Home Blog Page 194

‘भगवान से खुद कुछ करने को कहो’: यदि मूर्ति ठीक करने की गुहार का जवाब ये है तो फिर अदालतों की जरूरत ही क्या है… कभी सोचिएगा ‘माई लॉर्ड’ बीआर गवई

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर 2025) को खजुराहो, मध्य प्रदेश के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की सात फुट लंबी कटी हुई मूर्ति को बहाल करने की एक याचिका खारिज कर दी। ये मूर्ति यूनेस्को द्वारा संरक्षित खजुराहो के स्मारकों का हिस्सा है, जो सदियों पहले मुगल आक्रमणों के दौरान सिर कटवाकर अपवित्र और अपमानित छोड़ दी गई थी।

याचिकाकर्ता एक भक्त राकेश दालाल ने तर्क दिया कि मूर्ति को ठीक करना सिर्फ़ पुरातत्व की बात नहीं, बल्कि आस्था, सम्मान और हिंदुओं का बुनियादी अधिकार है कि वो अपनी पूर्ण देवताओं की पूजा कर सकें। सीनियर एडवोकेट संजय एम नुली के माध्यम से पेश हुए उन्होंने कोर्ट से कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दें कि मूर्ति की मरम्मत करें और मंदिर की पवित्रता को फिर से स्थापित करें।

याचिका में खजुराहो मंदिरों की विरासत का ज़िक्र किया गया, जो चंद्रवंशी राजाओं के समय बने थे। ब्रिटिश काल की उदासीनता के बाद आज़ादी के 70 साल से ज़्यादा बीतने के बावजूद लापरवाही ने मूर्ति को उपेक्षित छोड़ दिया है।

दालाल ने आगे कहा कि सरकार का लगातार बहाली का काम न करने से भक्तों के पूजा के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई विरोध प्रदर्शन, ज्ञापन और जन अभियान होने के बावजूद राज्य से कोई जवाब नहीं आया।

इस पर सीजेआई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच जो कुछ कहा, वो हैरान करने वाला था। क्योंकि उसमें कानूनी तर्क की जगह हिंदुओं को लेकर तंज था। सीजेआई ने याचिकाकर्ता से कहा, “ये पूरी तरह से पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन है। जा के खुद देवता से कहो कि अब कुछ करे। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो। तो जा के अब प्रार्थना करो।”

हिंदुओं के लिए ये टिप्पणी मुगल तलवारों से लगाए गए सदियों पुराने घाव से कहीं ज़्यादा गहरी चुभ गई। ये एक पुरानी ताना की गूँज थी, “अगर तुम्हारे देवता असली हैं, तो खुद को क्यों नहीं बचाया?” इस हिंदूफोबिक तंज का इस्तेमाल सदियों से इस्लामी शासकों और आधुनिक धर्मनिरपेक्ष एलीट्स करते हैं और उसका इस्तेमाल कर खुद सीजेआई ने उसका समर्थन कर दिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की असमानता

एक पल के लिए कल्पना कीजिए, अगर यही टिप्पणी मुसलमानों पर कही जाती। मान लीजिए वक्फ (संशोधन) एक्ट की सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने याचिकाकर्ताओं से कहा होता, “अगर ये कानून पसंद नहीं, तो जा के अल्लाह से मदद माँगो। दुआ करो, शायद वो तुम्हारी ज़मीनें बहाल कर दें।” इसके बाद तो पूरे देश में बवाल हो जाता। कानूनी भाईचारे वाले बयान जारी करते, टीवी एंकर चिल्लाते ‘न्यायिक इस्लामोफोबिया’, एनजीओ वाले संयुक्त राष्ट्र को चिट्ठियाँ भेजते और चीफ जस्टिस को कट्टरपंथी करार दे दिया जाता।

लेकिन जब यही तिरस्कार हिंदुओं के लिए रिज़र्व होता है, तो प्रतिक्रिया की जगह सिर्फ चुप्पी होती है। कोई वकील काउंसिल बयान नहीं देता। सड़कों पर कोई प्रदर्शन नहीं होता। कोर्ट में कोई याचिका नहीं दाखिल होती। दरअसल, भारत में धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ एक तरफ़ा चलती है। यहाँ हिंदुओं का मज़ाक उड़ाया जाता है। उनका अपमान किया जाता है और बेधड़क तंज कसे जाते हैं। वहीं, अल्पसंख्यकों के किसी गलफहमी की वजह से हुए अपमान को भी अस्तित्व का संकट बनाकर प्रचारित किया जाता है।

जब हम बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले पाखंड की बात कर रहे हैं, तो ये ज़िक्र करना ज़रूरी है कि सीजेआई गवई हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच का हिस्सा थे जिसने वक्फ संशोधन एक्ट, 2025 की कुछ धाराओं पर रोक लगा दी। खास उस प्रावधान पर, जिसमें विवाद सुलझने तक कब्ज़ा वाली सरकारी ज़मीन ‘वक्फ’ नहीं मानी जा सकती, जबकि यही असल में कब्ज़े और अतिक्रमण को बढ़ावा देता है।

सड़क का हिंसा Vs कोर्ट रूम

ये असमानता एक कड़वी हकीकत से उपजी है- अल्पसंख्यक अपनी संवेदनशीलताओं को सड़कों पर थोपते हैं, हिंदू न्याय के लिए अदालतों का रुख़ करते हैं।

जब मुसलमान अपमानित महसूस करते हैं, तो वो ‘सड़क वीटो’ का इस्तेमाल करते हैं। वो प्रदर्शन करते हैं, सड़कें जाम करते हैं और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हैं। मजहबी अपमान के शक में लोग हमले का शिकार होते या मारे जाते हैं, जैसे उदयपुर में कन्हैया लाल का भयानक कत्ल। कन्हैया लाल की गलती क्या थी? नूपुर शर्मा का समर्थन करना.. जिन्होंने भगवान शिव का सम्मान बचाने के लिए अपने साथ पैनल में बैठे शख्स को उसी की भाषा में जवाब दिया था। लेकिन तक सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा को न सिर्फ डाँट लगाई थी, बल्कि अकेले ‘देश को आग लगाने’ तक का दोष उनके माथे पर मढ़ दिया था।

जो सड़कों पर घूम-घूम कर कत्ल और तोड़फोड़ कर रहे थे, वो बिना नुकसान के बच निकले। राज्य और न्यायपालिका खूनखराबे के डर से सावधानी से चलते रहे और चुप्पी साधे रहे।

इसके उलट हिंदू कानूनी याचिकाओं के ज़रिए उपाय ढूँढते हैं। वो संवैधानिक अधिकारों का सहारा लेते हैं। संस्थाओं पर भरोसा करते हैं और उन्हें क्या मिलता है? तंज? उन्हें कहा जाता है कि ‘जा के प्रार्थना करो’। उनकी आस्था को छोटा बताया जाता है, भक्ति को कमतर आँका जाता है और याचिकाओं को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ करार दे दिया जाता है।

संदेश साफ़ और बेहद खतरनाक है- आक्रामकता को सम्मान मिलहै। कानून के रास्ते पर चलना मज़ाक का न्योता देता है। असल व्यवहार में देखें तो भारत की धर्मनिरपेक्षता हिंसा को ईनाम देती है, लेकिन संयम (हिंदू) धारण करने वालों को सजा।

अगर प्रार्थना ही जवाब है, तो अदालतों की क्या ज़रूरत?

चीफ जस्टिस की टिप्पणी ‘जा के अपने भगवान से प्रार्थना कर’ न सिर्फ़ अपमानजनक है बल्कि तर्क की दृष्टि से बेतुकी। अगर दिव्य हस्तक्षेप ही हल है, तो अदालतें क्यों? सुनवाई क्यों, फैसले क्यों, कानून की व्याख्या क्यों? हर मुकदमेबाज़ को बस प्रार्थना करने को कहा जा सकता, चाहे वो कंपनियाँ अनुबंध लड़ रही हों, नागरिक ज़मीन विवाद कर रहे हों या पीड़ित न्याय माँग रहे हों।

लेकिन ज़ाहिर है, ऐसा तंज सबके लिए नहीं बाँटा जाता। किसी कॉर्पोरेट वकील से कभी नहीं कहा गया कि वित्तीय झगड़ों के लिए ‘देवी लक्ष्मी से प्रार्थना करो’। किसी ईसाई से नहीं कहा गया कि राहत के लिए ‘येशु से प्रार्थना करो’। किसी मुसलमान से नहीं कहा गया कि वक्फ दावों की जगह ‘अल्लाह की रहमत माँगो’। सिर्फ़ हिंदुओं से कहा जाता कि उनकी आस्था उनके कानूनी हक को अमान्य कर देती है।

बेंच से हिंदूफोबिया को सामान्य बनाना

इस घटना का सबसे खतरनाक पहलू ये है कि ये हिंदूफोबिया को सामान्य कैसे बनाता है। जब भारत का चीफ जस्टिस हिंदू आस्था का मज़ाक उड़ाता है, तो वो पूरे सिस्टम के लिए टोन सेट करता है। इससे बुद्धिजीवी, अकादमिक और मीडिया एलीट्स को हौसला मिलता कि हिंदू मान्यताओं को अंधविश्वास कहते रहें, हिंदू शिकायतों को ‘बहुसंख्यकवाद’ ठहराएँ और हिंदू दावों को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ कहें।

यही तरीका है जिससे पूर्वाग्रह गहरा होता है, न सिर्फ़ भीड़ द्वारा मंदिर जलाने से, बल्कि चोगे वाले ताकतवरों के हल्के-फुल्के तंजों से। हर तिरस्कार हिंदुओं की गरिमा को चोट पहुँचाता है। उनके देवताओं का मज़ाक सामाजिक रूप से स्वीकार्य बना दिया जाता है और उसे संस्थागत रूप से स्वीकृति दे देता है।

अगर कानूनी तौर पर सीजेआई को लगता था कि ये याचिका एएसआई के दायरे में है न कि सुप्रीम कोर्ट के, तो ये बात वो सीधे तरीके से भी कह सकते थे। चूँकि सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान का मध्यस्थ और व्याख्याकार है, उसी को कहने का हक है। लेकिन सीजेआई ने जो कुछ नगण्य आदेश एएसआई के पास जाने का होना चाहिए था, उसे ओपन कोर्ट में एक तमाशे में बदल दिया, जहाँ देश की सबसे ऊंची न्यायिक अथॉरिटी ने एक अरब लोगों की आस्था का मज़ाक उड़ाया।

बहुत समय बीत चुका हो सकता है, लेकिन समय अन्याय का बचाव नहीं है। गुलामी सदियों बाद खत्म हुई। अपार्थीड दशकों बाद जड़ से उखड़ी। ऐतिहासिक गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं और सुधारनी चाहिए, चाहे कितनी पुरानी हों। इसके उलट सीजेआई ने अपने तंज से जो किया, उसका हिंदुओं को सदियों तक दंश झेलना पड़ सकता है।

सिर्फ़ भक्ति का नहीं, सदियों की हिंदू उत्पीड़न का मजek

याचिकाकर्ता का मज़ाक उड़ाकर चीफ जस्टिस ने सिर्फ़ एक गुहार खारिज नहीं की; उन्होंने हिंदुओं द्वारा सहन सदियों के धार्मिक उत्पीड़न को खारिज किया उसके दर्द को, और इतिहास से सुलह की संभावना को ठुकराया। वही कोर्ट जिसने राम जन्मभूमि मामले में राम लला को एक पक्ष माना, वो अब विष्णु के भक्तों पर हँस रहा है। वही न्यायपालिका जो अल्पसंख्यकों के मामले में आँख बंद कर लेती है, वो हिंदुओं से कहता है कि संवैधानिक तरीके से न्याय माँगने की जगह जाकर प्रार्थना करो और भगवान को बुलाओ।

यही आज भारतीय धर्मनिरपेक्षता की हालत है- एकतरफा रास्ता, जहाँ हिंदू अपनी आस्था के लिए ताने खाते हैं, तो अल्पसंख्यकों की शिकायतों को लाड़-प्यार से सहलाया जाता है। न्याय इस आधार पर दिया जाता है कि कौन सबसे ज़ोर से चिल्लाता है या फिर हिंसा की धमकी देता है।

इतिहास यहीं नहीं रुकेगा। हर कटी मूर्ति, हर अपवित्र मंदिर, हर चुप करा गया भक्त, सभ्यता के न्याय की लड़ाई के जारी रहने की याद दिलाता रहेगा। कोर्ट ताने कस सकते, लेकिन सभ्यता का कर्तव्य अमर है- याद रखना, बहाल करना और जो हमारा है वो वापस लेना।

तब तक हिंदुओं को कड़वी सच्चाई के साथ जीना पड़ेगा कि अपनी ही धरती पर 2025 में भी जब वो अपने देवताओं के लिए सम्मान माँगते हैं, तो देश की सर्वोच्च अदालत कहती है- “जा के प्रार्थना करो।”

सहिष्णुता सिखाने का नैतिक अधिकार खो गया

और आखिर में… याचिका कबूल करें या खारिज… ये तो कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच थोड़ी सहिष्णुता बरत सकती थी। वो आसान तरीके से इस याचिका को खारिज कर सकती थी। इसके बजाय सीजेआई की बेंच ने हिंदू भक्त की आस्था का मजाक उड़ाने का रास्ता चुना। जजों से संयम और गरिमा की अपील की जाती है, न कि 16वीं शताब्दी के मूर्ति भंजकों की भाषा बोलने की।

जब न्यायपालिका बहुसंख्यतों की गहरी आस्था की उपेक्षा कर उनका मजाक उड़ाती है, तब वो दूसरों को सहिष्णुता और सम्मान सिखाने का ज्ञान देने का नैतिक आधार खो देती है।

मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

देश की मजबूत आंतरिक सुरक्षा से लेकर सांस्कृतिक विरासत, मध्यम से लेकर निचले वर्ग को सुविधाएँ: PM मोदी के 75वें जन्मदिवस पर जानें- कैसे उनके नेतृत्व में बदला भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर 2025 को अपना 75वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। उन्होंने अपना पूरी जीवन राष्ट्र को समर्पित किया है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते देश ने कई बदलाव देखे हैं। पिछले 10 साल में उनकी सरकार ने देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया। इसके साथ देश की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने से लेकर हाशिए पर पड़े SC-ST समुदायों को सशक्त बनाने का काम किया है। मध्यम वर्गीय के लोगों और महिलाओं को बराबर का हक देने के लिए मोदी सरकार ने विशेष योजनाएँ चलाई हैं।

देश की मजबूत आंतरिक सुरक्षा

किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा के दो कंपोनेंट होते हैं। External Security और Internal Security। एक्सटर्नल सिक्योरिटी का जिम्मा तो सेनाओं के पास होता है और उसे सेना अच्छे से संभाल भी लेती हैं। लेकिन कोई भी राष्ट्र कितना मजबूत होगा या कितना कमजोर होगा यह इसकी इंटरनल सिक्योरिटी पर निर्भर करता है। भारत तो अपने आप में इस बात का उदाहरण है कि जब-जब हमारे यहाँ आंतरिक सुरक्षा कमजोर हुई है तब-तब यह राष्ट्र टूटा है। 

यदि बीते एक दशक में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो हमें यह देखने को मिलता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले 10 वर्षों में strong internal security system तैयार किया है।

Strong system इसलिए, क्योंकि 2014 से पहले का भी एक समय था जब आए दिन देश के अलग-अलग स्थानों पर बम धमाके होते थे, जिसमें सैकड़ो नागरिक अपनी जान गवाते थे।दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में सुबह दफ्तर के लिए निकलने वाला आदमी सोचता था कि मैं वापस जीवित पहुँचूँगा या नहीं। 

साल 2005 में दीपावली के समय दिल्ली में हुए ब्लास्ट, 2006 में मुंबई लोकल ट्रेन में हुए ब्लास्ट, 2008  में जयपुर शहर में हुए ब्लास्ट या फिर 26/11 का हमला, ये सारी घटनाएँ कमजोर हो चुकी internal security का ही example थी।

लेकिन आज विगत 10 वर्षों में देश किसी भी बड़े आतंकवादी हमले का शिकार नहीं हुआ है। पहले की तरह आज सड़कों पर धमाके नहीं होते। इम्प्रूवमेंट सिर्फ आतंक के मोर्चे पर ही नहीं बल्कि वामपंथी आतंकियों से निपटने में हुई है। 

जिन नक्सलियों ने सरकार और नागरिकों की नाक में दम कर रखा था उन नक्सलियों को भी eliminate किया जा रहा है। बीते 2 वर्षों में 500 से भी ज्यादा नक्सलियों को हमारे जवानों ने मार गिराया है और जल्द ही 31 मार्च 2026 एक भारत पूर्ण रूप से नक्सल मुक्त भी हो जाएगा। 

चाहे नक्सली क्षेत्र हो या फिर कश्मीर का अशांत क्षेत्र हो सरकार के प्रयासों से इन सभी क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है। 

Vibrant village program के तहत देशभर के सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाना या फिर पिछले 10 वर्षों में नॉर्थ ईस्ट में 14 लाख करोड़ रुपए के इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की बात हो। सरकार भारत के हर vulnerable areas को विकास के मुख्य धारा से जोड़कर आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दे रही है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत का पुनरुद्धार

दिनकर ने कहा था कि रोटी के बाद इंसान की सबसे कीमती चीज उसकी संस्कृति होती है। इसलिए संस्कृति की रक्षा हर सभ्यता का दायित्व है।

विगत 10 वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार ने जिस तरह से कल्चरल हेरिटेज को संरक्षित करने और उसको बढ़ावा देने में ध्यान दिया है, वह incredible है। खुद को माँ गंगा का बेटा कहने वाले प्रधानमंत्री ने नमामि गंगे के माध्यम से गंगा के नवीनीकरण का प्रयास किया है। 

अपने मंदिरों के लिए विख्यात भारत भूमि में आज World class Kashi Vishwanath Corridor और उज्जैन कॉरिडोर के निर्माण के साथ-साथ सोमनाथ मंदिर का नवीनीकरण भी हो चुका है। इन सबसे इतर पाँच शताब्दियों की लड़ाई को खत्म करते हुए अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण भी किया गया। 

मंदिर और भूमि के अलावा हमारे पूर्वज भी हमारी संस्कृति और हमारे विरासत के प्रतीक होते हैं। पूर्वजों की विरासत को संरक्षित रखने के लिए भी मोदी सरकार ने अनेक प्रयास किए हैं। 

केदारनाथ धाम में जगतगुरु आदि शंकराचार्य की मूर्ति और गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति का स्थापित होना इन्हीं प्रयासों का परिणाम है। इसके अलावा जिन रणबांकुरो ने इस देश के लिए बलिदान दिया, उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए वर्षों से लंबित National War Memorial और National Police Memorial की भी स्थापना की गई।

संस्कृति के हर aspect को cover करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जिस तरह से सरकार काम कर रही है, उसे देखते हुए यदि इस दौर को सांस्कृतिक पुनर्जागरण का दौर कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा।

SC और ST समुदाय के लिए सरकार की योजनाएँ

विकास का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता की GDP के आँकड़े बदल जाए या चमकती मेट्रो और चमकते हाइवे दिखने लगें। असली विकास तब दिखता है, जब समाज के वंचित वर्गों तक सरकार की पहुँच हो।

विगत 10 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने इसी approach के साथ काम करते हुए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए हैं ताकि उन्हें विकास की मुख्य धारा में लाया जा सके।

आज प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल में लगभग 60% मंत्री SC/ST या OBC समुदाय से आते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के अलावा आर्थिक रूप से इन्हें सशक्त करने के लिए भी कई योजनाएँ शुरू की गई हैं।

Stand Up योजना के तहत SC और ST को खुद का रोजगार शुरू करने के लिए अब तक 7,351 करोड़ से भी ज्यादा का लोन बैंक द्वारा दिया जा चुका है। इसके अलावा देश के 80 करोड़ लोग जिस गरीब कल्याण अन्य योजना के तहत राशन प्राप्त कर रहे हैं उसमें भी सबसे बड़ा तबका SCs और STs का ही है।

आयुष्मान भारत योजना, जिसके तहत हर साल ₹5,00,000 तक का हेल्थ कवरेज प्रदान किया जाता है, उसके अंतर्गत अब तक 34 करोड़ आयुष्मान कार्ड जो बने हैं, उसमें भी बड़ी संख्या SC और ST समुदाय की है। 

कुल मिलाकर देखा जाए तो चाहे स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय बनवाना हो, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देना हो या फिर सौभाग्य योजना के तहत हर घर बिजली पहुँचाना हो। सरकार की सारी योजनाओं का सीधा फायदा समाज के वंचित वर्गो तक यानी SC और STs तक ही पहुँच रहा है। 

मध्यम वर्ग को बेहतर सुविधाएँ

आम आदमी के साधारण जीवन को और आसान करना हो, चाहे 12 lakh तक की इनकम में टैक्स में छूट देना हो, घर खरीदना अफोर्डेबल बनाना हो,  मेडिकल सेवाएँ या भारत को ग्लोबली डिजिटल करना हो कुछ 10 सालों में इसमें बदलाव साफ दिखाई देता है।

मिडल क्लास चाहे रूरल एरिया या अर्बन एरिया का, उनके जीवन में मोदी सरकार बड़े बदलाव लाई है। चाहे हाल ही में दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर से GST (photo sent inbox) को घटाना हो। ज्यादातर गाड़ियों को 18% वाले रेट में लाना हो या फिर बजट में इनकम टैक्स का स्लैब 12 लाख पहुँचाना। 

इसके अलावा 2019 में Special Window for Affordable and Mid-Income Housing यानी SWAMIH फंड लॉन्च किया गया, जिसके माध्यम से रुके हुए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए ₹25,000 करोड़ की मदद दी गई।

PM आवास योजना के अंतर्गत 3 करोड़ से अधिक घर बनाए गए , जिससे रूरल और अर्बन दोनों एरिया में परिवारों को पक्की छत्त मिली है। इंटरनेट डेटा की कीमतें भी 97% तक घट गईं, जिससे ऑनलाइन शिक्षा, काम और सेवाएँ हर वर्ग तक पहुँचीं।

भारतनेट के जरिए 1.93 लाख ग्राम पंचायतें ऑप्टिक फाइबर से जुड़ चुकी हैं। Health facilities में आयुष्मान भारत के तहत 22.62 करोड़ हेल्थ कार्ड बनाए गए हैं, जिससे 40% भारतीयों को मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है।

यात्रा और कनेक्टिविटी के लिए Ude Desh ka Aam Naagrik यानी udan,योजना से 1.16 करोड़ लोग हवाई यात्रा afford कर पाए। वंदे भारत मिशन के तहत 2.17 लाख उड़ानों से लगभग 3 करोड़ लोगों को सुरक्षित घर लाया गया।

यानि मोदी सरकार में फोकस देश के उस मिडिल क्लास पर भी है, जिसकी कोई संगठित आवाज नहीं है, जो प्रदर्शनों के लिए सड़क पर तो नहीं उतरता लेकिन चाहे टैक्स में contribution हो या फिर देश में कंसम्पशन को बढ़ावा देना, वो अपना साइलेंट कॉन्ट्रिब्यूशन करता रहता है।

समाज में महिलाओं को बराबरी का सम्मान

“I measure the progress of a community by the degree of progress which have achieved”- ये डॉक्टर भीम राव अंबेडकर ने कहा था।

इसका अर्थ है- “किसी भी समाज की तरक्की ऐसे देखी जाति है की उस समाज की महिलाएँ शिक्षा, काम और अधिकार में कितनी आगे बढ़ी हैं।”

आज भारत में महिलाएँ रोज एक इतिहास रच रही हैं, जहाँ कभी बच्चे का जेंडर पता लगाकर भ्रूणहत्या के मामले सुनने को मिलते थे, वहीं आज की तारीख में NFHS-5 की report ये साफ बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में महिला स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर जमीनी स्तर पर सुधार हुआ है।

महिलाओं की paid maternity leave 12 हफ्ते से बढ़ाकर 26 हफ्ते कर देना। जन औषधि केंद्रों पर ₹1 में पेड मिल रहे हैं, जिससे महिलाओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी परेशानियों से राहत मिली है। 3.18 करोड़ बेटियों के भविष्य की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने ले लिए सुकन्या समृद्धि खाते खोले गए हैं। 

धुएँ वाले चूल्हों से होने वाली साँस की बीमारियों से महिलाओं को राहत मिली। सबसे बड़ी सौगात प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से 9.6 करोड़ घरों को LPG कनेक्शन दिए गए हैं। 

इसी तरह महिलाओं के स्वच्छ भारत मिशन से 11.72 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं। इससे महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वास्थ्य तीनों में सुधार हुआ है। सौभाग्य योजना से 2.86 करोड़ बिजली कनेक्शन दिए गए हैं, जिससे केरोसिन के लैम्प इतिहास हो गए।

चाहे संसद में महिलाओं को 33% reservation देना हो या ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर एक्शन लेना, लखपति दीदी योजना या फिर सेल्फ हेल्प ग्रुप को लोकल से ग्लोबल करना महिलाओं को और उनकी समस्याओं को prioritize किया गया है। वो महिला भले ही किसी बड़े घर से हो या किसी सुदूर इलाके से या आदिवासी तबके से.. महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिला है।  

बठिंडा में धमाकों की जाँच करेगी NIA, गुरप्रीत सिंह के घर में बम बनाते फटे कई बम: पाकिस्तानी आतंकी सरगना मसूद अजहर से प्रभावित है आरोपित

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 10 सितंबर 2025 को जीदा गाँव में हुए बठिंडा के दोहरे बम धमाकों की जाँच शुरू कर दी है। पुलिस ने मामले की सारी जानकारी इंटेलिजेंस ब्यूरो और NIA सहित केंद्रीय एजेंसियों को दी, जिसके बाद NIA ने जाँच शुरू की। पिछले दिनों NIA के चंडीगढ़ ऑफिस से SP लेवल के अधिकारी ने घटनास्थल का निरीक्षण किया था।

इससे पहले पुलिस की शुरुआती जाँच में सामने आया कि आरोपित 19 वर्षीय LLB का छात्र गुरप्रीत सिंह पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर की कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था।

SSP अमनीत कोंडल ने बताया कि NIA ने आरोपित से विस्तार से पूछताछ की, जिसाक बठिंडा के AIIMS अस्पताल में इलाज चल रहा है। उल्लेखनीय है कि आरोपित अब तक अधिकारिक तौर पर गिरफ्तार नहीं किया गया है। आरोपित के ठीक होने के बाद ही दोबारा पूछताछ की जाएगी ताकि उसके नेटवर्क का पता लगाया जा सके।

दोहरे बम धमाकों का प्रभाव

10 सितंबर 2025 की सुबह गुरप्रीत सिंह के घर में छिपाए गए विस्फोटक में अचानक धमाका हो गया, जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गया। विस्फोट से पूरा घर तबाह हो गया और गुरप्रीत का दाहिना हाथ तक काटना पड़ गया।

इसके बाद शाम करीब 4 बजे जब गुरप्रीत सिंह के पिता जगतार सिंह विस्फोट की सफाई करने लगे तो एक और विस्फोट हो गया। इस धमाके में उन्हें गंभीर चोटें आईं। बम धमाके की जानकारी पुलिस को अगले दिन जगतार सिंह का इलाज कर रहे अस्पताल की सूचना से मिली।

इसके बाद 14 सितंबर 2025 को विस्फोट की जाँच करने आई बम निरोधक टीम के सामने भी 3 छोटे विस्फोट हुए। फिर टीम को घटनास्थल को साफ करने के लिए रोबोट लगाने पड़े। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरप्रीत ने जिन केमिकल का इस्तेमाल कर रहा था, वो बेहद अस्थिर थे और अगर अपनी जगह से हटाए जाते तो विस्फोट हो सकते थे।

मसूद अजहर कनेक्शन और कट्टरपंथी एंगल

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, गुरप्रीत सिंह मसूद अजहर और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी प्रोपेगेंडा से प्रभावित था। गुरप्रीत के फोन से इस्लामी कट्टरपंथियों के वीडियो, विस्फोटक इकट्ठा करने की जानकारी और पाकिस्तानी आतंकवादियों के फोन नंबर मिले हैं।

इसके अलावा गुरप्रीत सिंह ने कट्टरपंथी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक फेक ID भी बनाई थी। जाँच में यह भी सामने आया है कि गुरप्रीत ने विस्फोटक बनाने की सामग्री ऑनलाइन मँगवाई थी और वीडियो देखकर बम बनाना सीख रहा था।

खुफिया जानकारी से यह भी पता चला है कि उसने जम्मू जाने के लिए ट्रेन और बस के टिकट भी बुक करवा लिए थे, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि वह अपने कच्चे विस्फोटकों को किसी बड़े ऑपरेशन के लिए ले जाने वाला था लेकिन अचानक हुए विस्फोट ने उसका सारा प्लान नाकाम कर दिया।

SSP कोंडर ने एक बयान में कहा कि आरोपित का PGIMER चंडीगढ़ में मानसिक उपचार चल रहा था, जिसे दो साल पहले परिवार ने खत्म करवा दिया। SSP ने बताया कि पहले डॉक्टरों ने लगातार निगरानी की सलाह दी थी लेकिन कथित तौर पर उसकी हालत को नजरअंदाज किया गया।

मामले में दर्ज हुई FIR

ऑपइंडिया को मिली FIR कॉपी के अनुसार, 10 सितंबर 2025 को गश्त के दौरान पुलिस को सूचना मिली कि गुरप्रीत सिंह ने अपने घर में विस्फोटक सामग्री इकट्ठा की है। सुबह लगभग 5 या 6 बजे विस्फोटक बनाने की कोशिश में लगे गुरप्रीत सिंह से अचानक विस्फोट हो गया, जिसमें वह बुरी तरह से घायल हो गया और उसका घर भी तबाह हो गया।

पंजाब पुलिस ने दर्ज की FIR का स्क्रीनशॉट

FIR में यह भी लिखा कि उसी दिन शाम लगभग 4 बजे घर की सफाई करते हुए एक दूसरा विस्फोट हुआ, जिसमें उसका पिता जगतार सिंह भी घायल हो गया।

मामले में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम,1908 (संशोधन अधिनियम 2001) की धारा 3,4,5 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 287, 288, 326 ( F) के तहत FIR दर्ज की गई है।

SSP ने बताया कि बम निरोध टीमें घर को सुरक्षित घोषित करने से पहले उसकी तलाशी ले रही हैं। केमिकल के करण और गुरप्रीत के फोन से मिले डिजिटल सबूतों को भी फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।

मीडिया को निशाना बनाने के लिए ‘अदालती आदेश का इस्तेमाल’ कर रही सरकार: NewsLaundry ने कोर्ट के फैसले को भी बनाया प्रोपेगेंडा टूल, कंटेंट हटाने से जुड़ा है मामला

वामपंथी प्रोपेगेंडा संस्थान न्यूज़लॉन्ड्री ने 16 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें कहा गया था कि सरकार उद्योगपति अडानी की आलोचना करने वाले पत्रकारों और मंचों को चुप कराने के लिए “अदालती आदेश का इस्तेमाल” कर रही है। धन्या राजेंद्रन से जुड़े वामपंथी मीडियाकर्मियों ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में दखलंदाजी का आरोप सरकार पर लगाया।

दिल्ली की कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि उद्योगपति गौतम अडानी और अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के खिलाफ बिना सबूत वाले निराधार कंटेट और आर्टिकल को तमाम प्लेटफॉर्म्स से हटाने का निर्देश दिया था। लेकिन प्रोपेगेंडा पत्रकारों ने जोर देकर कहा कि सरकार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही है। जबकि आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि चूँकि प्रकाशक सत्र न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहे, इसलिए सरकार द्वारा सामग्री हटाने का नोटिस जारी किया गया।

कोर्ट ने मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया

कोर्ट के आदेश की वास्तविकता उससे अलग है, जो दिखाई जा रही है। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट के जस्टिस अनुज कुमार सिंह ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम परंजॉय गुहा ठाकुरता एवं अन्य के मामले में अंतरिम आदेश दिया था। इसमें पत्रकारों परंजॉय गुहा ठाकुरता, रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुष जोशी और अन्य को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) के खिलाफ मानहानि वाली सामग्री प्रकाशित करने से रोक दिया गया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट, लेखों और वीडियो से ‘गलत, असत्यापित और प्रथम दृष्टया मानहानिकारक’ सामग्री हटाई जानी चाहिए। यदि तुरंत हटाना संभव न हो, तो 5 दिनों के भीतर सोशल मीडिया से कंटेंट, वीडियो, ट्वीट वगैरह हटाना सुनिश्चित करें। सरकार ने 16 सितंबर को मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश तभी जारी किया जब सोशल मीडिया पर इसे 5 दिन में हटाने के अदालती आदेश के बावजूद नहीं हटाया गया।

अदालत के समक्ष अडानी की दलीलें

अडानी एंटरप्राइजेज ने अपनी याचिका में दलील दी कि कुछ पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क ने कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया है, निवेशकों को अरबों का नुकसान हुआ है और भारत के बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं में बाधा डाली है। इसने आगे कहा गया कि ये प्रतिवादी “भारत-विरोधी हितों” से जुड़े हुए थे और घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों परियोजनाओं में बाधा डाल रहे हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में पाया कि AEL ने प्रथम दृष्टया निषेधाज्ञा का मामला बनाया था। हालाँकि न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि असत्यापित, निराधार और मानहानिकारक रिपोर्टिंग जारी नहीं रह सकती।

राजेंद्रन ने एक और पोस्ट डाल कर वकील इंदिरा जयसिंह के उस बयान को दोहराया, जिसमें उन्होंने कहा था, “प्रतिवादियों ने आदेश के विरुद्ध अपील दायर की है, जिसका उन्हें अधिकार है। न्यायालय जानता है कि अपने आदेशों का क्रियान्वयन कैसे करना है, इसलिए उन्हें मंत्रालय की आवश्यकता नहीं है। मंत्रालय न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल रहा है।”

वास्तव में जब कोई कोर्ट कोई आदेश जारी करता है, तो सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इसकी जानकारी देती है और इसका पालन करने के लिए बाध्य करती है। इस मामले में भी यही हुआ। कोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए मंत्रालय ने संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया। ये कहना गलत होगा कि मंत्रालय कोर्ट के आदेश का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए ‘उपयोग’ कर रहा है।

असीम मुनीर ने आंतकियों का नमाज-ए-जनाजा पढ़ने भेजे थे फौजी: जैश कमांडर ने पाकिस्तान को किया बेपर्दा, बोला- दिल्ली और मुंबई हमलों में मसूद अजहर का हाथ

जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी का एक और कबूलनामा सामने आया है। मसूद इलियास ने कबूल किया कि दिल्ली में संसद भवन हमले और मुंबई में 26/11 आतंकी हमले कराने के पीछे मसूद अजहर का ही हाथ है। इससे पाकिस्तान की आतंकी को पनाह ना देने वाले दावे की भी पोल खुल गई है।

मसूद इलियास कश्मीरी मे एक भड़काऊ भाषण देते हुए बताया कि पाँच साल बाद भारत की जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान में रहकर आतंकी हमले की साजिश रची। कश्मीरी ने अजहर के ठिकाने का भी खुलासा करते हुए कहा कि उसका आतंकी बेस बालाकोट में था, जिसे भारत ने 2019 की एयरस्ट्राइक में निशाना बनाया।

वीडियो में मसूद इलियास कश्मीरी ने कहा, “दिल्ली की तिहाड़ जेल को तोड़कर अमीर-उल-मुजाहिदीन मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान आते है। उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए बालाकोट की मिट्टी ही उनको ठिकाना देती है।”

उसने आगे कहा, “बालाकोट की मिट्टी और यहाँ का जर्रा-जर्रा, उसके हम अहसानमंद हैं। इस मिट्टी का किरदार कयामत तक याद रखा जाता है। दिल्ली और मुंबई को दहलाने वाले मौलाना मसूद अजहर को ये धरती ही पनाह देती है।”

पाकिस्तान में आतंकी संगठन का ‘मिशन मुस्तफा’ कार्यक्रम

पाकिस्तान हमेशा से आतंकी संगठनों को पनाह देता रहा है, इसके सबूत भी कई बार सामने आए हैं। अबकी बार साफ हो गया जब आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने पाकिस्तान के बालाकोट में अपना मिशन ‘मुस्तफा कार्यक्रम’ आयोजित किया, जिसमें भारत के मोस्ट वॉन्टेड आतंकी मसूद अजहर की जमकर तारीफ की।

इस कार्यक्रम में ही जैश के कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी ने भड़काऊ भाषण देते हुए भारत पर किए गए आतंकी हमलों का जश्न मनाया। इस दौरान कश्मीरी ने कहा, “हमने आतंक को अपनाकर पाकिस्तान की सीमाओं की रक्षा के लिए दिल्ली, काबुल और कंधार से जंग लड़ी।”

पाकिस्तानी फौज के आतंकी संगठन से रिश्ते

जैश कमांडर मसूद इलियास ने पाकिस्तानी फौज की पोल खोलते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर मे मारे आतंकियों के जनाजे मं शामिल होने का आदेश पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने अपने जनरलों को दिया था।

इस जनाजे के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। भारत ने इन आतंकियों को सम्मान के साथ जनाजा देने के लिए पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की थी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद डरे आतंकी

जैश कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी ने बयान में यह भी कहा कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों के बीच डर का माहौल है। कश्मीरी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ लोगों ने जिहाद से मुँह मोड़ लिया है लेकिन हम उसे दोबारा जिंदा करेंगे।”

कश्मीरी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के बाद कुछ लोगों ने जिहाद से मुँह मोड़ लिया है लेकिन हम उसे दोबारा जिंदा करेंगे।”

ऑपरेशन सिंदूर में मारा गया मसूद अजहर का परिवार

इससे पहले भी जैश कमांडर मसूद इलियास का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उसने कबूल किया कि ऑपरेशन सिंदूर में आतंकी मसूद अजहर का परिवार मारा गया। वीडियो में मसूद इलियास ने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुए बहावलपुर हुए हवाई हमले में जैश का हेडक्वार्टर तबाह हो गया, इसमें मसूद अजहर के परिवार के भी टुकड़े-टुकड़े हो गए।

जिस वायनाड ने राहुल गाँधी को दी ‘शरण’, जिसने प्रियंका वाड्रा को लोकसभा पहुँचाया, वहाँ एक-एक कर खुद की ही जान क्यों ले रहे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता?

केरल के वायनाड जिले में कॉन्ग्रेस पार्टी इन दिनों भारी संकट से जूझ रही है। यह वही इलाका है जहाँ पहले राहुल गाँधी सांसद थे और उन्होंने दो बार यहाँ से चुनाव जीता। बाद में उन्होंने सीट छोड़ दी और अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को यहाँ से सांसद बनवाया। लेकिन अब वायनाड कॉन्ग्रेस का गढ़ कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता लगातार आत्महत्या कर रहे हैं या सुसाइड की कोशिश कर रहे हैं।

इन सब के पीछे जो वजह हैं, वो हैं- पार्टी के अंदरूनी कलह, भ्रष्टाचार, कर्ज के जाल और वादाखिलाफी। कई कार्यकर्ताओं ने कॉन्ग्रेस पार्टी के काम के लिए करोड़ों का लोन लिया था, पार्टी ने वादा किया था कि पैसे लौटाने में मदद करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कर्ज चुकाने के दबाव में पिता-पुत्र ने जान दे दी, अब बहू ने भी सुसाइड नोट लिखकर पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हुए जान देने की कोशिश की।

कुछ दिन पहले ही एक नेता को फर्जी केस में फँसाया गया, जिसके बाद दूसरे नेता ने जान दे दी। ये घटनाएँ कॉन्ग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही हैं। केरल की वायनाड लोकसभा सीट से राहुल-प्रियंका को लगातार चुनाव जिताने के चक्कर में कार्यकर्ता कर्ज के बोझ तले दब गए और अब जान देने को मजबूर हो रहे हैं। पार्टी ने कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन पिता-पुत्र की मौत के बाद भी मदद नहीं की। कर्जदार पैसे माँग रहे थे, तो बहू ने सुसाइड नोट में कॉन्ग्रेस को कातिल बताया। ये सब पार्टी की खराब व्यवस्था की वजह से हो रहा है। प्रियंका गाँधी ने हाल ही में वायनाड का दौरा किया, लेकिन इन मुद्दों पर चुप्पी साधे रही।

वायनाड में कॉन्ग्रेस ने कराया जॉब स्कैम, बेरोजगारों से की ठगी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली बड़ी घटना दिसंबर 2024 की है, जब पूर्व डिस्ट्रिक्ट कॉन्ग्रेस कमिटी (डीसीसी) ट्रेजरर एनएम विजयन और उनके बेटे जिजेश ने आत्महत्या कर ली। विजयन लंबे समय से कॉन्ग्रेस के वफादार कार्यकर्ता थे। उन्होंने पार्टी के काम के लिए करीब 2.5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था।

ये कर्ज सुल्तान बाथेरी कोऑपरेटिव बैंक में नौकरियों के नाम पर लिया गया था। उन पर पार्टी के जिलाध्यक्ष एनडी अप्पाचन, पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट आईसी बालाकृष्णन एमएलए, पूर्व ट्रेजरर केके गोपीनाथन मास्टर और अन्य ने घोटाला करने के लिए दबाव डाला। उनसे जॉब के बदले कैश स्कैम कराया। लोग नौकरी के लिए लाखों रुपये देते थे, लेकिन नौकरी नहीं मिली। स्कैम फेल हो गया तो सारा बोझ विजयन पर आ गया।

विजयन ने अपनी संपत्ति गिरवी रख दी, लेकिन कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं बचे। पार्टी ने वादा किया था कि कर्ज की जिम्मेदारी लेगी, लेकिन सिर्फ थोड़ी मदद की। केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (केजेपीसीसी) ने कहा कि वो बाइंडिंग एग्रीमेंट नहीं था, सिर्फ मानवीय मदद है। विजयन ने 25 दिसंबर 2024 को जहर खाकर सुसाइड की कोशिश की, उनके बेटे जिजेश ने भी ऐसा ही किया। दोनों 27 दिसंबर को मर गए।

विजयन ने अपने सुसाइड नोट में सीधे अप्पाचन, बालाकृष्णन और गोपीनाथन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लिखा कि इन नेताओं ने उन्हें फँसाया और अब मदद नहीं कर रहे। परिवार का कहना है कि विजयन ने पार्टी के लिए सब कुछ किया, लेकिन बदले में धोखा मिला।

पुलिस ने सुसाइड नोट के आधार पर एमएलए बालाकृष्णन और तीन अन्य पर एबेटमेंट टू सुसाइड का केस दर्ज किया। लेकिन पार्टी ने इन नेताओं को अभी तक कोई सजा नहीं दी। परिवार आज भी कर्ज के बोझ तले दबा है। विजयन के बेटे ने कहा कि पिता ने पार्टी को बचाने के लिए खुद को झोंक दिया, लेकिन पार्टी ने पीठ दिखा दी। ये केस दिखाता है कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी के अंदर के भ्रष्टाचार ने विजयन और उनके बेटे की जान ले ली।

बदनामी से परेशान नेता को देनी पड़ी जान

दूसरी घटना 12 सितंबर 2025 की है, जिसमें मुल्लानकोली पंचायत सदस्य जोस नेलेडम ने आत्महत्या कर ली। जोस कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेता थे और मुल्लानकोली ग्राम पंचायत के वॉर्ड मेंबर थे। उनकी मौत पार्टी के अंदरूनी कलह की वजह से हुई।

दरअसल, कुछ दिन पहले जुलाई में एक डेवलपमेंट सेमिनार में डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन पर हमला हुआ था। ये फैक्शनल फाइट का नतीजा था। उसके बाद कनत्तुमालयिल थंकाचन, जो मारक्काडावु के लोकल कॉन्ग्रेस नेता हैं, को अवैध शराब और कंट्री बॉम्ब्स के केस में गिरफ्तार किया गया। थंकाचन 17 दिनों तक जेल में रहे। बाद में पुलिस ने कोर्ट में कहा कि केस फर्जी था और थंकाचन को रिहा कर दिया।

थंकाचन ने आरोप लगाया कि अप्पाचन गुट ने उन्हें फंसाया, जिसमें जोस भी शामिल थे। इसके बाद जोस पर साइबर अटैक शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम किया गया, अपमानित किया गया। जोस ने एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी ने उनका साथ नहीं दिया। सुसाइड से पहले जोस ने जहर खाया, कलाई काटी और तालाब में कूद गए। पड़ोसी ने उन्हें पाया और हॉस्पिटल ले गए, लेकिन रास्ते में ही मौत हो गई।

सुसाइड नोट में जोस ने लिखा, “पार्टी ने संकट में साथ नहीं दिया, साइबर अटैक ने तोड़ दिया।” डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन ने माना कि पार्टी के अंदर ताकतें जिम्मेदार हैं। लेकिन पार्टी ने इसे कवर-अप करने की कोशिश की। मलयाला मनोरमा और मथ्रुभूमि जैसे अखबारों में जोस के नोट को छिपाया गया। ये सबकुछ प्रियंका गाँधी के वायनाड दौरे के समय हुआ, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी।

विजयन की परेशान बहू ने दी जान देने की कोशिश

वायनाड की तीसरी घटना 13 सितंबर 2025 की है, जब एनएम विजयन की बहू पद्मजा ने सुसाइड की कोशिश की। पद्मजा 2024 में आत्महत्या कर लेने वाले विजयन की बहू हैं। उन्हें उनका बेटा प्राइवेट हॉस्पिटल ले गया।

सुसाइड नोट में पद्मजा ने लिखा, “किलर कॉन्ग्रेस, यहाँ एक और विक्टिम।” उन्होंने कहा कि पार्टी ने कर्ज नहीं चुकाया, जिसकी वजह से परिवार टूट रहा है। पद्मजा ने 12 सितंबर को मीडिया से कहा था कि पार्टी ने 30 जून 2025 तक 2.5 करोड़ का कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन सिर्फ 20 लाख दिए।

पद्मजा ने एमएलए टी सिद्दीक पर भी आरोप लगाया कि वो लिखित वादों को पूरा नहीं कर रहे। अस्पताल बिल तक के पैसे नहीं दे रहे। प्रियंका गाँधी ने परिवार को सपोर्ट का आश्वासन दिया था, लेकिन 13 सितंबर को वायनाड विजिट के दौरान भी नहीं मिलीं। पद्मजा ने पूछा, “क्या हमें मरना पड़ेगा तभी कॉन्ग्रेस को आँखें खुलेगी?”

अस्पताल में पद्मजा (फोटो साभार: Deshabhimani)

पद्मजा ने एक ऑडियो क्लिप जारी की, जिसमें थिरुवनचूर राधाकृष्णन कह रहे हैं कि पार्टी को कर्ज चुकाना चाहिए था। लेकिन पार्टी कह रही है कि कुछ कर्ज सेटल हो गया। ये सुसाइड अटेम्प्ट ने वायनाड में विरोध प्रदर्शन भड़का दिए।

आत्महत्या के कम से कम 5 मामले, लेकिन राहुल-प्रियंका ने साधी चुप्पी

वायनाड में कॉन्ग्रेस का ये संकट नया नहीं है। पिछले दशक में कम से कम पाँच कार्यकर्ताओं ने आत्महत्या की है। 2015 में पीवी जॉन, मनांथावादी ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी के प्रेसिडेंट ने पार्टी ऑफिस में ही फाँसी लगा ली थी। वो लोकल बॉडी इलेक्शन में हार के बाद अपमानित हो रहे थे। इसके अलावा साल 2023 में राजेंद्रन नायर ने सुसाइड किया, क्योंकि कॉन्ग्रेस कंट्रोल्ड प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक पुलप्पल्ली में उनके लैंड डॉक्यूमेंट्स का दुरुपयोग करके लोन लिया गया। पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट केएल पौलोस और जनरल सेक्रेटरी केके अब्राहम पर केस हैं। ये सभी घटनाएँ फैक्शनल फाइट, भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी से जुड़ी हैं।

पीवी जॉन, NM विजयन और बेटा जितेश (फोटो साभार: OnManorama)

प्रियंका बदलना चाहती हैं नेता, इतनी जान लेने बाद

प्रियंका गाँधी ने वायनाड की हालत पर नाराजगी जताई है। उन्होंने केपीसीसी से रिपोर्ट माँगी और डिस्ट्रिक्ट लीडरशिप चेंज की माँग की। अप्पाचन को हटाने की बात चल रही है। हटाए जाने वाले नामों में टीजे आइजैक और केई विनयान शामिल हैं। प्रियंका ने कहा कि मंडक्कई-चूरालमाला लैंडस्लाइड विक्टिम्स के लिए हाउसिंग प्रोजेक्ट में देरी हो रही है, क्योंकि डीसीसी साथ नहीं दे रही है। वो फंड्स जुटाने को तैयार थीं, लेकिन लोकल लीडर्स ने काम नहीं किया।

अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है कॉन्ग्रेस

विपक्षी सीपीएम कह रहा है कि कॉन्ग्रेस अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है। सीपीएम लीडर एमवी जयराजन ने विजयन परिवार का कर्ज चुकाने का ऐलान किया। मंत्री वी शिवंकुट्टा ने कहा कि कॉन्ग्रेस मर्डर, सुसाइड एबेटमेंट और वायलेंस का प्रतीक है।

इन सबके बीच, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता निराश हैं। एक नेता ने कहा कि पार्टी ने अपना मास बेस खो दिया। केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) पंचायत इलेक्शन की तैयारी कर रहा है, लेकिन ये सुसाइड्स ने पार्टी को पैरालाइज्ड कर दिया।

कॉन्ग्रेस को अब अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी। कार्यकर्ता जो पार्टी के लिए जान देते हैं, उन्हें धोखा नहीं मिलना चाहिए। वायनाड जैसे ट्रेडिशनल स्ट्रॉन्गहोल्ड में ये संकट पार्टी की साख को बर्बाद कर रहा है। समाज को ऐसी पार्टी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए जो अपने ही लोगों को मार डालती है। ये समय है कि कॉन्ग्रेस आँखें खोले और सुधार करे, वरना वायनाड में उनका गढ़ ढह जाएगा।

हाँ, मैं पास्टर हूँ, नेपाल से आकर यीशु-यीशु करता हूँ…बिहार में ‘पनिया बाबा’ के सभा करने पर पुलिस ने लगाई रोक: ‘जादुई पानी’ की आड़ में हिंदुओं को ईसाई बनाने का आरोप

बिहार के सारण में ‘जादुई पानी’ के नाम पर लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। स्थानीय लोगों ने ‘पनिया बाबा’ उर्फ वैधजी नामक एक ईसाई पादरी पर लोगों को बरगलाकर ईसाई बनाने के लिए प्रेरित करने का आरोप लगाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित पादरी जादुई पानी के नाम पर लोगों के ठीक होने का दावा करता था। ईसाई पादरी ‘पनिया बाबा’ लोगों से कहता था कि इस पानी को पीने से जीवन की समस्याएँ दूर हो जाती हैं।

दावा किया जा रहा है कि आरोपित प्रचारक नेपाल से आया था और सारण के कई गाँवों में वह लोगों को इस पानी से ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा चला रहा था।

‘मिशनरी के पैसे से धर्मांतरण का धंधा’

लोगों ने पानी के नाम पर सिर्फ धोखा देने का आरोप लगाया है। एक शख्स ने दावा किया है कि उसने 7 दिनों तक पादरी के यहाँ से पानी पिया था लेकिन कोई असर नहीं हुआ। एक अन्य शख्स ने दावा किया कि ईसाई मिशनरियों के द्वारा इसको फंडिंग दी जा रही थी और यहाँ धर्मांतरण का खेल चल रहा था।

एक महिला ने भी बाबा पर इलाज के नाम पर लोगों को बरगलाने का आरोप लगाया है। एक युवकों ने भी दावा किया है कि अगर सच में बाबा के पास चमत्कार है तो वो उनकी बीमारी ठीक करके दिखाएँ।

बाबा का क्या है दावा?

लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने वाले बाबा का दावा है कि अगर वो पानी पढ़कर दे दे तो उसे पीकर कैंसर तक ठीक हो जाता है। वो कहता है, “अगर कोई मरने की कगार पर है, नहीं चल पा रहा है तो भी प्रभु यीशू की कृपा से 3 महीने में वो ठीक हो जाएगा।”

धर्म परिवर्तन कराने के दावों पर उसने कहा कि वो एक पादरी है और ईसाई धर्म प्रचारक है। आरोपित ने सभी धर्मों का सम्मान करने की बात कही है। हालाँकि, वो अपनी सभाओं में यह सिखा रहा था कि रात को सोने से पहले और जागने के बाद प्रभु यीशु का नाम लो।

लोगों ने दावा किया कि पादरी कहता था कि मंदिर में शैतान रहते हैं। हालाँकि, ईसाई प्रचारक ने यह बात कहने से इनकार किया है।

पुलिस ने क्या कहा?

सारण पुलिस ने कहा है कि पनिया बाबा पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) व अनुमंडल पदाधिकारी, मढ़ौरा को मामले की जाँच के आदेश दिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि अभी पनिया बाबा पर जाँच चल रही है।

पुलिस ने कहा, “SDO द्वारा एक के सभा आयोजन की अनुमति दिए जाने की बात सामने आयी है जिसमें विधि व्यवस्था संधारण के लिए फोर्स नियुक्ति का आदेश भी दिया गया था। पिछले बुधवार को मदारपुर, भेल्दी थाना एरिया में ये सभा आयोजित होने की बात बताई गई है। तत्काल प्रभाव से ऐसे सभा आयोजन पर प्रतिबंध लगाया जाता है।”

7 महीनों में आवारा कुत्तों के 26 लाख मामले, ABC नियम ताक पर: ऑपइंडिया की RTI में खुलासा, NCDC के आँकड़े डराने वाले

भारत में आवारा कुत्तों की समस्या लागातार बढ़ रही है। हर साल लाखों लोगों को कुत्तों के काटने की घटना झेलनी पड़ती है। ये सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी एक गंभीर संकट है।

ऑपइंडिया ने देशभर में कुत्तों के काटने से जुड़े आँकड़ों के लिए एक RTI डाली थी। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने जानकारी दी है कि केवल वर्ष 2025 में ही अब तक 26 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने अपने जवाब में बताया कि 31 जुलाई 2025 तक भारत में कुल 26,71,732 कुत्ते काटने के मामले सामने आए हैं।

साभार- NCDC, भारत सरकार

ऑपइंडिया ने आरटीआई के जरिए 2001 से लेकर 31 जुलाई 2025 तक राज्यवार आँकड़ों की जानकारी जुटाई। 2001 में ही एबीसी (Animal Birth Control) नियम लागू हुए थे।

हालांकि, केंद्र सरकार के राज्यवार केंद्रीकृत आँकड़ों का संकलन 2012 से शुरू हुआ। ये भी एक समस्या ही है क्योंकि भारत में रेबीज के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। फिर भी 2001 से 2012 तक कोई केंद्रीकृत राज्यवार डेटा उपलब्ध नहीं है और ये तब है जब एबीसी नियम पहले ही लागू हो चुके थे।

आवारा कुत्तों का लगातार बढ़ता संकट

ऑपइंडिया को 2012 से 31 जुलाई 2025 तक के आँकड़े मिले। हालाँकि आरटीआई में कई अन्य सवाल भी शामिल थे, लेकिन अधिकांश का जवाब नहीं दिया गया क्योंकि वे अन्य विभागों के अधिकार क्षेत्र में आते थे।

इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन पहलुओं पर हमने ध्यान केंद्रित किया गया है। वह हैं- प्रतिवर्ष दर्ज किए गए कुत्ते काटने के मामले, राज्यवार कुत्ते काटने का भार और भारत सरकार की ओर से रेबीज से होने वाली मौतों का आधिकारिक डेटा।

NCDC की ओर से जारी आँकड़ों का चित्र

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़े इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम- इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IDSP-IHIP) से मिले हैं। इन आँकड़ों में सबसे सोचने वाली बात ये है कि वर्ष 2025 का महीने का औसत 2024 के मासिक औसत से अधिक है। ये दिखाता है कि देश में आवारा कुत्तों की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है।

आँकड़ों के अनुसार, 31 जुलाई 2025 तक हर महीने औसतन 3,81,676 कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए। यह संख्या 2024 के मासिक औसत 3,09,778 की तुलना में काफी अधिक है। इसका मतलब है कि भारत में 2025 में पिछले वर्ष की तुलना में हर महीने लगभग 80,000 अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

ऑपइंडिया की RTI उस जाँच का हिस्सा है जो देशभर में आवारा कुत्तों की परेशानी को सामने ला रही है। इस जाँच ने न केवल समस्या को गंभीरता से सामने रखा है, बल्कि नसबंदी और रेबीज नियंत्रण कार्यक्रमों की विफलता को भी उजागर किया है। जहाँ एक ओर समाजसेवी और एनजीओ इस संकट को जबरन ‘बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया’ मानते हैं, वहीं सरकार के अपने आँकड़े दूसरी सच्चाई ही बता रहे हैं।

RTI क्या कहती है?

RTI के जवाब में सरकार ने वर्ष 2012 से लेकर जुलाई 2025 तक हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के कुत्ते काटने के मामलों के वर्षवार आँकड़े उपलब्ध कराए हैं। 2012 से 2021 तक का डेटा IDSP पोर्टल के में ‘P फॉर्म’ ते तहत दर्ज किया गया था।

हालाँकि, इस रिपोर्टिंग फॉर्मेट में एक बड़ी परेशानी ये ती कि उस समय के रेबीज से मौतों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया। इसका मतलब है कि लगभग एक दशक तक भारत सरकार ने देशभर में रेबीज से होने वाली मौतों का डेटा ही दर्ज नहीं किया।

दिलचस्प बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का दावा है कि भारत में हर साल लगभग 20,000 रेबीज मौतें होती हैं, जो भारत सरकार के कुछ दशक पहले संसद में दिए गए उत्तर पर आधारित है।

हालिया अध्ययनों के अनुसार, भारत में रेबीज के मामलों का आँकड़े 5,000 से अधिक हो सकते हैं। लेकिन, सरकार के आँकड़े 2022 से हर साल 100 से कम मौतें दिखाते हैं।

वर्ष 2022 से सरकार ने IDSP-IHIP पोर्टल पर डेटा दर्ज करना शुरू किया।यहाँ पर जानकारी ‘प्रीजेंप्टिव फॉर्म’ पर दर्ज की जाती है। आसान तौर पर कहा जाए तो ये आँकड़े फील्ड स्तर पर तत्काल निगरानी के आधार पर अस्थायी तौर पर लिए गए हैं। ये बाद में संशोधित हो सकते हैं।

फिर भी, ये आँकड़े पहले से ही लाखों मामलों की पुष्टि करते हैं, जो इस परेशानी की थाह बताते हैं। इसके अलावा 2012 से 2019 के बीच राष्ट्रीय आँकड़ों में भी लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 2012 में कुल 42,51,977 मामले दर्ज हुए थे, जो 2019 में बढ़कर 72,69,410 हो गए।

2012 से 2017 के बीच कुत्तों के काटे जाने वाले मामलों के आंकड़े (साभार- NCDC)

इसके बाद 2020 में कोविड महामारी के कारण कुत्ते काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की गई। उस वर्ष यह संख्या घटकर 47,58,041 रह गई।

इसके बाद यह गिरावट जारी रही और 2022 में देशभर में केवल 21,90,056 मामले दर्ज हुए।

हालाँकि उस वर्ष के बाद आंकड़ों में तेज उछाल देखा गया। वर्ष 2023 में कुत्ते काटने के 30,52,324 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 37,17,336 हो गई।

सिर्फ जुलाई 2025 तक ही भारत में 26 लाख से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं। यदि यही प्रवृत्ति बनी रही, तो वर्ष 2025 के अंत तक देश में 45 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज हो सकते हैं।

आँकड़ों में कुछ खास बातें भी शामिल रहीं। ये भारत में पशु नियंत्रण नीतियों की विविधता को बताती हैं। उदाहरण के तौर पर, लक्षद्वीप ने लगातार ‘जीरो’ कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए हैं। यह कोई आँकड़ों का संयोग नहीं है, बल्कि स्पष्ट नीति का परिणाम है। इस द्वीप क्षेत्र में कुत्तों को रखने की अनुमति ही नहीं है। यहाँ तक कि पर्यटकों को भी अपने पालतू कुत्तों को साथ लाने की अनुमति नहीं दी जाती।

वहीं, इसके उलट, भारत के अन्य राज्यों और अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में हर साल लाखों की संख्या में कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए जाते हैं। यह अंतर बताता है कि जहाँ कुछ क्षेत्रों में सख्त और स्पष्ट रोकथाम नीतियाँ अपनाई गई हैं, वहीं अधिकांश हिस्सों में अस्थायी और अप्रभावी उपायों से ही काम चलाया जा रहा है।

वर्ष वार बढ़ता राष्ट्रीय ट्रेंड

ये आँकड़े एक बेहद चिंताजनक राष्ट्रीय रुझान की ओर ध्यान दिलाते हैं। वर्ष 2012 में भारत में 42.5 लाख से अधिक कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए थे। इसके बाद यह संख्या हर साल लगातार बढ़ती गई और 2018 में यह आँकड़ा 75 लाख को पार कर गया। ये अब तक के पूरे डेटा सेट में सबसे अधिक है।

इस बढ़ोतरी ने नसबंदी अभियानों की असफलता के साथ शहरी और ग्रामीण भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को बताता है।

इसके बाद आया कोविड काल, जिसमें कुत्तों के काटने के मामलों में काफी गिरावट दर्ज की। लेकिन, यह गिरावट ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। वर्ष 2023 में देश में फिर से 30 लाख से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए गए।

वर्ष 2020, 2021 और 2022 के आँकड़ों को लेकर कई सवाल हैं। 2020 में अधिकांश महीनों तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू था, फिर भी 47 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए। इसके बाद के दो वर्षों में, जब लॉकडाउन समाप्त हो चुका था तब कुत्ते काटने के मामलों में गिरावट जारी रही। ये बताता है कि जब देश कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा था तब कुत्तों के काटे जाने के मामलों की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं की गई।

रेबीज से मौतों के मामले केवल 2022 (21 मौतें), 2023 (50), 2024 (52) और 2025 (31 जुलाई तक 23) के लिए उपलब्ध हैं।

महामारी के बाद की गिरावट से कुत्तों के काटने की दर कम नहीं हुई

कुछ कुत्ता-प्रेमी यह तर्क दे सकते हैं कि 2020 से 2022 के बीच आवारा कुत्तों की समस्या पर नियंत्रण पा लिया गया। लेकिन वास्तविकता इसे उलट है। ये वह समय था जब कोविड-19 के कारण देश ठप पड़ा था। लोग घरों में बंद थे और लॉकडाउन हटने के बाद भी संक्रमण के डर से बाहर नहीं निकल रहे थे। इशके कारण कुत्तों और इंसानों के बीच संपर्क कम रहा।

इसके साथ ही, अस्पताल कोविड मामलों से जूझ रहे थे और लोग कुत्ते काटने के बाद इलाज के लिए अस्पताल जाने से भी डर रहे थे। इस कारण रिपोर्टिंग भी कम हुई। इसे गिरावट नहीं कहा जा सकता। इन सब के अलावा, सरकारी तंत्र पूरी तरह महामारी से निपटने की कोशिशों में लगा था। इसके कारण डेटा और मॉनिटरिंग भी प्रभावित हुई।

स्वास्थ्य कर्मियों, निगरानी अधिकारियों और नगर निगम प्रशासन के पास कुत्ते काटने की घटनाओं को दर्ज करने या प्रमाणित करने की सीमित क्षमता थी। इसलिए उन वर्षों में जो गिरावट दर्ज हुई, उसे नसबंदी या प्रशासन की सफलता नहीं कहा जा सकता। यह आँकड़ों का ही हेरफेर था जो विशेष परिस्थितियों में दर्ज हुआ।

2022 के बाद के आँकड़ों में ये बात साफ तौर पर सामने आ गई कि परेशानी हल नहीं हुई है। वह केवल कोविड महामारी के चलते कुछ समय के लिए छिप गया था।

राज्यवार स्थिति

राज्य स्तर पर आँकड़ों को गहराई से देखा जाए तो पता चलता है कि यह समस्या पूरे देश में कितनी अंदर तक अपनी जड़ें जमा चुकी है। इस सूची में उत्तर प्रदेश लगातार पहले नंबर पर रहा है।
यूपी के वार्षिक आँकड़ों को देखा जाए तो महामारी से पहले के वर्षों में 10 लाख से अधिक मामले सामने आते थे। कभी-कभी ये मामले 20 लाख से भी अधिक की संख्या में दर्ज होते थे।कोविड के बाद के वर्षों में यह संख्या घटकर हर साल 5 लाख से कम रही है।

बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश उन राज्यों में शामिल हैं जहाँ हर साल कुत्ते काटने के सबसे अधिक मामले दर्ज होते हैं। इन राज्यों में हर वर्ष लाखों की संख्या में मामले सामने आते हैं।

महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे राज्यों के आँकड़े अपेक्षाकृत कम हैं। लेकिन फिर भी हर साल आँकड़े 6 अंकों में दर्ज होते हैं। यह बताता है कि भारत का कोई भी हिस्सा इस परेशानी से अछूता नहीं है।

2024 में सबसे अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश से 1,42,953, उत्तर प्रदेश से 1,64,009, असम से 1,66,232, ओडिशा से 1,66,790, आंध्र प्रदेश से 2,45,166, बिहार से 2,63,925, कर्नाटक से 3,61,306, गुजरात से 3,92,652, तमिलनाडु से 4,80,425 और महाराष्ट्र से 4,85,349 मामले मिले हैं।

यह संकट केवल बड़े राज्यों तक ही सीमित नहीं है। छोटे राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में भी आवारा कुत्तों की समस्या काफी विकट है। उदाहरण के लिए, असम ने वर्ष 2024 में 1,66,000 से अधिक कुत्ते काटने के मामले दर्ज किए। वहीं केरल में पिछले एक दशक में हर साल 1,00,000 से अधिक मामले सामने आए हैं। ये बताता है कि यह समस्या किसी क्षेत्र विशेष की सीमाओं से ऊपर है।

इन आँकड़ों के लिहाज से भारत में लक्षद्वीप एकमात्र अपवाद है, जहाँ एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। वहीं, दूसरी ओर देश के अन्य हिस्सों में लाखों मामले हैं। यह बताता है कि सुनियोजित और निर्णायक प्रशासनिक उपाय सार्वजनिक स्वास्थ्य के परिणामों को पूरी तरह बदल सकते हैं।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। खबर को इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

झारखंड के 1 आदमी ने राजस्थान में 454 हिंदुओं को बना दिया ईसाई, रजिस्टर में दर्ज कर रखा था सबका डिटेल: बोला- धर्म परिवर्तन का मिलता है टारगेट, मिलती है सैलरी

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में धर्मांतरण गिरोह का खुलासा हुआ है। यहाँ चेन्नई की फ्रेंड्स मिशनरी प्रेयर बैंड (FMDB) सक्रिय है, जो हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई में परिवर्तित करती है। पकड़े गए आरोपित पौलुस बारजो ने बताया कि वह 11 साल में 454 हिंदुओं को ईसाई बना चुका है।

पौलुस बारजो श्रीगंगानगर में FMDB मिशनरी का इंचार्ज है। मिशनरी से उसे हर साल 20 लोगों के धर्मांतरण का टारगेट मिलता था। इसके लिए उसे 9 हजार रुपए महीना और अन्य लाभ दिए जाते थे। बारजो शादी का झाँसा देकर धर्मांतरण करवाता था। इस गिरोह में उसके साथ बाप-बेटे विनोद और आर्यन भी शामिल हैं।

पीड़ित संदीप की शिकायत पर मामला आया सामने

श्रीगंगानगर में धर्मांतरण गिरोह के सक्रिय होने का खुलासा तब हुआ जब अनूपगढ़ थाना क्षेत्र के रहने वाले संदीप ने धर्म परिवर्तन की शिकायत पुलिस से की। शिकायत में संदीप ने बताया कि अनूपगढ़ रेलवे स्टेशन के पास वह बाइक स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर गया था। यहाँ दुकान मालिक आर्यन और उसके बाप विनोद ने संदीप से शादी के बारे में पूछा। फिर शादी का झाँसा देकर मिशनरी के इंचार्ज पैलुस बारजो से मिलवाया।

संदीप ने आगे बताया कि 20 दिन पहले पौलुस बारजो ने उसे ईसाई धर्म में परिवर्तित होने का लालच दिया और कहा- “अगर तुम ईसाई धर्म अपना लेते हो तो प्रभु तुम से खुश हो जाएँगे और तुम्हारी शादी हो जाएगी।” इसके बाद बारजो ने नहर के पानी में डुबकी लगवाकर संदीप को ईसाई बना दिया।

पीड़ित संदीप ने कहा कि इसके बाद बारजो ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। बारजो उससे लगातार बाकी हिंदुओं को भी ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का दबाव बनाने लगे। इससे तंग आकर संदीप ने पुलिस और विश्व हिंदू परिषद से शिकायत की।

पौलुस बारजो का धर्मांतरण गिरोह

संदीप की शिकायत पर पुलिस ने 47 वर्षीय पौलुस बारजो और आर्यन को पूछताछ के लिए बुलाया। पूछताछ में बारजो ने 454 हिंदुओं का धर्मांतरण करवाने की बात कबूल कर ली। पुलिस को उसके पास से रजिस्टर भी मिला है, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों का पूरा डाटा है। बारजो के मकान का किराया, खाना, प्रार्थना सभा, आने-जाने का खर्च, बच्चों की स्कूल फीस भी मिशनरी ही देता है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, धर्मांतरण के लिए बारजो बीमार और गरीब हिंदू परिवारों को निशाना बनाता है। उन्हें प्रलोभन से ईसाई धर्म में बदलता है। अब तक बारजो ने जितने भी धर्मांतरण किए है, वे सभी पहले हिंदू ही थे। धर्मांतरण के लिए बारजो ने गैंग बनाया हुआ है।

अनूपगढ़ क्षेत्र में श्यामलाल और सुरजीत नाम के दो लोगों को काम पर लगाया हुआ है। इन लोगों ने गाँव-गाँव में अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं, जो हिंदू लोगों का ब्रेनवॉश कर धर्मांतरण का टारगेट पूरा करते हैं। ये सब भी हिंदू से ईसाई में धर्म परिवर्तन कराए हुए है। इस गिरोह में महिलाएँ भी शामिल हैं।

पौलुस बारजो ने 30 साल पहले कराया धर्मांतरण

पौलुस बारजो ने बताया कि वह झारखंड के कटिंगगेल गाँव का रहने वाला है। उसका मूल धर्म हिंदू ही है। वह 30 साल पहले 1995 में ईसाई बना था। बारजो का बड़ा भाई भी ईसाई बन गया है। बारजो ने धर्मांतरण करवाने के बाद ही 2003 में FMDB मिशनरी से जुड़ा।

FMDB से जुड़ने के लिए बारजो ने इंटरव्यू दिया। इसमें पास होने के बाद उसे झाँसी में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। एक साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद सबसे पहले राजस्थान के सीकर जिले में धर्मांतरण के काम का अंजाम देना शुरू किया।

इसके बाद 2008 में बारजो अनूपगढ़ आया और 2016 में चला गया। इस दौरान कई अन्य राज्यों में घूमा। फिर 2022 में अनूपगढ़ वापस आया और मिशनरी का इंचार्ज बन धर्मांतरण गिरोह चलाने लगा। फिलहाल वह विनोद के घर पर रहता था।

विश्व हिंदू परिषद ने की कार्रवाई की माँग

मामला सामने आने के बाद विश्व हिंदू परिषद ने कार्रवाई की माँग की है। संगठन के जिला मंत्री कृष्ण राव ने कहा कि पौलु बारजो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करवा रहा है। राव ने कहा कि इसके अलावा हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया।

जिला मंत्री ने कहा कि संदीप ने हिम्मत दिखाते हुए पुलिस से शिकायत की, अब संगठन पुलिस प्रशासन से मामले में कठोर कार्रवाई की माँग करता है।

धर्मांतरण के खिलाफ राजस्थान सरकार लाई सख्त कानून

राजस्थान की बीजेपी सरकार ने धर्मांतरण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। सरकार धर्मांतरण के खिलाफ नया बिल लाई है। यह बिल ‘राजस्थान विधि-विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध विधेयक-2025’ विधानसभा में पारित हो गया है। अब इसे राज्यपाल और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

इस बिल के तहत जबरन धर्मांतरण करवाने पर उम्रकैद और अवैध धर्मांतरण कराने पर 14 साल की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ₹5 लाख रुपए तक का जुर्माना भी भुगतना पड़ सकता है।

PM मोदी का बर्थडे पर रिटर्न गिफ्ट: MP के धार से ‘स्वस्थ नारी सशक्त परिवार’ और ‘माँ की बगिया’ योजना की शुरुआत की, PM-MITRA पार्क का किया भूमि पूजन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर 17 सितंबर 2025 को मध्य प्रदेश के धार जिले का दौरा किया। इसमें पीएम मोदी ने महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ‘स्वस्थ नारी सशक्त परिवार’ और ‘आठवें राष्ट्रीय पोषण माह’ अभियान का शुभारंभ किया। यह अभियान देश में अब तक का सबसे बड़ा स्वास्थ्य अभियान है, जिसके तहत 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक पूरे देश में लाखों स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएँगे।

महिलाओं और बच्चों के लिए सबसे बड़ा अभियान शुरू

जानकारी के अनुसार, देशभर में 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक एक लाख से ज्यादा स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएँगे। इन शिविरों में महिलाओं और बच्चों की विशेष जाँच की जाएगी। कैंपों में एनीमिया, टीबी, सिकल सेल और अन्य बीमारियों की जाँच की व्यवस्था होगी। मातृत्व, पोषण, टीकाकरण, और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी जागरूकता फैलाई जाएगी।

प्रधानमंत्री ने मातृ वंदना योजना के तहत देशभर की करीब 10 लाख महिलाओं के खातों में सीधे पैसा ट्रांसफर किया। यह आर्थिक मदद माताओं के पोषण और देखभाल को सुनिश्चित करने के लिए दी गई है।

‘सुमन सखी’ चैटबॉट और सिकल सेल कार्ड का वितरण

गर्भवती महिलाओं को जानकारी देने के लिए ‘सुमन सखी’ चैटबॉट लॉन्च हुआ। पीएम मोदी मध्य प्रदेश के लिए एक करोड़वां ‘सिकल सेल स्क्रीनिंग कार्ड’ भी वितरित करेंगे, जिससे इस बीमारी के खिलाफ देश की लड़ाई को नई दिशा मिली है।

पीएम मोदी ने जनजातीय क्षेत्रों में सेवाभाव से काम करने के लिए ‘आदि सेवा पर्व’ की शुरुआत की। इस अभियान में शिक्षा, पोषण, जल संरक्षण और रोजगार जैसे विषयों पर फोकस किया। ‘ग्राम विजन 2030’ योजना के तहत हर जनजातीय गाँव के लिए अलग विकास का रोडमैप बनेगा।

पीएम मित्रा पार्क से खुले रोजगार के नए रास्ते

प्रधानमंत्री मोदी धार में 2,150 एकड़ में बने ‘पीएम मित्रा टेक्सटाइल पार्क‘ का उद्घाटन किया। इस पार्क में 23000 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश प्रस्ताव मिला। इससे करीब 3 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। किसानों को उनकी कपास की बेहतर कीमत भी मिलेगी।

‘माँ की बगिया’ योजना से महिलाओं को नई पहचान

पीएम मोदी ने ‘एक बगिया माँ के नाम’ पहल के तहत महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य को पौधा भेंट किया। मध्य प्रदेश की 10,000 से ज्यादा महिलाएँ अब ‘माँ की बगिया’ विकसित करेंगी। यह योजना पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण दोनों को जोड़ती है।

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा न सिर्फ योजनाओं की घोषणाओं तक सीमित रहा, बल्कि यह स्वास्थ्य, रोजगार, जनजातीय उत्थान और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित होगा। धार की धरती से देश के कोने-कोने तक बदलाव की नई लहर पहुँचेगी।