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दावा 20000 कमरों का, मिले 7000 ही: दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने बताया- किचन-टॉयलेट को भी क्लासरूम में गिनती थी केजरीवाल सरकार, ₹49 लाख की ‘देशभक्ति’ के प्रचार पर खर्च किए ₹11 करोड़

दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए थे। जितने क्लासरूम बनाने का दावा केजरीवाल सरकार करती थी, उसका एक तिहाई ही असल में निर्माण हुआ था। वहीं एक ₹4 करोड़ की योजना के प्रचार के लिए ₹20 करोड़ का खर्च किया गया था। यह सारे खुलासे के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने किए हैं।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र की चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के विषय में कई आँकड़े रखे हैं। उन्होंने शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को बताया कि केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए।

मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार जिन्हें क्लासरूम बताती थी, वह असल में स्टोररूम, किचन और बाकी कामों के लिए बनाए जाने वाले कमरे थे।

केजरीवाल सरकार ने शौचालयों तक को बच्चों की पढ़ाई का कमरा बता दिया था। मंत्री सूद ने बताया है कि भाजपा सरकार अब लोक निर्माण विभाग (PWD) को इस विषय में आदेश देगी कि वह मात्र क्लास रूम को ही गिने ना कि बाकी तरह के निर्माण को।

शिक्षा मंत्री सूद ने यह भी बताया है कि केजरीवाल सरकार के दौरान स्कूलों में हैप्पीनेस करिकुलम नाम का पाठ्क्रम जोड़ा गया था। इस पर ₹4 करोड़ खर्च किए गए थे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसके प्रचार पर ₹20 करोड़ का खर्च कर डाला।

उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल की सरकार के दौरान देशभक्ति करिकुलम पर ₹49 लाख खर्च किए गए और इसके प्रचार पर ₹11 करोड़ से अधिक खर्च कर दिए गए। आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी से कहा कि उनके कर्म वापस उनके पास आएँगे।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने ₹1300 करोड़ का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।

आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।

शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।

ST की कुलदेवी को हटाकर बनाया ‘माता मरियम का मंदिर’, अकेले तापी में बन गए 1500 चर्च: दक्षिण गुजरात में ईसाई धर्मांतरण से हिंदू कार्यकर्ताओं ने किया आगाह

गुजरात के जनजाति बहुल क्षेत्रों में तेजी से ईसाई मिशनरियाँ घुसपैठ कर रही हैं। भोले-भाले आदिवासियों का धर्मांतरण करके इस इलाके की जनसांख्यिकी बदलने का काम तेजी से चल रहा है। इन सबके बावजूद सरकार से लेकर मीडिया तक इस मुद्दे पर सुप्त अवस्था में है। हिन्दू कार्यकर्ता लगातार इस समस्या से लड़ रहे हैं, लेकिन वह भी अब हार रहे हैं।

कथावाचक मोरारी बापू के एक ऐलान के बाद ईसाई धर्मांतरण की यह समस्या एक बार फिर चर्चा में आई है। मोरारी बापू ने यहाँ ईसाई धर्मांतरण रोकने के लिए हर नए खुलने वाले स्कूल को ₹1 लाख दान देने का वादा किया है। उन्होंने इस मामले में राज्य सरकार से ध्यान देने की बात कही है।

जमीनी स्थितियाँ, आँकड़े और स्थानीय लोगों के अनुभव बताते हैं कि अगर सरकार ने जल्द इस विषय में कोई एक्शन नहीं लिया तो तो बहुत जल्द इस इलाके में बड़े बदलाव आएँगे। इसकी शुरुआत हो चुकी है और एक्शन के लिए काफी कम समय बचा है।

ऑपइंडिया ने इस मामले में ईसाई धर्मांतरण से प्रभावित वापी जिले के कार्यकर्ताओं से बात की है। यह कार्यकर्ता देव बिरसा सेना के हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में इस पूरे गठजोड़ पर प्रकाश डाला। देव बिरसा सेना के नेता अरविंद वसावा का कहना है कि महज कुछ वर्षों में तापी में करीब 1,500 छोटे-बड़े चर्च स्थापित हो गए हैं और उनमें से अधिकांश अवैध हैं।

इसके अलावा, यहाँ ईसाइयों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार कोई भी धर्म परिवर्तन नहीं कर रहा है। इस मुद्दे पर हिंदू संगठनों द्वारा भी बड़ी लड़ाई लड़ी जा रही है। उनकी माँग है कि इस गतिविधि पर तभी नियंत्रण होगा जब धर्म परिवर्तन करने वालों को जनजाति सूची से बाहर कर दिया जाएगा।

प्रलोभन और अंधविश्वास से बना रहे ईसाई

देव बिरसा सेना के कार्यकर्ता अरविंद वसावा का कहना है कि पूरा तापी-सोनघर इलाका जनजातीय इलाका है। उन्होंने आरोप लगाया कि यहाँ अवैध रूप से 1500 चर्च स्थापित किए गए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले ईसाई पादरी क्षेत्र में सार्वजनिक बैठकों और प्रार्थना सभाओं से लेकर कई कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

वसावा का सवाल है कि जब यह पूरा इलाका कानूनी तौर पर जनजातीय इलाका है और यहाँ सरकारी रिकॉर्ड में कोई भी ईसाई नहीं बना है तो फिर यहाँ इन कार्यक्रमों को क्यों अनुमति दी जा रही है। वसावा ने आरोप लगाया कि ईसाई मिशनरियाँ विभिन्न प्रलोभन देकर और अंधविश्वास फैलाकर आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहे हैं।

उन्होंने बताया है कि कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से ईसाई नहीं बन पाया है। उनका कहना है कि संविधान में जनजातियों संस्कृति को संरक्षण दिए जाने के बावजूद इन क्षेत्रों में इतनी बड़ी संख्या में चर्च बनाए गए हैं और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

सरकारी रिकॉर्ड में नहीं किया जाता बदलाव

वसावा ने आगे बताया, “धर्म परिवर्तन के लगातार सबूत माँगे जाते हैं। लेकिन धर्म परिवर्तन करने वाले लोग कभी भी सार्वजनिक रूप से अपने ईसाई होने का प्रमाण नहीं देते। वे निजी चर्चाओं तक ही धर्म परिवर्तन की बातें सीमित रखते हैं। पूरे दक्षिण गुजरात में जनजातीय समुदाय है, वहाँ ईसाई नहीं हैं, फिर तापी जैसे जिलों के गाँवों में चर्च क्यों बनाए गए?”

वसावा ने कहा, “हम वनवासी हैं, तो हमारे इलाके में ईसाई जनसभा और बड़े कार्यक्रमों की क्या ज़रूरत है? अलग-अलग राज्यों से ईसाई पादरी, प्रचारक और बड़े लोग सिर्फ़ यहीं सभा करने क्यों आते हैं? यहाँ कोई जब कागजी तौर पर ईसाई नहीं हैं तो उनके यहाँ आने की क्या आवश्यकता है। अगर इस इलाके में कोई ईसाई है, तो सरकारी रिकॉर्ड दिखाइए।”

वसावा ने आरोप लगाया कि मिशनरियों द्वारा ईसाइयत में धर्मांतरित लोगों को सरकारी अभिलेखों में केवल जनजातीय हिंदू के रूप में लिखवाया जाता है। वे अन्य सभी जनजातीय संस्कृतियों, परंपराओं और त्योहारों का भी बहिष्कार कर रहे हैं।

वसावा ने बताया कि यह धर्मांतरित लोग अपनी ही संस्कृति के त्योहारों के लिए दान इकट्ठा करते समय भी पैसा नहीं देते। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा,”इस तरह तो अगली दूसरी या तीसरी पीढ़ी में हम और हमारी संस्कृति दोनों ही खत्म हो जाएगे, हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।”

भाजपा विधायक पर भी आरोप

आदिवासियों को धर्मांतरण से बचाने वाले संगठन ने स्थानीय भाजपा विधायक मोहन कोंकणी पर भी कई आरोप जड़े हैं। उन्होंने दावा किया कि कोंकणी एक ऐसे कार्यक्रम में मौजूद थे जहाँ ईसाई धर्मांतरण की बात हो रही थी। उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ है।

वीडियो में कोंकणी को ईसाई संप्रदाय के एक सार्वजनिक समारोह में मुख्य अतिथि और वक्ता के रूप में भाषण देते हुए देखा गया। इस वीडियो में वहाँ मौजूद लोगों से कह रहे थे कि वे ईसाई कार्यक्रम में अन्य लोगों को भी लेकर आएँ। देव बिरसा सेना ने कहा है कि विधायक ने जनसभा में खुलेआम मिशनरियों को प्रोत्साहित किया और उनसे अन्य लोगों को भी वहाँ लाने को कहा।

इस घटना के बारे में वसावा ने कहा, “कोंकणी विधायक खुद लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं करते, बल्कि वे उन्हें प्रोत्साहित करते हैं और माहौल बनाते हैं। उनके गाँव के बगल में हरिपुरा नाम का एक गाँव है, यहाँ पहाड़ी पर चर्च बनाया गया है और सड़कें और लाइटें भी लगाई गई हैं। यह सब किसके लिए हो रहा है?”

वसावा ने आगे कहा, “विधायक मोहन कोंकणी का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वे ईसाइयों वाली भाषा बोल रहे हैं। वे एक कट्टर ईसाई हैं और उन्हें देखकर कई जनजातीय लोग भी उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। कोंकणी के वीडियो में जीसस प्रभु और मदर मैरी जैसे शब्दों का भी उल्लेख किया गया है।”

ईसाइयों ने हटाई कुलदेवी, पहाड़ी पर किया कब्जा

अरविंद वसावा ने सोनगढ़ तालुका के नियाना बंदरपाड़ा गाँव में एक पहाड़ी पर स्थित एक हिंदू मंदिर के विषय में भी बताया है। उन्होंने कहा कि गिद्धमाड़ी आया डूंगर जनजाति की कुलदेवी माता का निवास स्थान है और हिंदू वहाँ पूजा-अर्चना करते हैं।

उन्होंने आगे बताया कि समय के साथ क्षेत्र में तेजी से बढ़ती ईसाई आबादी के कारण इस पहाड़ी पर आवागमन धीरे-धीरे कम हो गया और फिर ईसाई मिशनरियों ने वहाँ अपना स्थान स्थापित कर लिया जिसे ‘माता मरियम का मंदिर’ कहा जाता है।

अरविंद वसावा ने बताया है कि आज आदिवासियों को उस पहाड़ी में जाने तक नहीं दिया जाता है। जनजातीय लोग अपनी कुलदेवी की पूजा या आराधना भी नहीं कर सकते। वसावा ने बताया है कि ईसाइयों ने वहाँ पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है। उनका दावा है कि जब त्योहारों में जनजातीय लोग पूजा करने के लिए मंदिर जाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें भी भगा दिया जाता है।

कार्यकर्ताओं की सरकार से क्या अपेक्षा?

देव बिरसा सेना के अरविंद वसावा ने ऑपइंडिया के माध्यम से सरकार से दक्षिण गुजरात में धर्मांतरण रोकने और अवैध निर्माण को हटाने की माँग की है। उन्होंने सरकार से उनकी संस्कृति को बचाने के लिए सहायता चाहते हैं।

उन्होंने कहा, “हमारी जनजातीय संस्कृति, परंपरा, भाषा और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कृपया हमारा सहयोग करें और किसी भी कीमत पर ऐसी अवैध गतिविधियों को रोकें। आज कई गाँव ऐसे हैं जहां सिर्फ 10 जनजातीय लोग बचे हैं। बाकी सभी ने अपने पूर्वजों की परंपराओं और कुलदेवी-देवताओं को त्याग दिया है।”

उन्होंने कहा, “यहाँ के लोगों ने जनजातीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए विदेशी ताकतों से भी हाथ मिला लिया है। सरकार से हमारी बस यही माँग है कि हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज और हमारे पूर्वजों की विरासत बची रहे और हमारा अस्तित्व बचा रहे। हम सरकार से साफ अपील करते हैं कि वह हमारे पक्ष में आए, हमारी मदद करे…हमें और कुछ नहीं चाहिए।”

वायरल वीडियो में विधायक कोंकणी ने क्या कहा?

भाजपा विधायक मोहन कोंकणी ईसाई समुदाय द्वारा आयोजित एक सभा में वनवासी समुदाय को संबोधित करने गए थे। वनवासी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वायरल वीडियो में मोहन कोंकणी द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा किसी ईसाई पादरी जैसी लगती है।

अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने कहा, “प्रभु यीशु मसीह के नाम पर, मैं सभी को अपना प्रेमपूर्ण अभिवादन करता हूँ और मुझे बोलने का अवसर देने के लिए परमेश्वर पिता को धन्यवाद देता हूँ।” उन्होंने अपने संबोधन में ‘यूहन्ना’ शब्द का उपयोग किया।

उन्होंने कहा, “यूहन्ना (जो यीशु मसीह के जन्म से पहले आए थे, या यीशु के कार्य के लिए भेजा गया था) ने पहले अध्याय में लिखा है, “जितने लोगों ने उसे ग्रहण किया और उसका अनुसरण किया, उन्हें उसने परमेश्वर (यीशु मसीह) की संतान बनने का अधिकार दिया।”

वायरल वीडियो में कोंकणी ने वह न्यू टेस्टामेंट (ईसाई बाइबिल) को लेकर कहते हैं कि इसमें लिखा है, “तुम सब के सब मेरी शरण में आओ… ईश्वर यहाँ चमत्कारी कार्य करने आए हैं और उन्होंने आप लोगों को स्वीकार कर लिया है।” कोंकणी ने इस कार्यक्रम में और लोगों को लेकर आने को कहा।

विधायक कोंकणी ने क्या कहा?

ऑपइंडिया ने इस मामले को लेकर विधायक मोहन कोंकणी से भी बात की। उन्होंने कहा कि वह धर्मांतरण को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं और अगर ऐसा कर रहे हैं तो इस पर सबूत पेश कर कार्रवाई की जानी चाहिए। उनसे जब वायरल वीडियो के विषय में पूछा गया तो भी उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

उन्होंने कहा कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में जाना चाहिए और वहाँ अच्छा बोलना चाहिए। उनसे यह भी पूछा गया कि यदि तापी क्षेत्र में कानूनी रूप से कोई ईसाई नहीं है, तो फिर देश के सबसे बड़े पादरी और ईसाई प्रचारक वहाँ बैठकें करने क्यों आते हैं?

कोंकणी ने कहा कि देश में हर कोई स्वतंत्र है, इसलिए वे कहीं भी बैठक कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ने इसकी अनुमति दी होती तो इस बारे में पुलिस से पूछना ज्यादा उचित होता। उन्होंने यह भी दावा किया है कि इस विवाद के संबंध में उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया है।

उनसे स्थानीय लोगों के इस आरोप के बारे में भी पूछा गया कि वह ईसाई धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं। जवाब में उन्होंने कहा कि भले ही यह अंदरूनी तौर पर हो रहा हो, लेकिन सबूत मुहैया कराए जाने चाहिए और कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा, जब हमने देव बिरसा सेना का जिक्र किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी सेना के बारे में जानकारी नहीं है।

पूरी चर्चा के दौरान विधायक ने केवल साक्ष्यों की बात की तथा अपनी संलिप्तता से स्पष्ट इनकार करने के बजाय, साक्ष्य जुटाने तथा कार्रवाई करने की बात कही।

दक्षिण गुजरात में भयावह स्थिति

दक्षिण गुजरात और विशेषकर तापी-डांग में गुप्त ईसाई धर्मांतरण कार्यक्रम और अभियान लंबे समय से चल रहे हैं। लेकिन मोरारी बापू के मंच से दिए गए बयान के बाद इस पर अब चर्चा चालो हो गई है। मोरारी बापू ने कहा कि इस क्षेत्र के अधिकांश शिक्षक ईसाई हैं और वे जनजातीय बच्चों को ईसाई बना रहे हैं।

इस बयान के बाद विधायक मोहन कोंकणी ने बापू के बयान का खंडन किया और कुछ दिनों बाद वे ईसाई समुदाय के एक विशाल कार्यक्रम में पहुंचे। इसके बाद से उनका वीडियो वायरल हो रहा है और धर्मांतरण के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है।

लेकिन, हकीकत यह है कि इन घटनाओं से पहले भी तापी-डांग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मांतरण हो रहा था। दिसंबर 2022 में तापी के सोनगढ़ में नाना बंदरपाड़ा के जराली गाँव में एक हिंदू मंदिर को हटाया गया था, इससे विवाद पैदा हो गया था।

पुलिस के दखल के बाद हिंदुओं को पूजा का अधिकार दे दिया गया, लेकिन वे अभी भी वहाँ नहीं जा पा रहे हैं। स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि उन्हें ईसाइयों द्वारा धमकाया जा रहा है और पूजा करने से रोका जा रहा है। वर्ष 2022 में तापी से एक परिवार के 5 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था।

उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने हिंदू आदिवासियों को धोखा देकर उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया था। इसके अलावा, जुलाई 2023 में तापी के सोनगढ़ स्थित सरकारी स्कूल में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बाइबल पाठ का आयोजन किया गया था। इसको लेकर भी प्रदर्शन हुए थे।

न केवल तापी या डांग में, बल्कि दक्षिण गुजरात के नवसारी में भी हाल ही में दो ईसाई शिक्षकों को गिरफ्तार किया गया था। वे सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म का अपमान कर रहे थे और ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए लोगों को गुमराह कर रहे थे। उसका वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने भी कार्रवाई की।

नवसारी में एक सामाजिक संगठन से जुड़े कार्यकर्ता रवि नायक ने ऑपइंडिया को बताया कि नवसारी के ग्रामीण इलाकों में भी बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन अभियान चल रहा है। ये तो कुछ मामले हैं जो प्रकाश में आए हैं। अनगिनत मामले तो ऐसे हैं जिन्हें कोई कवरेज नहीं मिला।

बंगाल के मालदा में हिंसा, दावा- हिंदुओं के घरों-दुकानों को ‘मुस्लिम भीड़’ ने चुन-चुनकर बनाया निशाना: गवर्नर को लिखा पत्र- सनातनियों की रक्षा के लिए केंद्रीय बल करें तैनात

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मोथाबाड़ी क्षेत्र में गुरुवार (27 मार्च 2025) को सांप्रदायिक हिंसा की खबरें सामने आई हैं। इसको लेकर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। वायरल हो रहे वीडियो में हिंसक भीड़ को सड़कों पर मार्च करते हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हुए देखा जा सकता है। आरोप है कि मुस्लिम भीड़ हिंदू व्यापारियों की दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बना रही है।

हिंसा की जानकारी देते हुए बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने राज्य सरकार को निर्देश देने की माँग की है कि मोथाबारी क्षेत्र में हिंदुओ की सुरक्षा के लिए CAPF (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) की तैनाती की जाए। सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया है कि इलाके में हिंदुओं को खतरा बढ़ता जा रहा है और उनकी सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

BJP विधायक सुवेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर कुछ वीडियो भी साझा किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मोथाबाड़ी में बिना उकसावे के हिंदू व्यापारियों की दुकानों को निशाना बनाया जा रहा है। भाजपा नेता ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से इन हमलों को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई करने की अपील की है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया कि दोपहर 1 बजे से इन हमलों की शुरुआत हुई।

केंद्रीय शिक्षा और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास राज्यमंत्री डॉक्टर सुकांत मजूमदार ने भी इन घटनाओं के वीडियो साझा करते हुए लिखा, “दक्षिण मालदा के मोथाबाड़ी से भयावह दृश्य- हिंदू घरों और दुकानों को हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ा गया। ममता बनर्जी और उनकी मूकदर्शक बंगाल पुलिस क्या कर रहे हैं? चुप्पी। यह उनकी बेशर्म तुष्टीकरण राजनीति की कीमत है- कानूनहीनता, भय और हिंदुओं के साथ अन्याय!”

सुकांत मजूमदार द्वारा शेयर किए गए वीडियो में से एक में दिख रहा है कि हिंसक भीड़ बिना किसी उकसावे के दुकानों में तोड़फोड़ कर रही है। भीड़ के हाथों में इस्लामी झंडे भी हैं। वहीं, दूसरे वीडियो में संपत्तियों और घरों में तोड़फोड़ की घटना दिख रही है। BJP IT सेल हेड अमित मालवीय ने भी अपने सोशल मीडिया साइट पर एक वीडियो साझा किया है।

उन्होंने कहा कि मोथाबाड़ी में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही है, जहाँ मुस्लिम समुदाय की भीड़ बिना किसी उकसावे के हिंदू घरों, दुकानों और वाहनों पर हमला कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पर लंदन में होने और राज्य में हो रही इस अराजकता से बेखबर रहने का आरोप लगाया है। दरअसल, इन वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की गई है और ना ही बंगाल सरकार या पुलिस अधिकारियों द्वारा घटना पर कोई बयान दिया गया है।

भारत कोई धर्मशाला नहीं… जानिए मोदी सरकार के इमिग्रेशन बिल से कैसे घुसपैठ पर लगेगी लगाम? 4 पुराने कानून खत्म, विदेशियों को 6 श्रेणी में बाँटा

लोकसभा में गुरुवार (27 मार्च 2025) को इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट (Immigration and Foreigners Act) 2025 पास हो गया है। यह नया कानून भारत में विदेशियों के आने, रुकने और जाने को कंट्रोल करने के लिए बनाया गया है। इस बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ-साफ कहा कि भारत उन लोगों का स्वागत करता है जो पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या व्यापार के लिए यहाँ आते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है। यानी जो लोग गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

यह नया कानून पुराने इमिग्रेशन से जुड़े कई कानूनों को खत्म करता है, जैसे कि पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920, 1939 का विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1946 का विदेशियों का अधिनियम और साल 2000 का इमिग्रेशन कानून। इस नए बिल का मकसद है कि इमिग्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जाए और अवैध तरीके से भारत में घुसने वालों को रोका जाए। आइए, इस बिल की सारी अहम बातों को एक-एक करके समझते हैं, ताकि आपको पता चल सके कि यह कानून क्या कहता है और इसका असर क्या होगा।

क्या है इस बिल का मकसद?

सबसे पहले बात करते हैं कि यह बिल क्यों लाया गया? दरअसल, भारत में हर साल लाखों लोग बाहर से आते हैं। कुछ लोग टूरिस्ट बनकर, कुछ पढ़ाई के लिए, कुछ बिजनेस के लिए और कुछ शरण लेने के लिए। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि लोग गलत तरीके से भारत में घुस आते हैं या अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुक जाते हैं। ऐसे लोगों की वजह से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

इस नए कानून का मकसद है-

  • भारत में आने-जाने की प्रक्रिया को आसान और साफ-सुथरा बनाया जाए।
  • अवैध तरीके से घुसने वालों को रोका जाए।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जाए।
  • जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, जैसे टूरिस्ट, स्टूडेंट्स या बिजनेसमैन, उनके लिए रास्ता आसान हो।
  • शरणार्थियों को भी सही तरीके से मदद मिले, जो अपने देश में मुसीबत की वजह से भारत आते हैं।

यह कानून केंद्र सरकार की ओर से आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित होने के बाद लागू होगा। यानी जब सरकार इसकी आधिकारिक घोषणा कर देगी, तभी से यह लागू हो जाएगा।

विदेशियों को छह श्रेणियों में बाँटा गया

इस बिल की एक खास बात यह है कि इसमें विदेशियों को छह अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा गया है। इससे यह साफ हो जाता है कि किस तरह के विदेशी को क्या अधिकार मिलेंगे और उनकी क्या जिम्मेदारियाँ होंगी। इन श्रेणियों में शामिल हैं-

टूरिस्ट (पर्यटक): जो लोग घूमने-फिरने के लिए भारत आते हैं।

स्टूडेंट्स (छात्र): जो पढ़ाई के लिए भारत आते हैं।

बिजनेस वीजा होल्डर (व्यापारी): जो बिजनेस या व्यापार के लिए आते हैं।

शरणार्थी: जो अपने देश में उत्पीड़न की वजह से भारत में शरण लेने आते हैं।

अवैध अप्रवासी: जो बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसते हैं।

अन्य: इसमें वो लोग आते हैं जो किसी और वजह से भारत में हैं, जैसे मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए।

इस तरह से श्रेणियाँ बनाकर सरकार ने यह साफ कर दिया है कि हर तरह के विदेशी के लिए अलग नियम होंगे।

कानून में सख्त सजा का प्रावधान

इस बिल में सबसे ज्यादा जोर सख्ती पर दिया गया है। अगर कोई विदेशी गलत तरीके से भारत में घुसता है, जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है या अपने वीजा के नियम तोड़ता है, तो उसके लिए सख्त सजा का प्रावधान है। इसके लिए अलग-अलग तरह की सजा भी होगी, जिसमें…

अवैध प्रवेश: अगर कोई बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसता है, उसे अवैध अप्रवासी माना जाएगा। ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है, निर्वासित (देश से बाहर निकाला) किया जा सकता है या ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा।

वीजा की समय सीमा से ज्यादा रुकना: अगर कोई अपने वीजा की अवधि से ज्यादा वक्त तक भारत में रुकता है, तो उसे भी सजा मिलेगी। मामूली उल्लंघन में 5 साल तक भारत में दोबारा आने पर रोक लग सकती है। साथ ही चेतावनी या जुर्माना भी हो सकता है।

बार-बार गलती करने वालों पर सख्ती: अगर कोई बार-बार नियम तोड़ता है, तो उस पर और सख्त कार्रवाई होगी। लंबे समय तक भारत में आने पर रोक लग सकती है।

अवैध रूप से दोबारा घुसने की कोशिश: अगर कोई निर्वासित व्यक्ति दोबारा अवैध तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करता है, तो उसे 10 साल की जेल और आजीवन भारत में आने पर रोक लग सकती है।

बड़े अपराध: अगर कोई धोखाधड़ी, गंभीर अपराध या आतंकवाद जैसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो उसे तुरंत निर्वासित किया जाएगा, जेल होगी और हमेशा के लिए ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा।

शरणार्थियों के लिए खास प्रावधान

इस बिल में शरणार्थियों को भी ध्यान में रखा गया है। जो लोग अपने देश में उत्पीड़न की वजह से भारत में शरण लेने आते हैं, उनके लिए बेहतर सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं। यह प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से बनाए गए हैं, ताकि भारत अपनी मानवीय जिम्मेदारियों को निभा सके। ऐसे लोगों को कानूनी मान्यता और सहायता दी जाएगी, ताकि वे सुरक्षित रह सकें।

वीजा प्रक्रिया को बनाया गया आसान

जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, जैसे टूरिस्ट, स्टूडेंट्स या बिजनेसमैन, उनके लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। नए कानून के तहत वीजा लेने की प्रक्रिया को सरल किया गया है, ताकि लोगों को ज्यादा परेशानी न हो। ई-वीजा की 9 श्रेणियाँ बनाई गई हैं, इनमें ई-पर्यटन वीजा, ई-व्यापार वीजा, ई-चिकित्सा वीजा, चिकित्सा परिचारक वीजा, ई-आयुष वीजा, ई-प्रचारक वीजा, ई-छात्र वीजा और ई-छात्र आश्रित वीजा शामिल हैं। भारत में रुकने और जाने की प्रक्रिया को भी सुगम बनाया गया है।

इसके साथ ही कुछ सख्त नियम भी जोड़े गए हैं। जिसमें…

1- टूरिस्ट और स्टूडेंट्स को किसी भी तरह की नौकरी या बिजनेस करने की इजाजत नहीं होगी।

2- बिजनेस वीजा वालों को भारत में सैलरी वाली नौकरी करने की अनुमति नहीं होगी।

3- अगर कोई वीजा होल्डर किसी अपराध या धोखाधड़ी में शामिल पाया जाता है, तो उसका वीजा रद्द कर दिया जाएगा।

4- अगर वीजा जाली दस्तावेजों से लिया गया है, या कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, तो भी वीजा रद्द होगा।

FRRO को सूचना देना जरूरी

इस बिल में एक और अहम नियम है। अगर कोई विदेशी भारत में है और उसकी दी गई जानकारी में कोई बदलाव होता है, जैसे – पता बदलना, नौकरी बदलनी या यूनिवर्सिटी बदलनी, तो उसे तुरंत फॉरेन रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) को सूचित करना होगा। अगर कोई इस नियम को नहीं मानता, तो उसे जुर्माना भरना पड़ सकता है या उसे देश से निकाल दिया जा सकता है।

किन लोगों को माना जाएगा अवैध अप्रवासी?

इस बिल में साफ तौर पर बताया गया है कि अवैध अप्रवासी कौन होगा। अगर कोई व्यक्ति बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसता है, या अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुकता है, तो उसे अवैध अप्रवासी माना जाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे ऐसे लोगों को हिरासत में लें, निर्वासित करें या ब्लैक लिस्ट में डाल दें।

क्या कहते हैं आँकड़े?

इस बिल में कुछ आँकड़े भी दिए गए हैं, जो बताते हैं कि भारत में अवैध अप्रवास का मसला कितना बड़ा है। 20 मार्च 2025 तक के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 14 लाख लोग बिना सही दस्तावेजों के रह रहे हैं। इनमें से 5% लोग बांग्लादेश से हैं, 5% श्रीलंका से, 5% म्यांमार से और 5% अफगानिस्तान से हैं। बाकी 80% लोग नेपाल, भूटान, मालदीव और अफ्रीकी देशों से हैं।

इन लोगों में से 5% टूरिस्ट हैं, 5% स्टूडेंट्स, 5% बिजनेस वीजा होल्डर, 5% शरणार्थी, और 5% अवैध अप्रवासी हैं। बाकी 70% अन्य श्रेणियों में आते हैं। इनमें से 5% लोग बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसे हैं, 5% ने जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, और 5% ने अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुकने की कोशिश की है। बाकी 85% ने अन्य नियम तोड़े हैं। इन लोगों में से 5% को चेतावनी दी गई है, 5% पर जुर्माना लगाया गया है, 5% को निर्वासित किया गया है, और 5% को ब्लैक लिस्ट में डाला गया है। बाकी 80% पर अन्य कार्रवाई की गई है।

इन आँकड़ों से साफ है कि अवैध अप्रवास एक बड़ा मसला है और इस नए कानून के जरिए सरकार इसे रोकने की कोशिश कर रही है।

क्या होगा इसका असर?

इस नए कानून का असर कई तरह से देखने को मिलेगा। इस बिल से-

  • अवैध अप्रवास पर लगाम लगेगी। जो लोग गलत तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करेंगे, उनके लिए सजा सख्त होगी, जिससे ऐसे मामले कम हो सकते हैं।
  • जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, उनके लिए प्रक्रिया आसान होगी।
  • शरणार्थियों को कानूनी मदद मिलेगी, जिससे उनकी जिंदगी बेहतर हो सकती है।

इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट 2025 एक ऐसा कानून है, जो भारत में इमिग्रेशन की प्रक्रिया को साफ-सुथरा और सुरक्षित बनाने की कोशिश करता है। इसके खंड और उपखंड साफ तौर पर बताते हैं कि विदेशियों को क्या करना होगा और क्या नहीं। यह कानून अवैध अप्रवास को रोकने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और सही मकसद से आने वालों को आसानी देने के लिए बनाया गया है। इसमें शरणार्थियों के हक की भी रक्षा की गई है।

नाबालिग से 10 युवकों ने किया रेप, Video बनाकर कहा- जब बुलाएँगे, आना होगा: पीड़िता की माँ बोली- शिकायत करने पर SC-ST एक्ट में फँसाने की दी धमकी, बिहार के दरभंगा की घटना

बिहार के दरभंगा में दलित समाज 10 लड़कों ने 16 साल की एक नाबालिग युवती के साथ गैंगरेप किया। लड़की जब बेहोश हो गई तो आरोपित उसे नंग-धड़ंग छोड़कर भाग निकले। आरोपितों ने बलात्कार का वीडियो भी बनाया और पीड़िता से कहा कि जब भी बुलाया जाएगा तो उसे आना पड़ेगा। शिकायत करने पर पीड़िता के परिवार को SC-ST Act में फँसाने की धमकी भी दी। पुलिस ने 2 आरोपितों को पकड़ा है।

यह मामला दरभंगा के बहेड़ा थाना क्षेत्र के एक गाँव की है। पीड़िता ने 25 मार्च 2025 को गाँव के चौकीदार के बेटे दुर्गेश पासवान को मुख्य आरोपित बनाते हुए कुल 10 लोगों के खिलाफ गैंगरेप की FIR दर्ज कराई। प्राथमिकी में लड़की की माँ ने बताया कि यह घटना 15 मार्च की शाम की है। मामले में 10 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराने को लेकर पीड़िता की माँ ने कहा कि आरोपितों ने शिकायत करने पर हरिजन एक्ट में फँसाने की धमकी दी थी।

FIR के अनुसार, पीड़िता 15 मार्च की देर शाम को शौच के लिए गई थी। उसी दौरान चौकीदार का बेटा दुर्गेश पासवान मिला। उसने लड़की को बहलाकर धोबीया गाछी में ले गया। वहाँ सुमित पासवान, दिलखुश पासवान, सचित पासवान, अमित पासवान, अंकुश पासवान, सुजीत पासवान, विशाल पासवान, राघव पासवान और अंकित पासवान मौजूद थे। वे सभी नशे में थे।

आरोपितों ने पीड़िता का बारी-बारी से रेप किया। जब लड़की देर रात तक घर नहीं लौटी तो घर वालों ने उसकी खोजबीन शुरू कर दी। पीड़िता की माँ ने बताया कि उसकी बेटी पासवान टोला के पास बेहोशी हालत में मिली। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, घटना के दौरान जब पीड़िता बेहोश हो गई तो आरोपितों ने उसे जख्मी और नंगी हालत में छोड़कर वहाँ से भाग निकले।

पीड़िता की माँ का कहना है कि बेटी को घर लाया गया। जब वह होश में आई तो उसने घटना की जानकारी दी। पीड़िता ने बताया कि आरोपितों ने उसका अश्लील वीडियो भी बनाया है और धमकी दी थी कि अगर शिकायत की तो पूरे परिवार को एसटी-एससी एक्ट में फँसा दिया जाएगा। परिजनों का कहना है कि वे लोक-लाज और हरिजन एक्ट के डर से चुप्पी साध ली।

भास्कर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
दरभंगा गैंगरेप पीड़िता की माँ का दैनिक भास्कर में प्रकाशित बयान का स्क्रीनशॉट

इस बीच आरोपित लड़की को वीडियो कॉल करके धमकी देते कि उसे जब भी बुलाया जाएगा तो उसे आना पड़ेगा। वे कहते कि अगर नहीं आई तो वे उसकी अश्लील वीडियो वायरल कर देंगे। धीरे-धीरे यह बात गाँव के लोगों को पता चल गई। मामला खुल जाने के बाद आखिरकार पीड़िता के परिजनों ने थाने में दुर्गेश पासवान सहित 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया।

बेहड़ा थाना के SHO चंद्रकांत गौरी ने बताया कि पीड़िता का मेडिकल कराया गया है। पीड़िता की माँ की शिकायत के बाद पुलिस टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया। वहाँ पर खून के धब्बे भी मिले हैं। एसपी ग्रामीण आलोक कुमार ने कहा कि इस मामले में साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। फिलहाल दुर्गेश पासवान और सुमित पासवान को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं, बाकी 8 आरोपितोें के लिए छापेमारी की जा रही है।

वहीं, मुख्य आरोपित दुर्गेश पासवान के परिजनों ने गैंगरेप के आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि आरोप लगाने वाले शराब का काम करते हैं और दुर्गेश के चौकीदार पिता ने इसकी शिकायत कर दी थी। इससे नाराज होकर लड़की का परिवार उसे फँसा रहा है। उनका दावा है कि होली के दिन हुई इस घटना के दिन दुर्गेश गाँव में नहीं था।

बांग्लादेश बॉर्डर पर बाड़बंदी के लिए जमीन नहीं दे रही ममता सरकार, TMC कैडर करते हैं हुड़दंग: संसद में बोले अमित शाह, कहा- ज्यादातर घुसपैठियों के पास होता है बंगाल का आधार-वोटर कार्ड

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के गुंडे बांग्लादेश सीमा बंद करने में अड़चन डाल रहे हैं। वह सीमा पर तार लगाने गए सुरक्षाबलों के साथ बदतमीजी करते हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार भी इन्हीं गुंडों के पक्ष में है। वह भी बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए जमीन नहीं दे रही है। यह सारी बातें केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बताई हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार (27 मार्च, 2025) को लोकसभा में आव्रजन एवं प्रवासी विधेयक पर बोलते हुए बांग्लादेश सीमा को लेकर समस्याएँ बताईं। गृह मंत्री शाह ने विधेयक पर चर्चा के दौरान बताया कि बांग्लादेश सीमा पर सेना और BSF क्या कर रही है।

उन्होंने कहा, “हमारी बांग्लादेश से सटी हुई सीमा 2216 किलोमीटर है। इसमें से 1653 किलोमीटर बाड़ बन चुका है, इनके पास की रोड बन चुकी है, बाड़ के पास की चौकियाँ भी बन चुकी हैं। शेष 563 KM में से 112 KM पर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण फेंसिंग व्यावहारिक नहीं है।”

गृह मंत्री शाह ने आगे बताया, “इस इलाके में नाले हैं, नदियाँ हैं, इसलिए फेंसिंग नहीं हो सकती। अब मैं बताता हूँ कि 450 किलोमीटर क्यों बाक़ी है। मैंने बंगाल सरकार को 10 बार लिखा है लेकिन सरकार जमीन नहीं दे रही फेंसिंग के लिए।”

उन्होंने आगे बताया, “450 किलोमीटर के लिए गृह सचिव ने बंगाल के सचिव के साथ 7 बार बैठक की है लेकिन जमीन नहीं दे रहे हैं। जहाँ फेंसिंग लगाने जाते हैं वहाँ सत्ताधारी पार्टी का कैडर आकर बवाल करता है, धार्मिक नारे लगाता है। 450 किलोमीटर की बाड़ बंदी बंगाल सरकार के चलते नहीं हो रही।”

गृह मंत्री ने कहा कि अगर ममता बनर्जी जमीन दे दें तो यह सीमा बंद हो जाएगी। गृह मंत्री ने घुसपैठियों को मदद देने का आरोप भी बंगाल सरकार के ऊपर लगाया। उन्होंने कहा, “बांग्लादेशी या रोहिंग्या जब घुसपैठ करते हैं, तो इन्हें आधार कार्ड कौन देता है? जितने भी बांग्लादेशी पकड़े गए हैं, उनमे से अधिकांश के पास 24 परगना का आधार कार्ड और वोटर कार्ड पाया गया।”

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर बंगाल सरकार आधार कार्ड जारी न करे, तो कोई भी घुसपैठिया भारत में नहीं घुस सकता। गौरतलब है कि इससे पहले भी पश्चिम बंगाल सरकार पर घुसपैठियों के मामले में वोटबैंक के चलते नरमी बरतने के आरोप लगते आए हैं।

जिस विधेयक पर गृह मंत्री अमित शाह बोल रहे थे, वह लोकसभा से गुरुवार को पास हो गया। यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाना है। इस विधेयक के पास होने के बाद अवैध घुसपैठियों पर नकेल कसी जा सकेगी।

जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान, जानिए क्या है इसकी प्रक्रिया: कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।

संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।

न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।

अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।

इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।

रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।

यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।

सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।

साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।

इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।

अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।

समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।

यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।

यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।

जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।

रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।

इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।

उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।

तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।

इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।

इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।

कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।

वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।

उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।

बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।

अब प्रकाश को छू भी सकते हैं… क्या है ‘सुपर सॉलिड लाइट’, इससे कितना बदलेगा हमारा जीवन: सरल शब्दों में समझिए विज्ञान

सुबह-सुबह सूरज की रोशनी को देखकर दिन की शुरुआत करना लगभग हर व्यक्ति की चाहत होती है। इस रोशनी से ऊर्जा मिलती है, दिन अच्छा बीतेगा, ऐसा माना जाता है। लेकिन अगर यही रोशनी देखने के साथ छूने के लिए मिल जाए तो?

सोचने को तो कुछ भी सोचा जा सकता है। लेकिन अब धरातल पर भी साइंस फिक्शन की ये बात सच हो रही है। इटली के सीएनआर नैनोटेक (Consiglio Nazionale delle Ricerche) के एटोनियो गियानफेट (Antonio Gianfrate) और यूनिवर्सिटी ऑफ पाविया (University of Pavia) के डेविड निग्रो (Davide Nigro) की टीम ने रिसर्च कर ये दिखा दिया है कि प्रकाश भी ठोस हो सकता है।

17वीं सदी से अब तक शोध चालू

प्रकाश को लेकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में शोध शुरू हुए। न्यूटन और हाइजेंस जब लाइट पर काम कर रहे थे, तब से ही यह बहस चल रही है कि प्रकाश असल में है क्या? कोई कण या तरंग? न्यूटन का मानना था कि प्रकाश कणों से बना है।

इसके बाद 20वीं सदी में एल्बर्ट आइंस्टीन ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ लेकर आए और बताया कि प्रकाश दो तरह से काम कर सकता है। यानी लाइट का डुअल बिहेवियर होता है। इसमें कण भी हैं और तरंग भी। 1905 में आई इस थ्योरी में आइंस्टीन ने ये बताया कि पदार्थ के द्रव्यमान से ऊर्जा बनाई जा सकती है। वैसे ही ऊर्जा से पदार्थ बन सकता है। हालाँकि उन्होंने भी इसके ठोस में बदलने की संभावना से इनकार कर दिया था।

इसके बाद 1942 में एनरीको फर्मी ने संयुक्त राष्ट्र में ये दिखाया कि यूरेनियम जैसे पदार्थ से हम ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। हालाँकि ऊर्जा या फोटॉन से कोई ठोस पदार्थ बने, इस तरह के शोध में सफलता नहीं मिल पा रही थी। यही कारण है कि बाद में भी शोध जारी रहे।

प्रकाश को लेकर इतनी संभावनाओं के बावजूद अब तक सफलता क्यों नहीं मिली? इसका उत्तर है कि किसी भी ठोस पदार्थ का द्रव्यमान होता है। इसके उलट प्रकाश फोटॉन से बनता है, जिसका कोई द्रव्यमान या रेस्ट मास नहीं होता या कहा जाए शून्य होता है।

लाइट बन गई ‘सुपर सॉलिड’

नेचर पत्रिका में छपी इटली के वैज्ञानिकों की रिसर्च अब कौतूहल का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि प्रकाश को एक ‘सुपर सॉलिड’ पदार्थ में बदला जा सकता है। इसे ‘सुपर सॉलिड लाइट’ नाम दिया गया है। असल में सुपर सॉलिड एक ऐसी अवस्था है, जिसमें किसी पदार्थ को इस तरह ठंडा किया जाता है कि उसके परमाणु एक ही क्वांटम अवस्था में पहुँच जाते है। इसमें पदार्थ होता तो ठोस है, लेकिन उसकी संरचना फ्लुइड की तरह होती है। यानी ये बिना रुकावट के बहता रहता है।

इस तरह के सुपर सॉलिड पदार्थ को अब तक सिर्फ बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट्स (बीईसी) में ही देखा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस रिसर्च से भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग और ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इस रिसर्च को क्वांटम फिजिक्स के लिए एक अहम मील का पत्थर कहा जा सकता है।

कैसे जम गया प्रकाश?

वैज्ञानिकों ने प्रकाश को सामान्य रूप से तापमान कम करके नहीं जमाया, बल्कि इसके लिए खास तकनीक का उपयोग किया। उन्होंने क्वांटम तकनीक का उपयोग कर गैलियम आर्सेनाइड की संरचना में माइक्रोस्कोपिक रिज (सूक्ष्म लकीरें) के जरिए फोटॉन को नियंत्रित किया। इसके बाद प्रकाश को सुपर सॉलिड अवस्था में बदला गया।

इस रिसर्च से क्वांटम कंप्यूटिंग में नई टेक्नोलॉजी के नए आयाम सामने आ सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक तरह के सुपर कंप्यूटर होते हैं, जिनका उपयोग बड़े रिसर्च और जटिल गुणा-भाग करने के लिए किया जाता है। नया शोध इन सुपर कंप्यूटर की स्पीड और अधिक तेज कर सकता है। इससे सेमी कंडक्टर, स्पेस रिसर्च, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, साइबर सुरक्षा के साथ अन्य रिसर्च में मदद मिल सकती है।

आम इंसान को इस रिसर्च से क्या मिलेगा?

आम आदमी के लिए ये रिसर्च तुरंत तो नहीं पर भविष्य में कई तकनीकी बदलाव ला सकता है। इससे हमारे रोजमर्रा के जीवन में बेहतरी आ सकती है। भविष्य में आम इंसान भी बेहतर आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (AI) और स्मार्ट तकनीक का उपयोग कर सकता है।

नए मोबाइल और गैजेट्स के लिहाज से देखा जाए तो नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अत्याधुनिक ऑप्टिकल विकसित किए जा सकते हैं। अल्ट्रा थिन डिस्प्ले के मोबाइल और अत्यधिक शक्तिशाली प्रोसेसर तैयार हो सकते हैं। बैटरी लाइफ बढ़ जाएगी।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि आगे चलकर आपका मोबाइल चार्जर मिनटों में फोन की बैटरी फुल चार्ज कर देगा। आपके डेटा ट्रांसफर की गति कई गुना तेज हो सकती है। सुपरफास्ट इंटरनेट की सुविधा दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी पहुँच सकती है।

क्वांटम इंटरनेट पद्धति विकसित की जाएगी, जिससे इंटरनेट अधिक सुरक्षित हो जाएगा और हैकिंग नहीं हो पाएगी। कैंसर जैसी बीमारी के लिए बेहतर शोध हो सकते हैं। क्वांटम सेंसर और इमेजिंग तकनीक पैथालॉजी और एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जाँच सुविधाओं को सटीक बना सकता है।

पर्यावरण के लिहाज से भी ये शोध एक बेहतर विकल्प बन कर सामने आ सकते हैं। हरित ऊर्जा को भी बढ़ावा मिलेगा जो पर्यावरण के संरक्षण में सहायक होगा। इस खोज से ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए कई नए विकल्प मिल सकते हैं। अक्षय ऊर्जा, बैटरी और सुपर कंडक्टिविटी को बेहतर बना कर बिजली की खपत को कम किया जा सकता है। इससे उन जगहों तक बिजली पहुँचने के आसार होंगे जहाँ आज तक बिजली नहीं पहुँच पाई है।

फिक्शन से असल रिसर्च पर पहुँच गई साइंस

स्कूल में साइंस की पढ़ाई में बेंजीन और कार्बन के बारे में बच्चों को कई रिएक्शन समझाए जाते हैं। साइंस फिक्शन की ये बात सिर्फ याद करने तक ही सीमित रहती थी। वैज्ञानिकों के इस शोध ने फिक्शन को वास्तविक दुनिया के करीब ला दिया है। सूर्य के जिस प्रकाश को हमें सिर्फ देखने भर से ही गर्मी महसूस होने लगती है, जरा सोचिए कि अगर उसे ठोस में बदला जाएगा तो कितने नए शोध सामने आएँगे और कितने अविष्कारों से हम परिचित होंगे।

द्वारकाधीश ही नहीं… स्वामीनारायण संप्रदाय की किताब में भगवान राम, शिव और माता चामुंडा का भी अपमान: ऑपइंडिया की पड़ताल में खुलासा, यहाँ देखें सारे सबूत

गुजरात में स्वामीनारायण संप्रदाय विवादों में घिर गया है। स्वामीनारायण संप्रदाय को अपनी विवादास्पद पुस्तकों, उनके धर्मगुरुओं के अपमानजनक बयानों और अपने सिर्फ अपने ही गुरुओं की ही सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने जैसे मुद्दों पर हिन्दुओं के क्रोध का सामना करना पड़ रहा है।

जलाराम बापा के अपमान का विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि स्वामीनारायण संप्रदाय द्वारा द्वारकाधीश भगवान कृष्ण के अपमान का एक और विवाद सामने आ गया है। इसके बाद से द्वारका में स्थिति बिगड़ती जा रही है। इस मामले में ब्रह्म समाज के साथ-साथ पूरे हिंदू समुदाय ने स्वामीनारायण संप्रदाय को 48 घंटे के भीतर माफी माँगने का अल्टीमेटम दिया है।

विवाद की जड़ स्वामीनारायण संप्रदाय की एक पुस्तक है। पुस्तक का नाम है ‘श्रीजी संकल्पमूर्ति सद्गुरु श्री गोपालानंद स्वामी की वार्ता’। इस पुस्तक में भगवान द्वारकाधीश (कृष्ण) और पवित्र तीर्थ स्थल द्वारका के बारे में अपमानजनक लेख लिखने का आरोप है।

ऑपइंडिया के पास यह पुस्तक मौजूद है। ऑपइंडिया ने जब इस पुस्तक का अध्ययन किया तो कई खुलासे हुए। न केवल भगवान कृष्ण, बल्कि इस पुस्तक में भगवान राम, भगवान शंकर, भगवान हनुमान और भगवान गणपति के बारे में भी अपमानजनक लेख हैं।

इतना ही नहीं, इस पुस्तक में देवी चामुंडा, जिन्हें देवी पार्वती के अवतार के रूप में पूजा जाता है, उनके बारे में भी अपमानजनक बातें लिखी हैं। इस पुस्तक में एक जगह पर कहा गया है कि द्वारका में कोई भगवान ही नहीं है। इसके साथ ही भगवान कृष्ण की महिमा को कम करके ‘स्वामीनारायण’ को सर्वोच्च साबित करने का भी झूठा प्रयास भी किया गया है।

क्या है विवाद?

हाल ही में स्वामीनारायण संप्रदाय के एक स्वामी ने जलाराम बापा के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद पूरे गुजरात में विरोध हुआ था। इसके बाद वीरपुर में माफ़ी माँगी, लेकिन उस घटना के कुछ दिनों बाद स्वामीनारायण संप्रदाय की एक पुस्तक भी विवाद में आ गई है, इसमें आरोप लगाया गया है कि उसमें भगवान कृष्ण का अपमान किया गया है।

सोशल मीडिया पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि संप्रदाय बार-बार हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कर रहा है। संप्रदाय की श्रीजी संकल्पमूर्ति सद्गुरु श्री गोपालानंद स्वामी की वार्ता नामक पुस्तक में कहानी संख्या 33 में लिखा गया है “द्वारका में भगवान कहाँ होंगे? यदि आप भगवान को देखना चाहते हैं, तो वडताल जाइये।”

इसके साथ ही ब्राह्मण समुदाय को लेकर भी टिप्पणी की गई है। इसके सामने आने के बाद ब्रह्म समाज और हिंदू समाज ने संयुक्त रूप से द्वारका में विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन करने वाले हिन्दुओं ने संप्रदाय के स्वामियों को 48 घंटे के भीतर द्वारका आकर भगवान से माफी माँगने का का अल्टीमेटम भी दिया है।

इस पुस्तक में ऐसा क्या लिखा?

विवादास्पद पुस्तक की जाँच करते समय, ऑपइंडिया ने पाया कि कहानी संख्या 33 में स्वामीनारायण संप्रदाय के एक भक्त ‘अबासाहेब’ का उल्लेख है। पुस्तक में कहा गया है कि वह एक चरित्रवान व्यक्ति थे और उन्हें गोपालानंद स्वामी के दर्शन से लाभ हुआ।

पुस्तक आगे बताती है, “उन्होंने एक बार स्वामी से पूछा कि चूंकि उनके परिवार के सदस्य ‘कुसंगी’ हैं, इसलिए वह द्वारका जाने के लिए कह रहे हैं, तो उन्हें इस स्थिति में क्या करना चाहिए?” जवाब में गोपालानंद स्वामी कहते हैं, “द्वारका में भगवान कहाँ हैं? अगर भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन करने हैं तो वडताल चले जाइए। वहाँ भगवान स्वामीनारायण आपकी मनोकामना पूरी करेंगे।”

पुस्तक में आगे लिखा है, “स्वामी की अनुमति लेकर आबासाहेब चल पड़े। लेकिन उनके रिश्तेदार उनके खिलाफ थे, और उन्होंने द्वारका ही जाने पर बहुत जोर दिया। अंततः वे द्वारका की ओर चल पड़े और समुद्र तट पर जाकर जहाज पर सवार हो गए, तभी समुद्र में भयंकर तूफान आ गया।”

पुस्तक बताती है कि इसके बाद आबा साहेब ने सोचा कि यह सब गोपालानंद स्वामी की बात ना मानने के चलते हुआ। आगे इस कहानी कहती है कि डूबते समय आबासाहेब ने ‘स्वामीनारायण-स्वामीनारायण’ का जाप करना शुरू कर दिया।

पुस्तक में लिखा है कि गोपालानंद स्वामी ने आबासाहेब को दर्शन देकर एक लकड़ी का टुकड़ा हाथ में लेने को कहा था, जिसके कारण आबासाहेब उस टुकड़े को हाथ में लेकर समुद्र पार कर गए थे।

पुस्तक में गोपालानंद आबासाहेब से कहते हैं, “आपके परिवार के सदस्य आपके पिछले जन्म के दुश्मन हैं, इसलिए उन्होंने आपको गुमराह किया, लेकिन क्योंकि आप हमारे भक्त हैं, इसलिए हमने आपकी रक्षा की।”

इस कथा में द्वारका जाने की इच्छा रखने वालों को ‘कुसंगी’ बताया गया है। इसके अलावा, यह दावा करना कि द्वारका में कोई भगवान नहीं है, एक तरह से हिन्दू धर्म का अपमान ही है। इसके बाद अपने धर्मगुरु को असल भगवान भी बताया गया है।

पुस्तक में और भी विवादित बातें

इसी किताब की आगे की पड़ताल करने पर ऑपइंडिया ने पाया कि कहानी नंबर 25 में भी एक व्यक्ति का जिक्र है जिसका नाम नारुपंत नाना है। इस कथा में हिन्दू देवी चामुंडा के विषय में अपमानजनक बातें की गई हैं।

इस कहानी के अनुसार यह भक्त नारूपंत एक बार गोपालानंद के पास गए, इस दौरान नारूपंत के माथे पर तिलक देखकर गोपालानंद ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा, ”आप किस भगवान के उपासक हैं?” जवाब में उन्होंने कहा कि वे नारूपंत देवी के उपासक हैं और उनकी मां चामुंडा उनकी कुलदेवी हैं।

इस कहानी में इसके बाद गोपालानंद कहते हैं, “आप भगवान की पूजा करने के बजाय एक ‘छोटी’ देवी की पूजा क्यों करते हैं?” इसी कहानी में पेज नंबर 45 पर गोपालानंद कहते हैं, “देवी-देवताओं की पूजा करने से अंतत: घोर नरक की प्राप्ति होती है, लेकिन कल्याण नहीं होता।”

इसके बाद स्वामी गोपालानंद इस भक्त को कहते हैं, “यदि आप इस जन्म का अर्थ प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप देवी-देवताओं की पूजा छोड़कर हमारे गुरु श्री स्वामीनारायण भगवान की पूजा करें। वह सर्वेश्वर, सभी अवतारों के अवतार, सभी कारणों के कारण, एकमात्र ईश्वर हैं। इससे आपको निश्चित रूप से अटूट सुख की प्राप्ति होगी।”

कहानी में पेज नंबर 46 पर कहा गया है कि माता चामुंडा ने स्वप्न में नरूपंत को दर्शन देकर कहा, “अरे नरूपंत, देखो, हनुमान जी और गणपति दोनों ही स्वामीनारायण का नाम जप रहे हैं, हमारे मित्र माता चामुंडा के सामने कह रहे हैं कि नरूपंत सत्संगी हो गए हैं, इसलिए अब तुम्हें यहाँ से चले जाना चाहिए।”

आगे कहा गया है, “वास्तव में स्वामीनारायण ही एकमात्र भगवान हैं, अब तुम्हें (नरूपंत) उन्हीं की पूजा करनी चाहिए। हम भी अब से वहीं जाएँगे।” इस पूरी वार्ता का निष्कर्ष यह है कि स्वामी ‘स्वामीनारायण’ को ही भगवान बताया गया है और बाकी हिन्दू भगवानों को उनका उपासक बताया गया है।

इसके अलावा इसी पुस्तक में पेज संख्या 103 पर एक विवादित लेख भी है। इसमें कहा गया है, “गोपालानंद के सामने गदा पकड़े हनुमानजी काँप रहे हैं।” इसके अलावा पेज नंबर 44 पर रणछोड़रायजी का भी अपमान किया गया है। इसके अलावा पेज नंबर 49 पर भगवान शंकर को भी स्वामीनारायण और गोपालानंद की पूजा करते हुए दिखाया गया है।

वीडियो में भी की विवादित टिप्पणियाँ

इस पुस्तक पर जारी विवाद के बीच संप्रदाय के एक और स्वामी ने आपत्तिजनक बयान दिया है। सोशल मीडिया पर सामने आए 59 सेकंड के वीडियो में सूरत के वड रोड स्थित स्वामीनारायण गुरुकुल के स्वामी नीलकंठ चरण भगवान कृष्ण के बारे में बात करते नजर आ रहे हैं।

वह वीडियो में बताते हैं, “महाराज कहते हैं कि जब हम द्वारका गए तो द्वारकापति प्रार्थना की कि आप एक बड़ा मंदिर, एक बड़ा मंदिर बनाइए तो मैं वहाँ आकर रहना चाहता हूँ।” आगे स्वामी कहते हैं कि इसके कई वर्षों बाद स्वामी सच्चिदानंद ने मंदिर बनाने का निर्णय लिया और वडताल में मंदिर बनवाया।

स्वामी नीलकंठ चरण ने आगे कहा, “यह भी कहा जाता है कि मंदिर निर्माण के बाद द्वारकापति स्वामी सच्चिदानंद वडताल आये थे।” वायरल वीडियो ने इस विवाद की आग में घी डालने का काम किया है। हालाँकि, पुस्तक पर विवाद भी बना हुआ है।

अन्य किताबों में भी अपमान

ऊपर बताई गई किताब में ही नहीं बल्कि स्वामीनारायण संप्रदाय में कई ऐसी पुस्तकें हैं, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करके अपनी बात ऊँची दिखाने का प्रयास किया गया है। स्वामीनारायण संप्रदाय के तथाकथित संतों ने भी बार-बार भगवान शिव, राम और कृष्ण का मजाक उड़ाया है और उन्हें ‘स्वामीनारायण’ का अंश और सेवक बताया है।

हाल ही में ऐसे कई ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें स्वामीनारायण संप्रदाय के स्वामियों ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है। हाल ही में एक स्वामी ने हिंदू उत्सव ‘नवरात्रि’ को ‘लवरात्रि’ कहकर उसका अपमान किया था।

भड़के पुजारी और ब्राह्मण

इस पूरे विवाद को लेकर द्वारका के पुजारी ब्राह्मण समुदाय में काफी रोष है। ऑपइंडिया से बात करते हुए गुगली ब्रह्म समाज के अध्यक्ष यज्ञेशभाई उपाध्याय ने कहा कि वह, उनका समाज और पूरा हिंदू समाज भगवान श्री द्वारकाधीश का बार-बार अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।

उन्होंने बताया है कि उनके समुदाय के साथ-साथ पूरे हिंदू समुदाय ने इस मामले में सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए अधिकारियों को एक याचिका सौंपी है। उन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय की विवादास्पद पुस्तक को भी हटाए जाने की बात कही है।

उन्होंने कहा कि स्वामीनारायण संप्रदाय के एक स्वामी ने भी द्वारका के गुगली ब्राह्मणों पर टिप्पणी की थी और उन्हें ‘धन हड़पने वाले’ बताया था। उनका आरोप है कि स्वामी ने कहा था कि गुगली ब्राह्मण द्वारका में लोगों को लूटते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि स्वामीनारायण संप्रदाय के संत जो भी बयान देना चाहते हैं, देते हैं, लेकिन उनके पास इसका कोई सबूत नहीं है।

जो नेहरू से लेकर मनमोहन तक नहीं कर पाए, वो मोदी सरकार में हुआ मुमकिन: अप्रैल में पूरे भारत से रेल के जरिए जुड़ जाएगी कश्मीर घाटी, पहली ही ट्रेन होगी वन्दे भारत

अप्रैल, 2025 में भारत के किसी भी हिस्से ट्रेन पकड़ के कश्मीर घाटी पहुँचा जा सकेगा। कश्मीर घाटी में ट्रेन पहुँचाने के लिए सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। देश का अब तक का सबसे कठिन प्रोजेक्ट पूरा करके इसे दूसरे हिस्सों से जोड़ा गया है। कश्मीर को मिलने वाली पहली ट्रेन वन्दे भारत एक्सप्रेस होगी, यह भी सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 19 अप्रैल, 2025 को पीएम मोदी कटरा से श्रीनगर के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखा सकते हैं। कयास लगाए रहे हैं कि यह कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में ही होगा। ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के साथ ही पीएम मोदी उस चेनाब के पुल का भी दौरा करेंगे, जिसके चलते यह रेल लिंक जुड़ा है।

यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेल ब्रिज है और इस ट्रेन रूट की मुख्य कड़ी है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पीएम मोदी इस दौरान एक रैली को भी संबोधित कर सकते हैं। इस कायर्क्रम में संभवतः जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी शामिल होंगे।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि सबसे पहले ट्रेन कटरा से श्रीनगर के बीच चलेगी। हालाँकि, जल्द ही ट्रेन जम्मू और श्रीनगर के बीच भी चलेगी। बताया जा रहा है कि इस रूट पर सबसे पहले वन्दे भारत एक्सप्रेस चलाई जाएगी। दिल्ली से सीधे श्रीनगर ट्रेन सेवाओं को बाद में चालू किया जा सकता है।

इससे पहले कश्मीर में बनिहाल से लेकर बारामूला तक ट्रेन चलाई गई थी। श्रीनगर इसी लाइन का हिस्सा है। अब बनिहाल को कटरा से जोड़ा गया है। यह रूट 111 किलोमीटर का है। इसमें 104 किलोमीटर रास्ता सुरंगों और ब्रिज के सहारे बनाया गया है।

कश्मीर को जम्मू से जोड़ने का यह प्रोजेक्ट मोदी सरकार में पूरा हुआ है। जम्मू कश्मीर में इस पूरे प्रोजेक्ट को USBRL का नाम दिया गया है। इसका अर्थ उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लाइन और इस प्रोजेक्ट में लगभग ₹41 हजार करोड़ का खर्च हुआ है।

इस प्रोजक्ट को बनाने के लिए कोंकण रेलवे और IRCON जैसी एजेंसियों को लगाया गया था। पीएम मोदी ने यहाँ ट्रेन को झंडी दिखाने से पहले जम्मू-कश्मीर की रेल डिवीजन भी अलग कर दी थी। अब जम्मू भी एक रेल डीविजन बन चुका है, इससे पहले यह फिरोजपुर से नियंत्रित होता था।

मोदी सरकार में सिर्फ कश्मीर ही नहीं बल्कि उत्तरपूर्व का भारत भी रेल लिंक से जुड़ा है। 2014 में मेघालय, 2021 में मणिपुर रेलवे के माध्यम से भारत से जुड़े थे। मिजोरम की राजधानी आइजोल भी 2025 में रेलवे से जुड़ जाएगी। उत्तर पूर्व के बाकी राज्यों में मीटर गेज को ब्रोड गेज में बदला जा रहा है।