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टोल अच्छी सड़क के लिए लिया जाता है, खराब के लिए वसूलना सही नहीं: जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने NH-44 का हाल देख 80% कम किया चार्ज, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कर्मचारियों पर भी चेताया

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने कहा है कि सड़कों की हालत खराब होने के बावजूद टोल टैक्स वसूलना अनुचित है। इसके साथ ही अदालत ने पंजाब (पठानकोट) से जम्मू (उधमपुर) तक जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग 44 (NH-44) पर पड़ने वाले दो टोल प्लाजा पर टोल टैक्स में 80% की कटौती करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि टोल का संग्रह उपयोगकर्ताओं को अच्छी लाभ देने के लिए किया जाता है।

मुख्य न्यायाधीश ताशी राबस्तान और न्यायमूर्ति एमए चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि यदि निर्माण गतिविधियों के कारण राजमार्ग खराब स्थिति में है तो भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) या रियायतग्राही यात्रियों से टोल टैक्स नहीं वसूल सकते। अदालत ने कहा कि टोल उपयोगकर्ताओं के लिए सुचारू, सुरक्षित और अच्छी तरह से बनाए गए राजमार्गों के बदले में मुआवजे का एक रूप होना चाहिए।

हाई कोर्ट ने यह बात एक जनहित याचिका की सुनवाई करने के दौरान कही। याचिका में दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे परियोजना के तहत निर्माणाधीन पठानकोट से उधमपुर तक राजमार्ग पर स्थित लखनपुर, ठंडी खुई और बन्न टोल प्लाजा पर टोल टैक्स में छूट की माँग की गई थी। यह याचिका सुगंधा साहनी ने दायर की थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि एनएच-44 खंड का 60% से 70% हिस्सा दिसंबर 2021 से निर्माणाधीन है। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दरों का निर्धारण एवं संग्रह) नियम 2008 के विपरीत टोल वसूला जा रहा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस पर यात्रा करने में तीन से चार घंटे से अधिक का समय लगता है और डायवर्जन एवं खराब सड़क के कारण ईंधन और वाहन के रखरखाव पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने स्वयं स्वीकार किया है कि एनएच-44 पर निर्माण कार्य चल रहा है और यातायात की आवाजाही के लिए सर्विस रोड/डायवर्सन प्रदान किए गए हैं। इसका अर्थ है कि अधिकांश स्थानों पर चार लेन वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को घटाकर सिंगल लेन कर दिया गया है। वहाँ गंभीर मोड़, सड़क में गड्ढे हैं। इससे यात्रियों के सामने बड़ी समस्या आती हैं।

कोर्ट ने कहा कि यात्रियों से अनुचित तरीके से शुल्क लिया जा रहा है, क्योंकि उन्हें गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढाँचा नहीं मिल रहा है, जिसके लिए वे भुगतान कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार या एनएचएआई से यह अपेक्षा की जाती है कि वे दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे के पूरी तरह चालू होने तक टोल संग्रह को निलंबित कर दें।

अदालत ने यह भी कहा कि टोल संग्रह को निलंबित करने के बजाय अधिकारियों ने लखनपुर टोल प्लाजा और बन्न टोल प्लाजा पर उसी दिन टोल शुल्क बढ़ा दिया, जिस दिन ठंडी खुई टोल प्लाजा बंद हुआ था। कोर्ट ने कहा कि इसे देखकर ऐसा लगता है कि जनता को परेशान किया जा रहा है। एक तो खराब सड़क और ऊपर से भारी वसूल टैक्स वसूला जा रहा है।

न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर दो टोल प्लाजा के बीच की दूरी और ठेकेदारों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को वहाँ तैनात करने का संज्ञान लिया। अदालत ने निर्देश दिया जाता है कि टोल प्लाजा पर किसी भी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त न किया जाए, जिसका आपराधिक इतिहास हो। संबंधित पुलिस एजेंसी द्वारा कर्मचारियों का सत्यापन करने के बाद ही टोल प्लाजा पर तैनात किया चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि इसमें किसी तरह की कोताही होने पर संबंधित एसएचओ/इंचार्ज व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। इसके साथ ही कोर्ट ने टोल टैक्स घटाने के भी निर्देश दिया।कोर्ट ने राजमार्ग के सुचारु रूप से चालू हो जाने तक 26 जनवरी से पहले निर्धारित टोल शुल्क का केवल 20% वसूलने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही यह भी निर्देश दिया कि 60 किलोमीटर से पहले कोई टोल नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा है तो उसे हटाया जाए। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में ऐसे टोल प्लाजा की संख्या में वृद्धि नहीं होनी चाहिए, जिसका एकमात्र उद्देश्य आम जनता से पैसा कमाना हो।

‘गरीब दलितों की बेटी को देवदासी बना ब्राह्मण यूज करता था’: हीरो-हिरोइन के प्रेम विवाह के जिस Video पर हो रहा प्रोपेगेंडा, जानिए उसका सच

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि ये प्राचीन ‘देवदासी’ प्रथा को दिखाता है। वीडियो में एक जोड़े की शादी दिख रही है और इसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे ये एक दलित महिला की ब्राह्मण से जबरदस्ती शादी हो।

वीडियो में एक आवाज बताती है कि देवदासी सिस्टम में छोटी लड़कियों की शादी मंदिरों में भगवान से कर दी जाती थी, जिसका मतलब था ‘भगवान की सेविका’। ये भी कहा गया कि मंदिरों के पुजारी इन लड़कियों का शोषण करते थे, जिसमें यौन शोषण भी शामिल था और ये एक तरह की वैध वेश्यावृत्ति बन गई थी।

वॉयसओवर में ये भी दावा है कि कई संगठनों की कोशिश से ये प्रथा बंद हुई, लेकिन कर्नाटक के कुछ इलाकों में आज भी चल रही है। हालाँकि वीडियो में सीधे नहीं कहा गया, पर दावा किया गया कि ये एक देवदासी शादी है।

एक्स यूजर सीमा बुद्ध ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “1950 तक ब्राह्मण गरीब दलितों की बेटियों को देवदासी बनाकर इस्तेमाल करते थे। लेकिन तब हिंदू खतरे में क्यों नहीं थे?”

कई अन्य एक्स यूजर्स ने भी ऐसी ही लाइनों के साथ ये वीडियो पोस्ट किया।

हालाँकि सच ये है कि ये वीडियो देवदासी शादी का नहीं है। ये मलयालम टीवी एक्टर्स क्रिस वेणुगोपाल और दिव्या श्रीधर की शादी का है, जो अक्टूबर 2024 में हुई थी। दोनों टीवी सीरियल ‘पथरमट्टू’ में साथ काम करते हुए मिले और शादी की। क्रिस एक मलयालम एक्टर, वॉयस आर्टिस्ट और लेखक हैं, जबकि दिव्या मशहूर टीवी एक्ट्रेस हैं। क्रिस की लंबी सफेद दाढ़ी की वजह से लोग उन्हें पुजारी समझ बैठे, लेकिन वो ब्राह्मण पुजारी नहीं हैं।

दिलचस्प बात ये है कि शादी के वायरल होने के बाद इस जोड़े को उम्र के फर्क के लिए ट्रोल किया गया था। लोग कह रहे थे कि क्रिस 60 साल के हैं और दिव्या 40 की, यानी 20 साल का अंतर। लेकिन दिव्या ने साफ किया कि क्रिस 49 और वो 40 की हैं, यानी सिर्फ 9 साल का अंतर है। ये दिव्या की दूसरी शादी थी और उनकी पहली शादी से दो बच्चे भी हैं। ये वीडियो गलत दावों के साथ फैलाया जा रहा है, जो सच से कोसों दूर है।

हर श्रद्धालु बस एक ही धुन में था- संगम में स्नान, कुछ कमी रह गई हो तो क्षमा कीजिएगा: महाकुंभ के समापन पर PM मोदी ने बहाई शब्दों की गंगा, बताया एकता का महायज्ञ

महाकुंभ संपन्न हुआ…एकता का महायज्ञ संपन्न हुआ। जब एक राष्ट्र की चेतना जागृत होती है, जब वो सैकड़ों साल की गुलामी की मानसिकता के सारे बंधनों को तोड़कर नव चैतन्य के साथ हवा में सांस लेने लगता है, तो ऐसा ही दृश्य उपस्थित होता है, जैसा हमने 13 जनवरी के बाद से प्रयागराज में एकता के महाकुंभ में देखा।

22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में मैंने देवभक्ति से देशभक्ति की बात कही थी। प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान सभी देवी-देवता जुटे, संत-महात्मा जुटे, बाल-वृद्ध जुटे, महिलाएँ-युवा जुटे, और हमने देश की जागृत चेतना का साक्षात्कार किया। ये महाकुंभ एकता का महाकुंभ था, जहाँ 140 करोड़ देशवासियों की आस्था एक साथ एक समय में इस एक पर्व से आकर जुड़ गई थी।

तीर्थराज प्रयाग के इसी क्षेत्र में एकता, समरसता और प्रेम का पवित्र क्षेत्र श्रृंगवेरपुर भी है, जहाँ प्रभु श्रीराम और निषादराज का मिलन हुआ था। उनके मिलन का वो प्रसंग भी हमारे इतिहास में भक्ति और सद्भाव के संगम की तरह ही है। प्रयागराज का ये तीर्थ आज भी हमें एकता और समरसता की वो प्रेरणा देता है।

बीते 45 दिन, प्रतिदिन, मैंने देखा, कैसे देश के कोने-कोने से लाखों-लाख लोग संगम तट की ओर बढ़े जा रहे हैं। संगम पर स्नान की भावनाओं का ज्वार, लगातार बढ़ता ही रहा। हर श्रद्धालु बस एक ही धुन में था- संगम में स्नान। माँ गंगा, यमुना, सरस्वती की त्रिवेणी हर श्रद्धालु को उमंग, ऊर्जा और विश्वास के भाव से भर रही थी।

प्रयागराज में हुआ महाकुंभ का ये आयोजन, आधुनिक युग के मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स के लिए, प्लानिंग और पॉलिसी एक्सपर्ट्स के लिए, नए सिरे से अध्ययन का विषय बना है। आज पूरे विश्व में इस तरह के विराट आयोजन की कोई दूसरी तुलना नहीं है, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण भी नहीं है।

पूरी दुनिया हैरान है कि कैसे एक नदी तट पर, त्रिवेणी संगम पर इतनी बड़ी संख्या में करोड़ों की संख्या में लोग जुटे। इन करोड़ों लोगों को ना औपचारिक निमंत्रण था, ना ही किस समय पहुँचना है, उसकी कोई पूर्व सूचना थी। बस, लोग महाकुंभ चल पड़े…और पवित्र संगम में डुबकी लगाकर धन्य हो गए।

मैं वो तस्वीरें भूल नहीं सकता…स्नान के बाद असीम आनंद और संतोष से भरे वो चेहरे नहीं भूल सकता। महिलाएँ हों, बुजुर्ग हों, हमारे दिव्यांग जन हों, जिससे जो बन पड़ा, वो साधन करके संगम तक पहुँचा।

और, मेरे लिए ये देखना बहुत ही सुखद रहा कि बहुत बड़ी संख्या में भारत की आज की युवा पीढ़ी प्रयागराज पहुँची। भारत के युवाओं का इस तरह महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए आगे आना, एक बहुत बड़ा संदेश है। इससे ये विश्वास दृढ़ होता है कि भारत की युवा पीढ़ी हमारे संस्कार और संस्कृति की वाहक है और इसे आगे ले जाने का दायित्व समझती है और इसे लेकर संकल्पित भी है, समर्पित भी है।

इस महाकुंभ में प्रयागराज पहुँचने वालों की संख्या ने निश्चित तौर पर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इस महाकुंभ में हमने ये भी देखा कि जो प्रयाग नहीं पहुँच पाए, वो भी इस आयोजन से भाव-विभोर होकर जुड़े। कुंभ से लौटते हुए जो लोग त्रिवेणी तीर्थ अपने साथ लेकर गए, उस जल की कुछ बूंदों ने भी करोड़ों भक्तों को कुंभ स्नान जैसा ही पुण्य दिया। कितने ही लोगों का कुंभ से वापसी के बाद गाँव-गाँव में जो सत्कार हुआ, जिस तरह पूरे समाज ने उनके प्रति श्रद्धा से सिर झुकाया, वो अविस्मरणीय है।

ये कुछ ऐसा हुआ है, जो बीते कुछ दशकों में पहले कभी नहीं हुआ। ये कुछ ऐसा हुआ है, जो आने वाली कई-कई शताब्दियों की एक नींव रख गया है।

प्रयागराज में जितनी कल्पना की गई थी, उससे कहीं अधिक संख्या में श्रद्धालु वहाँ पहुँचे। इसकी एक वजह ये भी थी कि प्रशासन ने भी पुराने कुंभ के अनुभवों को देखते हुए ही अंदाजा लगाया था। लेकिन अमेरिका की आबादी के करीब दोगुने लोगों ने एकता के महाकुंभ में हिस्सा लिया, डुबकी लगाई।

आध्यात्मिक क्षेत्र में रिसर्च करने वाले लोग करोड़ों भारतवासियों के इस उत्साह पर अध्ययन करेंगे तो पाएँगे कि अपनी विरासत पर गौरव करने वाला भारत अब एक नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है। मैं मानता हूँ, ये युग परिवर्तन की वो आहट है, जो भारत का नया भविष्य लिखने जा रही है।

साथियों,

महाकुंभ की इस परंपरा से, हजारों वर्षों से भारत की राष्ट्रीय चेतना को बल मिलता रहा है। हर पूर्णकुंभ में समाज की उस समय की परिस्थितियों पर ऋषियों-मुनियों, विद्वत् जनों द्वारा 45 दिनों तक मंथन होता था। इस मंथन में देश को, समाज को नए दिशा-निर्देश मिलते थे।

इसके बाद हर 6 वर्ष में अर्धकुंभ में परिस्थितियों और दिशा-निर्देशों की समीक्षा होती थी। 12 पूर्णकुंभ होते-होते, यानि 144 साल के अंतराल पर जो दिशा-निर्देश, जो परंपराएँ पुरानी पड़ चुकी होती थीं, उन्हें त्याग दिया जाता था, आधुनिकता को स्वीकार किया जाता था और युगानुकूल परिवर्तन करके नए सिरे से नई परंपराओं को गढ़ा जाता था।

144 वर्षों के बाद होने वाले महाकुंभ में ऋषियों-मुनियों द्वारा, उस समय-काल और परिस्थितियों को देखते हुए नए संदेश भी दिए जाते थे। अब इस बार 144 वर्षों के बाद पड़े इस तरह के पूर्ण महाकुंभ ने भी हमें भारत की विकासयात्रा के नए अध्याय का संदेश दिया है। ये संदेश है- विकसित भारत का।

जिस तरह एकता के महाकुंभ में हर श्रद्धालु, चाहे वो गरीब हों या संपन्न हों, बाल हो या वृद्ध हो, देश से आया हो या विदेश से आया हो, गाँव का हो या शहर का हो, पूर्व से हो या पश्चिम से हो, उत्तर से हो दक्षिण से हो, किसी भी जाति का हो, किसी भी विचारधारा का हो, सब एक महायज्ञ के लिए एकता के महाकुंभ में एक हो गए। एक भारत-श्रेष्ठ भारत का ये चिर स्मरणीय दृश्य, करोड़ों देशवासियों में आत्मविश्वास के साक्षात्कार का महापर्व बन गया। अब इसी तरह हमें एक होकर विकसित भारत के महायज्ञ के लिए जुट जाना है।

साथियों,

आज मुझे वो प्रसंग भी याद आ रहा है जब बालक रूप में श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को अपने मुख में ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे। वैसे ही इस महाकुंभ में भारतवासियों ने और विश्व ने भारत के सामर्थ्य के विराट स्वरूप के दर्शन किए हैं। हमें अब इसी आत्मविश्वास से एक निष्ठ होकर, विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए आगे बढ़ना है।

भारत की ये एक ऐसी शक्ति है, जिसके बारे में भक्ति आंदोलन में हमारे संतों ने राष्ट्र के हर कोने में अलख जगाई थी। विवेकानंद हों या श्री ऑरोबिंदो हों, हर किसी ने हमें इसके बारे में जागरूक किया था। इसकी अनुभूति गाँधी जी ने भी आजादी के आंदोलन के समय की थी। आजादी के बाद भारत की इस शक्ति के विराट स्वरूप को यदि हमने जाना होता, और इस शक्ति को सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की ओर मोड़ा होता, तो ये गुलामी के प्रभावों से बाहर निकलते भारत की बहुत बड़ी शक्ति बन जाती। लेकिन हम तब ये नहीं कर पाए। अब मुझे संतोष है, खुशी है कि जनता जनार्दन की यही शक्ति, विकसित भारत के लिए एकजुट हो रही है।

वेद से विवेकानंद तक और उपनिषद से उपग्रह तक, भारत की महान परंपराओं ने इस राष्ट्र को गढ़ा है। मेरी कामना है, एक नागरिक के नाते, अनन्य भक्ति भाव से, अपने पूर्वजों का, हमारे ऋषियों-मुनियों का पुण्य स्मरण करते हुए, एकता के महाकुंभ से हम नई प्रेरणा लेते हुए, नए संकल्पों को साथ लेकर चलें। हम एकता के महामंत्र को जीवन मंत्र बनाएँ, देश सेवा में ही देव सेवा, जीव सेवा में ही शिव सेवा के भाव से स्वयं को समर्पित करें।

साथियों,

जब मैं काशी चुनाव के लिए गया था, तो मेरे अंतरमन के भाव शब्दों में प्रकट हुए थे, और मैंने कहा था- मां गंगा ने मुझे बुलाया है। इसमें एक दायित्व बोध भी था, हमारी माँ स्वरूपा नदियों की पवित्रता को लेकर, स्वच्छता को लेकर। प्रयागराज में भी गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर मेरा ये संकल्प और दृढ़ हुआ है। गंगा जी, यमुना जी, हमारी नदियों की स्वच्छता हमारी जीवन यात्रा से जुड़ी है। हमारी जिम्मेदारी बनती है कि नदी चाहे छोटी हो या बड़ी, हर नदी को जीवनदायिनी माँ का प्रतिरूप मानते हुए हम अपने यहाँ सुविधा के अनुसार, नदी उत्सव जरूर मनाएँ। ये एकता का महाकुंभ हमें इस बात की प्रेरणा देकर गया है कि हम अपनी नदियों को निरंतर स्वच्छ रखें, इस अभियान को निरंतर मजबूत करते रहें।

मैं जानता हूँ, इतना विशाल आयोजन आसान नहीं था। मैं प्रार्थना करता हूँ माँ गंगा से…माँ यमुना से…माँ सरस्वती से…हे माँ हमारी आराधना में कुछ कमी रह गई हो तो क्षमा करिएगा…। जनता जनार्दन, जो मेरे लिए ईश्वर का ही स्वरूप है, श्रद्धालुओं की सेवा में भी अगर हमसे कुछ कमी रह गई हो, तो मैं जनता जनार्दन का भी क्षमाप्रार्थी हूँ।

साथियों,

श्रद्धा से भरे जो करोड़ों लोग प्रयाग पहुँचकर इस एकता के महाकुंभ का हिस्सा बने, उनकी सेवा का दायित्व भी श्रद्धा के सामर्थ्य से ही पूरा हुआ है। यूपी का सांसद होने के नाते मैं गर्व से कह सकता हूँ कि योगी जी के नेतृत्व में शासन, प्रशासन और जनता ने मिलकर, इस एकता के महाकुंभ को सफल बनाया। केंद्र हो या राज्य हो, यहां ना कोई शासक था, ना कोई प्रशासक था, हर कोई श्रद्धा भाव से भरा सेवक था। हमारे सफाईकर्मी, हमारे पुलिसकर्मी, नाविक साथी, वाहन चालक, भोजन बनाने वाले, सभी ने पूरी श्रद्धा और सेवा भाव से निरंतर काम करके इस महाकुंभ को सफल बनाया। विशेषकर, प्रयागराज के निवासियों ने इन 45 दिनों में तमाम परेशानियों को उठाकर भी जिस तरह श्रद्धालुओं की सेवा की है, वह अतुलनीय है। मैं प्रयागराज के सभी निवासियों का, यूपी की जनता का आभार व्यक्त करता हूँ, अभिनंदन करता हूँ।

साथियों,

महाकुंभ के दृश्यों को देखकर, बहुत प्रारंभ से ही मेरे मन में जो भाव जगे, जो पिछले 45 दिनों में और अधिक पुष्ट हुए हैं, राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य को लेकर मेरी आस्था, अनेक गुना मजबूत हुई है।

140 करोड़ देशवासियों ने जिस तरह प्रयागराज में एकता के महाकुंभ को आज के विश्व की एक महान पहचान बना दिया, वो अद्भुत है।

देशवासियों के इस परिश्रम से, उनके प्रयास से, उनके संकल्प से अभीभूत मैं जल्द ही द्वादश ज्योतिर्लिंग में से प्रथम ज्योतिर्लिंग, श्री सोमनाथ के दर्शन करने जाऊँगा और श्रद्धा रूपी संकल्प पुष्प को समर्पित करते हुए हर भारतीय के लिए प्रार्थना करूँगा।

महाकुंभ का स्थूल स्वरूप महाशिवरात्रि को पूर्णता प्राप्त कर गया है। लेकिन मुझे विश्वास है, मां गंगा की अविरल धारा की तरह, महाकुंभ की आध्यात्मिक चेतना की धारा और एकता की धारा निरंतर बहती रहेगी।

(प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह विशेष लेख अपने ब्लाॅग पर लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

हिंदी से नफरत, उर्दू से प्यार: DMK की भाषा सियासत पर BJP ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री MK स्टालिन से माँगा जवाब, दोहरा चरित्र किया बेनकाब

तमिलनाडु में भाषा को लेकर राजनीति हमेशा से गर्म मुद्दा रही है। एक तरफ डीएमके हिंदी के खिलाफ नारे लगाती है, तो दूसरी तरफ उर्दू को बढ़ावा देने की बात करती है। उसकी ये दोहरी नीति दशकों से चली आ रही है। वो उर्दू को लेकर स्वीकार्यता दिखाती है, लेकिन हिंदी का नाम लेते ही भौंहे टेढ़ी करने लग जाती है। इस पूरे मुद्दे पर अब बीजेपी फ्रंट पर आ रही है और डीएमके को घेरने की कोशिश कर रही है।

उर्दू, हिंदू को लेकर डीएमके के दोहरे चरित्र को लेकर बीजेपी नेता के अमित मालवीय ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर सवाल उठाए। अमित मालवीय ने स्टालिन के 2015 के उस वादे को याद दिलाया, जिसमें डीएमके नेता ने कहा था कि सत्ता में आने पर स्कूलों में उर्दू को अनिवार्य करेंगे और इसके लिए कानून बनाएँगे। मालवीय ने इसे ढोंग करार देते हुए पूछा कि जब हिंदी, मलयालम, कन्नड़ जैसी भारतीय भाषाओं का विरोध हो रहा है, तो उर्दू को थोपना कहाँ तक ठीक है? उनका कहना था कि तमिलनाडु के युवाओं को मौके चाहिए, न कि भाषाई राजनीति।

डीएमके का हिंदी विरोध पुराना है। 1965 की हिंदी विरोधी आंदोलन की यादें आज भी ताजा हैं, जब द्रविड़ आंदोलन ने हिंदी को राज्य में लागू होने से रोका था। स्टालिन ने हाल ही में नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) के त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध करते हुए कहा कि तमिलनाडु फिर से भाषा युद्ध के लिए तैयार है। उनका तर्क है कि हिंदी जबरदस्ती थोपी जा रही है, जो तमिलों के सम्मान के खिलाफ है।

लेकिन सवाल यह है कि हिंदी को लेकर इतना हंगामा करने वाली डीएमके उर्दू को बढ़ावा देने में क्यों लगी है? क्या यह मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने की चाल नहीं?

साल 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि ने भी उर्दू को बचाने के लिए कदम उठाने का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि अल्पसंख्यक भाषाओं की रक्षा होगी। तब डीएमके ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन में यह बात कही थी। आज स्टालिन उसी रास्ते पर चलते दिख रहे हैं। हिंदी को ‘बाहरी’ बताकर खारिज करने वाली पार्टी उर्दू को लेकर इतनी नरम क्यों है? यह दोहरा रवैया साफ दिखता है। एक तरफ तमिल और अंग्रेजी को पर्याप्त बताकर त्रिभाषा नीति को ठुकराया जाता है, दूसरी तरफ उर्दू को लाने की बात होती है। यह तमिलनाडु की सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई कम, राजनीतिक फायदे की रणनीति ज्यादा लगती है।

बीजेपी का आरोप है कि डीएमके भाषा के नाम पर तुष्टिकरण कर रही है। मालवीय ने पूछा कि अगर हिंदी थोपना गलत है, तो उर्दू को बढ़ावा देना सही कैसे? तमिलनाडु के छात्रों का भविष्य दाँव पर है, जो हिंदी जैसी भाषा सीखकर राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन डीएमके की राजनीति उन्हें पीछे धकेल रही है।

स्टालिन कहते हैं कि वो हिंदी के खिलाफ नहीं, बस इसे थोपे जाने के खिलाफ हैं। पर उर्दू को लेकर उनकी चुप्पी और पुराने वादे इस दावे को खोखला बनाते हैं। क्या यह सिर्फ वोट की खातिर नहीं हो रहा?

जितनी पूरे अमेरिका की आबादी, उससे दो गुना ज्यादा लोगों ने 45 दिन में ही प्रयागराज महाकुंभ में लगा ली डुबकी: समापन पर खुद CM योगी ने की संगम की सफाई, त्रिवेणी की पूजा-अर्चना

प्रयागराज महाकुंभ 2025 का आज गुरुवार (27 फरवरी 2025) को आधिकारिक रूप से समापन हो गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस दौरान पूजा-अर्चना की। दुनिया का सबसे बड़ा यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन 13 जनवरी से शुरू होकर 26 फरवरी तक 45 दिन चला। इस दौरान 50 लाख से अधिक विदेशी सहित 66.21 करोड़ श्रद्धालुओं ने गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी पर स्नान किया। यह अमेरिका की जनसंख्या से दोगुना है।

महाकुंभ के आखिरी दिन महाशिवरात्रि को 1.44 करोड़ लोगों ने स्नान किया। वहीं, एक दिन में सबसे अधिक रिकॉर्ड 7.64 करोड़ श्रद्धालुओं ने मौनी अमावस्या को स्नान किया था। गुरुवार को योगी आदित्यनाथ त्रिवेणी तट पर अपने दोनों उपमुख्यमंत्रियों- केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक एवं अन्य मंत्रियों के साथ वैदिक रीति-रिवाज से माँ गंगा, यमुना और सरस्वती का पूजा-पाठ किया। इस दौरान उन्होंने पक्षियों को दाना भी खिलाया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस भव्य एवं दिव्य महाकुंभ के सफल समापन पर देशवासियों को शुभकामनाएँ दीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा, “यूपी का सांसद होने के नाते मैं गर्व से कह सकता हूँ कि योगी जी के नेतृत्व में शासन, प्रशासन और जनता ने मिलकर इस एकता के महाकुंभ को सफल बनाया। केंद्र हो या राज्य हो, यहाँ ना कोई शासक था और ना कोई प्रशासक था, हर कोई श्रद्धा भाव से भरा सेवक था।”

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, “सनातन संस्कृति की दिव्य आभा से दीप्त इस विराट आयोजन ने सबसे ज्यादा लोगों द्वारा एक साथ नदी की सफाई करने, सबसे ज्यादा कार्यकर्ताओं द्वारा एक साथ एक जगह पर सफाई करने तथा 8 घंटे में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा हैंड प्रिंट पेंटिंग करने का कीर्तिमान ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में स्थापित कर एक नया इतिहास रचा है।”

मुख्यमंत्री ने आगे लिखा, “महाकुम्भ में जनसहभागिता और स्वच्छता एवं कला के क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक प्रयासों को रेखांकित करती यह उपलब्धियां स्वच्छता, सुरक्षा व सुव्यवस्था का दीर्घकालिक प्रतीक बनकर हम सभी को निरंतर प्रेरणा प्रदान करती रहेंगी। ‘एकता के महाकुम्भ’ को ‘रिकॉर्ड का महाकुम्भ’ बनाने वाले सभी कार्मिकों एवं महानुभावों का हार्दिक अभिनंदन!”

महाकुंभ समापन के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सफाईकर्मियों को सम्मानित किया। उन्होंने गंगा तट पर झाड़ू लगाकर और गंगा से कूड़ा-कचड़ा निकालकर साफ-सफाई भी की। इसके बाद उनके साथ सहभोज किया। उस दौरान उनके मंत्रिमंडल के साथी भी मौजूद रहे। इसके साथ ही राज्य के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह और पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार भी मौजूद रहे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज महाकुंभ से जुड़े स्वच्छता कर्मियों को 10,000 रुपए का अतिरिक्त बोनस देने की घोषणा की है। इसके साथ ही प्रदेश के स्वच्छता कर्मियों को भी बड़ा उपहार दिया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के जिन स्वच्छता कर्मियों को 8 से 11 हजार रुपए महीना मिलते थे, उन्हें अप्रैल से कम-से-कम 16,000 मिलेंगे। इसके साथ ही उन्हें आयुष्मान योजना से भी जोड़ा जाएगा।

इस आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने कड़ी मेहनत की थी। लगभग 4,000 हेक्टेयर (15,947 बीघा) में था फैला हुआ था। व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मेला क्षेत्र को 25 सेक्टर बाँटा गया था। इसके लिए अस्पताल, विश्राम गृह, शौचालय, पेयजल आदि की व्यवस्था की गई थी। लगभग 13 किलोमीटर के क्षेत्र में 10 पक्के घाट सहित कुल 42 घाट बनाए गए थे।

सुरक्षा के लिए 50,000 से अधिकार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था। मेला क्षेत्र में 56 थाने और 144 चौकियाँ बनाई गई थीं। इसके अलावा 2 साइबर थाने भी बनाए गए थे। सुरक्षा को देखते हुए कमांडो, फायर ब्रिगेड, गोताखोर, जल पुलिस, नाव आदि की भी व्यवस्था की गई थी। गंगा और यमुना नदी को पार करने के लिए 30 पांटून पुल तैयार किए गए थे।

दरगाह की डेग से चर्च की वाइन तक में दिखती है ‘सेवा’, पर नजर नहीं आता संतों-मंदिरों का परोपकार… क्योंकि हम मजहब देख नहीं करते इलाज, मदद के नाम पर नहीं करते धर्मांतरण

दरगाह की बड़ी डेग में बनने वाले ‘मीठे राइस’ और चर्च में दी जाने वाली ‘लाल वाइन’ तो सोशल मीडिया पर अक्सर लोगों का ध्यान खींचते हैं लेकिन क्या कभी आपको इन जगहों पर मंदिर में बँटने वाले भंडारों के बारे में सुनने को मिलता है? अगर हाँ, तो क्या आप इन भंडारों के महत्व को समझ पाते हैं या आपके लिए ‘भूखे का पेट’ भरने का मतलब केवल ‘फीड द हंग्री’ को समझने तक ही सीमित है? पूरी बात का मतलब क्या है, ये नीचे आपको पढ़ने पर समझ आता जाएगा।

हाल में मध्यप्रदेश के बागेश्वर धाम में 252 करोड़ रुपए की लागत से 2.37 लाख वर्ग फीट में बनने वाले कैंसर हॉस्पिटल का शिलान्यास हुआ। इसके कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए और यहाँ उन्होंने हमारे धार्मिक स्थलों को लेकर जो कहा वो सुनने के साथ समझने योग्य है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था- “साथियों, आज कल नेताओं का एक दल ऐसा है, जो धर्म का मजाक उड़ाने में और लोगों को तोड़ने में लगा है। वे हिंदुओं की आस्था से नफरत करने वाले लोग हैं। ये हमारी मान्यताओं, संस्कृति और मंदिरों पर हमला करते हैं और हमारे पर्व और परंपराओं को गाली देते हैं…हमारे मंदिर पूजा के केंद्र होने के साथ ही सामाजिक चेतना के भी केंद्र रहे हैं। हमारे ऋषियों ने आयुर्वेद और योग का विज्ञान दिया… दूसरों की सेवा करना और दूसरों के दुख दूर करना ही धर्म है।”

इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नें पंडित धीरेंद्र शास्त्री को ‘मेरा छोटा भाई’ बताते हुए कहा ता- “मेरे छोटे भाई धीरेंद्र शास्त्री लोगों को जागरूक करते रहते हैं। एकता का मंत्र भी देते हैं। अब उन्होंने एक और संकल्प लिया है- इस कैंसर हॉस्पिटल के निर्माण की जिम्मेदारी। यानी अब बागेश्वर धाम में भजन, भोजन और निरोगी जीवन तीनों का आर्शीवाद मिलेगा। इस कार्य के लिए मैं धीरेंद्र शास्त्री का अभिनंदन करता हूँ।”

हर ओर बागेश्वर धाम के अस्पताल की चर्चा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस शुभ अवसर पर पहुँचने से पूरे देश की नजर बागेश्वर धाम में खुले कैंसर अस्पताल पर गई। मीडिया में हर जगह इसकी चर्चा हुई। बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘कट्टर धार्मिक नेता’ के तौर पर पेश किया जाता है, उनकी इस पहल को हर समुदाय ने सराहा… लेकिन ऐसा नहीं है कि पंडित धीरेंद्र शास्त्री या किसी हिंदू संस्थान द्वारा समाज की भलाई के लिए सोचा गया कोई पहला कार्य है।

कई दशकों से हिंदू संस्थान लोगों के स्वास्थ, शिक्षा और उनकी बुनियादी जरूरतें पूरा करने की दिशा में काम करते आए हैं, मगर कभी उन्हें वो नाम और सम्मान नहीं मिला जितने के वो हकदार थे। खुद बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री लंबे समय से गरीब परिवार की बेटियों की शादी कराते रहे, लेकिन उनके इस कार्य की चर्चा आज जाकर हो रही है जब वहाँ राष्ट्रपति मुर्मू मौजूद हैं, जिनकी नजर में ये कार्य पुण्य का है, न कि कोई प्रोपगेंडा।

बागेश्वर धाम की तरह तमाम धार्मिक स्थल हैं और पंडित धीरेंद्र शास्त्री जैसे कई संत समाज के लोग, जो समय-समय पर संबल होने पर समाज के लिए ऐसे परोपकारी कदम उठाते आए हैं। उदाहरण तमाम हैं, लेकिन यहाँ चर्चा कुछ चंद की करते हैं…

परोपकार में जुटे हिंदू मंदिर

आपने पटना के महावीर मंदिर के बारे में सुना होगा। 1730 में बना महावीर मंदिर, न जाने कितने सालों से रोजाना 3000-4000 लोगों का पेट भरता है। मंदिर की ओर से राम-रसोई, सीता रसोई चलाई जाती है जो हर श्रद्धालु का पेट भरने के लिए 10-10 तरीके के व्यंजन बनाती है। इसके अलावा इस मंदिर से तीन अस्पतालों के मरीजों के लिए भी तीनों समय का भोजन निशुल्क जाता है।

इसी तरह गोरखनाथ मंदिर। यहाँ के महंत स्वयं यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ हैं। इस मंदिर द्वारा गोरखनाथ चिकित्सालय विभिन्न प्रकार की चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करता है, जिसमें सामान्य OPD (आउट पेशेंट डिपार्टमेंट), पैथोलॉजी, ब्लड बैंक, डायलिसिस विभाग और विभिन्न विशेषज्ञताओं जैसे हृदय रोग, चर्म रोग, बाल रोग, मानसिक रोग आदि शामिल हैं। यहाँ पर मरीजों को मात्र 30 रुपए की फीस पर इलाज किया जाता है, जो इसे आर्थिक रूप से सुलभ बनाता है।

इसके बाद मुंबई का सिद्धि विनायक मंदिर। इस मंदिर का ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियों को नहीं देखता बल्कि सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय है। सिद्धि विनायक मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित फ्री कैंसर चिकित्सालय का उद्देश्य उन मरीजों को चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करना है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यहाँ केवल मरीजों को उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होतीं बल्कि यहाँ पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम काम करती है जो नवीनतम तकनीकों और उपचार विधियों का उपयोग करती है। इनका एक डायलिसिस केंद्र भी है उन रोगियों के लिए आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है जिन्हें किडनी संबंधी समस्याओं के कारण नियमित डायलिसिस की आवश्यकता होती है। 

धार्मिक संगठन होते हुए सामाजिक कार्यों के लिए बढ़-चढ़कर योगदान देने वाली संस्थाओं में एक नाम इस्कॉन का भी है। इस्कॉन में न केवल जरूरतमंदों के लिए भोजन वितरण कार्यक्रम चलाया जाता है, बल्कि इस्कॉन द्वारा समय-समय मेडिकल कैंप, आयुर्वेदिक उपचार, स्वास्थ्य जाँच आदि भी कराई जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी ये संगठन बढ़-चढ़कर भागीदारी दिखाता है। युवाओं को नैतिकता और जीवन के उद्देश्यों के बारे में बताता है।

कोविड काल में सहायक हुए थे हिंदू मंदिर

कोविड काल में भी हिंदू मंदिरों ने आगे आ आकर जरूरतमंदों की सहायता की थी और सरकार का काम आसान करने का पूरा प्रयास किया था।  महावीर मंदिर से मुफ्त में कोविड संक्रमितों के लिए ऑक्सीजन देने का काम शुरू हुआ था। मुंबई के जैन मंदिर ने अपने मंदिर को ही कोविड सेंटर में परिवर्तित करवा दिया था। महाराष्ट्र के संत गजानन मंदिर में 500-500 बेड के आइसोलेशन सेंटर बनाए गए थे। वाराणसी के काशी मंदिर ने मुफ्त में लोगों को दवाएँ वितरित की थीं। इस्कॉन मंदिर ने गर्भवती, बुजु्र्ग और बच्चों के लिए फ्री में खाने घर तक पहुँचाने की व्यवस्था की थी। इंदौर के राधास्वामी सत्संग व्यास को कोविड के समय में दूसरा सबसे बड़ा कोविड सेंटर बनाकर ऱखा गया था।

आर्थिक सहायता की बात करें तो इसमें भी हिंदू मंदिर कभी पीछे नहीं रहे। सोमनाथ मंदिर और गुजरात के अंबाजी मंदिर ने कोविड काल से निपटने के लिए 1-1 करोड़ रुपए सीएम राहत कोष में दिए थे। सिद्धिविनायक मंदिर ने कोरोना काल के वक्त महाराष्ट्र सरकार को 10 करोड़ की मदद की थी। शिरडी साई बाबा मंदिर ने भी मुख्य राहत कोष में 51 करोड़ रुपए देने का निर्णय लिया था। इसी तरह गोरखनाथ पीठ और उससे संबंधित कुछ संस्थाओं और महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् ने ‘पीएम केयर फंड’ एवं ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ में अब तक 51,00000 रुपए का योगदान भी दिया।

इसके अलावा बाहरी देशों में स्थित हिंदू मंदिरों ने भी संकट के काल में न केवल अपने देश के लोगों की सहायता की बल्कि भारत की मदद करने के लिए भी आगे आए। थाईलैंड के बैंकॉक में हिंदू समाज मंदिर ने भारत को कोरोनावायरस की दूसरी लहर से लड़ने में मदद करने के लिए समर्थन जुटाया। जॉर्जिया के ब्लूमिंगडेल में श्री राधेश्याम मंदिर सहित अमेरिका में कई हिंदू मंदिरों ने अहमदाबाद, भारत में एसजीवीपी होलिस्टिक अस्पताल को चिकित्सा सहायता के लिए सीधे धन जुटाया। लंदन में BAPS स्वामीनारायण मंदिर ने भी भारत के लिए 8 लाख 30 हजार डॉलर की की धनराशि जुटाई।

निस्वार्थ भाव से करते हिंदू संत सेवा

दिलचस्प बात ये हैं कि हिंदू मंदिरों, संगठनों, संस्थाओं ने ये सारे काम बिना किसी गुप्त उद्देश्य के किए। उन्होंने कभी कोई प्रलोभन देकर या अपना प्रचार करके ये नहीं दिखाया कि वो जगत में कल्याण के लिए क्या-क्या कर रहे हैं। बागेश्वर धाम में बना कैंसर अस्पताल बस एक और बड़ा उदाहरण है जो हिंदू संतों के उन प्रयासों को उजागर करता है जिन्हें वामपंथी हमेशा से दबाने की कोशिश करते रहे।

उन्हें हमेशा अगर परोपकार दिखा तो ईसाई मिशनरियों के कार्य में। उन्होंने मदर टेरेसा को ‘मसीह’ बता बताकर प्रमोट किया बिना ये देखे कि जिन्होंने भोपाल त्रासदी का समर्थन किया हो, इमरजेंसी में सुख खोजा हो, जिनकी शुरू की गई संस्था में लड़कियों के शोषण के मामले दर्ज होते रहे, वो- मसीह कैसे हो सकता है।

बड़ी चालाकी से वामपंथियों ने टेरेसा को ‘मदर’ की उपाधि दे दी, लेकिन साध्वी ऋतम्भरा की छवि कट्टर हिंदू से ऊपर नहीं उठने दी। वामपंथियों ने कभी साध्वी ऋतम्भरा जैसी सनातनी महिलाओं के बारे में दुनिया को ये बताना जरूरी नहीं समझा कि वह कैसे- वात्सल्य ग्राम के जरिए अनाथ बच्चों एवं परित्यक्त महिलाओं को आवास, भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा का प्रबन्ध करवाती हैं।

वामपंथियों ने आगे बढ़ाया पादरी बिजेंद्र जैसे लोगों का नाम जो खुलेआम लोगों को लालच देकर धर्मांतरित होने के लिए आकर्षित करते हैं और छवि बिगाड़ने की कोशिश की अनिरुद्ध आचार्य महाराज जैसे लोगों की, जो गौरी गोपाल आश्रम में वृद्धों के लिए आश्रम चलाते हैं, रोजाना न जाने कितनों को भोजन कराते हैं।

आज खोजेंगे तो ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएँगे, लेकिन पहले ऐसा संभव नहीं था। पहले हिंदू धर्म की बात करने वाला और प्रचार-प्रसार करने वाला कट्टर धर्मनेता की गिनती में आता था और जाकिर नाइक जैसे लोग समाज में शांति का संदेश देने वाले माने जाते थे।

आज स्थिति बदली है तो मालूम होना चाहिए कि हिंदुओं के सारे धार्मिक संगठन बिना लोगों की जाति-धर्म-पंथ-वर्ग देखे ये परोपकार करते हैं। वह गरीब का पेट भरने के लिए उसके दरवाजे पर आने का इंतजार नहीं करते, या अपनी रसोइयाँ दिखाकर प्रचार नहीं करते। वह इलाज का लालच देकर लोगों का धर्मांतरण नहीं कराते, बेघरों को आश्रय देने के लिए उनका धर्म नहीं जाँचते, शिक्षा के नाम केवल शिक्षा देते हैं, अपना कोई मिशन पूरा नहीं करते।

संभल का ढाँचा नहीं है मस्जिद, हाई कोर्ट ने भी आदेश में कहा ‘कथित मस्जिद’: रंगाई-पुताई पर बनाई कमेटी, ASI करेगी निरीक्षण; हिंदुओं ने बताया था मंदिर के निशान मिटाने की साजिश

संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को आदेश दिया कि वो मस्जिद में जाकर देखे कि रमजान से पहले सफेदी और सजावट की कितनी जरूरत है। इसके लिए ASI की तीन लोगों की टीम बनाई गई है, जो मस्जिद का मुआयना करेगी और शुक्रवार (28 फरवरी 2025) सुबह 10 बजे तक कोर्ट में रिपोर्ट देगी।

यह फैसला जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने मस्जिद की प्रबंधन समिति की अर्जी पर सुनाया। समिति चाहती थी कि रमजान की तैयारी के लिए मस्जिद में रंगाई-पुताई और दूसरा काम हो, लेकिन पुलिस और ASI ने इसे रोक दिया था।

रमजान के मौके पर मरम्मत-सफेद की जरूरत

मस्जिद कमेटी का कहना है कि रमजान 1 मार्च से शुरू हो रहा है, इसलिए मस्जिद को तैयार करना जरूरी है। वे हर साल सफेदी, सफाई, टूटी चीजों की मरम्मत और लाइटिंग का काम करते हैं ताकि नमाजियों को परेशानी न हो। कमेटी ने कहा कि अजान और ये काम उनकी धार्मिक आजादी का हिस्सा हैं, जो संविधान के आर्टिकल 25 और 26 में मिली है। लेकिन ASP नॉर्थ संभल ने 11 फरवरी को चिट्ठी लिखकर कहा कि मस्जिद संरक्षित स्मारक है, इसलिए ASI की इजाजत चाहिए।

कमेटी को ये बात गलत लगी, क्योंकि उनका दावा है कि सालों से वे खुद ये काम करते आए हैं और पहले कोई दिक्कत नहीं हुई। कोर्ट में सुनवाई के दौरान कमेटी के वकील SFA नकवी ने कहा कि ASI को खुद ये काम करना चाहिए, लेकिन वो बेवजह रोक रहे हैं।

मस्जिद नहीं, ‘कथित’ मस्जिद

ASI के वकील मनोज कुमार सिंह ने जवाब दिया कि कमेटी उनके लोगों को मस्जिद में घुसने नहीं दे रही। दूसरी तरफ, हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने विरोध किया। उनका कहना था कि पुताई के बहाने मस्जिद में मौजूद कथित हिंदू निशान मिटाए जा सकते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि कोर्ट इसे सिर्फ मस्जिद न माने, जिसके बाद जस्टिस ने ऑर्डर में ‘कथित मस्जिद’ लिखवाया।

कोर्ट के फैसले के अहम बिंदु

  • कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रमजान में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहना चाहिए और दोनों पक्षों के हितों का ध्यान रखा जाए।
  • ASI को मस्जिद की जाँच करने को कहा गया, ताकि ये पता चले कि काम जरूरी है या नहीं।
  • ASI ने अपनी टीम के लिए सुरक्षा माँगी, लेकिन कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया और कहा कि इसकी जरूरत नहीं।
  • हरिशंकर जैन की चिंता पर कोर्ट ने भरोसा दिया कि हिंदू निशानों को नुकसान नहीं होगा।

अब सबको ASI की रिपोर्ट का इंतजार है, जो बताएगी कि मस्जिद में काम हो सकता है या नहीं। बता दें कि इसी मस्जिद के सर्वे के दौरान इस्लामी भीड़ ने हमला कर दिया था, जिसके बाद तनाव फैल गया था। संभल में दंगाइयों के निशाने पर हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन थे।

योनि में लिंग का प्रवेश ही नहीं बलात्कार, वीर्य न भी गिरे तो भी यौन उत्पीड़न: केरल हाई कोर्ट ने POCSO के मामलों में ‘रगड़-स्पर्श-वीर्यपतन’ का दायरा बाँधा

केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में POCSO एक्ट के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पीड़िता के बाहरी जननांग (लेबिया मेजोरा या वल्वा) के साथ मामूली शारीरिक संपर्क भी यौन हमला माना जाएगा। हाई कोर्ट ने कहा कि यह क्रिया यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम 2012 (POCSO अधिनियम) की धारा 3 के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध होगा। इसके साथ ही आरोपित की सरकार को बरकरार रखा।

जस्टिस पीबी सुरेश कुमार और जोबिन सेबेस्टियन की खंडपीठ ने इस परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा, “स्त्री के बाहरी जननांग लेबिया मेजोरा या वल्वा में पुरुष जननांग का प्रवेश, चाहे वो आंशिक हो या मामूली हो, POCSO अधिनियम के तहत प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध होगा।” हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि इस दौरान चाहे वीर्य का उत्सर्जन हुआ हो या नहीं, यह मायने नहीं रखता।

याचिका दायर करने वाले आरोपित का तर्क था कि अभियोजन पक्ष IPC की धारा 376 में बलात्कार को साबित करने के लिए बताए गए जरूरी घटक लिंग के प्रवेश को साबित नहीं कर पाया। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने पीड़िता की मेडकिल रिपोर्ट का भी हवाला दिया और कहा कि उसकी हाइमन बरकरार थी। इसलिए इसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं माना जा सकता है।

हालाँकि, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज करते कहा कि अगर हाइमन नहीं टूटा, इसका मतलब ये नहीं है कि बलात्कार या प्रवेशात्मक यौन हमले का अपराध नहीं हुआ है। कोर्ट ने कहा कि साल 2013 में संशोधित IPC की धारा 375 (बलात्कार) में प्रवेशात्मक हमला सिर्फ योनि में पुरुष जननांग के पूरी तरह प्रवेश तक सीमित नहीं है। इसमें बाहरी महिला जननांग और उसके आसपास का प्रवेश भी शामिल है।

कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट में प्रवेशात्मक यौन हमले की परिभाषा में ‘योनि’ को साफ तौर परिभाषित नहीं किया गया है। इसलिए यहाँ IPC की परिभाषा को लागू किया जा सकता है, जिसमें आंशिक प्रवेश भी प्रवेशात्मक यौन हमला माना जाएगा। कोर्ट ने योनि में पूर्ण लिंग के प्रवेश को ही अपराध बनाने की आवश्यकता के तर्क को नकार दिया। इस तरह हाई कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए आजीवन कारावास की सजा को 25 साल के कठोर कारावास में बदल दिया।

दरअसल, केरल के कासरगोड में अपीलकर्ता ने 4 साल की बच्ची का अपने घर पर बार-बार बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया था। अपीलकर्ता पीड़िता का पड़ोसी है। कुछ समय के बाद बच्ची ने अपनी माँ से बताया कि उसके जननांग में दर्द हो रहा है। उस उसकी माँ उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई तो डॉक्टर को यौन शोषण का संदेह हुआ और उसने पुलिस को इसकी जानकारी दी।

इसके बाद पुलिस ने मेडिकल के आधार पर SC/ST Act और POCSO Act सहित रेप एवं IPC की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर लिया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान कासरगोड की निचली अदालत ने आरोपित को रेप का दोषी पाया और उसे आजीवन कारावास की सुनाई। इसके साथ ही उस पर 25,000 रुपए का जुर्माने भी लगाया। इस फैसले के खिलाफ आरोपित केरल हाई कोर्ट गया था।

केरल हाई कोर्ट ने इस केस के तमाम पहलुओं एवं साक्ष्यों को देखने-सुनने और विचार करने के बाद आरोपित की अपील याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही उसके आजीवन कारावास की सजा को 25 साल की कठोर कारावास में बदल दिया। न्यायालय ने कहा कि पीड़िता द्वारा दोषी को जानबूझकर फँसाने के संकेत नहीं हैं, क्योंकि दोनों के बीच किसी तरह की दुश्मनी नहीं है।

योनि, गुदा, मुँह में प्रवेश ही नहीं… जाँघों पर लिंग रगड़ना भी रेप

ऐसे ही एक मामले में केरल हाई कोर्ट ने 4 अगस्त 2021 को कहा था कि आरोपित को महिला के किसी भी अंग के साथ छेड़छाड़ करने से यौन संतुष्टि मिलती है तो ये भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार माना जाएगा। चाहे उसने अपने लिंग को महिला की योनि में प्रवेश कराया हो या नहीं कराया हो। दरअसल, बच्ची से रेप के आरोपित ने याचिका दायर कर कोर्ट से यह जाँचने की माँग की थी कि बच्ची की जाँघों के बीच लिंग रगड़ना बलात्कार है या नहीं।

कोर्ट ने कहा था कि IPC की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा में पीड़िता की जाँघों के बीच जननांग में प्रवेश कराना यौन हमला है। हाई कोर्ट कहा था, “आईपीसी की धारा 375 में योनि, मूत्रमार्ग, गुदा और मुँह (मानव शरीर में ज्ञात छेद) में लिंग के प्रवेश के अलावा यौन संतुष्टि के लिए अगर आरोपित कल्पना करके पीड़िता के शरीर के अन्य अंगों को ऐसा आकार दे कि उसे लिंग के रगड़े से यौन सुख मिले और वीर्य स्खलन हो तो यह बलात्कार की श्रेणी में आएगा।”

अंडरवियर हटाए बिना भी लिंग का स्पर्श बलात्कार

मेघालय हाई कोर्ट ने मार्च 2022 में एक नाबालिग से रेप के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि पीड़िता की अंडरवियर पर लिंग का स्पर्श भी बलात्कार माना जाएगा। अदालत ने कहा था कि अगर यह मान भी लिया जाए कि आरोपित ने चड्डी पहने हुए ही पीड़िता की योनि या फिर उसके मूत्रमार्ग में जबरन अपना लिंग प्रवेश कराने की कोशिश की तो भी यह IPC की धारा 375 (B) के तहत रेप होगा।

कोर्ट ने कहा था, “23 सितंबर 2006 की घटना में एक सप्ताह बाद 10 साल की पीड़िता का मेडिकल टेस्ट किया गया तो उसकी योनि कोमल और लाल पाई गई थी। उसका हाइमन (कौमार्य झिल्ली) टूटा हुआ था। जाँच करने वाले डॉक्टर का भी कहना था कि लड़की के साथ बलात्कार हुआ है। पीड़िता ने भी कहा था कि आरोपित ने उसकी चड्डी को नीचे खींचा था।”

UNHRC में पाकिस्तान ने उठाया कश्मीर का मुद्दा, तो भारत ने रगड़ दिया : कहा – ‘भीख पर जीने वालों को लेक्चर देने का हक नहीं’

पाकिस्तान को एक बार फिर भारत से मुँह की खानी पड़ी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की जिनेवा बैठक में पाकिस्तान ने कश्मीर का राग अलापा, लेकिन भारत ने उसे ऐसा जवाब दिया कि उसकी बोलती बंद हो गई। पाकिस्तान के कानून मंत्री अजम नजीर तरार ने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन और आत्मनिर्णय के अधिकार की बात उठाई, लेकिन भारत के डिप्लोमैट क्षितिज त्यागी ने उसे जमकर लताड़ लगाई। त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान खुद एक असफल देश है, जो अंतरराष्ट्रीय भीख (मदद) पर जीकर आतंकवाद को पालता है। ऐसे में उसे दूसरों को लेक्चर देने का कोई हक नहीं है।

अपने लोगों की जिंदगियाँ सुधारे पाकिस्तान

UNHRC में भारत ने साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हमेशा उसके अभिन्न हिस्से रहेंगे। त्यागी ने बताया कि पिछले कुछ सालों में इन इलाकों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तरक्की हुई है। उन्होंने कहा कि ये बदलाव दिखाते हैं कि वहाँ के लोग सरकार पर भरोसा करते हैं, जो पाकिस्तान के आतंकवाद से जख्मी इस इलाके में शांति लाने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ, पाकिस्तान को नसीहत दी गई कि उसे भारत पर कीचड़ उछालने की बजाय अपने लोगों को इंसाफ और बेहतर जिंदगी देने पर ध्यान देना चाहिए।

मानवाधिकारों की रक्षा में हिंदुस्तान आगे

भारत ने पाकिस्तान की पोल खोलते हुए कहा कि वहाँ मानवाधिकारों का हनन, अल्पसंख्यकों पर जुल्म और लोकतंत्र का गला घोंटना आम बात है। त्यागी ने तंज कसते हुए कहा कि पाकिस्तान का बड़बोलापन ढोंग से भरा है और उसकी हरकतें अमानवीय हैं। उन्होंने ये भी कहा कि भारत लोकतंत्र और अपने लोगों की गरिमा को मजबूत करने में जुटा है, जो पाकिस्तान को सीखना चाहिए। इससे पहले भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी UN में कहा था कि भारत मानवाधिकारों की रक्षा और आतंकवाद से लड़ाई में हमेशा आगे रहा है।

पाकिस्तान की इस हरकत से साफ है कि वह अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए कश्मीर का मुद्दा उठाता रहता है। लेकिन भारत हर बार उसे आईना दिखाने में कामयाब रहा है। त्यागी ने ये भी कहा कि पाकिस्तान ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) का गलत इस्तेमाल कर रहा है और उसका मजाक बना रहा है। भारत का कहना है कि उसे इस तरह की बकवास पर वक्त बर्बाद करने की बजाय अपने देश की बदहाली सुधारने की ओर ध्यान देना चाहिए।

काम धाम कुछ नहीं, प्रचार पर पानी की तरह बहाया पैसा: 5 साल में विज्ञापन पर 1200% बढ़ाया खर्च, CAG रिपोर्ट से दिल्ली की AAP सरकार की एक और करतूत आई सामने

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने विज्ञापनों पर बेतहाशा रुपये खर्च किए। CAG यानी Comptroller and Auditor General द्वारा सरकारी खर्चों पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि AAP सरकार ने 2018 से 2022 के बीच विज्ञापनों पर खर्च 1200% बढ़ा दिया। यानी 2018 में जहाँ 46.90 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वो 2022 तक बढ़कर 612.80 करोड़ रुपये हो गए। इस तरह 5 साल में 1200 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि ये खर्च सुप्रीम कोर्ट के नियमों को तोड़ते हुए किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, CAG ने पाया कि विज्ञापनों के लिए कोई ठीक प्लानिंग नहीं हुई। न तो ये तय किया गया कि विज्ञापन किसे दिखाना है, न ही बाद में चेक किया कि इसका असर क्या हुआ। पैसे देने में भी लापरवाही हुई। कई एजेंसियों को बिना जाँच के पेमेंट कर दी गई। यहाँ तक कि 2015-17 के विज्ञापनों के लिए 2020-22 में 57.90 करोड़ रुपये दे दिए गए, जो सुप्रीम कोर्ट के नियमों के खिलाफ है। दिल्ली से बाहर भी ढेर सारे विज्ञापन चलाए गए, जो गलत माना गया।

रिपोर्ट में ये भी खुलासा हुआ कि दिल्ली सरकार की पब्लिसिटी देखने वाली संस्था ‘शब्दार्थ’ में भी गड़बड़ियाँ थीं। वहाँ काम करने वाले कुछ लोग टेंडर देने में दखल दे रहे थे और बिना ठीक जाँच के एजेंसियाँ चुन ली गईं। खर्च का हिसाब-किताब भी साफ नहीं था। DIP यानी Department of Information and Publicity ने पुराने पेमेंट्स का डेटा तक ठीक से नहीं दिया। इससे सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।

AAP पर ये भी इल्जाम है कि उसने सरकारी विज्ञापनों के नाम पर अपनी पार्टी का प्रचार किया। इसके लिए 97 करोड़ रुपये वसूलने की बात हुई, जिसमें से 42 करोड़ रुपये चुका दिए गए, बाकी बचे पैसों की वसूली अभी बाकी है। इस बीच, विज्ञापन देने वाली एजेंसियों ने कई कोर्ट्स, ट्रिब्यूनल में आम आदमी पार्टी/सरकार के खिलाफ केस दर्ज कराए हैं, जिसमें विज्ञापन सेवा के बदले भुगतान न किए जाने की बात है। इन सभी मामलों की जाँच के लिए दिल्ली के L-G वीके सक्सेना ने आदेश भी दिए थे, इसके बावजूद आम आदमी पार्टी ने सभी नियमों का उल्लंघन करते हुए जमकर विज्ञापन जारी किए।

इस बीच, मोहल्ला क्लीनिक पर आई रिपोर्ट में भी गड़बड़ियों का खुलासा हुआ है। खास बात ये है कि 2016 से 23 के बीच 35.16 करोड़ रुपये मोहल्ला क्लीनिक को बनाने के लिए रखे गए थे, लेकिन सिर्फ 28% राशि ही खर्च की गई। AAP सरकार मोहल्ला क्लीनिक को लेकर विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का दावा करती रही। यही नहीं, पर्यावरण प्रदूषण को लेकर हल्ला मचाने वाली दिल्ली सरकार ने सिर्फ 7 जगहों पर प्रदूषण की जाँच की व्यवस्था की, जबकि दिल्ली में 128 एंट्री प्वॉइंट्स हैं।