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‘सिंथिया रिची के साथ सेक्स करना चाहते थे इमरान खान, दिया था ऑफर’: अमेरिकी ब्लॉगर के करीबी का खुलासा

अमेरिकी ब्लॉगर सिंथिया रिची के करीबी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पर बड़ा आरोप लगाया है। अली सलेम उर्फ़ बेगम नवाज़िश अली ने कहा कि उनसे बातचीत के दौरान सिंथिया ने आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि वो सिंथिया के काफी करीब थे और एक साथ एक कमरे में भी रह चुके हैं। उसी दौरान सिंथिया रिची ने उन्हें इमरान खान वाली बात बताई। उन्होंने कहा कि रहमान मलिक द्वारा उनका बलात्कार किए जाने की बात सिंथिया ने उन्हें नहीं बताई थी।

इसी दौरान उन्होंने कहा कि इमरान खान ने सिंथिया को उनके साथ सेक्स करने का ऑफर दिया था, ये बात सिंथिया रिची ने उन्हें खुद बताई थी। उन्होंने कहा कि रहमान मलिक के लिए उनके मन में कोई सहानुभूति का भाव नहीं है क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों की हत्या के दौरान वही उनके सिक्यूरिटी इंचार्ज थे और आसिफ अली ज़रदारी ने सत्ता में आने के बाद उन्हें इंटीरियर मिनिस्टर बना दिया। उन्होंने कहा कि सिंथिया ने उन्हें रहमान मलिक के बारे में कुछ नहीं कहा था।

एक फेसबुक लाइव सेशन के दौरान सिंथिया ने आरोप लगाया था कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के दौरान ही रहमान मलिक ने उनका बलात्कार किया था। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मकदूम शहाबुद्दीन पर भी उनके यौन शोषण का आरोप मढ़ा था। उन्होंने बताया कि जब वो प्रेसिडेंट हाउस में रुकी थीं, तभी गिलानी ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया था। हालाँकि, गिलानी ने इन आरोपों से इनकार किया है।

पाक के पूर्व पीएम ने कहा कि सिंथिया बेनजीर भुट्टों पर भी आरोप लगा चुकी हैं कि वो अपने गार्ड्स द्वारा महिलाओं का बलात्कार करवाती थीं। गिलानी के बेटों ने सिंथिया के खिलाफ अदालत में जाने का निर्णय लिया है। गिलानी ने कहा कि पार्टी के साथ विचार-विमर्श करने के बाद वो कोर्ट जाएँगे। वहीं अली सलेम ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि जब सिंथिया उनसे इमरान खान वाली बात शेयर कर सकती हैं तो उन्होंने रहमान मलिक के बारे में क्यों नहीं बताया?

सिंथिया डी रिची ने शनिवार (जून 06, 2020) सुबह कुछ ट्वीट किए थे। इनमें लिखा है,

“पीपीपी नेता मेरे खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। रेप कल्चर बंद होना चाहिए। महिलाएँ एकजुट हों और बच्चों को इस घृणित काम के बारे में जानकारी दें। वैसे यह सिर्फ पीपीपी का मामला नहीं है। कई सियासी पार्टियों ने मेरा शोषण किया। मैंने कभी परिवार को भी इन घटनाओं के बारे में नहीं बताया। मैंने हमेशा पाकिस्तान की एक सॉफ्ट इमेज बनाने के लिए मेहनत की। हालाँकि, मेरे अधिकांश मामलों में, जिनमें से दो का उल्लेख नहीं किया गया है, वे या तो PK लॉबिस्ट थे या 2 टियर पीपीपी।”

अमेरिकी ब्लॉगर सिंथिया रिची कथित तौर पर सोशल मीडिया पर पीपीपी नेताओं की निंदनीय तस्वीरें भी साझा कर रही हैं। सिंथिया, जो एक फिल्म निर्माता, पत्रकार और ब्लॉगर हैं, ने हाल ही में पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को निशाना बनाकर विवाद खड़ा कर दिया था

राजस्थान: सदस्यता अभियान के नाम पर हड़पे करोड़ों रुपए, यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित चार पर FIR दर्ज

राजस्थान जोधपुर के भोपालगढ़ थाने में यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास समेत चार पदाधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया गया है। रामचंद्र जलवानिया की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में श्रीनिवास के साथ यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी कृष्णा अलावरू, तरुण त्यागी और यूथ कॉन्ग्रेस चुनाव के प्रदेश रिटर्निंग ऑफिसर रहे जगदीश संधू के खिलाफ भी केस दर्ज कराया गया है।

जानकारी के मुताबिक भोपालगढ़ थाने में गुरुवार (04 जून, 2020) रामचन्द्र जलवानिया की ओर से कराई गई एफआईआर में चारों पदाधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। एफआईआर में कहा गया है कि इनके पदाधिकारियों की बातों में आकर पूरे प्रदेश में युवाओं ने 5 लाख सदस्य बनाए। इतना ही नहीं सदस्यता से करीब 6 करोड़ 25 लाख रुपए प्राप्त भी किए गए।

थाना प्रभारी राजेन्द्र खदाव ने बताया कि कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय यूथ कॉन्ग्रेस की कार्यकारिणी के पदाधिकारियों पर रुपए हड़पने का आरोप लगाकर मामला दर्ज करवाया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी है।

जानकारी के मुताबिक 22 और 23 फरवरी को हुए ऑनलाइन चुनाव के बाद 3 मार्च को जारी परिणाम एक महीने बाद यानि कि 7 अप्रैल को ही बदल दिए गए थे। पहले अध्यक्ष पद पर सुमित भगासरा को 46304 वोट और मुकेश भाकर को 23349 वोट और अमर दिन फकीर को 16720 वोट प्राप्त हुए थे, लेकिन बाद में वर्तमान विधायक मुकेश भाकर को विजयी घोषित कर दिया गया।

चौंकाने वाली बात यह कि चुनावी परिणामों के 35 दिन बाद ही बदल दिए गए थे। दरअसल कॉन्ग्रेस विधायक और इस चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के पद सुमित भगासरा से शिकस्त खाने वाले मुकेश भाकर ने वोटिंग में हैकिंग का दावा किया है।

विधायक के इन दावों के बाद यूथ कॉन्ग्रेस के चुनावी नतीजों बदल दिए गए। 35 दिन तक यूथ कॉन्ग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रहे सुमित को संगठन ने हटा दिया। उनकी जगह अब मुकेश भाकर को विजयी घोषित किया गया है।

‘इंशाल्लाह! अबकी प्रदर्शन और हिंसक होगा’: बैंकर ‘अफसार भाई’ साथियों संग रच रहा अमेरिका की तर्ज पर दंगे की साजिश

सोशल मीडिया में कई लोग ऐसी चर्चा कर रहे हैं कि अब जब कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव और सुरक्षा के बिच ऐहतियात बरतते हुए जहाँ संक्रमण नहीं है वहाँ आम गतिविधियों के लिए धीरे-धीरे लॉकडाउन खुल रहा है, ऐसे में दूसरे शाहीन बाग़ के लिए लोगों को भड़काया जाना शुरू हो गया है। इसी क्रम में ‘द क्विंट’ ने हजारों भड़काऊ मेल्स भेजे थे। अब ‘अफसार भाई’ नामक एक व्यक्ति द्वारा लखनऊ में एक हिंसक प्रदर्शन व दंगे की तैयारी करने की बात भी सामने आ रही है। बता दें कि लखनऊ में घंटाघर के सामने पहले भी प्रदर्शनकारी जमे थे।

अफसार के प्रोफाइल के अनुसार, वो ‘बैंक ऑफ बड़ौदा’ का कर्मचारी है। सुनैना विनोद नामक महिला ने फेसबुक पर उसके द्वारा रची जा रही साजिश का स्क्रीनशॉट लेकर शेयर किया और यूपी पुलिस को टैग कर के कार्रवाई करने की माँग की। अफसार फेसबुक और ट्विटर, दोनों ही सोशल मीडिया माध्यमों पर सक्रिय है। अमेरिका में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ को लेकर हो रहे दंगों की तर्ज पर भारत में भी कुछ ऐसा ही करने की साजिश रची जा रही है।

फेसबुक पर एक कमेन्ट में अफसार ने लिखा, “अमेरिका ने कुछ हमसे सीखा है। अब हम अमेरिका से कुछ सीखते हैं’। प्रोटेस्ट 2.0 जबरदस्त होना चाहिए।” उसे जवाब देते हुए शाकिब आलम नामक व्यक्ति ने लिखा, “बिलकुल। और ये सबसे ज्यादा शक्तिशाली और हिंसक होगा। इंशाल्लाह।” अफसार ट्विटर पर ख़ुद को ‘बड़ौदियन’ भी बताता है क्योंकि वो उसी बैंक में कार्यरत है। लोगों ने ‘बैंक ऑफ बड़ौदा’ से उसे निकाल बाहर करने की माँग की है।

अफसार के फेसबुक प्रोफाइल से पता चलता है कि वो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का रहने वाला है। सोशल मीडिया पर उसके बारे में चर्चा शुरू होने के बाद उसने अपने फेसबुक प्रोफाइल को लॉक कर दिया है, ताकि कोई उसके पोस्ट्स न देख पाए और कमेंट्स न पढ़ पाए। वहीं उसके ट्विटर प्रोफाइल की बात करतें तो वो वहाँ भी भड़काऊ ट्वीट्स करता रहता है। वह बैंकरों का वेतन बढाने की माँग करते हुए सरकार पर अन्याय का आरोप भी लगाता है।

बता दें कि अमेरिका में हो रही हिंसा के बाद भारत में फिर से शाहीन बाग़ और सीएए प्रोटेस्ट को हिंसक बनाने हेतु इसके दूसरे चरण की तैयारी की जा रही है। इसमें कई पत्रकारों से लेकर लिबरल तक शामिल हैं, जो आए दिन सोशल मीडिया पर लोगों को भड़काते रहते हैं। फिलहाल दंगा आरोपित सफूरा ज़रगर के गर्भवती होने का बहाना बना कर अदालत से लेकर गृह मंत्रालय तक पर निशाना साधा जा रहा है। हिंसा की साजिश रची जा रही है।

वो मंदिर भी जाएगा, पूजा भी करेगा: ‘द जज’ के निर्देशक से जानिए ‘लव जिहाद’ पर फिल्म बनाने की वजह

भारत में ‘लव जिहाद’ की घटनाएँ किसी से छिपी नहीं हैं। हाल ही में लुधियाना की एक युवती की हत्या का खुलासा हुआ, जिसे शाकिब नामक युवक ने अमन बन कर फाँस लिया था और बाद में पूरे परिवार ने मिल कर निर्ममता से लड़की की हत्या कर दी। ऐसी घटनाएँ आए दिन होती हैं। ऐसे में जीतू आरवमुधन ने ‘स्वराज्य मैग’ में एक लेख लिख कर बताया है कि उन्होंने लव जिहाद पर ‘द जज’ नामक फिल्म क्यों बनाई। इसके पीछे क्या उद्देश्य था?

उन्होंने लिखा है कि जहाँ एक तरफ सरकारें और मीडिया ये दिखाना चाहती है कि ऐसी कोई समस्या का अस्तित्व ही नहीं है, देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हिन्दुओं, ईसाईयों और सिखों को पता है कि लव जिहाद क्या होता है। ये सबसे ज्यादा केरल की ईसाई लड़कियों को इस्लाम में कन्वर्ट कराने के कारण हुआ, इसीलिए माना जाता है कि शब्द केरल से ही आया। जीतू लिखते हैं कि इतनी बड़ी समस्या होने के बावजूद हिन्दू इसके बारे में बात करने से कतराते हैं।

वो ‘स्वराज्य मैग’ में लिखते हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी रही है कि हिन्दू छात्र ख़ुद के समाज को लेकर ही हीन भावना से ग्रसित हो जाती है। साथ ही उन्होंने लिखा है कि बॉलीवुड की ‘गांजा जमुनी तहजीब’ के साथ-साथ जिस तरह से सरकारें हर एक व्यक्ति पर कथित सेकुलरिज्म थोपना चाहती है, इससे इस प्रकार के नैरेटिव को बढ़ावा मिला। वो लिखते हैं कि चूँकि अब कई हिन्दू इसे लेकर जागरूक हैं, ‘द जज’ में लव जिहाद से जुड़े कई पैटर्न्स पर गौर किया गया।

इस समस्या के बारे में जीतू ने कुछ ट्रेंड्स की ओर इशारा किया है। उनका कहना है कि दूसरे समुदाय के युवक ख़ुद को हिन्दू दिखाने के लिए कुछ भी करते हैं, मंदिरों में जाने और पूजा करने का दिखावा भी करते हैं। निकाह के बाद वो सच्चाई खुलने पर ख़ुद को सच्चा मजहबी बताते हैं और कहते हैं कि उन्हें सभी की भावनाओं का सम्मान है। इसके बाद वो और शादियाँ करने लगते हैं क्योंकि इस्लाम में इसकी अनुमति है।

देखें लव जिहाद पर बनी फिल्म ‘द जज’

जीतू लिखते हैं कि इसके बाद का ट्रेंड ये है कि सामुदाय विशेष का परिवार हिन्दू महिला को प्रताड़ित करना शुरू कर देता है और फिर दिखावटी मॉडर्निटी हवा हो जाती है बात-बात में शक करने की प्रक्रिया शुरू होती है और फिर अंत में हिन्दू महिला को मार डाला जाता है। वो लिखते हैं कि अधिकतर मामलों में तो समुदाय विशेष का पुरुष पहले से ही शादीशुदा होता है। वो लिखते हैं कि इस्लाम में उम्माह के जिस कॉन्सेप्ट को वो मानते हैं, उसके अनुसार हिन्दू महिलाओं को काफिर माना जाता है और उनके साथ दासी की तरह व्यवहार करने का प्रावधान है।

वो लिखते हैं कि ‘द जज’ में लिबरलों के रिएक्शन के बारे में बताया गया है। उनका कहना है कि इस फिल्म में वही दिखाया गया है, जिसे ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ के चक्कर में दशकों से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। इस फिल्म के लिए कई लोगों ने डोनेशन दिया है और इसे काफी कम बजट में तैयार किया गया है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस तरह की और समस्याओं के बारे में फ़िल्में बनेंगी और मुद्दों को उठाया जाएगा।

पालघर पर चुप रहने वाले, फेयरनेस क्रीम का प्रचार करने वाले ‘ब्लैक लाइव्स’ पर ज्ञान बाँच रहे: कंगना रनौत

अभिनेत्री कंगना रनौत ने बॉलीवुड के सेलेब्रिटीज और मशहूर हस्तियों को अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन पर बोलने, जबकि पालघर में साधुओं की लिंचिंग जैसी राष्ट्रीय घटनाओं पर चुप रहने पर उनकी आलोचना की है। अभिनेत्री ने एक बार फिर बॉलीवुड सितारों द्वारा चुनिंदे मुद्दों पर अपनी बात रखने वाले पाखंड का पर्दाफाश किया।

बीबीसी के लुसी होकिंग्स के साथ एक इंटरव्यू में, कंगना रनौत ने कई मुद्दों पर बात की, जिसमें चुने गए कुछ ही मामलों में बॉलीवुड सेलेब्रिटीज़ का एक्टिविज्म दिखाना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर उनका जानबूझकर चुप्पी साध लेना, जैसे कि पालघर साधु हत्या पर किसी ने कुछ नहीं बोला।

उन्होंने यह भी बोला कि कैसे एक तरफ ये लोग ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ जैसे आंदोलनों के समर्थन में खड़े होते हैं, वहीं दूसरी ओर यही लोग काले को गोरा बनाने वाली क्रीम का समर्थन भी करते हैं।

कंगना की टीम द्वारा ट्विटर पर शेयर किए गए वीडियो में, कंगना रनौत उन एंकरों के सवालों का जवाब देती नजर आईं, जिन्होंने पूछा कि क्यों मशहूर हस्तियाँ, राजनेता अपने आस पास हुए घिनोंने अपराधों की निंदा नहीं करते है। जबकि कहीं दूर घट रहीं घटनाओं पर तुरंत कमेंट कर देते हैं।

लुसी को जवाब देते हुए, अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा, “मुझे लगता है कि यह किसी भी तरह से पश्चिम का हिस्सा बनना चाहते हैं। लेकिन, यदि आप देखते हैं कि एशियाई हस्तियाँ और अभिनेता कैसे काम करते हैं, तो वे देश के इस हिस्से में बहुत प्रभावी हैं, लेकिन मुझे नहीं पता कि वे अमेरिका के सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों में कैसे भाग ले रहे हैं।”

हाल ही में पालघर में हुए हिंदू साधुओं की भयावह घटना का हवाला देते हुए, कंगना रनौत ने तथाकथित हस्तियों के चुनिंदे मुद्दों के बारे में बात करते हुए कहा कि इस घटना पर किसी ने भी एक शब्द तक नहीं कहा क्योंकि यह बहुसंख्यक लोगों की भावना से जुड़ा था।

उन्होंने कहा कि जब आप अपनी करुणा, अपनी सक्रियता, अपनी मानवता का राजनीतिकरण करते हैं, तो निश्चित रूप से आप समस्या का हिस्सा हैं। कंगना ने आगे कहा कि जो लोग दूसरों को दर्द देते हैं वो भी किसी ने किसी के प्रति दया रखते हैं लेकिन समस्या ये है कि उनकी करुणा भी सेलेक्टिव होती है।

अभिनेत्री ने कहा कि साधुओं की हत्या पर नाराजगी न जाहिर करने वाले देश में ज्यादातर हस्तियों से पूछा जाना चाहिए, कि क्यों साधुओं की हत्या पर कोई ऐसा आउटरेज पैदा नहीं हुआ? क्या सिर्फ इसलिए कि मार दिए गए साधुओं ने जो भगवा कपड़े पहने थे। कंगना रनौत ने बताया कि कैसे कोई इस घटना के बारे में बात नहीं करना चाहता था।

अभिनेत्री ने उन तथाकथित हस्तियों को उन मुद्दों पर बोलने के लिए ललकारा जो दूर घटित हो रहीं घटनाओं पर अपनी राय रखते है लेकिन अपने ही देश के मुद्दों पर चुपी साध लेते है।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री ने कहा, “हर देश के अपने अलग-अलग मुद्दे होते है, हमें दुनिया को सुधारने की कोशिश करने से पहले अपने भीतर की बुराई से निपटना होगा। और ऐसा करने में हम असफल हो रहे हैं।”

देश की लोकप्रिय हस्तियों के पाखंड का पर्दाफाश करते हुए, अभिनेत्री ने कहा कि इन लोगों ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ कहने से पहले काले चेहरे को गोरा बनाने वाले फेयरनेस उत्पादों का समर्थन करना बंद कर देना चाहिए। ये लोग कैसे दो मुँहा बातें कर सकते है और कोई इनसे यह सवाल पूछता क्यों नहीं है?”

कंगना रनौत ने ऐसे सेलिब्रिटी को लताड़ते हुए कहा, “उन लाखों-डॉलर के सौदों के बारे में जो वे कर रहे थे और अचानक कैसे उनके लिए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ रखने लगा। एक व्यक्ति के रूप में आपने इन मतभेदों को सिर्फ पैसा बनाने के रूप में देखा। जोकि इंसानियत को शर्मसार करता है।”

शो के आखिरी में कंगना रनौत ने कहा कि देश में मशहूर हस्तियाँ सिर्फ अपने पर्सनल मतलब को बढ़ावा देने के लिए ये विज्ञापन कर रही हैं।

इससे पहले भी, बॉलीवुड अभिनेता कंगना रनौत ने पालघर साधु लिंचिंग पर इन तथाकथित हस्तियों की चुप्पी पर सवाल उठाया था। जहाँ उन्होंने साधुओं की हत्या पर किसी भी सेलेब्रिटी के कुछ न बोलने पर आपत्ति जताई थी।

जब तिब्बत की संस्कृति और लोगों को तबाह कर रहा था चीन, उसके सैनिकों के लिए नेहरू ने भेजे थे चावल

क्या आप जानते हैं कि कभी तिब्बत एक आजाद मुल्क था। लेकिन 1949 में ब्रिटेन से आजाद होने बाद चीन ने 1950 में तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और तिब्बत से एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा छीन लिया। जब एक बार चीन फिर से हमारी सीमा पर अपनी आर्मी इकठ्ठा कर रहा है तो एतिहासिक दस्तावेजों को खॅंगालने की जरूरत है।

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने जब 1950 में तिब्बत पर हमला किया उस वक्त पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। कई ऐतिहासिक भूल पंडित नेहरू के जिम्मे है। उनमें से एक तिब्बत भी है। भारत की तत्कालीन सरकार चाहती तो तिब्बत आज भारत और चीन के मध्य एक बफर स्टेट के रूप में रह सकता था।

फ्रांसीसी मूल के लेखक, पत्रकार और तिब्बत की इतिहास के जानकार क्लाउडे अर्पी (Claude Arpi) ने ‘विल तिब्बत एवर फाइंड हर सोल अगेन (Will Tibet find her soul again)’ नाम की एक पुस्तक लिखी है। इसमें उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के हवाले से लिखा है कि जब चीनी सेना तिब्बत को तबाह कर रही थी तो उसके खाने के लिए चावलों की सप्लाई भारत से हो रही थी। हिंदी-चीनी भाई-भाई के दौर में भारत के सप्लाई किए हुए चावल खाकर चीनी सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे में खोए रहे। उन्होंने इस पुस्तक में स्पष्ट रूप से चीन के आक्रमण, छल-प्रपंच और तिब्बत को अजगर की तरह निगल जाने के बारे में व्यापक रूप से जानकारी दी है। नेहरू द्वारा मूर्खतापूर्ण तरीके से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को चावल की आपूर्ति करने का भी जिक्र किया है।

यह चावल कूटनीति चार वर्षों तक जारी रही। चीन से परिवहन की कठिनाइयों को देखते हुए वह भारत से इस खरीद को अंजाम दे रहा था। 20 अक्टूबर 1954 को इस बात पर फिर से जोर दिया गया कि भारत तिब्बत में तैनात पीएलए को चावल की आपूर्ति जारी रखेगा। चीन जो चावल भारत से खरीद रहा था वो विशेष रूप पर तिब्बत के लिए था, इस खबर को द हिंदू ने रिपोर्ट किया था। दस महीने बाद जब पहला चीनी ट्रक चीन की तरफ से ल्हासा तक रसद सामग्री लेकर पहुॅंचा तो फिर चीन की निर्भरता भारत पर चावल के लिए नहीं रही। वे लिखते हैं कि तिब्बतियों के लिए चावल कभी भी उनका परम्परागत भोजन नहीं रहा था। तिब्बती जौ से बने खाना खाते थे जिसे वो तत्स्यो कहते थे।

नेहरू का चीन प्रेम यहीं समाप्त नहीं होता। बहुत कम लोगों जानकारी होगी कि नेहरू ने संसद को सूचित किए बिना तिब्बत के ल्हासा और झिंझि‍यांग के कासगर में भारतीय मिशनों को बंद कर दिया था। नेहरू ने क्या सोच कर इन मिशनों को बंद किया था? वो भी बगैर भारतीय संसद को सूचित किए। नेहरू की आत्ममुग्धता और विश्वनेता बनने की इच्छा ने चीन की सभी इच्छाएँ पूरी की थी। इसका परिणाम आज तक भारत और तिब्बती भुगत रहे हैं।

1950 के दशक की शुरुआत पीएलए की टुकड़ियों को चावल खिलाना सबसे अधिक घटिया घटना थी। अर्पी लिखते हैं “दिल्ली के सक्रिय समर्थन के बिना, चीनी सैनिक तिब्बत में जीवित नहीं रह सकते थे।” उन्होंने लिखा कि तत्कालीन भारतीय नेतृत्व दीवार पर लिखी साफ इबारत को नहीं पढ़ पाया। अर्पी ने आगे लिखा है कि हिमालय के आर-पार भारत-चीन व्यापार के फलने-फूलने के बाद चीन ने उस समय तवांग और नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) पर कभी दावा नहीं किया, जो साबित करता है कि चीन अरुणाचल प्रदेश (भारतीय क्षेत्र का 90,000 वर्ग किलोमीटर) पर जो दावा करता है, दुश्मनी में ऐसा करता है और ‘दक्षिण तिब्बत’ की अवधारणा निर्मित की गई है।

अर्पी ने अपनी किताब में उस समय चीन में तैनात भारतीय राजदूत केएम पन्निकर के बारे में लिखा है कि वो नेहरू के बजाय माओ के राजदूत ज्यादा नजर आते थे। उन्होंने चीन का हर मौके पर बचाव किया। जब चीनी सेना तिब्बत की संस्कृति और लोगों को तबाह कर रही थी तो उन्होंने भारत सरकार को लिखे अपने नोट में कहा- बहुत समय से तिब्बत के बारे में कोई खबर नहीं आई है और आशा है कि तिब्बत को फिर से सही होने में समय लगेगा और चीनी अधिकारी उसकी अच्छे से देखभाल करेंगे।

पुस्तक में तत्कालीन रक्षामंत्री वीके कृष्णा मेनन का भी जिक्र है। उनकी बायोग्राफी लिखने वाले टीजेएस जॉर्ज के हवाले से जिक्र किया गया है कि उनको आत्मनिर्भरता की ऐसी सनक थी कि उन्होंने सेना के लिए साजो-समान बनाने वाले कारखानों को हेयरकिल्प्स और प्रेशर कुकर बनाने वाले कारखानों में तब्दील कर दिया। सेना के लिए युद्ध सामान आयात करने से मना कर दिया था। सेना मानती थी कि मेनन रक्षामंत्री लायक नहीं हैं। वे सेल्फ प्रोमोशन में ज्यादा व्यस्त रहते थे। लगातार विदेशी यात्राएँ करते थे। लेकिन नेहरू की कृपा से वो लगातार मंत्री बने रहे।

माओ त्से तुंग ने मुख्य भूमि चीन को समृद्धि प्रदान करने के लिए तिब्बत, झिंझियांग और इनर मंगोलिया को हड़प लिया। माओ ने तिब्बत को चीन की हथेली और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और नेफा को इसकी पाँच ऊँगलियाँ कहा था। लेकिन भारत कभी भी माओ त्से तुंग के इस स्टेटमेंट की गहराई नहीं पहचान पाया। जैसे नेहरू तिब्बत के सामरिक महत्व, अपने और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में पहचानने में विफल रहे।

“लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पाई” नेहरू की गलतियों की सजा देश आज तक भुगत रहा है। हमें नेहरू की महानता का जो इतिहास पढ़ाया गया है, उसे पुर्नावलोकन की जरूरत है। क्या सही, क्या गलत हुआ था, उसको जानने की जरूरत है ताकि इतिहास से सबक लेकर चीन जैसे जमीन के भूखे देश के बारे में दुनिया जान सके, और चीन को चीन के ही तरीके से मात दी जा सके।

माओ की बात चीन को आज भी याद है, लेकिन शायद भारत भूल गया है। हमें चीन की व्यवहार और उसके विचारों को अच्छे से अध्ययन करने की जरूरत है। वामपंथी अध्ययनवेत्ताओं का चीन से वैचारिक भाईचारा है। इस बात का ख्याल रखते हुए चीन को समझने की जरूरत है।

ट्रिपल-X में सेना को बदनाम करने को लेकर एकता कपूर के खिलाफ अब गुरुग्राम और मध्य प्रदेश में दर्ज हुई शिकायत

वेब सीरीज ट्रिपल-X बनाकर विवादों में धिरने वाली टीवी प्रॉड्यूसर एकता कपूर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं। मुंबई के बाद अब हरियाणा और मध्य प्रदेश में एकता कपूर के खिलाफ में शिकायत दर्ज कराई गई है।

जानकारी के मुताबिक ट्रिपल-X को लेकर शहीद कल्याण फाउंडेशन के अध्यक्ष मेजर टीसी राव ने पालम विहार थाने में एकता कपूर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इस मामले में एसएचओ राजेंद्र कुमार ने शिकायत मिलने की पुष्टि की है और बताया कि शिकायत के आधार पर मामले की जाँच की जा रही है।

मेजर टीसी राव ने कहा कि सेना के जवान देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देते हैं, लेकिन इस वेब सीरीज के निर्माता और निर्देशक ने दर्शाया है कि सेना के जवान जब सीमाओं पर सेवा करते हैं, तब उस वक्त उनकी पत्नियाँ घर पर अन्य पुरुषों के साथ अंतरंग सम्बन्ध रखती हैं।

उन्होंने आगे कहा, ‘यह बेहद आपत्तिजनक है और यह हमारे सशस्त्र बलों का मनोबल गिरा सकती है। ‘ट्रिपल एक्स-2’ में ऐसे दृश्य भी हैं, जिनमें सैन्य पुरुषों की वर्दी में अशोक की प्रतिमा और ताज के प्रतीक फटे हुए हैं। यह हमारे सशस्त्र बलों और सैन्य कर्मियों का अपमान है।

इतना ही नहीं शहीद कल्याण फाउंडेशन के अन्य सदस्यों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर एकता कपूर वेब सीरीज से आपत्तिजनक दृश्यों को नहीं हटाएँगी, तो हम अपना आंदोलन तेज करेंगे।

वहीं मध्य प्रदेश के इंदौर में एकता कपूर के खिलाफ एक और शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसमें कहा गया है कि एकता कपूर की आई नई वेब सीरीज में हिंदू देवताओं के साथ ही सेना का अपमान किया गया है।

आपको बता दें कि इससे पहले बिग बॉस 13 के प्रतिभागी रहे विकास पाठक उर्फ हिंदुस्तानी भाऊ ने मुंबई के खार थाने में एकता कपूर और उनकी माँ शोभा कपूर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस बात की जानकारी स्वयं भाऊ ने सोशल मीडिया के माध्यम के लोगों को दी थी।

मध्य प्रदेश: इंदौर में निर्माता एकता कपूर के खिलाफ एफआईआर बालाजी की XXX वेब श्रृंखला में राष्ट्रीय प्रतीक, हिंदू देवताओं और सेना के कर्मियों के अपमान का आरोप लगाते हुए दर्ज की गई।

भाऊ ने बताया कि इस बीच उन्हें बड़े-बड़े लोगों ने फोन किया और कहा कि आओ बैठकर बात करेंगे। लेकिन उन्होंने वीडियो में ‘अपनी भाषा’ में ये बात उन सभी लोगों को साफ कर दी कि उन्हें इस बारे में कोई बात नहीं करनी। बस एकता कपूर भारतीय सेना से माफी माँगे।

कम्युनिस्ट पार्टी ‘कोर्ट और पुलिस स्टेशन दोनों’ है: केरल महिला आयोग प्रमुख जोसेफिन का विवादित बयान

केरल राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन एमसी जोसेफिन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनकी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अदालत और पुलिस स्टेशन दोनों है। उनके इस बयान के बाद विवाद खड़ा हो गया है।

जानकारी के मुताबिक जोसेफिन ने यह बातें कदीनामकुलम घटना के मुद्दे पर बोलते हुए कही, जहाँ एक महिला का पति और उसके दोस्तों द्वारा यौन उत्पीड़न किया गया था।

सीपीएम नेता पीके सासी पर लगे आरोपों के संबंध में पूछे गए सवालों के जवाब में जोसेफिन ने कहा कि आयोग को इस मामले की जाँच करने की कोई आवश्यकता नहीं है, जब पीड़िता ने खुद कहा कि पार्टी द्वारा की गई जाँच ही काफी होगी।

एक रिपोर्टर ने सीपीआई (एम) नेताओं के खिलाफ कुछ मामलों पर आयोग के रुख के बारे में पूछा था। जिसके जवाब में जोसेफिन ने यह चौंकाने वाली बात कही। बता दें कि जोसेफिन सीपीएम की केंद्रीय समिति की सदस्य भी हैं।

महिला पैनल प्रमुख ने सीपीआई (एम) नेता और विधायक पीके सासी से जुड़े मामले का जिक्र करते हुए कहा, “मैं राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष हो सकती हूँ, लेकिन मैं कम्युनिस्ट पार्टी से हूँ। कोई भी अन्य पार्टी, मेरे अलावा, महिलाओं के खिलाफ मामलों में कड़ी कार्रवाई नहीं करेगी। मुझे पता है कि आप किस मामले की बात कर रहे हैं। उस मामले में, परिवार के सदस्य, जो पार्टी समर्थक हैं, ने मुझे बताया कि उनके लिए पार्टी द्वारा लिए जाने वाले फैसले ही काफी हैं।”

जोसेफिन आगे कहा, “हमारी पार्टी कोर्ट भी है और पुलिस स्टेशन भी। उस संबंध में किसी भी नेता के बारे में कोई उदासीनता नहीं दिखाई जाएगी।”

गौरतलब है कि 2018 में, श्योरानूर के विधायक पीके सासी पर डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) की एक महिला नेता यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिसके बाग सत्तारुढ़ माकपा सरकार ने उन्हें 6 महीने के लिए निलंबित कर दिया था।

महिला पैनल ने तब कहा था कि वे इस मामले की जाँच तभी करेंगी जब महिला सार्वजनिक रूप से सामने आएगी या फिर पुलिस में मामला दर्ज कराएगी।

इस बीच राज्य में विपक्षी दल कॉन्ग्रेस ने जोसेफिन को राज्य महिला पैनल प्रमुख के पद से इस्तीफा देने की माँग की है। राज्य में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने कहा कि जोसेफिन, जो एक अर्ध-न्यायिक निकाय के प्रमुख हैं, ने संविधान के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए एक टिप्पणी की है।

चेन्निथला ने एक विज्ञप्ति में कहा, “महिला पैनल प्रमुख कहती हैं कि CPI (M) का अर्थ है अदालत और पुलिस। उनका उस पद पर रहने का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने अर्ध-न्यायिक निकाय का नेतृत्व करते हुए संविधान-विरोधी बयान दिए हैं जो पूरी तरह से अस्वीकार्य है।”

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेन्द्रन ने जोसेफिन के बयान को देश की कानूनी प्रणाली के प्रति अपमानजनक बताया।

माफ़ करना, मैं तुम्हारे प्रोग्राम्स नहीं देखता: CM केजरीवाल ने की राहुल कँवल की ऑनलाइन बेइज्जती

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राहुल कँवल की बेइज्जती कर दी। दरअसल, कँवल ने अपने चैनल पर एक कार्यक्रम के दौरान दिल्ली के अस्पतालों और सरकार द्वारा जारी किए गए एप का ‘रियलिटी चेक’ किया था। इसके बाद ट्विटर पर उन्होंने बखान किया कि वो इस बात से अभिभूत हैं कि सीएम केजरीवाल ने उनका शो देखा और दावा किया कि केजरीवाल ने एप्लीकेशन और अस्पतालों के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ दिन का समय माँगा है।

राहुल कँवल ने अपने शो में दावा किया था कि दिल्ली के अस्पतालों में जो स्थिति है और दिल्ली कोरोना एप्लीकेशन में जो दिखाया जा रहा है, वो काफ़ी अलग है। कँवल ने दिल्ली के अस्तपालों के वार्डस में बदतर स्थिति होने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि अस्पतालों में मरीजों और उनके रिश्तेदारों का क्रंदन काफ़ी डरावना है। उनकी ट्वीट को कोट करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने कहा, “माफ़ करना राहुल, मैं कभी तुम्हारे प्रोग्राम्स नहीं देखता।“

केजरीवाल की इस ट्वीट के बाद लोगों ने राहुल कँवल का ख़ूब मजाक बनाया। एक यूजर ने लिखा कि राहुल कँवल ने हेयरकट वाला ट्वीट नहीं किया था, इसीलिए अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें भाव नहीं दिया। बता दें कि केजरीवाल ने सागरिका घोष को हेयरकट एन्जॉय करने की सलाह दी थी। एक अन्य यूजर ने लिखा कि भाजपा के ख़िलाफ़ इतना माहौल बनाने के बावजूद उन्हें सिर्फ़ बेइज्जती ही मिली। एक अन्य यूजर ने पूछा कि कँवल अब कितने झूठ बोलेंगे?

इधर केजरीवाल ने भी शनिवार (जून 6, 2020) को कहा कि कोई भी अस्पताल किसी भी मरीज को एडमिट करने से इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि अगर कोरोना के लक्षण वाले मरीज आते हैं तो अस्पतालों को उन्हें एडमिट कर के उनका इलाज करना ही होगा क्योंकि अब तक कोरोना की कोई दवा नहीं आई है। उन्होंने मेडिकल कर्मचारियों को PPE किट्स पहनने की सलाह दी, अगर मरीज में कोरोना के लक्षण दिख रहे हैं तो।

‘इंडिया टुडे’ के शो में विभिन्न अस्पतालों के मरीजों से बात की थी, जिन्होंने दावा किया था कि मरीजों को अस्पतालों में एडमिट नहीं किया जा रहा है। उन्होंने अस्पतालों के प्रबंधन का भी बयान दिखाया था। एक 67 साल के कोविड मरीज की मौत का मुद्दा उठाया गया था, जिनके परिवार ने अस्पताल पर कोताही बरतने के आरोप लगाए थे। इसी शो के बारे में कँवल ने ट्विटर पर बताया, जहाँ केजरीवाल ने उन्हें जवाब दिया।

हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब अरविन्द केजरीवाल ने राहुल कँवल को इस तरह का जवाब दिया हो। राहुल कँवल ने एक बार केजरीवाल से उनके मंत्री रहे सोमनाथ भारती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर सवाल पूछा था। कँवल ने केजरीवाल से पूछा था कि वाड्रा या भाजपा के मामले में तुरंत जाँच की माँग करने वाले केजरीवाल अपनी पार्टी में ऐसा क्यों नहीं करते? इस पर केजरीवाल ने कहा था कि उन्हें तो राहुल ने कोई कागज़ भेजा ही नहीं।

मैं आपके प्रोग्राम्स नहीं देखता: केजरीवाल ने 2014 में भी कँवल से कहा था

अरविन्द केजरीवाल ने तब भी मार्च 2014 में कहा था कि वो राहुल कँवल के कार्यक्रम देखते ही नहीं हैं क्योंकि वो इंटरेस्टिंग नहीं होते हैं। उन्होंने कँवल से कहा था कि वो बुरा न मानें लेकिन उनके प्रोग्राम्स इंटरेस्टिंग नहीं होते हैं। एक बार तो केजरीवाल ने कँवल को पीएम मोदी का प्रवक्ता तक बता दिया था। इस पर कँवल ने कहा था कि जब एक ट्रोल मुख्यमंत्री बनता है तो यही होता है। ये बहस ट्विटर पर सितम्बर 2016 में हुई थी।

डर का माहौल है… क्योंकि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज है, इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में है

एक छोटा बच्चा घर में अकेला है। उसके साथ खेलने के लिए बाकी बच्चे नहीं हैं। इसलिए बेचारा वही अकेला चोर-सिपाही सबके रोल बारी-बारी से निभाता है और अपने मन को बहलाता है। उसने अपने मुँह पर चादर ढकी, एक तरफ खड़े होकर डराने के अंदाज़ में जोर से ‘हाऊ’ बोला, फिर भागकर दूसरी तरफ जाकर दुबक कर बैठ गया और डरने का नाटक करने लगा।

बच्चे के खेल तक सब ठीक है, लेकिन यही खेल कुछ बड़े लोग भी खेल रहे हैं। खेल कुछ इस तरह है- यथार्थ से एंड्रॉमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) जितनी दूर की बातों की कपोल कल्पना करें, फिर उन्हें बंगलुरु सोनिक बूम जैसे रहस्यमय विस्फोटक स्वर में व्यक्त कर दें और ये लीजिए ‘डर का माहौल’ तैयार है। अब बस उसे तहे दिल से महसूस कराना बाकी है। इसके लिए आप लंबी-गहरी साँस लें और एक अन-अनुभूत पीड़ा के साथ संजीदा आवाज में बोलें- ‘चारों ओर डर का माहौल है’। आज इससे ज्यादा क्रांतिकारी कुछ और नहीं हो सकता। 

डर के माहौल के इन सुरों को अगर ठीक से सुनना है तो आपको 7.1 Surround Sound System वाले ध्वनि यंत्र का प्रयोग करना चाहिए। ताकि आप इस multi-channel audio को ठीक से सुन सकें। तब आपको पता चलेगा कि इस महाभीति गान का प्रथम स्वर ‘सा’ वाममार्गियों के कोने से आता है, ‘रे’ कॉन्ग्रेस व अनुषंगी पार्टियों से, ‘ग’ अति जागरूक पत्रकारों से, ‘म’ मुंबई वाले कलाकारों से, ‘प’ का पंचम स्वर पाकिस्तान वाली दिशा से, ‘ध’ धमाके वाले शांतिदूतों से, ‘नि’ निर्मल हृदय छात्र-छात्राओं की ओर से।

इस तरह ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की विशुद्ध संगीतमयता के साथ छद्म मानवाधिकार, उदारता, सेक्युलरिज्म आदि थीम के गीत गाए जाते हैं। इनका सुर एक इसलिए है क्योंकि इन सबको, चाहे वो पाकिस्तान हो या हमारे देश की सेवाभावी पार्टियाँ, इन्हें एक ही चीज से खतरा है और वो है हिंदुत्व।

गजब की बात ये है कि इन लोगों को हिन्दुओं के खिलाफ कोई भी प्रोपेगेंडा करने के लिए अतिवादी हिंदुत्व या उग्र हिंदुत्व जैसी औपचारिकता की भी जरूरत नहीं पड़ती है। सीधे हिंदुत्व शब्द में ही वो दहशत समेट दी जाती है जो इस देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों में डर का माहौल दिखाने और दुनिया भर में इसे बदनाम करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आप ये भी न सोचें कि सभी हिंदू खतरनाक हैं।

मौसमी हिंदुत्व को इससे बचाकर रखा गया है। मौसमी हिंदुत्व, मौसमी जनेऊ, मौसमी ब्राह्मण ये तो दुनिया के सबसे भोले-भाले प्राणी हैं। ये प्राय: उच्च राजवंशी, जगदद्धारक, अवतारी महापुरुष होते हैं, जिन्हें स्वयं ब्रह्मा ने इस धरा के कल्याण के लिए भेजा है। इसलिए इस लेख में जब भी हिंदुत्व की बात हो तब आप मौसमी हिंदुत्व को उससे बाहर ही रखें, क्योंकि ऐसे भोले-भाले प्राणियों को हिंदुत्व के लपेटे में लाने से अहिंसा के व्रत का उल्लंघन हो जाता है।

तो हम बात कर रहे थे कि हिंदुत्व बड़ी निर्दयी चीज़ है। इससे ज्यादा लचक तो आतंकवाद में पाई जाती है। अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद, भटके हुए बच्चे, तरक्की और वाजिब तालीम से महरूम नौजवान, डरे-सहमे युवा, एशियन पेंट्स के पास भी इतना विविधतापूर्ण शेडकार्ड मिलना मुश्किल है।

हिंदुत्व का खतरा इतना सर चढ़कर बोल रहा है कि हाल ही में पहले तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएम मोदी की इस्लाम विरोधी, हिंसक और क्षेत्रीय अस्थिरता वाली हिंदुत्ववादी या द्रविड़ ऐसी ही किसी विचारधारा के खिलाफ अनेक बार संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक संगठनों से शिकायत की है। फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके चिंता जाहिर की कि तानाशाह मोदी की सरकार न केवल भारत के अल्पसंख्यकों, जो कि इस समय भारत में दोयम दर्जे के नागरिक हैं उनके लिए, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए भी खतरा है।

इमरान खान के पास खतरा भाँपने की छठी इन्द्रियनुमा कौन सी तकनीक है पता नहीं, जो खतरे की इतनी पक्की पूर्वसूचना दे देते हैं। इतनी पक्की सूचना के लिए वाकई या तो अच्छी तकनीक चाहिए या फिर खतरे का तूफ़ान खुद ये सूचना दे कि वो आ रहा है तब वो सही होगी। मिनिमम-मैक्सिमम वाली घटना के बाद इनकी तकनीक पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए खतरे के आने की सूचना खुद खतरे ने दी है यही मानना पड़ेगा।

क्षेत्रीय शांति के लिए खतरे के तूफ़ान का अभी एक वीडियो भी पाकिस्तान से आया था जिसमें वो पूर्वसूचना दे रहा है कि हम आ गए हैं कश्मीर में, गजवा-ए-हिंद के लिए निकल पड़े हैं, बिल्कुल इमरान खान की सूचना से मेल खाता हुआ।

पता नहीं पाकिस्तान में ऐसे कौन से फ़िल्टर लगे आईने बेचे जाते हैं, जिसमें उन्हें अपना चेहरा बड़ा सुहाना नज़र आता है। पूरी की पूरी माइनॉरिटी के गायब होने से बने गड्ढे और जगह-जगह पर उभरते आतंरिक विद्रोहों के बर्बरता पूर्वक कुचले गए अपने ही चेहरे के फोड़े नज़र नहीं आते। खुद के दामन पर लगे बलूचियों, अहमदियों, हिंदुओं के संहार के छींटें नज़र नहीं आते। या हो सकता है उनके दाग अच्छे हों, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक दाँव-पेंचों के सर्फ में सब धुलते रहते हैं।

जिस हिंदुत्व का रोना रोकर पाकिस्तान से लेकर भारत तक ये वाममार्गी इसे खतरनाक जताने की कोशिश करते हैं उसका न तो दहशतगर्दी का अतीत है, न वर्तमान। फिर भी वही है खतरा। सवाल तो ये उठना चाहिए कि अगर इस्लाम पाकिस्तान सहित कितने ही दूसरे देशों का आधिकारिक धर्म हो सकता है और बहुत से देशों का राष्ट्रीय धर्म ईसाई धर्म है, तो हिंदुत्व भारत का आधिकारिक धर्म क्यों नहीं हो सकता? वो भी तब जब देश का बँटवारा हुआ ही धर्म के नाम पर था।

ये तो उल्टा इस्लामी देशों से उत्पीड़ित होकर आए हिन्दुओं को भी भारत में शरण देने का विरोध कर रहे हैं। फिर हिंदू किस देश में जाएगा? CAA के विरोध में ये लोग सड़कों पर ऐसे जम गए जैसे इस सड़क के संवैधानिक बैरिकेड्स हों। इस विरोध का सीधा सपाट मतलब यही है कि पाकिस्तान ने तुम्हें निकाल दिया, हिन्दुस्तान में हम तुम्हें रहने नहीं देंगे।

सारा मानवाधिकार गधे के सींग की तरह गायब हो गया। या हिंदू मानव की श्रेणी में नहीं आता? या भारत को शुरू में ही हिंदू राष्ट्र न बनाना गलती थी? बन जाता तो कम से कम आज उन उत्पीड़ित हिन्दुओं के लिए इस दुनिया में कहीं तो जगह होती। इतने स्पष्ट विरोधाभासों के बावजूद जो लोग उदारवाद के नाम पर इन घनघोर अनुदारवादी विचारों के पक्षधर बन जाते हैं, उनका सच और न्याय से कोई नाता नहीं है। ऊपर से धर्म निरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी के ढिंढोरे के शोर में चलती तुष्टिकरण की छेनियाँ देश की अखंडता को तार-तार करने पर तुली हैं, लेकिन फर्क किसे पड़ता है?

जिसे देखो वही हमें बिन माँगी सीख देने आ जाता है। अतिथि बनकर दूसरों के घर में लूट मचाने वाले अंग्रेज हमें कहते रहे कि हम असभ्य हैं, इसलिए वो हमें सभ्यता सिखाने आए हैं और हम में से बहुत से मान भी गए। जिस भारत ने दुनिया को विकसित हड़प्पा सभ्यता दी, उस पर हड़पने की सभ्यता थोंप दी गई और उस पर भी तुर्रा ये कि हम पिछड़े और वो सभ्यता के ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

अब सामने हैं चरमपंथी, उग्रवादी, अराजक वाममार्गी जो सर्वाधिक सहिष्णु हिंदुत्व को उदारता और धर्म निरपेक्षता सिखा रहे हैं। जिन्हें चार गाँवों में बहुसंख्यक होते ही अपना अलग वर्चस्व चाहिए वो देश की अस्सी प्रतिशत धर्म निरपेक्ष आबादी को असहिष्णु बता रहे हैं। जैसी सभ्यता और उदारता इन लोगों के द्वारा औरों को सिखाई जा रही है, उसका एक अंश भी कोई इस्तेमाल कर ले तो धरती से शांति सदा के लिए गायब हो जाएगी।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की जगह किसी हिंदू के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो जाती तो क्या कोहराम मच जाता, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। लेकिन अब ये रोना शुरू हो चुका है कि उसे उसके मजहब की सजा मिल रही है। कुछ लोगों ने हथिनी का भी धर्म देख लिया, लेकिन अब जब गिरफ्तार आरोपितों के नाम सामने आ गए तो दोहरे मानदंडों वाले विश्लेषक इस पूरे केस को हाथी के साइज से घटाकर चींटी जितना बना डालेंगे। ऐसे आचरण को विशुद्ध हिंदी भाषा में पाखंड कहते हैं।

इस भारत धरा पर अब एक पाखंड खंडिनी ध्वजा राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी गाड़ने की जरूरत है, ताकि इन दोहरे मानदंडों के पाखंड को सोचने पर मजबूर किया जा सके। ‘कंटकेनैव कंटकम्’ मतलब ये कि काँटा, काँटे से ही निकलता है, कॉटन से नहीं। इन कुतर्की लोगों को इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा। ये तभी संभव है जब भारत का नागरिक जागरूक और न्यायशील बनेगा।

हर व्यक्ति अपने स्तर से इस पाखंड का खंडन करे, किसी भी माध्यम से, चाहे आपको सुनने वाले एक या दो लोग ही क्यों न हों। याद करें अपने बचपन के जज्बातों को। तब हममें से किसने नहीं चाहा था कि हम भी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। जागरूक होना और दूसरों को भी जागरूक बनाना उस कुछ करने का सबसे अनिवार्य हिस्सा है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है और हर एक के वश की बात है।

ऋषि दयानंद ने मनुष्य की परिभाषा बताते हुए लिखा है, “मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपने समान औरों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान से कभी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे।” इसलिए मनुष्य बनें और बिना डरे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग करें। हमारी स्वाभाविक उदारता, अतिथि सत्कार और सहिष्णुता का मानव मूल्यों से रहित स्वार्थी ताकतों ने हमेशा गलत फायदा उठाया है। हमें ये सुनिश्चित करना है कि अब ऐसा न हो।

एक गुणी व्यक्ति ही किसी दूसरे के गुण की कीमत समझ सकता है। स्वार्थी व्यक्ति नहीं। इसलिए इससे पहले कि ये प्रोपेगेंडा संचालित लोग अपने कुतर्कों से आपको अपने से ही नफ़रत करना सिखा दें, आपको जागना होगा। अपनी विशेषताओं को पहचानें और खुद पर लग रहे आरोपों का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन करें, वरना ये ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ का खेल यूँ ही चलता रहेगा और आप खुद को चोर समझने भी लगेंगे।

हो सकता है कि कुछ युवाओं को इस जागरूकता अभियान में शामिल होना पिछड़ापन लगे, क्योंकि ज्यादातर पढ़े-लिखे युवा ही इस वामपंथी मायाजाल में जकड़े हुए हैं। लेकिन हमें ये भी याद रखना चाहिए कि बदलाव के मोड़ पर ये संशय एक आम बात है, जिसमें व्यक्ति का निर्णय ही उसे सही या गलत साबित करता है। 

आइए अंत में एक विचार पवित्र वेद संहिता का भी सुनते चलें। जो वेद हमें सहिष्णुता सिखाते हैं, वही हमें ये भी सिखाते हैं कि असामाजिक तत्वों का क्या समाधान करना है। क्रांति के नाम पर दंगे भड़काने वाले अराजक तत्वों के प्रति राज्य का क्या कर्तव्य है। इसके लिए वेद में लिखा गया है,

विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया शासदव्रतान्।
शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेषु चाकन।।

इसका मतलब है, “हे शासक! अपने राज्य के अच्छे सृजनशील लोगों और निर्माण की अपेक्षा ध्वंसात्मक कार्यों में रूचि रखने वालों अर्थात् इन दोनों ही प्रकृति के लोगों को जानो। यजनशील कार्यों यानी परहित में लगे व्यक्तियों की रक्षा करो और कुत्सित अर्थात् निंदनीय कार्यों में संलिप्त लोगों को कठोर दंड दो। प्रजा पालन के लिए राजा को राज्य के भीतर के दस्युओं को दंड देना है और बाह्य शत्रुओं से युद्ध करना है। इस कर्तव्य को शक्तिशाली शासक ही निभा सकता है, इसलिए तुम शक्तिशाली बनो।”