Home Blog Page 426

इस्लाम को नीचा दिखाता है हिंदुत्व… US की ह्यूस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाया जा रहा ऐसा ‘हिंदूफोबिक’ कंटेंट: भारतीय छात्र भड़के, विरोध देख यूनिवर्सिटी ने जारी की सफाई

अमेरिका के ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी में चल रहा एक कोर्स ‘लिव्ड हिंदू रिलिजन’ इन दिनों सुर्खियों में है। भारतीय-अमेरिकी छात्र ने इस कोर्स पर हिंदूफोबिया यानी हिंदू विरोधी होने का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कोर्स हिंदू धर्म को गलत तरीके से पेश करता है और भारत के राजनीतिक हालात को तोड़-मरोड़ कर दिखाता है।

दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी ने इसका बचाव करते हुए कहा कि ये कोर्स एकेडमिक फ्रीडम का हिस्सा है और इसमें किसी धर्म के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं है। इस विवाद ने सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक हंगामा मचा दिया है।

भारतीय-अमेरिकी छात्र वसंत भट्ट का आरोप है कि कोर्स को पढ़ाने वाले प्रोफेसर आरोन माइकल उलरे हिंदू धर्म को एक ‘औपनिवेशिक ढाँचा’ बताते हैं, न कि प्राचीन और जीवंत परंपरा। भट्ट के मुताबिक, प्रोफेसर कहते हैं कि ‘हिंदू’ शब्द हाल का है और इसे पुराने ग्रंथों में नहीं देखा जाता। कोर्स में ये भी दावा किया गया कि हिंदुत्व यानी ‘हिंदू-नेस’ को हिंदू राष्ट्रवादी इस्तेमाल करते हैं ताकि दूसरे मजहबों, खासकर इस्लाम को नीचा दिखा सकें।

भट्ट ने कोर्स का एक हिस्सा शेयर किया, जिसमें कहा गया, “हिंदू शब्द नया है, ग्रंथों में नहीं मिलता। हिंदुत्व वो शब्द है, जिसे हिंदू राष्ट्रवादी अपनी पहचान के लिए इस्तेमाल करते हैं।” ये सुनकर भट्ट और कई हिंदू छात्रों का गुस्सा भड़क उठा। उनका मानना है कि ये उनकी आस्था पर हमला है।

इतना ही नहीं, कोर्स में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘हिंदू कट्टरपंथी’ कहा गया और भारत को हिंदू राष्ट्रवादी देश बताते हुए अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का आरोप लगाया गया। भट्ट ने इसे ‘बौद्धिक रूप से खोखला’ और ‘हिंदूफोबिक’ करार दिया।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने गुस्सा जाहिर किया। एक यूजर ने लिखा, “मोदी को हिंदू कट्टरपंथी कहना और हमारी परंपरा को राजनीतिक हथियार बताना हिंदूफोबिया है।”

हिंदू ऑन कैंपस नाम के एक स्टूडेंट ग्रुप ने कहा, “इन दावों के पीछे कोई सबूत नहीं है। राजनीतिक मतभेद ठीक हैं, लेकिन हिंदू पहचान को बदनाम करना गलत है।” भट्ट ने इसकी शिकायत कॉलेज ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड सोशल साइंसेज के डीन से की, जिसके बाद यूनिवर्सिटी ने जाँच शुरू की।

सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ता देख हिंदू ऑन कैंपस ने ट्वीट किया, “मोदी पर कोर्स का हमला नस्लीय और धार्मिक भेदभाव है।” कई लोगों ने इसे उदारवादी शिक्षा में हिंदू विरोधी रवैये का सबूत बताया। एक यूजर ने लिखा, “हिंदू धर्म को सदियों से गलत दिखाया गया, और अब ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी भी यही कर रही है।” भट्ट का कहना है कि कोर्स हिंदू धर्म की जटिलता और समृद्धि को नजरअंदाज करता है और इसे सिर्फ एक राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करता है।

यूनिवर्सिटी ने दी सफाई

इस मुद्दे पर यूनिवर्सिटी की तरफ से सफाई जारी की गई है। ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी ने बयान जारी कर कहा कि वो एकेडमिक फ्रीडम को महत्व देती है। यूनिवर्सिटी के मुताबिक, ‘लिव्ड हिंदू रिलिजन’ कोर्स धार्मिक अध्ययन के अकादमिक ढाँचे पर आधारित है। यूनिवर्सिटी का कहना है कि ‘फंडामेंटलिज्म’ जैसे शब्द इसमें विश्लेषण के लिए इस्तेमाल होते हैं, न कि किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए।

बयान में कहा गया, “धार्मिक अध्ययन में फंडामेंटलिज्म का मतलब एक ऐसी विचारधारा से है जो धर्म के ‘सच्चे’ रूप को बनाए रखने का दावा करती है। ये कोई आलोचना नहीं, बल्कि धर्म के विकास को समझने का तरीका है।” यूनिवर्सिटी ने ये भी साफ किया कि कोर्स में भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार को मौजूदा घटनाओं से जोड़ा गया है, लेकिन ये हिंदू धर्म की आलोचना नहीं है।

इस कोर्ट को तैयार करने वाले प्रोफेसर उलरे ने भी सफाई दी है। उनका कहना है कि कोर्स में हिंदू धर्म को एकरूप नहीं दिखाया गया। उन्होंने कहा, “मैंने कभी हिंदू धर्म को औपनिवेशिक ढाँचा या अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का जरिया नहीं कहा। कोर्स में हिंदू धर्म की ऐतिहासिक जटिलता और समृद्धि को दिखाया जाता है।” उलरे ने ये भी कहा कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। यूनिवर्सिटी ने कहा कि वो छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लेती है और आरोपों की जाँच की जा रही है।

डमी स्कूलों से की पढ़ाई तो नहीं मिलेगी ‘ बोर्ड एग्जाम’ में एंट्री… CBSE का करारा प्रहार: शिक्षा में अनुशासन और समग्र विकास की ओर बड़ा कदम, NEP-2020 के अनुरूप सुधार

भारत में शिक्षा प्रणाली एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है। इसी क्रम में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसके तहत ऐसे छात्रों को कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा में बैठने से रोक दिया जाएगा, जो किसी मान्यता प्राप्त नियमित स्कूल में नामांकित नहीं हैं। यह निर्णय तथाकथित ‘डमी स्कूलों’ के खिलाफ एक सख्त कदम है, जो शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखने और छात्रों को समग्र शिक्षा प्रदान करने के लिए उठाया गया है।

यह कदम न केवल शिक्षा के मूल्यों को मजबूत करता है, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप भी है। साथ ही, यह हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा कोचिंग संस्थानों के लिए जारी दिशा-निर्देशों और राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल की भावना को भी समर्थन देता है। यह सुधार शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, अनुशासन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक आवश्यक पहल है।

शिक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना

CBSE का यह निर्णय वर्षों से चली आ रही उस प्रवृत्ति के खिलाफ है, जिसमें मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र डमी स्कूलों में प्रवेश लेते हैं। ये स्कूल नाममात्र के होते हैं और इनमें छात्रों को नियमित कक्षाओं में भाग लेने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे छात्र सिर्फ बोर्ड परीक्षा देने के लिए पंजीकृत होते हैं और पूरा समय कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं। यह न केवल शिक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है बल्कि बोर्ड परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।

CBSE द्वारा तय किए गए 75% उपस्थिति नियम को सख्ती से लागू करना और स्कूलों को जवाबदेह बनाना, यह सुनिश्चित करेगा कि छात्र केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि समग्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूलों में नामांकित हों। यह कदम स्कूल प्रबंधन एवं छात्रों और माता-पिता की सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ाने का कार्य करेगा और शिक्षा को महज़ एक औपचारिकता की बजाय एक अनुशासित प्रक्रिया बनाएगा।

यह एक लंबे समय से अपेक्षित सुधार है, जिसे CBSE को पहले ही लागू कर देना चाहिए था। कोटा, दिल्ली, जयपुर, लखनऊ, पटना जैसे शहरों में हजारों बच्चे नियमित स्कूल छोड़कर केवल कोचिंग कक्षाओं में जा रहे हैं, जो कि सरकार की NEP और केंद्र सरकार द्वारा जारी कोचिंग संस्थान के दिशा-निर्देशों के खिलाफ एक खुला विरोध है।

आखिरकार दिल्ली स्थित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE मुख्यालय ने दिल्ली के नजफगढ़, मुंडका और नांगलोई जैसे क्षेत्रों में चल रहे डमी स्कूलों के कारोबार का संज्ञान लिया है। ऐसे में मुख्य मुद्दा यह है कि CBSE के अधिकारी कितनी ईमानदारी से स्कूलों से नियमों का पालन करवाते हैं।

NEP-2020 के साथ पूर्ण समन्वय

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का प्रमुख उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि छात्रों के चिंतनशील, रचनात्मक और व्यावहारिक कौशल को विकसित करना है। यह नीति स्कूली शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम आधारित पढ़ाई से आगे बढ़ाकर विद्यालयों को जीवन के लिए तैयार करने पर ज़ोर देती है।

CBSE द्वारा लिया गया यह निर्णय NEP-2020 के उन्हीं सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है, जिसमें कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल विषयों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य नैतिक मूल्यों, नेतृत्व कौशल और सृजनात्मकता को भी विकसित करना होना चाहिए। डमी स्कूलों पर प्रतिबंध से यह सुनिश्चित होगा कि छात्र स्कूल के अनुभवात्मक शिक्षण प्रणाली, सह-पाठयक्रम गतिविधियों और सामाजिक विकास का लाभ उठा सकें।

इसके अलावा, यह निर्णय समग्र मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive Evaluation) की नीति को भी बल देता है, जहाँ छात्र/छात्राओं का मूल्यांकन केवल बोर्ड परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी पूरी शैक्षणिक यात्रा के दौरान उनके प्रदर्शन और कौशल विकास पर किया जाता है।

कोचिंग संस्थानों पर प्रभाव: संतुलन बनाना अनिवार्य होगा

इस कदम का सबसे बड़ा प्रभाव देश के कोचिंग संस्थानों पर पड़ेगा, जो वर्षों से डमी स्कूल प्रणाली पर निर्भर थे। विशेष रूप से कोटा, दिल्ली, पटना और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में छात्र डमी स्कूलों में दाखिला लेकर पूर्ण रूप से कोचिंग संस्थानों में समय बिताते थे।

हाल ही में राजस्थान सरकार ने कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल पेश किया, जिसमें कोचिंग संस्थानों के कामकाज को नियमित करने, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने और एक संतुलित शैक्षणिक वातावरण बनाए रखने की दिशा में कड़े नियम बनाए गए हैं। यह बदलाव कोचिंग संस्थानों को अपनी रणनीति बदलने और अपने पाठ्यक्रम को अधिक व्यापक बनाने के लिए मजबूर करेगा।

अब कोचिंग सेंटर केवल परीक्षा क्रैक करने का अड्डा नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें एक पूरक शिक्षा प्रणाली के रूप में कार्य करना होगा। कोचिंग संस्थानों को अब छात्रों को प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के साथ-साथ आलोचनात्मक सोच, समस्या समाधान कौशल और समय प्रबंधन सिखाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इससे कोचिंग संस्थाओं में भी एक उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण प्रणाली विकसित होगी।

स्कूल प्रबंधकों के लिए चुनौती और अवसर

स्कूल मालिकों के लिए यह निर्णय जहाँ एक बड़ी चुनौती है, वहीं एक नया अवसर भी प्रस्तुत करता है। अब ऐसे स्कूलों की पहचान होगी, जो केवल डमी छात्रों को नामांकित कर रहे थे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में विफल थे। इस फैसले से अच्छे स्कूलों को मजबूती मिलेगी, क्योंकि वे अब अपने शिक्षण गुणवत्ता को और बेहतर बना सकते हैं।

इसके साथ ही, यह निर्णय स्कूलों को डिजिटल लर्निंग, प्रयोगात्मक शिक्षा और नवाचार आधारित शिक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करेगा। स्कूल यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर शिक्षण सुविधाओं पर ध्यान देंगे तो उन्हें भी इसका लाभ मिलेगा और वे छात्र/छात्राओं एवं उनके माता-पिता के लिए अधिक आकर्षक बनेंगे।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर प्रभाव

शुरुआत में यह निर्णय उन छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण लग सकता है, जो केवल प्रतियोगी परीक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। हालाँकि, दीर्घकालिक दृष्टि से यह बदलाव उनके समग्र विकास के लिए अत्यंत लाभकारी साबित होगा। जब छात्र नियमित रूप से स्कूल जाएँगे तो उन्हें केवल परीक्षा की रणनीति ही नहीं, बल्कि जीवन के लिए आवश्यक कौशल भी विकसित करने का अवसर मिलेगा।

स्कूलों में शिक्षकों से संवाद, परियोजना कार्यों में भागीदारी, और सह-पाठयक्रम गतिविधियों के माध्यम से वे समस्या समाधान, टीम वर्क, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों को विकसित कर सकेंगे। इसके अलावा, यह निर्णय राज्य कोटा प्रणाली के दुरुपयोग को भी रोकेगा, जहाँ छात्र अपनी 12वीं की परीक्षा किसी विशेष राज्य से देकर वहाँ के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश लेने की कोशिश करते थे। इससे प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी होगी और केवल योग्य उम्मीदवारों को ही लाभ मिलेगा।

निष्कर्ष: एक मजबूत और निष्पक्ष शिक्षा प्रणाली की ओर अग्रसर भारत

CBSE द्वारा डमी स्कूलों पर प्रतिबंध और नियमित विद्यालयों में उपस्थिति को अनिवार्य बनाने का निर्णय एक बहु प्रतीक्षित सुधार है। यह कदम NEP-2020 की उस व्यापक सोच के अनुरूप है, जिसमें शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करने वाला एक सशक्त माध्यम माना गया है।

इस फैसले से न केवल छात्रों की शिक्षा प्रणाली को मजबूती मिलेगी, बल्कि कोचिंग संस्थान और स्कूल प्रबंधक भी अधिक उत्तरदायी बनेंगे। अब कोचिंग संस्थानों को परीक्षा-केंद्रित अध्ययन के बजाय छात्रों को समग्र रूप से विकसित करने की दिशा में कार्य करना होगा। वहीं स्कूलों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने और नवीनतम शिक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

छात्रों के लिए यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संदेश है कि शिक्षा केवल अंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण विकास यात्रा है। उन्हें अब परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ अन्य कौशलों को भी सीखने का अवसर मिलेगा, जिससे वे न केवल एक अच्छे प्रतियोगी बल्कि एक अच्छे नागरिक भी बन सकेंगे। इस बहु प्रतीक्षित सुधार का दूरगामी प्रभाव भारतीय शिक्षा प्रणाली पर पड़ेगा और एक नई पीढ़ी को तैयार करने में मदद करेगा, जो ज्ञान, अनुशासन और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होगी।

ईसाई धर्मांतरण के लिए ST बच्चों का हो रहा ब्रेनवॉश, MP के मंडला में बाल आयोग को SFI स्कूल के अवैध हॉस्टल से मिले 48 बच्चे: छात्रों का लक्ष्य- पास्टर और सिस्टर बनना, फंडिंग पर सवाल

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय हैं। ये स्कूल चला रही हैं, ये हॉस्टल चला रही हैं, जिनमें बच्चों को शिक्षा के नाम पर ईसाई बनाया जा रहा है। मंडला के घुटास ग्राम में साइन फॉर इंडिया नाम का स्कूल है, इसके हॉस्टल में रहने वाले 15 लड़कियों और 33 लड़कों को ईसाई बना दिया गया है। इस स्कूल को हॉस्टल चलाने की अनुमति तक नहीं है।

मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की जाँच में पता चला कि इन बच्चों का ब्रेनवॉश करके उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। इस स्कूल को ओडिशा का ज्योति राज बिना किसी अनुमति के चला रहा है। आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सारी जानकारी भोपाल मुख्यालय व प्रशासन को कार्रवाई के लिए भेज दी है।

बच्चों का ब्रेनवॉश और मजहबी किताबें

बाल संरक्षण आयोग के सदस्य ओंकार सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि ये 48 बच्चे दामोह, अनूपपुर, ओडिशा राज्य और आसपास के इलाकों से लाए गए थे। टीम ने जब बच्चों से बात की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं। बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनने की बजाय पास्टर और सिस्टर बनने की बात कह रहे थे। बच्चों ने खुद बताया कि उन्हें ईसाई धर्म से जुड़ने के लिए कहा गया है। जाँच में पाया गया कि उनका पूरी तरह से ब्रेनवॉश कर दिया गया था। स्कूल में बाइबिल समेत कई मजहबी किताबें भी मिलीं, जो इस बात का सबूत थीं कि यहाँ धार्मिक गतिविधियाँ चल रही थीं।

बाइबिल के साथ होती है स्कूल में प्रार्थना

आयोग की टीम के सामने ही एक अजीब नजारा देखने को मिला। स्कूल में प्रार्थना खुले में नहीं, बल्कि छत के नीचे एक अंडरग्राउंड जगह पर हो रही थी। आमतौर पर स्कूलों में प्रार्थना खुले में होती है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं था। टीम ने बच्चों से बातचीत और प्रार्थना का पूरा वीडियो रिकॉर्ड किया, जो अब सबूत के तौर पर प्रशासन और भोपाल मुख्यालय को भेजा गया है।

डीपीसी केके उपाध्याय ने बताया कि उन्हें पहले से शक था कि स्कूल में कुछ गलत चल रहा है। जब आयोग की टीम पहुँची, तो बच्चों को बाइबिल के साथ प्रार्थना कक्ष में जाते देखा। बच्चों ने कहा कि वे रोज शाम 6:30 बजे ईसाई प्रार्थना करते हैं और पहले वे दूसरे धर्म को मानते थे।

बच्चियों के कमरे में लगे हैं सीसीटीवी कैमरे

बाल संरक्षण आयोग की सदस्य डॉ. निवेदिता शर्मा ने बताया कि स्कूल के दस्तावेजों में बच्चों का धर्म हिंदू और जाति गोंड लिखा था, लेकिन हॉस्टल के रिकॉर्ड में उन्हें क्रिश्चियन दिखाया गया। बच्चों के पूरे कागजात भी नहीं मिले। हैरानी की बात ये कि हॉस्टल में बच्चियों के बाथरूम में कैमरे लगे थे, जो बेहद आपत्तिजनक है। इन 48 बच्चों में 15 लड़कियाँ और 33 लड़के शामिल हैं – जो मंडला, ओडिशा और अनूपपुर से लाए गए थे। बच्चों के माता-पिता की अनुमति के बिना उन्हें धार्मिक गतिविधियों में शामिल किया जा रहा था।

गोंड के साथ बैगा जनजाति के बच्चे भी निशाने पर

मंडला जिले के सामाजिक कार्यकर्ता तारेंद्र चौरसिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि बच्चों के हाथ में कलावा, माथे पर तिलक, सब गायब हैं। हिंदू प्रतीकों को मिटा दिया गया है। गोंड बच्चे हैं। पूरी तरह से ईसाई बनाए जा चुके हैं। प्रार्थना में ईशू की प्रार्थना करते हैं, बाइबिल हाथ में लिए रहते हैं। ये सभी बच्चे गोंड और बैगा जनजाति के हैं। बैना जनजाति की संख्या तेजी से खत्म हो रही है और इसमें सबसे बड़ा योगदान इन मिशनरियों का है।

तारेंद्र चौरसिया ने कहा, “सबसे बड़ा विषय यह है कि यहाँ आदिवासी बच्चों के साथ-साथ बैगा जनजाति बच्चों को भी कन्वर्ट किया जा चुका है। बिना माता-पिता के अनुमति के इनको प्रार्थना कराई जाती है एवँ उनके स्कूल फॉर्म में भी क्रिश्चियन रिलिजन लिखा गया है। इसी तरह आदिवासी जिला मंडला में ईसाई मिशनरियों के द्वारा विद्यालय को धर्मांतरण का अड्डा बनाया हुआ है, लगभग सभी स्कूलों में इसी तरह के मामले सामने आ रहे हैं।”

इस मामले से जुड़े वीडियो – फोटो ऑपइंडिया के पास मौजूद हैं। प्रार्थना करने से लेकर एमपी बाल संरक्षण आयोग के सदस्यों से बातचीत तक के, इन वीडियो और अन्य जानकारियों को कार्रवाई के लिए आगे भेजा गया है। हैरानी की बात है कि बामुश्किल 100 परिवारों वाले इस पिछड़े से गाँव में ईसाई मिशनरियाँ करोड़ों खर्च करके स्कूल बना रही हैं और उसमें बच्चों को मामूली फीस पर पढ़ाया जा रहा है। आखिर इसके पीछे का मकसद क्या है और कौन इस काम के लिए पैसे दे रहा है, इसकी जाँच बेहद जरूरी है।

साफ तौर पर ये पूरा मामला ईसाई मिशनरियों की करतूतों की ओर इशारा कर रहा है। बिना अनुमति के स्कूल चलाना, बच्चों का ब्रेनवॉश करना और धर्मांतरण की कोशिश करना गंभीर अपराध है। मुख्य आरोपित ज्योति राज ओडिशा का रहने वाला है और उसके खिलाफ कार्रवाई की माँग तेज हो गई है। प्रशासन से संपर्क कर इस मामले में सख्त कदम उठाने को कहा गया है। ये घटना एक बार फिर सवाल उठाती है कि क्या मिशनरी गतिविधियों के नाम पर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है?

‘न्यायपालिका का सबसे काला दिन…’ जस्टिस यशवंत वर्मा के ‘ट्रांसफर’ से भड़के इलाहाबाद HC के वकील, बार एसोसिएशन विरोध में उतरा: ‘कैश कांड’ में महिला की एंट्री से जाँचकर्ता भी परेशान

कैश कांड में फँसे दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरण करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च 2025) को जारी कर दी। स्थानांतरण की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे केंद्र स्वीकार कर लिया है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग भी खारिज कर दी। इस बीच जस्टिस वर्मा के घर में किसी रहस्यमयी महिला के आने बात भी सामने आ रही है।

दरअसल, होली के दिन 14 मार्च की रात करीब 11.30 बजे जस्टिस वर्मा के घर में आग लगी थी। उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे। दिल्ली के आधिकारिक आवास में उनकी वृद्ध माँ और बेटी थी। जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने दिल्ली फायर ब्रिगेड को इसकी सूचना दी। दमकल कर्मी जब जस्टिस वर्मा के घर आए तो वहाँ बोरों में भरी हुई नोटों की गड्डियों में आग लगी देखी।

मीडिया में यह खबर सात दिन बाद 21 मार्च को आई। इसके बाद बवाल होने लगे। आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम की बैठक बुलाई और जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने का आदेश जारी कर दिया। वर्मा वहीं से दिल्ली हाई कोर्ट में प्रोन्नत होकर आए थे। उधर, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कूड़ेदान नहीं है।

जस्टिस वर्मा के घर मिली भारी नकदी के मामला तूल पकड़ने लगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय से रिपोर्ट माँगी। रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय एक आंतरिक जाँच कमिटी बनाई, जो मामले की जाँच कर रही है।

इस बीच एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि जस्टिस वर्मा पर FIR दर्ज करने की माँग की। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि इस पर विचार करने से इनकार कर दिया। वहीं, यह मामला संसद में भी गूँजा। बाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अनुमति के बाद ही FIR दर्ज की जा सकती है।

अमित शाह ने यह भी कहा कि CJI संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बताई गई प्रक्रिया के तहत मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने जाँच के लिए जजों की एक समिति भी बनाई है। समिति की जाँच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए। इस बीच केेंद्र सरकार ने जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद स्थानांतरण करने की स्वीकृति दे दी और सुप्रीम कोर्ट ने इसका आदेश भी जारी कर दिया।

अधिसूचना में कहा गया है, “राष्ट्रपति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने का निर्णय लिया है।” हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने समिति की जाँच रिपोर्ट आने तक जस्टिस वर्मा को न्यायिक कार्यों से दूर रखने का भी आदेश दिया है। उधर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी ने इसे भारतीय न्यायपालिका का काला दिन बताया और कहा कि इसको लेकर बेमियादी हड़ताल जारी रहेगा।

‘रहस्यमयी महिला’ और जले एवं बचे हुए नोटों की गुमशुदगी

जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में मिली भारी मात्रा में नकदी के मामले में एक महिला की एंट्री हो गई है। मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि जस्टिस वर्मा के घर में आग लगने के कुछ देर बाद एक महिला कार से वहाँ पहुँची थी। महिला ने वहाँ तैनात पुलिस अधिकारियों को अपनी बातों में उलझाया और जस्टिस वर्मा के बंगले के स्टोर रूम में चली गई। कहा जा रहा है कि कुछ पुलिसकर्मी भी उसके साथ गए थे।

इस मामले में दो पुलिस अधिकारी और एक जूनियर अधिकारी जाँच के दायरे में हैं। जाँचकर्ता यह भी जाँच कर रहे हैं कि स्टोर रूम से जले और बिना जले नोटों को हटाने में उस महिला की कोई भूमिका थी और इसमें उसकी किसी पुलिस कर्मी ने सहायता की थी? फिलहाल, वहाँ तैनात 5 पुलिस कर्मियों को अपना मोबाइल पुलिस में जाँच के लिए जमा करने का आदेश दे दिया गया है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जाँच में पता चला है कि जस्टिस वर्मा के घर पर लगी आग में वहाँ रखी नकदी का कुछ ही हिस्सा जला था। वहाँ पर नोटों की गड्डियों से भरे कई बैग रखे थे, जलने से बच गए थे। ऐसे में जाँचकर्ता ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि जले हुए नोटों और जलने से बच गए नोटों से भरे बैगों का क्या हुआ।

यह भी पता लगाया जा रहा है कि घटना वाली रात को जज के आवास से कुछ नकदी निकाली भी गई थी या नहीं। दरअसल, जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में 14 मार्च की रात आग लगी थी। यह आग बेहद मामूली थी और 15 मिनट में ही इसे बुझा दिया गया था। हालाँकि, पुलिस और दमकल कर्मी वहाँ 2 घंटे तक रहे थे। यह फायर डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में कहा गया है।

म्यांमार-थाईलैंड में विनाशकारी भूकंप, नमाज पढ़ते समय मस्जिद गिरने से 20 की मौत: सोने का पगोड़ा भी गिरा, देखिए तबाही के Videos

म्यांमार में शुक्रवार (28 मार्च 2025) को 7.7 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया, जिसके बाद हर तरफ तबाही फैल गई। इसका असला पड़ोसी देश थाईलैंड में भी पड़ा है, वहाँ भी व्यापक नुकसान की शुरुआती खबर है। स्थानीय समयानुसार दोपहर 12:50 बजे ये धरती काँपी और इसके 12 मिनट बाद 6.8 का झटका फिर लगा। इसका केंद्र सागाइंग शहर से 16 किमी दूर था, सिर्फ 10 किमी की गहराई पर।

खबरों के मुताबिक, म्यांमार में अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है। मांडले में एक मस्जिद ढह गई, जहाँ नमाज पढ़ रहे लोग मलबे में दब गए। वहाँ से 20 मौतों की खबर है। एक यूनिवर्सिटी में आग लग गई और लोग डर से चीखते-भागते दिखे। नेपीडॉ की सड़कें टूट गईं, और 1000 बेड वाला अस्पताल घायलों से भर गया। म्यांमार की सेना ने आपातकाल घोषित कर दुनिया से मदद माँगी है।

इस भूकंप का असर थाईलैंड तक पहुँचा। बैंकॉक में 900 किमी दूर एक 30 मंजिला इमारत ढह गई, जिसमें 78 मजदूर फँस गए। तीन की मौत हो चुकी है। बांग सू के डिप्टी पुलिस चीफ वोरापत सुकथाई ने कहा, “मैंने लोगों को मदद माँगते सुना, पर घायलों की संख्या अभी साफ नहीं।”

इस बीच, थाई पीएम पेतोंगतार्न शिनवात्रा ने आपात बैठक बुलाई और बैंकॉक में आपातकाल लगा दिया। मेट्रो-रेल सेवाएँ बंद कर दी गई हैं, लोग सड़कों पर डरे हुए हैं। भूकंप का असर चीन के युन्नान, भारत के कोलकाता, मणिपुर और बांग्लादेश के ढाका-चटगाँव तक पड़ा है।।

मांडले का मशहूर महामुनि पगोड़ा भी टूट गया, जिसे भारत ने 2020 में ठीक करवाया था। 2016 में भी भूकंप ने इसे तोड़ा था। ये बौद्धों का पवित्र स्थल है, जहाँ हर दिन भक्तों की भीड़ रहती है। अब फिर से मलबे में बदल गया। म्यांमार का सागाइंग फॉल्ट भूकंपों के लिए जाना जाता है।

बता दें कि 1930 से 1956 तक 6 बड़े भूकंप आए थे। साल 2016 में बागान में 6.8 तीव्रता से तीन लोग मारे गए थे। इस बार भी मांडले में इरावदी नदी का पुराना अवा ब्रिज ढह गया। लोग डरे हुए हैं, घरों में जाने की हिम्मत नहीं। म्यांमार की खराब मेडिकल सुविधाएँ मुसीबत बढ़ा रही हैं। हर तरफ अफरा-तफरी है, लोग अपनों को ढूँढ रहे हैं।

मोदी सरकार ने तोड़ी आतंकवाद की कमर तो कश्मीरी युवाओं का फितूर भी उतरा, AK-47 वाला ‘टैटू’ मिटाने को क्लीनिकों में उमड़ी भीड़: हाथ, गर्दन, छाती पर गुदवा रखे थे

जम्मू-कश्मीर में अब युवा आतंक से मुँह मोड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक आतंकवादियों को अपना नायक मानने वाले युवा अब इस जाल में नहीं फँस रहे। जो युवा कभी रियाज नाइकू और बुरहान वानी बनने का सपना देखने वाले सेना में जाने को अपनी पहली पसंद मान रहे हैं। इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर के युवा अब अपने टैटू हटवा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के युवा अब तक अपने हाथ, गर्दन और छाती पर AK-47 और बिच्छू जैसे टैटू बनवा रहे थे। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि अब कश्मीर में युवा यह टैटू हटवाने के लिए भाग रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि बीते 4 सालों में कई हजार युवा अपने टैटू मिटवा चुके हैं। टैटू विशेषज्ञों का कहना है कि अब लोग कश्मीरी संस्कृति और धर्म के बारे में जागरूक हो रहे हैं। अब जो लोग नए टैटू बनवा रहे हैं, उनकी भी प्राथमिकता में बदलाव आया है।

सबसे ज्यादा मिट रहे AK-47 वाले टैटू

रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ के टैटू स्टूडियो में पूरे दिन युवाओं की भीड़ रहती है। वहाँ से कुछ दूरी पर लेजर पेन से टैटू मिटाने वाले विशेषज्ञ बासित बशीर का क्लीनिक भी है। उनके क्लीनिक पर युवाओं की भीड़ हाल के दिनों में बढ़ गई है। बासित ने बताया कि सबसे अधिक AK-47 वाले टैटू हटवाने के लिए युवा आ रहे हैं। ब्वायफ्रेंड और गर्लफ्रेंड के टैटू भी मिटवाए जा रहे हैं।

सालों से हिंसा और आतंक की परछाई में रहे युवाओं के मन-मस्तिष्क पर भी आतंक की छाप आ गई थी। इसी के चलते उनके टैटू भी AK-47, कंकाल की खोपड़ी, बिच्छू, साँप और शेर जैसे टैटू शरीर के अलग अलग हिस्सों में बनवाने लगे। रिपोर्ट में बशीर ने बताया कि अब तक वह लगभग एक लाख लोगों के शरीर से ऐसे टैटू मिटा चुके हैं।

जोश में बनवा लिया था, अब उससे जुड़ाव नहीं

Wion की रिपोर्ट कहती है कि टैटू हटवाने के लिए आने वाले लोग कैमरे पर या आधिकारिक तौर पर बात नहीं करना चाहते। ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर में टैटू को एक टैबू के तौर पर देखा जाता है। इसके अलावा कई लोगों का कहना है कि ट्रेंड के दौरान बनवाए गए टैटू से अब लोगो का उतना जुड़ाव नहीं रहा।

इसके अलावा टैटू हटाने के पीछे मजहबी कारण भी है। इस्लाम मजहब में भी स्थायी टैटू की इजाजत नहीं है। टैटू बनवाकर मस्जिद में जाना हराम है। मस्जिद के इमाम भी टैटू के खिलाफ लगातार तक़रीर देते रहते हैं। इसके चलते भी बड़ी संख्या में युवा अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बने टैटू हटवाने के लिए पहुँच रहे हैं।

अब कौन से टैटू ट्रेंड में

टैटू बनवाने के शरीर पर कई नुकसान भी हैं, लेकिन अभी भी लोगों में टैटू बनवाने को लेकर क्रेज बना हुआ है। कहा जा रहा है कि कश्मीर में अब मजहबी की बातें ज्यादा हावी हो रही हैं। बड़े पैमाने पर लोग मजहब के प्रति झुकाव महसूस कर रहे हैं। ऐसे में टैटू बनवाने वालो में अल्लाह, 786 और धर्म से जुड़े अन्य प्रतीक गुदवा रहे हैं।

बस कहने को है ‘कानून की नजर में सब बराबर’, जान लीजिए जस्टिस यशवंत वर्मा की जगह आपके घर में लगी आग में जले मिलते नोटों के बंडल तो क्या होता?

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली के दिन आग लगने की घटना के दौरान भारी मात्रा में अघोषित नकदी मिलने के बारे में पता चला था। इसको लेकर हर तरफ सवाल उठने लगे। आखिरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले में आंतरिक जाँच के लिए एक समिति गठित की है। इस आलेख में हम ये समझने का प्रयास करेंगे कि अगर यही घटना एक सामान्य आदमी के साथ हुई होता तो क्या होता।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना सिंह कहती हैं, “अगर आम आदमी के घर से इतनी नकदी बरामद होती तो पुलिस, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय या सीबीआई (CBI) जैसी एजेंसियाँ तुरंत कार्रवाई करतीं। आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू हो जाती। मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA, 2002), आयकर अधिनियम 1961 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज होता।”

वो आगे बताती हैं, “अवैध आय घोषित कर भारी जुर्माना लगाया जाता और उसकी संपत्तियों को ज़ब्त करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती। तुरंत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाता। आरोपित को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता और ज़मानत मिलना मुश्किल हो जाता। सामान्य आदमी से बरामद नकदी को सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाता और आरोपित के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाते।”

क्या होता, अगर जस्टिस वर्मा की जगह आम आदमी होता?

अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो तब क्या होता? ये एक अहम सवाल है। अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो दमकल कर्मी आग बुझाने की कार्रवाई के बाद कैश मिलने की जानकारी अपने अधिकारी को देते। इसके साथ ही वे दिल्ली पुलिस को सूचित करते। दमकल कर्मी इस घटना के बारे में अपनी डायरी में इसकी डिटेल में जानकारी देते।

वहीं, दिल्ली पुलिस के अधिकारी मौके पर पहुँचकर जाँच करते और इसकी जानकारी आयकर विभाग को देते। आयकर विभाग जिस व्यक्ति के आवास में नोट मिले या नोट जले, उससे पूछताछ करता। अगर वह व्यक्ति उस नकदी के बारे में एक-एक जानकारी देता कि किस तरह यह नकदी उससे जुड़ा है और उसने इस धन को कैसे कमाया और किस लिए रखा था।

अगर आयकर विभाग उसकी दी गई जानकारी से संतुष्ट हो जाता और उसे लगता है कि यह नकदी गलत तरीके से नहीं कमाई गई है और उसका उद्देश्य गलत नहीं था तो मामला बंद हो जाता। अगर आयकर अधिकारी उसके जवाब से संतुष्ट नहीं होते तो आय से अधिक संपत्ति जमा करने का उस पर मुकदमा दर्ज करते। साथ ही इसकी जानकारी प्रवर्तन निदेशालय (ED) को देते।

प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी मामले की जाँच करते और उन्हें लगता है कि मामला मनी लॉन्ड्रिंग का है तो इसमें FIR दर्ज करके उस व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता। इसके बाद वह ट्रायल के दौरान जेल में बंद रहता और आरोपित व्यक्ति जमानत के लिए अदालत की बार-बार चक्कर लगाता। इस तरह यह मामला आम और खास के लिए अलग हो जाता।

जस्टिस वर्मा के साथ क्या हो रही है कानूनी प्रक्रिया?

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट में बताएगी जस्टिस आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही ‘न्यायिक कदाचार’ के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं। कदाचार गंभीर होगा तो CJI जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देंगे। वे इससे इनकार करेंगे तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित कर जस्टिस वर्मा को हटाने की कार्यवाही की सिफारिश कर सकते हैं।

इसके बाद संसद में जस्टिस पर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे। अध्यक्ष या सभापति सांसदों और न्यायविदों से सलाह-मशविरा करेंगे। अगर स्पीकर या सभापति नोटिस को स्वीकार कर लेते हैं तो जस्टिस वर्मा के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए 3 सदस्यीय समिति गठित करेंगे।

समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देंगे। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देगी। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाएगा।

रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाएगा। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए। यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाएगा।

दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस तरह जज को हटाने का काम पूरा हो जाएगा। अभी तक के इतिहास में किसी जज पर महाभियोग से नहीं हटाया जा सका है, जबकि दो लोगों पर महाभियोग की कार्रवाई शुरू हुई है। इस तरह जज को सजा देने का काम पूरा हो जाएगा।

जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग सुप्रीम कोर्ट में खारिज

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च) को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सरकारी परिसर में अवैध नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने की माँग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई थी। पीठ ने कहा कि CJI के निर्देश पर मामले की इन-हाउस जाँच जारी है।

पीठ ने कहा, “इन-हाउस जाँच पूरी होने के बाद कई विकल्प खुले हैं। सीजेआई एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं या रिपोर्ट की जाँच करने के बाद मामले को संसद को भेज सकते हैं। आज इस याचिका पर विचार करने का समय नहीं है। इन-हाउस रिपोर्ट के बाद सभी विकल्प खुले हैं। याचिका समय से पहले है।”

याचिकाकर्ता नेदुम्पारा ने अपनी याचिका में कहा था कि केरल हाई कोर्ट के तत्कालीन जज के खिलाफ POCSO मामले का आरोप था, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। उन्होंने कहा कि जाँच करना कोर्ट का काम नहीं है। इसे पुलिस पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस कमिटी वैधानिक प्राधिकरण नहीं है। यह विशेष एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जाँच का विकल्प नहीं हो सकती है।

नेदुम्पारा ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में आम आदमी कई सवाल पूछ रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि 14 मार्च को जब नकदी बरामद हुई, उस दिन से आज तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? जब्ती का कोई पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया? एक सप्ताह तक इस घोटाले को क्यों छिपाया गया? आपराधिक कानून क्यों नहीं बनाया गया?

दरअसल, इसी सुप्रीम कोर्ट ने आज से 34 साल पहले 1991 में एक फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया था कि जज भी जनता के सेवक हैं। इसलिए अगर वे अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट या कोई भी कोर्ट के जज के खिलाफ भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। हालाँकि,उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्ते रखी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर CJI को लगता है कि आरोपों में दम नहीं है तो मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी कहा था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति ना हो, तब तक संबंधित जज के खिलाफ CrPC की धारा 154 के तहत मुकदमा नहीं दर्ज किया जा सकता। इस धारा के तहत पुलिस बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संभ्रांत कृष्ण का कहना है, “जस्टिस वर्मा के सरकारी निवास से भारी मात्रा में कैश पाए जाने की बात बहुत गंभीर विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के लिए तत्परता से एक समिति का गठन कर दिया है। अगर जाँच में जस्टिस वर्मा की किसी भी रूप में कोई भूमिका सामने आती है तो फिर उन पर आम नागरिक की तरह कानूनी प्रक्रिया की जा सकती है।”

इस तरह की समस्याओं के पीछे की मूल वजहों की ओर इशारा करते हुए एडवोकेट संभ्रांत कृष्ण आगे कहते हैं, “यह पूरा प्रकरण एक बड़ी समस्या, कॉलेजियम के द्वारा जजों की नियुक्ति, की ओर हम सबका ध्यान पुनः आकर्षित करता है। जब तब इसमें सुधार और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक अयोग्य व्यक्ति भी न्याय की कुर्सी पर विराजते रहेंगे।”

रीना सिंह कहती हैं, “जस्टिस वर्मा जैसे प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तुरंत गिरफ्तारी नहीं होती है। उन्हें राजनीतिक-सामाजिक संपर्कों का लाभ मिलता है। उनकी जमानत भी जल्दी हो सकती है, जबकि आम आदमी को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती। मीडिया कवरेज में भी आम आदमी के मामले को कठोरता से दिखाया जाता, जबकि प्रभावशाली व्यक्तियों को बचाने के प्रयास होते।”

हालाँकि, रीना सिंह और संभ्रांत कृष्ण जैसे अन्य अधिवक्ता भी ये मानते हैं कि कानून के सामने सब बराबर हैं, लेकिन कॉलेजियम एक बड़ी समस्या है। न्यायिक प्रक्रिया में समानता लाने के लिए सभी के खिलाफ निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित सुनवाई के साथ-साथ कठोर दंड का प्रावधान होना आवश्यक है, ताकि कोई भी कानून से ऊपर न हो।

जस्टिस वर्मा के घर नकदी मिलने में की एक-एक जानकारी

होली के दिन 14 मार्च 2025 मार्च की रात करीब 11.30 बजे जस्टिस वर्मा के घर में आग ली। जिस समय यह घटना हुई, उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे। दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास में उनकी वृद्ध माँ और बेटी थी। आग की सूचना घर वालों ने जस्टिस वर्मा को दी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने निजी सचिव ने दिल्ली फायर ब्रिगेड को इसकी सूचना दी।

सूचना मिलते ही दमकल की दो गाड़ियाँ मौके पर भेजी गईं और 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया। उस दौरान स्टोर रूम में बोरों में भरकर रखे भारी मात्रा में नोट जल चुके थे। नोटों के बारे में दमकल कर्मियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताया। आग बुझने के बाद जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने मौके पर पहुँचे पाँच पुलिसकर्मियों को वहाँ से चले जाने के लिए कहा।

जब इस मामले के जाँच अधिकारी अगली सुबह जस्टिस वर्मा के आवास पर आए तो उन्हें वापस भेज दिया गया और बाद में आने के लिए कहा गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने घटना की रात को पंचनामा नहीं बनाया था। इसको लेकर वहाँ तैनात अधिकारियों से सवाल तलब किए जाएँगे। दरअसल, पंचनामा बनाने के लिए पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो घटनास्थल के गवाह हों और मुकदमे के दौरान वे कोर्ट में अपना बयान दे सकें।

तुगलक रोड थाने में एक दैनिक डायरी दर्ज की गई, लेकिन उसमें वित्तीय बरामदगी का जिक्र नहीं किया गया। घटना के 8 घंटे बाद इसकी जानकारी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा को मिली। दरअसल, नई दिल्ली जिला के एडिशनल डीसीपी ने 15 मार्च 2025 को सुबह 8 बजे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुबह की डायरी सौंपी थी। उस डायरी में पिछले 24 घंटों में इलाके में हुई घटनाओं का सारांश था।

इस डायरी में जस्टिस वर्मा के आवास में लगी आग का भी जिक्र था। इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को घटना की जानकारी दी गई और नोटों में लगी आग का वीडियो भी उन्हें दिखाया गया। इसके बाद पुलिस कमिश्नर इसकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी। अंत में उन्होंने 15 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय को घटना की जानकारी दी।

इस घटना के 7 दिन बाद 21 मार्च को यह मामला मीडिया में आया। इसको लेकर हंगामा मच गया। दिल्ली के फायर चीफ अतुल गर्ग के हवाले से PTI में खबर चली कि दमकल कर्मियों ने जस्टिस वर्मा के घर में कहीं नकदी नहीं देखी। जब विवाद हुआ तो अतुल गर्ग ने कहा कि उन्होंने PTI को इस तरह का कभी बयान नहीं दिया कि जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर कोई नकदी नहीं मिली थी।

विवाद बढ़ गया तो CJI खन्ना ने 5 जजों वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बुलाई गई। आनन-फानन में कॉलेजियम ने घटना को चिंतानक बताते हुए जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया। इसको लेकर भी सवाल उठे। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके स्थानांतरण का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ‘कूड़ेदान’ नहीं है।

जब विरोध बढ़ा तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण का मामला इससे अलग है। इसके साथ ही CJI ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय से इस मामले की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी। CJI को सौंपी रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय कहा कि घटना के अगले दिन 15 मार्च की शाम करीब 4:50 बजे दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने आग के बारे में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सूचित किया।

रिपोर्ट तैयार करने के लिए मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के साथ घटनास्थल का दौरा किया और वहाँ जस्टिस वर्मा से भी मुलाकात की। जस्टिस वर्मा ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उस कमरे में नौकर, माली और कभी-कभी सीपीडब्ल्यूडी कर्मी रहते थे। जब मुख्य न्यायाधीश ने जले नोटों की तस्वीरें दिखाईं तो न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने खिलाफ किसी साजिश की आशंका व्यक्त की।

तमाम घटनाओं को लेकर चीफ जस्टिस उपाध्याय ने 25 पन्नों की अपनी रिपोर्ट CJI को भेज दी। इस रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि मामले की गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद CJI ने जस्टिस डीके उपाध्याय को आदेश दिया कि वे जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य ना सौंपे। साथ ही जस्टिस वर्मा से ये कहने के लिए भी कहा कि वे मोबाइल के कॉल रिकॉर्ड एवं अन्य डेटा डिलीट ना करें।

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।


सलमान खान ने पहनी राम जन्मभूमि स्पेशल एडिशन घड़ी, भड़क उठे इस्लामी कट्टरपंथी: बताया- मुर्तद, कहा- मुस्लिमों गैरत हो तो इस ज#@ का सिनेमा कभी नहीं देखना

सलमान खान की नई फिल्म ‘सिकंदर’ इस ईद पर आने वाली है, लेकिन उससे पहले उनकी घड़ी ने सोशल मीडिया पर बखेड़ा खड़ा कर दिया है। दरअसल, सलमान ने ट्विटर पर तस्वीरें डालीं और लिखा, “ईद पर थिएटर में मिलते हैं!” तस्वीरों में वो ऑरेंज रंग की घड़ी पहने कार के पास खड़े दिखे।

सलमान खान ने जो घड़ी पहनी है, वो जैकब एंड कंपनी की लिमिटेड एडिशन की घड़ी है। घड़ी में अयोध्‍या का रामलला मंदिर और हनुमान गढ़ी के बजरंग बली भी बैठे दिख रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलमान को यह घड़ी उनकी अम्मी सुशीला चरक यानी सलमा खान ने गिफ्ट की है। दुनियाभर में इसकी सिर्फ 49 घड़ियाँ हैं और सलमान के पास इनमें से एक है। इसी एडिशन की एक घड़ी कुछ समय पहले अभिषेक बच्चन भी पहने दिखे थे।

सलमान के पोस्ट से भड़के इस्लामी कट्टरपंथी

दरअसल, सलमान खान ने जिस कंपनी की घड़ी पहनी है, उस कंपनी के मालिक का नाम जैकब अराबो है। जैकब अराबो बुखारियन यहूदी हैं, जिसे इजरायल का समर्थन करने पर इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर निशाना बनाते रहते हैं।

ऐसे में सलमान खान की तस्वीरें आते ही इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए। मिर्जा बेग नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने लिखा, “अगर मुसलमानों गैरत है और मुसलमान हो तो इस ज$#@ की कभी मूवी नहीं देखना।” इसमें आगे लिखा है – यहूदी की कंपनी की घड़ी, वो भी राम जन्मभूमि एडिशन पहनना मुस्लिमों का मजाक उड़ाना है।

मिर्जा बेग के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

मस्टर स्तोरियानी’ (@Storyani_Yam) ने सलमान को ‘मुर्तद’ करार देते हुए ट्वीट किया, “मुस्लिम्स को सलमान खान का बहिष्कार करना चाहिए। 1992 में बाबरी के लिए मुसलमानों ने जान दी, और ये राम जन्मभूमि की घड़ी पहनकर शहीदों का मजाक उड़ा रहा है।”

इस बीच, किसी ने ‘सिकंदर’ फिल्म का बहिष्कार करने की बात की, ये इल्जाम लगाते हुए कि सलमान बाबरी मस्जिद ढहाने का मजाक उड़ा रहे हैं। मजेदार बात ये है कि बहिष्कार की बात करने वाला शख्स फिलिस्तीन का समर्थन करता है, पर राम जन्मभूमि आंदोलन को गलत ठहरा रहा है।

डॉ उज्मा के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

बता दें कि ‘सिकंदर’ एक एक्शन थ्रिलर फिल्म है, जो ईद 2025 पर रिलीज होगी। इसे ए. आर. मुरुगादॉस ने डायरेक्ट किया है और साजिद नाडियाडवाला ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में ढेर सारा एक्शन और ड्रामा होगा। सलमान का मुरुगादॉस के साथ ये पहला प्रोजेक्ट है और फैंस को इसकी बड़ी उम्मीदें हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर नहीं होगी FIR, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका: कहा- इंटरनल कमेटी कर रही जाँच, अभी यह सब करने का टाइम नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के FIR नहीं दर्ज की जाएगी। उनके घर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नगदी मिली थी। सुप्रीम कोर्ट ने यशवंत वर्मा ने खिलाफ FIR की माँग करने वाली याचिका को सुनने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभी FIR दर्ज करने का समय नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका की सुनवाई शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को जस्टिस उज्जल भुइयाँ और जस्टिस अभय एस ओका ने की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के घर कैश मिलने के मामले में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा बनाई गई कमिटी जाँच कर रही है।

कोर्ट ने बताया कि अगर यह कमिटी कुछ गलत पाएगी तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने कहा, “इन हाउस जाँच जारी है। अगर रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ सामने आती है तो FIR दर्ज की जा सकती है या फिर मामला संसद को भी भेजा जा सकता है। आज इस पर विचार करने का समय नहीं है।”

कोर्ट ने कहा है कि वह इस में अभी हस्तक्षेप नहीं करेंगे और चीफ जस्टिस के पास सारे विकल्प खुले हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस सुनवाई के दौरान कोर्ट से आग्रह किया कि वह भले कोई आदेश ना दें लेकिन याचिका स्वीकार कर लें। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी बात नहीं मानी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करते हुए याचिका पर सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका वकील मैथ्यू जे नेदुमपारा और बाकी लोगों ने लगाई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि FIR ना दर्ज होने से आम जनता के मन में प्रश्न उठ रहे हैं।

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली वाले दिन (14 मार्च, 2025) को आग लग गई थी। इसके बाद अग्निशमनकर्मियों को बुलाया गया था। उन्हें आग बुझाने के दौरान घर के एक कमरे से बड़ी मात्रा में नकद मिला था।

इसका वीडियो भी सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके विषय में एक रिपोर्ट भी जारी की थी। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उनका ट्रांसफर इस घटना के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक जाँच कमिटी बना दी है, इसमें तीन जस्टिस शामिल हैं। इसकी रिपोर्ट आने तक तक यशवंत वर्मा को न्यायिक काम से हटा दिया गया है।

दावा 20000 कमरों का, मिले 7000 ही: दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने बताया- किचन-टॉयलेट को भी क्लासरूम में गिनती थी केजरीवाल सरकार, ₹49 लाख की ‘देशभक्ति’ के प्रचार पर खर्च किए ₹11 करोड़

दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए थे। जितने क्लासरूम बनाने का दावा केजरीवाल सरकार करती थी, उसका एक तिहाई ही असल में निर्माण हुआ था। वहीं एक ₹4 करोड़ की योजना के प्रचार के लिए ₹20 करोड़ का खर्च किया गया था। यह सारे खुलासे के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने किए हैं।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र की चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के विषय में कई आँकड़े रखे हैं। उन्होंने शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को बताया कि केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए।

मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार जिन्हें क्लासरूम बताती थी, वह असल में स्टोररूम, किचन और बाकी कामों के लिए बनाए जाने वाले कमरे थे।

केजरीवाल सरकार ने शौचालयों तक को बच्चों की पढ़ाई का कमरा बता दिया था। मंत्री सूद ने बताया है कि भाजपा सरकार अब लोक निर्माण विभाग (PWD) को इस विषय में आदेश देगी कि वह मात्र क्लास रूम को ही गिने ना कि बाकी तरह के निर्माण को।

शिक्षा मंत्री सूद ने यह भी बताया है कि केजरीवाल सरकार के दौरान स्कूलों में हैप्पीनेस करिकुलम नाम का पाठ्क्रम जोड़ा गया था। इस पर ₹4 करोड़ खर्च किए गए थे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसके प्रचार पर ₹20 करोड़ का खर्च कर डाला।

उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल की सरकार के दौरान देशभक्ति करिकुलम पर ₹49 लाख खर्च किए गए और इसके प्रचार पर ₹11 करोड़ से अधिक खर्च कर दिए गए। आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी से कहा कि उनके कर्म वापस उनके पास आएँगे।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने ₹1300 करोड़ का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।

आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।

शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।