैंडों के आवास के पास रहते हैं। सालों से जागरूकता अभियान और पर्यटन से मिलने वाले लाभों ने स्थानीय समर्थन बनाने में मदद की। लोग अब गैंडों को संकट या खतरे के रूप में नहीं, बल्कि गौरव और आजीविका का प्रतीक मानने लगे।
भारतीय राइनो विजन 2020: एक महत्वपूर्ण मोड़
यह पहल 2005 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य एक सींग वाले गैंडों के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना था। इस परियोजना को असम सरकार, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल, इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन (IRF), वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) और यूएस फिश & वाइल्डलाइफ सर्विस ने मिलकर चलाया।
इस योजना का लक्ष्य था कि भारत में गैंडों की आबादी को दोगुना करके 2020 तक 3,000 पहुँचाया जाए और उन्हें असम के सात अभयारण्यों (Sanctuaries) में भेजा जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गैंडों की संख्या किसी एक उद्यान में अत्यधिक न हो, बल्कि उन्हें मानस नेशनल पार्क, लाओखोवा-बुराचापोरी-कोचमोरी और डिब्रू-सैखोवा जैसे अन्य संरक्षित उद्यानों में फैलाया जाए, ताकि वे सुरक्षित वातावरण में प्रजनन कर सकें।
2008 से 2012 के बीच, काजीरंगा और पोबितोरा से 18 गैंडों को मानस नेशनल पार्क में स्थानांतरित किया गया और बाद में 8 और गैंडों को वहाँ ले जाया गया। यह प्रयास सफल रहा क्योंकि इसके बाद मानस में नए बच्चों का जन्म हुआ। यह केवल स्थानांतरण अभियान नहीं था। इसमें गश्त के रास्ते, प्रहरी चौकियाँ और मॉनिटरिंग सिस्टम भी बनाए गए, ताकि शिकार पर नियंत्रण रखा जा सके।
राष्ट्रीय गैंडा संरक्षण रणनीति और आईआरवी 2.0
भारत ने IRV 2020 की सफलता के बाद नेशनल राइनो कंसर्वेशन स्ट्रैटेजी शुरू किया, जो भारत के संकटग्रस्त ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति है। इसके प्रमुख कार्यक्रमों में भारत के सभी गैंडों के लिए डीएनए प्रोफाइल विकसित करना शामिल है, ताकि उन्हें प्रभावी ढंग से सुरक्षा और निगरानी प्रदान की जा सके।
Indian Rhino Vision 2020 जैसी संरक्षण अभियानों की सफलता के बाद यह नीति भविष्य-केंद्रित ढांचा पेश करती है, जो लंबे समय तक इस प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में मदद करेगी। यह भारत की गैंडों के संरक्षण के लिए पहली स्वतंत्र और समग्र नीति है। यह अभूतपूर्व पहल भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक बड़ा कदम है, जो देश की सबसे प्रतीकात्मक प्रजातियों में से एक को संरक्षित करने के लिए एक केंद्रित और एकीकृत रणनीति पेश करती है।
अब यह अभियान दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसे Indian Rhino Vision 2.0 कहा जाता है। इसका लक्ष्य है कि 2030 तक असम में कम से कम तीन मेटा-आबादी में 4,500–5,000 ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों की संख्या सुरक्षित और बनाए रखी जाए।
— Chief Minister Assam (@CMOfficeAssam) March 9, 2024
IRV 2.0 में आवास सुधार (Habitat Enhancement), गैंडे के विस्तार क्षेत्र (Rhino Range Extension), समुदाय की भागीदारी, अपराध निगरानी और सक्रिय संरक्षण कार्रवाई पर विशेष ध्यान दिया गया है।
काजीरंगा: संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल
आज काजीरंगा की प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में है। यह वास्तव में वैश्विक गैंडे संरक्षण परियोजना की रीढ़ है, जहाँ विश्व के लगभग 70% ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों का आवास है। केवल 2022 की जनगणना में ही 2,613 गैंडों की संख्या दर्ज की गई।
यह उद्यान यह भी दिखाता है कि लगातार प्रयास और दृढ़ता से संरक्षण से क्या हासिल किया जा सकता है। 1908 में केवल 12 गैंडों के साथ शुरू होकर, काजीरंगा ने अब 3,000+ गैंडों की संख्या पार कर ली है, और यह विश्व स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की सबसे सफल पुनरुद्धार कहानियों में से एक बन चुका है।
असम में गैंडों की जनसंख्या में वृद्धि 1966-2022 (वास्तविक जनगणना रिकॉर्ड के आधार पर) (ग्राफ़ पीआईबी द्वारा)
गैंडों की आबादी बढ़ाने के लिए इतनी सारी पहलों के बावजूद, वे शिकार के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। पिछले दस सालों में लगभग 10,000 गैंडों का शिकार उनके सींगों की माँग को पूरा करने के लिए किया गया, जिन्हें परंपरागत औषधि और स्टेटस सिंबल के रूप में, विशेषकर चीन और वियतनाम में, उच्च मूल्य दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एंड क्राइम कार्यालय (UNODC) के अनुसार, गैंडे से बने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी किए जाने वाले अवैध वन्यजीव सामान का 29% हिस्सा हैं।
इसी कारण विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) का महत्व है। यह याद दिलाता है कि संरक्षण कभी पूर्ण नहीं होता। गैंडे केवल जीव-जंतु नहीं हैं, बल्कि भारत की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित करना प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना है।
भारत में एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण की कहानी 1900 के दशक की शुरुआत में विलुप्ति के कगार पर पहुँचने से लेकर आज 4,000 से अधिक समृद्ध आबादी तक पहुँचने तक एक चमत्कार से कम नहीं है। इस कहानी के केंद्र में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान है, जो अब दुनिया का सबसे मजबूत गैंडों का किला बन चुका है। काजीरंगा विश्व प्रसिद्ध वन्यजीव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के पर्यटकों को आकर्षित करता है और गैंडे संरक्षण के प्रति जागरूकता और समर्थन को और बढ़ावा देता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
वह मुस्लिम है। पर मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकती। क्योंकि वह मुस्लिम होने के साथ-साथ औरत भी है। कुछेक मस्जिदों में उसे नमाज पढ़ने का हक मिला भी है तो शर्तों के साथ। मसलन, पर्दे में रहना, सुगंध न लगाना, अलग कमरा… वगैरह वगैरह। लेकिन एक गैर हिंदू (मुस्लिम महिला) आपके मंदिर में प्रवेश कर नवरात्र के आपके आगमिक अनुष्ठानों का प्रारंभ कर सकती है। क्योंकि कॉन्ग्रेस और इस देश की अदालतें ऐसा चाहती हैं। क्योंकि इस देश का हिंदू सुषुप्त है।
सोमवार (22 सितंबर 2025) को कलश स्थापना के साथ हिंदुओं की आस्था के महत्वपूर्ण पर्व नवरात्रि का प्रारंभ हुआ। लेकिन इसी दिन कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एक ऐसा वीडियो आया है जो हिंदुओं की आस्था पर सीधा प्रहार है। बानू मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।
ವಿಶ್ವ ವಿಖ್ಯಾತ ಮೈಸೂರು ದಸರಾ 2025ಕ್ಕೆ ಚಾಮುಂಡೇಶ್ವರಿ ದೇವಿಯ ಅಗ್ರ ಪೂಜೆಯ ಮೂಲಕ ಚಾಲನೆ ನೀಡಿದ ಬಾನು ಮುಷ್ತಾಖ್ ಅವರು.
ऐसा नहीं है कि लेखिका बानू मुश्ताक की हिंदुत्व में आस्था है। उनकी देवी पूजा में आस्था है। जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस घटना को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा भी है, “कन्नड़ भाषा को देवी के रूप में पूजने पर स्वयं के मुस्लिम होने के नाते मजहबी ऐतराज जताने वाली लेखिका मुश्ताक बानो को कर्नाटक सरकार ने मैसूर दशहरा समारोह का अतिथि बना कर आमंत्रित किया है।”
बानू मुश्ताक इतने अव्वल दर्जे की सेकुलर हैं कि इस्लाम में औरतों की स्थिति पर वह केवल चुप्पी ही नहीं ओढ़ती हैं, बल्कि वह प्रयास करती हैं कि औरतों के साथ भेदभाव का ठीकरा भी सनातन की कथित परंपराओं पर फोड़ा जा सके। ऐसे में सीधा सवाल यह है कि जिसकी सनातन में कोई आस्था नहीं है, उसे माँ चामुंडेश्वरी के अनुष्ठान में शामिल क्यों किया गया? वैदिक मंत्रोच्चार के बीच माँ की पवित्र मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने की अनुमति कैसे दी गई?
चामुंडी पहाड़ियों पर स्थित इस मंदिर में विराजमान माँ चामुंडेश्वरी, मैसूर राजघराने की अधिष्ठात्री देवी हैं। भले कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार मैसूर के दशहरा महोत्सव को ‘राजकीय यानी सरकारी’ कार्यक्रम बताए। भले हिंदुओं की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट भी इसे ‘सरकारी कार्यक्रम’ कह दे। पर सच्चाई यह है कि यह सदियों से चला आ रहा एक आगमिक अनुष्ठान है।
हमारे मंदिर, हमारे अनुष्ठान, हमारी परम्पराएँ किसी व्यक्ति या सरकार की बपौती नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम बताकर हमारी आस्थाओं से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। इनकी व्याख्या कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से नहीं कर सकता। बावजूद एक विधर्मी महिला ने हमारे मंदिर में प्रवेश किया, हमारे अनुष्ठान की पवित्रता और गरिमा को भंग किया।
क्या इसकी दोषी केवल कॉन्ग्रेस है? यकीनन नहीं। अतीत में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं जब हिंदुओं की आस्थाओं पर प्रहार कर कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण किया है। फिर क्या इसकी दोषी कर्नाटक की वह जनता नहीं, जिसने कॉन्ग्रेस को अपनी आस्था पर प्रहार का यह मौका प्रदान किया है?
क्या हम इस मामले में अदालतों के भरोसे रहे सकते हैं? यकीनन नहीं। बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने के कर्नाटक सरकार के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। उसने याचिका खारिज कर दी। फिर हिंदू सुप्रीम कोर्ट गए। परिणाम नहीं बदला। वैसे भी जिस देश का मुख्य न्यायाधीश एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी करे कि ‘अपने भगवान से कहो कि वे भी अपने लिए कुछ करें’, उस देश की न्यायपालिका से उम्मीद करना अपने कर्तव्यों से भागने जैसा है।
इस क्षण के लिए दोषी माँ चामुंडेश्वरी मंदिर के वे पुजारी भी हैं, जिन्होंने बानू मुश्ताक के हाथों में पूजा की थाली थमाई। पवित्र मूर्ति पर चढ़ाने के लिए उन्हें पुष्प भेंट किया। उन्हें आरती दी। दोषी मैसूर के वे हिंदू भी हैं जिन्होंने इस क्षण को आने से रोकने के लिए विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। इस क्षण के लिए हर एक हिंदू दोषी है। इस पाप का पाश्ताचाप उन्हें ही करना होगा। कॉन्ग्रेस या न्यायापालिका को कोस कर हम अपने कर्तव्यों से भाग नहीं सकते।
हिंदू त्योहार दीवाली के मौके पर एक्सिस बैंक (Axis Bank) ने अपना नया विज्ञापन कैंपेन ‘दिल से ओपन सेलिब्रेशन 2025’ लॉन्च किया है। हैरानी की बात यह है कि इस विज्ञापन में दीवाली की रोशनी और नवरात्रि की धूम के बीच अचानक सांता क्लॉज टपक पड़ते हैं।
Dil Se Open Celebrations is here! Get up to 20% off* on credit cards & EMIs from Navratri all the way till Christmas! And guess what? The news has already got someone special to come early!
जाहिर है, यह वही सांता है जो आमतौर पर क्रिसमस का प्रतीक है। इन्हीं सांता को हिंदू त्योहारों के बीच लाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि त्यौहार सबका है और उत्सव धर्म की सीमाओं से परे होना चाहिए। यानि वही हिंद त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का भाषण।
इस विज्ञापन की वीडियो में दिखाया गया कि नवरात्रि के अवसर पर ‘गरबा डांस’ चल रहा होता है तभी अचानक सांता क्लॉज की एंट्री हो जाती है। इस विज्ञापन से एक्सिस बैंक ने अपने ऑफर्स प्रोमोट करने की कोशिश की है, जो नवरात्रि से लेकर दीवाली और फिर क्रिसमस तक चलेंगे।
सोशल मीडिया पर एक्सिस बैंक के ‘ईसाई करण’ का विरोध
एक्सिस बैंक के इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया में बवाल मचा हुआ है। एक्सिस बैंक पर ईसाई करण को लेकर विरोध हो रहा है। नेटिजन्स एक्सिस बैंक से विज्ञापन हटाने की माँग कर रहे हैं। ट्विटर/एक्स पर बैंक को बॉयकाट करने का हैशटैग ट्रेंड भी चल रहा है।
एक्सिस बैंक के विज्ञापन पर एक्स यूजर The Jaipur Dialogues ने लिखा, “एक्सिस बैंक सांता क्लॉज के साथ नवरात्रि मना रहा है। यह हिंदू त्योहार को नीचा दिखाने की चरम सीमा है। एक्सिस बैंक इस विज्ञान को तुरंत वापस ले वरना बहिष्कार का सामना करे। एक्सिस बैंक को सबक सिखाना जरूरी है।”
Axis Bank is Celebrating Navratri with Santa Claus
Heights of demeaning a Hindu Festival@AxisBank – Retract this Ad immediately or face Boycott Calls!
एक्स पर Treeni ने लिखा, “नवरात्रि का ईसाई करण? एक्सिस बैंक नवरात्रि के दौरान सांता क्लॉज को उपहार बाँटते हुए दिखाकर हिंदू धर्म का मजाक उड़ा रहा है और आने वाले सभी हिंदू त्योहारों में भी ऐसा ही करने की योजना बना रहा है!”
The Christianization of Navratri?@AxisBank is mocking Hinduism by depicting Santa Claus distributing gifts during Navratri and plans to continue this throughout all upcoming Hindu festivals!pic.twitter.com/je5a6dXOpN
एक्स यूजर अभय प्रताप सिंह ने लिखा, “Axis Bank ने किया नवरात्रि का ईसाई करण आख़िर हिंदू त्योहारों के साथ ही ऐसा खिलवाड़ क्यों होता है? क्या ईद के एड में सेंटा क्लॉज केपी दिखा सकते हैं? क्या क्रिसमस के एड में इस्लामिक प्रतीकों को दिखा सकते हैं? फिर नवरात्रि के एड में सेंटा क्लॉज क्यों?”
Axis Bank ने किया नवरात्रि का ईसाईकरण
आख़िर हिंदू त्योहारों के साथ ही ऐसा खिलवाड़ क्यों होता है ?
– क्या ईद के एड में सेंटा क्लॉज केपी दिखा सकते हैं ? – क्या क्रिसमस के एड में इस्लामिक प्रतीकों को दिखा सकते हैं ?
अदवाएता नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “मैं अपनी बीमा योजना की जाँच करवाती हूँ, तुम्हारी बेवकूफी के चलते अपना खाता बंद करवाऊँगी। पागल आदमी.. इस bugger का हमारे नवरात्रि से क्या संबंध है??”
रितु प्रिया नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “ये क्या मजाक है?? थोड़ा दिन में रहना सीखो, हमारे पर्व त्यौहार पर अपनी रोटी सेंकने की कोशिश न करें।”
वैशाली मिश्रा नाम की एक्स यूजर ने सवाल किया, “ईद हो या कोई अन्य मुस्लिम पर्व आप ऐसा ऐड बना सकते हैं।”
सौरव सिंह नाम के एक्स यूजर ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को टैग करते हुए एक्सिस बैंक पर कार्रवाई की माँग की। यूजर ने लिखा, “@RBI @PMOIndia कृपया कार्रवाई करें। हिंदुओं की भावनाएँ भी मायने रखती हैं।”
एक्स यूजर पारीतोष व्यास ने लिखा, “इस विज्ञापन में आप क्या बकवास दिखा रहे हैं? यह विचार किस विज्ञापन एजेंसी के दिमाग में आया है? एक्सिस बैंक हिंदुओं को क्या बताना चाह रहा है? भारतीय त्योहारों को बेचने का एक बहुत ही घटिया तरीका। कृपया इस विज्ञापन को कूड़ेदान में फेंक दो। बेवकूफ लोग।”
एक यूजर ने लिखा, “गरबा हिंदू धर्म की परंपरा है जो देवी पूजन से संबंधित है कोई साधारण नाच नहीं है फिर इसमें सांता क्लॉज का क्या काम? क्या एक्सिस बैंक ऐसा मजाक अन्य धर्मों के साथ कर सकता है?”
हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ
एक्सिस बैंक ने हिंदू त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का वही पुराना पाठ पढ़ाने की कोशिश की है, जो पहले भी कई ब्रांड्स और कंपनियाँ दे चुकी है। यानि हिंदू त्योहार को निशाना बनाकर नीचा दिखाने का यह पहला मामला नहीं है। साल 2020 में ज्वैलरी ब्रांड ‘तनिष्क’ ने दीवाली पर लव जिहाद को प्रमोट करते विज्ञापन बनाया था।
इस विज्ञापन में एक हिंदू बहू को उसकी मुस्लिम सास के साथ मिलकर गोद भराई का जश्न मनाते हुए दिखाया गया था। यह वही सेकुलर प्रोपेगेंडा है, जिसके बाद हिंदू लड़कियाँ फ्रिज और सूटकेस में मिलती हैं।
ऐसे कई ब्रांड्स और कंपनियाँ हौ जो सेकुलर विज्ञापन के नाम पर हिंदुओं का अपमान करते हैं। इसमें सभी धर्मों को एक बताते हुए हिंदुओं को कट्टर और असहिष्णु दिखाया जाता है। वहीं मुस्लिम को ‘पीड़ित’ और शांतिप्रिय दिखाते हैं और यह सब केवल हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर किया जाता है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि रमजान या ईद के विज्ञापन आते हैं तो उनमें किसी और धर्म का प्रतीक या त्योहार नहीं घुसाया जाता। क्रिसमस के विज्ञापन में कभी दीवाली की झलक नहीं मिलती। लेकिन दीवाली और नवरात्रि जैसे हिंदू त्योहारों पर अक्सर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ सेक्युलरिज्म का झंडा लेकर आ धमकती हैं।
एक्सिस बैंक का यह विज्ञापन भी उसी सोच का हिस्सा लगता है, जहाँ हिंदू त्योहारों को किसी न किसी बहाने ‘सभी के’ त्योहार में बदलने की कोशिश की जाती है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति है, जिसमें कंपनियाँ जानबूझकर हिंदू पर्वों पर ही ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ पढ़ाती हैं।
ईटानगर में सोमवार (22 सितम्बर 2025) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय व्यापारियों, करदाताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस मौके पर उन्होंने हाल ही में लागू किए गए ‘अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों’ को जनता के लिए दोहरा लाभ बताते हुए कहा कि अब व्यापार आसान होगा, लागत घटेगी और आम लोगों के बजट में भी राहत मिलेगी।
ईटानगर में आयोजित GST बचत उत्सव को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 56वीं GST परिषद बैठक के बाद चार स्तरीय कर ढाँचे को सरल करते हुए अब इसे दो प्रमुख स्लैब 5% और 18% में बदल दिया गया है।
विलासिता और सेहत के लिए नुकसान दायक वस्तुओं पर 40% कर का अलग स्लैब रहेगा। पीएम मोदी ने कहा, “आज से अगली पीढ़ी के GST सुधार लागू हो गए हैं और देशभर में GST बचत उत्सव शुरू हो गया है। त्योहारों के मौसम में लोगों को दोहरा लाभ मिला है।”
Prosperity, growth and empowerment!
This interaction from Arunachal Pradesh is a strong reflection of why India is so optimistic about the GST Bachat Utsav.
People are backing the reform and the range of opportunities is rising across sectors… pic.twitter.com/3SFr3eSxz3
स्थानीय व्यापारियों ने प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा कि पहले उन्हें कई तरह के करों से जूझना पड़ता था, लेकिन एक राष्ट्र, एक कर ने व्यापार को सरल बनाया है। उनका मानना है कि निर्माण लागत घटने से आवास किफायती होंगे और स्थानीय कच्चा माल सस्ता होने से उत्पाद प्रतिस्पर्धी बनेंगे। होटल उद्योग ने उम्मीद जताई कि GST कटौती से घरेलू पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जबकि कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्र को भी इसका सीधा लाभ होगा।
From markets to households, GST Bachat Utsav brings a festive buzz, ensuring lower costs and brighter smiles in every home! pic.twitter.com/hW9ebIw3Ri
पीएम मोदी ने व्यापारियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि वह हमेशा स्थानीय उत्पादों के ब्रांड एंबेसडर रहे हैं। उन्होंने लोगों से स्वदेशी खरीदें और स्वदेशी बेचें का आह्वान किया और जोर देकर कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है।
कार्यक्रम में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी प्रधानमंत्री का आभार जताया और कहा कि इन सुधारों से राज्य के व्यापारियों और जनता को बड़ा लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक, पीएम मोदी ने ईटानगर में 5100 करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाओं की आधारशिला भी रखी।
इसके बाद वह त्रिपुरा स्थित माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में पूजा-अर्चना और विकास कार्यों के उद्घाटन के लिए रवाना हुए। प्रधानमंत्री ने अखबारों में GST दरों में कटौती को लेकर हुई सकारात्मक कवरेज का जिक्र करते हुए कहा कि यह सुधार हर घर में खुशियाँ और रसोई के बजट में राहत लेकर आएगा। उन्होंने कहा, बाजारों से लेकर घरों तक, GST बचत उत्सव त्योहारी रौनक लेकर आया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 सितंबर को गुजरात का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने अहमदाबाद जिले के लोथल में बन रहे नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) का जायजा लिया। पीएम मोदी ने निर्माण कार्य की प्रगति की समीक्षा की और परियोजना से जुड़ी बैठक भी की।
लोथल में एनएमएचसी परियोजना क्या है?
Lothal in Gujarat, a 4000 year old Indus site is the world's oldest known dock. The National Maritime Heritage Complex (NMHC) here will showcase India's rich maritime history from the Indus Valley Civilisation to date. pic.twitter.com/65pLFexAKz
गुजरात के लोथल में बन रहा नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) मोदी सरकार की एक पहल है। इसका उद्देश्य सिंधु-सरस्वती सभ्यता यानी इंडस वैली सिविलाइज़ेशन की समुद्री और इंजीनियरिंग उपलब्धियों को सम्मान देना है।
करीब 2400 ईसा पूर्व लोथल इस सभ्यता का एक अहम बंदरगाह शहर था। गुजरात सरकार द्वारा आवंटित 400 एकड़ जमीन पर 4,500 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हो रहा यह प्रोजेक्ट लोथल की ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने, पर्यटन को बढ़ावा देने और आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा का केंद्र बनाने की दिशा में काम करेगा।
World's Largest Maritime Museum, Lothal
?Area : 400 acres ?Cost : 4,500 cr
?To showcase India’s 5,000-year-old maritime History ?12 states to set up their galleries ?The 77-meter-tall lighthouse being constructed here will be visible even from Ahmedabad
अक्टूबर 2024 में केंद्र सरकार ने सागरमाला कार्यक्रम के तहत नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) को मंज़ूरी दी थी। इसका मकसद प्राचीन समुद्री इंजीनियरिंग की इस अनोखी धरोहर को दुनिया के सामने लाना है। यह परियोजना विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के साथ-साथ भारत के प्राचीन समुद्री व्यापार को नई पहचान देने पर भी जोर देती है।
यह कॉम्प्लेक्स दो चरणों में विकसित किया जा रहा है और इसमें नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज म्यूज़ियम शामिल है, जिसमें भारत के समुद्री इतिहास को इंडस वैली सिविलाइज़ेशन से आधुनिक समय तक दिखाने वाली 14 गैलरी होंगी।
फेज 1A का काम 60% से अधिक पूरा हो चुका है और यह साल के अंत तक खुलने के लिए तैयार है। इसमें छह गैलरी शामिल हैं, जिनमें इंडियन नेवी और कोस्ट गार्ड की प्रदर्शनी भी है, जिसमें INS निशंक मिसाइल बोट, सी हैरियर विमान और UH-3 हेलिकॉप्टर जैसे ऐतिहासिक वस्त्र और मॉडल दिखाए जाएँगे। इसके अलावा इसमें लोथल का पुनर्निर्मित टाउनशिप और जेट्टी वॉकवे भी मौजूद हैं।
गुजरात के लोथल में निर्माणाधीन एनएमएचसी, देश गुजरात के माध्यम से छवि
फेज 1B में आठ और गैलरी जोड़ी जाएँगी, साथ ही 77 मीटर ऊँचा लाइटहाउस म्यूजियम बनेगा, जो दुनिया का सबसे ऊँचा म्यूज़ियम होने की योजना में है। इसमें 5D डोम थिएटर और बागीचा कॉम्प्लेक्स भी शामिल होगा, जिसमें 1500 वाहनों के लिए पार्किंग, फ़ूड कॉर्ट और मेडिकल सुविधाएँ होंगी।
फेज 2, जिसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से आठीक साहियोग किया जाएगा, जिसमें तटीय राज्यों के पवेलियन, ईको-रिज़ॉर्ट्स, लोथल शहर का पूरी तरह से पुनर्निर्मित मॉडल, एक मैरीटाइम इंस्टिट्यूट और चार थीम पार्क शामिल होंगे। ये थीम पार्क समुद्री इतिहास, जलवायु परिवर्तन, स्मारक और एडवेंचर पर केंद्रित होंगे।
4500 years of maritime brilliance, soon coming alive at Lothal.
The National Maritime Heritage Museum will take you on a journey through India’s rich oceanic legacy, with live exhibits and rare artifacts.
इस परियोजना को बंदरगाह, शिपिंग और वाटरवे मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय का समर्थन प्राप्त है। इसके लिए फंडिंग मुख्य बंदरगाहों, रक्षा मंत्रालय, नेशनल कल्चर फंड और 3,000 करोड़ रुपए के निजी निवेश से की जा रही है। वहीं, लाइटहाउस म्यूज़ियम का वित्तपोषण डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ लाइटहाउस और लाइटशिप्स (DGLL) करेगा।
India’s leadership in maritime is rooted in a legacy older than 4 millennia! Lothal Dockyard is where Harappan merchants perfected tidal-lock basins.
India Maritime Week 2025 celebrates this timeless legacy, reinstating India as a maritime powerhouse, now and forever.… pic.twitter.com/THjjtwpg7y
आर्थिक दृष्टि से, नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) रोज़ाना 25,000 पर्यटकों को आकर्षित करने की उम्मीद है। इससे सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 22,000 नौकरियाँ पैदा होंगी और क्षेत्र की स्थानीय उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। इसका उद्देश्य लोथल को भारत के प्रमुख हेरिटेज पर्यटन स्थलों के बराबर एक बड़ा पर्यटन केंद्र बनाना है।
लोथल का महत्व: यह भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास का प्रमाण कैसे है
लोथल सिंधु-सरस्वती सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है। यह दिखाता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता कैसे सिंधु नदी से फैलकर सरस्वती के किनारे फली-फूली और उत्तर-पश्चिम भारत तक विकसित हुई। इस सभ्यता ने व्यापार, शिल्पकला, नगर योजना और संस्कृति में अपनी विरासत की निरंतरता को बनाए रखा।
लोथल, गुजरात के भाल क्षेत्र में खंभात की खाड़ी के पास स्थित है और यहाँ दुनिया का सबसे पुराना मानव निर्मित डॉकयार्ड है। इसमें 214 मीटर लंबा और 36 मीटर चौड़ा ट्रैपेज़ॉइडल बेसिन है, जिसकी लंबवत ईंट की दीवारें हैं और यह साबरमती नदी से इनलेट और आउटलेट चैनलों के जरिए जुड़ा हुआ है।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग जल प्रबंधन और योजना बनाने में अत्यंत कुशल थे। लोथल का डॉकयार्ड क्षेत्र में उच्च ज्वार-भाटा को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था और इसमें सिल्ट जमाव को रोकने के लिए स्पिल चैनल भी बनाया गया था।
लोथल में प्रारंभिक उत्खनन 1955 से 1962 के बीच किए गए थे। इस उत्खनन परियोजना का नेतृत्व एस आर राव ने किया था, जिन्हें अपने जीवन में 30 हड़प्पा स्थलों की खोज करने का श्रेय दिया जाता है। राव ने लोथल के महत्व को बताते हुए इसे पेन म्यूज़ीअम एक्स्पिडिशन मैगजीन (Penn Museum’s Expedition Magazine) में लिखा था।
“हड़प्पावासियों द्वारा निर्मित पकी हुई ईंटों की अब तक की सबसे बड़ी संरचना लोथल में रखी गई थी, जिसका उपयोग जहाजों को खड़ा करने और माल को संभालने के लिए बर्थ के रूप में किया जाता था… मूल रूप से, गोदी को 18 मीटर से 20 मीटर लंबे और 4 से 6 मीटर चौड़े जहाजों को जलद्वार में डालने के लिए डिज़ाइन किया गया था… कम से कम दो जहाज एक साथ प्रवेश द्वार से गुजर सकते थे…”
कुछ पश्चिमी विशेषज्ञ इस बात से संतुष्ट नहीं थे कि लोथल एक डॉकयार्ड हो सकता है। हालाँकि, IIT गाँधी नगर के हालिया अध्ययन ने सैटेलाइट इमेजरी की मदद से दिखाया कि डॉकयार्ड और बंदरगाह की थ्योरी अधिक सही है। सैटेलाइट इमेजरी ने साबरमती की पुरानी नहरों को उजागर किया, जो लोथल के ठीक पास बहती थीं, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने बताया। समय के साथ नदी का मार्ग बदल गया और यह स्थल से दूर चली गई, जिससे लोथल का डॉकयार्ड असामान्य स्थिति में रह गया। जब पुरानी नहरें बहती थीं, तब नावें आसानी से लोथल से धोलाविरा तक जा सकती थीं, जो रण ऑफ कच्छ में एक अन्य महत्वपूर्ण IVC स्थल है।
IIT गाँधी नगर के अध्ययन, प्रोफेसर वी एन प्रभाकर, प्रोफेसर विक्रांत जैन और एकता गुप्ता द्वारा किया गया, राव की लिखी बातों की पुष्टि करता है। साबरमती की पुरानी नहरों का प्रवाह लोथल को भूगोलिक दृष्टि से सुविधाजनक स्थान प्रदान करता था, जो सक्रिय व्यापार नेटवर्क के केंद्र में था। यह नेटवर्क अरब सागर के भारतीय बंदरगाहों, खासकर खंभात की खाड़ी, से शुरू होकर प्राचीन मेसोपोटामिया तक फैला हुआ था।
आईआईटी गाँधी नगर के अध्ययन में साबरमती के पुराने चैनलों के उपग्रह साक्ष्य मिले
इस थ्योरी को लोथल और आसपास के क्षेत्र से मिले प्राचीन मुहरों (seals) की संख्या भी समर्थन देती है। रिपोर्ट के अनुसार, यह संख्या सौराष्ट्र के किसी भी अन्य स्थल से अधिक है। इन मुहरों का इस्तेमाल माल ढोने के पैकेज, व्यापार दस्तावेज और पत्रों पर चिह्न लगाने के लिए किया जाता था।
लोथल में कई चरणों में आबादी और पुनर्स्थापनाएँ हुईं। इस क्षेत्र का धीरे-धीरे पतन मुख्य रूप से साबरमती नदी के विनाशकारी बाढ़ और नदी के मार्ग बदलने के कारण हुआ, जिससे डॉकयार्ड सूख गया।
राव ने लिखा कि लगभग 2000 ईसा पूर्व की एक बड़ी बाढ़ के बाद यह फलता-फूलता शहर तबाह हो गया और बचे रह गए केवल कुछ लोग और असंगठित गाँव। फिर 1900 ईसा पूर्व एक और बड़ी बाढ़ ने इस स्थल को स्थायी रूप से नष्ट कर दिया।
नेशनल मैरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स (NMHC) इंडस वैली सभ्यता की समुद्री और इंजीनियरिंग क्षमताओं की विरासत को संरक्षित करेगा, साथ ही आर्थिक विकास और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देगा।
उन लोगों के लिए, जो अपनी समुद्री विरासत से दूर हो गए हैं, NMHC हमारी शिपबिल्डिंग और समुद्री व्यापार की समृद्ध परंपरा तक पहुँच का माध्यम बनेगा। उन्नत तकनीक और सोच-समझकर डिजाइन के जरिए NMHC सुनिश्चित करेगा कि लोथल का ऐतिहासिक महत्व भविष्य की पीढ़ियों यानी सिंधु-सरस्वती सभ्यता के वंशजों तक सुलभ और जीवंत रहे।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
आपको और आपके परिवार को शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। मेरी प्रार्थना है, ये त्योहार आप सभी के जीवन में सुख और समृद्धि लेकर आए।
इस वर्ष त्योहारों में हमें एक और उपहार मिल रहा है। 22 सितंबर 2025 से Next Generation GST Reforms लागू होने के साथ ही पूरे देश में ‘GST बचत उत्सव की शुरुआत हो गई है। इन रिफॉर्म्स से किसान, महिला, युवा, गरीब, मध्यम वर्ग, व्यापारी, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, सभी को फायदा होगा।
नए GST रिफॉर्म्स की विशेषता है कि अब मुख्य रूप से सिर्फ दो ही स्लैब रहेंगे। रोजमर्रा की जरूरी चीजें जैसे स्वाना, दवाइयाँ, साबुन, टूथपेस्ट और कई अन्य सामान अब या तो टैक्स फ्री होंगे या 5% की सबसे कम स्लैब में आएँगे। घर बनाने, गाड़ी खरीदने, बाहर खाने या परिवार के साथ छुट्टियाँ मनाने जैसे सपनों को पूरा करना अब आसान होगा। हेल्थ इंश्योरेंस पर भी अब GST को शून्य कर दिया गया है।
मुझे ये देखकर अच्छा लगा कि कई दुकानदार और व्यापारी ‘पहले और अब’ के बोर्ड लगाकर, लोगों को बता रहे हैं कि कोई सामान कितना सस्ता हो गया है।
हमारी GST यात्रा 2017 में शुरू हुई थी। तब देश को अनेक तरह के टैक्स और टोल के जंजाल से मुक्ति मिली थी। इससे ग्राहकों और व्यापारियों, कारोबारियों को बहुत राहत मिली थी। अब ये नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म हमें और आगे ले जा रहे है। इसमें सिस्टम को और सरल बनाया गया है। इससे हमारे दुकानदार साथियों, लघु उद्योगों की सहूलियत और बढ़ेगी।
नागरिक देवो भव हमारा मंत्र है। पिछले 11 वर्षों में हमारे प्रयासों से 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। देश में एक नियो मिडिल क्लास तैयार हुआ है। अब इसे और सशक्त बनाया जा रहा है। हमने मध्यम वर्ग को भी मजबूत किया है। 12 लाख रुपए तक की आप पर कोई टैक्स नहीं लिया जा रहा है। अगर इनकम टैक्स में छूट और नए GST Reforms को मिलाकर देखें तो देशवासियों के सालाना लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए बचेंगे।
देश ने 2047 तक विकसित भारत का संकल्प लिया है और इसे सिद्ध करने के लिए आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलना जरूरी है। नए GST रिफॉर्म्स से आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी तेज गति मिलेगी।
आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक है कि हम स्वदेशी को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ। चाहे ब्रांड कोई भी हो, कंपनी कोई भी हो, अगर उसमें भारतीय श्रमिक और कारीगर की मेहनत लगी है, तो वो स्वदेशी है।
जब भी आप अपने देश के कारीगरों, श्रमिकों और इंडस्ट्री के बनाए सामान को खरीदते हैं तो आप कई परिवारों की रोजी-रोटी में मदद करते हैं और देश के युवाओं के लिए रोजगार पैदा करते हैं।
मैं अपने दुकानदारों और व्यापारियों से भी अपील करता हूँ कि वो स्वदेशी सामान ही बेचें।
आइए गर्व से कहें, ये स्वदेशी है।
आपके घर की बचत बढ़े, आपके सपने पूरे हों, आप अपने पसंद की चीजों के साथ त्योहारों की चमक बढ़ाएँ… मेरी यही कामना है। एक बार फिर, मैं आपको नवरात्रि के साथ ही ‘GST बचत उत्सव’ की शुभकामनाएँ देता हूँ। धन्यवाद ।
यूपी में जाति आधारित रैलियाँ, गाड़ियों पर जाति सूचक शब्द या एफआईआर में जातियों का अब उल्लेख नहीं होगा। योगी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का पालन करते हुए सार्वजनिक तौर पर जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। राज्य के मुख्य सचिव ने इसे सार्वजनिक जगहों और पुलिस रिकॉर्डस् में जाति के उल्लेख पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। राज्य में जाति भेदभाव को दूर करने की दिशा में इसे एक अहम कदम माना जा रहा है।
यूपी के मुख्य सचिव के निर्देश में जिन बातों पर जोर दिया गया है, उसमें जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह से रोक, सोशल मीडिया पर सख्ती अहम है। हालाँकि एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामलों में छूट दी गई है।
राज्य के मुख्य सचिव के निर्देश
FIR और पुलिस रिकॉर्ड में जाति का जिक्र नहीं- अब पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर, चार्जशीट या दूसरे दस्तावेजों में जाति का उल्लेख नहीं होगा। अब आरोपित के पिता-माता का नाम लिखा जाएगा। इससे उसकी पहचान होगी। पहले माता का नाम लिखना अनिवार्य नहीं था।
जाति आधारित रैलियों पर बैन- जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह रोक लगा दिया गया है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर जातीय घृणा फैलाने वाले कंटेंट या जाति विशेष के महिमामंडन वाले कंटेंट या वीडियो पर रोक लगा दी गई है। ऐसा करने पर आईटी नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
हालाँकि इस मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामलों में छूट दी जाएगी।
सार्वजनिक स्थानों पर जातिसूचक शब्दों पर बैन- गाड़ियों, साइन बोर्ड्स, थाने के नोटिस बोर्ड या दूसरे सार्वजनिक जगहों पर जाति आधारित संकेत, शब्द या प्रतीक हटा दिए जाएँगे। इसके लिए मोटर वाहन नियमों में भी बदलाव किया जाएगा।
एनसीआरबी और सीसीटीएनएस सिस्टम- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के क्राइम क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम सीसीटीएनएस में जाति भरने वाले कॉलम को छोड़ा जाएगा। एनसीआरबी को पत्र लिखकर इस कॉलम को डिलीट करने की अपील सरकार करेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रवीण छेत्री बनाम राज्य मामले में सुनवाई के दौरान ऐतिहासिक फैसला दिया था। जस्टिस विनोद दिवाकर ने 19 सितंबर 2025 को शराब तस्करी के मामले पर सुनवाई के दौरान जाति सूचक शब्द को हटाने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता प्रवीण छेत्री ने अपनी गिरफ्तारी के दौरान एफआईआर और जब्ती मेमो में अपनी भील जाति लिखे जाने पर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने जाति के महिमामंडन को ‘एंटी नेशनल’ और नैतिकता के खिलाफ कहा था।
अलीगढ़ से एक इमाम की पिटाई का मामला चर्चा में है। इमाम का नाम मुहम्मद मुस्तकीम है। पुलिस ने इस केस में जाँच के बाद स्पष्ट कहा है कि ये आपसी झड़प का मामला था। बावजूद इसके सोशल मीडिया पर वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी इसे मॉब लिंचिंग का केस बताकर फैला रहे हैं।
दावा किया जा रहा है कि ‘राम-राम’ न कहने के कारण इमाम पर हमला हुआ। दिलचस्प बात ये है कि घटना से जुड़ी लिखित शिकायत में मुस्तकीम ने धार्मिक नारे लगवाने वाली बात कहीं बताई ही नहीं है। सारा प्रोपेगेंडा बाद में बनाई गई एक वीडियो को वायरल करके फैलाया जा रहा है।
वायरल वीडियो में इमाम क्या बोला?
वायरल वीडियो में मुस्तकीम बताता है कि वह लखनपुरा की मस्जिद का इमाम है और बच्चों को उर्दू पढ़ाता है। शनिवार (20 सितंबर 2025) शाम को वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर लौट रहा था। उसे बुलाकगढ़ी के पास कुछ लोगों ने रोका। उसे राम-राम बोलने के लिए कहा गया। जब उसने किसी बात का जवाब नहीं दिया तो उसके साथ मार-पीट की गई। उसे पाकिस्तान जाने के लिए कहा गया। उसने यहाँ तक आरोप लगाया कि राह चलते लोगों से बुलवाया जाता है और बदतमीजी की जाती थी।
अलीगढ़ में एक स्थानीय मस्जिद के इमाम को कुछ सत्ता-पोषित गुंडों ने बंधक बनाकर एक घंटे से अधिक समय तक बेरहमी से पीटा और उन्हें 'राम-राम' कहने के लिए मजबूर किया।
डबल इंजन वाली भाजपा सरकार पूरे प्रदेश को नफरत की आग में झोंकना चाहती है।
इस्लामी कट्टरपंथी बता रहे मॉब लिंचिंग, कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा
अब उसकी इसी वीडियो को शेयर करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी अलग एंगल दे रहे हैं। इमाम से मारपीट को स्थानीय मुफ्ती मोहम्मद अकबर काजमी ने ‘मॉब लिंचिंग’ करार दिया। उसने कहा है कि इमाम से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगवाए गए और 10-12 लोगों ने मिलकर पीटा। पुलिस इस मामले में जल्द कार्रवाई करे।
तस्वीर साभार: दैनिक भास्कर
शाही जामा मस्जिद के इमाम महमूद रजा काजमी ने आरोप लगाया कि मुस्तकीम को 1 महीने से परेशान किया जा रहा था। लड़के उसे राम-राम कहकर परेशाम करते थे। जवाब न देने पर उसे गाली दी जाती थी-कठमुल्ला कहा जाता था। उसके साथ इन्हीं सबके कारण मारपीट हुई है। मामले में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अलीगढ़ ➡दबंगों ने मस्जिद इमाम से लगवाए धार्मिक नारे ➡नारे लगाने से इनकार करने पर पीटने का आरोप ➡घटना से समुदाय विशेष के लोगों में पनपा आक्रोश ➡बुलाकगढ़ी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाते हैं इमाम ➡पुलिस ने जांच कर कार्रवाई का दिया आश्वासन ➡थाना लोधा क्षेत्र के गांव बुलाकगढ़ी के… pic.twitter.com/FQFtHuxKSc
इसी तरह इस वीडियो के बूते कॉन्ग्रेसी अपना प्रोपगेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। दिखाया जा रहा है कि मस्जिद के इमाम को बंधक बनाकर इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने राम-राम नहीं बोला।
यूपी कॉन्ग्रेस का ट्वीट
मीडिया संस्थानों ने दी गलत जानकारी को हवा
यूपी कॉन्ग्रेस और इस्लामी कट्टरपंथियों के अलावा सोशल मीडिया व मीडिया संस्थानों ने भी बिना मामले में सच्चाई की पड़ताल किए इसी दावे को हवा दी है। द ऑब्जर्वर पोस्ट ने तो ये लिखा है कि इमाम की दाढ़ी-टोपी देखकर उस पर हमला हुआ।
ऑब्जर्वर पोस्ट का ट्वीट
एबीपी ने तो अपनी रिपोर्ट में ये भी बताया कि मुस्तकीम की दाढ़ी नोचकर उसे कटवा, गाय खाने वाला कहा गया। इसी तरह दैनिक भास्कर ने भी इसी बयान के आधार पर ये रिपोर्ट की।
एबीपी और दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
पुलिस ने सारे दावे किए खारिज
वहीं अगर केस की जाँच करने वाली अलीगढ़ पुलिस का पक्ष जानें तो पता चलता है कि ये सारे दावे फर्जी हैं। ऑपइंडिया से बातचीत में भी पुलिस ने बताया कि ये सामान्य मारपीट वाली घटना है।
पुलिस के अनुसार, घटना 20 अगस्त 2025 को थाना लोदा में ग्राम बुलाकगढ़ी के मुहम्मद मुस्तकीम को लेकर है। इमाम मुस्तकीम उस दिन अपनी साइकिल से उस दिन रास्ते से जा रहा था। रास्ते में कुछ बच्चे आ गए थे और उन बच्चों को हटाने के दौरान पास खड़े जीशांत से उसकी बहस हो गई और दोनों के बीच मारपीट होने से दोनों घायल हुए और दोनों को अस्पताल लेकर जाया गया।
थाना लोधा- सोशल मीडिया के माध्यम से एक प्रकरण संज्ञान में आया है, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा बताया जा रहा है कि उसे कुछ धार्मिक नारे लगाने को मजबूर किया गया था और उसके साथ मारपीट की गई थी, इस संबंध में अवगत कराना है कि कल दि0 20.09.2025 को थाना लोधा में ग्राम बुलाकगढ़ी अन्तर्गत… pic.twitter.com/w6C66VHg67
पुलिस ने बताया कि इस केस में दोनों पक्ष से शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस की जाँच में सामने आया है इसमें किसी भी तरह का कोई भी धार्मिक रंग व धार्मिक नारा लगाने के लिए मजबूर करने की बात सामने नही आई है, यह बात पूर्णतः गलत है अलीगढ़ पुलिस द्वारा इसका खंडन करती है।