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जो नेहरू से लेकर मनमोहन तक नहीं कर पाए, वो मोदी सरकार में हुआ मुमकिन: अप्रैल में पूरे भारत से रेल के जरिए जुड़ जाएगी कश्मीर घाटी, पहली ही ट्रेन होगी वन्दे भारत

अप्रैल, 2025 में भारत के किसी भी हिस्से ट्रेन पकड़ के कश्मीर घाटी पहुँचा जा सकेगा। कश्मीर घाटी में ट्रेन पहुँचाने के लिए सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। देश का अब तक का सबसे कठिन प्रोजेक्ट पूरा करके इसे दूसरे हिस्सों से जोड़ा गया है। कश्मीर को मिलने वाली पहली ट्रेन वन्दे भारत एक्सप्रेस होगी, यह भी सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 19 अप्रैल, 2025 को पीएम मोदी कटरा से श्रीनगर के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखा सकते हैं। कयास लगाए रहे हैं कि यह कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में ही होगा। ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के साथ ही पीएम मोदी उस चेनाब के पुल का भी दौरा करेंगे, जिसके चलते यह रेल लिंक जुड़ा है।

यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेल ब्रिज है और इस ट्रेन रूट की मुख्य कड़ी है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पीएम मोदी इस दौरान एक रैली को भी संबोधित कर सकते हैं। इस कायर्क्रम में संभवतः जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी शामिल होंगे।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि सबसे पहले ट्रेन कटरा से श्रीनगर के बीच चलेगी। हालाँकि, जल्द ही ट्रेन जम्मू और श्रीनगर के बीच भी चलेगी। बताया जा रहा है कि इस रूट पर सबसे पहले वन्दे भारत एक्सप्रेस चलाई जाएगी। दिल्ली से सीधे श्रीनगर ट्रेन सेवाओं को बाद में चालू किया जा सकता है।

इससे पहले कश्मीर में बनिहाल से लेकर बारामूला तक ट्रेन चलाई गई थी। श्रीनगर इसी लाइन का हिस्सा है। अब बनिहाल को कटरा से जोड़ा गया है। यह रूट 111 किलोमीटर का है। इसमें 104 किलोमीटर रास्ता सुरंगों और ब्रिज के सहारे बनाया गया है।

कश्मीर को जम्मू से जोड़ने का यह प्रोजेक्ट मोदी सरकार में पूरा हुआ है। जम्मू कश्मीर में इस पूरे प्रोजेक्ट को USBRL का नाम दिया गया है। इसका अर्थ उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लाइन और इस प्रोजेक्ट में लगभग ₹41 हजार करोड़ का खर्च हुआ है।

इस प्रोजक्ट को बनाने के लिए कोंकण रेलवे और IRCON जैसी एजेंसियों को लगाया गया था। पीएम मोदी ने यहाँ ट्रेन को झंडी दिखाने से पहले जम्मू-कश्मीर की रेल डिवीजन भी अलग कर दी थी। अब जम्मू भी एक रेल डीविजन बन चुका है, इससे पहले यह फिरोजपुर से नियंत्रित होता था।

मोदी सरकार में सिर्फ कश्मीर ही नहीं बल्कि उत्तरपूर्व का भारत भी रेल लिंक से जुड़ा है। 2014 में मेघालय, 2021 में मणिपुर रेलवे के माध्यम से भारत से जुड़े थे। मिजोरम की राजधानी आइजोल भी 2025 में रेलवे से जुड़ जाएगी। उत्तर पूर्व के बाकी राज्यों में मीटर गेज को ब्रोड गेज में बदला जा रहा है।

कोई सिगरेट धूक रहा, कोई टॉयलेट में बैठकर तो कोई बेड पर लेटकर जज के सामने हो रहा पेश: दिल्ली से गुजरात तक ऑनलाइन सुनवाई में अलग ही चल रही ‘नौटंकी’

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 25 मार्च को वर्चुअल सुनवाई के दौरान सिगरेट पीने पर वादी सुशील कुमार को तलब किया है। कोर्ट ने सुशील कुमार को 29 मार्च 2025 को अदालत में उपस्थित रहने और अपना स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट में सुशील कुमार स्पष्टीकरण दें कि कार्यवाही के दौरान धूम्रपान करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।

वसीयत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे जज (पश्चिम) शिव कुमार ने 25 मार्च 2025 को दिए गए अपने आदेश में कहा, “आवेदक संख्या 1/श्री सुशील कुमार को एन.डी.ओ.एच. (अगली सुनवाई की तिथि) पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के लिए न्यायालय नोटिस द्वारा जारी किया जाता है।” उन्होंने इस मामले को सुनवाई के लिए 29 मार्च का दिन सूचीबद्ध किया है।

कोर्ट ने कहा कि जब अन्य मामलों की सुनवाई चल रही थी, तब सुशील कुमार फोन पर बात कर रहे थे। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया, क्योंकि इससे कार्यवाही में बाधा आ रही थी। इसके बाद भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया। इसके बाद उन्हें म्यूट मोड पर रख दिया गया। जब उनसे इस ‘दुर्व्यवहार’ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोर्ट से माफी माँग ली और कहा कि वे दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे।

इसके कुछ ही देर बाद कोर्ट आदेश लिखने में लगा तो सुशील कुमार कैमरा के सामने ही सिगरेट पीने लगे। इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का काम सँभाल रहे कोर्ट के कर्मचारी ने देख लिया। इसको लेकर जब उनसे सवाल किया गया तो सुशील कुमार वेब मीटिंग छोड़कर चले गए। वहीं, सुशील कुमार के वकील भी अगली सुनवाई की तारीख लेकर कोर्ट रूम से चले गए।

शौचालय में बैठकर वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हुआ शख्स

हाल ही में वर्चुअल सुनवाई के दौरान गुजरात में ऐसे दो मामले सामने आए हैं। एक मामले में एक व्यक्ति शौचालय में बैठकर कोर्ट की कार्यवाही में भाग ले रहा था। वहीं, दूसरे मामले में सुनवाई के दौरान एक व्यक्ति बेड पर लेटा हुआ था। गुजरात हाई कोर्ट में 17 जनवरी को सुनवाई के दौरान धवलभाई कनुभाई अंबालाल पटेल नाम का व्यक्ति शौचालय में बैठकर अदालत की कार्यवाही में शामिल हुआ था।

हाई कोर्ट के जस्टिस एमके ठक्कर की पीठ ने इस मामले में पटेल के व्यवहार की निंदा की थी। इसके साथ ही कोर्ट की गरिमा को कम करने के लिए 42 वर्षीय पटेल पर 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने पटेल पर सामुदायिक सेवा का दंड भी लगाया। उन्हें दो सप्ताह तक हाई कोर्ट परिसर में स्थित बगीचों में पानी देने और सफाई करने का निर्देश दिया। उन्हें रोजाना 8 घंटे काम करना तय हुआ।

पटेल अपने पिता के खिलाफ एक मामले से संबंधित सुनवाई में वर्चुअली शामिल हुए थे। ऑनलाइन सुनवाई के दौरान उन्होंने अभद्र व्यवहार किया। इसके कारण अदालत ने उन्हें डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ समय बाद पटेल सुनवाई में फिर शामिल हुए। इस बार वे शौचालय में बैठे हुए थे। इसके बाद उन्हें फिर हटा दिया गया। बाद में अदालत ने सोला पुलिस स्टेशन को इसकी जाँच करने का निर्देश दिया।

बेड पर लेटे हुए कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुआ

इसी तरह 13 फरवरी को न्यायमूर्ति एमके ठक्कर की अदालत में कार्रवाई के दौरान वामदेव गाँधी नामक एक व्यक्ति अपने बिस्तर पर लेटे हुए था। वह अदालत की कार्यवाही को लेटकर ऐसे देख रहा था, जैसे कि वह कोई फिल्म देख रहा हो और उसका उसका आनंद ले रहा हो। जब अदालत की नजर वामदेव गाँधी की हरकत पर पड़ी तो कोर्ट ने उन पर 25,000 रुपए का जुर्माना ठोक दिया।

अदालत ने कहा, “न्याय तक पहुँच और व्यापक जनहित के लिए ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा प्रदान की गई है। सुनवाई में जुड़ने वाले व्यक्ति को अदालत की गरिमा को बनाए रखना होगा। इस तरह का आचरण अदालत की गरिमा और शिष्टाचार से समझौता करता है। इसलिए इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अगर इस तरह के कृत्य से सख्ती से नहीं निपटा जाता है तो इससे जनता की नज़र में अदालत की गरिमा कम हो सकती है।”

1971 का युद्ध हमारे रिश्ते का मार्गदर्शक, एक-दूसरे की चिंताओं को समझ कर आगे बढ़ेगा रिश्ता: पीएम मोदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस पर मोहम्मद युनुस को लिखा पत्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को पत्र लिखा है। पीएम मोदी ने यह पत्र बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस (26 मार्च, 2025) के मौके पर लिखा है। पीएम मोदी ने कहा है कि 1971 का मुक्तियुद्ध अभी भी दोनों देशों के रिश्तों का मार्गदर्शक है। उन्होंने दोनों देशों के बीच ‘चिंताओं’ को समझने की बात कही है।

पीएम मोदी ने लिखा, “मैं बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर आपको और बांग्लादेश के लोगों को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ। यह दिन हमारे साझा इतिहास और बलिदानों का प्रमाण है, इसने हमारी हमारी द्विपक्षीय साझेदारी की नींव रखी है। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम की भावना हमारे संबंधों के लिए मार्गदर्शन का प्रकाश बनी हुई है।”

पीएम मोदी ने कहा कि संग्राम की यह भावना लगातार दोनों देशों के लोगों को फायदा पहुँचा रही है। पीएम मोदी ने आगे लिखा, “हम शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए अपनी साझा आकांक्षाओं तथा एक-दूसरे के हितों और चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर इस साझेदारी को और आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस पर पीएम मोदी के साथ ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी शुभकामनाएँ दी हैं। उन्होंने भी दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते की वकालत की है। प्रधानमंत्री शेख हसीना के अगस्त, 2024 में सत्ता से हटने के बाद यह दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।

गौरतलब है कि 26 मार्च, 1971 को ही बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान और उनके साथी नेताओं ने पाकिस्तान से आजादी का ऐलान किया था। इसके बाद दिसम्बर, 1971 तक युद्ध चला था। भारत ने दिसम्बर में पाकिस्तान की फ़ौज से आत्मसमर्पण करवाया था। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान ही बांग्लादेश बना था।

हाल ही में बांग्लादेश विदेश मंत्रालय की तरफ से मोहम्मद यूनुस और पीएम मोदी के बीच मुलाक़ात के लिए भी प्रयास किया गया था। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने यह समय थाईलैंड में होने वाली BIMSTEC समिट के लिए माँगा था। हालाँकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से अभी इस पर कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।

थाईलैंड में यह समिट 1 अप्रैल-5 अप्रैल के बीच होनी है। यह पहला मौक़ा होगा जब पीएम मोदी और सलाहकार यूनुस एक ही मंच साझा करेंगे। हालाँकि, दोनों नेताओं के बीच इस सम्मेलन से इतर कोई बातचीत होगी या नहीं, या स्पष्ट नहीं है।

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत का कोई भी बड़ा नेता नहीं गया है। भारत की तरफ से विदेश सचिव विक्रम मिसरी एक बार बांग्लादेश गए हैं। भारत लगातार बांग्लादेश पर सत्ता परिवर्तन के बाद हिन्दुओं पर हमला करने वालों पर सख्ती करने की अपील करता आया है। बांग्लादेश कहता है कि उसके देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।

राजस्थान के जिस गाँव में एक भी मुस्लिम नहीं, उस गाँव के पते पर भी बंगाल-बिहार के मुस्लिमों ने कराया रजिस्ट्रेशन: 29000 फर्जी खातों में लिया गया ‘PM किसान सम्मान निधि’ का पैसा

राजस्थान के पाली में एक फ्रॉड का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ हिंदुओं के गाँव में मुस्लिमों के नाम से फर्जी अकाउंट बनाकर ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ से 7 करोड़ रुपए ले लिए गए। इन गाँवों में एक भी मुस्लिम नहीं हैं। जिन खातों में ये ट्रांसफर किए गए, वे पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर बनाए गए हैं। पाली में ऐसे लगभग 29 हजार फर्जी खाते मिले हैं।

जाँच में पाली जिले के देसूरी में 20 हजार, रानी में 9,004 और मारवाड़ जंक्शन में 62 फर्जी खाते मिले। इस मामले में अब मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। हैरानी की बात है कि ये फर्जीवाड़ा साल 2020 में हुआ, लेकिन अधिकारियों ने यह बात सामने नहीं आने दी। इस मामले में उन्होंने FIR भी नहीं दर्ज करवाई थी। हालाँकि, अधिकारियों ने फर्जी खातों को ब्लॉक करके उसमें राशि जाने पर रोक लगा दी थी।

दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 से अगस्त 2020 के बीच फर्जी किसानों के नाम से CSC और ईमित्र के माध्यम से पीएम सम्मान निधि के लिए आवेदन किया गया। आवेदन का पटवारी ने सत्यापन किया और उसे तहसीलदार को भेज दिया। तहसीलदार ने भी जाँच करके आवेदन पत्रों को कलेक्टर भेज दिया। इस तरह ये सूची केंद्र सरकार के पास पहुँच गई।

फर्जी नामों वाले खाते (साभार: भास्कर)

इसके बाद केंद्र सरकार ने इन खातों में किसान निधि के पैसे भेजने शुरू कर दिए। अब आशंका जताई जा रही है कि सरकारी आईडी को हैक करके इन आवेदनों को स्वीकृत कर लिया गया था। हालाँकि, इस मामले की फिलहाल जाँच चल रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि इन आवेदनों को एक ही सरकारी आईडी को हैक करके स्वीकृत किया गया था या अलग-अलग आईडी से।

दरअसल, साल 2020 में अधिकारियों ने पाया कि देसूरी में पीएम किसान सम्मान निधि के लिए आवेदनों की भारी संख्या में आवेदन किए गए। इसके कारण लंबित आवेदनों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई। उस साल 5 नवंबर को 265 लंबित आवेदनों की संख्या 21 दिसंबर तक अचानक 19,331 तक पहुँच गई। अधिकारियों ने जाँच किया तो पता चला कि ये खाते फर्जी हैं।

जाँच में पता चला कि ये खाते पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर बनाए गए हैं। इनमें से 95 प्रतिशत खाते मुस्लिमों के नाम से थे। जाँच में पता चला कि देसूरी गाँव में एक भी मुस्लिम नहीं हैं। इस तरह राजस्थान के बाहर के 4,793 बैंक अकाउंट में किसान सम्मान निधि का 1 करोड़ 51 लाख 24 हजार रुपए ट्रांसफर भी हो चुके थे। इसके बाद इन खातों को फ्रीज कर दिया गया।

यही हाल रानी ब्लॉक के वरकाणा गाँव का भी है। इस गाँव में भी एक भी मुस्लिम नहीं हैं। यहाँ मुस्लिमों के नाम से 9,004 फर्जी खाते खोल लिए गए। इन सबका पंजीकरण एक ही दिन किया गया था। आश्चर्य की बात ये है कि ये सभी खाते रानी स्थित बैंक की एक शाखा में खोले गए। मुस्लिमों के नाम पर बने इन खातों में किसान सम्मान निधि की 3 किस्त भी जा चुकी थी।

जाँच के दौरान पता चला कि ये सभी खाते पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर खुले हैं। इनमें 90 प्रतिशत नाम मुस्लिम हैं। इन सभी का पंजीकरण एक ही समय पर किया गया था और इन सभी आवेदनों को सरकारी पोर्टल पर अलग-अलग तारीख को एक ही समय में स्वीकृत भी किया गया था। वहीं, राज्य के मारवाड़ जंक्शन में फिलहाल 62 फर्जी खाते मिले हैं।

अधिकारियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कई ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो फर्जी आईडी बनाकर किसान सम्मान निधि के पैसे ले रहे हैं। बिना किसी ओटीपी के पोर्टल पर इन फर्जी आवेदनों को स्वीकृत कर लिया गया, जबकि उस गाँव के जो असली किसान हैं उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया। इस तरह कुल 32 हजार फर्जी आवेदन दिए गए थे।

छत्तीसगढ़ में भी मुस्लिमों के नाम पर फर्जी किसान

राजस्थान में सामने आया मामला किसी बड़े गिरोह का काम लगता है, क्योंकि ऐसा ही मामला मार्च 2024 में छत्तीसगढ़ में भी सामने आया था। बेमेतरा जिले के एक गाँव में 856 फर्जी किसानों के खातों में किसान सम्मान निधि का पैसा डालने का आरोप लगा था। इनमें से 198 किसानों के खातों तो पश्चिम बंगाल में थे। मामला सामने आने के बाद जिले के कलेक्टर ने जाँच के आदेश दिए थे।

दरअसल, जिले के बेरला ब्लॉक के बरगाँव में 656 मुस्लिमों के नाम पर खुले खातों में इस योजना के पैसे जा रहे थे। जाँच में पता चला कि इस गाँव में सिर्फ 19 मुस्लिम किसान ही हैं। ये सभी गाँव में रहते भी नहीं थे। इस पूरे मामले में लगभग 3 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया था। ये वो मामले हैं, जो अब तक सामने आए हैं।

अब यूट्यूब ने निकाली कुणाल कामरा की हेकड़ी, T-Series ने वीडियो पर कॉपीराइट ठोंका: भड़का ‘कॉमेडियन’ बोला- ‘कठपुतली बनना बंद करो’

कॉमेडी के नाम पर हिंदू घृणा फैलाने वाला कुणाल कामरा इन दिनों चारों तरफ से फंस गया है। पहले डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को लेकर बयान पर बवाल मचा तो हर जगह उसका विरोध हुआ। अब खबर है कि यूट्यूब ने कुणाल कामरा के स्टैंड-अप वीडियो “नया भारत: A Comedy Special” पर कॉपीराइट स्ट्राइक लगा दी है।

इस स्ट्राइक के बाद कामरा भड़का हुआ है। कामरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, “हैलो @TSeries, स्टॉप बिंग ए स्टूज। पैरोडी और सटायर कानूनी रूप से फेयर यूज़ के अंतर्गत आते हैं। मैंने गाने के बोल या मूल संगीत का उपयोग नहीं किया है। अगर आप इस वीडियो को हटा देते हैं तो हर कवर गाना/डांस वीडियो भी हटाया जा सकता है।”

कुणाल कामरा ने इसके बाद टी सीरिज को माफिया बता दिया। कामरा ने एकनाथ शिंदे और बाकी लोगों पर जो मजाक वाले गाने बनाए थे, उनमें टी सीरिज के गानों के धुन इस्तेमाल हुई थी। ऐसे में टी सीरिज ने संभवतः इस पर स्ट्राइक लगाई है। हालाँकि, टी सीरिज ने इस स्ट्राइक को लेकर पुष्टि नहीं की है।

इस स्ट्राइक के बाद कुणाल कामरा के यूट्यूब चैनल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनकी रीच भी यूट्यूब घटा सकता है और अगर दोबारा स्ट्राइक होती है तो उनका चैनल बंद भी हो सकता है। कुणाल कामरा को यूट्यूब पर फैन्स से मिलने वाले पैसे भी बंद हो सकते हैं।

गौरतलब है कि रविवार (23 मार्च, 2025) को मुंबई में एक लाइव कार्यक्रम के दौरान कुणाल कामरा ने एकनाथ शिंदे को ‘गद्दार’ बताया था और उन पर एक अपमानजनक गाना गया था। उन्होंने एकनाथ शिंदे को रिक्शावाला बताया और कहा कि अगर उनकी नजर से देखा जाए तो शिंदे गद्दार नजर आएँगे।

कामरा ने कहा था कि एकनाथ शिंदे ने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। कामरा ने यह भी दावा किया कि एकनाथ शिंदे ने ‘बाप चुराया है।’ उनका इशारा बालासाहेब ठाकरे की तरफ था। गौरतलब है कि एकनाथ शिंदे लगातार बालासाहेब की राजनीति के आदर्शों से समझौता करने का आरोप उद्धव ठाकरे पर लगाते हैं।

इस मामले में कुणाल कामरा के खिलाफ FIR दर्ज करवाई गई थी। उनको दो बार मुंबई पुलिस पेश होने के लिए नोटिस भेज चुकी है। कुणाल कामरा के फोन और बैंक खातों की जाँच की बात भी महाराष्ट्र सरकार कह चुकी है। कुणाल कामरा कथित तौर पर तमिलनाडु में है।

संभल हिंसा के दौरान पुलिस की गोली से नहीं हुई मौतें, अवैध हथियारों से चली थी ताबड़तोड़ गोलियाँ: फॉरेंसिक रिपोर्ट से पुष्टि; पड़ताल में PAK निर्मित कारतूस हुए थे बरामद

उत्तर प्रदेश के संभल में नवम्बर, 2024 में हुई हिंसा के दौरान सारी फायरिंग अवैध हथियारों से हुई थी। पुलिस ने इस दौरान गोलियाँ नहीं चलाई थीं। यह हिंसा में जब्त किए गए हथियारों की बैलिस्टिक रिपोर्ट से सामने आया है। संभल हिंसा में फायरिंग के कारण 4 लोगों की मौत हुई थी, इस संबंध में दो दंगाई पकड़े गए थे।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बैलिस्टिक जाँच के लिए हिंसा के बाद जब्त किए गए हथियारों और घटनास्थल से प्राप्त गोलियों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया था। इस फॉरेंसिक रिपोर्ट में सामने आया है कि पुलिस की तरफ से हिंसा के दौरान फायरिंग नहीं की गई थी।

संभल पुलिस को बैलिस्टिक जाँच की यह रिपोर्ट मिल गई है। हालाँकि, अभी कुछ जानकारियाँ सामने आना बाकी हैं। पुलिस ने बताया है कि अभी हिंसा के बाद मिले अवैध हथियारों और खाली कारतूसों का मिला किया जाएगा, इसके बाद ही कुछ और जानकारी सामने आ सकेगी।

बैलिस्टिक रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि संभल में हिंसा के दौरान जो गोलियाँ चली थीं, उनके लिए अवैध हथियारों का इस्तेमाल हुआ था। एक पुलिस अधिकारी ने कहा है कि जो लोग मारे गए थे, उनके शवों से गोलियाँ नहीं बरामद हुई हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि क्या गोलियाँ उनके शरीर को पार कर गई थीं।

संभल में पुलिस को एक पाकिस्तानी कारतूस भी मिला था। इसके विषय में भी जाँच की जा रही है। ताजा बैलिस्टिक रिपोर्ट से उन लोगों के दावे फेल हो गए हैं, जो पुलिस पर फायरिंग का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप लगाने वालों में सपा नेताओं से लेकर कई इस्लामी नेता भी थे।

संभल सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने भी हत्याओं का आरोप पुलिस पर मढ़ा था। जामा मस्जिद के सदर जफर अली ने भी यह बात प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कही थी। पुलिस फायरिंग से लगातार इनकार करती रही थी और उसने हिंसा के दौरान रबर की गोलियाँ चलाने की बात बताई थी।

संभल हिंसा के दौरान बिलाल, अयान, कैफ और नईम नाम के 4 लड़कों की मौत हुई थी। पुलिस ने इन लड़कों की हत्या के मामले में गैंगस्टर शारिक साठा के गुर्गे मुल्ला अफरोज और वारिस को गिरफ्तार किया था। इन्होंने हिंसा के दौरान फायरिंग करने की बात कबूली थी।

न्यायपालिका में सुधार के लिए आया NJAC, पर सुप्रीम कोर्ट ने ही कर दिया खारिज: जज ही जज नियुक्त करेंगे, जज ही जज की जाँच करेंगे… वाली व्यवस्था से नहीं आएगी पारदर्शिता-जवाबदेही

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली अघोषित भारी नकदी को लेकर न्यायपालिका में सुधार की जरूरत को एक बार बहस को तेज कर दिया है। न्यायपालिका में सुधार की माँग लंबे समय से हो रही है, लेकिन देश की सर्वोच्च न्यायालय इसे न्यायपालिका में हस्तक्षेप की आशंका जाहिर करके इसे खारिज करता रहा है। वहीं, न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और त्वरित न्याय की माँग लंबे समय से हो रही है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। इसके लेकर आम लोगों से लेकर विधायिका तक के लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक जज के पास इतनी भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी कहाँ से आई।

मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया। हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का भी सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ। उच्च तबके में भी इसको लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई।

इसके बाद CJI संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। यह अलग मामला है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर लोग पूछने लगे कि जब हाई कोर्ट से पदोन्नत करके जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट लाया गया तो फिर उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस क्यों भेजा जा रहा है। लोगों ने इसे नकदी बरामदी मामले से जोड़ा।

आखिरकार CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक’ जाँच कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति एक तरह की विभागीय जाँच है। इस मामले की जाँच जज ही करेंगे, जज ही निर्णय लेंगे और जज के खिलाफ फैसला सुनाएँगे। इस तरह इस मामले में पारदर्शिता को लेकर बड़ा सवाल उठने लगा है। सोशल मीडिया पर यूजर्स का कहना है कि मामले की जाँच किसी पेशेवर जाँच एजेंसी से कराई जानी चाहिए। इससे न्यायपालिका पर विश्वसनीयता बढ़ेगी।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने कहा है कि स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। संसद को आपराधिक आरोप या महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। दरअसल, यह पहली बार नहीं है कि किसी न्यायाधीश पर इस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं। इसके पहले कई जजों पर गंभीर आरोप लग चुके हैं। जजों पर अक्सर भाई-भतीजावाद का भी आरोप लगते रहता है, जो न्यायपालिका में दिखता भी है।

न्यायपालिका पर कब-कब उठे सवाल?

हालाँकि, आजाद भारत में अभी तक सिर्फ एक ही न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई थी। वह थे न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी। हालाँकि, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। बाद में वे सुप्रीम कोर्ट के जज भी बने। रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अपने आधिकारिक अपार्टमेंट में बिस्तर, आलीशान साज-सज्जा और एयर कंडीशनिंग से भरपूर सामान रखने का दोषी पाया गया था। इसके परिणामस्वरूप सन 1990 के दशक में एक बड़ा राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था।

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय की सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।

उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।

बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने पूर्ववर्ती के फैसले की जाँच और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी। अन्यथा यह मामला चुपचाप खारिज कर दिया जाता। साल 2011 में यादव के सेवानिवृत्त होने के दिन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। 14 साल बाद भी यह मामला विशेष CBI अदालत में लंबित है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एसके गंगेले पर ग्वालियर में एक महिला जिला न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। इसकी जाँच के लिए 58 सांसदों द्वारा समर्थित प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद अप्रैल 2015 में हामिद अंसारी द्वारा गठित एक समिति द्वारा मंजूरी दी गई थी। साल 2014 में उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था।

कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश पॉल डेनियल दिनाकरन प्रेमकुमार को अगस्त 2009 में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए अनुशंसित किया था। हालाँकि, कानूनी समुदाय के कई प्रतिष्ठित सदस्यों ने उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। दिसंबर 2009 में कॉलेजियम को प्रस्ताव वापस भेज दिया। उन्हें सिक्किम हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया।

जस्टिस दिनाकरन को बर्खास्त करने के लिए 76 सांसदों ने हामिद अंसारी को प्रस्ताव भेजा। इसके बाद अंसारी ने जनवरी 2010 में एक जाँच पैनल बनाया। हालाँकि, जस्टिस दिनाकरन ने समिति में अपनी अविश्वास बताया और आखिरकार 29 जुलाई 2011 को पद से इस्तीफा दे दिया। दिनाकरन पर किसानों की 300 एकड़ से अधिक जमीन कब्जाने सहित 16 गंभीर आरोप लगे थे।

केशवानंद भारती केस और सुप्रीम कोर्ट

भारतीय संसद ने संविधान में 24वाँ संशोधन पारित करके न्यायपालिका के अधिकार और न्यायिक समीक्षा की शक्ति को सीमित दिया था। इसके अलावा, 25वें और 29वें संशोधन को मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करना और संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान को बदलने का अधिकार देना था। तब केरल के एडनार मठ के प्रमुख केशवानंद भारती ने इसको चुनौती दी।

केशवानंद भारती ने इन संशोधनों की वैधता को चुनौती देते हुए दावा किया गया कि ये संशोधन संविधान के मूल ढाँचे के खिलाफ हैं। इसके बाद केशवानंद भारती मामले का सुप्रीम कोर्ट से फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी ढाँचे की अवधारणा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखते हुए संविधान को बदलने की संसद की क्षमता को सीमित कर दिया था।

यहाँ ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस फैसले के जरिए न्यायपालिका ने अपने अधिकार को खतरे में डालने वाले संशोधनों को पलटने के लिए एक तंत्र विकसित कर दिया और खुद को और भी अधिक शक्ति दे दी। तब से इस फैसले को ‘न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा’ और न्यायिक सुधारों का विरोध करने के लिए लागू किया गया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम विकसित कर लिया।

कॉलेजियम का खेल

भारत की न्यायपालिका दुनिया की संभवत: अकेली ऐसी न्यायपालिका है, जो अपना नियम भी खुद ही तय करती है। चाहे वह नियुक्ति हो, जाँच हो या कार्रवाई…. इसमें किसी संघीय एजेंसी या किसी अन्य की कोई भूमिका नहीं होती है। इसके लिए कोर्ट ने 1993 में अपने ही निर्णय के आधार पर कॉलेजियम भी बना लिया था, जो पारदर्शिता और जवाबदेही के हिसाब से संदिग्ध है।

इस कॉलेजियम सिस्टम को हटाने के लिए सरकार ने लगातार प्रयास किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट सरकार के निर्णय को ही खारिज कर देता। पिछले कुछ समय में देश के उपराष्ट्रपति से लेकर कानून मंत्री तक कॉलेजियम के खिलाफ बोल चुके हैं। आम लोग भी कॉलेजियम को खत्म करने का समर्थन करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इन सब बातों पर ध्यान नहीं देता।

कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से ही आया है। इसे देश की संसद ने नहीं बनाया है और ना ही संविधान में इसके लिए कोई प्रावधान है। दरअसल, सन 1981 में ‘First Judges Case (गुप्ता केस)’ में कहा गया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय जजों की नियुक्ति-ट्रांसफर में सर्वोपरि नहीं है। इसके बाद 1993 में ‘कॉलेजियम सिस्टम’ लाया गया।

इस कॉलेजियम सिस्टम में CJI की अध्यक्षता में 2 वरिष्ठतम जजों को डाला गया। सन 1998 में समिति की संख्या 5 कर दी गई। इसमें CJI के अलावा सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम जज होते हैं। इसी तरह हाई कोर्ट में भी ऐसे ही कॉलेजियम करता है। इसमें रिटायर हो रहा CJI ही अपने उत्तराधिकारी की अनुशंसा करता है। यह कुछ-कुछ राजतंत्र जैसा था। कुछ विवादों के बाद ये पद वरिष्ठता के आधार पर दिया जाने लगा।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम पहले केंद्रीय कानून मंत्री को अपनी अनुशंसा भेजता है। वहाँ से यह प्रधानमंत्री के पास जाता है। फिर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति करते हैं। इस पूरे सिस्टम में कहीं पारदर्शिता नहीं है। साथ ही भाई-भतीजावाद का जबरदस्त बोलबाला है। इसके कारण कई प्रतिभावान जूनियर जज-वकील पीछे रह जाते हैं।

अब तक के जजों की नियुक्ति से इसे समझा जा सकता है। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के 38% जजों के परिवार का न्यायपालिका से कनेक्शन है। इससे भाई-भतीजावाद को समझा जा सकता है। इतना नहीं, RTI और लोकपाल के दायरे में सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं आते हैं। इतना ही नहीं, जजों को अपनी संपत्तियाँ घोषित करने की भी जरूरत नहीं होती है, जबकि ब्यूरोक्रेट्स को ऐसा करना होता है।

लचर न्यायिक व्यवस्था के कारण देश की अदालतों में दिसंबर 2024 तक 5.1 करोड़ मामले लंबित हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 70,852 थी। अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा छुट्टियाँ लेने की बात की जाए तो साल 2022 में वे 83 दिन छुट्टियों पर रहे। अगर 50 दिन रविवार के भी जोड़ दीजिए तो यह संख्या 133 दिन हो जाता है यानी साल के 36% दिन।

विश्व न्याय परियोजना द्वारा प्रकाशित ‘विधि नियम सूचकांक 2023’ में भारत की रैंकिंग न्यायिक विलंबों को प्रदर्शित करती है और बताती है कि भारत में न्यायिक सुधार कितना जरूरी है। इस रिपोर्ट में भारत को नागरिक न्याय में 142 देशों में से 111वें स्थान पर तथा आपराधिक न्याय में 93वें स्थान पर रखा गया है। इन व्यवस्थाओं को देखते हुए न्यायिक सुधार की लगातार माँग की जाती रहती है।

न्यायिक सुधार

‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक, 2010’ के जरिए न्यायिक मानक निर्धारित किए थे। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया बनाई बनाई गई। इस विधेयक में न्यायाधीशों की संपत्ति और देनदारियों के साथ-साथ उनकी पत्नी और बच्चों की संपत्ति एवं देनदारियों का खुलासा करना अनिवार्य कर दिया गया था।

विधेयक में ‘राष्ट्रीय न्यायिक निगरानी समिति’ की स्थापना की बात कही गई थी, जो जजों के खिलाफ शिकायतों की जाँच करने वाली एजेंसी बनाने की बात कही गई थी। इसके अलावा, विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया था कि कोई भी व्यक्ति किसी न्यायाधीश के ‘दुर्व्यवहार’ के बारे में निगरानी समिति से शिकायत कर सकता है। बाद में इस बिल को संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया।

मई 2012 में लोकसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया, लेकिन 15वीं लोकसभा के भंग होने के कारण यह समाप्त हो गया। इसमें भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न के आरोपित जजों की समय सीमा के तहत जाँच की बात कही गई थी। विधेयक में यह भी कहा गया था कि पैनल को शिकायतें मिलने के बाद उन्हें जाँच समिति को भेजा जाएगा और यदि आरोप गंभीर हैं तो अध्यक्ष जाँच का अनुरोध करेंगे।

विधेयक में निगरानी समिति की देखरेख भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) को दिया गया। CJI को जाँच दल गठन करने की शक्ति दी गई। न्यायाधीश के खिलाफ जाँच कैमरे के सामने की जानी चाहिए थी। यदि जाँच के बाद आरोप साबित हो जाते हैं तो न्यायाधीश का न्यायिक कार्य निलंबित किया करने की बात कही गई थी। हालाँकि, इस विधेयक का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ।

विधि आयोग के तत्कालीन प्रमुख और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने कहा कि इसका न्यायिक स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक संविधान द्वारा उच्च न्यायपालिका को दी गई सुरक्षा का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के वर्तमान जज द्वारा कदाचार का दावा करने वाली सार्वजनिक शिकायतों की अनुमति देता है, जिसके कारण उन पर महाभियोग चलाया जा सकता है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)

साल 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सरकार ने न्यायिक क्षेत्रों में भी सुधार करने की कोशिश की थी। मोदी सरकार साल 2014 में संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए ‘NJAC’ के प्रावधानों को शामिल किया था।

NJAC में 6 सदस्यों का प्रावधान किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इन दो विशेषज्ञों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मिलकर करेंगे। इसमें यह भी प्रावधान है कि ये दो विशेषज्ञ हर तीन साल पर बदलते रहेंगे।

इसके साथ ही साल 2014 में संविधान संशोधन करके केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के मामले में बड़ा बदलाव किया। इस संशोधन में संसद को यह अधिकार दिया गया कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियमों को बना सकता है और जरूरत पड़ी तो उसमें बदलाव भी कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा इस कानून को बनाने के बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘संविधान के आधारभूत ढाँचे से छेड़छाड़’ बताया। बता दें कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में बताया गया है, जबकि देश में कानून बनाने का अधिकार सरकार और संसद के पास ही है।

जो जैसे समझे, उसे उसी भाषा में समझाना जरूरी: ‘बुलडोजर सिस्टम’ पर बोले CM योगी, कहा- भलाई के काम नहीं करता वक्फ बोर्ड, जब हिंदू रहेंगे सेफ तभी मुस्लिम भी होंगे सुरक्षित

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि 100 मुस्लिम परिवारों के 50 हिन्दू सुरक्षित नहीं हो सकते। उन्होंने कहा है कि वक्फ बिल से मुस्लिमों को भी फायदा होगा। सीएम योगी ने स्पष्ट किया है कि हर व्यक्ति को कानून के दायरे में रह कर सबक सिखाया जाएगा।

यह सारी बातें सीएम योगी आदित्यनाथ ने बुधवार (26 मार्च, 2025) को ANI के एक पॉडकास्ट में की है। उन्होंने कहा कि एक योगी के रूप में वह सभी की खुशी की कामना करते हैं। सीएम योगी ने कहा कि वह ‘सबका साथ-सबका विकास’ में विश्वास रखते हैं। इस पॉडकास्‍ट में सीएम योगी ने वक्फ बिल, मुसलमानों की सुरक्षा और बुल्डोजर जस्टिस पर अपनी राय रखी।

सीएम योगी ने कहा, “100 हिंदू परिवारों के बीच एक मुस्लिम परिवार सबसे सुरक्षित है। उन्हें अपने सभी धार्मिक कार्यों का पालन करने की स्वतंत्रता होगी, लेकिन क्या 100 मुस्लिम परिवारों के बीच 50 हिंदू सुरक्षित हो सकते हैं? नहीं। बांग्लादेश इसका उदाहरण है। इससे पहले पाकिस्तान इसका उदाहरण था। अफगानिस्तान में क्या हुआ? अगर धुआँ है या किसी को चोट लग रही है, तो हमें इससे पहले ही सावधान हो जाना चाहिए। इसी बात का ध्यान रखने की जरूरत है।” उन्होंने कहा कि वह सभी के साथ समान व्यवहार करते हैं।

सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की सुरक्षा पर बात की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान सबसे सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा, “अगर हिंदू सुरक्षित हैं, तो मुसलमान भी सुरक्षित हैं। अगर 2017 से पहले यूपी में दंगे होते थे, अगर हिंदुओं की दुकानें जल रही थीं, तो मुसलमानों की दुकानें भी जल रही थीं। अगर हिंदुओं के घर जल रहे थे, तो मुसलमानों के घर भी जल रहे थे। 2017 के बाद दंगे बंद हो गए।”

सीएम योगी ने कहा, “मैं एक साधारण नागरिक हूँ, उत्तर प्रदेश का नागरिक हूँ और मैं एक योगी हूँ, जो सभी की खुशी की कामना करता हूँ। मैं सभी के साथ और विकास में विश्वास करता हूँ।”

वक्फ बिल से मुसलमानों और देश को फायदा

सीएम योगी ने इस पॉडकास्ट के दौरान वक्फ बिल को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा, ” मस्जिद लेकर क्या करेगी? वक्फ बिल के बारे में लोगों को गुमराह किया जा रहा है। वक्फ के नाम पर कितनी जमीनों पर कब्जा किया जाएगा?”

सीएम योगी ने कहा, “वक्फ के नाम पर आज तक एक भी समाज कल्याण का काम नहीं किया गया है। उसके नाम पर जो भी आता है उसका व्यक्तिगत लाभ लिया जाता है। औने-पौने दाम पर बेचा जाता है। एक ही जमान को कई लोगों को बेचा है। इससे इनके लिए भा संकट आएगा और जिसने खरीदा उसके ऊपर भी संकट आएगा।”

पिछले सालों में वक्फ को लेकर हुई गड़बड़ियों पर सीएम योगी ने कहा, “वक्फ के नाम पर पिछली सरकारों में कई ऊल-जुलूल फैसले लिए गए हैं। जिस जमीन को वक्फ ने कहा हमारी है, वो उन्हें दे दी गई। आपको ये ताकत किसने दी कि आप किसी भी स्थल को कब्जा कर लेंगे? वक्फ संशोधन अधिनियम आज की आवश्यकता है। ये देश और मुसलमानों के हित में है।”

बुलडोजर एक्शन पर बोले सीएम

बुलडोजर जस्टिस को लेकर किए गए सवालों पर सीएम योगी ने कहा, “जो न्याय में विश्वास रखते हैं उन्हें न्याय मिलता है और जो स्वयं कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उन्हें कानून के दायरे में रहकर सबक सिखाया जाता है। जो जैसे समझेगा, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। कोई हिंसक बनकर प्रहार करने सामने आ जाए तो सामने गिड़गिड़ाऐ, ये तो नहीं होगा, उस हिंसा का प्रतिकार तो करना होगा।”

सीएम योगी ने स्पष्ट किया कि अपराध के रोग को हटाना जरूरी है।

नुपुर शर्मा को मौत की धमकी, नारा दिया- जो सूफी की बात करेगा, वही भारत पर राज करेगा: जानिए कौन है नागपुर दंगों में गिरफ्तार हुआ हामिद इंजीनियर

नागपुर में हिंदू विरोधी मुस्लिमों की हिंसा केस में माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) का कार्यकारी अध्यक्ष मोहम्मद हामिद इंजीनियर पुलिस के हत्थे चढ़ गया। नागपुर पुलिस ने ये गिरफ्तारी 17 मार्च 2025 को नागपुर के हिंदू विरोधी हिंसा मामले में हुई। हामिद एक समय मुस्लिम समुदाय का बड़ा चेहरा था और 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल रहा था। मगर अब उस पर देशद्रोह और दंगे भड़काने जैसे संगीन इल्जाम हैं। पुलिस ने कहा कि हामिद ने भड़काऊ भाषणों से माहौल खराब किया और दंगों के सरगना फहीम खान की मेंटरिंग की।

साल 2022 में हामिद तब चर्चा में आया था जब उसने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा को जान से मारने की धमकी दी थी। नागपुर के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) लोहित मटानी ने उसकी गिरफ्तारी की तस्दीक की।

सरकारी नौकरी से कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा तक

हामिद ने शुरुआत में महाराष्ट्र के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) में नौकरी की थी, इसीलिए लोग उसे ‘इंजीनियर’ कहने लगे। साल 2002 में वो लोगों की नजर में आया जब नागपुर के मोमिनपुरा में एक मस्जिद पर कब्जे का झगड़ा हुआ। मस्जिद पहले अहले सुन्नत जमात के पास थी, लेकिन तबलीगी जमात के लोगों ने उस पर कब्जा कर लिया। तबलीगी जमात देवबंदी विचारधारा से जुड़ा समूह है, जो कई बार कट्टरपंथी हरकतों में फंसा है। हामिद बरेलवी स्कूल से था, और इन दोनों में गहरे मतभेद हैं।

इस झगड़े के बाद हामिद ने कट्टरपंथ की राह पकड़ ली। उसने ‘ईमान तंजीम’ नाम का एक ग्रुप बनाया, जो बरेलवी सुन्नी पहचान और सूफी ढोंग को बचाने का दावा करता था। हामिद ने एक भाषण में कहा था, “हमें लगा कि प्रशासन हमेशा सियासी दबदबे वालों का साथ देता है, इसलिए ईमान तंजीम बनाया।”

हामिद को वहाबी और देवबंदी विचारों का सुन्नी संस्थानों पर कब्जा बर्दाश्त नहीं था। वो जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों पर खुलकर हमला बोलता था। उसने मौलाना अबुल कलाम आजाद को निशाने पर लेते हुए कहा था कि अबुल कलाम आजाद ने बरेलवी हितों को कुचल दिया था। उसके भाषण ज्यादातर सूफी ढोंग, दरगाहों का धंधा और पैगंबर के नाम पर कट्टरता फैलाने वाले होते थे।

साल 2009 में हामिद ने माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) बनाई। इसका नारा था, “जो सूफी संतों की बात करेगा, वही भारत पर राज करेगा”। इससे उसकी कट्टर सोच साफ दिखती थी। MDP ने कई राज्यों में चुनाव लड़ा, लेकिन कहीं कामयाबी नहीं मिली। फिर भी सांप्रदायिक तनाव के मौके पर ये पार्टी सड़कों पर कूद पड़ती थी।

सूफी बनकर की थी पीएम मोदी से मुलाकात

साल 2015 में हामिद चर्चा में तब आया था, जब उसने पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। ये मुलाकात पीएम की सूफी पहल के तहत हुई थी, जिसमें पहला मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल था। हामिद ने वहाँ वहाबी विचारधारा के बढ़ते असर का रोना रोया था।

उसने पीएम मोदी से कहा था, “सुन्नी वक्फ बोर्ड पर कट्टर सोच हावी हो गई है। कई सुन्नी संस्थानों पर कब्जा हो गया है, जहाँ कट्टरपंथी विचार फैलाए जा रहे हैं। अगर ये सोच भारत में फैली, तो देश के लिए खतरा होगा।”

उसने अहले सुन्नतुल जमात के लिए अलग वक्फ बोर्ड की माँग करते हुए कहा, “वहाबियों को उनका अलग वहाबी वक्फ बोर्ड दे दो।” उस वक्त कुछ लोग उसे नरम सूफी आवाज समझ बैठे, जो कट्टर इस्लामी जवाब दे रहा था।

पैगंबर के नाम पर धमकियों भरा अतीत

हामिद 15 साल पहले नजर में आया था, जब उसके टैबलॉयड ‘इमाम की आवाज’ में गुजरात और जयपुर में सिलसिलेवार बम धमाकों की बात कही गई। उसकी कॉपियाँ गुजरात के बड़े पुलिस अफसरों को भेजी गईं। हामिद ने सफाई दी कि मुस्लिम समुदाय में गुटबाजी और खूनखराबे की बात कर रहा था।

साल 2011 में उसे हिरासत में लिया गया था, जब मोमिनपुरा में कथित सूफी संत बाबा मुस्तफा के दफन को लेकर भीड़ ने हिंसा की थी। इस हंगामे में उसकी बड़ी भूमिका थी, जो आपसी झगड़ों से जुड़ी थी।

हामिद की कट्टरता 2022 में खुलकर सामने आई, जब उसने नुपुर शर्मा के खिलाफ जहरीले बयान दिए। जून 2022 के पहले हफ्ते में नागपुर में MDP के बैनर तले प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें उसने नुपुर शर्मा और दिल्ली बीजेपी के पूर्व नेता नवीन जिंदल को मौत की धमकी दी।

उसने कहा, “पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताखी करने की एक ही सजा है – मौत। कोई आपको रोक नहीं सकता। आप अपनी मौत का फरमान लिख रहे हैं।” उसने 2019 में कमलेश तिवारी की हत्या का हवाला देते हुए कहा, “ये मत सोचो कि मामला सुलझ गया तो आप बच जाओगे। ईशनिंदा मत करो।”

यही वो वक्त था जब MDP सिर्फ नाम की पार्टी से आगे बढ़कर सड़कों पर कट्टर आंदोलन करने लगी। ये लोग इस्लाम का अपमान करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग लेकर हंगामा करते थे।

नागपुर में हिंदू विरोधी दंगों में रहा शामिल

बता दें कि 17 मार्च 2025 को नागपुर के महाल इलाके में मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हमले किए थे। जिसमें हिंदुओं के घरों, गाड़ियों को निशाना बनाया गया, साथ ही पुलिस वालों पर भी हमले किए गए थे। अफवाह फैली कि कुरान का अपमान हुआ। ये अफवाह तब उड़ी जब हिंदू संगठन खुल्दाबाद में औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।

पुलिस का कहना है कि MDP के नागपुर शहर अध्यक्ष फहीम खान ने इन अफवाहों को हवा दी। उसने भड़काऊ वीडियो फैलाकर उत्तरी और मध्य नागपुर में भीड़ जुटाई। 19 मार्च 2025 को उसे दंगों का सरगना बताकर पकड़ा गया।

फहीम की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की नजर हामिद इंजीनियर पर पड़ी। हामिद ने फहीम की गिरफ्तारी का विरोध किया और फहीम के समर्थन में बयानबाजी की। इस दौरान उसने यूट्यूब चैनल पर जहरीले बयान दिए, जिसके बाद 21 मार्च 2025 को पुलिस ने उसे धर दबोचा। उसके साथ ही यूट्यूबर मोहम्मद शहजाद खान को भी पकड़ा गया था, जो उसकी पार्टी MDP का सदस्य है।

साध्वी प्रज्ञा से दिशा सालियान तक परमबीर सिंह की वर्दी पर छींटे कई, जब सलमान खान को खोज रही थी मुंबई पुलिस तब उनके साथ कर रहे थे पार्टी: ‘भगोड़ा’ भी घोषित कर चुकी है कोर्ट, जानिए इनसे जुड़े विवाद

दिशा सालियान की मौत के मामले में उनके पिता सतीश सालियान ने मुंबई पुलिस में लिखित शिकायत देकर शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे, एक्टर डिनो मोरिया, सूरज पंचोली और कुछ पुलिस वालों के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। सतीश का दावा है कि उनकी बेटी के साथ गैंगरेप हुआ और फिर उसकी हत्या कर दी गई। इस शिकायत में आदित्य ठाकरे को मुख्य आरोपित बताया गया है, साथ ही तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर सच को दबाने का इल्जाम लगाया गया है। वकील नीलेश ओझा ने कहा कि ये शिकायत जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस ने स्वीकार कर ली है और इसमें परमबीर सिंह का नाम भी है, जो उस वक्त मुंबई पुलिस कमिश्नर थे। ओझा का कहना है कि परमबीर ने सबूत मिटाने और मामले को रफा-दफा करने में अहम रोल निभाया।

परमबीर सिंह को इस FIR में कवरअप का मास्टरमाइंड कहा गया है। शिकायत में दावा है कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके झूठ बोला और आदित्य ठाकरे को बचाने की कोशिश की। सतीश सालियान और उनके वकील का आरोप है कि परमबीर ने पुलिस की ताकत का गलत इस्तेमाल किया और सच को सामने आने से रोका। ये पहली बार नहीं है जब परमबीर सिंह किसी विवाद में फँसे हों। परमबीर का नाम पहले भी कई बड़े मामलों में आ चुका है, जहाँ उन पर गंभीर इल्जाम लगे हैं।

कर्नल पुरोहित को यातनाएँ देने में परमबीर सिंह रहा आगे

साल 2008 के मालेगांव बम धमाके में कर्नल श्रीकांत पुरोहित को आरोपित बनाया गया था। कर्नल ने कोर्ट में बताया कि परमबीर सिंह और ATS के अफसरों ने उन्हें टॉर्चर किया। उनके साथ मारपीट, गालियाँ और प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया, ताकि वो ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव कबूल लें। कर्नल का कहना है कि परमबीर ने कॉन्ग्रेस की शह पर उन्हें फँसाया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

सलमान खान के साथ पार्टी करता था परमबीर

साल 2012 में सलमान खान के हिट एंड रन केस में समन नहीं पहुँचा, क्योंकि पुलिस ने कहा वो शहर से बाहर हैं। बाद में खुलासा हुआ कि सलमान उस वक्त मुंबई में ही थे और परमबीर सिंह के साथ पार्टी कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परमबीर ने सलमान को बचाने की कोशिश की। इसने सवाल उठाया कि क्या परमबीर बड़े लोगों को फायदा पहुँचाने में लगे थे।

परमबीर ने छिपाया 26/11 हमले के दोषी कसाब का फोन

रिटायर्ड ACP शमशेर खान पठान ने दावा किया कि 26/11 हमले में कसाब के पास से मिला फोन परमबीर ने अपने पास रख लिया। इस फोन से पाकिस्तान के हैंडलर्स का पता चल सकता था, लेकिन परमबीर ने इसे जाँच टीम को नहीं दिया। पठान ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को लिखे पत्र में कहा था कि 26/11 के बाद कसाब के पास से मिले जिस फोन को परमबीर सिंह ने जब्त किया, कथित तौर पर उसी फ़ोन पर कसाब को उसके आका पाकिस्तान से ऑर्डर दे रहे थे।

साध्वी प्रज्ञा पर भी किया अत्याचार

परमबीर सिंह पर साध्वी प्रज्ञा को प्रताड़ित करने के गंभीर आरोप हैं। प्रज्ञा ने कहा था कि मालेगांव केस में उन्हें हिरासत में टॉर्चर किया गया, उन्हें बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उन्हें वेंटीलेटर तक पर जाना पड़ा। उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई। उन्हें पोर्न दिखाकर भद्दे सवाल पूछे गए। साध्वी का दावा है कि परमबीर ने ‘भगवा आतंक’ का झूठा नैरेटिव बनाने के लिए ये सब किया।

26/11 हमले के समय नहीं निभाया फर्ज

मुंबई अटैक 26/11 के दौरान परमबीर सिंह पर आतंकियों से मुकाबला करने से इनकार करने का आरोप लगा। तत्कालीन कमिश्नर हसन गफूर ने कहा कि परमबीर और कुछ अफसर ड्यूटी से पीछे हट गए। एक PIL में भी दावा किया गया कि उनकी लापरवाही से कई जानें बचाई जा सकती थीं। बता दें कि 2009 में 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के तुरंत बाद हमले के दौरान कर्तव्य की लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और तीन अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ याचिका दायर की गई थी।

सिंचाई घोटाले में अजित पवार को दी थी क्लीनचिट

महाराष्ट्र में ACB के डीजी रहते हुए परमबीर ने अजित पवार को सिंचाई घोटाले में क्लीनचिट दे दी। इस घोटाले में अजित पर करोड़ों के गबन का आरोप था। परमबीर के इस फैसले पर सवाल उठे कि क्या उन्होंने राजनीतिक दबाव में ऐसा किया।

ड्रग केस में सलिल चतुर्वेदी को फँसाने का आरोप

साल 2009 में परमबीर पर प्रोवोग के को-ओनर सलिल चतुर्वेदी को ड्रग केस में फँसाने का इल्जाम लगा। CID की जाँच में पता चला कि परमबीर की टीम ने चतुर्वेदी के घर में कोकीन प्लांट की थी। बाद में चतुर्वेदी बरी हो गए।

जबरन वसूली के केस में कोर्ट में घोषित किया था भगोड़ा

2021 में परमबीर पर होटल कारोबारी बिमल अग्रवाल से 11 लाख की वसूली का केस दर्ज हुआ। समन के बावजूद वो पेश नहीं हुए। मुंबई कोर्ट ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया और संपत्ति कुर्क करने की बात कही।

परमबीर सिंह का करियर विवादों से भरा रहा। 2021 में मुंबई कोर्ट ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया था, लेकिन बाद में महाराष्ट्र सरकार ने कुछ केस वापस ले लिए। आज वो मुंबई के लीलावती अस्पताल में डायरेक्टर हैं। पुलिस की वर्दी से अस्पताल के बोर्डरूम तक का उनका सफर सवाल उठाता है कि क्या सच को दबाने और विवादों से बचने की उनकी कला ही उन्हें आगे ले गई। दिशा सालियान केस में उनका नाम फिर से चर्चा में है, लेकिन क्या इस बार सच सामने आएगा, ये वक्त ही बताएगा।