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पुलिस ने हथकड़ी लगाई, आयरन रॉड से पीटा: डीएमके MLA के खिलाफ पोस्ट करने वाला युवक

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में पी जयराज (59) और उनके बेटे जे फेनिक्स के साथ पुलिस बर्बरता के बाद एक और मामला सामने आया है। इस घटना में भी पुलिस की भूमिका संदिग्ध और संवेदनहीन नज़र आई है।

32 साल के युवक ने पुलिस पर आयरन रॉड से पीटने का आरोप लगाया है। घटना के लगभग एक महीने बाद युवक ने शिकायत दर्ज कराई है। इस दौरान वह अस्पताल में भर्ती था क्योंकि उसके पूरे शरीर में कई फ्रैक्चर हैं। 

तूतूकड़ी के तिरुचेंदूर में रहने वाले होटल मैनेजर एस मणिकंदन केरल के गुरुवायूर में काम करते हैं। जून की शुरुआत में पुलिस उन्हें गुरुवायूर से उठा कर 500 किलोमीटर दूर तिरुचेंदूर लेकर आई। मणिकंदन का कहना है कि जनवरी में उन्होंने डीएमके विधायक अनिता आर राधाकृष्णन के विरोध में एक वीडियो बना कर फेसबुक पर साझा किया था। इसके चलते उन्हें पुलिस की बर्बरता का सामना करना पड़ा।  

दरअसल मद्रास उच्च न्यायालय ने पुलिस की बर्बरता के कारण पी जयराज और जे फेनिक्स की मृत्यु होने के बाद तमिलनाडु में हुए विरोध-प्रदर्शन के बाद जिला न्यायाधीश को आदेश दिया था कि वह ऐसे मामलों पर निगाह रखें। न्यायाधीश के पास मामले की सूचना आने के बाद मणिकंदन को भर्ती कराया गया था।   

इसके पहले मणिकंदन को पी सरवनन के सामने पेश किया गया था, वह मजिस्ट्रेट जिनकी भूमिका पर जयराज और फेनिक्स के मामले में काफी सवाल उठे थे। मणिकंदन पर लगाए गए आरोपों के मुताबिक़ उसने अपने वीडियो में नादर समुदाय के बारे में कुछ बातें कही थीं, जिस समुदाय से डीएमके विधायक राधाकृष्णन आती हैं। तूतूकड़ी के नए पुलिस अधीक्षक का कहना है कि मणिकंदन को पूरी सुरक्षा दी जाएगी।

मामले से जुड़ी अब तक की जानकारी के मुताबिक़ जिस तरह मणिकंदन के साथ निर्दयता करके उसे गुरुवायूर से लाया गया, उससे अदालत भी हैरान है। अगर कार्यवाही करने वालों के पास वारंट था तो उन्हें स्थानीय पुलिस की मदद लेनी चाहिए थी।

वीडियो में मणिकंदन ने राधाकृष्णन पर अक्सर अपने समुदाय के लोगों का पक्ष लेने का आरोप लगाया है। जैसे ही उनका वीडियो वायरल हुआ उसके ठीक कुछ समय बाद ही उन्हें और उनके घर वालों को नादर समुदाय के लोगों से धमकियाँ मिलने लगी थी।  

इतना ही नहीं 6 जून को पुलिस ने मणिकंदन के पिता (पेशे से पोस्टमास्टर) और उनके भाई को भी तलब किया। 7 जून को गुरुवायूर स्थित उनके घर पर कई लोग मौजूद थे, जिन्होंने खुद को तिरुचेंदूर में कार्यरत पुलिसकर्मी बताया था। इसके बाद उन सभी लोगों ने मणिकंदन को हथकड़ी लगाई और तिरुचेंदूर ले गएl तूतूकड़ी के नज़दीक आते ही उनके साथ मारपीट और ज़्यादती शुरू हो गई थीl 

वहाँ उनके पिता और भाई पहले से ही मौजूद थे, उन्हें मणिकंदन से बात नहीं करने दिया गया। 8 जून को मणिकंदन को बताया गया कि तिरुचेंदूर के पुलिस उपाधीक्षक पूछताछ करेंगे। इसके बाद उसे पुलिस थाने के पहले तल पर ले जाया गया और खूब पीटा गया।

मणिकंदन द्वारा की गई शिकायत के अनुसार सुबह के 3 बजे तक पुलिस वाले उसे पीटते रहे, इस दौरान दो डंडे  तक टूट गए, डंडे टूटने के बाद प्लास्टिक की पाइप से पीटने लगे। इस दौरान मणिकंदन के पैर के अंगूठे भी टूट गएl 

9 जून की शाम 5:30 बजे पुलिस ने उसका हाथ खिड़की से बाँध दिया और लोहे की रॉड से पीटने लगे। पुलिस की ऐसी बर्बरता तब तक जारी रही जब तक मणिकंदन बेहोश नहीं हो गया। इसके बाद पुलिस ने मणिकंदन को इस बारे में किसी से बात न करें की धमकी भी दी। इसके बाद तिरुचेंदूर पुलिस स्टेशन के इन्स्पेक्टर मुथूरमण और उनके सह कर्मियों ने मणिकंदन को मजिस्ट्रेट सर्वनन के सामने पेश किया। जहां मणिकंदन ने यह कहा कि उसे यह चोटें गिरने की वजह से आई हैं और फिर उसे तूतूकड़ी की पेरूरानी जेल में डाल दिया गयाl अपनी शिकायत में मणिकंदन का यह भी कहना है कि उसे जमानत पर बाहर आने के बाद पुलिस वालों से ख़तरा है।   

हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के घर पर चला बुलडोजर, भाभी के पास मिली पिस्तौल: तलाश में पुलिस की 100 टीमें

हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे पर पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा है। एक तरफ उसकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है, दूसरी तरफ उसके घर पर बुलडोजर चलाया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कानपुर के बिठुर स्थित विकास दुबे का घर JCB से गिराया जा रहा है। इसके साथ ही पुलिस की 100 टीमें अलग-अलग इलाकों की तलाशी ले रही हैं, जहाँ विकास के घर वाले रहते हैं।

इसी खोजबीन के दौरान पुलिस ने लखनऊ के कृष्णानगर इलाके में भी छापेमारी की। नौकर के सिवाय विकास के इंद्रलोक कॉलोनी वाले घर में कोई नहीं मिला। मगर पुलिस ने वहाँ से कुछ संदिग्ध सामानों के साथ पेन ड्राइव बरामद किया है।

उसी इलाके में रहने वाले विकास के भाई दीप के घर भी पुलिस ने दबिश दी। लेकिन वह भी घटना के बाद से ही फरार है। पुलिस को उसकी पत्नी के पास से रिवाल्वर मिली है। इसका लाइसेंस होने का दावा किया जा रहा है। फिलहाल पुलिस इसकी पड़ताल कर रही है। 12 लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ भी की जा रही हैं।

गौरतलब है कि कानपुर में दो जुलाई को हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला किया। हमले में आठ पुलिसकर्मी की मौत हो गई। इस घटना के बहाने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यूपी पुलिस का मजाक उड़ाने की कोशिश की है।

अखिलेश ने बीबीसी का एक कार्टून शेयर किया है जिसमें यूपी पुलिस के आठ जवानों की मौत को लेकर कटाक्ष किया गया है। यहाँ यह जानना दिलचस्प है कि विकास दुबे की सपा-बसपा के कई नेताओं से करीबी रही है। उसकी पत्नी सपा के टिकट पर पंचायत चुनाव भी लड़ चुकी है।

इधर पुलिसकर्मियों पर घात लगाकर हमला करने वाले कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे की माँ ने बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को उनके बेटे को मुठभेड़ में मार देना चाहिए क्योंकि उसने जो किया वह गलत था।

गैंगस्टर की माँ सरला देवी ने कहा, “अच्छा होगा अगर वो खुद सरेंडर कर दे। धोखे से भागता रहा तो पुलिस उसे एनकाउंटर में मार देगी। मैं तो कहती हूँ पकड़ लो और फिर एनकाउंटर कर दो। उसने बहुत बुरा किया है।”

गैंगस्टर विकास दुबे की माँ ने कहा कि राजनेताओं के संपर्क में आने के बाद विकास दुबे अपराध की दुनिया में शामिल हो गया था। सरला देवी ने यह भी कहा कि उनके गैंगस्टर बेटे ने परिवार को बहुत शर्मिंदा किया है।

कानपुर में हुई मुठभेड़ के बाद विकास दुबे फिलहाल फरार है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुख्यात गैंगस्टर को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है।

विकास दुबे की माँ सरला देवी ने कहा, “विकास एमएलए चुनाव जीतना चाहता था। उसने तत्कालीन भाजपा सरकार में मंत्री रहे संतोष शुक्ला की हत्या कर दी थी। मैं चार महीने से उनसे नहीं मिली हूँ। मैं अपने छोटे बेटे के साथ लखनऊ में रह रही हूँ। हमें उसकी वजह से बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।”

उल्लेखनीय है कि कानपुर स्थित चौबेपुर के बिकरू गाँव में हिस्ट्रीशीटर बदमाश विकास दुबे को बृहस्पतिवार (जुलाई 02, 2020) की आधी रात पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला कर दिया गया।

शुक्रवार (जुलाई 03 ,2020) को पुलिस ने बताया कि यह मुठभेड़ बृहस्पतिवार और शुक्रवार की रात चौबेपुर थाना अंतर्गत डिक्रू गाँव में 60 आपराधिक मामलों में आरोपित हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को गिरफ्तार करने के लिए हुई थी।

अधिकारियों ने कहा कि जब पुलिस टीम खूंखार अपराधी के ठिकाने पर पहुँचने वाली थी, तब एक बिल्डिंग की छत से उन पर गोलियों की बौछार की गई, जिससे डिप्टी एसपी देवेंद्र मिश्रा, तीन सब-इंस्पेक्टर और चार कॉन्स्टेबल मारे गए। घटना का विवरण देते हुए, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) एचसी अवस्थी ने कहा कि कुख्यात अपराधी को इस छापेमारी की भनक लग गई थी।

DGP अवस्थी ने कहा कि उसने और उसके साथियों ने पुलिसकर्मियों को उनके ठिकाने की ओर बढ़ने से रोकने के लिए बड़े स्तर पर रोड ब्लॉक कर रखा था। पुलिस टीम के गाँव में पहुँचते ही विकास दुबे और उसके साथियों ने घरों की छत से फायरिंग शुरू कर दी। अपराधियों ने एक इमारत की छत से उन पर नजर रखी और हमला किया जिससे पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।

डीजीपी ने कहा कि हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के खिलाफ धारा 307 के तहत मामला दर्ज़ किया गया था, पुलिस उसे पकड़ने गई थी। पुलिस सर्विलांस के जरिए विकास दुबे का पता लगा रही है और कई अन्य ठिकानों पर छापे मार रही है। साथ ही सभी सीमाओं को भी सील कर दिया गया है।

वर्ष 2001 में शिवली थाने के बाहर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की थाने में घुसकर हत्या करने में नामजद रह चुके हिस्ट्रीशीटर बदमाश विकास दुबे चौबेपुर थाना क्षेत्र के गाँव बिकरू का रहने वाला है। उस पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

गलवान के बलिदानी जवानों का शौर्य बड़े पर्दे पर पेश करेंगे अजय देवगन, चीन ने धोखे से किया था वार

अभिनेता-निर्माता अजय देवगन लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ भारतीय सैनिकों की हिंसक झड़प की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। फिल्म के बारे में अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह भारतीय सेना के 20 जवानों के बलिदान की कहानी सुनाएगी, जिन्होंने चीनी सेना का मुकाबला किया था।

हालाँकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि अजय फिल्म में अभिनय करेंगे या नहीं। कलाकारों और अन्य चीजों पर अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है। फिल्म को अजय देवगन फिल्म्स और सेलेक्ट मीडिया होल्डिंग्स एलएलपी द्वारा निर्मित किया जाएगा।

15 जून को, पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ 20 भारतीय सैनिकों ने हिंसक हमले में अपनी जान गवाँ दी थी। यह टकराव श्योक नदी के साथ संगम से पहले, पूर्व-पश्चिम दिशा में बहने वाली नदी के दक्षिणी तट पर स्थित गलवान घाटी में हुआ था।

इस पर फिल्म बनाए जाने की जानकारी फिल्म समीक्षक तरण आदर्श ने ट्वीट कर दी है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “यह ऑफिशियल है कि अजय देवगन गलवान घाटी की घटना पर फिल्म बनाने जा रहे हैं। अभी फिल्म का कोई शीर्षक नहीं दिया गया है। इस फिल्म के जरिए उन 20 भारतीय सेना के जवानों की कहानी दिखाई जाएगी, जिन्होंने चीनी सेना का मुकाबला किया था। इस फिल्म को अजय देवगन और सेलेक्ट मीडिया होल्डिंग्स एलएलपी प्रोड्यूस करेंगे। फिल्म की कास्ट भी अभी फाइनल नहीं हुई है।”

IT’S OFFICIAL… #AjayDevgn to make film on #GalwanValley clash… The film – not titled yet – will narrate the story of sacrifice of 20 #Indian army men, who fought the #Chinese army… Cast not finalized… Ajay Devgn FFilms and Select Media Holdings LLP will produce the film. pic.twitter.com/yaM6rPcK7Z— taran adarsh (@taran_adarsh) July 4, 2020

अजय देवगन की युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ लगभग तैयार हो चुकी है। फिल्म का प्रीमियर डिज्नी एवं हॉटस्टार पर जल्द ही किया जाएगा। फिल्म को ‘हॉटस्टार’ ने लगभग 112 करोड़ रुपए में खरीदा है। अभिषेक दुधैया के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर आधारित है।

इसमें संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, नोरा फतेही, शरद केलकर, अम्मी विर्क और प्रणीत सुभाष सहित अन्य कलाकार हैं। इस फिल्म में अजय देवगन भारतीय वायुसेना स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक की भूमिका निभा रहे हैं, जो 1971 के युद्ध में भुज हवाई अड्डे के प्रभारी थे।

विजय कार्णिक, उनकी टीम और भुज की स्थानीय 300 महिलाओं की वजह से भारतीय वायु सेना की एयरस्ट्रिप की मरम्मत की जा सकी थी और पाकिस्तान को जवाब दिया जा सका। इसे भारत का ‘पर्ल हार्बर मोमेंट’ भी कहा जाता है। खास बात है कि 1971 की कहानी जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर में दिखाई जा चुकी है लेकिन ये फिल्म वायुसेना के संघर्षों को सामने रखेगी।

फतवे के आगे इमरान सरकार ने घुटने टेके, इस्लामाबाद में कृष्ण मंदिर के निर्माण पर लगाई रोक

पाकिस्तान के प्रताड़ित हिंदुओं ने जिस फतवा के आगे झुकने से इनकार कर दिया था, उसके सामने इमरान खान की सरकार ने घुटने टेक दिए हैं। इस्लामाबाद में कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी (CDA) ने शुक्रवार (3 जुलाई, 2020) को कानून का हवाला देते हुए कृष्णा मंदिर के निर्माण में बनने वाली चारदीवारी का कार्य रोक दिया।

पाकिस्‍तान सरकार ने अब मंदिर के संबंध में इस्‍लामिक आइडियॉलजी काउंसिल से सलाह लेने का फैसला किया है।ट्विटर के जरिए धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने कहा है कि वह केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों से संबंधित पूजा स्थलों को पुनर्निर्मित करने में मदद कर सकता है। नए मंदिर के निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

सीडीए के प्रवर्तन और भवन नियंत्रण विभागों की एक संयुक्त टीम शुक्रवार को एच-9/2 में मंदिर निर्माण स्थल पर पहुँची और श्रमिकों को निर्माण का काम रोकने का निर्देश दिया। सीडीए के प्रवक्ता मज़हर हुसैन ने कहा कि नागरिक प्राधिकरण के भवन नियंत्रण कानूनों ने स्पष्ट रूप से ये कहा कि जब तक इमारत के निर्माण के लिए मँजूरी नहीं मिल जाती तब तक इस जमीन पर कोई काम नहीं होगा।

सीडीए के प्रवर्तन विभाग के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने खुलासा किया कि पहली बार इस क्लॉज़ को लागू किया है। वरना हमेशा अन्य लोगों को सीमा की दीवार का निर्माण करने की अनुमति दे दी जाती थी।

मंदिर निर्माण के लिए हिंदू पंचायत इस्लामाबाद ने अब काम रोक दिया है और निर्माण शुरू करने की अनुमति लेने के लिए सोमवार को सीडीए से संपर्क करने का फैसला किया है।

पाकिस्‍तान के ह्यूमन राइट्स के संसदीय सचिव लाल चंद्र मल्‍ही ने कहा, “हम नियमों का पालन करते हैं, लेकिन बाउंड्री का निर्माण जरूरी है, क्यूंकि कुछ मदरसों से सम्बंधित लोगों ने 2018 में प्लॉट पर टेंट स्थापित कर दिया था और इस जगह को साफ करने के लिए हमें राजधानी प्रशासन की मदद पाने के लिए कई महीने लग गए थे।”

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल, 92 न्यूज एचडी प्लस ने हिंदू मंदिर के निर्माण को रोकने के लिए इस्लामिक एजेंडे का हवाला दिया था।

हालाँकि बाद में इस झूठे दावे को हटा दिया गया।

कुछ मजहबी संस्थाओं ने बुधवार को मंदिर बनाने को लेकर सरकार की आलोचना की थी और इसे पाकिस्तानी विचारधारा के खिलाफ बताया था। उन्होंने इस मुद्दे को फ़ेडरल शरीअत कोर्ट ले जाने का फैसला भी किया था।

बता दें की इससे पहले पाकिस्तान में गंभीर धार्मिक प्रताड़ना झेलने वाले हिंदुओं ने साहसिक निर्णय लिते हुए इस्लामाबाद में कृष्ण मंदिर का निर्माण कार्य जारी रखने का फैसला किया था। इस्लामिक देश की राजधानी में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिंदुओं ने 20,000 वर्गफुट में कृष्ण मंदिर बनाने का निश्चय किया था। यह जमीन उन्हें पाकिस्तान सरकार से आवंटित हुई थी।

इस फैसले के बाद कृष्ण मंदिर को लेकर कट्टरपंथियों की लगातार धमकियाँ मिल रही थी और इस्लामिक उलेमाओं से लेकर इस्लामिक नेता तक पाकिस्तान सरकार के इस फैसले के विरोध में आवाज बुलंद कर रहे थे।

पिछले दिनों इस संबंध में इस्लामी शिक्षा देने वाले संस्थान जामिया अशर्फिया के मुफ्ती जियाउद्दीन ने कहा था कि गैर मुस्लिमों के लिए मंदिर या अन्य धार्मिक स्थल बनाने के लिए सरकारी धन खर्च नहीं किया जा सकता। इसी संस्था ने मंदिर निर्माण को लेकर फतवा जारी करते हुए कहा था कि अल्पसंख्यकों (हिंदुओं) के लिए सरकारी धन से मंदिर निर्माण कई सवाल खड़े कर रहा है।

इस फतवे के अलावा इस्लामाबाद हाई कोर्ट में मंदिर निर्माण को लेकर एक याचिका भी डाली गई थी। याचिका में याचिकाकर्ता ने कहा था कि यह योजना राष्ट्रीय राजधानी इस्लामाबाद के लिए तैयार मास्टर प्लान के तहत नहीं आती है।

याचिका में आग्रह किया गया था कि इस्लामाबाद के सेक्टर एच 9 में मंदिर निर्माण के लिए आवंटित भूमि को वापस लिया जाना चाहिए और मंदिर के लिए निर्माण धन भी वापस लेना चाहिए। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कैपिटल डेवलपमेंट अथॉरिटी (सीडीए) को नोटिस जारी किया था।

गौरतलब हो कि वैसे तो श्रीकृष्ण मंदिर इस्लामाबाद में पहला हिंदू मंदिर होगा। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक इससे पहले वहाँ दो और मंदिर थे। उनमें से एक को टूरिस्ट प्लेस बना दिया गया और दूसरा मुकदमेबाजी के चलते बंद पड़ा है।

अब इस श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण इस्‍लामाबाद के H-9 क्षेत्र में 20,000 वर्गफुट में किया जा रहा था। मंगलवार को मल्‍ही ने ही इस मंदिर की आधारशिला रखी थी। नींव रखे जाने के इस कार्यक्रम के दौरान वहाँ उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए मल्‍ही ने जानकारी दी थी कि भारत और पाकिस्तान की आज़ादी से पहले इस्‍लामाबाद और उससे सटे हुए क्षेत्रों में कई हिंदू मंदिर हुआ करते थे।

इनमें सैदपुर गाँव और रावल झील के पास स्थित मंदिर शामिल है। हालाँकि, उन्होंने बताया कि इन मंदिरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया और कभी इस्‍तेमाल नहीं किया गया। वो पड़े रहे और प्रयोग में आए ही नहीं।

ओली की कुर्सी से संकट सोमवार तक टला, नेपाली PM को बचाने के लिए चीन-पाक ने लगा रखा है जोर

नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति की बैठक सोमवार तक के लिए टाल दी गई है। इस बैठक में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के भविष्य पर फैसला होना था।

पार्टी में आम राय बनाने और टूट रोकने के लिए बैठक टाली गई है। पार्टी के सह अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड के प्रेस सलाहकार बिष्णु सपकोटा ने बताया, “स्थायी समिति की बैठक सोमवार सुबह 11 बजे तक के लिए टाल दी गई है क्योंकि पार्टी के दोनों अध्यक्ष चर्चा के लिए और समय चाहते हैं।”

उल्लेखनीय है कि प्रचंड के साथ-साथ पीएम ओली भी पार्टी के अध्यक्ष हैं। इससे पहले दोनों नेता शुक्रवार को इस मसले पर सहमति बनाने में असफल रहे थे। इधर, ओली ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पार्टी की अन्य इकाइयों से मदद मॉंगी हैं। उन्होंने पार्टी के यूथ और स्टूडेंट विंग के नेताओं को मशविरे के लिए अपने आवास पर बुलाया था। साथ ही उन्हें विपक्षी नेपाली कॉन्ग्रेस पार्टी से भी मदद की उम्मीद है।

यदि प्रचंड और ओली आम राय बनाने में कामयाब नहीं हुए तो पार्टी में टूट तय है। भारत विरोधी रुख और चीन के बढ़ते दखल को लेकर ओली के खिलाफ पार्टी के भीतर काफी नाराजगी है। पिछले हफ्ते नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) की स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने साफ शब्दों में ओली से प्रधानमंत्री पद या पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहा था।

पार्टी के भीतर अपने इस्तीफे की मॉंग उठने के बाद ओली ने इसका ठीकरा भारत पर फोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन प्रचंड ने उनकी इस टिप्पणी को अनुचित करार दिया था।

उल्लेखनीय है कि हाल में नेपाल ने एक नया नक्शा पास किया है। इसमें भारत के कुछ इलाकों को शामिल कर लिया गया है। दूसरी ओर, नेपाल के कुछ इलाकों पर चीन द्वारा अतिक्रमण करने की भी खबरें आई है।

नेपाल के भारत विरोधी एजेंडे के लिए होऊ यांगी जिम्मेदार बताई जा रही हैं। होऊ यांगी नेपाल में चीन की राजदूत हैं। पहले नेपाल के नए नक्शे के पीछे उनका ही हाथ बताया गया था। अब कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि होऊ यांगी की दखल नेपाल के आर्मी हेडक्वार्टर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक है।

नेपाली सेना के प्रमुख जनरल पूर्णचंद्र थापा का दफ्तर हो या पीएम ओली का कार्यालय, बताया जाता है कि चीनी राजदूत नेपाल के किसी भी क्षेत्र में बेरोकटोक आ-जा सकती हैं।

मॉडल की तरह दिखने वाली होऊ यांगी के रसूख का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी उनके लिए विशेष भोज की मेजबानी करती हैं। ओली कैबिनेट के सदस्य उनके साथ तस्वीरें खिंचवाकर खुद को धन्य समझते हैं। होऊ यांगी भी नेपाल के वरिष्ठ नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें आए दिन सोशल मीडिया में शेयर करती रहती हैं।

यहॉं तक कि ओली और प्रचंड के बीच तनाव की खबरें सामने आने के बाद उन्होंने भी सुलह की कोशिशें की थी। इस क्रम में उन्होंने प्रचंड से भेंट कर उन्हें आपस में नहीं लड़ने की सलाह दी थी। कुर्सी बचाने की कोशिशों के बीच प्रचंड और ओली ने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भी मुलाकात की है।

बताया जाता है कि चीन के साथ-साथ पाकिस्तान भी ओली की कुर्सी बचाने के लिए सक्रिय है। इकोनॉमिक्स टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस क्रम में ओली मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कॉन्ग्रेस के संपर्क में भी हैं। दिलचस्प यह है कि नेपाल में तैनाती से पहले होऊ यांगी तीन साल पाकिस्तान में भी काम कर चुकी हैं।

ओली अध्यादेश लाकर पॉलिटिकल पार्टीज ऐक्ट में बदलाव कर सकते हैं। इससे उन्हें पार्टी को बाँटने में आसानी होगी। यह सब चीन और पाकिस्तान के समर्थन से हो रहा है।

हालॉंकि जानकारों का मानना है कि शायद ही ओली कुर्सी बचाने में कामयाब रहें। बताया जाता है कि 44 सदस्यीय स्थायी समिति में केवल 13 सदस्य ही ओली के पक्ष में हैं। पिछले सप्ताह हुई बैठक में प्रचंड ने ओली पर निशाना साधते हुए कहा था कि वे नेपाल को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे।

उन्होंने कहा था, “हमने सुना है कि सत्ता में बने रहने के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश मॉडल पर काम चल रहा है। लेकिन इस तरह के प्रयास सफल नहीं होंगे। भ्रष्टाचार के नाम पर कोई हमें जेल में नहीं डाल सकता है। देश को सेना की मदद से चलाना आसान नहीं है और ना ही पार्टी को तोड़कर विपक्ष के साथ सरकार चलाना संभव है।”

तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच ओली को चीन द्वारा हनी ट्रै​पिंग में फॅंसाने की अफवाहें भी पिछले कई दिनों से चल रही है। मेजर गौरव आर्या ने भी पिछले दिनों इस संबंध में ट्वीट किया था। हालॉंकि ओली के सेक्स टेप को लेकर सोशल मीडिया में अब तक किए गए दावे निराधार ही साबित हुए हैं।

विकास दुबे को पहले ‘साइकिल’ का सहारा, अब यूपी पुलिस का मजाक बना रहे अखिलेश यादव

कानपुर में दो जुलाई को हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला किया। हमले में आठ पुलिसकर्मी की मौत हो गई। इस घटना के बहाने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यूपी पुलिस का मजाक उड़ाने की कोशिश की है।

अखिलेश ने बीबीसी का एक कार्टून शेयर किया है जिसमें यूपी पुलिस के आठ जवानों की मौत को लेकर कटाक्ष किया गया है। यहॉं यह जानना दिलचस्प है कि विकास दुबे की सपा-बसपा के कई नेताओं से करीबी रही है। उसकी पत्नी सपा के टिकट पर पंचायत चुनाव भी लड़ चुकी है।

इधर पुलिसकर्मियों पर घात लगाकर हमला करने वाले कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे की माँ ने बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को उनके बेटे को मुठभेड़ में मार देना चाहिए क्योंकि उसने जो किया वह गलत था।

गैंगस्टर की माँ सरला देवी ने कहा, “अच्छा होगा अगर वो खुद सरेंडर कर दे। धोखे से भागता रहा तो पुलिस उसे एनकाउंटर में मार देगी। मैं तो कहती हूँ पकड़ लो और फिर एनकाउंटर कर दो। उसने बहुत बुरा किया है।”

गैंगस्टर विकास दुबे की माँ ने कहा कि राजनेताओं के संपर्क में आने के बाद विकास दुबे अपराध की दुनिया में शामिल हो गया था। सरला देवी ने यह भी कहा कि उनके गैंगस्टर बेटे ने परिवार को बहुत शर्मिंदा किया है।

कानपुर में हुई मुठभेड़ के बाद विकास दुबे फिलहाल फरार है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुख्यात गैंगस्टर को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है।

विकास दुबे की माँ सरला देवी ने कहा, “विकास एमएलए चुनाव जीतना चाहता था। उसने तत्कालीन भाजपा सरकार में मंत्री रहे संतोष शुक्ला की हत्या कर दी थी। मैं चार महीने से उनसे नहीं मिली हूँ। मैं अपने छोटे बेटे के साथ लखनऊ में रह रही हूँ। हमें उसकी वजह से बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।”

गौरतलब है कि कानपुर स्थित चौबेपुर के बिकरू गाँव में हिस्ट्रीशीटर बदमाश विकास दुबे को बृहस्पतिवार (जुलाई 02, 2020) की आधी रात पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला कर दिया गया।

कानपुर में अपराधियों के साथ मुठभेड़ में एक उप पुलिस अधीक्षक सहित कम से कम आठ उत्तर प्रदेश पुलिसकर्मियों ने अपनी जान गंवाई है जबकि 4 गंभीर रूप से घायल हैं। घायलों में एक पुलिस कर्मी की हालत गंभीर बनी हुई है। 

शुक्रवार (जुलाई 03 ,2020) को पुलिस ने बताया कि यह मुठभेड़ बृहस्पतिवार और शुक्रवार की रात चौबेपुर थाना अंतर्गत डिक्रू गाँव में 60 आपराधिक मामलों में आरोपित हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को गिरफ्तार करने के लिए हुई थी।

अधिकारियों ने कहा कि जब पुलिस टीम खूंखार अपराधी के ठिकाने पर पहुँचने वाली थी, तब एक बिल्डिंग की छत से उन पर गोलियों की बौछार की गई, जिससे डिप्टी एसपी देवेंद्र मिश्रा, तीन सब-इंस्पेक्टर और चार कॉन्स्टेबल मारे गए। घटना का विवरण देते हुए, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) एचसी अवस्थी ने कहा कि कुख्यात अपराधी को इस छापेमारी की भनक लग गई थी।

DGP अवस्थी ने कहा कि उसने और उसके साथियों ने पुलिसकर्मियों को उनके ठिकाने की ओर बढ़ने से रोकने के लिए बड़े स्तर पर रोड ब्लॉक कर रखा था। पुलिस टीम के गाँव में पहुँचते ही विकास दुबे और उसके साथियों ने घरों की छत से फायरिंग शुरू कर दी। अपराधियों ने एक इमारत की छत से उन पर नजर रखी और हमला किया जिससे पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।

डीजीपी ने कहा कि हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के खिलाफ धारा 307 के तहत मामला दर्ज़ किया गया था, पुलिस उसे पकड़ने गई थी। पुलिस सर्विलांस के जरिए विकास दुबे का पता लगा रही है और कई अन्य ठिकानों पर छापे मार रही है। साथ ही सभी सीमाओं को भी सील कर दिया गया है।

वर्ष 2001 में शिवली थाने के बाहर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की थाने में घुसकर हत्या करने में नामजद रह चुके हिस्ट्रीशीटर बदमाश विकास दुबे चौबेपुर थाना क्षेत्र के गाँव बिकरू का रहने वाला है। उस पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। 

सुशांत की मौत से करियर सँवारने की कोशिश में स्वरा भास्कर, सहानुभूति पाने के लिए खुद को बताया आउटसाइडर

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से बॉलीवुड में नेपोटिज्म और आउटसाइडर को लेकर दोहरा व्यवहार चर्चा के केंद्र में है। लोग बॉलीवुड में प्रचलित नेपोटिज्म, खेमेबाजी और दिग्गज सेलिब्रिटीज की बुलिंग को सुशांत की आत्महत्या की वजह बता रहे हैं।

सुशांत के असामयिक निधन के बाद जनता में स्ट्रगल करने वाले एक्टर्स के लिए सहानुभूति उत्पन्न हो गई है। इस सहानभूति का फायदा उठाने के लिए स्वरा भास्कर ने खुद को आउटसाइडर बताया है। साथ ही लोगों से थिएटर में जा कर अपनी फिल्म देखने का अनुरोध भी किया है।

स्वरा हाल ही में आई अपनी एक वेब सीरीज रसभरी को लेकर कंट्रोवर्सी में हैं। IMDB पोर्टल में वेब सीरीज रसभरी को सब कम रेटिंग मिली है। वहीं CNN 18 में दिए एक इंटरव्यू में स्वरा ने खुद को नवाजुद्दीन सिद्दीकी, दीपक डोबरियाल, ऋचा चड्डा, जयदीप अहलावत, राजकुमार राव, जीशान अय्यूब जैसे अभिनेताओं की तरह आउटसाइडर बताया है।

स्वरा ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री नेपोटिस्टिक नहीं है, सामंतवादी है। इसलिए, जब इसे एक उद्योग और कॉरपोरेट मनी का दर्जा मिला और इसमें विभिन्न प्लेटफार्म उभर आए। इसकी वजह से इसमें आपको आउटसाइडर दिखने लगे। जैसे कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव, जयदीप अहलावत, दीपक डोबरियाल, ऋचा चड्डा, हुमा कुरैशी, मैं, मोनिका डोगरा और अन्य प्रमुख भूमिकाओं में आने वाले लोग।

स्वरा भास्कर ने कहा कि स्टार किड्स के ऊपर उठने के पीछे ऑडियंस जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा, “मैं दर्शकों से पूछना चाहती हूँ, आपको बहुत हमदर्दी है हमसे (बाहरी लोगों)। लेकिन नवाजुद्दीन की मोतीचूर चकनाचूर का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन क्या था? इरफान खान के कारवॉं का क्या हाल हुआ? राजकुमार राव की ट्रैप्ड ने कितनी कमाई की? रिचा चड्ढा के आर्टिकल 375 का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कैसा रहा? सुशांत सिंह राजपूत की सोनचिरैया और मेरी अनारकली का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कैसा था? इनकी तुलना हीरोपंथी के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन, स्टूडेंट ऑफ द ईयर की सफलता, धड़क की कमाई से करिए। ये दर्शक हैं जो स्टार किड्स को बड़े सितारे बनाते हैं। यदि आपको हमसे सहानुभूति है तो थिएटर में जाकर हमारी फिल्में देखिए।”

खुद को आउटसाइडर बोल कर स्वरा भास्कर लोगों की सहानुभूति पाना चाहती है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। दरअसल, स्वरा भास्कर की माँ इरा भास्कर सेंसर बोर्ड (CBFC) की सदस्य रह चुकी हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि जब एक्टर रणवीर कपूर की मूवी ‘रॉकस्टार’ में उसके प्रोडूसर को ‘फ्री तिब्बत’ वाले फ्लैग को ब्लर्र करने के लिए कहा गया था, तब इरा भास्कर CBFC की सदस्य थीं। उस दौरान सीबीएफसी ने कहा था कि “फ्री तिब्बत” का नारा भारत-चीन संबंधों को नुकसान पहुँचा सकता है।

इरा भास्कर जनवरी 2015 तक CBFC की सदस्य थीं और सीबीएफसी प्रमुख लीला सैमसन के पद छोड़ने के बाद उन्होंने भी बोर्ड छोड़ने का फैसला लिया था। इरा भास्कर फिल्म इतिहासकार के साथ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सिनेमा स्टडीज़ की प्रोफेसर भी हैं।

स्वरा भास्कर का खुद को आउटसाइडर बताना कहीं न कहीं लोगों को गुमराह करना और पब्लिक की सहानुभूति पाने की कोशिश है, जबकि उनकी माँ भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय की फिल्म-प्रमाणन संस्था सेंसर बोर्ड की मेंबर रह चुकी हैं।

ऐसा कर स्वरा न केवल अपने मॉं के अतीत को छिपाना चाहती हैं बल्कि एक अभिनेता की मौत का फायदा उठा कर अपने बॉलीवुड करियर को पटरियों पर लाने की कोशिश कर रही हैं।

लद्दाख के सबसे दुर्गम स्थान पर निमू में PM मोदी ने की सिंधु पूजा, अयोध्या से भी आया बुलावा

PM नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (जुलाई 03, 2020) को 11,000 फुट की ऊँचाई पर लद्दाख के निमू पोस्ट पहुँचकर भारतीय सेना के जवानों का मनोबल बढ़ाया। इस दौरान उन्होंने सिंधु दर्शन पूजा भी की।

इसका वीडियो और तस्वीरें आज सामने आए हैं। सिंधु नदी के तट पर 11,000 फुट की ऊँचाई पर स्थित निमू पोस्ट सबसे दुर्गम स्थानों में से एक है।

पूर्व लद्दाख स्थित गलवान घाटी क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाओं के बीच जारी गतिरोध के बीच शुक्रवार को पीएम मोदी ने अचानक लेह दौरा कर सेना के जवानों से बातचीत की और उनका हौसला बढ़ाया। पीएम मोदी के इस दौरे ने सीमा पर भारत की दृढ़ता के संकेत दिए हैं।

लेह पहुँचकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सेना के अधिकारियों, जवानों और अस्पताल में भर्ती जवानों से मुलाकात की। उन्होंने सेना के जवानों को संबोधित करते हुए उनका उत्साह बढ़ाया। पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि लेह, लद्दाख से लेकर करगिल और सियाचिन तक, यहाँ की बर्फीली चोटियों से लेकर गलवान घाटी की ठंडे पानी की धारा तक हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा-जर्रा, हर कंकड़, पत्थर भारतीय सैनिकों के पराक्रम की गवाही देते हैं।

पीएम मोदी ने आगे कहा कि हम वो लोग हैं जो बाँसुरी बजाने वाले भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं और हम वही लोग सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण को आदर्श मानते हैं। उन्होंने कहा, “मैं आज आपको प्रणाम करने आया हूँ और आपको देखकर एक ऊर्जा लेकर जाऊँगा। हम दुनिया की किसी ताकत के सामने न झुके हैं और न कभी झुकेंगे। ये बात मैं आप जैसे पराक्रमी, वीर साथियों के कारण कह पा रहा हूँ।”

श्रीराम मंदिर ट्रस्ट ने जताई पीएम मोदी के उपस्थित होने की इच्छा

आज शनिवार (जुलाई 04, 2020) को श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा कि श्री राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य 18 जुलाई को अयोध्या में मिलेंगे। इस दौरान राम मंदिर निर्माण पर चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि पीएम मोदी एक बार अयोध्या आएँ ताकि निर्माण शुरू हो जाए।

इस ट्रस्ट के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास हैं। प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र, केंद्रीय अतिरिक्त गृह सचिव ज्ञानेश कुमार और उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी समेत कई अन्य इसके सदस्य हैं। बैठक के एजेंडा का संकेत देते हुए राय ने कहा कि मंदिर के पिलरों (स्तम्भ) की नींव रखने का मुद्दा बैठक में उठाया जा सकता है।

18 जुलाई को अयोध्या में श्री राम मंदिर न्यास की बैठक में जमीन के समतल होने के बाद परियोजना के विभिन्न चरणों पर चर्चा होगी। ज्ञात हो कि यह ट्रस्ट अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के काम की देखरेख के लिए उच्चतम न्यायालय के आदेश के तहत गठित किया गया है।

दिल्ली दंगों से जाकिर नाइक के भी जुड़े तार, फंड के लिए मिला था खालिद सैफी, विदेशी फंडिंग का स्पेशल सेल को मिला लिंक

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की जाँच से नए विवरण सामने आए हैं। इससे पता चला है कि फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए JNU छात्रनेता उमर खालिद के करीबी खालिद सैफी की मुलाकात मलेशिया में भगोड़े इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक से हुई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, खालिद सैफी कथित तौर पर दिल्ली दंगों के सूत्रधारों में से एक है और JNU छात्रनेता उमर खालिद और ताहिर हुसैन का करीबी भी।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दायर की गई स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, यह फंड सऊदी अरब में वापस सिंगापुर में एक एनआरआई के पास भेज दिया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जाँच से पता चला है कि पूर्व कॉन्ग्रेस नगरपालिका पार्षद इशरत जहाँ को गाजियाबाद और महाराष्ट्र में अन्य रिश्तेदारों से संदिग्ध मार्ग से फंड मिला था। इशरत को दिल्ली पुलिस ने मार्च में दिल्ली दंगों के मामले में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

कोरोना वायरस की महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण खालिद सैफी और इशरत जहाँ की पूछताछ अभी लंबित है। इसके अलावा, जाँच से यह बात भी सामने आई है कि खालिद सैफी को दंगों के लिए सिंगापुर के एक एनआरआई खाते के माध्यम से फंड मिला था।

यह धन भारत में एक एनजीओ को हस्तांतरित किया गया था जो उमर खालिद और उसके मेरठ के किसी पार्टनर द्वारा संचालित था, जो वर्तमान में कोरोना वायरस के चलते क्वारंटाइन है। सिंगापुर के एनआरआई की पहचान करने के लिए जाँच जारी है।

पुलिस को खालिद सैफी के मोबाइल फोन से पैसों के बारे में और जानकारी मिलने की उम्मीद है। बताया जा रहा है कि खालिद सैफी के मोबाइल डेटा की जाँच बहुत जरूरी है।

खालिद सैफी के पासपोर्ट से पता चला है कि दिल्ली दंगों की फंडिंग के लिए जाकिर नाइक जैसे कई लोगों से मुलाकात करने के लिए उसने कई देशों की यात्रा की थी।

आरोपित इशरत जहाँ और खालिद सैफी को सिंगापुर, सऊदी अरब सहित विदेशों और पीएफआई से बेहिसाब फंड मिला था।

सऊदी अरब सहित भारत के भी कई हिस्सों से आया था फंड

दिल्ली पुलिस ने अदालत में पेश जाँच रिपोर्ट में कहा है कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के लिए सऊदी अरब और देश के अलग-अलग हिस्सों से भी फंडिंग आई थी। पुलिस का कहना है कि दिल्ली में दंगे सुनियोजित साजिश और योजना के परिणामस्वरूप भड़के थे और यह अचानक नहीं था।

इससे पहले ही दिल्ली पुलिस ने एक स्थानीय अदालत को बताया था कि गवाहों से पूछताछ से यह पता चला कि दिल्ली दंगों की साजिश में आरोपित शिफा उर रहमान को मध्य-पूर्व के देशों में स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया के पूर्व छात्र संघ के सदस्यों से फंड मिला था। इसके बाद पटियाला हाउस कोर्ट ने गिरफ्तार किए गए जामिया के पूर्व प्रेजिडेंट शिफा उर रहमान को 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था।

पुलिस ने कहा कि रहमान का नाम इशरत जहाँ, खालिद सैफी, मीरान हैदर, सफूरा जरगर, गुल्फ़ीशा खातून, ताहिर हुसैन और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के तीन सदस्यों से पूछताछ के दौरान सामने आया था।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अदालत से दिल्ली हिंसा की तह तक पहुँचने के लिए और आरोप-पत्र दाखिल करने के लिए समय माँगा है। पुलिस ने कहा कि कोरोना वायरस के कारण जारी देशव्यापी लॉकडाउन के कारण जाँच में देरी हुई है।

गौरतलब है कि इसी साल की शुरुआत में 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दो दिवसीय दौरे पर भारत आए थे। उनके दौरे के दौरान ही उत्तरी-पूर्व दिल्ली में दंगे भड़क गए थे। दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल, आईबी अफसर अंकित शर्मा की दंगाइयों ने जान ले ली थी।

दंगों में 53 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। पुलिस अलग-अलग मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच कर रही है। अब तक दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में 1300 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

जातिवाद के लिए मनुस्मृति को दोष देना, हिरोशिमा बमबारी के लिए आइंस्टाइन को जिम्मेदार बताने जैसा

अमेरिका के एक गोरे पुलिस ऑफिसर डेरेक शाविन ने 46 वर्षीय अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की निर्मम हत्या कर दी और अमेरिका #BlackLivesMatter की माँग के साथ भड़क उठा। विरोध की आग इतनी भड़की कि कोलंबस और वास्कोडिगामा की मूर्तियों को भी इस आधार पर ध्वस्त किया गया कि इनकी खोजों की वजह से ही दास व्यापार का रास्ता खुला। 

इसी की तर्ज पर भारत की जाति व्यवस्था के लिए महर्षि मनु को दोषी ठहराकर उनका बहिष्कार करने और उनकी मूर्तियों को भंग करने की अपील की जाने लगी। 

कोलंबस और वास्कोडिगामा को दास व्यापार के लिए और मनु को जाति व्यवस्था के लिए दोषी ठहराना ऐसा ही है, जैसे आइंस्टाइन को हिरोशिमा-नागासाकी पर बम बरसाने के लिए उत्तरदायी ठहराना। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके खोजे फॉर्मूला का इस्तेमाल करके इसे बनाया गया। 

हम सब जानते हैं कि आइंस्टाइन परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के सख्त विरोधी थे। इसलिए परमाणु हमलों की तोहमत उनके सर नहीं मढ़ी जाती और इसलिए भी कि वो अपना दृष्टिकोण रखने के लिए उस समय जीवित थे। काश महर्षि मनु के साथ भी ऐसा ही होता। 

यद्यपि महर्षि मनु हर रचनाकार की तरह अपनी मनुस्मृति के माध्यम से जीवित हैं, किंतु दुर्भाग्य से रामायण-महाभारत-पुराण आदि की तरह मनुस्मृति भी बेशुमार प्रक्षेपों का शिकार हुई है। इन प्रक्षेपों की पहचान होती है इन्हीं ग्रंथों के अंत:साक्ष्यों से। जैसे भारत के संविधान में कोई भी संशोधन संविधान की मूल भावना को दरकिनार करके नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होता है तो उसकी न्यायिक पुनरीक्षा होगी। वैसे ही किसी भी ग्रंथ में यदि ऐसा परिवर्तन होता है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। ये समीक्षा दुराग्रह रहित विषय विशेषज्ञों की अदालत ही कर सकती है। 

मनुस्मृति पर इस तरह का काम हुआ भी है। गुरुकल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेन्द्र कुमार एवं संस्कृत शास्त्रों के उद्भट विद्वान आचार्य राजवीर शास्त्री के गहन शोध से विशुद्ध मनुस्मृति का प्रकाशन हुआ। इस लेख में सभी उद्धरण मनुस्मृति के इसी संस्करण से लिए गए हैं। 

इन प्रक्षेपों के लिए कौन उत्तरदायी है? निश्चित रूप से वही जिसको इससे लाभ हो। भ्रष्ट आचरण बड़ी सहजता से हर जगह अपनी पैठ बना लेते हैं। मनुस्मृति जब दंड व्यवस्था का आधार बनने लगी तो प्रभावशाली लोगों ने उसके पर कतरने शुरू कर दिए और इच्छानुरूप मिलावटें शुरू हो गईं। कानून का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं। 

क्या वह मनु ब्राह्मण के लिए आडंबरयुक्त जीवन शैली का उपदेश कर सकता है जिस मनु ने ब्राह्मण के लिए यह नीति वचन लिखा-

सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा।। (मनु.-२.१६२)

अर्थात् ब्राह्मण को सम्मान से वैसे ही परहेज करना चाहिए जैसे कोई विष से परहेज करता है। इसके विपरीत अपनी अवमानना की कामना इतनी उत्सुकता से करनी चाहिए मानो कोई अमृत मिलने वाला हो। ये उसकी मन:साधना के उपाय के रूप में निर्देशित किया गया है। इसे इससे अधिक सख्त तरीके से नहीं कहा जा सकता था। अब आप इस निर्देश को कालांतर में हुए दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तनों से तोल कर देखें और सोचें कि क्या मनु ब्राह्मण समाज के उस आडंबरपूर्ण आचरण के प्रवर्तक हो सकते हैं? 

जहाँ तक वर्णों के बीच भेदभाव पूर्ण आचरण की बात है, मनुस्मृति के इस विधान को देखें-

अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य च।। (मनु.-८.३३७)

ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वापि शतं भवेत्।
द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स: ।। (मनु.-८.३३८)

इसका अर्थ है कि चोरी करने पर शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा, ब्राह्मण को चौंसठ गुणा, सौ गुणा या एक सौ अट्ठाईस गुणा दंड हो। यानी जिसका जितना ज्ञान और जितनी अधिक प्रतिष्ठा हो, उसको उतना ही अधिक दंड होना चाहिए। क्या यह विशेषाधिकार की कोटि में आएगा?  

इसके बावजूद वर्तमान जाति व्यवस्था के लिए मनु को जिम्मेदार ठहराया जाता है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जाति नहीं वर्ण का जिक्र है और उनका मूल वेद हैं, मनुस्मृति मूल नहीं है।

मनु स्वयं कहते हैं- ‘स महाद्युति: पृथक्कर्माण्यकल्पयत्’ अर्थात् उस महातेजस्वी परमात्मा ने वर्णों के पृथक्-पृथक् कर्म बनाए। इसलिए मनु वर्ण व्यवस्था के प्रवर्तक नहीं हैं। उन्होंने तो बस वेद की बात को आगे बढ़ाया। अपने मन से कुछ नहीं कहा।

ऐसे में जातिप्रथा का आरोप मनु पर लगाना उतना ही हास्यास्पद है, जितना साइबर अपराधों के लिए चार्ल्स बैबेज को जिम्मेदार ठहराना (बशर्ते कोई इतनी बेवकूफी करे)। 

मनु ने शूद्रों से पढ़ने का हक़ छीन लिया, यह एक व्यापक आरोप है। मनु ने उनका हक़ नहीं छीना बल्कि जो अवसर मिलने पर भी पढ़ नहीं पाए वो शूद्र कहलाए। मनु के कहने से नहीं, परंपरा से या वेद आधारित समाज व्यवस्था से। तैत्तिरीय ब्राह्मण का वचन है- ‘असतो वा एष संभूतो यत् शूद्र:’ अर्थात् (अनिच्छा या असामर्थ्य किसी भी वजह से) असत: यानी अज्ञान के कारण शूद्र इस स्थिति में है।

स्पष्ट है कि उसे इस दशा में रहने के लिए किसी ने मजबूर नहीं किया है। वो जब चाहे इससे बाहर आ सकता है, योग्यता अर्जित कर सकता है, अन्यों की सेवा करके आजीविका चलाना उसकी जन्मजात मजबूरी नहीं है। ये तो ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब…’ की लोकोक्ति से अलग कुछ है ही नहीं। रही बात शूद्रों के साथ भेदभाव भरे व्यवहार की तो वेद या मनुस्मृति में शूद्र का शोषण करने या उसे अस्पृश्य मानने का कोई आधार नहीं है। वेदों में शूद्र को यज्ञ करने का विधान है- 

पञ्चजना: मम होत्रं जुषध्वम्। (ऋग्वेद-१०.५३.४-५)

निरुक्तकार के अनुसार- ‘पञ्चजना: – चत्वारो वर्णा:, निषाद: पंचम इति औपमन्यव:। (निरुक्त-३.२.७)’। इस प्रमाण से यहाँ ‘पञ्चजना:’ का अर्थ है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निरामिषभोजी निषाद। यज्ञ करने का निर्देश इन सबको है। इसलिए वैदिकी व्यवस्था में भेदभाव या छुआछूत का कोई स्थान नहीं।

एक आरोप है कि मनु ने शूद्र और स्त्रियों को बोलने का अधिकार नहीं दिया। यदि किसी श्लोक में ऐसा वर्णित है तो वो उसके प्रक्षिप्त होने, यानी बाद में जोड़े जाने का स्पष्ट प्रमाण है, क्योंकि एक तो मनु जिन वेदों को प्रमाण मान कर प्रवृत्त हो रहे हैं वो स्वयं शूद्रों और अतिशूद्रों को भी वेद पढ़ने का अधिकार देते हैं। यानी वेद की दृष्टि में वेदाध्यन के लिए सिर्फ मनुष्य होना योग्यता है- 

‘यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:। 
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय..।। (यजु.-२६.२)  

दूसरा स्वयं मनुस्मृति में भी शूद्र के लिए कहा गया है-

‘उत्कृष्टां जातिमश्नुते।‘ (मनु.-९.३३५) 

वह उत्कृष्ट जन्म या द्विजत्व को पा लेता है। इस तरह शूद्र को उत्कृष्ट वर्ण की प्राप्ति का अधिकारी मानना ही यह दर्शाता है कि उसे वेदादि शास्त्र पढ़ने का अधिकार है, क्योंकि न पढ़ने के कारण ही वह शूद्रत्व को प्राप्त हुआ था।

एक आरोप है कि मनु ने स्त्रियों से बोलने और पढ़ने का अधिकार छीन लिया। चलिए देखते हैं मनुस्मृति क्या कहती है- 

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्म: शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वत: ।। (मनु.-२.२४०)

स्त्रियाँ नाना प्रकार के रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, श्रेष्ठ भाषण और विविध शिल्पविद्या सब देश तथा सब मनुष्यों से ग्रहण करें। बोलने के अधिकार के बिना विद्या की प्राप्ति और सुभाषित जिसका अर्थ ही है बोलना, क्या संभव हैं?

इसके अतिरिक्त ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ जैसे कितने ही अन्य श्लोक हैं, जो स्त्रियों का महिमा मंडन करते हैं। जहाँ तक स्त्रियों को पुरुषों के संरक्षण में रखने की बात है, वो उनकी सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है। यद्यपि बहुत सी नारियाँ बहुत वीरांगनाएँ हुई हैं और अभी भी हैं किंतु यह सामान्य बात नहीं है। महिलाओं में शारीरिक बल आमतौर पर पुरुषों से कम होता है, इसलिए अधिकाँश महिलाएँ अपनी सुरक्षा पूरी तरह से नहीं कर पाती। हम देखते हैं कि ये बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इसलिए इस विषय में मनुस्मृति की दृष्टि व्यावहारिक ही है। किंतु किसी भी प्रसंग में प्रक्षिप्त खंडों का कोई समर्थन नहीं है।

मनु ने शूद्र के अतिरिक्त तीनों वर्णों को द्विज कहा है और शूद्र को एकजाति। द्विज यानी जिसका दोबारा जन्म होता है, एक बार माता की कोख से और दूसरा विद्याध्ययन से परिष्कृत व्यक्तित्व का जन्म। इस दूसरे जन्म के लिए विद्यार्थी विद्याध्यन के लिए गुरुकुल में जाता था, जहाँ उसका उपनयन और वेदारम्भ संस्कार होता था और इसके साथ ही विद्याध्यन का शुभारम्भ हो जाता था।

मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय में उपनयन के समय का उल्लेख करते हुए मनु कहते हैं कि जो ब्रह्मवर्चसकाम हैं, यानी जिनको ईश्वर और विद्या की शीघ्र प्राप्ति की इच्छा है, ऐसे माता-पिता अपने बच्चे का उपनयन संस्कार पाँचवें वर्ष में करा लें। जो बलार्थी यानी बल की कामना वाले हैं, अपने बालक को क्षत्रिय बनाना चाहते हैं, वे छठे वर्ष में तथा जो अर्थी यानी धन की कामना वाले हैं, उन्हें आठवें वर्ष में बालक का उपनयन कराना चाहिए। 

इस निर्धारित समय में जिनका उपनयन नहीं हो पाता उन्हें पढ़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया गया है, बल्कि उपनयन की समय सीमा को पर्याप्त रूप से बढ़ाया गया है और सभी को जब जागे तभी सवेरा का बहुमूल्य अवसर प्रदान किया गया है। इस अंतिम समय सीमा के अनुसार ब्राह्मण वर्ण के इच्छुक अभ्यर्थी को सोलह वर्ष तक, क्षत्रियत्व की कामना वाले को बाइस वर्ष तथा वैश्यवर्ण के इच्छुक को चौबीस वर्ष की आयु तक भी उपनयन कराकर अध्ययन का अवसर प्रदान किया गया है।

इस तरह विद्या रुपी माता जब उन्हें दूसरा जन्म देती है तो वे द्विज बन जाते हैं। जिन्हें इनमें से किसी भी वर्ण की कामना नहीं है, उनका उपनयन संस्कार ही नहीं होता और इस तरह वो द्विज की बजाय एकजाति यानी एक बार जन्म वाले शूद्र कहलाते हैं। फिर चाहे वो ब्राह्मण के घर पैदा हुआ हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र किसी के भी।

एक बार द्विज बनने के बाद भी किसी का स्थान स्थायी रूप से पक्का नहीं है। जो अपने वर्ण के निर्धारित कर्मों को नहीं करते उनका वर्ण परिवर्तित भी हो जाता है और वो निचले वर्णों को प्राप्त हो जाते हैं। बस इतनी राहत की बात है कि साँप-सीढ़ी के इस खेल में पासे आपकी मर्जी से डलेंगे-

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वय: ।। (मनु.-२.१६८)

अर्थ यह कि जो द्विज वेदाध्ययन न करके अन्यत्र श्रम करते हैं, वे जीते-जागते अपने परिवार सहित शूद्रपन को प्राप्त हो जाते हैं। जब परिवार का मुखिया ही वेद विमुख है तो संतति से और क्या अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें अध्ययन का अवसर मिलना भी मुश्किल है, क्योंकि अध्ययन के लिए उपनयन तो माता-पिता को ही कराना है। ऐसा ही एक दूसरा प्रसंग है, जहाँ कर्मानुसार वर्ण परिवर्तन की बात कही गई है-

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।। (मनु.-१०.६५)

शूद्र ब्राह्मण और ब्राह्मण शूद्र हो जाता है। गुण-कर्मानुसार ब्राह्मण या तो ब्राह्मण ही रह सकता है या फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के गुणों वाला हो तो वो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाता है। वैसे ही शूद्र भी यदि उत्तम गुणयुक्त हो तो यथायोग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। ऐसा ही क्षत्रिय और वैश्य के विषय में है। 

इसके उलट यदि मनु के नाम पर कुछ भी प्रचलित है तो वो झूठ है, क्योकि मनु ने स्वयं वेदों को प्रमाण माना है और इस विषय में वेद का मत हम पहले ही देख चुके हैं, जहाँ उन्हें यज्ञ अनुष्ठान करने और वेदों को पढ़ने का अधिकार दिया गया है। इसलिए शूद्रों और स्त्रियों को बोलने के अधिकार से वंचित रखने का आरोप बिल्कुल गलत है।

मनुस्मृति में शूद्र के कर्तव्य वर्णित हैं-

एकमेव तु शूद्राय प्रभु: कर्म समादिशत्।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।। (मनु.-१.९१)

प्रभु ने शूद्र यानी जो अधिक पढ़ा-लिखा नहीं है या जिसमें अध्ययन जन्य अन्य कुशलताओं का अभाव है, उसके लिए बाकी वर्णों की सेवा का कार्य निर्धारित किया है। अब इस बात में आपको याद रखना पड़ेगा कि इसमें कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का बेटा भी हो सकता है, जो पढ़ नहीं पाया।

किंतु हमारे पूर्वाग्रहों का आलम यह है कि इस बात पर उन लोगों को भी आपत्ति होती है, जिनके कार्यालय में एक व्यक्ति अधिक पढ़ा-लिखा न होने की वजह से चपरासी या सफाई कर्मचारी का कार्य करता है। या कहीं वो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी कहाता है और हम सवाल उस मनु पर उठाते हैं, जिसने शूद्र को शुचि: अर्थात् पवित्र कहा, अछूत नहीं।

इसके अतिरिक्त आप व्हाइट से लेकर ब्लैक कॉलर जॉब्स तक सारा वर्गीकरण देख सकते हैं, जो किसी दुर्भावना से नहीं किया गया। इसलिए वर्गीकरण सदा आपत्तिजनक नहीं हैं। चारों वर्ण इसी प्रकार के विद्वेष रहित वर्गीकरण थे, जो कालांतर में दोषयुक्त हो गए। इसमें मनु का कोई दोष नहीं है। 

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में व्यक्ति की प्रतिष्ठा का आधार गुणों को माना गया है, जन्म को नहीं-

वित्तं बन्धुर्वय: कर्म विद्या भवति पंचमी।
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्।। (मनु.-२.१३६)

धन, बंधुत्व, आयु, कर्म, विद्या ये सभी प्रतिष्ठा के आधार हैं और उत्तरोत्तर अधिक वजनदार हैं।

वर्ण व्यवस्था को जन्म की बजाय कर्म पर आश्रित सिद्ध करने के लिए सीधे शब्द प्रमाणों के अलावा अन्य संकेत भी हैं। जैसे मनु ने वर्णों के विभाजन का कारण बताते हुए कहा- ‘लोकानां विवृद्ध्यर्थम् (मनु.-१.३१)’ समाज की वृद्धि के लिए और दूसरा वर्णों के कर्म-निर्धारण का कारण कारण बताते हुए कहा- ‘सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थम् (मनु.-१.१८७)’ इस समस्त जगत की सुरक्षा के लिए कर्मों का निर्धारण आवश्यक है।

इसके लिए व्यक्ति में उन कर्मों की योग्यता का होना आवश्यक है अन्यथा समाज की वृद्धि और संसार की रक्षा न तो सिर्फ उच्च कुल में पैदा होने मात्र से होगी न आरक्षण से। इन कर्तव्यों को करने के सामर्थ्य से ही होगी। यदि जन्म के आधार पर वर्ण होते तो कर्मों के निर्धारण की क्या आवश्यकता थी? 

बाबा साहेब आंबेडकर ने किसी पुस्तक में आक्रोश में मनु और वेदों की भर्त्सना की। इसलिए हम भी वही मानेंगे, चाहे वो शास्त्र का भाव हो या न हो तो यह भी एक दुराग्रह है। अगर आप बाबा साहेब के वाक्य को ब्रह्म वाक्य मानते हैं, उससे टस से मस नहीं हो सकते तो कुछ लोग वेद और मनु को प्रमाण मानते हैं। फिर आपको आपत्ति क्या है? 

अंबेडकर विधिवेत्ता थे, कानून के प्रामाणिक विद्वान थे। इसलिए संविधान के निर्माण में उनके महत्वपूर्ण योगदान को भूरिश: नमन। किंतु कोई भी व्यक्ति सर्वज्ञ होने का दावा नहीं कर सकता। वेदों की व्याख्या के लिए या उसका अभिप्राय बताने के लिए शास्त्रीय योग्यता के अतिरिक्त व्याख्याता को सर्वहितकारी, निष्पक्ष ऋषितुल्य होना चाहिए।

इस योग्यता के बिना जब-जब वेदों का अर्थ किया गया है, अनर्थ ही हुआ है। एक प्रामाणिक व्याख्या के उदाहरण के रूप में आधुनिक युग के भाष्यकारों में महर्षि दयानंद एवं कुछ अन्य विद्वानों के भाष्य को देखा जा सकता है। सार्वभौम, शाश्वत और सनातन प्रगतिशीलता के द्योतक वेदों पर निराधार आरोप लगाना तो उल्टा आरोपकर्ता की समझ पर ही सवाल खड़े करता है। 

गलत व्याख्या तो संविधान की भी की जा सकती है। ऐसी व्याख्या जो संविधान निर्माताओं की विवक्षा के खिलाफ हो, उन्हें अभीष्ट न हो, लेकिन हम सदा संविधान की मूल भावना को सामने रख कर की गई व्याख्या को ही सर्वोपरि और उचित मानते हैं। इसी तरह वेदों की भी सभी व्याख्याएँ स्वीकार्य नहीं हैं। ऊपर दिए गए वेदों के प्रमाणों में जब साफ़-साफ़ शब्दों में शूद्र को बोलने-पढ़ने का अधिकार दिया गया है तो उससे विपरीत व्याख्या कैसे स्वीकार हो सकती है? 

तोड़-मरोड़ कर व्याख्या करना तो चोरों और अपराधियों का काम है। इसलिए जिसने भी वेदों की विपरीत व्याख्या की या मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में प्रक्षेप किया, उन्होंने अपने शास्त्र विरुद्ध कारनामों को शास्त्र सम्मत ठहराने का षड्यंत्र किया। आंबेडकर ने ऐसे ही किसी अनर्थकारी व्याख्याता का अनुगमन किया होगा, वर्ना ये संभव नहीं था, क्योंकि आंबेडकर नि:संदेह विद्वान व्यक्ति थे और विद्वान कभी पूर्वाग्रही नहीं होता।

इसलिए हम सब भी मनु या वेदों के नाम पर हो रहे दुष्प्रचार को यूँ ही स्वीकार न करें। उनको निष्पक्षता और सत्य के आग्रह के साथ फिर से जाँचें। वेद ही सर्वप्रथम ऐसे ग्रंथ हैं, जिनकी शिक्षाएँ और विधान पूर्णत: धर्मनिरपेक्ष हैं और सम्पूर्ण मानवता को संबोधित करके कहे गए हैं। 

चलिए मनुस्मृति के एक सुभाषित के साथ इस चर्चा को विराम दिया जाए-

फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति।। (६.६७)

रीठा यद्यपि जल को शुद्ध करता है, फिर भी उसका नाम लेने मात्र से जल शुद्ध नहीं हो जाता। उसे पीस कर जल में डालने से ही उसकी शुद्धि होती है। वैसे ही व्यक्ति के नाम या उपाधियों के बाहरी दिखावे से ही श्रेष्ठ फल नहीं मिलता, अपितु तदनुकूल आचरण से मिलता है।