
दिल्ली की कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि उद्योगपति गौतम अडानी और अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के खिलाफ बिना सबूत वाले निराधार कंटेट और आर्टिकल को तमाम प्लेटफॉर्म्स से हटाने का निर्देश दिया था। लेकिन प्रोपेगेंडा पत्रकारों ने जोर देकर कहा कि सरकार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही है। जबकि आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि चूँकि प्रकाशक सत्र न्यायालय द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहे, इसलिए सरकार द्वारा सामग्री हटाने का नोटिस जारी किया गया।

कोर्ट ने मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया
कोर्ट के आदेश की वास्तविकता उससे अलग है, जो दिखाई जा रही है। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट के जस्टिस अनुज कुमार सिंह ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम परंजॉय गुहा ठाकुरता एवं अन्य के मामले में अंतरिम आदेश दिया था। इसमें पत्रकारों परंजॉय गुहा ठाकुरता, रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, आयुष जोशी और अन्य को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) के खिलाफ मानहानि वाली सामग्री प्रकाशित करने से रोक दिया गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट, लेखों और वीडियो से ‘गलत, असत्यापित और प्रथम दृष्टया मानहानिकारक’ सामग्री हटाई जानी चाहिए। यदि तुरंत हटाना संभव न हो, तो 5 दिनों के भीतर सोशल मीडिया से कंटेंट, वीडियो, ट्वीट वगैरह हटाना सुनिश्चित करें। सरकार ने 16 सितंबर को मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश तभी जारी किया जब सोशल मीडिया पर इसे 5 दिन में हटाने के अदालती आदेश के बावजूद नहीं हटाया गया।
अदालत के समक्ष अडानी की दलीलें
अडानी एंटरप्राइजेज ने अपनी याचिका में दलील दी कि कुछ पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क ने कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया है, निवेशकों को अरबों का नुकसान हुआ है और भारत के बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं में बाधा डाली है। इसने आगे कहा गया कि ये प्रतिवादी “भारत-विरोधी हितों” से जुड़े हुए थे और घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों परियोजनाओं में बाधा डाल रहे हैं।
न्यायालय ने अपने आदेश में पाया कि AEL ने प्रथम दृष्टया निषेधाज्ञा का मामला बनाया था। हालाँकि न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार किया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि असत्यापित, निराधार और मानहानिकारक रिपोर्टिंग जारी नहीं रह सकती।
राजेंद्रन ने एक और पोस्ट डाल कर वकील इंदिरा जयसिंह के उस बयान को दोहराया, जिसमें उन्होंने कहा था, “प्रतिवादियों ने आदेश के विरुद्ध अपील दायर की है, जिसका उन्हें अधिकार है। न्यायालय जानता है कि अपने आदेशों का क्रियान्वयन कैसे करना है, इसलिए उन्हें मंत्रालय की आवश्यकता नहीं है। मंत्रालय न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल रहा है।”

वास्तव में जब कोई कोर्ट कोई आदेश जारी करता है, तो सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इसकी जानकारी देती है और इसका पालन करने के लिए बाध्य करती है। इस मामले में भी यही हुआ। कोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए मंत्रालय ने संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मानहानिकारक सामग्री हटाने का निर्देश दिया। ये कहना गलत होगा कि मंत्रालय कोर्ट के आदेश का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए ‘उपयोग’ कर रहा है।


