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चुनाव बिहार का, पर तेजस्वी से लेकर पप्पू तक बजा रहे वक्फ-शरिया की डफली: विकास-संविधान से नहीं सरोकार, मुस्लिमों को उकसा कर ‘ध्रुवीकरण’ ही RJD-कॉन्ग्रेस-ओवैसी का एजेंडा

पटना के गाँधी मैदान में रविवार (29 जून 2025) को ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ नाम से एक बड़ी रैली हुई। इस रैली का आयोजन इमारत-ए-शरिया नाम के एक मजहबी संगठन ने किया था। इसका मकसद था वक्फ संशोधन बिल 2025 का विरोध करना। इस रैली में बिहार की विपक्षी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हुए जैसे तेजस्वी यादव, पप्पू यादव और AIMIM के अख्तरुल ईमान।

दरअसल, पटना के गाँधी मैदान में आयोजित ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली सिर्फ वक्फ बिल के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसके पीछे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की सियासत है। आइए, समझते हैं कि ये रैली थी क्या और क्यों, इसका असली मकसद क्या था और इसने बिहार की सियासत को कैसे गर्म कर दिया।

गाँधी मैदान की रैली में क्या – क्या कहा गया

रविवार को पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में हजारों लोग जमा हुए, खासकर मुस्लिम समुदाय के लोग। रैली में नेताओं ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोला। तेजस्वी यादव ने कहा, “ये देश किसी के बाप का नहीं है। ये हम सबका हिंदुस्तान है।” उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो न सिर्फ वक्फ की संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है, बल्कि मुस्लिमों, पिछड़ों और दलितों के वोट देने के अधिकार को भी छीनने की साजिश रच रही है। तेजस्वी ने ऐलान किया कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी, तो वो इस वक्फ संशोधन कानून को लागू नहीं होने देंगे।

गाँधी मैदान की रैली में मंच पर बैठे तेजस्वी और इस्लामी नेता (फोटो साभार : X_yadavtejashwi)

AIMIM के नेता अख्तरुल ईमान ने इस बिल को अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये कानून वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और जिलाधिकारियों को ज्यादा ताकत देता है।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान खान प्रतापगढ़ी ने शेरो-शायरी के साथ अपनी बात रखी और कहा, “ये बिल मुसलमानों को मंजूर नहीं है। ये हमारी बर्बादी का कारण बनेगा।” वहीं, निर्दलीय सांसद मगर कॉन्ग्रेस नेता पप्पू यादव ने मंच से खूब माहौल बनाने की कोशिश की।

वीआइपी पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने कहा कि जैसे मछली को पानी चाहिए, वैसे ही मुसलमानों को वक्फ बोर्ड चाहिए। उन्होंने बीजेपी पर मुस्लिमों की विरासत लूटने का इल्जाम लगाया।

सीपीआई माले के दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये बिल पूरे हिंदुस्तान पर हमला है और इसे रोकने के लिए नफरत फैलाने वालों को सत्ता से हटाना होगा। राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ फैसला उनके पक्ष में आएगा। कुल मिलाकर रैली में काफी भड़काऊ बयानबाजी हुई, जिसमें शरिया, वक्फ और मुस्लिम अधिकारों की बातें जोर-शोर से उठीं।

वक्फ बिल क्या है और विवाद क्यों?

वक्फ का मतलब है वो संपत्ति जो मुस्लिम समुदाय के मजहबी, सामाजिक या शैक्षिक कामों के लिए दी जाती है – जैसे मस्जिद, कब्रिस्तान या स्कूल। वक्फ बोर्ड इन संपत्तियों को संभालता है। केंद्र सरकार ने 2025 में वक्फ कानून में कुछ बदलाव किए, जिसे वक्फ संशोधन बिल कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने, महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने और वक्फ संपत्तियों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए हैं। इस बिल को बनाने से पहले संसदीय समिति, मुस्लिम संगठनों और कई लोगों से सलाह ली गई थी। सरकार कहती है कि कोई कानून थोपा नहीं गया।

लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये बिल वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। उनका इल्जाम है कि बीजेपी इस बिल के जरिए मुस्लिमों की संपत्ति पर कब्जा करना चाहती है और उनके वोट देने के हक को भी कमजोर कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस बिल की वैधता पर सुनवाई चल रही है और फैसला अभी तक नहीं आया है।

बिहार में इस्लामी सियासत का POWER GAME

बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटों पर मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। इन सीटों पर 20 से 40 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। बिहार में कुल 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो किसी भी पार्टी का खेल बना या बिगाड़ सकती है। यही वजह है कि विपक्षी पार्टियाँ जैसे आरजेडी, कॉन्ग्रेस और AIMIM इस रैली के जरिए मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने में जुट गईं।

विपक्ष बीजेपी पर सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की सियासत करने का इल्जाम लगाता है। लेकिन इस रैली को देखकर लगता है कि खुद विपक्ष ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहा है। वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर ये पार्टियाँ मुस्लिम समुदाय को भड़काने और अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं। तेजस्वी यादव ने रैली में कहा, “हम मुस्लिम समाज के साथ हैं और उनकी लड़ाई अंतिम साँस तक लड़ेंगे।” ये बयान साफ दिखाता है कि उनका मकसद मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

वक्फ के बहाने सक्रिय हुई AIMIM

बता दें कि पिछले यानी साल 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने बिहार में 5 सीटें जीती थीं, खासकर सीमांचल इलाके में। सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में 24 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 12 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। AIMIM की जीत ने विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन) का खेल बिगाड़ा था, क्योंकि उनके वोट बँट गए। इस बार भी AIMIM वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।

इमारत-ए-शरिया और मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी

इस रैली के पीछे इमारत-ए-शरिया और इसके प्रमुख मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी का बड़ा रोल रहा। मौलाना ने वक्फ संपत्तियों की रक्षा के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाया। उन्होंने 5 करोड़ ईमेल के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुँचाई। हालाँकि वो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से निकाले जा चुके हैं और उनकी इस रैली को भी AIMPLB ने समर्थन नहीं दिया। AIMPLB ने साफ कहा कि वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहता, इसके बावजूद इस मजहबी संगठन के मंच पर सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ न सिर्फ मौजूद रही, बल्कि अपने-अपने अंदाज में मुस्लिमों से समर्थन भी माँग लिया।

बिहार में असली मुद्दा क्या होना चाहिए?

बिहार के चुनाव में स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, उद्योग और विकास की बात होनी चाहिए। लेकिन इस रैली में सिर्फ वक्फ और मजहबी मुद्दों पर जोर रहा। विपक्षी पार्टियाँ मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। बीजेपी पर ध्रुवीकरण का इल्जाम लगाने वाले ये लोग खुद मजहबी आधार पर वोट माँग रहे हैं। ये रैली इसका सबूत है।

मुस्लिम समुदाय में भी कई सवाल हैं। जैसे, वक्फ बोर्ड की अरबों की संपत्ति का फायदा आम मुसलमान को क्यों नहीं मिलता? शिया और सुन्नी बोर्ड अलग-अलग क्यों हैं? गाँधी संग्रहालय के संयुक्त सचिव और मुस्लिम स्कॉलर आसिफ वासी कहते हैं, “वक्फ बिल का ज्यादा असर नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट 18 पार्टियों में बँटा हुआ है। 18 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, तो 78 फीसदी गैर-मुस्लिम वोट भी हैं।” उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति से आम मुसलमान को आज तक कोई खास फायदा नहीं हुआ।

वक्फ रैली पर बीजेपी और जेडीयू की प्रतिक्रिया रही तीखी

पटना की इस रैली पर बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा और लोकतांत्रिक परंपराओं को चुनौती देने वाला कदम बताया। सिन्हा ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल संसद की माँग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर पारित हुआ है। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाना और उनके गलत इस्तेमाल को रोकना है। उन्होंने साफ किया कि इस कानून में मजहबी स्वतंत्रता पर कोई आँच नहीं आती। गैर-मुस्लिम सदस्यों की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक होगी, न कि मजहबी।

सिन्हा ने राजद-कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि ये पार्टियाँ वोटबैंक की सियासत के लिए भ्रम और अराजकता फैलाना चाहती हैं। उन्होंने 2013 के वक्फ कानून का जिक्र किया, जब रातोंरात दिल्ली की 120 से ज्यादा वीवीआईपी संपत्तियाँ वक्फ को सौंप दी गई थीं। सिन्हा ने कहा कि अब ऐसी मिलीभगत की संस्कृति नहीं चलेगी।

बिहार बीजेपी ने इस रैली में तेजस्वी यादव के बयान पर सीधा निशाना साधा। बिहार बीजेपी ने लिखा, “तेजस्वी यादव की गाँधी मैदान रैली का असली एजेंडा अब सामने आ गया है। मंच से अब बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की नहीं, बल्कि शरीया और शरीयत की बातें हो रही हैं। क्या तेजस्वी और राहुल गाँधी बिहार को संविधान नहीं, शरीयत से चलाना चाहते हैं? देश को बाँटने वाली इस खतरनाक राजनीति का जवाब जनता 2025 में देगी। बिहार बाबा साहब के संविधान से चलेगा, शरीयत से नहीं।”

बिहार के मंत्री जमा खान ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में कुछ भी बोल रहे हैं, बिना ये सोचे कि उनकी बातें समाज में सौहार्द बिगाड़ सकती हैं। खान ने कहा कि विपक्ष खासकर राजद और कॉन्ग्रेस मुस्लिम समुदाय को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहार की जनता नीतीश कुमार पर भरोसा करती है। जमा खान ने रैली को सियासी मंच बताते हुए कहा कि ये सिर्फ भावनाओं को भड़काने की कोशिश थी, लेकिन 2025 में एनडीए फिर से सरकार बनाएगी, क्योंकि जनता सच्चाई जानती है।

लालू और नीतीश में मुस्लिम वोटर किसके साथ?

बिहार में वक्फ बिल का मुद्दा इसलिए भी गर्म है, क्योंकि यहाँ 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो चुनाव में बड़ा रोल अदा करती है। इस मुद्दे पर दो बड़े नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की साख दाँव पर है। लालू की पार्टी राजद हमेशा से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के सहारे सियासत करती रही है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपनी ‘सेकुलर’ छवि और सभी समाज के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए बिहार में मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग हमेशा उनके समर्थन में रहा है।

90 के दशक में लालू और नीतीश एक साथ थे और दोनों को सेकुलर माना जाता था। लेकिन 2005 में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और अपनी अलग पहचान बनाई। उस वक्त मुस्लिम वोटरों ने उनका साथ दिया। 2005 में जेडीयू के 4 मुस्लिम विधायक जीते, 2010 में 7, और 2015 में 5। लेकिन 2020 के चुनाव में नीतीश का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जो दिखाता है कि मुस्लिम वोटरों में उनकी लोकप्रियता घटी है। वक्फ बिल पर जेडीयू के समर्थन ने इस नाराजगी को और बढ़ाया है।

सीमांचल का सियासी समीकरण

सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया मुस्लिम बहुल हैं। यहाँ की 24 विधानसभा सीटों में से 12 पर मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। 2020 में एनडीए ने 11 सीटें जीतीं, महागठबंधन को 8 मिलीं और AIMIM ने 5 सीटें हासिल कीं। अब वक्फ संसोधन कानून के बहाने इस बार राजद और AIMIM इसी वोटबैंक पर नजर जमाए बैठे हुए हैं।

‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी। ये रैली दिखाती है कि राजद, कॉन्ग्रेस और AIMIM जैसी विपक्षी पार्टियां मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये पार्टियाँ वाकई मुस्लिम समुदाय की भलाई चाहती हैं या सिर्फ वोटबैंक की सियासत कर रही हैं? बिहार के 18 फीसदी मुस्लिम वोटर इस चुनाव में किसके साथ जाएँगे, ये वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि इस रैली ने बिहार के चुनाव को मजहबी रंग दे दिया है। रोजगार, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों की जगह वक्फ जैसे मुद्दों ने सियासत को गर्म कर दिया है और ये देखना बाकी है कि इसका असर चुनाव में कैसे दिखेगा।

अतीक अहमद का रिश्तेदार पप्पन पीर हिन्दू टीचर पर बना रहा धर्मांतरण का दबाव, 5 साल की बेटी को ‘अल्लाह-अल्लाह’ बोलना सिखाया: पूरे परिवार को पहले ही कबूल करवाया इस्लाम, UP के बदायूँ में दर्ज हुई FIR

उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक हिंदू शिक्षिका ने आरोप लगाया है कि उन्हें और उनकी 5 साल की बेटी को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह आरोप पप्पन पीर पर लगा है। पुलिस ने पप्पन पीर के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

पूरा परिवार धर्मांतरण के चंगुल में

जानकारी के अनुसार, हिंदू शिक्षिका ने बताया, “पप्पन पीर ने मेरे पति, ससुर और सास का पहले ही धर्मांतरण करवा दिया है। अब वह मुझ पर भी इस्लाम कबूल करने का दवाब बना रहा है।” हिंदू शिक्षिका ने आगे बताया कि वे आए दिन धमकी देते रहते हैं, या तो इस्लाम कबूल करो वरना पति को तलाक दे दो।

हिंदू शिक्षिका ने बताया कि पप्पन पीर ने अतीक अहमद और अरशद के नाम से धमकी दी गई है। इसके अलावा जेल से भेजे गए पन्नों के स्क्रीनशॉट भी दिखाए गए।

अतीक अहमद का रिश्तेदार हूँ- पप्पन पीर

हिंदू शिक्षिका ने आगे बताया कि पप्पन पीर कई सालों से ससुराल आता-जाता रहता था। पप्पन पीर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ बरगलाता रहता है और कहता था कि इस्लाम में केवल एक ही भगवान है। पप्पन पीर ने यह भी कहा कि वे अतीक अहमद के साले सद्दाम का रिश्तेदार है।

हिंदू शिक्षिका ने बताया, “मेरे पति पप्पन पीर को बहुत मानते हैं और पिछले 1.5 साल से मिले नहीं है। जब मैं पति को ढूँढ़ते हुए पप्पन पीर के घर गई तो उन्हें वहाँ नमाज पढ़ते हुए देखा। पप्पन पीर ने मेरी बेटी को ‘अल्लाह-अल्लाह’ कहना भी सीखा दिया है।

पुलिस कार्रवाई और आरोप

हिंदू शिक्षिका के पति ने 8 अप्रैल 2024 को मौलवी के कहने पर तलाक के लिए अर्जी दी और उनकी सास ने भी 3 अप्रैल 2025 को घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया।

हिंदू शिक्षिका ने बताया कि पप्पन पीर के दबाव के कारण पुलिस ने शुरू में कोई कार्रवाई नहीं की। अब जाकर 30 जून 2025 को सर्किल ऑफिसर सिटी से मदद माँगी।

सरकार के आदेश के बाद 1 जुलाई 2025 की शाम को सिटी कोतवाली पुलिस ने पप्पन पीर के खिलाफ FIR दर्ज की और मामले की जाँच कर रही है।

मोदी सरकार में रेलवे के मैप पर आ रहे पूर्वोत्तर राज्य, 2014 के बाद 300% ज्यादा पैसा किया खर्च: अब ‘सेवेन सिस्टर्स’ की राजधानियाँ भी जुड़ेंगी, सिक्किम में पहली बार पहुँचेगी रेलगाड़ी

पिछले ग्यारह वर्षों में पूर्वोत्तर क्षेत्रों का विकास उल्लेखनीय रहा है। देश की मुख्य धारा से दूर अविकसित माने जाने वाले 7 सिस्टर्स में मोदी सरकार ने विकास की ऐसी बयार बहाई है कि हर राज्य रेलवे कनेक्टिविटी से जुड़ गया है। भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण इस क्षेत्र में विकास की आँधी आ गई है।

कुछ साल पहले मोदी सरकार ने बहु चरणीय कनेक्टिविटी परियोजना शुरू की थी। इसका मकसद 7 सिस्टर्स और वन ब्रदर्स की राजधानियों को एक-दूसरे से जोड़ना था। इसका रिजल्ट अब सामने आ रहा है। 2025 के अंत तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा और मणिपुर की राजधानी इंफाल के बीच रेलवे कनेक्टिविटी बन जाएगी। इसके अलावा मिजोरम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश का पासीघाट तक रेलवे नेटवर्क बिछ जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि 2029 तक पूर्वोत्तर के सारे राज्य एक-दूसरे से रेलवे के माध्यम से भी जुड़ जाएँगे।

केंद्र सरकार के ‘एक्ट ईस्ट’ के तहत बुनियादी ढाँचे पर आधारित विकास यहाँ किया जा रहा है। मिजोरम में बैराबी-सैरांग लाइन, नागालैंड में दीमापुर-जुब्ज़ा लाइन, सिक्किम में सेवोके-रंगपो परियोजना और असम में अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाला इंजीनियरिंग चमत्कार बोगीबील ब्रिज जैसी प्रमुख रेलवे परियोजनाओं ने भारत की सात बहनों और एक भाई के बीच का रिश्ता और मजबूत किया है।

मोदी सरकार का रणनीतिक प्रयास, विजन और नीति

2014 से ही भारत सरकार पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों के साथ जोड़ने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कनेक्टिविटी के माध्यम से विकास’ के तहत बुनियादी ढाँचे का विकास और रेलवे का विस्तार कर रही है। इस विजन को पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और नॉर्थ ईस्ट स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम (NESIDS) जैसी नीतियों से और बढ़ावा मिला है। इस स्कीम का मकसद कनेक्टिविटी की कमी को पूरा करना है।

रेल मंत्रालय के अनुसार पूर्वोत्तर में रेल परियोजनाओं के लिए पूँजी वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2023-24 तक 370% से अधिक बढ़े हैं। इसका फायदा नई रेलवे लाइनों, गेज परिवर्तन, विद्युतीकरण और पटरियों के दोहरीकरण में हो रहा है।

धनसिरी-दीमापुर-जुब्जा रेलवे लाइन

कई दशकों तक नागालैंड रेलवे नेटवर्क से दूर रहा। हालाँकि दीमापुर रेलवे नेटवर्क में जुड़ा रहा है। अब दीमापुर-जुब्जा (कोहिमा) रेलवे लाइन पर कई सालों से काम चल रहा था। पिछले दशक में इस पर तेजी से काम हुआ। इस परियोजना पर 6,663 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। 82.5 किलोमीटर लंबी यह लाइन सिर्फ दीमापुर और राजधानी कोहिमा को ही नहीं जोड़ेगी बल्कि धनसिरी, शोखुवी, मोल्वोम, फेरिमा, पिफेमा जैसे कई शहरों कस्बों को जोड़ेगी। इसमें 37 सुरंगे, 24 पुल, 156 छोटे पुल, 5 रोड ओवर ब्रिज और 15 रोड अंडर ब्रिज बनाए जा रहे हैं।

जब यह लाइन चालू हो जाएगी, तो इससे यात्रा में समय कम लगेगा और कृषि उपज, पारंपरिक शिल्प और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। 2026 तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा प्रमुख रेल हब बनने जा रहा है। यह परियोजना शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार तक पहुँच के माध्यम से राज्य के जनजातीय समुदायों को सशक्त बना रही है।

सिक्किम की पहली रेलवे परियोजना

सात बहनों में से एक सिक्किम आखिरकार राष्ट्रीय रेलवे नेटवर्क से जुड़ने के लिए तैयार है। 44.96 किलोमीटर लंबी इस परियोजना में कुल 5 स्टेशन हैं। सिक्किम में प्रवेश करने से पहले यह पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों के घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसमें 14 सुरंगें और 28 पुल बनाए गए हैं और इसे 2027 तक पूरा करने की योजना है।

यह रेलवे लाइन गंगटोक के पास के सीमावर्ती शहर रंगपो को भारतीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ेगी। इस परियोजना को गंगटोक तक पहुँचाने की भी बात की जा रही है। यह लाइन पर्यटन और बागवानी आधारित उद्योगों को काफी बढ़ावा देगा, साथ ही भारत-चीन सीमा तक भारतीय सेना को पहुँचने में आसानी होगी ।

बोगीबील पुल इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल

असम से अरुणाचल को जोड़ने के लिए बना बोगीबील ब्रिज इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल है। ये ब्रह्मपुत्र नदी पर बना भारत का सबसे लंबा रेलवे और सड़क पुल की मिलीजुली परियोजना है।

दिसंबर 2018 में बनकर तैयार हुआ यह 4.94 किलोमीटर लंबा ढाँचा असम के उत्तरी तट पर स्थित धेमाजी को दक्षिण में डिब्रूगढ़ से जोड़ता है। ये अप्रत्यक्ष रूप से अरुणाचल प्रदेश से जुड़ता है। इससे असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच यात्रा का समय काफी कम हो गया है।

पुल बनने से पहले डिब्रूगढ़ से ईटानगर जाने वाले लोगों को सड़क मार्ग से 24 घंटे का समय लगता था, लेकिन अब यह यात्रा सिर्फ 6 घंटे में पूरी हो जाती है। इस पुल का सामरिक सैन्य महत्व भी है क्योंकि ये चीन सीमा से लगे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के नजदीक है।

अरुणाचल प्रदेश तक पहुँचा ट्रेन

अरुणाचल प्रदेश में 2013 तक कोई रेल संपर्क नहीं था। 2014 में उद्घाटन किए गए नाहरलागुन रेलवे स्टेशन ने राज्य में रेल आवागमन की शुरुआत हुई। ये स्टेशन ईटानगर से सिर्फ 15 किमी दूर है। नाहरलागुन से गुवाहाटी और दिल्ली तक इंटरसिटी सेवाओं ने न केवल यात्रा के समय को कम किया है, बल्कि पूर्वोत्तर को दिल्ली से जोड़ा भी है।

इसके अलावा सरकार ने 200 किलोमीटर लंबी भालुकपोंग -तवांग रेलवे लाइन को मंजूरी भी दे दी है।

मेघालय और मिजोरम का रेल कनेक्शन

मेघालय की राजधानी शिलांग और मिजोरम की राजधानी आइजोल पूर्वोत्तर के प्रशासनिक केंद्र हैं, लेकिन दशकों तक यहाँ रेलवे कनेक्टिविटी की कमी रही। तेतेलिया-बिरनीहाट लाइन से अब शिलांग को भारतीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की उम्मीद है।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत 51.38 किलोमीटर लंबी परियोजना बैराबी- सैरांग रेलवे लाइन आइजोल को सीधे भारत के नेटवर्क से जोड़ रहा है। इसमें 55 बड़े पुल, 87 छोटे पुल और 23 सुरंगें शामिल हैं। 2025 में ये परियोजना पूरी होने जा रही है।

त्रिपुरा और मणिपुर तक रेलवे नेटवर्क

2014 के बाद त्रिपुरा में रेलवे नेटवर्क का विकास हुआ। अगरतला-अखौरा रेल परियोजना भारत को बांग्लादेश से जोड़ती है। इसके 2025 में पूरा होने की संभावना है।

मणिपुर में जिरीबाम-इम्फाल रेलवे लाइन निर्माणाधीन है। 111 किलोमीटर से ज्यादा लंबी यह लाइन पहली बार इम्फाल को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ेगी। इससे मणिपुर की राजधानी में सामान और पर्यटक आसानी से पहुँच सकेंगे। ये परियोजना 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है। इस ट्रैक का 70% से ज़्यादा हिस्सा सुरंगों से होकर गुज़रेगी। म्यांमार से सटे होने की वजह से मणिपुर में इसका सामरिक महत्व भी है।

आर्थिक और रणनीतिक फायदा

इन परियोजनाओं का असर बहुआयामी है। पर्यटन, शिक्षा, बागवानी आदि के विकास में इनका काफी महत्व है। नागालैंड के संतरे, मेघालय के अनानास और मिजोरम के बाँस के हस्तशिल्प जैसे स्थानीय उत्पादों को विश्वस्तर पर ले जाने में इससे काफी मदद मिलेगी।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय से पूर्वोत्तर भारत में रेलवे के बदलाव की असली कहानी सिर्फ पटरियाँ और सुरंग, पुल ही नहीं कह रहे, बल्कि इसका असर काफी गहरा है। ये परियोजनाएं उन लोगों पर सीधा असर डाल रही हैं जो पहले खुद को उपेक्षित समझते थे। नया रेल नेटवर्क पूर्वोत्तर की जीवन रेखा बन गई है। जैसे-जैसे भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, पूर्वोत्तर की भागीदारी भी बढ़ रही है और देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है।

11 लोग भगदड़ में दब कर मरे, तब कॉन्ग्रेस सरकार को नियमों की आई याद: हाई कोर्ट की लताड़ के बाद भीड़ प्रबन्धन पर कर्नाटक ने जारी की गाइडलाइंस

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरू (आरसीबी) ने 18 वर्षों में पहली बार इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की ट्रॉफी जीती। इसके बाद 4 जून 2025 को बेंगलुरू में इसका जश्न मनाने की तैयारी की गई। इसके लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम में लाखों की भीड़ इकट्ठा हो गई। इसके बाद वहाँ भगदड़ मची जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी और 56 लोग घायल हो गए थे।

अब कर्नाटक सरकार ने 1 जुलाई 2025 को किसी भी कार्यक्रम के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP ) तैयार किया है। साथ ही साथ बेंगलुरू भगदड़ पर जाँच भी चल रही है। इसके तहत केंद्रीय प्रशासनिक के न्यायाधिकरण (CAT ) ने चिन्नास्वामी स्टेडियम में भगदड़ के लिए आरसीबी को भी दोषी ठहराया है।

SOP में क्या होगा?

कर्नाटक सरकार ने भीड़ प्रबंधन के लिए एक विस्तृत SOP (Standard Operating Procedure) जारी किया है। इसका उद्देश्य भविष्य में भगदड़ जैसी घटनाओं को रोकना और सार्वजनिक समारोह में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। SOP के तहत पुलिस के आला-अफसरों को किसी भी आयोजन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए आयोजकों से संपर्क करना होगा।

SOP में कार्यक्रम की रूपरेखा के साथ आयोजन की तारीख और सही समय होना जरूरी है। इसके साथ ही कार्यक्रम में कितनी भीड़ आ सकती है। उसके अनुसार जगह पर्याप्त है कि नहीं। समारोह स्थल में प्रवेश और निकास के लिए समुचित रास्ते के साथ आपातकालीन निकासी के बारे में जानकारी जरूरी होगी। आयोजन कितनी देर तक आगे खिंच सकता है, आयोजन में किसी तरह के विरोधाभास की स्थिति होने के क्या आसार हो सकते हैं।

अगर कार्यक्रम में किसी भी तरह के विरोधाभास की स्थिति होने के आसार होते हैं तो उस दौरान के विरोध प्रदर्शनों की संभावना, आस-पास के क्षेत्र में स्थित महत्वपूर्ण जगहों पर खतरे के बारे में भी बताना होगा। इसके साथ ही और उस तरह के पिछले आयोजनों की स्थिति की समीक्षा भी की जाएगी।

इसके अलावा आयोजन स्थल में अग्निशमन (फायर एक्टिंग्विशर्स) की व्यवस्था के साथ स्वास्थ्य और अन्य जरूरी विभागों की अनुमति जरूरी होगी। इन सबके साथ कार्यक्रम के लिए डिजिटल टिकटिंग और सीटों के आरक्षण पर भी काम किया जाना इस SOP में शामिल होगा। इसके तहत प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग किया जाने की बात कही गई है।

कितना आसान होगा नए नियम लागू कर पाना

जनसंख्या और इस तरह के आयोजन के लिहाज से इस SOP को लागू करने में कर्नाटक सरकार को कई चुनौतियाँ झेलनी पड़ सकती हैं। व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो इन दिशा- निर्देशों को समझने में पुलिस समेत अन्य विभागों को ही काफी समय लग जाएगा।

इसके अलावा कर्नाटक में वर्तमान में लगभग 92,000 पुलिस कर्मी हैं। इसके एवज में 2011 के जनसंख्या सर्वे को ही मानें तो कर्नाटक की जनसंख्या 6.11 करोड़ है। ऐसे में किसी आयोजन में भारी भीड़ होने पर अगर कोई अनहोनी होती है तो उतने संसाधनों का जुटा पाना भी एक बड़ी चुनौती वाली बात है। विरोध प्रदर्शन जैसे मामलों में ये SOP गुब्बारे की हवा जैसे ही साबित होगी।

RCB के खिलाफ आया आदेश

CAT ने अपने आदेश में कहा कि सोशल मीडिया के जरिए RCB ने कई बार आयोजन का प्रमोशन किया। इससे लगभग 12 घंटे में ही काफी भीड़ एक साथ आ गई। इतने कम समय में पुलिस पूरी तरह से व्यवस्था कर पाने में असमर्थ थी।

आदेश में पुलिस की सीमाओं पर भी बात की गई और कहा गया कि वह ‘न तो भगवान’ हैं और ‘न ही जादूगर’, जिनके पास आखिरी समय में किसी की इच्छा पूरी करने के लिए ‘अलादीन का चिराग’ हो।

इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने पुख्ता सबूत न होने के कारण आईपीएस विकास कुमार विकास का निलंबन भी रद्द कर दिया। साथ ही दो अन्य अधिकारियों को भी बहाल करने के सिफारिश की।

भले ही CAT ने अपना आदेश सुना दिया हो या फिर SOP जारी कर दी गई हो, लेकिन जिन 11 लोगों की जानें गईं और जो लोग गंबीर रूप से घायल हुए, उन पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया अब भी अधूरी लगती है। इस पूरे मामले पर कई पक्षों ने कर्नाटक सरकार से जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक के साथ पूरी पारदर्शिता लाने की बात कही।

इसे लेकर याचिकाएँ भी डालीं गईं जिनमें ये आरोप लगे हैं कि कार्रवाई में राजनीतिक दबाव शामिल है, इसलिए न्याय मिलने में देरी हो रही है। फिर भी ढाक के वही तीन पात अब तक दिख रहे हैं यानी जाँच प्रक्रिया को अपने स्तर से ही कर्नाटक सरकार से ही चला रही है।

आयोजन में सरकार के उपमुख्यमंत्री बी बुलाए गए थे। इशके बावजूद इतनी बड़ी घटना हुई। इस मामले पर हाईकोर्ट ने भी सरकार से कई सवाल पूछे थे। इसके जवाब में कर्नाटक सरकार ने उस समय चुप्पी साध ली और जवाब देने के लिए समय की माँग कर डाली थी।

अडानी पॉवर के ₹3700 करोड़ बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने लौटाए, बाक़ी पैसा भी जल्द चुकाने को कहा: पहले मंत्री बोला था- ऐसे ही चला लेंगे काम

बांग्लादेश ने अडानी पावर को 437 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 3744 करोड़ रुपए का बकाया चुका दिया है। ये भुगतान 2017 के समझौते के तहत झारखंड के गोड्डा प्लांट से बिजली आपूर्ति के लिए किया गया है। द्विपक्षीय बिजली आपूर्ति समझौते के तहत किया गया ये सबसे बड़ा भुगतान है।

सूत्रों के मुताबिक भुगतान में बकाया बिल, वहन लागत और 2017 में बांग्लादेश और भारतीय समूह के बीच बिजली खरीद समझौते (पीपीए) से जुड़ी धनराशि भी शामिल हैं।

झारखंड में अडानी के 1,600 मेगावाट के गोड्डा बिजली संयंत्र से बिजली आपूर्ति में महीनों से अनियमितता रही है। भुगतान में देरी के कारण पिछले साल आपूर्ति कम हो गई थी। इस बीच रूस-यूक्रेन जंग और बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से बांग्लादेश की वित्तीय स्थिति बिगड़ गई।

जानकारों के मुताबिक बांग्लादेश ने पिछले कुछ महीनों में अपने भुगतान को नियमित कर दिया है। ये भुगतान हर महीने 90-100 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा है। बांग्लादेश ने वर्तमान भुगतान के अलावा दो महीने के बिलिंग के लिए लेटर्स ऑफ क्रेडिट (एलसी) लागू किया है और सभी बकाया राशि के लिए विस्तारित संप्रभु गारंटी दी है, जिससे अडानी पावर को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।

बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री मुहम्मद फ़ौजुल कबीर खान ने पिछले साल रॉयटर्स से कहा था कि बांग्लादेश अडानी की बिजली आपूर्ति के बिना भी चल सकता है। इस दौरान उन्होने घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि का हवाला दिया था। साथ ही माना भी था कि सभी घरेलू इकाइयाँ काम नहीं कर रही हैं।

मंत्री के दावे के बावजूद बांग्लादेश को अडानी पावर के बिजली की जरूरत पड़ी। कंपनी को बड़ा भुगतान करने के बाद बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने कंपनी से शेड्यूल के अनुसार गोड्डा प्लांट की दोनों इकाइयों से पूरी बिजली आपूर्ति फिर से शुरू करने का अनुरोध किया है। यह प्लांट बांग्लादेश की बिजली की माँग का लगभग 10% पूरा करता है।

BPDB के डेटा से पता चलता है कि अडानी पावर की बिजली दूसरी कंपनियों से आपूर्ति की जाने वाली बिजली से थोड़ी सस्ती पड़ती है। आर्थिक विश्लेषकों का सुझाव है कि इन घटनाक्रमों से अडानी पावर की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो सकता है। कंपनी को उम्मीद है कि उसकी रेटिंग AA से AA+ तक अपग्रेड हो जाएगी। इससे कंपनी को कर्ज लेने में कम व्याज चुकाना पड़ेगा।

2017 का बिजली समझौता अक्सर राजनीतिक बहस का विषय रहा है। बांग्लादेश में तत्कालीन शेख हसीना सरकार के विरोधियों ने मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता और आयातित कोयला-आधारित बिजली पर निर्भरता का विरोध किया था। लेकिन अब इसके आगे चलते रहने के आसार हैं। समझौते के समर्थकों का कहना है कि गोड्डा संयंत्र ने बांग्लादेश को विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी मूल्य पर बिजली प्रदान की है, जिससे देश में बिजली की कमी को दूर करने में मदद मिली है।

हाल ही में हुआ वित्तीय समझौता बांग्लादेश के अपने ऊर्जा क्षेत्र को स्थिर करने और अपने समझौते को पूरा करने की वचनबद्धता को दर्शाता है। भुगतान वापस पटरी पर आने और आपूर्ति पूरी तरह से बहाल होने के साथ दोनों पक्ष भविष्य को लेकर भी आशावादी हैं।

मुस्लिम आरोपित का नाम ‘गोल’ और जगन्नाथ मंदिर पर ‘गोलमाल’: राजदीप सरदेसाई की ‘पक्षपाती’ पत्रकारिता… पहलगाम रेप मामले में ‘जुबैर अहमद’ का नाम लेने से किया किनारा

यह बात अब साफ हो चुकी है कि पत्रकार राजदीप सरदेसाई अपनी पत्रकारिता में दोहरा मापदंड अपनाते हैं। हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनसे उनकी पत्रकारिता की निष्पक्षता पानी की तरह दिखाई देती है।

मुस्लिम आरोपितों के नाम लेने में संकोच

हाल ही में, पहलगाम में एक 70 वर्षीय विधवा महिला के साथ हुए बलात्कार मामले में राजदीप सरदेसाई ने जानबूझकर आरोपित का नाम नहीं लिया। पीड़ित के साथ ‘जुबैर अहमद’ नाम के व्यक्ति ने रेप किया था।

राजदीप सरदेसाई ने इस घटना पर ट्वीट किया और कोर्ट के जमानत रद्द करने के फैसले का जिक्र भी किया, लेकिन आरोपित ‘जुबैर अहमद’ का नाम छोड़ दिया।

जब नेटिज़न्स ने उनसे सवाल किया, तो राजदीप सरदेसाई ने अपनी गलती मानने के बजाय, दूसरे मामलों का हवाला देना शुरू कर दिया। राजदीप सरदेसाई ने कहा कि कोलकाता के एक मामले में आरोपित का नाम ‘मोनोजित मिश्रा‘ था और तमिलनाडु के दहेज उत्पीड़न मामले में आरोपित पति कविन कुमार, ससुर ईश्वरामुर्थी और सास चित्रादेवी थे।

आरोपित का नाम जानबूझकर छुपाया गया था, यह बात साफ दिखती है। राजदीप सरदेसाई ने यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन यह बात संस्कृति और धर्म से जुड़े पहलुओं को नज़रअंदाज़ करती है।

जगन्नाथ मंदिर की ‘तुलना’ का विवाद

राजदीप सरदेसाई ने 27 जून 2025 को भी एक और विवाद खड़ा कर दिया था, जब उन्होंने ओडिशा के 900 साल पुराने पुरी जगन्नाथ धाम की तुलना पश्चिम बंगाल के दीघा में बने एक नए जगन्नाथ मंदिर से की। राजदीप सरदेसाई ने X (पहले ट्वीटर) पर लिखा, “जगन्नाथ यात्रा के अब 2 स्थान हैं- मूल ओडिशा के पुरी में, एक नया पश्चिम बंगाल के दीघा में।”

यह तुलना जानबूझकर की गई गलती है ताकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के लिए ‘एजेंडा सेट’ किया जा सके। ये तुलना इसलिए भी की गई होगी, क्योंकि राजदीप सरदेसाई की पत्नी सागरिका घोष TMC की राज्यसभा सांसद हैं।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर 12वीं सदी में बना एक ऐतिहासिक मंदिर है, जबकि दीघा का मंदिर अभी दो महीने पहले ही बनाया गया है। पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने भी स्पष्ट किया है कि दीघा मंदिर का भगवान जगन्नाथ की भक्ति से कोई लेना-देना नहीं है।

यह घटनाएँ राजदीप सरदेसाई की पत्रकारिता में एक पक्षपाती पैटर्न को दर्शाती हैं, जहाँ वे कुछ मामलों में जानकारी छिपाते हैं और दूसरों में जानबूझकर तुलना करके राजनीतिक एजेंडा साधने की कोशिश करते हैं।

साँस न आने पर पीड़िता को दिया इनहेलर ताकि फिर रेप कर सके, कोलकाता गैंगरेप के आरोपित TMC नेता मोनोजीत के शरीर पर मिले ताजा घाव, खरोच: मेडिकल रिपोर्ट में हुआ खुलासा, बंगाल के नेता मानस भुइयां के लिए ये ‘छोटी सी घटना’

कोलकाता लॉ कॉलेज में छात्रा से हुए गैंगरेप मामले में मुख्य आरोपित टीएमसी नेता मोनोजीत मिश्रा के खिलाफ अहम सुराग मिले हैं। मोनोजीत मिश्रा के शरीर पर ताजा खरोंच और नाखून के निशान पाए गए हैं। शुरुआती मेडिकल जाँच में इसका खुलासा हुआ है। माना जा रहा है कि गैंगरेप का पुरजोर विरोध कर रही छात्रा ने उसे खरोंचा था।

पुलिस के मुताबिक, ” मोनोजीत के शरीर पर ताजा खरोंच के निशान मिले हैं। ऐसा तब होता है जब कोई अपने ऊपर हुए हमले का विरोध करता है। ” इस बीच मोनोजीत मिश्रा के कॉल डिटेल को एसआईटी ने खंगाला है जिसमें पता चला है कि घटना के अगले दिन सुबह उसने कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल डॉक्टर नयना चटर्जी से फोन पर बात की थी। पुलिस डॉक्टर चटर्जी से दो बार पूछताछ कर चुकी है।

पुलिस अधिकारी के मुताबिक, “ये जानना बेहद जरूरी है कि दोनों के बीच वारदात के अगले दिन किस संदर्भ में बातचीत हुई।”

इस बीच ये बात भी सामने आई है कि एक आरोपित जैब अहमद ने पीड़िता के लिए मेडिकल स्टोर से इनहेलर खरीदने गया था। मेडिकल स्टोर पर लगे सीसीटीवी फुटेज में ये खुलासा हुआ है।

दरअसल पीड़िता को जब गेट से खींच कर कॉलेज परिसर में ले जाया जा रहा था तो उसे पैनिक अटैक आया। उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उस वक्त उसे आरोपितों ने इनहेलर दिया।

मंगलवार 1 जुलाई 2025 को कोलकाता में कोर्ट की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि छात्रा को इनहेलर इसलिए नहीं दिया गया कि वह ठीक हो जाए बल्कि इसलिए दिया गया कि ठीक होने के बाद उसके साथ गैंगरेप किया जा सके।

इस बीच छात्रा के साथ गैंगरेप पर पश्चिम बंगाल के मंत्री और टीएमसी नेता मानस भुइयां का बयान सामने आया है। उन्होने गैंगरेप की वारदात को “छोटी घटना” बताया है।

इससे पहले टीएमसी नेता मदन मित्रा और कल्याण बनर्जी ने 25 जून को छात्रा के साथ हुए गैंगरेप को ‘छोटी घटना’ बताया था। बीजेपी ने बंगाल के मंत्री और टीएमसी नेताओं के बयान की कड़ी आलोचना की है साथ ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार को “बलात्कारियों का रक्षक” बताया है।

बीजेपी पश्चिम बंगाल के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने मंगलवार (1 जून 2025) को राज्य के सिंचाई मंत्री मानस भुनिया के कथित बयान का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है., “जबकि पूरा देश 24 वर्षीय कानून की उम्मीदवार के साथ हुई अकल्पनीय क्रूरता से स्तब्ध है, टीएमसी नेता अपनी राजनीतिक बॉस ममता बनर्जी से प्रशंसा पाने के लिए बलात्कार को सामान्य बनाने में व्यस्त हैं।”

कोलकाता लॉ कॉलेज की 24 वर्षीय प्रथम ईयर की छात्रा के साथ 25 जून को लॉ कॉलेज परिसर में तीन लोगों ने गैंगरेप किया था। इनमें 31 वर्षीय पूर्व छात्र मोनोजीत मिश्रा, 19 वर्षीय जैब अहमद और 20 वर्षीय प्रमित मुखोपाध्याय शामिल है। इनके अलावा कॉलेज के एक सुरक्षा गार्ड को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया है।

ट्रंप के ‘मच लैस टैरिफ’ से खुलेगी व्यापार की नई राहें, समझौते पर टिकी है दोनों देशों की उम्मीदें: डेयरी-कृषि उत्पादों के बाजार में घुसने की कोशिश में अमेरिका, भारत को भी अमेरिकी बाजारों से आस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत के साथ उनका एक व्यापार समझौता हो सकता है, जिसमें चीजें खरीदने-बेचने पर बहुत कम टैक्स लगेगा। इसे ‘मच लैस टैरिफ’ का नाम दिया गया है।

ट्रंप ने मंगलवार (1 जुलाई 2025) को बताया कि दोनों देशों के बीच बातचीत में कुछ रुकावटें आ रही हैं, फिर भी उन्हें उम्मीद है कि वे एक समझौता कर लेंगे। यह बात ट्रंप ने 9 जुलाई 2025 को अमेरिकी टैक्स (जिसे ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ कहते हैं) की 90 दिन की रोक खत्म होने से ठीक पहले कही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उन्हें लगता है कि भारत के साथ एक व्यापार समझौता हो जाएगा। यह समझौता ‘अलग तरह’ का होगा, जिससे अमेरिका भारत के बाजार में ‘आसानी से चीजें बेच पाएगा।’

ट्रंप ने कहा, “अभी भारत अपने व्यापार में किसी को आसानी से अंदर नहीं आने देता।” उन्हें लगता है कि भारत इसमें बदलाव करेगा, और अगर ऐसा हुआ, तो सामानों पर बहुत कम टैक्स (टैरिफ) लगेगा।

कहाँ फँस रही है बात?

भारत और अमेरिका के अधिकारी एक व्यापार समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर 9 जुलाई 2025 तक यह समझौता नहीं होता, तो अमेरिका भारत से आने वाले सामानों पर 26% टैक्स लगाने की योजना बना रहा है। इसमें पहले से लगा 10% टैक्स भी शामिल है।

बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट यह है कि भारत अपने डेयरी उत्पादों (दूध, दही आदि) का बाजार विदेशी कंपनियों के लिए नहीं खोलना चाहता। अमेरिका चाहता है कि भारत डेयरी और खेती से जुड़े सामानों जैसे सेब, सूखे मेवे और जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर कम टैक्स लगाए।

भारत की माँग

वहीं, भारत चाहता है कि अमेरिका उसके कपड़े, गहने, चमड़े के सामान और खेती से जुड़े उत्पादों जैसे झींगा, तिलहन, अंगूर और केले के लिए अपना बाजार खोले।

व्यापार के जानकार कहते हैं कि शायद दोनों देश कुछ खास सामानों और सेवाओं पर ही समझौता करें। जैसे- भारत से आने वाले कपड़े, चमड़े और गहने जैसे सामानों पर क्योंकि इन्हें बनाने में बहुत से मजदूर लगते हैं। बाकी चीजों को शायद अभी समझौते से बाहर रखा जाए।

आगे क्या होगा?

अभी यह साफ नहीं है कि बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी। दोनों देश अपने-अपने फायदे देखना चाहते हैं। भारत के लिए डेयरी और खेती का मामला बहुत संवेदनशील है, जबकि अमेरिका इन क्षेत्रों में पूरी तरह से पहुँच चाहता है।

हालाँकि, अभी भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर कोई असर नहीं पड़ा है, सिर्फ स्टील और एल्यूमीनियम जैसे कुछ सामानों पर पहले से ही ज्यादा टैक्स लगता है।

बिहार में घर-घर जाकर चुनाव आयोग कर रहा मतदाताओं का सत्यापन, तेजस्वी-ओवैसी-सागरिका से लेकर रवीश कुमार तक की फूल रही साँस: जानिए उस प्रक्रिया की ABCD, जिसे विपक्ष बता रहा NRC

बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले भारत का चुनाव आयोग (ECI) वोटर लिस्ट को ठीक करने का एक बड़ा काम कर रहा है। इसे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कहते हैं। इस काम में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) यानी वो लोग जो हर गाँव और मोहल्ले में वोटिंग का काम देखते हैं, घर-घर जाकर ये जाँच रहे हैं कि वोटर लिस्ट में कौन-कौन का नाम सही है। मतलब जिन लोगों को वोट डालने का हक है, उनका नाम लिस्ट में रहे और जिनका नहीं होना चाहिए, जैसे कि जिनकी मृत्यु हो गई है या जो कहीं और चले गए हैं, उनका नाम हट जाए।

चुनाव आयोग का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है ताकि वोटिंग में कोई गड़बड़ न हो। बिहार में अभी 7.89 करोड़ लोग वोटर हैं और इस जाँच से ये सुनिश्चित होगा कि सिर्फ़ सही लोग ही वोट डालें। इसके लिए 1.5 लाख से ज़्यादा बूथ लेवल एजेंट (BLA) लगाए गए हैं, जो सभी पार्टियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

हालाँकि विपक्षी पार्टियाँ जैसे राष्ट्रीय जनता दल (RJD), AIMIM, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ और तेजस्वी यादव, असदुद्दीन ओवैसी, सागरिका घोष जैसे नेता इस काम को NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि ये सब बीजेपी और NDA की साजिश है, ताकि गरीब, दलित, पिछड़े और मुस्लिम लोगों को वोटर लिस्ट से हटाया जा सके। आइए इस पूरे मामले को समझते हैं कि ये काम क्या है, कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है और विपक्ष क्यों चिल्ला रहा है।

कैसे हो रहा है ये काम?

चुनाव आयोग ने 25 जून 2025 से ये जाँच शुरू की है, जो 26 जुलाई तक चलेगी। इसके बाद 30 सितंबर को नई और सही वोटर लिस्ट छपेगी। इस काम में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) हर घर में जा रहे हैं। उनके पास एक फॉर्म होता है, जो आधा भरा होता है। वो उस फॉर्म को लोगों को देते हैं और उनसे कुछ जानकारी माँगते हैं, जैसे कि नाम, पता और कुछ कागजात। ये कागजात इसलिए चाहिए ताकि ये पक्का हो सके कि वो व्यक्ति वोट डालने का हकदार है।

अगर आपका नाम 2003 की वोटर लिस्ट में है (जब बिहार में आखिरी बार ऐसा बड़ा काम हुआ था), तो आपको बस अपनी जानकारी की पुष्टि करनी है। अगर आपके मम्मी-पापा का नाम उस लिस्ट में है, तो आपको कोई अतिरिक्त कागज देने की जरूरत नहीं। लेकिन अगर आपका या आपके मम्मी-पापा का नाम उस पुरानी लिस्ट में नहीं है, तो आपको कुछ कागज, जैसे जन्म प्रमाणपत्र या दूसरा कोई दस्तावेज़ देना पड़ सकता है।

फोटो साभार : X_ECI

BLO ये सारी जानकारी को एक मोबाइल ऐप (ECIनेट) में अपलोड करते हैं। साथ ही आपको एक रसीद भी देते हैं कि आपने फॉर्म भरा है। आयोग ने ये भी कहा है कि इस काम में बुजुर्गों, बीमार लोगों या दिव्यांग लोगों को परेशान नहीं करना है। बिहार में 2003 की वोटर लिस्ट में 4.96 करोड़ लोगों के नाम थे और आयोग का कहना है कि इन लोगों और इनके बच्चों को कोई खास कागज देने की जरूरत नहीं। यानी करीब 60% लोगों को आसानी होगी।

क्यों हो रहा है ये काम?

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट को समय-समय पर ठीक करना जरूरी है, क्योंकि बहुत कुछ बदल जाता है। जैसे-

शहरीकरण: बिहार में लोग अब गाँवों से शहरों की तरफ जा रहे हैं।
पलायन: बहुत से लोग नौकरी या दूसरी वजहों से बिहार से बाहर चले गए हैं।
नए वोटर: 18 साल के हो रहे युवाओं के नाम लिस्ट में जोड़ने हैं।
मृत्यु: कुछ लोग जिनकी मौत हो गई, लेकिन उनका नाम लिस्ट में अब भी है।
अवैध लोग: कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं, जो भारत के नागरिक नहीं हैं लेकिन लिस्ट में नाम डलवाए हैं।

आयोग का कहना है कि ये सब ठीक करने से वोटर लिस्ट साफ-सुथरी होगी। भारत के संविधान में अनुच्छेद 326 कहता है कि सिर्फ़ भारतीय नागरिक, जो 18 साल से बड़े हों और उस इलाके में रहते हों, वोटर बन सकते हैं। इसके लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 के नियमों का पालन हो रहा है। आयोग का मकसद है कि कोई भी सही वोटर छूटे नहीं और कोई गलत व्यक्ति लिस्ट में न रहे।

विपक्ष क्यों कर रहा है हंगामा?

विपक्षी पार्टियाँ और कुछ लोग इस काम को लेकर बहुत शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि ये जाँच सिर्फ़ एक बहाना है और इसके जरिए बीजेपी गरीब, दलित, पिछड़े और मुस्लिम लोगों को वोटर लिस्ट से हटाना चाहती है।

तेजस्वी यादव (RJD): बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और RJD नेता तेजस्वी यादव ने इसे “संदिग्ध और चिंताजनक” बताया। उनका कहना है कि बीजेपी और RSS इस जाँच के बहाने बिहार के गरीब लोगों का वोटिंग का हक छीनना चाहते हैं। उन्होंने ट्वीट किया कि आयोग ने अचानक सारी वोटर लिस्ट को रद्द करने का फैसला क्यों लिया? साथ ही, उन्होंने ये भी सवाल उठाया कि आधार कार्ड को इस जाँच में क्यों नहीं लिया जा रहा, जबकि वोटर लिस्ट को आधार से जोड़ने की बात हो रही थी।

असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM): AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘बिहार में चुपके से NRC लागू करना’ बताया। उनका कहना है कि इस जाँच से गरीब लोगों को लिस्ट से हटाया जाएगा, क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाणपत्र जैसे कागज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 2000 में सिर्फ़ 3.5% लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र था। ओवैसी ने आयोग को चिट्ठी लिखकर इस पर आपत्ति जताई है।

सागरिका घोष (TMC): तृणमूल कॉन्ग्रेस की सागरिका घोष ने कहा कि ये जाँच बहुत सख्त है, क्योंकि इसमें मम्मी-पापा के जन्म प्रमाणपत्र माँगे जा रहे हैं। उनका कहना है कि आम लोग, खासकर गरीब, इतने पुराने कागज कहाँ से लाएँगे? TMC का बिहार में कोई खास आधार नहीं है, फिर भी वो इस मुद्दे पर बोल रही है।

मनोज झा: RJD सांसद मनोज झा ने पूछा कि क्या एक महीने में 8 करोड़ लोगों की जाँच हो सकती है? उन्होंने कहा कि इससे गरीब और कमजोर लोग वोटिंग से वंचित हो सकते हैं।

पत्रकार रवीश कुमार ने उनके ट्वीट को शेयर करके इस बात को और बढ़ावा दिया।

रविश कुमार ने मनोज झा के ट्वीट को री-ट्वीट कर इसका समर्थन किया है, उसी ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X_Ravish_Journo)

रविश कुमार : रविश कुमार खुलेआम सरकार, संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी तत्वों के खिलाफ लोगों को भड़कर व्यूज बटोरने में आगे रहे हैं। इस मुद्दे पर चुप कैसे रहते? उन्होंने बाकायदा वीडियो बनाकर तेजस्वी यादव की बातों को आगे बढ़ाने और आम लोगों को भड़काने की कोशिश की है।

इस बीच, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि अगर आयोग विपक्ष की बात नहीं मानेगा, तो ‘इंडिया’ गठबंधन कोर्ट जाएगा। उनका इल्ज़ाम है कि ये जाँच गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश है।

NDA का जवाब क्या है?

सत्तारूढ़ NDA गठबंधन इस जाँच का समर्थन कर रहा है। उनके नेताओं का कहना है कि विपक्ष हार के डर से बहाने बना रहा है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि वोटर लिस्ट को ठीक करना कानून का हिस्सा है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में लिखा है कि समय-समय पर लिस्ट को अपडेट करना जरूरी है। इससे गड़बड़ियाँ, जैसे मृत लोगों के नाम या गलत लोग, हटाए जा सकते हैं।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि कुछ जगहों पर 20,000 तक फर्जी वोटर हैं। ये जाँच उनको हटाएगी, जिससे विपक्ष को नुकसान होगा। इसलिए वो शोर मचा रहे हैं। NDA का कहना है कि ये जाँच पारदर्शिता लाएगी और सही वोटरों को फायदा होगा।

पहले भी हुआ है ऐसा काम

ये कोई नया काम नहीं है। आज़ादी के बाद से कई बार वोटर लिस्ट को ठीक करने के लिए ऐसे अभियान चले हैं।

  • 1952-56: पहले आम चुनाव के बाद हर साल कुछ इलाकों की लिस्ट को गहन जाँच के साथ ठीक किया गया।
  • 1956: शहरों, मज़दूरों वाले इलाकों और जहाँ लोग ज़्यादा इधर-उधर जाते थे, वहाँ खास जाँच हुई।
  • 1962-66: लोकसभा चुनावों के बाद कुछ सालों में पूरे देश में गहन और छोटी जाँच हुई।
  • 1983-88: गाँवों और शहरों में गहन जाँच हुई।
  • 1995-2002: 1995 और 2002 में भी बड़े स्तर पर लिस्ट ठीक की गई।

बिहार में आखिरी बार 2002 में ऐसी जाँच हुई थी और 2003 में नई लिस्ट छपी थी। उस वक्त किसी ने इसे NRC से नहीं जोड़ा था। लेकिन अब, क्योंकि चुनाव नज़दीक हैं, विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है।

वोटर लिस्ट की जाँच कई तरह से होती है-

  • गहन जाँच: पुरानी लिस्ट को बिना देखे, नए सिरे से जाँच होती है।
  • सारांश जाँच: सिर्फ़ अपडेट किया जाता है, घर-घर नहीं जाते।
  • विशेष जाँच: अगर कहीं गड़बड़ दिखे, तो खास जाँच होती है।
  • मिश्रित जाँच: पुरानी लिस्ट को देखकर और घर-घर जाकर जाँच होती है।

बिहार में अभी मिश्रित जाँच हो रही है, जिसमें 2003 की लिस्ट को आधार बनाया गया है।

विपक्ष का वही पुराना राग

विपक्ष का ये हंगामा कोई नई बात नहीं है। हर बड़े चुनाव से पहले वो कुछ न कुछ मुद्दा उठाते हैं। कभी EVM पर सवाल उठाते हैं, कभी वोटर लिस्ट पर और कभी चुनाव आयोग को बीजेपी का साथी बताते हैं। लेकिन जब विपक्षी पार्टी चुनाव जीत जाती है जैसे पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु में.. तो ये सारे सवाल गायब हो जाते हैं। हारने पर फिर वही इल्ज़ाम शुरू हो जाते हैं, जैसे महाराष्ट्र चुनाव में मिली हार के भूत का पीछा करते हुए अब भी कॉन्ग्रेस हल्ला मचा रही है, जबकि उसे चुनाव आयोग से लेकर हाई कोर्ट तक करारी हार मिल चुकी है।

प्राडा ने मॉडल्स को पहनाई कोल्हापुरी चप्पलें, ₹1 लाख में बेचा… भारत के गुस्से के बाद दिया श्रेय: स्टील से लेकर चावल तक, पश्चिमी देशों की भारतीय संस्कृति से जुड़ी चीजों को चुराने की पुरानी है आदत

हाल ही में इटली के एक लग्जरी ब्रांड प्राडा ने मिलान के रैंपवॉक के लिए अपने स्प्रिंग और समर सीजन के मेंस वियर कलेक्शन 2026 दिखाया। इसमें ब्रांड ने मॉडल्स को चमड़े की चप्पलें पहनाईं और इसे अपना बेहतरीन और ओरिजिनल कलेक्शन बताया। बस इसी के बाद दुनियाभर में प्राडा का तिरस्कार और बवाल शुरू हो गया।

बवाल होना भी लाजिमी है क्योंकि प्राडा जिन चप्पलों को अपनी ‘प्रेरणा’ बता रहा था वह असल में भारतीय कोल्हापुरी चप्पलें हैं जो भारत की एक पारंपरिक हस्तशिल्प की अनूठी पहचान के साथ आम लोगों के लिए गर्व का जरिया भी हैं।

प्राडा ने इन चप्पलों को ₹1,00,000 तक बेच डाला जबकि भारत में यही कोल्हापुरी चप्पलें ₹200 से ₹1000 में ही आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं। प्राडा के इस कलेक्शन की चप्पलें सोशल मीडिया में जैसे ही वायरल हुई वैसे ही भारतीयों का आक्रोश सामने आया।

भारतीयों ने नाराजगी जताते हुए प्राडा से सवाल किया कि ब्रांड ने पीढ़ियों से चली आ रही इस कारीगरी की विरासत के लिए भारत या कोल्हापुर आदि का जिक्र क्यों नहीं किया।

कोल्हापुरी चप्पलों की है अपनी खासियत

भारतीय पारंपरिक हस्तशिल्प में महाराष्ट्र और कर्नाटक के कारीगरों द्वारा चमड़े पर की गई की सदियों की मेहनत और कौशल का दूसरा नाम कोल्हापुरी चप्पल कहा जा सकता है। आमतौर पर इसकी कीमत 500 से 1000 रुपए के बीच है। ये कोल्हापुरी चप्पलें जितनी महीन और बेहतरीन कारीगरी का संगम दिखाती हैं उतनी ही मजबूत और टिकाऊ भी होती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कोल्हापुरी चप्पलों का निर्माण 12वीं या 13वीं शताब्दी से चला आ रहा है। महाराष्ट्र के राजघरानों में रखे गए मोची समूह के कुशल कारीगर इसे हाथ से तैयार करते थे। इसकी एक खासियत ये भी है कि इसे बनाने में लोहे की कीलों का उपयोग नहीं किया जाता।

कोल्हापुरी चप्पलें किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। इसे 2019 में भारत सरकार ने GI टैग भी मिल चुका है। GI Tag उन उत्पादों को मिलता है जो किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े होते हैं और क्षेत्र के आधार पर ही उनकी विशिष्टता तय की जाती है।

आखिरकार झुका प्राडा

भारतीयों की गुस्सा देखने के बाद प्राडा को आखिरकार अपनी गलती माननी पड़ी। प्राडा के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी प्रमुख लोरेंजो बर्टेली ने महाराष्ट्र चेंबर ऑफ कॉमर्स को पत्र लिखकर अपनी गलती मानी और स्वीकार किया कि ये चप्पलें भारतीय परंपरा की सदियों पुरानी विरासत हैं।

बर्टेली ने स्थानीय भारतीय कारीगरों से ‘सार्थक बातचीत’ करने की बात भी कही। हालाँकि भारतीयों का गुस्सा अगर सामने नहीं आता तो शायद प्राडा अपने इस ‘अपने कलेक्शन’ से काफी मुनाफा कमा चुका होता।

भारतीय विरासतों की सदियों से हो रही नकल

यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें भारतीय पारंपरिक उत्पादों या विरासतों की नकल कर उसका फायदा उठाया गया हो। इससे पहले भी कई बड़े ब्रांडों ने न केवल फैशन में बल्कि खानपान और धातुओं में भी चोरियाँ कीं, उनसे मिली प्रसिद्धि का फायदा उठाया और असल देश और लोगों को तवज्जो देना भूल गए।

इटली के ही लग्जरी ब्रांड गूची ने 2021 में ‘ऑर्गेनिक लिनन काफ्तान’ के नाम पर भारतीय कुर्ता बेचा। इसकी कीमत लगभग ₹2.5 लाख थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर ब्रांड का जमकर मजाक बना। अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जारा ने अपने कपड़ों में कई बार भारतीय ब्लॉक प्रिंट्स और डिजाइनों का उपयोग किया है। इसके लिए उसने कभी भारतीय स्रोत को श्रेय नहीं दिया।

इसी तरह लुई वितोन ने बनारसी ब्रोकेट समेत भारतीय कढ़ाई का इस्तेमाल अपने कलेक्शन में किया। हालाँकि उसका कोई भी श्रेय जमीनी कारीगरों को नहीं दिया। इसी तरह भारतीय डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी ने 2021 में H&M के साथ मिलकर ‘वांडरलस्ट’ नाम का कलेक्शन पेश किया। इसमें राजस्थान के सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट का उपयोग किया लेकिन श्रेय नहीं दिया गया। सांगानेरी प्रिंट को भी GI Tag मिला हुआ है।

फैशन के अलावा भी हुईं हैं भारत के उत्पादों की चोरियाँ

मध्यकालीन यूरोप में तलवार की बेहतरीन धार और काफी मजबूत धातु के तौर पर दमिश्क स्टील प्रसिद्ध हुआ था। 12वीं सदी में यूरोप से ईसाइयत को बढ़ाने के लिए निकले योद्धाओं ने पश्चिम एशिया स्थित सीरिया की राजधानी दमिश्क में सबसे पहले ऐसी तलवारों को देखा जो रेशम के कोमल कपड़ों को भी हवा में काट देती थीं। उस जगह के नाम पर ही उन्होंने इस तलवार को दमिश्क स्टील नाम दिया।

हालाँकि असल में ये दमिश्क स्टील भारत की उत्पत्ति है। भारत से इसे पश्चिम एशिया में निर्यात किया जाता था। मूल रूप से वुट्ज स्टील (wootz steel) से बने दमिश्क स्टील को केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में तैयार किया जाता था। असल में वुट्ज स्टील का नाम तमिल के ‘उक्कू’ शब्द से आया है जिसका अर्थ इस्पात होता है।

ये स्टील 1-1.5% कार्बन से बना हाइपरयूटेक्टाइड स्टील होता था। इसके कारण ही ये दुनिया में सबसे सबसे अधिक मजबूत और धारदार होता था। भारत की इस धातु से बनी तलवारें आज भी यूरोपीय और एशियाई संग्राहलयों में हैं लेकिन इनसे भारत का नाम गायब हो गया है।

भारतीय उपमहाद्वीप की विरासत बासमती चावल भी हुए चोरी

भारतीय उपमहाद्वीप में पारंपरिक रूप से उगाए जाने वाले सुगंधित बासमती चावल भी चोरी होने से अछूते नहीं रह पाए। भारत और पाकिस्तान में होने वाली बासमती चावलों की खेती पर अमेरिकी कंपनी राइसटेक (RiceTec Inc.) ने 1997 में अमेरिकी पेटेंट करवाया। इसके बाद वहाँ उगने वाले बासमती चावलों को टैक्समती (Texmati) और जैसमती (Jasmati) कहकर बेचना शुरू कर दिया।

इसके बाद भारत ने बासमती को GI Tag देने की प्रक्रिया शुरू की। 18 साल की कानूनी लड़ाई के बाद बासमती को वैश्विक मान्यता और GI Tag मिल पाया।

नकल कर मुनाफा कमाने की पुरानी चाल

प्रेरणा के नाम पर बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड सदियों से चली आ रही पारंपरिक विधाओं के साथ कुशल कारीगरों की मेहनत का भी अपनी सुविधानुसार मजाक बनाते हैं। खुद का उत्पाद बताकर अच्छा खासा मुनाफा कमा लेते हैं, दुनियाभर में नाम कमा लेते हैं।

इसके बाद जब उनकी नकल पकड़ में आती है तो धीरे से माफी माँगकर बात को रफा-दफा कर देने का तरीका अपना लेते हैं। इन सब के बीच नुकसान सिर्फ और सिर्फ उन कुशल हाथों का होता है जिनकी पीढ़ियाँ इसी काम के बलबूते कमाती-खाती और अपनी पहचान स्थापित करती आई हैं।

जब कारीगर बार-बार अपने हुनर का मजाक बनते देखते हैं तो उनमें हताशा साफ तौर पर दिखती है। हतोत्साहित होने के साथ वे स्वयं को छला हुआ पाते हैं। तब वे इसे छोड़ने का मन बना लेते हैं ताकि उनकी अगली पीढ़ी इस निराशा से न जूझे।

ऐसे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार और कानून- नियम निर्माताओं की है कि वे हमारी विरासत को संजोने के लिए इतने कड़े नियामक तय कर दें कि कोई भी ब्रांड ‘असल कला’ की नकल करने से पहले उसके परिणामों से डर जाएं। तभी इस तरह के आधुनिक ब्रांड उन कुशल कारीगरों के पेट पर लात मारने या उनकी प्रतिभा का फायदा उठाने से पहले दो बार सोचेंगे।