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महाकुंभ खत्म होते ही प्रयागराज में माहौल बिगाड़ने का प्रयास, हिंदुओं के घरों के बाहर फेंके गए बछड़े के सिर-पैर: पुलिस ने दर्ज की FIR, CCTV से हो रही जाँच

भव्य एवं दिव्य महाकुंभ की वजह विश्व पटल पर आए प्रयागराज में सांप्रदायिक हिंसा की साजिश रचने की शुरुआत हो गई है। हिंदुओं के महान धार्मिक उत्सव महाकुंभ के समापन के 48 घंटे के भीतर ही समुदाय के लिए पवित्र माने जाने वाले गोवंश के अवशेष इधर-उधर फेंके मिले हैं। शहर के दरियाबाद पुलिस चौकी के पास सड़क पर बछड़े का सिर और पैर सड़क एवं नाली में फेंके हुए मिले।

जब आसपास के लोगों ने देखा तो उनमें आक्रोश फैल गया। उन्होंने इसकी सूचना तुरंत पुलिस को दी। इसके बाद मौके पर पहुँचकर पुलिस ने लोगों से पूछताछ की और जाँच शुरू कर दी। आरोपितों की पहचान के लिए पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी चेक की। दरियाबाद निवासी गोपाल अग्रवाल की शिकायत पर अतरसुइया थाने में अज्ञात के खिलाफ FIR दर्ज हुई है।

ट्रांसपोर्ट का काम करने वाले गोपाल अग्रवाल 27 फरवरी को अपने घर से निकले तो उनके गेट पर बछड़े का कटा सिर रखा हुआ था। इसके बाद उन्होंने देखा तो उनके पड़ोसी अधिवक्ता दीपक कपूर एवं कई लोगों के घरों के सामने कटा पैर था। वहीं, शरीर के अन्य क्षत-विक्षत हिस्से गली में बिखरे पड़े थे। इसकी जानकारी मिलने पर हंगामा हो गया। सूचना पाकर तीन थानों की पुलिस मौके पर पहुँची।

पुलिस ने सूचना देकर पशु चिकित्सकों को बुलवाया। इसके बाद एक टीम आकर जाँच की और गोवंश के अवशेषों को अपने साथ ले गई। थाना प्रभारी संजय द्विवेदी का कहना है कि अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। द्विवेदी का कहना है कि माहौल खराब करने के लिए किसी ने जानबूझकर यह हरकत की है। इस FIR में दो बड़े आरोप लगाए गए हैं।

FIR में कहा गया है कि हिंदुओं के घरों को चिह्नित वहाँ गोवंश के अवशेष जानबूझकर रखे गए। इसमें यह भी कहा गया है कि यह हरकत किसी मुस्लिम समाज के किसी अराजतक तत्व की हो सकती है, क्योंकि जिस इलाके में यह घटना हुई है, वहाँ के बगल में मुस्लिमों की बस्ती है। इस बस्ती में मुस्लिमों की भारी आबादी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। इस संबंध में संबंधित थाने को जानकारी दी जाती रही है। हालाँकि, गोवंश का सिर और पैर काटकर फेंकने वाले आज तक पकड़े नहीं गए। लोगों ने पुलिस से अविलंब कार्रवाई का आग्रह किया है। बता दें कि पिछले पाँच महीने में यह तीसरी घटना है।

व्हाइट हाउस जाकर जेलेंस्की ने किया अमेरिका का अपमान, ट्रंप पत्रकारों के सामने भड़के: ऑन कैमरा हुई ‘तू-तू, मैं-मैं’, बाद में यूक्रेनी राष्ट्रपति बोले- हमें खेद है

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की व्हाइट हाउस में मुलाकात बड़े ड्रामे के साथ खत्म हुई। ये बैठक शुक्रवार (28 फरवरी 2025) को वॉशिंगटन डीसी में हुई थी, लेकिन तय समय से पहले ही ज़ेलेंस्की वहाँ से चले गए। जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस भी रद्द कर दी गई, क्योंकि ट्रंप ने ज़ेलेंस्की पर अमेरिका का अपमान करने का आरोप लगाया।

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ज़ेलेंस्की शांति नहीं चाहते, बल्कि अमेरिका की मदद से फायदा उठाना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “मुझे फायदा नहीं, शांति चाहिए। ज़ेलेंस्की ने ओवल ऑफिस में अमेरिका का सम्मान नहीं किया। जब वो शांति के लिए तैयार हों, तब आएँ।” बैठक में ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ज़ेलेंस्की को रूस-यूक्रेन जंग पर उनकी राय के लिए फटकारा। ज़ेलेंस्की ने अमेरिका को यूक्रेन की मुश्किलों का जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, लेकिन वेंस ने उन्हें रोक दिया। ये सब मीडिया में दिखाया गया।

बैठक में तनाव तब बढ़ा जब एक पत्रकार ने यूक्रेन की सुरक्षा पर सवाल पूछा। ट्रंप ने कहा, “मैं सुरक्षा की बात नहीं करना चाहता। मुझे बस डील चाहिए। यूरोप अपने लोग वहां भेजेगा। फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश सुरक्षा देंगे। हम खनिज निकालकर अपनी सुरक्षा करेंगे।” ज़ेलेंस्की ने जवाब दिया, “बिना सुरक्षा गारंटी के सीजफायर का कोई फायदा नहीं। पुतिन ने 25 बार सीजफायर तोड़ा है। मजबूत सेना चाहिए, वरना पुतिन नहीं रुकेगा।” ट्रंप भड़क गए और बोले, “आप सीजफायर नहीं चाहते, अपने लोगों को मरवाना चाहते हैं। ये अमेरिका का अपमान है।”

रूस ने इस झगड़े पर खुशी जताई। पूर्व रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने इसे ‘ज़ेलेंस्की के लिए करारा थप्पड़’ बताया। उन्होंने टेलीग्राम पर लिखा, “कीव सरकार तीसरे विश्व युद्ध का खेल खेल रही है। यूक्रेन को मदद बंद होनी चाहिए।” रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने कहा, “ज़ेलेंस्की उस हाथ को काट रहे हैं जो उन्हें खाना देता है।”

टीवी कमेंटेटर व्लादिमीर सोलोव्योव ने इसे ‘ज़ेलेंस्की की व्हाइट हाउस में आत्महत्या; करार दिया। रूस लंबे समय से ज़ेलेंस्की को अमेरिका का पिट्ठू बताता रहा है और अब ट्रंप के साथ अपने रिश्ते बेहतर करने की कोशिश में है। रूसी अधिकारी सर्गेई मार्कोव ने कहा, “ये झगड़ा ज़ेलेंस्की के करियर का अंत तेज करेगा।”

राजनीतिक विश्लेषक रिचर्ज हनानिया ने जेलेंस्की को आड़े हाथों लिया। उन्होंने बताया कि ये जेलेंस्की ही थी, जिसकी वजह से बातचीत बर्बाद हो गई, वर्ना कुछ ही मिनट में उनके हाथों में यूक्रेन की सुरक्षा गारंटी हो सकती थी।

हालाँकि जेलेंस्की ने एक्स पर पोस्ट कर अमेरिका, राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य सहयोगियों को शुक्रिया कहा है।

इस बीच, उन्होंने अमेरिकी चैनल फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ये भी कहा कि जो कुछ हुआ, वो नहीं होना था। इसके लिए वो माफी माँगते हैं।

इस घटना से यूक्रेन और उसके यूरोपीय दोस्त चिंतित हैं। उन्हें डर है कि ट्रंप और पुतिन कोई डील कर सकते हैं, जिसमें यूक्रेन को नजरअंदाज कर दिया जाए। ज़ेलेंस्की की स्थिति पहले से कमजोर हो गई है, क्योंकि वो अमेरिकी मदद पर निर्भर हैं।

BBC ने हमास कमांडर के बेटे को बनाया अपनी डॉक्यूमेंट्री का ‘हीरो’, बीवी को भी डॉलर दिए: लोग भड़के तो माँगनी पड़ी माफी, Video भी डिलीट

बीबीसी एक बार फिर विवादों में घिर गया है। इस बार मामला छोड़ा ज्यादा गंभीर है, क्योंकि बीबीसी ने डॉक्यूमेंट्री के नाम पर हमास जैसे आतंकी संगठन के नेता के बेटे को न सिर्फ मंच दिया, बल्कि डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों ने उसकी बीवी को पैसे भी दिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीबीसी ने ‘गाजा: हाउ टु सरवाइव ए वॉरजोन’ नाम की फिल्म बनाई, जिसमें 14 साल के अब्दुल्ला अल-यजूरी ने गाजा की जिंदगी के बारे में बताया। लेकिन बाद में पता चला कि अब्दुल्ला का बाप, डॉ. अयमन अल-यजूरी हमास सरकार में डिप्टी एग्रीकल्चर मिनिस्टर रह चुका है। हमास को दुनिया आतंकवादी संगठन मानती है और बीबीसी पर सवाल उठे कि उसने ऐसे शख्स के बेटे को क्यों चुना? क्या ये आतंकवादियों को बढ़ावा देने की कोशिश थी?

हालाँकि बीबीसी ने माफी माँग ली है और फिल्म को हटा दिया है। लेकिन लोग गुस्से में हैं। पता चला कि फिल्म बनाने वाली कंपनी होयो फिल्म्स को अब्दुल्ला के अब्बू के हमास कनेक्शन के बारे में पता भी था, लेकिन उसने बीबीसी को नहीं बताया। बीबीसी ने भी ठीक से जाँच नहीं की। ऊपर से अब्दुल्ला की अम्मी को पैसे भी दिए गए। अब सवाल है – क्या ये पैसे हमास तक पहुँचे?

इस मामले को लेकर ब्रिटेन की सरकार सख्त है। यूके की संस्कृति मंत्री लिसा नैंडी ने कहा कि उन्हें पक्का सबूत चाहिए कि आतंकवादियों को एक पैसा भी नहीं मिला। वहीं, आम लोग लोग बीबीसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने बीबीसी को आतंकियों का मंच करार दिया है।

हालाँकि कुछ ‘लिबरल’ लोगों को बीबीसी का डॉक्यूमेंट्री को हटाना पसंद नहीं आया। कुछ का कहना है कि ये फिल्म बच्चों की आवाज उठाने के लिए थी, जिसमें गाजा की मुश्किल जिंदगी दिखाई गई। गैरी लाइनकर जैसे बड़े नामों ने इसे सेंसरशिप बताया।

यही नहीं, हमास नेता के बेटे को मंच देने के अलावा बीबीसी ने डॉक्यूमेंट्री में इस्तेमाल ट्रांसस्क्रिप्ट का भी गलत तरीके से अनुवाद किया, ताकि आतंकी मंसूरों को खतरनाक की जगह हल्का बताया जा सके। दरअसल, बीबीसी ने डॉक्यूमेंट्री में ‘जिहाद’ की जगह ‘लड़ाई’ शब्द का इस्तेमाल किया है और ‘यहूदी’ को ‘इजरायली’ बताया है। ऐसे में लोग बीबीसी पर सच्चाई को भी छिपाने का आरोप लग रहा है।

कर्नाटक का हाल-बेहाल, लेकिन अपने लिए ‘शीशमहल’ बनवा रहे CM सिद्धारमैया: BJP ने उठाए सवाल, कहा- विकास के लिए पैसा नहीं, आवास पर ₹2.60 करोड़ खर्च

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के मुखिया भी अपने लिए ‘शीशमहल’ बनवा रहे हैं। इसको लेकर विवाद शुरू हो गया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने सरकारी आवास ‘कावेरी’ का जीर्णोद्धार करवा रहे हैं। इसके लिए राज्य लोक निर्माण विभाग ने 2.60 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया है।

राज्य के वित्त विभाग की ओर से इसको लेकर एक सरकारी अधिसूचना जारी की गई है। उसमें मुख्यमंत्री आवास में जो बदलाव करने की बात कही गई है, उसके बारे में बताया है। इसमें एक बाथरूम के साथ एक नया सहायक कक्ष, अतिरिक्त भंडारण कक्ष, भंडारण रैक, उन्नत प्रकाश व्यवस्था, जल व्यवस्था, फर्निचर सहित कई तरह के कार्य शामिल हैं।

हेल्पर रूम के निर्माण और रसोई के सामान आदि के लिए 1.70 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। वहीं, एयर कंडिशन और बिजली को भव्य बनाने के लिए 89 लाख रुपए खर्च होंगे। इनमें 16 लाख रुपए से सीसीटीवी कैमरे, एयर कंडीशनर और बिजली के अन्य उपकरणों आदि लगाए जाएँगे हैं। वहीं, 45 लाख रुपए से उपमुख्यमंत्री के सचिव के कक्ष का जीर्णोद्धार किया जाएगा।

बता दें कि PwD को इसके लिए टेंडर जारी किए बिना सीधे नवीनीकरण कार्य करने की अनुमति दी गई है। कर्नाटक पारदर्शिता सार्वजनिक खरीद (केटीपीपी) अधिनियम की धारा 4(G) के तहत PwD को यह छूट दी गई है। पिछले महीने 29 जनवरी को उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के आधिकारिक आवास पर बिजली के काम और फर्नीचर लगाने के लिए PwD को कथित तौर पर ऐसी ही छूट दी गई थी।

चिकपेट से भाजपा विधायक उदय गरुड़ाचार ने कहा, “जो काम नहीं किया जाना चाहिए, वह मुख्यमंत्री खुद कर रहे हैं। मेरी अपील है कि हम पहले यह सुनिश्चित करें कि बाकी सभी काम हो जाएँ। एक बार जब सारी ज़रूरतों को पूरा। कर दिया जाता है तो वे अपने घर के नवीनीकरण या जो कुछ भी चाहें, उस पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। लोग पैसे के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब पैसे नहीं बचे हैं।”

ऐसे समय में, जब राज्य वित्तीय संकट से जूझ रहा है, सार्वजनिक धन का उपयोग करके सीएम आवास का जीर्णोद्धार कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर सवाल खड़े करता है। पिछले साल जुलाई में कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया के वित्तीय सलाहकार बसवराज रायरेड्डी ने कहा था कि ‘गारंटी योजनाओं’ के कारण राज्य के पास विकास परियोजनाओं के लिए धन की कमी हो गई है।

दिल्ली के 14 अस्पतालों में नहीं कोई ICU, मोहल्ला क्लिनिक एकदम बर्बाद: CAG रिपोर्ट ने खोली केजरीवाल सरकार की पोल, लाडली योजना में ₹220 करोड़ का घोटाला

देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली की जनता के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ हमेशा से अहम रही हैं। ये अलग बात है कि जनता को हमेशा झुनझुना ही मिलता रहा है। दिल्ली की सत्ता पर 11 साल काबिज रहे अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आप सरकार ने जनहित के कामों को करने की जगह ढिंढोरा ही पीटा, क्योंकि अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट्स आ रही हैं, जिससे केजरीवाल सरकार की करतूतें उजाकर हो रही हैं। इन रिपोर्ट्स को अरविंद केजरीवाल या आतिशी के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा में पेश ही नहीं किया गया।

सीएजी की दो नई रिपोर्ट्स ने दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक योजनाओं की पोल खोल दी है। पहली रिपोर्ट में दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली सामने आई है, जिसमें सरकारी अस्पतालों में ICU, एंबुलेंस और बेड की कमी से लेकर कोविड-19 के दौरान फंड के दुरुपयोग तक की बातें शामिल हैं। दूसरी CAG रिपोर्ट ने दिल्ली सरकार की लाडली योजना में 220 करोड़ रुपये से ज्यादा की गड़बड़ियाँ उजागर की हैं, जिसमें फर्जी पंजीकरण, वित्तीय लापरवाही और लाभार्थियों तक फायदा न पहुँचने जैसे गंभीर मुद्दे हैं।

ये दोनों रिपोर्ट्स बताती हैं कि दिल्ली सरकार ने जनता की भलाई के लिए मिले संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं किया और कुप्रबंधन के चलते आम लोग परेशान रहे। इन रिपोर्ट्स ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं और सुधार की सख्त जरूरत को रेखांकित किया है। आइए इन दोनों मुद्दों को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि आखिर दिल्ली की जनता के साथ क्या-क्या हुआ।

दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं पर CAG रिपोर्ट

CAG की रिपोर्ट ने दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की हालत को पूरी तरह बेपर्दा कर दिया है। कुल 27 अस्पतालों में से 14 में ICU की सुविधा तक नहीं है, जो गंभीर मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसके अलावा 12 अस्पतालों में एंबुलेंस नहीं हैं, यानी जरूरत पड़ने पर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाना भी मुश्किल है। 16 अस्पतालों में ब्लड बैंक की कमी है, जिससे आपात स्थिति में खून की व्यवस्था करना एक बड़ा संकट बन जाता है।

दिल्ली की आप सरकार जिन मोहल्ला क्लीनिकों को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती रही है, उनकी हालत भी दयनीय है। ऐसी 21 क्लीनिकों में शौचालय नहीं हैं, 15 में बिजली बैकअप की सुविधा नहीं है, और 6 में तो डॉक्टरों के लिए टेबल तक नहीं है। 12 क्लीनिकों में दिव्यांगों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है, जो आप सरकार के कथित विकास दावों की हवा निकाल देता है। ये हालात साफ दिखाते हैं कि बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ भी दिल्ली की जनता से कोसों दूर हैं।

दिल्ली में केंद्र सरकार से मिले कोविड फंड का दुरुपयोग

कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया जूझ रही थी, दिल्ली में भी हालात भयावह थे। केंद्र सरकार ने दिल्ली को इस संकट से निपटने के लिए 787.91 करोड़ रुपये का फंड दिया था, लेकिन हैरानी की बात है कि इसमें से सिर्फ 582.84 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। बाकी 205.07 करोड़ रुपये बिना इस्तेमाल के पड़े रहे, जिसका नतीजा ये हुआ कि मरीजों को जरूरी सुविधाएँ नहीं मिल सकीं।

दिल्ली सरकार को स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती और वेतन के लिए 52 करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन इसमें से 30.52 करोड़ रुपये खर्च नहीं हुए। इसका मतलब साफ है कि डॉक्टरों और नर्सों की कमी को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। दवाइयाँ, पीपीई किट्स और दूसरी मेडिकल सप्लाई के लिए 119.85 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे, लेकिन 83.14 करोड़ रुपये का उपयोग नहीं हुआ। इस लापरवाही की कीमत दिल्ली की जनता को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, क्योंकि उस वक्त ऑक्सीजन, बेड और दवाइयों की भारी किल्लत थी।

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में बेड और स्टाफ की कमी

दिल्ली सरकार ने 2016-17 से 2020-21 तक 32,000 नए बेड जोड़ने का बड़ा वादा किया था, लेकिन असल में सिर्फ 1,357 बेड ही जोड़े गए, जो लक्ष्य का महज 4.24% है। इस कमी का असर ये हुआ कि कई अस्पतालों में बेड की ऑक्यूपेंसी 101% से 189% तक रही। यानी एक बेड पर दो-दो मरीजों को रखना पड़ा या कई मरीजों को फर्श पर इलाज लेना पड़ा। स्टाफ की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है।

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य विभागों में 8,194 पद खाली पड़े हैं। नर्सिंग स्टाफ में 21% और पैरामेडिकल स्टाफ में 38% की कमी है। खास तौर पर राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल और जनकपुरी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में हालात बदतर हैं, जहाँ डॉक्टरों की 50-74% और नर्सिंग स्टाफ की 73-96% कमी पाई गई। इस कमी के चलते मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है और कई बार सही देखभाल भी नहीं मिल पाती।

दिल्ली सरकार ने की प्रोजेक्ट्स में देरी, मशीनें हुईं खराब

दिल्ली में तीन नए अस्पताल बनाने की परियोजनाएँ शुरू हुई थीं, लेकिन इनमें भारी देरी और लागत में इजाफा हुआ। इंदिरा गाँधी अस्पताल में 5 साल की देरी हुई और लागत 314.9 करोड़ रुपये बढ़ गई। बुराड़ी अस्पताल 6 साल लेट हुआ, जिसकी लागत में 41.26 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। वहीं, एमए डेंटल अस्पताल (फेज-2) में 3 साल की देरी हुई और 26.36 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए। ये प्रोजेक्ट पिछली सरकार के वक्त शुरू हुए थे, लेकिन मौजूदा सरकार इन्हें पूरा करने में नाकाम रही। इसके अलावा, कई अस्पतालों में जरूरी उपकरण भी खराब पड़े हैं।

मरीजों को सर्जरी के लिए 12 महीने तक करना पड़ा इंतजार

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, मरीजों को लोक नायक अस्पताल में बड़ी सर्जरी के लिए 2-3 महीने और बर्न व प्लास्टिक सर्जरी के लिए 6-8 महीने का इंतजार करना पड़ा। चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में पीडियाट्रिक सर्जरी के लिए 12 महीने की वेटिंग थी। कई जगहों पर एक्स-रे, सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड मशीनें बेकार पड़ी रहीं, जिससे मरीजों को सही समय पर डायग्नोसिस भी नहीं मिल सका।

दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन और एंबुलेंस की कमी

कोविड के दौरान ऑक्सीजन की किल्लत ने दिल्ली को हिलाकर रख दिया था, और CAG रिपोर्ट बताती है कि 8 अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था ही नहीं थी। ये वो वक्त था जब लोग सड़कों पर ऑक्सीजन सिलेंडर ढूंढते फिर रहे थे। इसके साथ ही, 12 अस्पतालों में एंबुलेंस की सुविधा नहीं थी और जो CATS एंबुलेंस चल रही थीं, उनमें भी जरूरी उपकरणों की कमी थी।

मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाने के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं था, जिसके चलते कई लोगों की जान चली गई। मोहल्ला क्लीनिकों में भी हालात बद से बदतर थे। 15 क्लीनिकों में बिजली बैकअप नहीं था, यानी बिजली जाने पर मरीजों का इलाज ठप हो जाता था। इन सबके बीच सरकार के दावे हवाई साबित हुए और जनता को भारी परेशानी उठानी पड़ी।

लाडली योजना में 220 करोड़ का घोटाला

लाडली योजना को 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने शुरू किया था, जिसका मकसद लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना और 18 साल की उम्र पर 1 लाख रुपये तक की मदद देना था। लेकिन अरविंद केजरीवाल की सरकार ने इस योजना में भी धाँधलियों को अंजाम दे दिया। CAG की रिपोर्ट ने इसमें 220 करोड़ रुपये से ज्यादा की अनियमितताएँ उजागर की हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 41 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान हुआ और 618.38 करोड़ रुपये की राशि अघोषित पड़ी है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने लाभार्थियों के विवरण को सत्यापित करने में ढिलाई बरती, जिसके चलते बड़े पैमाने पर डुप्लिकेशन हुआ। 36,000 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए, जहाँ नाम, जन्मतिथि और माता-पिता का विवरण एक जैसा था। दिसंबर 2022 तक 8.84 लाख सक्रिय लाभार्थियों में 16,546 डुप्लिकेट और 131 ट्रिपल पंजीकरण पाए गए, जिससे 11.49 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

फर्जी रजिस्ट्रेशन हुए, 9% लाभार्थी 18 साल के पार

ऑडिट में ये भी पता चला कि 20,127 मामलों में जहाँ नाम या जन्मतिथि मिलती थी, वहाँ 29.23 करोड़ रुपये गलत तरीके से वितरित किए गए। सबसे बड़ी खामी ये थी कि मई 2023 तक आधार सत्यापन को योजना में शामिल नहीं किया गया था। इसके चलते एक ही लाभार्थी के कई पंजीकरण हो गए और फर्जीवाड़ा बढ़ता गया। करीब 9% लाभार्थियों ने 18 साल की उम्र के बाद नामांकन कराया, जिससे 180.92 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। 78,065 ऐसे लाभार्थी थे, जो पंजीकरण के समय पात्र उम्र पार कर चुके थे, फिर भी उनके खातों में पैसे जमा किए गए। कई मामलों में जन्मतिथि का कॉलम खाली था, जिससे ये साफ हो गया कि सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की भारी कमी थी।

लाभार्थियों को पैसा भी नहीं मिला

दिल्ली में 8.84 लाख सक्रिय लाभार्थियों में से 4.9 लाख लड़कियाँ, यानी 55%, पात्र होने के बावजूद योजना का लाभ नहीं ले सकीं। 18-20 साल की उम्र के 1.26 लाख लाभार्थियों के 236.03 करोड़ रुपये, 20-26 साल के 1.18 लाख के 224.56 करोड़ रुपये, और 26 साल से ऊपर की 77,000 लड़कियों के 157.78 करोड़ रुपये अभी तक वितरित नहीं हुए हैं।

इसके अलावा 1 लाख 74 हजार 960 ऐसे मामले थे, जिनमें लाभार्थी समाप्ति मानदंड को पूरा करते थे, लेकिन उनका निपटारा नहीं हुआ। विभाग का कहना है कि उसने पात्र लाभार्थियों तक पहुँचने के लिए सार्वजनिक नोटिस जारी किए थे, लेकिन ऑडिट में पाया गया कि सिर्फ दो बार 10 सितंबर 2020 और 17 जून 2022 को नोटिस जारी हुए। इतने बड़े पैमाने पर योजना चलाने के लिए ये कोशिश नाकाफी थी और लाभार्थियों तक जानकारी नहीं पहुँच सकी।

लाडली योजना के पंजीकरण में 69% की कमी

लाडली योजना में हर साल पंजीकरण की संख्या में भारी गिरावट आई है। 2009-10 में 1,39,773 लाभार्थी पंजीकृत हुए थे, जो 2020-21 में घटकर सिर्फ 43,415 रह गए, यानी 69% की कमी। जन्म के समय पंजीकरण भी 23,871 से घटकर 3,153 हो गया। ये आँकड़े बताते हैं कि योजना धीरे-धीरे अपनी अहमियत खोती जा रही है। लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण के जिस मकसद के लिए इसे शुरू किया गया था, वो पूरा नहीं हो सका। फंड की बर्बादी, फर्जी पंजीकरण और कुप्रबंधन ने इस योजना को नाकाम कर दिया। सरकार ने इसे ठीक करने के लिए मई 2023 में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) सिस्टम में शामिल करने की कोशिश शुरू की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

जरूरत मंद लड़कियों को नहीं मिली मदद

लाडली योजना में इतनी बड़ी गड़बड़ियों के बावजूद जिम्मेदारी तय करने की कोई कोशिश नहीं दिखती। विभाग ने न तो लाभार्थियों के डेटा को सही करने की जहमत उठाई और न ही फंड के सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया। 618.38 करोड़ रुपये जैसे भारी-भरकम फंड का इस्तेमाल न होना बताता है कि योजना को लेकर गंभीरता की कमी थी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उन लड़कियों को हुआ, जो इस मदद की हकदार थीं, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला।

CAG की दोनों रिपोर्ट्स ने दिल्ली सरकार की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुविधाओं की कमी और कोविड फंड की बर्बादी से लेकर लाडली योजना में फर्जीवाड़ा और लापरवाही तक, ये सब दिखाता है कि जनता के हितों को कितना नजरअंदाज किया गया। दिल्ली की जनता ने इन कमियों की भारी कीमत चुकाई है, चाहे वो इलाज के लिए तरसना हो या शिक्षा के लिए मदद न मिलना।

बांग्लादेश की आजादी में भारत का योगदान काट दो… हिंदुओं का नरसंहार कराने वाले सुहरावर्दी को पढ़ाओ: यूनुस सरकार बदल रही पाठ्य-पुस्तक

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट करने के मोहम्मद यूनुस की की अंतरिम सरकार ने वहाँ के पाठ्यक्रमों में भी बदलाव शुरू कर दिया है। यूनुस सरकार के निर्देश पर बांग्लादेश के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तक बोर्ड (NCBT) ने 2025 के शैक्षणिक वर्ष में स्कूली पाठ्यक्रमों से शेख मुजीबुर्रहमान से संबंधित लेखन को कम कर दिया है। मुजीबुर्रहमान निर्वासित पीएम हसीना के पिता थे।

मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के संस्थापक एवं प्रथम राष्ट्रपति थे। पाठ्य-पुस्तकों में उनसे संबंधित सामग्री को कम कर दिया गया है। जो हैं उन्हें फिर से लिखा गया है। जिन अध्यायों में पाकिस्तान के खिलाफ मुक्ति संग्राम में उनके नेतृत्व को दिखाया गया था, उन्हें या तो हटा दिया गया है या स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अन्य राजनीतिक व्यक्तियों को शामिल करते हुए उसे फिर से लिखा गया है।

हिंदू विरोधी और मुस्लिम लीग के नेताओं को जोड़ा

पुस्तकों में जिन अन्य राजनीतिक हस्तियों को शामिल किया गया है, उनमें मुस्लिम लीग पूर्व नेता मौलाना अब्दुल हामिद खान भशानी, अविभाजित बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हिंदू विरोधी हुसैन सुहरावर्दी, मुस्लिम लीग के पूर्व नेता एवं पूर्वी पाकिस्तान के पीएम अबुल कासिम फजलुल हक और हसीना की प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया एवं उनके शौहर व पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान शामिल हैं।

बांग्लादेश की आजादी में मुजीबुर्रहमान के योगदान को भी घटा दिया गया है। ‘मुजीब माने मुक्ति (मुजीब का मतलब आजादी)’ को कक्षा 4 की बंगाली किताबों से हटा दिया गया है। वहीं, बांग्लादेश की आजादी की माँग को जियाउर रहमान के हवाले कर दिया गय है। नई पुस्तकों में कहा गया है कि तत्कालीन सेना प्रमुख ने 26 मार्च 1971 को चटगाँव से स्वतंत्रता की पहली घोषणा की थी।

इसमें आगे कहा गया है कि जियाउर रहमान की व्यक्तिगत घोषणा के अगले दिन 27 मार्च 1971 को मुजीब ने भी आजादी की घोषणा की थी। पिछली पुस्तकों में मुजीब को 26 मार्च 1971 को स्वतंत्रता की पहली घोषणा करने का श्रेय दिया गया था। इस तरह बंगबंधु कहलाने वाले मुजीबुर्रहमान के योगदान को कम करके इसे दूसरे के हवाले किया जा रहा है।

भारतीय योगदान को लेकर काट-छाँट

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पाठ्य-पुस्तकों में बांग्लादेश की आज़ादी में भारत के योगदान को रखा गया है, लेकिन तत्कालीन पीएम इंदिरा गाँधी के साथ मुजीबुर्रहमान की ऐतिहासिक तस्वीरें हटा दी गई हैं। इन दो तस्वीरों में एक 6 फ़रवरी 1972 को कोलकाता की एक रैली में दोनों के संयुक्त संबोधन की तस्वीर और 17 मार्च 1972 को ढाका में इंदिरा गाँधी के स्वागत की तस्वीर शामिल हैं।

हालाँकि, साल 1971 के युद्ध में भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी की भूमिका बरकरार रखी गई है। इसमें 16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के सामने पाकिस्तान के आत्मसमर्पण की ऐतिहासिक तस्वीर शामिल है। इसके अलावा, पुस्तकों के नए संस्करणों में बांग्लादेश की स्वतंत्रता को सबसे पहले मान्यता देने वाले देश के रूप में भारत का नाम हटा दिया गय है। भारत जगह भूटान का नाम कर दिया गया है।

बांग्लादेश के संशोधित पाठ्य-पुस्तकों संस्करण में कहा गया है कि भूटान ने 3 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश की आजादी को मान्यता देने वाला पहला देश था। वहीं, मोहम्मद यूनुस की सरकार ने सभी पाठ्य-पुस्तक से शेख हसीना को पूरी तरह से हटा दिया गया है। इससे पहले के किताबों में पिछले कवर पेज पर शेख हसीना का छात्रों के लिए एक पारंपरिक संदेश छपा होता था।

उस पेज पर अब जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन की तस्वीरें छापी गई हैं, जो हसीना के खिलाफ शुरू की गई थीं। बांग्लादेश शिक्षा मंत्रालय द्वारा नियुक्त 57 विशेषज्ञों की एक टीम ने इन संशोधनों की रूपरेखा तैयार की है। इन संशोधनों को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक छात्रों के लिए 441 पाठ्य-पुस्तकों में किया गया है। वर्तमान शैक्षणिक साल के 40 करोड़ से अधिक नई पुस्तकें छापी गई हैं।

पुस्तकों में शेख हसीना प्रशासन पर सत्ता बनाए रखने के लिए न्यायपालिका और सिविल सेवा का इस्तेमाल कर अनुचित चुनाव कराने का आरोप लगाया गया है। इस बीच पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) की नेता खालिदा जिया ने कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति के खिलाफ लोगों से एकजुट होने का आग्रह किया है।

संभल के मजहबी ढाँचे की नहीं होगी रंगाई-पुताई: इलाहाबाद HC कोर्ट ने मस्जिद कमेटी को दिया झटका, ASI की रिपोर्ट देख दिए परिसर में सिर्फ ‘सफाई’ करने के आदेश

संभल के जामा मस्जिद को लेकर इलाहाबाद कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने मस्जिद कमेटी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि मजहबी ढाँचे के भीतर किसी प्रकार की रंगाई-पुताई नहीं की जा सकती। यहाँ अब केवल मस्जिद कमेटी को सफाई करने की अनुमति है।

बता दें कि संभल मस्जिद समिति की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका डालते हुए रंगाई-पुताई की परमिशन माँगी थी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने इस माँग को अस्वीकार कर दिया है। इस रिपोर्ट में कहा गया था ढाँचे में कोई ऐसी संरचनात्मक समस्या नहीं है इसलिए इसकी मरम्मत या फिर रंगाई करना जरूरी नहीं है। अब मामले में अगली सुनवाई 5 मार्च को होगी।

गौरतलब है कि मस्जिद कमेटी ने माँग की थी कि रमजान के मद्देनजर उन्हें मरम्मत कराने की अनुमति दी जाए। इसी के बाद कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को आदेश दिया कि वो मस्जिद में जाकर देखे कि रमजान से पहले सफेदी और सजावट की कितनी जरूरत है। इसके लिए ASI की तीन लोगों की टीम बनाई गई थी, जो मस्जिद का मुआयना करने गई थी।

हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार दिवालिया… अब मंदिरों से पैसे माँग कर चलाना चाहती है FREE वाली योजनाएँ: BJP ने किया विरोध

मुफ्त की रेवड़ी बाँटकर आर्थिक संकट में घिर चुके हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार अब मंदिरों पर नजर गड़ाए हुए हैं। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी योजनाओं को चलाने के लिए राज्य के बड़े मंदिरों को पत्र लिखकर उनसे पैसे माँगे हैं। ये पैसे सरकार ने अपनी दो योजनाओं को देने के लिए आग्रह किया है। भाजपा सरकार ने इसका विरोध किया है।

कॉन्ग्रेस सरकार की भाषा एवं संस्कृति विभाग ने यह पत्र 29 जनवरी 2025 को मंदिर ट्रस्ट को पत्र लिखा था। इसमें मंदिर समितियों से जरूरतमंद बच्चों की मदद करने का आग्रह किया गया है। सरकार की अपील पर जिलाधिकारियों ने मंदिर ट्रस्टों को पत्र जारी किया। पत्र में लिखा गया कि ‘मुख्यमंत्री सुखाश्रय’ और ‘सुख शिक्षा योजना’ की मदद सरकार के अधीन आने वाले मंदिरों के ट्रस्ट भी करेंगे।

हिमाचल प्रदेश में 36 बड़े हिंदू मंदिरों की देखरेख जिला प्रशासन करता है। इन मंदिरों से करोड़ों की आमदनी होती है। हालाँकि, यह अपील थी और इन योजनाओं में मदद करना या नहीं करना मंदिर समितियों पर छोड़ दिया गया। दरअसल, हिमाचल प्रदेश में सरकार बनते ही सुक्खू सरकार ने ‘मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना’ और मुख्यमंत्री सुखाश्रय योजना’ शुरू की है।

‘मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना’ में विधवा, तलाकशुदा, बेसहारा महिलाओं और दिव्यांग माता-पिता के बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण के लिए वित्तीय सहायता दे रही है। इसके लिए पात्रता 18 वर्ष से कम आयु है। इसके लिए 1,000 रुपए मासिक दी जा रही है। वहीं, मुख्यमंत्री सुखाश्रय योजना में सरकार ने 6,000 बच्चों को गोद लिया और उन्हें ‘चिल्ड्रन ऑफ स्टेट’ का दर्जा दिया है।

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार सनातन और हिंदू का विरोध करती है। दूसरी तरफ मंदिरों से पैसा लेकर अपनी योजना चलाना चाह रही है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि मंदिरों से पैसा लेकर सरकार को जल्दी भेजा जाए। उन्होंने लोगों से भी इसका विरोध करने की अपील की है।

बता दें कि हिमाचल प्रदेश में 36 मंदिर सरकार के अंतर्गत आते हैं। इनमें सबसे धनवान मंदिर ऊना जिले का माँ चिंतापूर्णी मंदिर है। इस मंदिर के खजाने में एक अरब रुपए की बैंक एफडी और 1,098 किलोग्राम से अधिक सोना एवं 72,000 किलोग्राम चाँदी है। बिलासपुर में स्थित शक्तिपीठ नैनादेवी मंदिर के पास 11 करोड़ रुपए नकद और 58 करोड़ रुपए से अधिक की बैंक एफडी है।

इसके अलावा नैनादेवी मंदिर शक्तिपीठ में 1,080 किलोग्राम सोना और 72,000 किलोग्राम से अधिक चाँदी है। इसके अलावा, कई अन्य शक्तिपीठों में भी अरबों रुपए की संपत्ति है। इसके अलावा, अन्य शक्तिपीठों में भी अरबों रुपए की संपत्ति और हजारों किलोग्राम सोना-चाँदी है।

हजारीबाग हिंसा: जहाँ महाशिवरात्रि पर हिंदुओं के 1 दिन के लाउडस्पीकर पर पथराव, वहीं साल भर से बना डाला है सरकारी स्कूल को मस्जिद-मदरसा

झारखंड के हजारीबाग में महाशिवरात्रि के दिन पताका और लाउडस्पीकर लगाने पर कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा मदरसे से पथराव और आगजनी की गई थी। इस मामले में इचाक थाना ने 24 हिंदू और 21 मुस्लिम के खिलाफ नामजद और 200 अज्ञात पर FIR दर्ज की है। हिंसा के पीछे पुरानी वजह बताई जा रही है, जो गुंबद बनाने को लेकर है। वहीं, विधायक इरफान अंसारी ने कहा कि मुस्लिम किसी से कमजोर नहीं है।

हजारीबाग पुलिस ने यह प्राथमिकी दारोगा मंगल उरांव के बयान पर दर्ज की है। इसमें षडयंत्र के तहत हथियार से लैस होकर पुलिस के कार्य में बाधा पहुँचाने, धार्मिक उन्माद फैलाने, संपत्ति को जलाने एवं क्षति पहुंचाने तथा विधि व्यवस्था की समस्या उत्पन्न करने सहित कई आरोप लगाए गए हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि पीड़ित हिंदुओं को ही इस प्राथमिकी में सबसे अधिक 24 आरोपित बनाया गया है।

प्राथमिकी दर्ज करने के बाद पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में 25 वर्षीय शिवकुमार महतो उर्फ बुला, 23 वर्षीय अजीत महतो और अशरफ मियाँ शामिल हैं। किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील की है। इसके साथ ही इंटरनेट और ह्वाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया साइटों पर निगरानी बढ़ा दी गई है।

घटना के बाद से ही इचाक थाना क्षेत्र के डुमरौन गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ है। गाँव में युवक और वृद्ध दिखाई नहीं दे रहे हैं। वहीं, महिलाओं ने पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाया है। महिलाओं का कहना है कि यह घटना एक स्कूल पर बनाए गए मीनार के कारण शिवरात्रि के दिन हिंदुओं पर हमला किया गया। महिलाओं का कहना है कि मीनार को लेकर भी पुलिस ने कार्रवाई नहीं की थी।

क्या है स्कूल पर मीनार बनाने का मामला?

लोगों का कहना है कि इस हिंसा की असली वजह मीनार ही है। अगर इस पर पहले ही कार्रवाई की जाती है तो यह हिंसा नहीं होती। दरअसल, डुमरौन में एक सरकारी स्कूल है। इस स्कूल में सिर्फ दो कमरे हैं। एक कमरा बड़े हॉल की तरह है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में इस स्कूल के मेन गेट पर मुस्लिमों ने रातों-रात मीनार बना दी। इस मीनार की ऊँचाई लगभग 35 फीट है।

इसके बाद 1976 में स्थापित इस स्कूल को मुस्लिम मस्जिद और मदरसे के रूप में इस्तेमाल करने लगे। स्कूल में एक बड़ा ग्राउंड भी है। लोगों का कहना है कि मुस्लिम यहाँ मदरसा संचालित करने लगे हैं। स्कूल के प्रभारी हेडमास्टर ने इस संबंध में 25 जनवरी को विभाग और संबंधित पदाधिकारी को लिखित शिकायत दी थी। गाँव के लगभग 128 लोगों ने इस मामले में प्रखंड से लेकर जिला तक शिकायत की थी।

शिकायत मिलने के बाद प्रशिक्षु IAS अधिकारी शताब्दी मजूमदार और तत्कालीन सीओ रामजी दास ने जाँच की थी। इस दौरान अधिकारियों ने गाँव के लोगों से बातचीत की थी। इसके बाद इसकी जाँच रिपोर्ट जिलाधिकारी भेजी गई थी। इसके बाद आज तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई। इस पर कोई भी अधिकारी बात करने को तैयार नहीं है। इस स्कूल में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लगभग 100 बच्चे पढ़ते हैं।

मुस्लिम कमजोर नहीं हैं: मंत्री इरफान अंसारी

झारखंड सरकार में मंत्री इरफान अंसारी ने इस हिंसा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुओं को ही दोषी ठहरा दिया। RSS और भाजपा के बहाने उन्होंने कहा कि हजारीबाग के आसपास के एरिया में RSS मानसिकता को लोग, असामाजिक तत्व, कट्टरवादी सोच के लोग, कट्टर विचारधारा के लोग युवाओं में नफरत का बीज बो रहे हैं। ये उसी सोच का साइड इफेक्ट है। इसका फायदा भाजपा को होगा।

इरफान अंसारी ने कहा, “वहाँ (डुमरौन गाँव के हिंदुस्तान चौक) पर जबरन झंड़ा लगाने की क्या जरूरत थी? किसी के गाँव में जाकर जबरन माइक लगाना चाहते थे। ये कौन-सा तरीका है? कहिएगा कि मस्जिद में लगा देंगे माइक। ऊपर से केस भी इन्हीं लोगों (मुस्लिम समुदाय) पर ही कीजिएगा। ये कौन सा तरीका है? वहाँ के मुस्लिमों को इन लोगों ने (हिंदुओं ने) कमजोर समझ लिया है।”

इरफान अंसारी के बयान को लेकर हजारीबाग से भाजपा सांसद मनीष जायसवाल ने कहा, “अगर इरफान अंसारी को देखना है कि कौन-सा समुदाय मजबूत है और कौन-सा कमजोर है तो सड़कों पर उतर कर देख लें। जनता बता देगी कि कौन मजबूत है और कौन कमजोर। झंडा और बाजा के ऊपर विवाद था।” भाजपा ने कहा कि झारखंड मुस्लिम तुष्टिकरण का प्रयोगशाला बन गया है।

हजारीबाग हिंसा और इरफान अंसारी का मामला झारखंड विधानसभा में भी उठा। भाजपा विधायक अमित यादव ने कहा कि मंत्री इरफान अंसारी ने हिंदुओं को लेकर आपत्तिजनक बात कही है। इसलिए अंसारी को माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि के दिन पोल पर लाउडस्पीकर लगाया जा रहा था। इस दौरान एक समुदाय के लोगों ने पथराव कर दिया और बाइक और टैम्पो में आग लगा दी।

वहीं, केंद्रीय रक्षा राज्यमंत्री एवं राँची से सांसद संजय सेठ ने हिंसा के लिए बांग्लादेशी घुसपैठी मुस्लिमों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि होली हो या सरस्वती पूजा, रामनवमी हो या महाशिवरात्रि… ऐसी घटनाएँ झारखंड में ही क्यों होती हैं? उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए इसलिए हो रहा है, क्योंकि बांग्लादेशी घुसपैठिए यहाँ की जनसांख्यिकी बदल रहे हैं और सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट कर रहे हैं।

प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अजय साह ने कहा कि झारखंड में जेएमएम और कॉन्ग्रेस की नीति के कारण झारखंड में शुक्रवार को स्कूलों को जबरन बंद कराया जा रहा है। उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने, स्लीपर सेल को राजनीतिक संरक्षण देने, जनजातीय लड़कियों के साथ लव जिहाद करने वालों को संरक्षण देने, आतंकी संगठनों के विस्तार और धर्मांतरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

क्या हुआ था महाशिवरात्रि के दिन?

हजारीबाग के ईचाक थाना क्षेत्र के डुमरौन गाँव स्थित पीपरटोला में हिंदुस्तान चौक पर हिंदू समुदाय महाशिवरात्रि के दिन 26 फरवरी को खंभों पर पताका और लाउडस्पीकर बाँध रहे थे। इसको लेकर मुस्लिमों ने विरोध किया। इसी बीच किसी ने इसकी जानकारी पुलिस को दे दी। जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों पक्षों को समझाकर शांत करा दिया। ये तय हुआ कि शिवरात्रि के बाद लाउडस्पीकर खोल दिया जाएगा।

इसी बीच पास के मदरसे वाले स्कूल और आसपास के घरों से हिंदुओं पर पथराव कर दिया। इस पथराव में पुलिस कर्मी बाल-बाल बच गए। हालाँकि, 6 लोग बुरी तरह घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बचाव में हिंदू पक्ष ने भी पथराव शुरू कर दिया। इस दौरान उपद्रवियों ने एक कार, 6 बाइक, 1 स्कूटी और 1 साइकिल को आग लगा दी। एक बाइक को कुँए में भी डाल दिया।

इस घटना से कुछ दिन पहले सड़क पर लगे खंभे पर हिंदू समुदाय के कुछ लोगों ने भगवा पताका फहरा दिया था। इसको लेकर मुस्लिम पक्ष ने हंगामा मचा दिया था। यह मामला भी थाने पहुँच गया था। ऐसे में जब पूरे सरकारी स्कूल को मस्जिद और मदरसे में बदल दिया गया हो और सिर्फ खंभे पर लाउडस्पीकर एवं पताका फहराने पर हंगामा समझ से परे हैं। सरकारी तुष्टिकरण ने भी आग में घी डालने का काम किया।

कुरान जलाने की घटना पर आया गुस्सा, बन गए IS के आतंकी: जर्मन कोर्ट ने 2 अफगानियों को सुनाई सजा, स्वीडन की संसद पर हमले करने की रच रहे थे साजिश

जर्मन कोर्ट ने अफगान के दो इस्लामी स्टेट से जुड़े आतंकियों को स्वीडिश संसद पर हमले की योजना बनाने और पुलिसकर्मियों की हत्या की साजिश रचने के आरोप में कई वर्षों की जेल की सजा सुनाई है। बताया जा रहा है कि इन्होंने ये कुरान जलाए जाने की घटना के विरोध में किया था।

जेन हायर रीजनल कोर्ट ने इन दोनों को आतंकवादी संगठन इस्लामी स्टेट का सदस्य होने और हत्या की साजिश रचने के आरोप में दोषी पाया। कोर्ट ने 30 वर्षीय एक आरोपित को 5 साल और छह महीने तथा 24 वर्षीय दूसरे आरोपित को 4 साल और 2 महीने की सजा सुनाई

सजा के खिलाफ आरोपित अभी अपील कर सकते हैं। दोनों आरोपितों में से एक का नाम इब्राहीम एमजी है और दूसरे का रामिन एन हैं। ये दोनों पूर्वी जर्मनी के थुरिंगिया राज्य के गेरा में रहते थे और आपस में एक दूसरे को जानते थे। इनका संबंध इस्लामिक स्टेट समूह से था।

बताया जा रहा है कि ये दोनों आतंकी ऑनलाइन प्रचार के माध्यम से कट्टरपंथी बनाए गए थे। पुलिस ने पिछले साल इन दोनों को मार्च में गिरफ्तार किया गया था। उस समय ये लोग चेक गणराज्य से लौट रहे थे। जहाँ जाकर इन्होंने हमले के लिए हथियार प्राप्त करने का प्रयास किया था।

कोर्ट के मुताबिक, दोनों अफगानियों को कुछ समय से निगरानी में रखा गया था। जर्मन अधिकारियों ने बताया कि ये दोनों व्यक्ति इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रांत (ISIS-K) से जुड़े हुए थे। इन्हें यूरोप में हमले करने का आदेश प्राप्त किया था। उनके द्वारा किए गए प्रयासों में पुलिस और अन्य लोगों को मारने की योजना शामिल थी।