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PM मोदी की माँ का AI वीडियो सोशल मीडिया से तुरंत हटाने के आदेश, पटना HC ने कॉन्ग्रेस को लगाई डाँट: कहा- देरी होने पर लेंगे एक्शन

पटना हाईकोर्ट ने बुधवार (17 सितंबर 2025) को एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने कॉन्ग्रेस पार्टी को सख्त हिदायत दी है कि वो पीएम नरेंद्र मोदी की माँ हीराबेन मोदी का AI जेनरेटेड वीडियो तुरंत सोशल मीडिया से हटा दे। ये वीडियो बिहार कॉन्ग्रेस ने पोस्ट किया था, जिसमें पीएम मोदी को सपने में अपनी माँ से डाँट खाते हुए दिखाया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पटना हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस पीबी बाजंतरी ने ये आदेश दिया। पटना हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाया। जस्टिस बीपी बाजंतरी ने कहा कि ये वीडियो तुरंत हटाओ, वरना सख्त कार्रवाई होगी।

इस मामले में बीजेपी दिल्ली इलेक्शन सेल के कन्वीनर संकेत गुप्ता ने FIR दर्ज कराई थी। FIR में भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ 18(2), 336(3), 336(4), 340(2), 352, 356(2) और 61(2) लगाई गईं। ये वीडियो पीएम की छवि खराब करने और माँ का अपमान करने के लिए बनाया गया था।

ये मामला तब शुरू हुआ जब बिहार कॉन्ग्रेस ने सोशल मीडिया पर ये वीडियो शेयर किया। वीडियो में पीएम मोदी अपनी माँ हीराबेन से राजनीति पर डाँट खा रहे हैं, जो वोट चोरी जैसे मुद्दों पर था। हीराबेन मोदी का निधन 2022 में हो गया था। इस वीडियो से बीजेपी भड़क गई। बीजेपी नेताओं ने कहा कि ये न सिर्फ पीएम की माँ का अपमान है, बल्कि पूरे देश की माताओं का भी।

इससे पहले भी बिहार के दरभंगा में कॉन्ग्रेस की वोटर अधिकार यात्रा के दौरान स्टेज से पीएम और उनकी माँ पर गालियाँ दी गई थीं। पीएम मोदी ने उस घटना पर कहा था, “मेरी माँ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। ये गालियाँ सिर्फ मेरी माँ को नहीं, बल्कि देश की हर माँ, बहन और बेटी को अपमानित करने वाली हैं। बिहार की धरती कभी माँ का अपमान बर्दाश्त नहीं करती।” उन्होंने ये भी कहा कि वो एक बार माफ कर सकते हैं, लेकिन बिहार और भारत की जनता कभी नहीं।

मोदी सरकार के प्रहार से खौफ में वामपंथी आतंकी, हथियार डालकर शांति वार्ता के लिए लिखा पत्र: शाह ने मार्च 2026 तय की है नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन, 2025 में अब तक 200+ ढेर

नक्सली संगठन CPI (माओवादी) ने पहली बार सरकार से शांति वार्ता करने और हथियार डालने की पेशकश की है। संगठन ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा है कि वो फिलहाल एक महीने के लिए अस्थायी तौर पर संघर्ष रोककर सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं।

यह कदम तब उठाया गया है, जब गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षाबलों की कड़ी कार्रवाई से नक्सलियों को बड़ा नुकसान हुआ है, जिससे वे बातचीत के लिए मजबूर हुए हैं।

नक्सलियों के पत्र में क्या लिखा है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नक्सली संगठन के प्रवक्ता ‘अभय’ ने 15 अगस्त 2025 को जारी एक प्रेस नोट में कहा कि वो फिलहाल के लिए हथियारबंद संघर्ष को रोकना चाहते हैं और शांति वार्ता के लिए तैयार हैं। अभय ने अपने पत्र में लिखा कि बीते महीनों में लगातार मुठभेड़ों में उसके कई बड़े नेता मारे गए हैं। बसवराजू जैसे शीर्ष नेता समेत केंद्रीय कमेटी के 7 सदस्य इस साल मारे गए। अब संगठन शांति चाहता है।

नक्सली संगठन का सरकार को पत्र, लिखा- हथियार डालकर शांति वार्ता को तैयार

पत्र में यह भी कहा गया है कि वे सरकार से बातचीत करने के लिए एक महीने का समय चाहता हैं ताकि वो अपने देश भर के नेताओं और कार्यकर्ताओं, खासकर जेल में बंद साथियों से इस बारे में सलाह-मशविरा कर सकें। नक्सलियों ने कहा कि अगर सरकार चाहे तो वे वीडियो कॉल पर भी बात करने के लिए तैयार हैं।

पत्र में यह भी लिखा है कि भविष्य में वे राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लोगों के हक के लिए लड़ेंगे। हालाँकि, छत्तीसगढ़ पुलिस इस पत्र की सच्चाई की जाँच कर रही है और कहा है कि बातचीत पर कोई भी फैसला सरकार ही लेगी।

अमित शाह की डेडलाइन और 2024-25 तक मारे गए नक्सलियों की संख्या

गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का ऐलान किया था। अमित शाह ने कहा था कि अब समय आ गया है कि इस समस्या पर आखिरी प्रहार किया जाए। इसके बाद से ही सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज कर दिया है।

साल 2024 और 2025 में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में काफी तेजी आई है। इस दौरान सुरक्षाबलों ने बड़ी संख्या में नक्सलियों को मार गिराया है, जबकि कई ने डर से आत्मसमर्पण कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया। इसके अलावा, 1090 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया।

इस साल, सुरक्षाबलों ने 200 से ज्यादा नक्सलियों को मार गिराया है, जिनमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं। वहीं 104 को गिरफ्तार किया गया है और 164 ने आत्मसमर्पण किया है। हाल ही में, 21 मई 2025 को 27 नक्सली मारे गए थे, जिसमें 1.5 करोड़ का इनामी बसवा राजू भी था।

इससे पहले भी कई बड़े ऑपरेशन हुए, जिनमें कई टॉप नक्सली नेताओं का खात्मा हुआ। माना जा रहा है कि इन लगातार हो रही कार्रवाईयों ने ही नक्सलियों को हथियार डालने के लिए मजबूर किया है।

पिछले 15 महीनों में, कुल मिलाकर 400 से ज़्यादा नक्सली मारे गए हैं, जिनमें कई बड़े कमांडर भी शामिल हैं। गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में चलाई जा रही ‘जीरो टॉलरेंस‘ नीति के कारण इन ऑपरेशनों को बड़ी सफलता मिली है।

नक्सली हिंसा में कमी

सरकार की कड़ी कार्रवाई के कारण नक्सली हिंसा में भी कमी आई है। 2004 से 2014 के बीच जहाँ 16,463 हिंसक घटनाएँ हुई थीं। वहीं, मोदी सरकार आने के बाद 2014 से 2024 के बीच यह संख्या 53% घटकर 7,744 रह गई।

इसी दौरान सुरक्षाबलों की मौत में 73% और नागरिकों की मौत में 70% की कमी आई है। 2014 में जहाँ 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, 2024 में यह संख्या घटकर केवल 12 रह गई है।

सरकार की शर्त

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने पहले ही साफ कर दिया था कि सरकार किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन उसकी कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। विजय शर्मा ने कहा था कि अगर नक्सली मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं तो उन्हें भारतीय संविधान को मानना होगा, क्योंकि बिना संविधान को माने कोई भी बातचीत बेमतलब होगी।

राहुल गाँधी ने ‘वोट चोरी’ के प्रेजेंटेशन में दिखाई न्यूजलॉन्ड्री की प्रोपेगेंडा रिपोर्ट, जाने इसे लिखने वाले हिंदू-विरोधी विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल की पूरी कुंडली

कॉन्ग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर बेबुनियाद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाकर उसे ‘मुद्दा’ बनाने की कोशिश करती है, जबकि उसके समर्थक प्रोपेगेंडा चैनल अपने राजनीतिक आकाओं के दावों को ‘विश्वसनीय’ बताते हुए झूठे तथ्यों का प्रचार-प्रसार करते हैं।

पत्रकार विजय पटेल ने इस सांठगांठ को उजागर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हाल ही में पोस्ट डाला है। इसमें बताया गया है कि कैसे राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस का ‘वोट चोरी‘ प्रचार अभियान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और हिन्दू विरोधियों के हाथों में इसकी डोर है।

कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी की 7 अगस्त को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई गई ‘वोट चोरी’ पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन पहले ही सवालों के घेरे में आ चुकी है, लेकिन हालिया खुलासे चुनावी धोखाधड़ी के उनके दावों को और कमजोर कर देते हैं। गाँधी को न केवल ‘वोट चोरी’ प्रेजेंटेशन के कारण, बल्कि वामपंथी प्रचारक न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित हिटजॉब्स पर उनकी निर्भरता के कारण भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

ये प्रोपेगैंडा लेख कट्टर हिंदू-विरोधी लोगों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें से एक की पहचान विशाल वैभव के रूप में हुई है। ये लोग चुनाव आयोग के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

विवादास्पद पीपीटी के चौथे पेज पर, राहुल गाँधी ने दावा किया, “महाराष्ट्र के नतीजों ने बड़े पैमाने पर वोट चोरी के हमारे संदेह की पुष्टि की है।” पीपीटी में न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट का शीर्षक है, “नए मतदाताओं की बाढ़? कामठी का अजीबोगरीब मामला, जहाँ महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख जीते।”

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री के प्रचार लेखों का सहारा लेना, उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता को दर्शाता है। हालाँकि यह बात सामने आई है कि न्यूज़लॉन्ड्री के पत्रकार विशाल वैभव हिंदू विरोधी हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया यूजर्स पर ‘गौमूत्र’, ‘cowf&kers’ और ‘D%kless Hindutva’ जैसे तंज कसते हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री पर ऑथर पेज के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि एक्स अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब मौजूद नहीं है। इसमें हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन दिख जाएँगे।

शायद, न्यूज़लॉन्ड्री के प्रोपेगैंडा फैक्ट्री का हिस्सा बनने के लिए हिंदुओं को ‘गाली देना’ अनिवार्य पात्रता है। राहुल गाँधी ने अपनी वोट चोरी वाले पीपीटी में जिस न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्टर की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात की, अब उसके बारे में बात करते हैं। उसका कॉन्ग्रेस पार्टी से पुराना नाता रहा है। सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक की ऑनर और संचालक विवादास्पद कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर है।

ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे सीपीआर विदेशी फंडिंग मानदंडों के उल्लंघन के लिए जाँच के घेरे में रहा है और केंद्र सरकार ने इसका लाइसेंस निलंबित कर दिया था। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च पर सितंबर 2022 में आयकर छापे पड़े थे। जुलाई 2023 में अय्यर के सीपीआर को टैक्स छूट मिलना भी बंद हो गया।

मित्तल इंडियास्पेंड (IndiaSpend) पोर्टल के साथ काम कर चुके हैं। इंडियास्पेंड कॉन्ग्रेस पार्टी की वैचारिक विचारधारा से सबसे ज़्यादा जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, कॉन्ग्रेस पार्टी के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती इंडियास्पेंड के संस्थापक ट्रस्टी हैं। हालाँकि, इंडियास्पेंड की वेबसाइट में उनका नाम नहीं है। ऑपइंडिया ने कई मौकों पर इंडियास्पेंड के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी झूठों का पर्दाफ़ाश किया है। इंडियास्पेंड ने पहले भी अपने डेटाबेस में मुस्लिम पीड़ितों की संख्या बढ़ाने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। कई मामलों में ऐसा देखा गया है।

न्यूज़लॉन्ड्री की वरिष्ठ रिपोर्टर सुमेधा मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा-विरोधी और इस्लाम-समर्थक प्रोपोगेंडा आउटलेट्स में भी काम किया है।

दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2021 से सितंबर 2022 के बीच, सुमेधा मित्तल ने मोदी विरोधी और कुख्यात शासन विरोधी जॉर्ज सोरोस की क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) में काम किया। OCCRP को अमेरिकी विदेश विभाग और अब भंग हो चुकी अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) से भारी मात्रा में धन प्राप्त हुआ। OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF), फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन और रॉकफ़ेलर ब्रदर्स फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि OCCRP ने व्यवसायी गौतम अडानी और सेबी के खिलाफ़ हिटजॉब्स प्रकाशित किए थे। OCCRP भारतीय लोकतंत्र को कमज़ोर करने के लिए बार-बार दुष्प्रचार भी करता रहा है। भारत में ‘वोट चोरी’, म्यांमार में डेटा संकलन, झूठ और भ्रामक सूचनाओं को ‘ज़बरदस्त’ खुलासे के रूप में प्रस्तुत किया गया

कॉन्ग्रेस पार्टी राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ पीपीटी के साथ एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश कर रही थी। इस बीच से बात सामने आयी कि ये दस्तावेज म्यांमार में तैयार किए गए थे। ‘वोट चोरी’ वेबसाइट पर अपलोड की गई पीडीएफ फाइलों के मेटाडेटा विश्लेषण से पता चला कि राहुल गाँधी की प्रस्तुति के तीनों संस्करण म्यांमार मानक समय (एमएमटी) में बनाए गए हैं। कॉन्ग्रेस नेताओं और आईटी सेल ने इन आरोपों को हालाँकि खारिज किया, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर संदेह जताने के लिए कॉन्ग्रेस ने न्यूज़लॉन्ड्री के लेखों का सहारा लेना, अपने आप में उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है। हालाँकि, यह सामने आया है कि न्यूज़लॉन्ड्री के लेखक, विशाल वैभव, एक कट्टर हिंदू विरोधी रहे हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर ‘गौमूत्र’, ‘गाय-बकरियों’ और ‘गधा हिंदुत्व’ जैसे व्यंग्य करते रहते हैं। न्यूज़लॉन्ड्री पर उनके लेखक पृष्ठ के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि X अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब “मौजूद नहीं है”, लेकिन उनके बेहद विक्षिप्त और हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन सामने आए हैं।

राहुल गाँधी द्वारा अपने वोट चोरी पीपीटी में उद्धृत न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्ट्स की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात करें तो उनका न केवल एक वैचारिक पूर्वाग्रह है, बल्कि कॉन्ग्रेस पार्टी से उनका पुराना संबंध भी है।

सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक का स्वामित्व और संचालन विवादास्पद कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर के पास है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च सितंबर 2022 में आयकर छापों का विषय रहा है। जुलाई 2023 में अय्यर के थिंक टैंक की कर छूट की स्थिति भी रद्द कर दी गई थी। मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा विरोधी और इस्लाम समर्थक प्रचार आउटलेट में भी योगदान दिया है।

राहुल गाँधी की वोट चोरी के दस्तावेजों का म्यांमार में तैयार किया जाना आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उनका करियर विदेशी ताकतों की संलिप्तता से जुड़े विवादों में घिरा रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, रहस्यमयी विदेश यात्राएँ, विदेशी अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकें, कज़ाकिस्तान, रूस और इंडोनेशिया के रोबोट द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्रभाव अभियान, और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का आह्वान किया जाना, इसकी पुष्टि करते हैं।

22 पेज वाली वोट चोरी की इस पीपीटी में कॉन्ग्रेस पार्टी ‘हम हारे नहीं हैं, हमें हरा दिया गया है’ साबित करने की कोशिश करती रही। हालाँकि ऑपइंडिया ने बताया है कि कैसे चुनाव आयोग ने हर आरोप का खंडन किया, चाहे वह मतदाता पंजीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में गड़बड़ी हो, मतदान प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करना हो या राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए डिजिटल मतदाता सूची को साझा करने से चुनाव आयोग का साफ इनकार हो।

दस्तावेज़ के पेज 8 पर, गाँधी ने यह आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र के आँकड़ों को छिपा रहा है ताकि ‘वोट चोरी’ का पता नहीं चल पाए, लेकिन उनकी टीम ने बड़ी मेहनत से इसकी जाँच की है। हालाँकि, चुनाव आयोग के इस पेज में 30 एंट्री हैं और महादेवपुरा में मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 6 लाख है। इसका सीधा अर्थ यह है कि गाँधी के दावों के विपरीत, लाखों नहीं, बल्कि केवल 20,000 पेज की जाँच की आवश्यकता थी। जाहिर है, आँकड़ों पर आधारित प्रचार में भी, कॉन्ग्रेस मेलोड्रामा का तड़का लगाना नहीं भूली।

यह दस्तावेज चुनिंदा मामलों से जुड़ा है, जिसमें प्रबंधन या तकनीकी समस्याएँ शामिल थीं और उन्हें ‘वोट चोरी’ के सबूत के रूप में पेश किया गया। कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं की उपेक्षा का इतिहास रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी अब सरासर झूठ और वैचारिक रूप से पक्षपातपूर्ण प्रचार करने वालों पर निर्भर है और तुच्छ राजनीतिक फायदे के लिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

4 बंडल दस्तावेज, ₹1000 करोड़ का लेनदेन: छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में ED ने पेश की 7000 पन्नों की चार्जशीट, भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को बताया ‘सिंडिकेट का प्रमुख हैंडलर’

छत्तीसगढ़ के शराब घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। रायपुर की विशेष अदालत में ED ने 4 बंडलों में कुल 7000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी निवेश और राजनीतिक नेटवर्किंग से जुड़े आरोपों को शामिल किया गया है।

ED का दावा है कि चैतन्य को शराब घोटाले की ब्लैक मनी से ₹16.70 करोड़ मिले। इसे उसने रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में निवेश कर वैध दिखाने की कोशिश की। इसके अलावा घोटाले के लिए सिंडिकेट बनाकर कुल ₹1000 करोड़ का लेनदेन किया।

ED ने 18 जुलाई 2025 को चैतन्य को उनके भिलाई स्थित घर से गिरफ्तार किया था। अभी वह जेल में हैं। यह शराब घोटाला वर्ष 2019 से 2022 के बीच कॉन्ग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुआ।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ED के ये सभी आरोप लक्ष्मी नारायण बंसल उर्फ पप्पू बंसल के बयान पर आधारित हैं। बंसल ने ED को बताया कि उन्होंने चैतन्य के साथ मिलकर शराब घोटाले से ₹1,000 करोड़ बनाए और काले धन को सफेद करने की कोशिश की।

शराब घोटाले से राज्य को हुआ ₹2,161 करोड़ का नुकसान

ED का कहना है कि इस पूरे सिंडिकेट ने अपने हिसाब से आबकारी विभाग के समान ही ये तंत्र बनाया और शराब बेची। इससे राज्य को मिलने वाले राज्स्व के बजाय सिंजिकेट को फायदा हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य को कुल ₹2,161 करोड़ का नुकसान हुआ।

इस मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) भी सक्रिय हैं। दोनों एजेंसियों ने चैतन्य की सात दिन की रिमांड माँगी है, जिससे उनकी गिरफ्तारी की आशंका बढ़ गई है।

कोर्ट ने फिलहाल फैसला सुरक्षित रखा है और अगली सुनवाई 19 सितंबर 2025 को निर्धारित की गई है। चैतन्य ने गिरफ्तारी से बचने के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका लगाई थी, जिसे जस्टिस अरविंद वर्मा की एकल पीठ ने खारिज कर दिया।

सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल विवेक शर्मा ने याचिका का विरोध किया, जबकि बचाव पक्ष ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया।

ED के अनुसार, शराब घोटाले का पैसा एक नेटवर्क के जरिए चैतन्य तक पहुँचा। इस नेटवर्क में अनवर ढेबर, दीपेंद्र चावड़ा, केके श्रीवास्तव और कॉन्ग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल शामिल थे।

शराब घोटाले में सिंडिकेट का प्रमुख हैंडलर था चैतन्य बघेल

ED का आरोप है कि चैतन्य ही इस नेटवर्क का मास्टरमाइंड है। उसी ने इस घोटाले से जुड़े ₹1000 करोड़ के लेन-देन को मैनेज किया, जिसमें कई फ्रंट कंपनियों और नकद लेन-देन शामिल थे।

ED ने अपने आरोपो में ये भी बताया कि ₹18.9 करोड़ की अवैध राशि को चैतन्य की रियल एस्टेट परियोजना में निवेश किया गया। चैतन्य बघेल ने अपने रियल एस्टेट प्रोजेक्ट विट्ठल ग्रीन में 18.90 करोड़ रुपए और अपनी रियल एस्टेट फर्म मेसर्स बघेल डेवलपर्स एंड एसोसिएट्स में 3.10 करोड़ रुपए के काले धन का इस्तेमाल किया।

आरोपों की पुष्टि के लिए ED ने डिजिटल साक्ष्य, गवाहों के बयान और सौम्या चौरसिया (मुख्यमंत्री कार्यालय की पूर्व उप सचिव), ढेबर, चैतन्य और अन्य आरोपितों की व्हाट्सएप चैट को प्रस्तुत किया है।

ED के अनुसार, बंसल ने चैतन्य के कहने पर छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के कोषाध्यक्ष को बड़ी मात्रा में नकद पैसे पहुँचाए गए। मामले में एक अन्य आरोपी अग्रवाल फिलहाल फरार है।

500 साल बाद जन्मभूमि पर राम मंदिर, 500 साल बाद पावागढ़ में फहराई धर्म ध्वजा… काशी से कामाख्या तक PM मोदी ने जगाया ‘गर्व से कहो हम हिंदू है’ का गौरव बोध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (17 सितंबर 2025) अपना 75वाँ जन्मदिन मना रहे हैं। 2014 में सत्ता सँभालने के बाद उन्होंने जहाँ अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और राजनीति के क्षेत्र में कई बड़े फैसले लिए तो दूसरी और उनके कार्यकाल का एक अहम पहलू धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी रहा है।

500 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण हो या फिर पावागढ़ की पहाड़ियों पर 5 शताब्दियों बाद धर्म ध्वजा का फिर से फहराया जाना हो, इन घटनाओं ने खुद को गर्व से हिंदू बताने के गौरव बोध को फिर से जगाया है।

काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन में महाकाल लोक का निर्माण और असम की कामाख्या शक्ति पीठ का विकास जैसे कार्यों ने आस्था से जुड़े इन स्थलों को नई पहचान दी है। इन स्थलों पर जाने वाले लोगों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।

जब पीएम मोदी ने पावागढ़ में फहराई धर्म ध्वजा

राम मंदिर के संघर्ष की कहानी तो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँच गई है लेकिन पावागढ़ के काली माता मंदिर के लिए भी संघर्ष कम नहीं था। इस मंदिर पर महमूद बेगड़ा नाम के सुल्तान ने 15 वीं सदी में हमला किया था। महमूद गुजरात का छठा सुल्तान था और उसका पूरा नाम अबुल फत-नासिर-उद-दीन महमूद शाह प्रथम था। मात्र 13 साल की उम्र में सुल्तान की गद्दी पर बैठने के बाद उसने गुजरात में 52 साल राज किया।

1459-1511 ई के बीच कई लोगों ने इस सुल्तान का खूँखार रूप कई बार देखा। वह इलाकों को कब्जाने के लिए जंग लड़ता और जब जीत हासिल होती तो वहाँ के राजाओं से इस्लाम कबूल करने को कहता। जैसे ही कोई राजा इस्लाम मानने से मना करता वह उन्हें मौत के घाट उतार देता।

उसने जूनागढ़ और पावागढ़ में भी अपना कब्जा बहुत जल्दी कर लिया था। इसके बाद उसने महाकाली के मंदिर और द्वारका मंदिर को तुड़वाया। हिंदू मंदिरों पर हमले से उसका उद्देश्य साफ था कि हिंदुओं की अपने भगवान के प्रति आस्था कम हो जाए और वह इस्लाम कबूलें।

प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता

बता दें कि 15वीं शताब्दी के खूँखार इस्लामी सुल्तान ने पावागढ़ में जिस महाकाली मंदिर को अपना निशाना बनाया था उसे लेकर मान्यता है कि यहाँ पर ऋषि विश्वामित्र ने माता काली की कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा श्रीराम भगवान और माता सीता के पुत्रों ने भी पावागढ़ में ही मोक्ष प्राप्त किया था।

पावागढ़ में इस प्राचीन मंदिर के शिखर को तोड़कर एक सुल्तान ने दरगाह का निर्माण करवाया था अब वहाँ दोबारा काली माता का भव्य मंदिर बनकर गया है। पीएम मोदी ने 18 जून 2022 को 500 साल बाद यहाँ ध्वज फहराया था।

गुजरात से सोमनाथ तक अध्यात्म का उदय

मोदी सरकार में उत्तराखंड के चारधाम महामार्ग प्रोजेक्ट के जरिए चार प्रमुख तीर्थस्थलों- केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री को हर मौसम में सड़क के द्वारा जोड़ने की बड़ी योजना चल रही है। वहीं, 2013 की आपदा के बाद केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण भी पीएम मोदी की प्राथमिकताओं में रहा है। धारा 370 हटने के बाद श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर और घाटी के अन्य प्राचीन मंदिरों, शक्तिपीठों का पुनर्विकास शुरू हुआ है।

मोदी सरकार ने विश्वविद्यालयों और IITs में भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) की शुरुआत की, जिसके तहत वेद, उपनिषद, योग और आयुर्वेद को शिक्षा से जोड़ा गया है। साथ ही, अयोध्या, चित्रकूट, हंपी, कुरुक्षेत्र जैसे ‘रामायण और पीएम मोदी’ केंद्रों पर इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा गया।

बतौर प्रधानमंत्री अपने एक दशक के कार्यकाल में पीएम मोदी ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को फिर से भारत के केंद्र में ला खड़ा किया है। पीएम मोदी के उदय से सामूहिक चेतना का उद्भव हुआ है, धर्मस्थल भव्य और दिव्य हुए हैं। मोदी सिर्फ प्रधानमंत्री से अधिक एक ऐसे शख्स के तौर पर सामने आए हैं जिन्होंने ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ की भावना को नया आत्मविश्वास दिया है।

‘भगवान से खुद कुछ करने को कहो’: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति बदलने की याचिका, खजुराहो के मंदिर से जुड़ा है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर 2025) को मध्य प्रदेश के खजुराहो में जावरी मंदिर की सात फुट लंबी भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति को ठीक करने या नई लगाने की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका राकेश दालाल ने दायर की थी। उनका कहना था कि मुगल हमलों में मूर्ति का सिर टूट गया था और भक्तों को पूजा करने का हक मिलना चाहिए। लेकिन सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने याचिका सुनने से मना कर दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीजेआई ने इसे ‘पब्लिसिटी का हथकंडा’ बताया। उन्होंने कहा, “ये बस पब्लिसिटी के लिए है… जाओ, भगवान विष्णु से खुद कहो कि कुछ करें। अगर तुम उनके इतने बड़े भक्त हो, तो प्रार्थना करो, ध्यान लगाओ।”

याचिकाकर्ता के वकील ने मूर्ति की तस्वीर दिखाई और कहा कि सिर पूरी तरह बर्बाद है, इसे ठीक करना जरूरी है। लेकिन सीजेआई ने जवाब दिया कि खजुराहो मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) के जिम्मे है। उन्होंने कहा, “ये पुरातत्व की चीज है। एएसआई को तय करना है कि मूर्ति ठीक होगी या नहीं। कई सारी दिक्कतें हैं। तब तक, अगर तुम्हें शिवजी से दिक्कत नहीं, तो वहाँ जाकर पूजा कर लो। खजुराहो में शिव का बहुत बड़ा लिंगम है, सबसे बड़े में से एक।” बेंच ने याचिका फौरन खारिज कर दी।

याचिका में लिखा था कि केंद्र के गृह मंत्री और एएसआई को कई बार चिट्ठी लिखी गई, लेकिन जवाब मिला कि मूर्ति बदलना संरक्षण नियमों के खिलाफ है। एएसआई के सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट ने कहा कि खजुराहो मंदिरों की देखभाल उनकी जिम्मेदारी है और टूटी मूर्ति को नई से बदलना नियमों में नहीं है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे भक्तों के पूजा के हक का हनन हो रहा है। उन्होंने विरोध, ज्ञापन और अभियानों का जिक्र किया, जो बेकार गए। लेकिन कोर्ट ने इसे हक का मसला नहीं माना।

सीजेआई का बयान सोशल मीडिया पर तूफान मचा रहा है। लोग गुस्से में हैं कि कोर्ट ने हिंदू भक्तों की भावनाओं का मजाक बनाया। कईयों का कहना है कि देवता से पूछने वाला तंज अपमानजनक है।

शशांक शेखर झा ने ट्वीट किया, “हिंदुस्तान में एक हिंदू भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति ठीक करने की गुहार लगाता है। सुप्रीम कोर्ट में मामला जाता है। सीजेआई, जो खुद को नियो-बौद्ध कहते हैं, न सिर्फ मदद करने से मना करते हैं, बल्कि भक्त की आस्था का मजाक उड़ाते हैं। मैं मध्य प्रदेश के सीएम @DrMohanYadav51 से मूर्ति ठीक करने की अपील करता हूँ।”

एडवोकेट विनीत जिंदल ने लिखा, “इससे अधिक शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता कि देश के माननीय CJI भगवान के संदर्भ में इस प्रकार की टिप्पणी करें। जो व्यक्ति सभी धर्मों को सम्मान देने की बात करते हैं, क्या वे किसी अन्य धर्म विशेष के संदर्भ में इस तरह के शब्द कह सकते हैं? निश्चित ही नहीं। आदेश देना उनका अधिकार है, लेकिन भगवान का अपमान सहन नहीं किया जाएगा, चाहे वह देश का मुख्य न्यायाधीश ही क्यों न हो। माननीय CJI को देश के करोड़ों हिंदुओं से क्षमा माँगनी चाहिए और अपने इन मौखिक शब्दों को तत्काल वापस लेना चाहिए।”

इन ट्वीट्स से साफ है कि लोग खफा हैं। कई यूजर्स कह रहे हैं कि कोर्ट को धार्मिक मामलों में संवेदनशील होना चाहिए। मध्य प्रदेश के सीएम से हस्तक्षेप की माँग तेज हो रही है। जानकारों का कहना है कि एएसआई के नियम सख्त हैं, लेकिन भक्तों की आस्था को भी देखना चाहिए। ये मामला अब सियासी रंग ले सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर कराने के दावे की पोल पाकिस्तान के डिप्टी PM ने खोली, कहा- भारत ने ठुकरा दिया था अमेरिका का प्रस्ताव

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों बार-बार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाई। वे कहते हैं कि उन्होंने दोनों देशों को धमकी दी थी कि अगर जंग नहीं रुकी तो व्यापार बंद कर देंगे। लेकिन अब पाकिस्तान के ही विदेश मंत्री इशाक डार ने ट्रंप की पोल खोल दी है। डार ने साफ कहा कि भारत ने कभी किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं मानी। सब कुछ द्विपक्षीय था, यानी सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच।

पाकिस्तान के डिप्टी पीएम और विदेश मंत्री इशाक डार ने अल जजीरा को इंटरव्यू में ट्रंप के दावे को झूठा साबित कर दिया। डार ने कहा, “हम तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के खिलाफ नहीं, लेकिन भारत ने हमेशा कहा कि ये द्विपक्षीय मुद्दा है।”

डार ने बताया कि मई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने युद्धविराम का प्रस्ताव दिया था। रुबियो ने कहा था कि किसी तीसरी जगह पर बातचीत होगी, लेकिन 25 जुलाई को वॉशिंगटन में रुबियो से मिले तो रुबियो से उन्होंने भारत से बात के बारे में पूछा। इस पर रुबियो ने जवाब दिया, “भारत ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। भारत ने कहा कि ये उनका द्विपक्षीय मामला है।”

डार ने जोड़ा, “हम किसी से भीख नहीं माँग रहे। पाकिस्तान शांति चाहता है। डायलॉग ही रास्ता है, लेकिन बातचीत दोनों तरफ से हो। अगर भारत तैयार हो तो हम बात करने को तैयार हैं।” डार ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका से कोई मदद नहीं माँगी।

हालाँकि डार ये कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने मदद नहीं माँगी, लेकिन भारत ने साफ कहा है कि पाकिस्तान ने पहले घुटने टेके और ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारतीय समकक्ष से गुहार लगाई थी। खैर, दावे अमेरिका की तरफ से भी हुए, पाकिस्तान की तरफ से भी। लेकिन हकीकत क्या है, ये सारी दुनिया देख चुकी है। भारत ने पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर में न सिर्फ पंगु कर दिया था, बल्कि उसकी हवाई रक्षा प्रणाली को पंगु करते हुए अंदर तक जोरदार हमले किए। अभी तक पाकिस्तान के सभी एयरबेस ऑपरेशन नहीं हो पाए हैं।

बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप लगातार दावा करते रहे हैं कि अमेरिका की मध्यस्थता से दोनों देशों ने पूर्ण युद्धविराम कर लिया। ट्रंप कहते रहे हैं, “मैंने दो न्यूक्लियर देशों की जंग रोकी। लाखों लोग मर सकते थे।” ट्रंप ने दावा किया था कि व्यापार की बात करके भारत को मनाया। लेकिन भारत ने हमेशा इनकार किया।

अब डार के बयान ने सबकुछ साफ कर दिया है। डार का बयान ट्रंप के लिए बड़ा झटका है। पहले पाकिस्तान ने ट्रंप के दावे का समर्थन किया था, लेकिन अब डार ने पलट दिया। भारत ने हमेशा कहा कि आतंकवाद पर बात होगी, लेकिन कश्मीर को अलग मुद्दा बनाना गलत। व्यापार या मध्यस्थता का कोई लिंक नहीं।

गौरतलब है कि 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोग मारे गए थे, जिसमें अधिकतर हिंदू पर्यटक थे। भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान और PoK में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नौ कैंपों को निशाना बनाया। पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की और हवाई झड़पें हुईं। जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाँच पाकिस्तानी लड़ाकू विमान गिराए।

‘मस्जिद, मदरसा, दरगाह के पास गरबा खेलना मना है’: गुजरात के एक गाँव में बोर्ड लगाकर सुनाया फरमान, हिंदू संगठनों के विरोध के बाद हरकत में आई पुलिस

गुजरात के खेड़ा शहर के मातर तालुका स्थित नानी भागोल गाँव में मस्जिद के पास एक बोर्ड लगाया गया, जिस पर विवाद हो गया है। बोर्ड में लिखा गया कि नानी भागोल हुसैनी चौक पर दरगाह, मस्जिद और मदरसों के आसपास गरबा खेलने पर मनाही है। बोर्ड लगाए जाने के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया।

हिंदू संगठन ने इस विवादित बोर्ड को संविधान के विरुद्ध बताते हुए पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज करवाई। मामला पुलिस तक पहुँचा तो मुस्लिमों ने बोर्ड को हटाने के बजाए उस पर तुरंत काला रंग पोत दिया। पुलिस ने मामले में FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए जिला बजरंग दल संयोजक केयूर पटेल ने बताया कि यह पूरा मामला खेड़ा जिले के मातर तालुका के नानी भागोल गाँव का है। सोमवार (15 सितंबर 2025) की सुबह हिंदू संगठन को जानकारी मिली की नानी भागोल के हुसैनी चौक पर गरबा न करने से संबंधित विवादित बोर्ड लगाया गया है। इस पर स्थानीय कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया।

पटेल के मुताबिक, यह बोर्ड स्थानीय मस्जिद समिति ने एक निजी जमीन की दीवार पर लगाया था। घटना की जानकारी मिलते ही हिंदू संगठन ने विरोध-प्रदर्शन कर कार्रवाई की माँग की। संगठन के कार्यकर्ताओं ने मातर थाने के पुलिस निरीक्षक को लिखित में शिकायत भी दी है। ऑपइंडिया के पास शिकायत की कॉपी भी उपलब्ध है।

हिंदू संगठनों ने जिहादी मानसिकता की निंदा की

हिंदू संगठनों ने पुलिस को सौंपी शिकायत में इस घटना की आलोचना की और इसे जिहादी मानसिकता बताया है। शिकायत में कहा गया कि नानी भगोल गाँव में मस्जिद समिति ने दरगाहों, मदरसों और मस्जिदों के आसपास गरबा खेलने पर सख्त पाबंदी लगाने की बात लिखी है। हिंदू संगठनों ने इस घटना को संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ बताया है।

पुलिस को दी शिकायत में यह भी लिखा गया कि इस विवादित बोर्ड को लगाने का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(D), अनुच्छेद 35, अनुच्छेद 26, अनुच्छेद 153, अनुच्छेद 295 और अनुच्छेद 505 का उल्लंघन है। ये सभी अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता और समानता की बात करते हैं। यह भी बताया कि इस तरह की पाबंदी गुजराती संस्कृति के विरुद्ध हैं और हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं।

इसके अलावा हिंदू संगठन ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाएँ में समाज में फूट और नफरत फैलाने का काम करती हैं। हिंदू संगठनों ने पुलिस से माँग की कि इस तरह के विवादित बोर्ड को तुरंत हटाया जाए और जिम्मेदार लोगों पर तुरंत कार्रवाई की जाए। इसके साथ यह भी माँग की गई कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों।

हिंदू संगठन ने बताया कि हुसैनी चौक मुस्लिम बहुल इलाका है। इलाके में नवरात्रि जैसे कार्यक्रमों पर भी प्रतिबंध रहता है। इसके बावजूद कुछ मुस्लिम लोगों ने दुश्मनी फैलाने के लिए ऐसे विवादित लेख के साथ बोर्ड लगाया है।

पुलिस की जाँच शुरू

वहीं ऑपइंडिया से बात करते हुए मातर पुलिस थाने के इंस्पेक्टर आरएन खाट ने बताया कि पुलिस ने आवेदन मिलने के कुछ घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू कर दी थी। पुलिस ने मस्जिद आयोग को घटना की जानकारी दी और विवादित बोर्ड हटाने के आदेश दिए। इसके बाद बोर्ड पर काला रंग पोतकर लिखावट मिटा दी गई।

इंस्पेक्टर ने आगे बताया कि इस मामले में FIR दर्ज की जा चुकी है। जाँच के बाद बोर्ड लगाने वाले व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

मूलरूप से गुजराती में प्रकाशित इस रिपोर्ट को यहाँ लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस, ASI सर्वेक्षण, गैर मुस्लिम सदस्य… वक्फ कानून में सुप्रीम कोर्ट ने क्या रखा-क्या हटाया, जानिए सब कुछ विस्तार से एक साथ

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 सितंबर 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर अंतरिम फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि पूरा कानून वैध है, लेकिन कुछ हिस्सों पर अस्थाई रोक लगा दी। ये रोक भी ऐसे प्वॉइंट्स पर हैं, जिसका कानून पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला।

सुप्रीम कोर्ट ने पाँच साल इस्लाम प्रैक्टिस प्रमाण (सेक्शन 3(r)), सरकारी संपत्ति जाँच के एकतरफा फैसले (सेक्शन 3C) और बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की अधिक संख्या पर रोक लगाई। लेकिन वक्फ-बाय-यूजर हटाना, ट्राइबल जमीन पर रोक, रजिस्ट्रेशन अनिवार्य और संरक्षित स्मारकों पर वैध ठहराया। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला मुस्लिम समुदाय के मजहबी अधिकारों, वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और सरकारी संपत्तियों की रक्षा पर क्या असर डालेगा, इसे विस्तार से समझते हैं।

वक्फ क्या है? इस बात को समझना जरूरी

भारत में वक्फ संपत्तियाँ बहुत पुरानी हैं – कुछ मुगल काल की, कुछ इससे पहले की। आज देश में करीब 8 लाख वक्फ संपत्तियाँ हैं, जिनकी कीमत अरबों में है। लेकिन समस्या ये है कि कई जगहों पर इनका दुरुपयोग होता रहा है – अवैध कब्जे, किराया न लेना या फिर सरकारी जमीनों को वक्फ बताकर हड़प लेना।

इसी दुरुपयोग को रोकने के लिए देश में साल 1923 से कानून बने। 1923 का मुसलमान वक्फ एक्ट पहला था, जो रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता लाया। फिर 1934 में बंगाल वक्फ एक्ट, 1954 में वक्फ एक्ट, 1995 में यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट एक्ट आया।

साल 2013 में इस कानून में फिर से बदलाव लाया गया, लेकिन वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग रुका नहीं। ऐसे में अब साल 2025 में वक्फ संशोधन अधिनियम आया है, जो वक्फ बोर्डों को मजबूत बनाने, रजिस्ट्रेशन सख्त करने और दुरुपयोग रोकने के लिए है। हालाँकि मुस्लिम संगठनों ने इसे चुनौती दी है, ये कहते हुए कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) और समानता (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है।

कानूनी चुनौती मुख्य रूप से तीन प्रमुख प्रावधानों पर केंद्रित थी-

  1. वक्फ संपत्तियों को रद्द करने की शक्ति: कोर्ट, वक्फ-बाय-यूजर या वक्फ डीड के जरिए घोषित संपत्तियों को डी-नोटिफाई करने की शक्ति पर सवाल उठे।
  2. वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केवल मुस्लिम ही इनमें होने चाहिए, सिवाय उन सदस्यों के जो पदेन (एक्स-ऑफिशियो) हैं।
  3. कलेक्टर की जाँच का प्रावधान: इसमें कहा गया था कि अगर कलेक्टर जाँच के बाद संपत्ति को सरकारी जमीन मानता है, तो उसे वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

ये मामला कई रिट याचिकाओं का बंडल था। मुख्य याचिका व्रिट पिटिशन (सिविल) नंबर 276/2025 है, जो ‘इन रे: द वक्फ अमेंडमेंट एक्ट, 2025’ पर है। इसमें 2013 की पुरानी याचिका (नंबर 814) और 2025 की 18 नई याचिकाएँ (269, 284, 314, 331, 344, 353, 375, 381, 398, 415, 427, 431, 436, 439, 440, 445, 447, 450) शामिल हैं। एक ट्रांसफर पिटिशन (1316/2025) भी थी।

सुनवाई अप्रैल 2025 से चल रही थी। 16-17 अप्रैल को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने तीन मुख्य मुद्दे तय किए थे – 1) वक्फ बाय यूजर का डी-रिकग्निशन, 2) सरकारी संपत्तियों पर स्पेशल प्रोविजन, 3) सेंट्रल काउंसिल और स्टेट बोर्ड की कंपोजिशन में बदलाव।

अब इस मामले में सोमवार (15 सितंबर 2025) को चीफ जस्टिस गवई, जस्टिस अगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने फाइनल अंतरिम फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून पर रोक लगाने से किया साफ इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी नए कानून (जैसे ये वक्फ अमेंडमेंट) को तुरंत रोकना (स्टे लगाना) आसान नहीं है। ये रेयर केस में ही होता है। क्यों? क्योंकि कोर्ट को लगता है कि हर कानून को ‘संवैधानिक’ मानकर चलना चाहिए (प्रेजम्प्शन ऑफ कन्स्टिट्यूशनलिटी), जब तक साफ-साफ गलती न साबित हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर नहीं लगाई रोक (SC के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट)

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि सिर्फ 2 हालात में तुरंत किसी भी कानून पर रोक लगा सकते हैं, जब–
1-अगर कानून बनाने का हक ही न हो (लेगिस्लेटिव कम्पिटेंस न हो)।
2-अगर ये फंडामेंटल राइट्स (जैसे रिलिजन की आजादी, इक्वालिटी) का बिल्कुल साफ उल्लंघन करे।

कोर्ट ने बताया कानून को वैध

याचिकाकर्ताओं की दलीलों को पढ़ें

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये कानून वक्फ को ‘प्रोटेक्ट’ करने का नाम लेकर संपत्ति छीनने का प्लान है। कपिल सिब्बल ने कहा, “ये कानून वक्फ को बचाने का बहाना है, लेकिन असल में सरकारी संपत्तियाँ हड़प लेने का। 2025 से पहले वक्फ रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं था। 1923 के मुसलमान वक्फ एक्ट और 1954 के एक्ट में प्रोविजन था, लेकिन न करने पर सिर्फ म्यूतावल्ली (मैनेजर) को हटाने की सजा थी, वक्फ पर असर नहीं पड़ता था।”

याचिकाकर्ताओं ने चेतावनी दी कि वक्फ-बाय-यूजर प्रावधान को खत्म करने से सदियों पुरानी मस्जिदें, कब्रिस्तान और अन्य धार्मिक स्थल खो सकते हैं। उनका कहना था कि यह मुस्लिम धार्मिक मामलों में दखलंदाजी है और यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक समुदायों को अपने अजहबी मामलों को संभालने का अधिकार देता है।

सरकार की तरफ से क्या कहा गया?

सरकार का साफ कहना है कि ये कानून वक्फ संपत्तियों का मिसयूज रोकता है, वक्फ को मजबूत बनाता है। सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “वक्फ का आधार भले ही इस्लामी परंपरा में हो, लेकिन यह कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड मुख्य रूप से सांसारिक (सेक्युलर) काम करते हैं, जैसे संपत्ति प्रबंधन, लेखा-जोखा रखना और ऑडिट करना।”

वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने के मुद्दे पर मेहता ने कहा कि यह 2013 में बनाया गया एक वैधानिक प्रावधान था, कोई मौलिक अधिकार नहीं। 2025 के संशोधन के जरिए संसद को इसे हटाने का पूरा अधिकार था।

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के विभिन्न प्रावधानों पर गहन विश्लेषण किया है, जो पेज 72 से 123 तक फैला हुआ है। यह हिस्सा कानून की हर मुख्य धारा को छूता है, जिसमें याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ, सरकार की सफाई और कोर्ट का तर्क शामिल है। कोर्ट ने कहा कि ये संशोधन वक्फ संपत्तियों को मजबूत बनाने और दुरुपयोग रोकने के लिए हैं, लेकिन कुछ जगहों पर संतुलन की जरूरत है।

5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस की जरूरत वैध, लेकिन SC ने लगाई अस्थाई रोक

1- सबसे पहले बात करते हैं सेक्शन 4(ix)(a) की, जो मूल वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 3(r) में संशोधन लाता है। यह धारा वक्फ की परिभाषा तय करती है। संशोधन में एक नया नियम जोड़ा गया है कि कोई व्यक्ति अगर अपनी संपत्ति को वक्फ घोषित करना चाहता है, तो उसे साबित करना होगा कि वह कम से कम पाँच साल से इस्लाम का पालन कर रहा है।

कोर्ट ने इसे वैध माना, क्योंकि यह दुरुपयोग रोकने का तरीका है। कल्पना कीजिए, कोई व्यक्ति अचानक संपत्ति दान कर दे और बाद में कहे कि वह वक्फ था – इससे विवाद बढ़ते हैं। यह प्रावधान ऐसी धोखाधड़ी को रोकता है, खासकर जब संपत्ति सरकारी या विवादित हो। लेकिन कोर्ट ने एक समस्या देखी- अभी तक कोई तंत्र नहीं है कि कैसे यह पाँच साल का प्रमाण चेक होगा। राज्य सरकार को नियम बनाने होंगे, जैसे दस्तावेज, गवाह या रिकॉर्ड। जब तक ऐसा तंत्र न बने, कोर्ट ने इस हिस्से पर अस्थाई रोक लगा दी।

5 साल के इस्लाम के पालन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

मतलब फिलहाल कोई नया वक्फ बनाने के लिए यह प्रमाण न दिखाना पड़ेगा। यह स्टे प्राइमा फेसी है, यानी पहली नजर में जरूरी लग रहा है, लेकिन फाइनल सुनवाई में बदल सकता है। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह भेदभावपूर्ण है, क्योंकि दूसरे धर्मों में ऐसा नहीं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि वक्फ इस्लामिक कॉन्सेप्ट है, तो इसकी खास सुरक्षा जरूरी। फिर भी बिना मैकेनिज्म के लागू न हो।

सरकारी संपत्तियों को हड़पने पर भी लगाई रोक, अब सरकार की एंट्री

सेक्शन 5 में नई धारा 3C जोड़ी गई है, जो सरकारी संपत्तियों पर विशेष प्रावधान को लेकर है। यह कहता है कि कोई सरकारी संपत्ति, चाहे पहले या बाद में वक्फ घोषित की गई हो, वक्फ नहीं मानी जाएगी। कोर्ट ने मूल विचार को सही माना, क्योंकि सरकारी संपत्ति पब्लिक ट्रस्ट है, इसे वक्फ बताकर हड़पना गलत। लेकिन कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी।

खासकर सब-सेक्शन (2) का प्रोविजो, जो कहता है कि डेजिग्नेटेड ऑफिसर (कलेक्टर से ऊपर का अधिकारी) की रिपोर्ट आने से पहले ही संपत्ति को वक्फ न मानो। साथ ही सब-सेक्शन (3) और (4) पर स्टे – ये कहते हैं कि अगर ऑफिसर जाँच कर कहे कि सरकारी है, तो रेवेन्यू रिकॉर्ड बदल दो और बोर्ड को निर्देश दो। कोर्ट ने कहा यह एकतरफा है, बिना पूर्ण सुनवाई के स्टेटस बदलना अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब विवादित मामलों में वक्फ ट्रिब्यूनल ही फैसला करेगा। जाँच शुरू होने पर तीसरे पक्ष को बेचना या हस्तांतरित न हो सकेगा, लेकिन हाई कोर्ट में अपील का रास्ता खुला रहेगा।

ASI संरक्षित धरोहरों पर नहीं होगा वक्फ का अधिकार, पर नमाज की दी अनुमति

इसी सेक्शन 5 का एक और हिस्सा धारा 3D संरक्षित स्मारकों से जुड़ा है। यह कहता है कि अगर कोई स्मारक 1904 या 1958 के कानूनों के तहत ‘प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट’ घोषित हो, तो वक्फ घोषणा शून्य हो जाएगी। कोर्ट ने इसे वैध माना, क्योंकि पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) को स्मारकों की रक्षा का अधिकार है। लेकिन महत्वपूर्ण बात- मजहबी प्रथाएँ जारी रहेंगी। मतलब अगर मस्जिद या कब्रिस्तान स्मारक में है, तो नमाज या पूजा रुकेगी नहीं – 1958 एक्ट की धारा 5(6) यही कहती है।

ट्राइबल की जमीनें नहीं की जा सकेंगी वक्फ, सभी दलीलें खारिज

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अगला हिस्सा धारा 3E है, जो ट्राइबल भूमि से जुड़ा है। यह कहता है कि संविधान के पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत अनुसूचित जनजातियों की जमीन वक्फ नहीं घोषित की जा सकती। कोर्ट ने इसे पूरी तरह सही ठहराया। कारण-ट्राइबल समुदाय कमजोर हैं, उनकी जमीनें संरक्षित हैं ताकि बाहरी लोग हड़प न लें। यह संवैधानिक प्रोटेक्शन है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ट्राइबल मुसलमान अपनी जमीन वक्फ नहीं कर सकेंगे, जो धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। लेकिन कोर्ट ने कहा अनुच्छेद 25-26 यहाँ लागू नहीं, क्योंकि ट्राइबल हित प्राथमिक हैं। उदाहरण- नॉर्थ-ईस्ट या झारखंड जैसे इलाकों में ट्राइबल मुसलमानों की जमीनें वक्फ क्लेम से सुरक्षित रहेंगी। याचिकाकर्ता इस पर स्टे ऑर्डर माँग रहे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी दलीलों को खारिज कर दिया।

वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों की संख्या सीमित

अब सेक्शन 10, 12 और 16 पर, जो सेंट्रल वक्फ काउंसिल और स्टेट वक्फ बोर्ड की संरचना बदलते हैं (मूल धारा 9 और 14)। संशोधन में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई – काउंसिल में 22 में 12 तक, बोर्ड में 11 में 7 तक। कोर्ट ने संरचना को वैध माना, क्योंकि ये सलाहकारी और प्रशासनिक निकाय हैं, धार्मिक मामलों में दखल नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कैपिंग कर दी। अब काउंसिल में 4 से ज्यादा गैर-मुस्लिम नहीं, बोर्ड में 3 से ज्यादा नहीं। यह बैलेंस है। याचिकाकर्ताओं ने इसे अनुच्छेद 26 (धार्मिक प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करार दिया, तो सरकार ने इसे स्वभाव से सेकुलर बताया। हालाँकि इन बोर्ड्स में दबदबा मुस्लिमों का ही रहेगा।

वक्फ का रजिस्ट्रेशन रहेगा अनिवार्य, नहीं मानी गई कोई दलील

सेक्शन 21 रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाता है (मूल धारा 36)। कोर्ट ने कहा 1923 के कानून से ही रजिस्ट्रेशन जरूरी था, यह दुरुपयोग रोकता है। लिखित दस्तावेज (डीड) अनिवार्य, वक्फ दान अब वैध नहीं रहेगा। याचिकाकर्ताओं ने कहा इस्लामिक प्रथा में मौखिक दान मान्य, लेकिन कोर्ट ने कहा कानून में रिकॉर्ड जरूरी, विवाद सुलझाने के लिए। इस मामले में कोर्ट ने कोई स्टे नहीं दिया।

वक्फ कानूनों में कब-कब हुआ बदवाल

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वक्फ कानूनों में कब-कब बदलाव हुए, इसे भी बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को समझा कि नए कानून की जरूरत क्यों पड़ी। फैसले के मुताबिक, वक्फ मतलब मुस्लिम रिलिजन में चैरिटी प्रॉपर्टी, जो कभी बेची या ट्रांसफर नहीं हो सकती – ये हमेशा गरीबों, मस्जिद या पढ़ाई के लिए रहती है। लेकिन इतिहास बताता है कि वक्फ का मिसयूज (गलत इस्तेमाल) बहुत हुआ, इसलिए रजिस्ट्रेशन जरूरी बना। चलिए, आपको वक्फ कानून में हुए बदलाव के बारे में विस्तार से बताते हैं…

1923 का मुसलमान वक्फ एक्ट: ये पहला बड़ा कानून था। मकसद? वक्फ का मिसमैनेजमेंट (गलत मैनेजमेंट) रोकना। पहले वक्फ प्रॉपर्टी को क्रेडिटर्स (कर्ज देने वाले) से बचाने का तरीका था, लेकिन लोग इसे लूट लेते थे। इसलिए रजिस्ट्रेशन की शुरुआत हुई – मतलब वक्फ को रजिस्टर कराओ, वरना मैनेजर (मुतावल्ली) को हटा दो। लेकिन सख्त पेनल्टी नहीं थी, बस नाममात्र का। कोर्ट कहता है, ये कानून वक्फ को ‘सुरक्षित’ रखने के लिए बनाया गया था, लेकिन बेहद कमजोर था।

1934 का बंगाल वक्फ एक्ट: ये बंगाल के लिए स्पेशल था। यहाँ पहली बार ‘वक्फ बाय यूजर’ का कॉन्सेप्ट आया। मतलब? अगर कोई प्रॉपर्टी लंबे समय से वक्फ की तरह इस्तेमाल हो रही है (जैसे मस्जिद बनी हुई है), तो वो वक्फ मानी जाएगी, भले पेपर पर न हो। ये अच्छा स्टेप था, क्योंकि पुरानी वक्फ प्रॉपर्टी को बचाया। लेकिन ये सिर्फ बंगाल तक सीमित रहा।

1954 का वक्फ एक्ट: आजादी के बाद का पहला नेशनल कानून। इसमें सर्वे (सभी वक्फ चेक करना), रजिस्ट्रेशन और पेनल्टी जोड़ी गई। मतलब सरकारी अफसर वक्फ प्रॉपर्टी का लिस्ट बनाएँगे, रजिस्टर कराएँगे और गलती पर जुर्माना लगेगा। कोर्ट ने कहा कि ये कानून वक्फ को ऑर्गनाइज करने के लिए था, क्योंकि पहले बहुत कन्फ्यूजन था।

1976 की वक्फ इंक्वायरी कमिटी: एक कमिटी बनी, जिसने वक्फ के मिसयूज की जाँच की। उन्होंने कहा कि नॉन-रजिस्ट्रेशन (रजिस्टर न कराना) रोकने के लिए सेक्शन 55A जोड़ो – मतलब, अगर रजिस्टर न किया तो कोर्ट में केस न लड़ सको। ये सिफारिश अच्छी थी, लेकिन ये बदलाव तुरंत लागू नहीं हो पाया।

1984 का अमेंडमेंट: 1976 की कमिटी के बाद ये चेंज आया। सेक्शन 55E जोड़ा गया, जो रजिस्ट्रेशन को और सख्त बनाता। लेकिन कोर्ट कहता है, ये ठीक से इम्प्लीमेंट (लागू) नहीं हुआ – यानी, कागजों पर रह गया।

1995 का ओरिजिनल वक्फ एक्ट: ये सबसे बड़ा था। इसमें ‘वक्फ बाय यूजर’ को नेशनल लेवल पर मान्यता दी, रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया, और वक्फ ट्रिब्यूनल (खास कोर्ट) बनाया। सेक्शन 87 में कहा कि अगर रजिस्टर न किया तो कोर्ट में सूट (केस) नहीं चलेगा (लेकिन 2013 में ये डिलीट हो गया)। कोर्ट कहता है, ये एक्ट वक्फ को मजबूत बनाने के लिए था, लेकिन फिर भी मिसयूज जारी रहा।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पाँच साल इस्लाम प्रैक्टिस प्रमाण (सेक्शन 3(r)), सरकारी संपत्ति जाँच के एकतरफा फैसले (सेक्शन 3C) और बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की अधिक संख्या पर रोक लगाई है। लेकिन इसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस को भी जरूरी माना। चूँकि अभी ऐसा कोई सिस्टम नहीं बना है, जिसमें 5 साल इस्लाम की प्रैक्टिस की जाँच की जा सके, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने सिस्टम बनने तक इस पर अस्थाई रोक लगाई है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कानून में वक्फ-बाय-यूजर को हटाने, ट्राइबल जमीन को वक्फ में बदलने पर रोक, रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता और संरक्षित स्मारकों पर सरकार द्वारा बनाए गए कानून की स्थिति को सही माना है। ऐसे में मूल मुद्दे पर इस फैसला का कोई खास असर नहीं दिख रहा है।

घुसपैठ-डेमोग्राफी चेंज का खतरा… बिहार चुनाव के मायने केवल राजनीतिक नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दशा-दिशा भी तय करेगा जनादेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्णिया की ऐतिहासिक रैली में यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव का असली एजेंडा क्या होगा। पीएम मोदी ने जो शब्द कहे, वे सिर्फ चुनावी भाषण नहीं थे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला संदेश था।

उन्होंने साफ कर दिया कि बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश को यह समझना होगा कि घुसपैठ और डेमोग्राफी में बदलाव देश की सुरक्षा, संस्कृति और पहचान के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पीएम मोदी ने अपने भाषण में विपक्षी दलों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि बिहार में एक भी घुसपैठिया नहीं छोड़ा जाएगा और यह मिशन किसी भी राजनीतिक समीकरण से ऊपर है।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कॉन्ग्रेस और राजद को विशेष रूप से निशाना बनाया। उन्होंने राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव पर सीधे आरोप लगाए कि वे घुसपैठियों के हितैषी बनकर सामने आए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक का असली मकसद तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति है।

प्रधानमंत्री के अनुसार, यह गठबंधन उन लोगों के साथ खड़ा है जो सीमांचल जैसे संवेदनशील इलाकों में देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। पीएम मोदी का यह आक्रामक रुख साफ बताता है कि भाजपा इस चुनाव को सिर्फ बिहार की राजनीति तक सीमित नहीं रखेगी बल्कि इसे एक राष्ट्रीय मुहिम के रूप में पेश करेगी।

प्रधानमंत्री का फोकस खास तौर पर सीमांचल क्षेत्र पर था। यह इलाका पश्चिम बंगाल और असम से सटा हुआ है और यहाँ की भौगोलिक संवेदनशीलता के कारण यह घुसपैठ का सबसे बड़ा रास्ता माना जाता है। भाजपा का दावा है कि यहाँ योजनाबद्ध तरीके से जनसंख्या संरचना बदली जा रही है।

पीएम मोदी ने जनता को चेताया कि अगर यह प्रवृत्ति नहीं रोकी गई तो स्थानीय लोग अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो जाएँगे और उनकी संस्कृति, परंपरा और अधिकार छिन जाएँगे। यह चेतावनी न केवल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी है।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि विपक्ष के संरक्षण में घुसपैठिए न केवल वोट बैंक का हिस्सा बनते हैं, बल्कि वे समाज में असंतुलन भी पैदा करते हैं। यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी साजिश है जो भारत के ताने-बाने को तोड़ने के लिए रची गई है।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कॉन्ग्रेस और राजद जैसी पार्टियाँ अपने स्वार्थ के लिए घुसपैठियों को बचाती हैं, उन्हें पहचान पत्र दिलवाती हैं और फिर उनका उपयोग चुनाव जीतने के लिए करती हैं। उनका यह सीधा हमला विपक्ष के वोट बैंक की राजनीति को पूरी तरह से बेनकाब करने वाला था।

घुसपैठ को लेकर चिंता केवल प्रधानमंत्री मोदी की ही नहीं है बल्कि संवैधानिक संस्थाएँ भी इसे लेकर चिंतित हैं। बिहार में चुनाव आयोग द्वारा किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का एक उद्देश्य वोटर लिस्ट से घुसपैठियों को बाहर करना भी है। इस प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट की गहन समीक्षा की गई है।

भाजपा का कहना है कि इससे फर्जी वोटर और घुसपैठियों का नाम हटाया जाएगा। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह पूरी कवायद मुस्लिम समुदाय और सीमावर्ती जिलों के मतदाताओं को चुनाव से बाहर करने की कोशिश है।

राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव का कहना है कि यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है लेकिन भाजपा इसे देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बता रही है। बीजेपी का कहना है कि असली लोकतंत्र वही है जिसमें केवल वैध नागरिक ही मतदान कर सकें।

घुसपैठ को लेकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े चिंता है वो पीएम मोदी ने पहली बार नहीं जाहिर की है। 15 अगस्त 2025 को लाल किले से अपने भाषण में उन्होंने घुसपैठ के खिलाफ अपने अभियान के स्पष्ट संकेत दे दिए थे।

उन्होंने कहा था कि देश में कुछ ताकतें ऐसी हैं जो सुनियोजित तरीके से डेमोग्राफी बदल रही हैं। यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और उसकी सामाजिक संरचना को कमजोर करने की कोशिश है।

उन्होंने यह भी कहा था कि यह घुसपैठ न केवल सीमाओं को असुरक्षित बनाती है, बल्कि बहन-बेटियों की सुरक्षा और आदिवासियों की जमीन के अधिकारों पर भी सीधा खतरा है। पूर्णिया की रैली इसी संदेश का विस्तार थी, जिसने बिहार चुनाव को एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है।

भाजपा के लिए यह चुनाव रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। बिहार में जीत हासिल करने के लिए सीमांचल और पूर्वी बिहार के इलाके निर्णायक भूमिका निभाएँगे। भाजपा का प्रयास है कि वह घुसपैठ के मुद्दे को उठाकर हिंदू मतदाताओं को एकजुट करे और विपक्ष को डिफेंसिव मोड में ले आए।

यह रणनीति सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि पश्चिम बंगाल, असम और झारखंड जैसे राज्यों में भी इसका प्रभाव दिखाई देगा। यह भाजपा के लिए एक दीर्घकालिक नैरेटिव तैयार करने का अवसर है।

घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से भारत की राजनीति में गहराई से जुड़ा रहा है। भाजपा ने हमेशा देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति गंभीरता दिखाई है। वहीं, विपक्ष पर यह आरोप लगता रहा है कि वह केवल मुस्लिम वोट बैंक के लालच में राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करता है। पूर्णिया की रैली ने इस बहस को और तीखा कर दिया है।

यह चुनाव सिर्फ विकास और वादों का नहीं होगा बल्कि यह तय करेगा कि बिहार और पूरे देश की राजनीति किस दिशा में जाएगी। पीएम मोदी के भाषण के बाद यह स्पष्ट है कि बीजेपी के लिए यह चुनाव जीतना सिर्फ राजनीतिक तौर पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।

यह चुनाव देश के भविष्य की दिशा तय करने का है। भाजपा का संदेश स्पष्ट है यह लड़ाई घुसपैठियों और देशद्रोहियों के खिलाफ है। अब यह देखना होगा कि जनता इस संदेश को कितनी मजबूती से स्वीकार करती है और क्या यह मुद्दा भाजपा को निर्णायक बढ़त दिला पाता है या नहीं।