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JNU प्रेसिडेंट आइशी घोष सहित 19 के खिलाफ FIR: मारपीट और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप

दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार और शनिवार को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रशासन की ओर से शिकायत मिलने के बाद दो एफआईआर दर्ज की हैं। इन एफआईआर में जेएनयू छात्र संघ प्रेसिडेंट आइशी घोष के साथ ही 19 अन्य छात्रों के नाम शामिल हैं। पुलिस जल्द ही इन छात्रों को पूछताछ के लिए बुलाएगी।

FIR की कॉपी

बता दें कि शुक्रवार और शनिवार (3 और 4 जनवरी को) को भी छात्रों ने जेएनयू परिसर में हंगामा किया था। छात्रों ने सर्वर रूम ठप कर लोगों को बंधक बनाने के साथ संपत्ति को नुकसान पहुँचाया था। जेएनयू प्रशासन ने हंगामा करने वाले इन छात्रों के खिलाफ नामजद शिकायत दी थी।

पुलिस ने बताया कि हॉस्टल में मारपीट के दौरान जेएनयू प्रशासन की तरफ से पुलिस को पत्र लिखकर परिसर में हो रही हिंसा और कानून व्यवस्था को काबू करने के लिए आग्रह किया गया। इसके बाद पुलिस ने परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल को बुलाया और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।

जेएनयू में पिछले कई दिनों से फीस बढ़ोतरी का मुद्दा गर्माया हुआ है। रविवार रात कुछ नकाबपोश बदमाशों ने छात्रों और शिक्षकों को बुरी तरह पीट दिया था और कैंपस में तोड़फोड़ की थी। नकाबपोश गुंडे हाथों में रॉड और डंडे लेकर मारपीट और तोड़फोड़ कर रहे थे। इस मामले में जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन और एबीवीपी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। दोनों ही गुट खुद को पीड़ित बता रहे हैं। हालाँकि कई वीडियो सामने आए हैं, जिसमें साफ तौर पर दिख रहा है कि जेएनयू छात्र संघ प्रेसिडेंट आइशी घोष नकाबपोश गुंडों को रास्ता दिखाती नजर आ रही हैं।

जेएनयू में आतंक का ये तांडव लगभग 8 घंटों तक चला। इस दौरान महिला छात्रों को भी नहीं बख्शा गया। रजिस्ट्रेशन कराने गए छात्रों की पिटाई की गई। मीनाक्षी लेखी ने बताया कि महिला छात्रों के प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया और साथ ही बाथरूम में ले जाकर भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।

एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उन पर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई।

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आजाद मैदान में वॉशरूम-पानी की व्यवस्था, इसलिए प्रदर्शनकारियों को किया वहाँ शिफ्ट: मुंबई पुलिस

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा के विरोध में मुम्बई स्थिति गेटवे ऑफ इंडिया के बाहर सोमवार को रात भर प्रदर्शन किया गया। पुलिस का कहना है कि अब प्रदर्शनकारियों को गेटवे ऑफ इंडिया से हटाकर आजाद मैदान भेज दिया गया है। बता दें कि रविवार आधी रात को दक्षिण मुम्बई के कोलाबा में गेटवे ऑफ इंडिया के सामने छात्रों और महिलाओं सहित बड़ी संख्या में लोग जमा हुए थे। बाद में अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर और विशाल ददलानी जैसी बॉलीवुड हस्तियाँ भी यहाँ पहुँचीं। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने  ‘फ्री कश्मीर’ लिखे पोस्टर भी लहराए।

इस बारे में बात करते हुए डीसीपी संग्रामसिंह निशंदर ने कहा कि इन प्रदर्शनकारियों की वजह से सड़कें अवरुद्ध हो रही थीं और आम लोगों एवं पर्यटकों को परेशानी हो रही थी। उन्होंने कहा, “हमने प्रदर्शनकारियों से बाहर निकलने के लिए कई बार अपील की थी। हमने अब उन्हें आजाद मैदान में स्थानांतरित कर दिया है।” 

डीसीपी संग्रामसिंह के बयान का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वो कहते हुए नजर आ रहे हैं कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हटाया नहीं है, बल्कि सिर्फ रीलोकेट किया है। क्योंकि वहाँ पर शौचालय और पानी की बेहतर व्यवस्था है, जबकि गेटवे ऑफ इंडिया के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं थी। 

आपको बता दें कि इससे पहले प्रदर्शनकारियों ने गेटवे ऑफ इंडिया से सटे ताज पैलेस होटल के वॉशरुम इस्तेमाल नहीं करने देने पर सवाल दागे थे। सोनिया मरियम नाम की महिला ने ताज होटल को ट्वीट करके प्रदर्शनकारियों को वॉशरूम इस्तेमाल न करने देने का कारण पूछा था।

उन्होंने ताज होटल को टैग करते हुए पूछा, “क्या कोई कारण है कि आप प्रदर्शनकारियों को वॉशरूम का उपयोग नहीं करने दे रहे हैं? इस भेदभावपूर्ण व्यवहार का क्या मतलब है?” इसके साथ ही एक अन्य ट्वीट में वो ‘मानवाधिकार’ की बात करती नजर आईं। उन्होंने लिखा, “वाशरूम का उपयोग करने और एक प्रतिष्ठान से पानी माँगना मानवीय अधिकार है। सभी सार्वजनिक टॉयलेट में सैनिटरी सुविधा नहीं होती है, इससे मदद के बजाय नुकसान ही होता है।”

ताज होटल से इस तरह की माँग करना मूर्खतापूर्ण होने के साथ ही हास्यास्पद भी लगता है। एक यूजर ने तो इस प्रतिक्रिया देते हुए लिख भी दिया कि प्रदर्शन तो रोड पर होते हैं, फिर चाहे धूप हो, बारिश हो, या फिर कुछ और… लेकिन इनको वॉशरूम इस्तेमाल करने के लिए ताज चाहिए… और ये भेदभाव की बात करते हैं… हास्यास्पद।

वहीं एक यूजर ने लिखा, “कल को आप कहेंगे कि आपको फिर से विरोध प्रदर्शन पर उतरने से पहले थोड़ी देर के लिए आराम करने का अधिकार है, और इसलिए ताज से कमरे, कॉफी और शॉवर का उपयोग करने देने के लिए कहा जाए। इसके बाद आप इन अधिकारों के लिए भी एक और विरोध प्रदर्शन शुरू करने का सुझाव देंगे।”

गौरतलब है कि रविवार की शाम को हॉकी स्टिक और लोहे की छड़ों लैस नकाबपोश गुंडों ने दिल्ली के जेएनयू कैंपस में धावा बोला और हॉस्टल के छात्रों को निशाना बनाया। लाठी, पत्थरों और लोहे की छड़ों के साथ गुंडों ने हाथापाई, मारपीट और खिड़कियों, फर्नीचर सामानों की तोड़फोड़ की। उन्होंने एक महिला छात्रावास पर भी हमला किया। इस दौरान हिंसा में कम से कम 34 लोग घायल हुए।

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जेएनयू में रविवार (जनवरी 5, 2020) की रात हुई हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबई में विरोध प्रदर्शन के दौरान देश विरोधी नारेबाजी का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मंगलवार (जनवरी 7,2020) की तड़के तक गेटवे ऑफ इंडिया पर जारी प्रदर्शन में एक छात्रा के हाथ में ‘फ्री कश्मीर’ का पोस्टर देखा गया। जिसके बाद महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी शिवसेना पर न केवल विपक्षी पार्टी (भाजपा) ने निशाना साधा बल्कि गठबंधन में उनकी सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता भी इस पर सवाल उठाने से नहीं चूके।

विरोध प्रदर्शन में ‘फ्री कश्मीर’ के पोस्टर पर महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार को कटघरे में खड़ा कर सवाल किया। फडणवीस ने सीएम उद्धव ठाकरे से पूछा कि क्या उन्हें फ्री कश्मीर भारत विरोधी अभियान बर्दाश्त है। देवेंद्र फडणवीस ने ‘फ्री कश्मीर’के पोस्टर वाले वीडियो ट्वीट कर लिखा, “यह किस बात का प्रदर्शन है? फ्री कश्मीर के नारे क्यों लगाए जा रहे हैं? हम मुंबई में इस तरह के अलगाववादी तत्वों को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?”

पूर्व सीएम फडणवीस ने आगे लिखा, “सीएम कार्यालय से 2 किलोमीटर की दूरी पर आजादी गैंग ने फ्री कश्मीर के नारे लगाए। उद्धव जी आप अपनी नाक के नीचे फ्री कश्मीर एंटी इंडियन कैंपेन को बर्दाश्त कर रहे हैं।”

गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा ध्यान आकर्षित करवाने के बाद भी उद्धव ठाकरे जहाँ इस मामले पर शांत रहे। वहीं उन्हीं की सहयोगी पार्टी कॉन्ग्रेस के नेता संजय निरुपम ने भी इस ‘फ्री कश्मीर’ के पोस्टर पर आपत्ति जताई।

संजय निरुपम ने ट्वीट कर कहा कि ऐसे पोस्टर देश भर में चल रहे छात्र आंदोलन को बदनाम कर सकते हैं। निरुपम ने कहा कि आंदोलनकारियों को सावधानी बरतनी पड़ेगी। जेएनयू हिंसा का कश्मीर की आजादी से क्या मतलब है।

संजय निरुपम ने ट्वीट किया, “ऐसे पोस्टर देश भर में चल रहे छात्र आंदोलन को बदनाम कर सकते हैं। आंदोलन गुमराह हो सकता है। आंदोलनकारियों को सावधानी बरतनी पड़ेगी। #JNUVoilence का कश्मीर की आज़ादी से क्या रिश्ता ? कौन हैं ये लोग ? किसने गेटवे पर भेजा इन्हें ? बेहतर होगा,सरकार इसकी जाँच कराए।”

मुख्यमंत्री भले अब तक शांत हैं लेकिन उनके ‘संजय’ ने मुँह खोल दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और सामना के संपादक संजय राउत ने FREE KASHMIR बैनर को लेकर सफाई दी है। उनका कहना है कि जिन्होंने यह बैनर थामा था, उनका मकसद कश्मीर में फ्री इंटरनेट, फ्री मोबाइल सर्विसेज और अन्य प्रतिबंधों से है। हालाँकि आखिर में उन्होंने यह जोड़ा कि जो लोग भारत से कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, उन्हें बर्दाशत नहीं किया जाएगा।

गौरतलब है कि सोमवार को जेएनयू हिंसा के ख़िलाफ़ मुंबाई के हुतात्मा चौक से गेटवे ऑफ इंडिया तक मार्च निकाला गया था। इसी मार्च में एक छात्रा के हाथ में फ्री कश्मीर का पोस्टर दिखा। जिसके बाद सोशल मीडिया पर भाजपा पार्टी और कॉन्ग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं ने उद्धव ठाकरे पर निशाना साधा।

बता दें कि गेटवे ऑफ इंडिया तक निकाले गए मार्च में आईआईटी बॉम्बे, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के अलावा कई दूसरे शैक्षणिक संस्थानों के स्टूडेंट्स शामिल हुए। विरोध-प्रदर्शनों में दीया मिर्जा, जोया अख्तर, राहुल बोस, विशाल भारद्वाज, तापसी पन्नू जैसी फिल्‍मी हस्तियाँ भी नजर आईं। प्रदर्शन में शामिल स्टूडेंट्स ने कहा कि आज यह जेएनयू के साथ हुआ, कल किसी और के साथ होगा और फिर हमारे साथ भी हो सकता है। ऐसे में इसके खिलाफ आवाज उठानी जरूरी है। रैली के दौरान ‘हमें चाहिए आज़ादी‘ और ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगाए गए।

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न्यूजलॉन्ड्री और अजेंडाबाज अभिनंदन: हीनभाव से ग्रस्त, नक्सल हिमायती जो साइट से हिन्दूघृणा बाँटता है

न्यूज़लॉन्ड्री स्वघोषित रूप से ‘मीडिया की आलोचना करने वाला, खबर और समसामयिक विषयों की वेबसाइट’ है। हालाँकि, एक सरसरी निगाह डालने से पता चल जाता है कि हर टुटपुँजिए ‘वानाबी ऑल्टरनेटिव जर्नलिज्म पोर्टल’ की तरह इसमें अपने नाम के अलावा और किसी बात पर ढंग का काम नहीं किया गया है। नाम में लॉन्ड्री रखने भर से खबरों की धुलाई नहीं हो जाती, लेकिन ये बात ज़रूर है कि वामपंथी लम्पटों के समाज में स्वीकार्यता अवश्य बढ़ जाती है। कायदे से इसका नाम न्यूज़लौंडी या न्यूज़लौंडा होना चाहिए था क्योंकि जमीर बेच कर पत्रकारिता के नाम पर जो वैचारिक दोगलापन इस साइट पर दिखता है, उससे लॉन्ड्री शब्द का अपमान होता है।

लिबरलों और वामपंथियों के नाजायज मेल से विचित्र तरह की वक्र वैचारिक संतानों ने भारतीय मीडिया लैंडस्केप में जन्म लिया है, जिनका एकसूत्री अजेंडा एक तरह के प्रोपेगेंडा पर ज़हर उगलते रहना है। हिन्दुओं से एक अलग स्तर की घृणा की आग फैलाने वाले ‘न्यूजलौंडी’ टाइप के डिजिटल जिहादियों ने इंटरनेट के फ्री होने का फायदा उठाते हुए एक खास विचारधारा, अलग विचार, एवम् हिन्दू धर्म के प्रति जो नफ़रत फैलाई है, उसके लिए इसके सीईओ अभिनंनदन सेखरी, सिकड़ी, सिक-री (या जो भी नाम है) का गिलहरी योगदान आने वाले समय में याद रखा जा सकता है। ‘जा सकता है’ इसलिए क्योंकि वामपंथियों की आदत रही है अपने काम के लिए अपने ही कार्यकर्ताओं को निपटाते रहने का।

न्यूजलॉन्ड्री जब अस्तित्व में आई थी तो इसको लेकर खासा उत्साह था क्योंकि राडिया टेप आदि प्रकरण को ले कर आम जनता को लगा था कि सही में खबरों को धोने-सुखाने वाले लोग आए हैं। न्यूजलॉन्ड्री के शुरुआती दिनों में आनंद रंगनाथन जैसे विद्वान इससे जुड़े थे और रिपोर्टिंग एवम् विश्लेषण एक-आयामी नहीं था। तब के दिनों में हर वो मीडिया संस्थान या वैचारिक स्तम्भ लिखने वाले पत्रकार आदि इनके निशाने पर रहते थे जो पत्रकारिता का चोला ओढ़े अजेंडाबाजी में व्यस्त रहते थे।

समय बदला और फिर नक्सली विचारधारा और आतंकियों के हिमायतियों के हाथ में इसका नियंत्रण गया। अभिनंदन सेखरी जैसे नक्सल सिंपेथाइजर ने उस नक्सली की बातों का मजाक उड़ाया, जो छत्तीसगढ़ में 18 साल तक नक्सली रहने के बाद आत्मसमर्पण कर ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए आज के कई शहरी नक्सलियों के नाम लेता पाया गया। अभिनंदन सेखरी आखिर इस बात का मखौल क्यों करेगा जहाँ कोई हार्डकोर नक्सली किसी दूसरे नक्सली का नाम ले रहा हो? क्योंकि वो नाम सुधा भारद्वाज और अरुण फरेरा जैसे लोगों के थे, जिन पर आज कल भीमा कोरेगाँव की हिंसा भड़काने और प्रधानमंत्री की हत्या की योजना के मामले अदालतों में चल रहे हैं।

जब जड़ में ही सड़न घुस चुकी हो तो पत्ते हरे कैसे होंगे? अभिनंदन सेखरी के प्रभाव ने कई ढंग के लोगों को छोड़ने को विवश किया, जिसमें आनंद रंगनाथन भी एक थे, और, कुछ लोगों के अनुसार, हाल के दिनों में मधु त्रेहान का अलग होना भी न्यूजलॉन्ड्री के रेबीज़ग्रस्त रिपोर्टिंग और विश्लेषण को ही बताया जाता है। लोग कहते हैं मधु त्रेहान ने काफी हद तक इस एकतरफा जाती गाड़ी को संतुलित बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन आत्ममुग्ध अभिनंदन सेखरी की नक्सली विचारधारा और अंतर्निहित हिन्दूघृणा ने न्यूजलॉन्ड्री को उसी शब्द के दायरे में बाँध दिया जिसे प्रेस्या या प्रेस्टीट्यूट कहा जाता है।

इसी शृंखला में तहलका प्रकरण पर इनकी रिपोर्टिंग से अचम्भा हुआ जब निरुपमा सेखरी ने ‘विक्टिम शेमिंग’ के नए कीर्तिमान स्थापित किए। उस रिपोर्ट को पढ़ने, और फिर यह जानने के बाद कि एक महिला ने यह खबर की है, आप मुँह में वमन कर देंगे और फेंकने को सिवाय ऐसे पत्रकार के नाम के, कोई जगह नहीं मिलेगी। इस रिपोर्ट में तरुण तेजपाल का पूरा पक्ष लेते हुए, वामपंथियों की दोगली शैली में (पहले लिखो कि मैं तरुण तेजपाल को बचा नहीं रही, और पूरा लेख यही साबित करने में लगे रहो कि वो बुद्ध का अवतार है) पीड़िता पर ऐसे सवाल किए जैसे उसने इस शारीरिक शोषण के बारे में बोल कर मानवता के खिलाफ अपराध किया हो।

मीडिया वाचडॉग यानी पत्रकारिता की धारा पर पैनी निगाह जमा कर लोगों तक उनके झूठ और प्रपंच को पकड़ने की बात कहने वाला न्यूज़लॉन्ड्री, आज भी अपने ‘अबाउट अस’ में ‘मीडिया क्रिटिक’ ही लिखता है, जबकि जिन बातों पर आक्रमणकारी हो कर यह पोर्टल अस्तित्व में आया था, आज वही सारे तिकड़म खुद करता है: एक पार्टी की गोद में लैपडान्स करना (आम आदमी पार्टी), एकतरफा रिपोर्टिंग जहाँ भाजपा सरकारों ने आज तक एक भी ढंग का काम नहीं किया है, फूहड़ लौंडों को सदी के विचारकों की तरह स्थापित करने के लिए विडियो/इंटरव्यू (राठी, बनर्जी, कामरा आदि), लगातार मुसलमानों को पीड़ित दिखाना और हिन्दुओं को एक सामान्यीकृत शोषक बताते रहना, घृणा से भरी हुई सेलेक्टिव तरीके के विश्लेषण जहाँ अपवादों को उदाहरण के तौर पर दिखाया जाता है। इन सारी बातों के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं, न ही मैं कोई हायपरलिंक दूँगा। आप इनकी साइट पर जा कर किसी भी रैंडम जगह से दस लेख पढ़ लीजिए, समझ में आ जाएगा।

न्यूजलौंडी का अपना अजेंडाबाज: अभिनंदन सेखरी

अभिनंदन सेखरी के बारे में आप यह कह सकते हैं कि इस लम्मट ने अपनी अन्तश्चेतना बेच कर वामपंथी गिरोह के भीतरी कक्ष में प्रवृष्टि ली और मतिसुन्न हो कर, जमीर गिरवी रख कर न्यूजलॉन्ड्री की फंडिंग पाई। दूसरों पर तमाम तरह के आरोप मढ़ने वाले इस न्यूजलौंडी पर थोड़ा गौर करेंगे तो आप पाएँगे कि अर्णब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी से इसे और इसके कुछ कर्मचारियों को फेटिश की हद तक का प्रेम है, लेकिन हाँ कोई रवीश कुमार पर कुछ भी लिखे तो उसके व्यंग्यों को भी बेचारे फैक्टचेक कर देते हैं। (ख़ैर, व्यंग्य-कटाक्ष सबको समझ में नहीं आते, खास कर तब जब आपके वैचारिक पिता की लुंगी उतार दी गई हो तब तो आँख मूँदनी ही पड़ती है।)

ऑपइंडिया पर हिट जॉब

हाल ही में, न्यूजलौंडी ने ऑपइंडिया हिन्दी को ले कर एक तथाकथित प्रोफाइल करने की कोशिश की थी, जिसका एक ही उद्देश्य था ऑपइंडिया को ले कर अपने पूर्वग्रहों का विषवमन करना। इनके रिपोर्टर ने मुझसे फोन पर बात करते हुए ‘एथिक्स’ आदि का भी ज्ञान दिया था, और कहा था कि छापने से पहले मुझे मेरे फोन कॉल की रिकॉर्डिंग भी भेजेगा। ख़ैर, रिपोर्ट छपी न्यूजलौंडी हिन्दी पर, किसी ने देखा नहीं तीन दिन तक। फिर अचानक रवीश कुमार ने अपने पेज पर इसे जगह दे दी। ध्यान रहे कि रवीश कुमार के प्रपंचों के ऑपइंडिया एक अरसे से तथ्यों और तर्कों से काटता रहा है। इस रिपोर्ट में रवीश कुमार को ले कर ऑपइंडिया पर कई पन्ने समर्पित थे कि ऑपइंडिया ये करता है, वो करता है, ऐसे करता है, और वैसे भी करता है।

बाद में पता चला कि पूरी रिपोर्ट रवीश कुमार ने न सिर्फ छापने का विचार न्यूजलौंडी को दिया था, बल्कि उसका पूरा ड्राफ्ट पढ़ा, कुछ हिस्से लिखे और सोचा कि उनके नाम पर हो रहे ‘हमले’ के कारण लोग पढ़ लेंगे और ऑपइंडिया की थू-थू होगी। हुआ कुछ नहीं, तो फिर अपने पेज की रीच का इस्तेमाल करना चाहा। वहाँ इस रिपोर्ट को ले कर कमेंट में इतनी गालियाँ पड़ी हैं कि उस दिन से लगभग हर दिन (आप चाहें तो चेक कर लें) रवीश कुमार कम से कम एक पोस्ट में ‘आईटी सेल वाले नौजवानों की भाषा आप कमेंट में पढ़ लीजिए’ की बात अवश्य करते हैं।

ये हिट जॉब न तो रवीश के हिसाब से चल रहा था, न अभिनंदन सिक-री के, तो फिर इसका अनुवाद कराया गया अंग्रेजी में और फिर अपने इकोसिस्टम के सामूहिक फैंटेसी के उपभोग हेतु ट्विटर पर इसकी बिकवाली शुरू हुई। हालाँकि, इस पूरे रिपोर्ट पर मैंने एक विडियो में न्यूजलौंडी का घाघरा अच्छे से उतारा था, लेकिन अभिनंदन का मन नहीं भरा था, इसलिए अनुवाद करवाया। लेकिन इस रिपोर्ट के आने से एक अजीब बात हो गई, जिस कारण यह पूरा लेख लिखा जा रहा है।

इस लेख को पढ़ने के बाद न्यूजलॉन्ड्री के एक पूर्व पत्रकार ने हमसे सम्पर्क किया और कहा कि उसके पास अभिनंदन सेखरी के बारे में बहुत सारी बातें हैं कहने को। यूँ तो सेखरी की करतूतों को देखने के बाद आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये किस तरह का आवारा नक्सली है, लेकिन फिर भी किसी से फर्स्टहैंड सूचना मिल जाए तो सुनने में कोई बुराई नहीं। उसके बाद इस झबरे बालों वाले अभिनंदन के बारे में जो बातें सामने आईं वो न्यूज़लौंडी की दिशा, दशा और सेखरी के निम्न स्तर के अजेंडाबाज होने की पुष्टि करता है। यहाँ निम्न स्तर का या घटिया होने का मतलब वह अपने उद्देश्य में मनसा-वाचा-कर्मणा लगा हुआ है।

न्यूजलौंडी के अभिनंदन: हीनभावना से ग्रस्त, गालीबाज, नक्सल हिमायती

खैर, इस एक्स-न्यूजलॉन्ड्री पत्रकार ने, जो कि अभी एक राष्ट्रीय स्तर के पोर्टल के लिए काम करते हैं, अभिनंदन शेखरी के बारे में बताने से पहले नाम न छापने की अपील की। यूँ तो ये एक सामान्य अपील है, लेकिन पूछने पर जो बात पता चली वो अभिनंदन के बारे में काफी कुछ कहती है।

उसने कहा, “मैं नाम इसलिए नहीं बता सकता क्योंकि पहले भी मेरे एक सहकर्मी ने अभिनंदन के व्यवहार से दुखी हो कर नौकरी छोड़नी चाही, तो अभिनंदन ने अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हुए उसकी नौकरी एक लम्बे समय तक कहीं लगने ही नहीं दी। इनका एक नेक्सस है और ये खुल कर मेरे सामने बोल रहे थे कि ‘साले का करियर बर्बाद कर दूँगा’। अगर मेरा नाम आप लिखेंगे तो हो सकता है कि वो आर्टिकल के छपने के अगले दिन मुझे यहाँ की नौकरी से बाहर करा दे।”

मीडिया उद्योग में होने से इस बात की पुष्टि मैं भी कर सकता हूँ कि आपका वामपंथी बॉस अगर आपके पीछे पड़ जाए तो वो आपका करियर वाकई में बर्बाद कर सकता है। क्योंकि हर बड़े मीडिया हाउस में इनके जान-पहचान के लोग होते हैं, जिनके साथ या उनके नीचे इन्होंने काम किया होता है, चाटुकारिता से सीढ़ियाँ चढ़ी हुई होती हैं, तो ऐसे संबंधों का फायदा उठा कर करियर चौपट करना बहुत आसान है।

हमने उसे आश्वस्त किया तो आगे न्यूजलॉन्ड्री के वर्क कल्चर पर बताते हुए पूर्व न्यूजलॉन्ड्री पत्रकार ने दावा किया, “वर्क कल्चर वही है जो टिपिकल वामपंथी पोर्टलों का है। अभिनंदन की वैचारिक लाइन क्लियर है जहाँ वो हिन्दुओं पर हो रहे अपराधों को आम तौर पर इग्नोर कहता है, और गलती से भी कोई मुसलमान सामाजिक अपराध का भी शिकार हुआ है तो उसमें उसे किसी भी तरह हिन्दू-मुसलमान एंगल चाहिए ही। इसे आप अभिनंदन का SoP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) कह सकते हैं। जैसे कि मान लीजिए कमलेश तिवारी की हत्या हुई। जिस तरह से हुई उससे साफ है कि मुसलमानों ने की, और क्यों की। लेकिन अभिनंदन की पहली प्रतिक्रिया यह होगी कि ‘साले संघियों ने कराया होगा ताकि इसका फायदा उठा सकें’। फिर वो किसी भी ऐसी अफवाह, एक भी सोशल मीडिया पोस्ट, या छोटे से लोकल फेसबुक पेज पर ‘पुलिस तलाश रही है प्रेम का एंगल’ को भी प्रमुखता से छाप सकता है। या फिर वो इन मौकों पर पूरी तरह से चुप रह जाएगा। अंग्रेजी में वो यहाँ तक कह देगा कि ऐसी बातों को जगह देने से सेकुलर फ्रैब्रिक टूटेगा, लोग उन्मादी हो जाएँगे।”

पुष्टि के लिए जब हमने ‘कमलेश तिवारी’ खोजने की कोशिश की, तो न हिन्दी, न अंग्रेजी में, एक भी लेख मिला जो इस हत्याकांड पर अपना वैचारिक पक्ष रख रहा हो। इसी तरह कई मौकों पर, जहाँ अपराधी मुसलमान हो तो उसकी गरीबी ऐसे खींच कर ले आएँगे जैसे कि गरीब दंगाइयों को पुलिस गरीबी देख कर छोड़ दे। हाल ही में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने दंगाइयों से आगजनी, पत्थरबाजी, कट्टा चलाने आदि से हुई क्षति के लिए पैसा वसूलने की बात करते हुए उनके परिवारों को नोटिस भेजा तो न्यूजलौंडी के अभिनंदन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गरीब लोग पैसा कहाँ से देंगे! ये तो इन गरीब दंगाइयों को घर से पेट्रोल और माचिस ले कर निकलने से पहले सोचना था न?

कुछ और रिपोर्ट जहाँ मुसलमान प्रेम फफक कर बाहर आता है

इसी शृंखला में एक और रिपोर्ट जामिया में हुए दंगों के बाद पुलिस द्वारा दंगाइयों को नियंत्रित करने की कोशिश को ‘आतंक की रात’ कह कर छापा। आप यह जान लीजिए कि दंगों के दूसरे ही दिन दस हार्डकोर अपराधी पुलिस द्वारा पकड़े गए, वहाँ 750 फर्जी आईकार्ड के मिलने की पुष्टि जामिया मिलिया ने ही की, और PFI के 150 इस्लामी कट्टरपंथियों के दंगे के दो दिन पहले से उसी इलाके में होने की पुष्टि पुलिस कर चुकी है। हाँ, जामिया के ‘हिन्दुओं से आजादी’, ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और ‘नारा ए तकबीर’ के नारों पर न्यूजलौंडी चुप है।

इसी तरह अलीगढ़ में पुलिस द्वारा जारी किए विडियो में छात्रों द्वारा गेट तोड़ने, आग लगाने की खबरों को दरकिनार करते हुए, वहाँ की दीवारों पर हिन्दुओं को कैलाश भेजने, खिलाफत 2.0 लिखने और कैंटीन के सामने ख़िलाफ़त के समर्थन में तख्तियाँ ले कर इकट्ठे छात्रों और ‘हिन्दुत्व की कबर खुदेगी, AMU की धरती पर’, के बावजूद न्यूजलौंडी के अजेंडाबाजों ने क्या छापा है? ‘जख्मी, पिटे, स्टन ग्रेनेड से हमले के बाद अलीगढ़ के विद्यार्थियों द्वारा ख़ौफ़नाक रात का वर्णन’! यहाँ भी एकतरफा पुलिस द्वारा नियंत्रण की कोशिश को ‘पुलिस की बर्बरता’ कह कर वामपंथी नैरेटिव को हवा देने की नाकाम चाल।

और तो और, इन्होंने अयोध्या मामले पर टीवी पर आने वाले साधुओं पर एक पूरा लेख लिखा है जिसके शीर्षक से ही हिन्दूघृणा का पहला स्वाद आप तक पहुँच जाएगा। हालाँकि, बहुत खोजने पर भी कमलेश तिवारी की हत्या को जायज ठहराने वाले कठमुल्लों या आम मुसलमान पैनलिस्टों पर कोई लेख नहीं मिला। अगर बात चीखने की ही है तो मेंहदी लगाए दाढ़ी और टोपीधारी मुल्लों पर न्यूजलौंडी अपने किसी रिपोर्टर को क्यों नहीं भेज पाता? क्योंकि इससे अभिनंदन के वैचारिक चाचा-मामा के बारे में कई बातें बाहर आ जातीं!

न्यूजलॉन्ड्री से पहले जुड़े पत्रकार ने बताया, “सेखरी का फंडा सीधा और सपाट है कि मुसलमानों को, नक्सलियों को, आतंकियों तक को, विक्टिम बना कर दिखाना है। ये लोग कभी भी मुसलमानों के अपराधों पर मुखर हो कर नहीं लिखते। मीडिया क्रिटिक बनने के नाम पर इनका काम बस राइट विंग वाले लोगों को टार्गेट करना है, बाकी का काम इकोसिस्टम कर देता है। मुझे घिन आती है इस आदमी से कि यह सीधे चेहरे के साथ सहकर्मियों को ऐसा लिखने को कैसे कहता है!”

आगे उसने कहा, “अभिनंदन वाकई में एक इन्सिक्योर इंसान है। वो हीनभावना से भरा हुआ है लेकिन हमेशा अपने सीईओ होने के घमंड में भरा रहता है। हर दूसरे बात पर माँ-बहन की गालियाँ देना… कुछ गालियाँ इतनी खराब की मैं बता नहीं सकता! इसके साथ कोई भी ढंग का व्यक्ति ज्यादा दिन काम नहीं कर सकता। मधु मैम ने भी शायद उसकी इन्हीं हरकतों के कारण किनारा कर लिया। कई अच्छे लोग यहाँ इसलिए नहीं टिक पाए क्योंकि अभिनंदन एक ऐसहोल है। हाँ, मैं यही कहूँगा क्योंकि उसे लगता है अंग्रेजी में गालियाँ देना कूल है।”

न्यूजलौंडी पर क्या है, किस तरह का है, यह जानने के लिए आपको किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। साइट पर जाइए, स्क्रॉल कीजिए (क्योंकि पढ़ने लायक कुछ होता नहीं), आपको पता चल जाएगा कि अभिनन्दन शेखरी अरविंद केजरीवाल का पिट्ठू है। आम आदमी पार्टी ने जनता का रिपोर्टर जैसी वेबसाइट और अंकित लाल जैसे लोगों में पैसा क्यों खर्च किया, जबकि अभिनंदन शेखरी और न्यूज़लॉन्ड्री पब्लिक से ‘खबरें देना जनता की सेवा है’ के नाम पर पैसे उठा कर आम आदमी के समर्थन और भाजपा के विरोध में प्रचार करती ही है, यह आश्चर्य की बात है।

पूर्व कर्मचारी ने इस पर भी बताया, “मैं ये तो नहीं जानता कि आम आदमी पार्टी इन लोगों को पैसे देती है, लेकिन जिस तरह के लोगों को ये प्रमोट करते हैं जैसे कि आकाश बनर्जी, ध्रुव राठी आदि हैं, सीधे तौर पर एक राजनैतिक अजेंडे को बढ़ाने जैसा है। भाजपा को लेकर इनकी मंशा विरोध तक ही सीमित नहीं, अभिनंदन तो कहता है कि अगर तुम भाजपा के समर्थन में हो तो तुम्हें मानव नहीं कहा जा सकता। किसी पत्रकार के द्वारा इस तरह की अतिवादी सोच पर मुझे आश्चर्य होता था। लेकिन मेरे जाने के बाद ये लोग यही काम दिल्ली चुनावों को देखते हुए, और भी सक्रिय रूप से कर रहे हैं।”

प्रपंच पोर्टल की खबरों के शीर्षक देखिए, समझ जाएँगे

न्यूजलौंडी पर जिस तरह की खबरें हैं, जिन लोगों के इंटरव्यू हैं, जैसे सवाल पूछे जाते हैं, उसे देख कर पूर्व कर्मचारी की बात पर सवाल उठाना मुश्किल ही है। ये जानने के लिए हमें किसी स्वघोषित मीडिया क्रिटिक के पास जाने की आवश्यकता नहीं है कि न्यूजलॉन्ड्री इस तरह की एकतरफा, हिन्दूफोबिक, तल्ख और गैरवामपंथी विचारों के लिए अंतर्निहित घृणा से सनी पत्रकारिता क्यों करता है।

मोदी के सरकार में आने से, और तत्पश्चात् भाजपा की लगातार बनती राज्य सरकारों ने एक वैसी विचाराधारा को उभरने का मौका दिया जिन्हें एक लाइन में खारिज कर दिया जाता था। सोशल मीडिया के आने से उनकी अभिव्यक्ति को भी बल मिला है। रक्तरंजित वामपंथी विचारधारा और आतंकियों को हिमायती पत्रकारों, पोर्टलों पर लोगों ने सवाल उठाने शुरू किए तो एक तरह की घृणा से इंधन पाने वाले नितम्ब चिपका कर एक हो गए और अपने पाठकों को बरगलाना शुरू किया।

इसी कारण आपको वामपंथी पाठकों में फ्लैक्सिबिलिटी का अभाव दिखेगा। वो नाम के उदारवादी हैं, जबकि वैचारिक लोच का पूर्ण अभाव है इनके भीतर। न्यूजलौंडी जैसे पोर्टलों ने इसी जहरीले विचार को पकड़ा और अपने पाठकों को इकट्ठा करना शुरू किया। ये कुछ वैसे ही जैसे अकबरुद्दीन ओवैसी मुसलमान वोटों को इकट्ठा करने के लिए पंद्रह मिनट पुलिस हटाने की धमकी देता है। अभिनंदन सेखरी, अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे दंगाइयों का परिष्कृत संस्करण है, जिसे अंग्रेजी बोलनी आती है और वो मोदी को मोदी ही कहता है, मुडी या मोडी नहीं।

कमाल की बात यह है कि सिक-री के न्यूजलौंडी लेखक पेज पर उसके परिचय में एक लाइन लिखी हुई है, जिसका अनुवाद यह है: न्यूजट्रैक के लिए शोध करने वाले अभिनंदन बाद में ऐसे रिपोर्टर बने, जिन्होंने वैसी खबरों को किया जो बाकी छोड़ देते थे। पहली नजर में आपको ये सकारात्मक लगेगा लेकिन ये अभिनंदन की सच्चाई है कि जिन खबरों में कुछ नहीं होता, वहाँ ये हिन्दू-मुसलमान ले आता है, इसे गुरुद्वारे में सिख-मुस्लिम सद्भाव दिखता है, लेकिन पूरे भारत में हिन्दू-मुसलमान का सौहार्द नहीं दिखता। इसे तबरेज दिखता है, जुनैद दिखता है, अखलाक दिखता है, लेकिन भारत यादव, अंकित सक्सेना, ध्रुव त्यागी नहीं दिखते।

अभिनंदन के इसी टैलेंट की बात करते हुए पूर्व सहकर्मी ने बताया, “अगर कोई खबर आए, जो राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बन चुका हो, हमें लगता है कि करना चाहिए और उसमें अपराधी मुसलमान हो, तो सेखरी अलग लाइन ले लेता है: यू नो… दे आर आलरेडी लिविंग इन फियर, द फासिस्ट संघीज़ आर पुशिंग देम टू वाल एवरीव्हेयर… इन दिस एटमोस्फियर, वी जस्ट कान्ट डू दीज काइन्ड्स ऑफ स्टोरीज़! (तुम लोग समझते नहीं कि वो बेचारे किस तरह के डर में जीते हैं, ये फासीवादी संघी उन्हें हर जगह सता रहे हैं… ऐसे माहौल में हम इस तरह की खबरें नहीं कर सकते।) ऐसी स्थिति में आप कुछ नहीं कर सकते। ये आपको हर दिन सहना होता है ताकि किसी नकली डर से डरे हुए मुसलमान के अपराध की चर्चा तक न हो न्यूजलॉन्ड्री पर। हमेशा ‘कीप डिगिंग’ (खोजते रहो) कह कर कुछ ऐसा खोजने को कहा जाता है जहाँ किसी नक्सली, आतंकी या मुसलमान अपराधी का कोई मानवीय दृष्टिकोण सामने लाया जा सके। जैसे कि वो गरीब है, उसके जेल जाने से घरवालों को कौन खिलाएगा, उसकी बहन कैसे पढ़ेगी, बाप भजन गाता था… या कुछ भी इस तरह का। कभी-कभी आप अभिनंदन के ‘इविल जीनियस’ को अडमायर करने लगते हैं कि जो भी कहो, बंदा इस मामले में टैलेंटेड तो है ही!”

न्यूजलौंडी के कुछ नायाब कारनामे

वामपंथियों पर अगर किसी ने आलोचनात्मक लेख लिखा तो न्यूजलौंडी तुरंत उस पर सीधे लेख लिख कर धावा बोलती है, या फिर अपने गिरोह के द्वारा ऐसे लोगों की डिजिटल लिंचिंग में शरीक हो जाती है। अपने ही लिखे हुए लेखों को मिटाना, किसी खास पत्रकार को बचाना, उसकी साख पर किसी भी तरह की आँच न आने देना आदि आम बात है। मधु त्रेहान ने स्वयं क्लिप को हटाने की बात को स्वीकारा जहाँ जितेन्द्र सिंह नामक व्यक्ति ने सवाल उठाए कि राजदीप सरदेसाई के पास ₹52 करोड़ का बंग्ला कैसे है? उसी तरह समर हलरंकर पर न्यूजलौंडी ने एक लेख लिखा जिसमें उसने हिन्दुस्तान टाइम्स में कोई लेख लिखा था, जिस पर चोरी का आरोप लगा था। न्यूजलौंडी ‘फैक्ट्स’ को बाहर लाने की बात कर रही थी, आज आप वो लेख खोजने जाएँगे, तो हेडलाइन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

ख़ैर, लिस्ट लम्बी है। हाल ही में, चाँदनी चौक के हौजकाजी इलाके में मुसलमानों की एक भीड़ ने हिन्दू अल्पसंख्यकों के मंदिर पर पत्थबाजी की, मूर्तियाँ खंडित की, मंदिर को क्षति पहुँचाई। हमारी अंग्रेजी की एडिटर नुपुर शर्मा ने वहाँ जा कर ग्राउंड रिपोर्ट लिखी। उसी मामले में वहाँ एक सत्रह वर्ष के बच्चे को कथित तौर पर मुसलमानों की भीड़ द्वारा मस्जिद में खींच कर ले जाने की बात सामने आई। उसके माता-पिता अपनी बात किसी के द्वारा न सुने जाने पर सड़क पर, हताशा में, आत्महत्या करने की बात कर रहे थे। नुपुर की रिपोर्ट पहली (और शायद आखिरी थी) उस बच्चे के बारे में। चार दिन बाद बच्चा किसी तरह वापस आया। अब न्यूजलौंडी जगा और कहने लगा कि बच्चा जब वापस आ गया तो इस रिपोर्ट को करने की क्या ज़रूरत थी!

मतलब, हमें चार दिन पहले पता चल जाना चाहिए था कि वो बच्चा वापस आ जाएगा। जैसे कि नजीब अहमद आज तक वापस नहीं आया, तो उसकी रिपोर्टिंग बंद हो जानी चाहिए! ये नमूने विचित्र हैं बिलकुल! इसी तरह, सीईओ सेखरी ने, जो कि केजरीवाल का पुराना साथी भी है, स्वराज्य मैग्जीन की स्वाति गोयल शर्मा को उन्मादी कह बैठा क्योंकि उन्होंने गुरुग्राम के टोपी कांड की सच्चाई बाहर लाई थी। याद हो कि मोदी के दूसरी बार सत्ता में आने के तुरंत बाद ‘जय श्री राम’ को ले कर एक फर्जी खबरों का प्रचलन दिखा था, उसी क्रम में गुरुग्राम में मोहम्मद बरकत आलम के ‘टोपी कांड’ को मुख्यधारा के मीडिया गिरोह ने ‘हेट क्राइम’ कह कर छापा था। जब न्यूजलौंडी का झूठ नाम ले कर पकड़ लिया गया तो सीईओ सेखरी अंग्रेजी में गाली-गलौज करने लगा।

आयुष्मान भारत पर इन्होंने अर्धसत्य और लम्बे-लम्बे झूठ छापे ताकि इस योजना की साख गिरे। वहाँ इन्होंने पूरा प्रोपेगेंडा पेला कि इन लोगों को बाहर रखा जाएगा, उन्हें बाहर रखा जाएगा और हमने जाँच की तो पाया न्यूजलौंडी वही कर रहा था, जिसके लिए आज कल जाना जाता है: भावहीन चेहरे के साथ प्रपंच फैलाना। इनकी हिन्दूघृणा खुल कर सामने आ गई जब इन्होंने राष्ट्रपति कोविंद और उनकी धर्मपत्नी द्वारा जगन्नाथ मंदिर में ‘पुजारियों द्वारा जातिगत भेदभाव के कारण बुरे बर्ताव’ की बात खबरों में छापी। न्यूजलौंडी ने इस खबर को बाद में बेशर्मी के साथ हटा दिया।

साथ ही, इनके अनेक ऐसे कांडों में साइट पर या अपने स्तम्भकारों की मदद से प्रधानमंत्री मोदी के बारे वैचारिक जहर उगलने से ले कर सीधे-सीधे झूठ फैलाने की बातें सामने आईं कि गुजरात चुनावों के समय वो अजमेर शरीफ में एक मुसलमान चिश्ती से मिल रहे थे ताकि मुस्लिम तुष्टीकरण से फायदा हो। जबकि वो विडियो पुरानी थी। इसी तरह, प्रधानमंत्री की बातों को संदर्भ से बाहर ले कर न्यूजलौंडी ने लिखा कि नरेन्द्र मोदी ने ‘दलित विरोधी’ बात कही है। जबकि, इसके उलट जो बात कही गई वो यह थी कि मीडिया को हर खबर में दलित-सवर्ण जैसी बात लाने से बचना चाहिए।

अगर कल वाली (जनवरी 5, 2020) JNU हिंसा की बात करें तो न्यूजलौंडी के बिके जमीर की बात और निखर कर सामने आती है। पूर्वग्रह से ग्रस्त, आम जनता द्वारा लगातार नंगे किए जाने के बावजूद, अंतिम साँस की हुकहुकी पर चलते इस वामपंथी पोर्टल ने इस हिंसा के लिए ABVP को जिम्मेदार ठहराने का मन बना लिया था। इस कारण, जब इस पार्टी के बच्चे AIIMS में चिकित्सा के लिए पहुँचे तो इन्होंने एक डॉक्टर भट्टी को कहीं से निकाला और उनसे कहलवाया कि ‘ABVP वालों की चोटें फर्जी लग रही थीं।’ चूँकि खबर न्यूजलौंडी की थी तो पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस पर पड़ताल की। पता चला कि डॉक्टर साहब, डॉक्टर कम अजेंडाबाजी और राजनीति में ज्यादा सक्रिय हैं। डॉक्टर साहब CAA-NRC प्रदर्शनों के लिए प्रदर्शनकारी जुटाने के काम में अपने फेसबुक पेज पर व्यस्त पाए गए हैं। और अगर इतना ही काम नहीं था तो पता चला कि डॉ भट्टी कॉन्ग्रेस के मेडिकल सेल के नेशनल कन्वीनर हैं।

2018 की जनवरी में प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ की एक महिला पत्रकार, दमयंती धर, ने यह शिकायत अपने एडिटर से की कि जब वो एक डॉक्टर का इंटरव्यू ले रही थीं, तब एक कथित दलित एक्टिविस्ट केवल राठौड़ और कई अन्य लोगों ने उनके साथ न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि गालियाँ दी, मोबाइल छीने, विडियो डिलीट किया और उनके साथ जो हुआ वो रिकॉर्ड करते रहे। एडिटर ने कहा ‘जाने दो, ये सब तो पत्रकारिता में चलता रहता है’। दमयंती ने तब लिखा था कि उन्हें उस दिन समझ में आया कि वामपंथी एडिटरों का दोगलापन कैसा होता है। अब असली बात, न्यूजलौंडी जो खुद को मीडिया पर नजर रखने वाला कुत्ता कहता है, वो कुत्तपनी कर गया और उसने इस पर कोई रिपोर्ट नहीं की। ये जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनकी बिरादरी के पत्रकारों पर अगर कोई जोर से चिल्लाता भी है, तो झबरा अभिनंदन झाऊँ-झाऊँ करते हुए 360° देखने लगता है कि कहीं कोई भगवा रंग तो नहीं दिख रहा।

ये तो कुछ ऐसी खबरें हैं जो बताती हैं कि इनसे गलतियाँ नहीं होतीं, बल्कि सोच-समझ कर, योजनाबद्ध तरीके से न्यूजलौंडी इस तरह के ‘हिट जॉब’ में शामिल रहता है। नैरेटिव बना कर चुनाव की पूर्व संध्या पर वैचारिक लेखों के माध्यम से गैरभाजपा पार्टियों के लिए न्यूजरूम कैम्पेनिंग से ले कर, लोगों में हिन्दू-मुस्लिम घृणा फैलाने की बातें करना इनके कई अजेंडे में से एक है। ईकोसिस्टम के सहयोग से एक ही तरह की खबरें, वैचारिक स्तंभों के नाम पर, ‘हम तो निष्पक्ष हैं’ के चोले में, न्यूज़लौंडी और अभिनंदन सेखरी ने लगातार लिखी हैं, लिखवाई हैं।

न्यूजलौंडी पर विषयों का चयन भी उसकी विचारधारा के हिसाब से होता है, आम आदमी पार्टी की विचारधारा के हिसाब से होता है, और इस बात से होता है कि पाठकों का ध्रुवीकरण करने के लिए किस एंगल से, क्या बातें कहना उचित रहेगा। वैचारिक दंगाई, या विचारों का दोगलापन जैसे वाक्यांश अगर भौतिक शरीर पा जाते तो उनकी शक्ल अभिनंदन सेखरी से मिलती और बाल झबरा कुत्ते से। इसकी फर्जी, प्रपंची पत्रकारिता कैसी है, वो बताने के लिए मैं (दोबारा) यहाँ कोई हायपरलिंक नहीं दूँगा क्योंकि ऐसे पोर्टलों पर आपका एक विजिट भी उस पाप में आपका योगदान होगा, जो इस राष्ट्र को तोड़ रहा है।

ABVP वालों के चोट को फ़र्ज़ी बताने वाला डॉक्टर निकला कॉन्ग्रेस नेता, ‘रावण’ से लिंक, न्यूज़लॉन्ड्री की खुली पोल

एक नाम है- डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी। बताया गया है कि ये ईएमएस का डॉक्टर है और इसके बयान के आधार पर एबीवीपी को जेएनयू में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ये क्या है, इसकी पड़ताल तो हम करेंगे ही लेकिन सबसे पहले जानिए कि मामला क्या है? जैसा कि हमें पता है, जेएनयू में नकाबपोश वामपंथी गुंडों ने जम पर उत्पात मचाया। एबीवीपी की छात्र-छात्राओं की पिटाई की गई। सिक्योरिटी गार्ड्स और प्रोफेसरों तक को नहीं बख्शा गया। एबीवीपी के कई छात्रों को हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा। कई वायरल वीडियो से पता चला कि वामपंथियों ने पूरी हिंसा को अंजाम दिया है। हालाँकि, न्यूज़लॉन्ड्री जैसे प्रोपेगंडा पोर्टल्स ने कुछ और ही दिखाने का प्रयास कर के झूठ फैलाया।

प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने झूठ फैलाने के लिए डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के बयान का सहारा लिया। प्रोपेगंडा पोर्टल ने लिखा कि भट्टी एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं और एम्स में घायल छात्रों के भर्ती होने की बात सुनते ही वो भागे-भागे पहुँचे। बताया गया कि जेएनयू से 15 घायल छात्रों को ट्रामा सेंटर में लाया गया है, जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं। न्यूज़लॉन्ड्री ने डॉक्टर भट्टी के हवाले से बताया- “एक प्रोफेसर घायल हुए हैं। जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष के सिर में गंभीर चोटें आई हैं। उन्हें ‘रेड एरिया’ में शिफ्ट कर दिया गया है। एक छात्र की आँखों को नुकसान पहुँचा है। कई छात्रों को शरीर में अलग-अलग हिस्सों में चोटें आई हैं।“

न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार, डॉक्टर भट्टी ने एबीवीपी के दावों को मानने से इनकार कर दिया। डॉक्टर भट्टी ने दावा किया कि एबीवीपी के छात्रों को जो भी चोटें आई हैं, वो दिखावटी हैं। ऑपइंडिया के कई लेख में आप देख सकते हैं, जिसमें छात्रा वेलेंटिना की उँगलियों में चोटें आई हैं और उनकी मरहम-पट्टी हुई है। इसी तरह एबीवीपी नेता मनीष का हाथ टूट गया है। तो क्या ये माना जाए कि दिखावटी चोट के कारण एम्स ने उनका उपचार कर दिया और मरहम-पट्टी कर दी? इससे ही डॉक्टर भट्टी के बयान की पोल खुल जाती है। न्यूज़लॉन्ड्री ने उसी डॉक्टर भट्टी के बयान को प्राथमिकता दी है, जिन्होंने एबीवीपी के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाया है।

अब सवाल ये उठता है कि ये डॉक्टर भट्टी हैं कौन? इसके लिए नीचे ‘यूथ कॉन्ग्रेस’ के इस ट्वीट को देखिए। ये ट्वीट फ़रवरी 15, 2019 का है। लगभग एक वर्ष पहले का। इसमें कॉन्ग्रेस ने सूचित किया है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी को ‘ऑल इंडिया मेडिकल सेल’ का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। साथ ही कॉन्ग्रेस ने भट्टी को शुभकामनाएँ भी दी हैं। इससे क्या पता चलता है? डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी काफ़ी पहले से कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे हैं और पार्टी के पदाधिकारी भी हैं। क्या ऐसे व्यक्ति के बयान को आधार बना कर कोई निष्पक्ष दावा किया जा सकता है? इसका जवाब है- नहीं।

जब आप डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी का फेसबुक प्रोफाइल खँगालेंगे तो आपको पता चलेगा कि वो मोदी-विरोधी हैं और सीएए के विरोध में उन्होंने भीड़ जुटाई थी। उनके 4 फेसबुक पोस्ट्स से आप समझ सकते हैं कि कैसे वो अक्सर मोदी और भाजपा के ख़िलाफ़ ज़हर उगलता रहता है। डॉक्टर भट्टी ने एक फेसबुक पोस्ट में जामिया के डॉक्टरों द्वारा सीएए के विरोध में लगातार 6 दिन प्रदर्शन करने की बात कही है। उसने दावा किया था कि यूपी पुलिस ने डॉक्टरों को पीटा, उनपर गोली चलाई और उनके साथ बर्बरता की। जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है। ऑपइंडिया ने एएमयू थाने से संपर्क किया तो उन्होंने डॉक्टरों पर गोली चलाने या उन्हें पीटने की बात से इनकार किया।

अब आते हैं डॉक्टर भट्टी के दूसरे फेसबुक पोस्ट पर। अपने दूसरे फेसबुक पोस्ट में उसने दावा किया कि यूपी पुलिस ने सीएए के विरोध में बोलने पर आईएएस कन्नन गोपीनाथन को हिरासत में ले लिया है। उसने दावा किया कि सभी डॉक्टर सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ है। उसका एक और फेसबुक पोस्ट है, जिसमें उसने दावा किया है कि पुलिस ने जेएनयू के डॉक्टरों व नर्सों की पिटाई की है। डॉक्टर भट्टी ने भारत में क़ानून का राज ख़त्म होने और अराजकता फैलने की बातें की। बता दें कि कट्टर विपक्षी नेतागण भी ऐसी ही बातें कर के भाजपा और पीएम मोदी पर हमला करते हैं। उसने लिखा कि उसका संगठन ‘पुलिस के हमले’ की निंदा करता है।

अब बात डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के चौथे फेसबुक पोस्ट की, जिसमे उसने लिखा है कि मोदी और शाह ने 2019 कें जनादेश का अपमान किया है और जनता के साथ वादाखिलाफ़ी की है। उसने लिखा है कि अगर मोदी-शाह ऐसा ही करते रहे तो पूरे देश में दंगे होंगे। इन चार फेसबुक पोस्ट्स से पता चल जाता है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी वही सब कर रहा है, जो मोदी के अंधविरोध में विपक्ष और मीडिया का वामपंथी-कॉन्ग्रेसी गुट कर रहा है। यानी, मोदी-शाह के ख़िलाफ़ भीड़ जुटाने और ज़हर उगलने वाले व्यक्ति के राजनीतिक बयान को न्यूज़लॉन्ड्री ने ‘डॉक्टर का बयान’ बता कर पेश कर दिया।

क्या एक अंधविरोध से ग्रस्त राजनीतिक व्यक्ति का बयान ‘एक्सपर्ट ओपिनियन’ के रूप में प्रयोग किया जा सकता है? मान लीजिए अगर प्रियंका गाँधी बोलती हैं कि पीएम मोदी अगला चुनाव हार जाएँगे, तो ये लिखा जा सकता है कि ‘राजनीतिक विश्लेषक’ प्रियंका गाँधी ने फलाँ बयान दिया है। नहीं, उन्हें ‘कॉन्ग्रेस महासचिव’ प्रियंका गाँधी ही लिखा जाएगा। न्यूज़लॉन्ड्री ने डॉक्टर भट्टी के बयान के साथ यही खेल खेला है। सवाल ये उठता है कि क्या डॉक्टर भट्टी एम्स की तरफ़ से बयान दे रहा था? आख़िर प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री ने उनके बयान को एम्स के डॉक्टर का बयान बता कर क्यों पेश किया? क्या पी चिदंबरम के मोदी के ख़िलाफ़ दिए बयान को ‘लीगल एक्सपर्ट’ के बयान के रूप में दिखाया जाएगा या फिर कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री के बयान के रूप में?

मोदी विरोधी कॉन्ग्रेस समर्थक के बयान के आधार पर न्यूज़लॉन्ड्री ने दावा कर दिया कि एबीवीपी ने हिंसा की है और वामपंथी दंगाई निर्दोष हैं। ये ज़हरीला प्रोपेगंडा लोगों तक पहुँचाया गया। दरअसल, एम्स के वेबसाइट पर डॉक्टर भट्टी को ‘Alumna’ के रूप में दिखाया गया है। अगर ऐसा है तो फिर और भी कई सवाल उठते हैं। वो एम्स के वार्ड में कैसे घुसा और उसने एम्स की तरफ़ से मीडिया को बयान क्यों दिया? अगर वो अधिकृत ही नहीं है तो उसने छात्रों को लगी चोटों और उनके इलाज को लेकर एम्स की तरफ़ से टिप्पणी क्यों की? क्या उसे एम्स के वार्डस में जाने की अनुमति है या फिर उसे एम्स ने प्रवक्ता बनाया है? जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं है।

असलियत क्या है? असलियत ये है कि डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद का डॉक्टर है। उसने एक के बाद एक ट्वीट कर के दावा किया था कि चंद्रशेखर बीमार है और उसे हार्ट अटैक आ सकता है। हालाँकि, पुलिस ने उसके दावों को नकार दिया था। ‘स्क्रॉल’ सहित कई मीडिया संस्थानों ने भट्टी को ‘चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण’ का डॉक्टर बताया था और कहा था कि अगर उसे जेल से हॉस्पिटल में नहीं शिफ्ट किया गया तो उसकी जान जा सकती है। ‘रावण’ को दरियागंज में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।

तो क्या ‘रावण’ के डॉक्टर को न्यूज़लॉन्ड्री ने एम्स के मेडिकल एक्सपर्ट का बयान बता कर पेश किया? तो क्या भट्टी भी एक ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ है, जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ हर मुद्दे पर ज़हर उगलने के लिए कहीं भी पहुँच जाता है। डॉक्टर भट्टी के बारे में एम्स की वेबसाइट पर लिखा हुआ था कि वो मणिपाल हॉस्पिटल में कार्यरत है। जब मणिपाल हॉस्पिटल को कॉल किया गया तो पता चला कि इस नाम का कोई डॉक्टर वहाँ है ही नहीं। मणिपाल की वेबसाइट पर भी सर्च करने पर उसका नाम नहीं मिलता है। कुल मिला कर डॉक्टर हरजीत सिंह भट्टी के बारे में एक-एक चीज संदिग्ध है और न्यूज़लॉन्ड्री ने उसके बयान के आधार पर झूठा दावा कर दिया।

(इस लेख को स्वाति गोयल शर्मा और अभिजीत अय्यर मित्रा के रीसर्च के आधार पर तैयार किया गया है)

JNU हिंसा के दो चेहरे: जानिए कौन हैं नकाबपोशों का नेतृत्व करने वाली आइशी घोष और गीता कुमारी

जेएनयू में हुई हिंसा में ऐसे तो कई वामपंथी छात्र नेताओं के नाम सामने आए हैं लेकिन दो ऐसी महिला नेताएँ हैं, जिन्होंने मास्क पहने हिंसक भीड़ के नेतृत्व किया। दो अलग-अलग वायरल वीडियो में इन दोनों को देखा जा सकता है। एक महिला होकर महिला छात्रों पर ही अत्याचार करना, ये कहाँ तक जायज है? अव्वल तो ये कि बाद में यही वामपंथी महिलाधिकार के नाम पर धरना देते हैं, प्रदर्शन करते हैं और कैंडल लेकर निकलते हैं। जेएनयू की हिंसा की पहली किरदार हैं जेएनयूएसयू की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष। वहीं इसकी दूसरी किरदार हैं- गीता कुमारी, जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष।

आइशी और गीता, ये दोनों ही वामपंथी छात्रों का नेतृत्व करती रही हैं। सबसे पहले बात आइशी घोष की। अभी वो मीडिया के सामने बड़े-बड़े बयान देने में लगी हुई हैं। वो न हारने और न डरने की बातें करते हुए दावा कर रही हैं कि एबीवीपी ने उन पर हमला किया। लेकिन, वायरल वीडियो कुछ और स्थिति बताते हैं। एक वायरल वीडियो में आइशी घोष कुछ नकाबपोश लोगों के साथ जाती दिख रही हैं। वैसे तो उन्होंने पूरी सतर्कता बरती लेकिन वीडियो फुटेज ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। एक व्यक्ति ने ऊपर से अपने फोन से वीडियो लिया, जिससे आइशी की पोल खुल गई।

ये वीडियो सूर्यास्त के पहले का है, जिससे पता चल जाता है कि हमले किसने किए। आइशी नकाबपोशों को दिशा दिखा रही हैं कि उन्हें किधर जाना है। जेएनयूएसयू ने भी पुष्टि की है कि वो आइशी ही है लेकिन उसका कहना है कि वो एबीवीपी के लोगों को हॉस्टल से भगाने के लिए अंदर गई थी। जेएनयू छात्र संगठन अपने ही बयान में फँस गया। आइशी घोष सितंबर 2019 में सीपीएम के समर्थन से जेएनयूएसयू की अध्यक्ष बनी थीं। आइशी ने जीतने के बाद कहा था कि वो वामपंथ से प्रेरित हैं क्योंकि वामपंथ ही एक ऐसी विचारधारा है जो चुनाव पर चुनाव हारने के बावजूद लोगों से जुड़े मुद्दे उठाती है।

आइशी घोष के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें भी चोटें आई हैं। हालाँकि, जब वो हॉस्टल में घुसती दिख रही हैं, तब उन्हें चोट नहीं आई थी। इससे सवाल उठता है कि जब वो हिंसा करने वाले नकाबपोशों के साथ थीं तो फिर उन्हें चोट कैसे आ गई? मीडिया को भी सम्बोधित करने वो सिर में मरहम-पट्टी लगा कर आईं। हालाँकि, वामपंथी इससे पहले भी हिजाब और जैकेट के ऊपर से पट्टी बाँधने का नाटक कर चुके हैं। अगर आइशी को सच में किसी एबीवीपी वाले ने पीटा है तो फिर उसका कोई वीडियो और फोटो क्यों नहीं है? आइशी ने ही दावा किया था कि जब उनपर हमला हुआ, तब वहाँ उनके कई साथी मौजूद थे।

ये वही आइशी घोष हैं, जिन्होंने जेएनयू हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस दौरान छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। आइशी ने दिल्ली पुलिस पर छात्राओं के साथ अभद्रता करने का गंभीर आरोप लगाया था। अभी भी आइशी हिंसा के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा रही हैं जबकि जेएनयू के चुनावों में आरएसएस हिस्सा लेता ही नहीं है और न ही वो एक राजनीतिक पार्टी है। इस प्रोपेगंडा में आइशी घोष के परिवार का भी बयान लाया जा रहा है, जिसमें उनके पिता कहते दिख रहे हैं कि आज उनकी बेटी पर हमला हुआ है, कल को उनपर भी हो सकता है।

ये वामपंथी मीडिया का सबसे बड़ा प्रोपेगंडा रहा है। जब भी उनके गुट के किसी व्यक्ति पर कुछ आरोप लगते हैं या उसकी पोल खुलती नज़र आती है तो मीडिया उसके घर जाकर माता-पिता का इंटरव्यू लेता है और सहानुभूति की लहर तैयार करता है। न सिर्फ़ बुरहान वानी जैसे आतंकियों, बल्कि हैदराबाद के बलात्कारियों के साथ भी ऐसा ही किया गया। वामपंथी अक्सर महिलाओं, छात्रों और दिव्यांगों को आगे कर के अपनी लड़ाई लड़ते हैं। वो बार-बार दलितों और मुस्लिमों का नाम आगे करते हैं ताकि ऐसा लगे कि वो उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिलती है।

हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रही दूसरी महिला का नाम है गीता कुमारी। गीता को सितम्बर 2017 में जेएनयूएसयू का अध्यक्ष चुना गया था। गीता ने जब चुनाव जीता था, तब उन्होंने कहा था कि उनके माता-पिता पहले चाहते थे कि वो पढ़ाई पर अपना ध्यान केंद्रित करें। हालाँकि, उनका कहना था कि बाद में उनके घरवालों ने उनका समर्थन किया। जैसी कि वामपंथ की प्रकृति है, वो घरवालों के ख़िलाफ़ बगावत करने और माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को क्रांति के रूप में देखते हैं। जामिया हिंसा मामले में जब चंदा यादव नामक युवती की ब्रांडिंग का प्रयास किया गया था, तब उसके बारे में भी यही प्रचारित किया गया था। कहा गया था कि चंदा के माता-पिता को लगता था कि जामिया में वो मुस्लिमों के बीच कैसे रहेगी, लेकिन उसने परिवार के विरुद्ध जाकर वहाँ दाखिला लिया।

गीता कुमारी को एक वीडियो में हॉस्टल में बैठ कर नकाबपोशों से बातचीत करते देखा जा सकता है। उन्हें एक व्यक्ति आग्रह कर रहा होता है कि वो लोग जो भी करें वो 100 मीटर से दूर रह कर। इस वीडियो में वो उस व्यक्ति की बातों को अनसुनी कर हिंसा की योजना बनाते दिख रही हैं। उनके साथ नकाबपोश दिख रहे हैं, जिन्होंने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पिटाई की। गीता के चुनाव के दौरान न सिर्फ़ जम्मू कश्मीर और फिलिस्तीन की ‘आज़ादी’ का मुद्दा उछाला गया था, बल्कि नजीब को लेकर पीएम मोदी से सवाल पूछे गए थे।

गीता इससे पहले भी उपद्रव कर चुकी हैं। उन्होंने दर्जनों छात्रों के साथ जेएनयू में डीन के दफ्तर में हंगामा किया था। प्रोफेसर उमेश कदम ने बताया था कि गीता और उनके साथियों ने उनके दफ्तर में घुस कर उन पर हमला कर दिया। प्रोफेसर कदम को गीता और उनके साथियों ने मिल कर बँधक बना लिया था। बाद में सिक्योरिटी गार्ड्स की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया। गीता और उनके साथियों पर वीसी को गाली देने का भी आरोप लगाया था। उन्होंने वीसी के मंच के पास जाकर उपद्रव किया था। गीता भी एक ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ की तरह हैं। इन दोनों महिला नेताओं ने जेएनयू की हिंसा में अहम किरदार निभाया, ऐसा कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है और कई वीडियो से भी खुलासा हुआ है।

जब ऑपइंडिया ने जेएनयू के कुछ छात्रों से गीता और आइशी के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि ये दोनों ही भाजपा के ख़िलाफ़ घृणा लेकर घूमती हैं और अक्सर ब्राह्मणों के बारे में भली-बुरी बातें बोलती हुई पाई जाती हैं। इससे पता चलता है कि ये दोनों और इनका छात्र संगठन जातिवादी ज़हर बोने के भी प्रयास करता रहता है। गीता के बारे में कहा जाता है कि वो अक्सर अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के सेना में होने की बात बोलती है। बता दें कि ट्रोल गुरमेहर कौर भी विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के बलिदानी होने की बात उठाती आई हैं।

लेफ्ट इकोसिस्टम ने पहले ही रच ली थी JNU हिंसा की साज़िश: वामपंथियों की बौखलाहट का पूरा खाका

जेएनयू में वामपंथियों द्वारा आतंक का तांडव मचाने के पीछे एक बहुत बड़ी साज़िश है। यहाँ हम इस घटना के पीछे जितने भी कारक हैं, उनके बारे में बात करेंगे। हिंसा को लेकर बहुत कुछ मीडिया में आया भी है और आगे भी हम इसके बारे में बात करेंगे। लेकिन, सबसे पहले ये जानते हैं कि वामपंथी छात्रों ने ऐसा क्यों किया? इसके लिए सबसे पहले जेएनयू प्रशासन के बयान को देखते हैं। जनवरी 1, 2020 से जेएनयू का विंटर सेशन रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ। इसके लिए रजिस्ट्रेशन का काम चल रहा था। सालों भर उपद्रव, प्रदर्शन और दंगों में व्यस्त रहने वाले छात्रों को पठन-पाठन का कार्य मंजूर नहीं था और अकादमिक कैलेंडर के हिसाब से कार्य चल रहे थे, इससे वो ख़ासे चिंतित थे।

जेएनयू हिंसा के पीछे असली कारण

शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को अचानक से कुछ छात्र जेएनयू के ‘कम्युनिकेशन एंड इनफार्मेशन सेंटर (CIS)’ में घुस गए और उन्होंने वहाँ मौजूद कर्मचारियों को भगा दिया। इसके बाद इंटरनेट सर्विस को बाधित कर दिया गया। ये छात्र रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया का विरोध कर रहे थे। जेएनयू प्रशासन ने बताया कि इन छात्रों की इस करतूत के कारण उस दिन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया ठप्प रही। जेएनयू प्रशासन ने इस मामले की पुलिस कंप्लेंट भी की। अगले दिन सीआईएस फिर से चालू किया गया और कर्मचारी आम दिनों की तरह अपना काम करने लगे। हज़ारों छात्रों ने रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा लिया और फी भरी।

इसके बाद वो उपद्रवी छात्र फिर से लौट आए, जिन्होंने सीआईएस को ठप्प किया था। उन्होंने फिर से कर्मचारियों को भगा कर इंटरनेट सर्विस रोकने का प्रयास किया। वो ये देख कर बौखला गए थे कि हज़ारों की संख्या में छात्र रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे हैं। दंगाई छात्रों ने बिजली सप्लाई सिस्टम को तोड़फोड़ डाला। उन्होंने ऑप्टिकल फाइबर को नुक़सान पहुँचाया। जेएनयू ने इसे ‘आपराधिक साज़िश’ बताते हुए फिर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जेएनयू ने बताया है कि उपद्रवी छात्रों का ये गुट लगातार ऐसे छात्रों को परेशान कर रहा है, जो पढ़ाई के काम में लगे हैं।

उन्होंने कई कॉलेजों के गेट बंद कर दिए, छात्रों को क्लास जाने से रोका और कर्मचारियों व प्रोफेसरों के साथ बदतमीजी की। कई छात्रों ने जब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहा तो उन्हें मारा-पीटा गया। हॉस्टलों में भी उन छात्रों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया, जो रजिस्ट्रेशन कराना चाहते थे और जो अकादमिक कैलेंडर के हिसाब से चलना चाहते थे। शाम को ‘पेरियार’ हॉस्टल में दंगाई छात्र घुस गए और उन्होंने एबीवीपी से जुड़े छात्रों की पिटाई की। जैसा कि कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने ऑपइंडिया को बताया है, शॉल में पत्थर छिपा कर लाए कम से कम 500 दंगाइयों ने लाठी-डंडों से छात्रों पर हमला किया।

जेएनयू प्रशासन का बयान तस्वीर साफ़ कर देता है

आतंक का ये तांडव 8 घंटों तक चला। महिला छात्रों को भी नहीं बख्शा गया। रजिस्ट्रेशन कराने गए छात्रों की पिटाई की गई। एबीवीपी के छात्रों के रूम का गेट तोड़ कर उनपर हमला किया गया। किसी की गर्दन में चोटें आई हैं तो किसी का हाथ टूट गया है। जब कैम्पस में पुलिस पहुँची तो पुलिस के ख़िलाफ़ भी ‘गो बैक’ के नारे लगाए गए। छात्रों को घेर-घेर कर पीटा गया। एबीवीपी की एक छात्रा शाम्भवी की वेशभूषा में एक वामपंथी छात्रा ने हमले किए ताकि इसमें संगठन का नाम बदनाम हो। बाद में पता चला शाम्भवी ख़ुद घायल हुई हैं और वामपंथी गुंडों की पोल खुल गई।

इसकी पटकथा पिछले कुछ सप्ताह से लिखी जा रही थी। इन दंगाई छात्रों ने एडमिन ब्लॉक में जम कर तोड़फोड़ मचाई थी। यहाँ तक कि कुलपति के दफ़्तर को भी नहीं छोड़ा गया। वहाँ भी तोड़फोड़ मचाई गई। जेएनयू प्रशासन का पूछना है कि क्या ये दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि कुछ उपद्रवियों के कारण उन छात्रों को ख़ासी परेशानी हो रही है, जो सचमुच पढ़ाई करने के लिए वहाँ आए हैं। जेएनयू के बयान और रजिस्ट्रेशन रोकने की वामपंथियों की बौखलाहट से काफ़ी-कुछ स्पष्ट हो जाता है। यहाँ सोचने वाली बात ये है कि वामपंथी विश्वविद्यालय में अध्ययन संबंधी कार्य क्यों नहीं होने देना चाहते?

कुछ अन्य मुद्दे, जो वामपंथियों की बौखलाहट का कारण बने

सीएए को लेकर दंगा किया गया। पूरे देश को आगजनी में झोंकने का प्रयास किया गया। विदेशी मीडिया संस्थानों में लेख लिख कर भारत की छवि ख़राब करने की कोशिश की गई। जामिया में आयशा और लदीदा नामक दो जिहादियों को छात्र नेता बता कर पेश किया गया। उनके लिए पूरा का पूरा ड्रामा रचा गया, ताकि ऐसा लगे कि वो ‘पुलिस बर्बरता’ के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही हैं। एएमयू में हिंसा भड़काई गई। सीएए विरोध के नाम पर हज़ारों मुस्लिमों की भीड़ ने ट्रेनों को जलाया और यात्रियों पर पत्थरबाजी की। लेकिन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक फ़ैसले ने वामपंथियों के इस खेल को बदल दिया।

सीएम योगी ने स्पष्ट कहा कि सीसीटीवी व प्रत्यक्षदर्शियों की मदद से दोषियों को चिह्नित किया जाएगा और जिसने भी सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया है, उसकी संपत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। एक-एक दंगाई को चिह्नित किया जाने लगा और पोल खुलने लगी कि इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं? बौखलाए वामपंथियों को तब करारा झटका लगा, जब सद्गुरु सरीखी हस्ती ने सीएए को लेकर अपनी राय साझा की और जनता को भ्रम में न पड़ने की सलाह दी। भाजपा ने सीएए के समर्थन में मिस्ड कॉल अभियान शुरू किया और उसे तगड़ा समर्थन मिला। वामपंथी आकाओं ने सोशल मीडिया पर चिंता जाहिर करनी शुरू कर दी कि मिस्ड कॉल के आँकड़े आएँगे तो मीडिया उन्हें जम कर चलाएगा।

उनका ये ‘डर’ तब और बढ़ गया, जब भाजपा ने 3 जनवरी से 3 करोड़ घरों में सीधे दस्तक देकर सीएए के फ़ायदे समझाने शुरू कर दिए। भाजपा के दोनों अध्यक्षों से लेकर साधारण कार्यकर्ताओं तक, सभी ने इस अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। खेल बदल चुका था। जिस मसले को वामपंथियों ने बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया, वो इतना अच्छा क़ानून था कि उसके बारे में जनता को समझा कर भाजपा को ही फ़ायदा होने लगा। वामपंथियों ने अंत में शाहीन बाग़ में ड्रामा खेल कर अपना सबकुछ झोंक दिया। 90 वर्ष की बूढी महिलाओं से लेकर मात्र 20 दिन तक की बच्ची को विरोध प्रदर्शन का चेहरा बनाया गया।

एनडीटीवी सरीखे चैनलों ने इन चेहरों को ख़ासी तवज्जो दी लेकिन सबकुछ विफल रहा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जोधपुर में स्पष्ट कर दिया कि विपक्षी जो करना है कर लें, सरकार सीएए पर एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी और जनता को घर-घर जाकर इसके बारे में समझाएगी। दिल्ली पुलिस को बदनाम करने की लाख कोशिश की गई लेकिन उससे भी कुछ फ़ायदा नहीं हुआ। जामिया की जिहादिनों से लेकर शाहीन बाग़ के ड्रामे तक, सब फेल होने के बाद वामपंथियों ने अपना अंतिम हथियार निकाला और अपने छात्र संगठन का इस्तेमाल कर के हिंसा और दंगे को अंजाम दिया।

वामपंथी इकोसिस्टम की गहरी साज़िश का पर्दाफाश

अब आते हैं उपद्रवियों व दंगाइयों के आकाओं पर। ये वो लोग हैं, जो जनता को भड़काते हैं, बरगलाते हैं और उनके भीतर ‘डर’ बैठा कर उनका इस्तेमाल करते हैं। इनमें हर क्षेत्र में अच्छा नाम कमा चुके लोगों से लेकर बेरोज़गारी का दौर देख रहे लोगों तक शामिल हैं। राजनीति, साहित्य, सिनेमा और पत्रकारिता- ये चार ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ इन लोगों की बड़ी पैठ है। जेएनयू में हिंसा की ख़बर आते ही स्वरा भास्कर ने तुरंत एक वीडियो शूट किया और लोगों से भारी संख्या में जेएनयू मेन गेट के पास आने की अपील की। ये अपील आम जनता से नहीं बल्कि वामपंथ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से थी।

पुणे स्थित एफटीआईआई में छात्रों ने एक विशाल बैनर लगा कर जेएनयू के समर्थन में रैली निकाली। इतनी जल्दी, इतना बड़ा बैनर कैसे तैयार हो गया? इससे तो ऐसा लगता है कि पहले से सारी साज़िशें रच ली गई थीं। अनुराग कश्यप का ट्वीट तुरंत आ गया, जिसमें उन्होंने भाजपा, एबीवीपी, पीएम मोदी और शाह- सबको आतंकवादी बता दिया। बरखा दत्त सरीखे पत्रकारों ने तुरंत एबीवीपी को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराने के लिए अफवाहें फैलानी शुरू कर दी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी कुछ पत्रकारों से अंग्रेजी में ट्वीट करवाया गया कि छात्रों पर अत्याचार हो रहा है। भारत सरकार की छवि बिगाड़ने की कोशिश की गई।

अरविन्द केजरीवाल ने तुरंत ट्वीट कर के लिखा कि वो हिंसा की निंदा करते हैं। ये एक बहुत बड़ी चालाकी होती है। ‘हिंसा की निंदा’ करते समय वो न तो पीड़ित न नाम बताते हैं और न ही उनलोगों के बारे में कुछ बताते हैं, जिन्होंने हिंसा की। सीधा ‘हिंसा की निंदा’ कर देने से और बाकी सारी चीजें छिपा लेने से नकारात्मकता का माहौल तो बनता ही है और साथ ही इससे सरकार पर निशाना साधने में भी आसानी होती है। आख़िर इतनी जल्दी पूरा का पूरा लेफ्ट इकोसिस्टम हरकत में कैसे आ गया? इतनी जल्दी पोस्टर-बैनर कैसे बन गए? इतनी जल्दी बड़ी संख्या में लोगों को प्रदर्शन के लिए इकठ्ठा कैसे कर लिया गया? क्यों न माना जाए कि ये सबकुछ पूर्व-नियोजित साज़िश के तहत क्रमबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।

सुबह होने से पहले ही रात के 2 बजे ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ पर वामपंथियों की एक बड़ी भीड़ जुट गई। ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ जैसे नारे लगाने की ख़बरें आईं, जिनकी पुष्टि होनी अभी बाकी है। अगर गुस्सा जेएनयू हिंसा को लेकर था तो हिंसा करने वाले वामपंथियों के ख़िलाफ़ किसी ने भी कुछ क्यों नहीं लिखा? इसमें हिन्दू, ब्राह्मण और भाजपा कैसे घुस गए? याद कीजिए, सीएए के समय भी मजहबी नारेबाजी की गई थी, हिन्दू प्रतीक चिह्नों का अपमान किया गया था और देवी-देवताओं का मज़ाक बनाया गया था। इससे पता चलता है कि लेफ्ट इकोसिस्टम सीएए और जेएनयू के बहाने हिंदुत्व के ख़िलाफ़ अपनी घृणा को एक मुखौटा पहनाना चाहता है।

झूठ फैलाने की सारी हदें पार कर दी गईं

सबसे पहले बात बरखा दत्त की। बरखा ने एक व्हाट्सप्प ग्रुप में हुए चैट का स्क्रीनशॉट शेयर किया। इसमें दावा किया गया कि ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ नामक ग्रुप में हिंसा की साज़िश रची जा रही है। ग्रुप का नाम ऐसा रखा गया है, जिससे प्रतीत होता है कि ये एबीवीपी का ग्रुप है। लेकिन, ये दाँव उलटा पड़ गया। जब लोगों ने उस नंबर को खँगाला तो उसका कॉन्ग्रेस कनेक्शन सामने आया। ‘ट्रू कॉलर’ नामक ऐप कर भी उसका नाम ‘आईएनसी’ से ही सेव था। इसके बाद कॉन्ग्रेस ने ट्वीट कर के सफ़ाई देते हुए कहा कि उसने पूर्व में ऐसे कई नंबरों की सेवा ली थी, जिनका अब पार्टी से कोई नाता नहीं है। हालाँकि, तब तक उनकी पोल खुल चुकी थी।

इसी तरह एबीवीपी की कार्यकर्ता की वेशभूषा में एक वामपंथी महिला को तैयार किया गया, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। उनके इस प्रोपेगेंडा की भी पोल खुल गई। वामपंथी छात्र संगठन के चैट का स्क्रीनशॉट वायरल हुआ, जिससे पता चला कि योजना बना कर हमले किए गए थे। इस ग्रुप में ‘संघी गुंडों की पिटाई’ और ‘ये तो ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है’ जैसे मैसेजों का आदान-प्रदान हुआ। इस ग्रुप से ही पता चला कि वामपंथियों ने पहले ही योजना बना ली थी कि वो लोहे के रॉड और डंडों से हमला करेंगे। जामिया से भी गुंडों को बुलाने की बातें की गईं। इस चैट को नीचे देखें:

वामपंथी ग्रुप का वायरल चैट: हमले की प्लानिंग

जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष और वामपंथी नेता आइशा घोष को नकाबपोश गुंडों के नेतृत्व करते हुए देखा गया। जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी को नकाब पहने दंगाइयों के साथ हमले की साजिश रचते हुए देखा गया। इन सबके वीडियो वायरल हुए, जिसके बाद वामपंथी गैंग की पोल खुली। राणा अयूब जैसे पत्रकारों ने अफवाह पर अफवाह फैला कर अपने मकसद को अंजाम देने का प्रयास किया। जबकि सच्चाई क्या है, ये घायल छात्रों ने ऑपइंडिया को बताया। घायल छात्रा वेलेंटिना ने बताया कि हॉस्टल रूम से लेकर मेस तक घुस कर एबीवीपी वालों को पीटा गया। महिलाओं के साथ बदतमीजी करने से लेकर प्रोफेसरों के साथ धक्का-मुक्की तक, वामपंथी गुंडों ने लगातार हमले किए।

जेएनयू में लगातार हो रहे विवाद, हिंसा व दंगों का निदान क्या?

जेएनयू पिछली बार कब किसी अच्छे कारण से सुर्ख़ियों में आया था, ये दिमाग पर लाख ज़ोर देने के बावजूद याद नहीं आता। वहाँ कई लोग हैं जो अच्छा कार्य कर रहे हैं लेकिन वो वामपंथियों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा और छात्रों के गुटों के बीच लगातार होते टकराव के कारण छिप जाते हैं। हमने देखा कि जो पढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी पढ़ने नहीं दिया जा रहा। कई ऐसे छात्र हैं, जो ग्रामीण परिवेश से आए हैं और उनके व उनके परिवार की पूरी उम्मीद फ़र्ज़ी राजनीति पर नहीं, जेएनयू के अकादमिक कैलेण्डर पर टिकी है। उनका क्या होगा? सबसे पहले उपाय ये है कि जेएनयू में छात्र राजनीति पर कुछ सालों के लिए लगाम लगाई जाए।

वाराणसी के बीएचयू में भी एबीवीपी से लेकर सभी छात्र संगठनों की उपस्थिति है। वहाँ छात्र संघ के चुनाव नहीं होते लेकिन तब भी वहाँ छात्र अपनी माँगें रखते हैं, विरोध प्रदर्शन करते हैं और देशहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी करते हैं। क्या राजनीति और चुनाव होने से ही एक यूनिवर्सिटी की पहचान बनती है? अगले कुछ वर्षों के लिए जेएनयूए में चुनाव व राजनीति सम्बन्धी गतिविधियों पर लगाम लगा कर यहाँ लगातार हो रहे विवाद को थामा जा सकता है। अगर ऐसे कोई क्रियाकलाप होते भी हैं तो इसे पूर्ण पुलिसिया संरक्षण में कराया जाना चाहिए। ऐसी सुरक्षा हो, जहाँ एक व्यक्ति को भी हिंसा करने की इजाजत न हो।

जहाँ वामपंथियों की अच्छी-खासी उपस्थिति है, वहीं राजनीतिक हिंसा की वारदातें ज्यादा क्यों होती हैं? केरल में संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं का ख़ून बहाया जाता है। पश्चिम बंगाल में कभी तृणमूल के कार्यकर्ताओं के साथ यही किया गया था। ये अलग बात है कि आज तृणमूल की भी यही नीति है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने से पहले तक लगातार कत्लेआम मचाया गया। इन सभी राज्यों में वामपंथियों के सबसे अच्छे दौर में ऐसी वारदातें हुईं। जैसे ही उनकी उपस्थिति कमज़ोर पड़ी, उनके कार्यकर्ताओं ने हिंसा करनी भी शुरू कर दी। अब वो इसी फॉर्मूले को जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में आजमा रहे हैं। छात्रों को आगे कर के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी जा रही है।

प्रियंका-कॉन्ग्रेस आग बुझाने का काम करती हैं और ये आग लगाने का, मोदी-शाह दंगों के एक्सपर्ट: राशिद अल्वी

मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में कॉन्ग्रेस के नेता और उनके समर्थक JNU में हुई हिंसा के लिए केंद्र सरकार पर दोष मढ़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह को खलनायक के तौर पर चित्रित करने का भी काम कर रहे हैं।

Zee News की ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को “Experts in Roiting” यानी “दंगों का एक्सपर्ट” तक कह डाला। अमरोहा में, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता ने प्रियंका गाँधी और कॉन्ग्रेस को ‘आग बुझाने वाला’ और दो बीजेपी सुप्रीमों को ‘आग लगाने वाले लोग’ बताया।

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, “अमित शाह और नरेंद्र मोदी का इतिहास पूरे देश में विख्यात है। यह दोनों दंगे कराने में विशेषज्ञ रहे हैं। अमेरिका ने उन्हें वीज़ा देने से मना कर दिया था, देश के लोग उनके इतिहास को अच्छी तरह से जानते हैं।”

राशिद अल्वी ने कहा, “प्रियंका गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी आग बुझाने का काम करती हैं और ये लोग (मोदी-शाह) आग लगाने जा रहे हैं।” इसके आगे कॉन्ग्रेस नेता ने आरोप लगाते हुए कहा कि मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान दोनों एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी और इमरान खान एक साथ हैं और यही कारण है कि यह सब हो रहा है।”

राशिद अल्वी ने पीएम मोदी के ख़िलाफ़ ऐसा पहली बार मोर्चा नहीं खोला है। इससे पहले, 2013 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, अल्वी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘यमराज’ कहा था। यह बड़ी विचित्र बात है कि कॉन्ग्रेस नेता जिस मुद्दे के लिए मोदी और शाह को ‘दंगों का विशेषज्ञ’ कह रहे हैं, उसमें उन्हीं के पार्टी के सदस्यों का हाथ होने की ख़बर सामने आई है।

रविवार (5 जनवरी) को JNU परिसर में नक़ाबपोश गुंडों ने दंगा किया और छात्रों को मारा-पीटा। इस दंगे को ABVP के सिर मढ़ने के लिए जिस व्हाट्सअप ग्रुप का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर JNU छात्र संगठन की पूर्व अध्यक्ष गीता ने शेयर किया उसका कनेक्शन वामपंथियों से था। इस ग्रुप में शामिल कई लोगों के नंबर साफ़तौर पर नज़र आए। इन नंबर्स की जब पड़ताल की गई तो पता चला कि उसमें एक नंबर अमन सिन्हा नाम के छात्र का था।

बता दें कि यह वहीं अमन सिन्हा था जिसका संबंध भाजपा से नहीं बल्कि कन्हैया कुमार, उमर खालिद जैसे वामपंथियों और कट्टरवादियों से था। इतना ही नहीं अमन सिन्हा की वॉल पर, उसके द्वारा शेयर की गई तस्वीरों से यह साफ पता चलता है कि इस पूरे कारनामे को सुनियोजित ढंग से अंजाम देने के लिए किसने अपनी भूमिका निभाई। ऐसे में कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी का मोदी और शाह को लेकर दिया गया बयान आधारहीन ही नहीं बल्कि मनगढ़ंत भी है।

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एनडीटीवी एक ऐसा नाम है, जो किसी भी मसले की रिपोर्टिंग इस आधार पर करता है कि उसमें भाजपा, मोदी-शाह अथवा हिंदुत्व का नाम घसीटा जा सके। जहाँ इनका नाम आने की सम्भावना नहीं रहती, वहाँ एनडीटीवी ऐसा कुछ नहीं करता। मुस्लिम फ़क़ीर को काला जादू वाले तांत्रिक बना कर पेश करने वाला एनडीटीवी अरविन्द केजरीवाल को चुनावी फायदा पहुँचाने के लिए एक इंटरव्यू किया, जिसमें आप कार्यकर्ताओं को ‘आम आदमी’ बता कर उनसे केजरीवाल की तारीफ करवाई गई। ख़ासकर जब मामला भाजपा व दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़ा हो, एनडीटीवी उसमें उनके किरदार को नकारात्मकता के साथ पेश करेगा, ऐसा तय होता है।

लेकिन, अबकी नकारात्मकता फैलाने वाले एनडीटीवी ने भी वामपंथियों को धोखा दे दिया है। एनडीटीवी ने स्वीकार किया है कि जेएनयू में हिंसा की वारदात शुरू करने में वामपंथियों का हाथ था। वामपंथी संगठन आइसा ने हिंसा की शुरुआत की। यानी, एनडीटीवी ने माना है कि इस पूरे फसाद की जड़ वामपंथी उपद्रवी हैं। पहला हमला लेफ्ट छात्रों की ओर से हुआ। एनडीटीवी की इस ख़बर से उन वामपंथियों को झटका लगना तय है, इनकी सारी उम्मीदें इस चैनल पर टिकी हुई थीं। उन्हें अप्रत्याशित तरीके से धोखा मिला है। वो शायद ही एनडीटीवी को माफ़ कर पाएँ।

एनडीटीवी ने माना है कि जब वामपंथी छात्रों ने हॉस्टल में हमला किया, तब वहाँ एबीवीपी के काफ़ी कम छात्र थे। इससे पता चल जाता है एबीवीपी से जुड़े छात्रों को किस कदर पीटा गया होगा। एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में ये भी माना है कि वामपंथियों ने वहाँ मौजूद 10 पुलिसकर्मियों से भी हाथापाई की। इसपर चुटकी लेते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “लाजिमी है, अब वो एनडीटीवी नहीं देखेंगे!” इस पंक्ति से फैज़, एनडीटीवी और वामपंथी- तीनों पर ही निशाना साधा गया।

यहाँ तक कि एनडीटीवी की इस सूचना को एबीवीपी वालों ने भी शेयर किया। एबीवीपी ने कहा कि अब तो एनडीटीवी ने भी मान लिया है कि सारे फसाद की जड़ वामपंथी हैं। एनडीटीवी भी मान रहा है कि वामपंथियों ने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर हमले करने शुरू किए। एबीवीपी ने इस ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर शांति स्थापित करनी है तो ये वामपंथी संगठनों को प्रतिबंधित करने का सबसे सही समय है। इससे देश के सभी विश्वविद्यालयों में शांति आएगी। एबीवीपी की राष्ट्रीय महासचिव निधि त्रिपाठी ने इस ख़बर पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा:

“अब तो एनडीटीवी भी स्वीकार कर चुका है कि हिंसा का स्रोत कम्यूनिस्ट हैं। ऐसे में, फिल्म जगत और बौद्धिक जगत के भ्रमित तथाकथित लिबरल्स को भी स्वीकार करने में कोई संकोच नही करना चाहिए कि वामपंथियों ने हिंसा की है। एबीवीपी के विषय में कल से सोशल मीडिया में जो भी भ्रामक प्रचार हुआ, एनडीटीवी की ख़बर के साथ ही उसका अंत हो चुका है।”

हालाँकि, एनडीटीवी को जल्द ही समझ में आ गया गया कि उसे क्या प्रोपेगंडा फैलाना है और उसने कई ऐसे न्यूज़ रिपोर्ट्स किए, जिसमें एबीवीपी को इस हमले के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। एबीवीपी ने संदिग्ध स्क्रीनशॉट्स के माध्यम से ऐसा दावा किया। ऐसे ही एक स्क्रीनशॉट को बरखा दत्त ने शेयर किया था। बाद में पता चला कि वो जिसे एबीवीपी का कार्यकर्ता बता कर हिंसा की साज़िश रचने का आरोप लगा रही थी, वो कॉन्ग्रेस का निकला। वो नंबर कॉन्ग्रेस से जुड़ा हुआ है, पार्टी ने भी ऐसा स्वीकार किया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने कहा कि अब वो उस नंबर की सेवाएँ नहीं ले रहा है।

दिल्ली पुलिस ने बताया है कि कई नकाबपोशों की शिनाख्त हो गई है और क्राइम ब्रांच को मामला सौंप दिया गया है। एनडीटीवी ने पत्थरबाजी के बहाने एबीवीपी पर आरोप लगाया है। एक प्रोफेसर का बयान प्रकाशित किया गया है, जिसमें उसने कहा है कि बड़े-बड़े पत्थरों से उपद्रवियों ने हमला किया। जबकि, ऑपइंडिया से बातचीत में घायल छात्रा वेलेंटिना ने बताया कि उपद्रवी शॉल के नीचे पत्थर छिपा कर लाए थे और वो सभी वामपंथी थे। ऐसे में एनडीटीवी की ख़बर को ही आधार बनाएँ और उसे वेलेंटिना के बयान से जोड़ कर देखें तो पता चलता है कि प्रोफेसरों पर भी वामपंथियों ने ही हमला किया।

एनडीटीवी ने दावा किया है कि जब ये हमला हुआ, तब जेएनयू के सारे स्ट्रीट लाइट्स को ऑफ कर दिया गया था। वैसे, ये पहली बार नहीं है जब जेएनयू के उपद्रवियों के प्रदर्शन के दौरान स्ट्रीट लाइट्स ऑफ किया गया हो। जब हॉस्टल फी बढ़ाने को लेकर उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, तब भी स्ट्रीट लाइट्स ऑफ कर दिए गए थे। इसके बाद जेएनयू के छात्रों द्वारा पुलिस पर पत्थरबाजी करने की सूचना मिली थी। हालाँकि, जेएनयू के छात्रों ने कहा था कि पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया। क्या ऐसा संभव नहीं कि दंगाई वामपंथियों ने पकड़े जाने के डर से स्ट्रीट लाइट्स ऑफ कर दिए हों?

हालाँकि, एनडीटीवी अब भले ही वामपंथियों को ख़ुश करने के लिए भाजपा व एबीवीपी को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 1000 लेख लिखे, डैमेज हो चुका है। वो कहते हैं न, सच छिपाए नहीं छिपता। शायद एनडीटीवी पर यही कहावत फिट बैठती है। एक लाइन की ख़बर ने वामपंथियों को इतना निराश किया है कि वो ‘अपने’ टीवी चैनल पर भी भरोसा करने से पहले शायद कई बार सोचें। वैसे, एनडीटीवी ने बड़ी चालाकी से एबीवीपी छात्रों द्वारा लगाए गए आरोपों व जारी किए गए सबूतों को छिपा लिया।

एनडीटीवी ने अपने एक भी लेख में उन स्क्रीनशॉट्स और वीडियो का जिक्र नहीं किया, जिसमें वामपंथियों द्वारा हमले करने की बात पता चलती है। शुक्रवार (जनवरी 3, 2020) को दोपहर में वामपंथी गुंडों ने रजिस्ट्रेशन कराने आए छात्रों की खुलेआम पिटाई की। प्रसार भारती सहित कई बड़े मीडिया संस्थानों ने अपने ट्विटर हैंडल से इस वीडियो को शेयर किया। लेकिन, एनडीटीवी ने एक बार भी इस वीडियो का जिक्र तक नहीं किया। हाँ, उसने ‘सूत्र’ के हवाले से दावा किया कि जेएनयू में पहले हमला लेफ्ट वालों ने किया।

फाइनेंशियल टाइम्स को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लगाई लताड़, लिखा था- हिंसक भीड़ को ‘राष्ट्रवादी’

जेएनयू में रविवार (जनवरी 6, 2020) की रात हुई हिंसा के बाद कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इस मामले पर अपनी रिपोर्टिंग की। लेकिन, इसी बीच फाइनेंशियल टाइम्स ने इस मामले को कवर करते हुए अपनी खबर को नया एंगल देने का प्रयास किया और हेडलाइन में दंगा करने वालों के लिए उपद्रवी भीड़ (Rowdy Mob), हिंसक भीड़ (Violent MOB), दंगाइयों (Rioters) की भीड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने की बजाय ‘उत्पातियों’ को ‘राष्ट्रवादियों (nationalist)’ की भीड़ बताया।

फाइनेंशियल टाइन्स की खबर की हेडलाइन

हालाँकि, सोशल मीडिया पर एक विदेशी मीडिया द्वारा ‘राष्ट्रवादी’ शब्द का अपमान होता देख कई भारतीयों ने फाइनेंशियल टाइम्स को खरी खोटी सुनाई। लेकिन इसी दौरान भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी फाइनेंशियल टाइम्स को जमकर लताड़ा।

उन्होंने नकाबपोश दंगाईयों को, जिन्होंने छात्रों और शिक्षकों पर हमला किया, उन्हें राष्ट्रवादी कहने पर विदेशी मीडिया को टैग करते हुए व्यंगात्मक लहजे में लिखा कि दुनिया भर के टैकनोलजिस्ट उस तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए उत्सुक हैं, जिसका इस्तेमाल करके फाइनेंशियल टाइम्स ने मुँह पर नकाब ढके लोगों को ‘राष्ट्रवादी’ करार दिया।

गौरतलब है कि अपने इस ट्वीट में केंद्रीय मंत्री ने फाइनेंशियल टाइम्स को जवाब देते हुए ये भी लिखा कि भारत में हर विश्वविद्यालय और संस्थान धर्मनिरपेक्ष हैं। बता दें उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी हेडलाइन में लिखा था कि राष्ट्रवादियों की भीड़ ने दिल्ली स्थित सेकुलर विश्वविद्यालय पर हमला बोला।

अपने ट्वीट में फाइनेंशियल टाइम्स को लताड़ लगाते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम्हारे लिए भारत को समझना थोड़ा मुश्किल हैं। लेकिन ये एक कोशिश हैं। हर मौक़ा मिलने पर देश के टुकड़े होने की भविष्यवाणी करना बंद करो। भारत विविधतापूर्ण लोकतंत्र है और सभी मतभेदों को समाहित कर हमेशा सशक्‍त होकर उभरा है।”

इसके बाद प्रकाश जावड़ेकर ने अपने अगले ट्वीट में ही फाइनेंशियल टाइम्स की एक पुरानी रिपोर्ट की फोटो को साझा किया। साथ ही भारत के प्रति उनकी समझ और उनकी रिपोर्टिंग को निम्न स्तर का करार दिया।

बता दें, सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्टिंग की आलोचना की है और इस तरह के लेखों को बरगलाने वाला बताया है। लोगों का कहना है कि फाइनेंशियल टाइम्स जैसे मीडिया सिर्फ़ आग में घी डालने का काम करते हैं, आखिर उन्हें कैसे पता कि नकाबपोश राष्ट्रवादी थे? ऐसे संस्थानों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि 5 जनवरी की शाम जेएनयू में हुई घटना के बाद और विदेशी मीडिया को जवाब देने से पहले, भाजपा नेता ने विपक्ष के हमलों का भी जवाब दिया था। जहाँ उन्होंने पूरे प्रकरण की निंदा की थी। साथ ही विपक्ष के आरोपों पर कहा था कि कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट, आम आदमी पार्टी के साथ कुछ तत्व जानबूझकर देश भर में और खासकर विश्वविद्यालयों में हिंसा का माहौल तैयार करना चाहते हैं, इसलिए इसकी जाँच अच्छे से होनी चाहिए।