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‘तेरी माँ की…’ गाली देने वाला है The Hindu का पूर्व जर्निलस्ट, रेप पीड़िता को भी कह चुका है K*tti, har*#zadi

रविवार को नकाबपोश गुंडों ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) कैंपस में धावा बोला और हॉस्टल में छात्रों को निशाना बनाया। लाठी, पत्थरों और लोहे की छड़ों के साथ गुंडों ने हाथापाई, मारपीट और खिड़कियों, फर्नीचर सामानों में तोड़फोड़ की। बता दें कि हिंसा की शुरुआत सर्वर रूम से शुरू हुई थी। वामपंथी गुंडों ने छात्रों को विंटर सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन से रोकने के लिए सर्वर रूम को लॉक कर दिया था, वाई-फाई काट दिया था। जेएनयू के पेरियार हॉस्टल के भीतर घुसकर छात्रों के साथ हुई हिंसा के बाद विश्वविद्यालय के बाहर काफी बवाल हुआ।

इसी दौरान रिपब्लिक भारत के रिपोर्टर पीयूष मिश्रा भी रिपोर्टिंग करने वहाँ पहुँचे थे। वहाँ पर उपस्थित छात्रों के साथ ही फ्रीलांस जर्नलिस्ट अभिमन्यु सिंह उर्फ अभिमन्यु कुमार ने भी गाली-गलौच और बदसलूकी की। बता दें कि अभिमन्यु सिंह मीडिया संस्थान द हिन्दू, संडे गार्डियन में काम कर चुके हैं और फिलहाल ऑनलाइन पोर्टल जनता की आवाज के साथ जुड़े हुए हैं।

अभिमन्यु सिंह ने रिपबल्कि टीवी के पत्रकार के साथ की बदसलूकी

इस वीडियो में लगभग 18 सेकेंड में नीली जैकेट और लाल दुपट्टे में एक व्यक्ति पीयूष मिश्रा के पास पहुँचता है और उसके साथ धक्का-मुक्की की। वह अभिमन्यु सिंह हैं।

अभिमन्यु सिंह के फेसबुक से ली गई फोटो

ऑपइंडिया की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद हरियाणा की रहने वाली एक महिला मीना (बदला हुआ नाम) ने हमसे संपर्क किया और आरोप लगाया गया कि सिंह ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और उसे ‘K*tti’ और ‘har*mzadi’ कहा।

मीना ने दावा किया कि जब उन्होंने डच निवासी पीटर डी ब्रुइजन पर बलात्कार का आरोप लगाया तो सिंह की पत्नी ऐलेट्टा आंद्रे, जो कि भारत में डच जर्नलिस्ट है, ने इंटरनेशनल पब्लिकेशन में उनको बदनाम कर दिया था।

मीना ने 7 जुलाई, 2018 को गुरुग्राम पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज करवाया था। इसमें कहा गया था कि पीटर ने अपनी शादी के बारे में उससे झूठ बोला था और फिर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। इस FIR की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी है। मीना ने आरोप लगाया कि पीटर ने शादी का वादा करके उसके साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाए थे। हालाँकि, जब मीना प्रेगनेंट हुई तो सिंह ने उस पर अबॉर्शन के लिए मजबूर किया गया।

मीना ने अपने FIR में कहा कि सितंबर 2014 में उन्होंने पीटर के खिलाफ रेप केस दर्ज करवाया था। हालाँकि मार्च 2019 में आरोपित पीटर नीदरलैंड चला गया, जिसके बाद वो फिर कभी वापस लौटकर नहीं आया। 

अपनी FIR में मीना ने पीटर के साथ ही कई अन्य लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत दर्ज करवाई थी। इसमें ऐलेट्टा आंद्रे, जियोरी बूम, सोज़र्ड वीमर सोजेरड्समा, फेरी स्टॉप, लोयस बॉमर्स, जेने पीटर, माने शर्मा और नताली राइटन के नाम शामिल हैं। मीना का कहना है कि ये लोग या तो पत्रकार हैं, राजनेता हैं या फिर आरोपित के दोस्त हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में बलात्कार मामले को लेकर फर्जी खबरें छापने की कोशिश की।  

ऑपइंडिया से बात करते हुए मीना ने कहा कि उन्होंने ऑपइंडिया रिपोर्ट से सिंह की पहचान की और फिर उन्हें याद आया कि कैसे सिंह ने उन्हें कोर्ट रूम में इसलिए गाली दी थी क्योंकि उन्होंने उसकी डच पत्रकार पत्नी का नाम FIR में दिया था और साथ ही उस पर बदनाम करने का आरोप लगाया था। वो कहती हैं, “वह चिल्लाया और यौन उत्पीड़न पीड़िता को गाली दी। वह केस के सिलसिले में अदालत में आया था। उसने कोर्ट में जज के सामने और फिर अदालत के बाहर भी मुझे गाली दी। उसने जज और वकीलों के सामने मुझे ‘k*tti’ और ‘har*mzadi’ कहा।”

मीना ने अपनी शिकायतों के बारे में विदेश मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ ही एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया को भी लिखा है।

मोदी के कहने पर फोर्ब्स में कन्हैया का नाम, शेहला ने नए नोट पर लिख दिया- कन्हैबा बेब्फा है

फोर्ब्स की विश्व के टॉप-20 निर्णायक लोगों की सूची लीक होने के बाद लिबरल गिरोह में फूट पड़ने की खबर आ रही है। रक्तपिपासु वामपंथी कन्हैया कुमार के रक्त के प्यासे बताए जा रहे। खान मार्केट गैंग का कहना है कि मोदी-शाह ने साजिशन कन्हैया कुमार का नाम सूची में डलवाया है। इसके लिए अडानी से बकायदा फोर्ब्स को विज्ञापन दिलवाया गया है। कहा जा रहा है कि विज्ञापन का पैसा लेकर खुद अंबानी गए थे।

सूत्रों के अनुसार पेरियार हॉस्टल में इस मसले पर पोलित ब्यूरो की बैठक हुई थी। बैठक की भनक एबीवीपी के लोगों को नहीं लगे इसके लिए ड्रेस कोड तय किया गया- नकाब। बैठक में मौजूद लोगों के बीच का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा था। एक पक्ष का कहना था कि साजिशन कन्हैया का नाम डलवाया गया है। वहीं, दूसरे गुट का कहना था कि इस साजिश में कन्हैया भी शामिल है। इस गुट के लोग कह रहे थे कि गिरिराज सिंह ने चूँकि अगला चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया है, इसलिए कन्हैया ‘फूल’ बना रहा है। इस गुट को जिन प्रमुख लोगों का समर्थन हासिल है उनमें प्राइम टाइम प्रोपेगेंडा स्पेशलिस्ट रवीश कुमार, लिंगलहरी कुमार की खास दोस्त शेहला रशीद और टुकड़े-टुकड़े गैंग के उनके प्रमुख सिपहसलाहकार उमर खालिद शामिल हैं।

गुप्त सूत्र बताते हैं कि उमर खालिद बेहद गुस्से में था। बैठक के दौरान ही उसने पूरी बकार्डी गटक ली। फिर खाली बोतल दीवार पर मार दी। उसका कहना था कि जब दिल्ली पुलिस की एफआईआर में उसका नाम कन्हैया के साथ है तो फोर्ब्स की सूची में साथ-साथ क्यों नहीं है। कांच के उन्हीं टुकड़ों से शेहला कलाई पर कुछ लिखने जा रही थी। लेकिन जामिया की जेहादिनों ने मजहब का वास्ता देकर रोक लिया। समझाया कि कन्हैया कुमार वैसे भी काफिर ही है। काफिरों के लिए खून बहाया नहीं जाता है। उनका खून बहाया जाता है। नारा-ए-तकबीर के बाद शेहला ने पास बैठे कॉमरेड से एक नया नोट मॉंगा और उस पर लिख डाला- कन्हैया कुमार बेवफा है। यह नोट जैसे ही ट्वीट किया गया वायरल हो गया।

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार इसके बाद रवीश फट पड़े। उन्होंने कहा कि इस प्रोपेगेंडा में सबसे ज्यादा मेरी ही स्याही लगी है। फिर कैसे कन्हैया का नाम आया। पहले मेरा हक बनता है। उन्होंने कन्हैया पर जात भाई को ही दगा देने का गंभीर आरोप लगाया। प्राइम टाइम नहीं करने का ऐलान करते हुए वे बीच बैठक से ही निकल गए। कन्हैया ने सफाई देने की कोशिश की तो उसे बोलने नहीं दिया गया। इसी दौरान हुई गर्मागर्म बहस में एक बोतल आइशी घोष के कपार पर बजर गया।

अपना ही खून देख नकाबधारी पतली गली से निकल गए। कॉमरेडों ने इसकी सूचना सलीम उर्फ योगेंद्र यादव को दी। बरखा को भी काम पर लगाया गया। तय किया गया कि आइशी के खून को भगवा में रंगना है। जनपथ तक खबर पहुँची तो राहुल गाँधी के नाम से सुरजेवाला ने ट्वीट दागा। लिखा, “मोदी-शाह ने आपका पैसा लूट कर अपने दोस्तों को दिया। फिर उन उन दोस्तों से फोर्ब्स को पैसा दिलवाया। विपक्षी एकता को तोड़ने के लिए उन्हीं पैसों से कन्हैया का नाम सूची में डलवाया गया है।” इस क्रोनोलॉजी को समझने की अपील करते हुए ​प्रियंका गॉंधी रवीश कुमार को मनाने उनके घर पहुॅंचीं। लेकिन रवीश ने स्पष्ट कर दिया- बोलना ही है। कम से कम पुस्तक मेला तक तो ‘बोलना ही है’।

इस मसले की गूँज सदन में भी सुनाई पड़ी। अधीर रंजन चौधरी ने इसे आंतरिक मामला मानने से इनकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मॉंग की है। कॉन्ग्रेस की अपील पर संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि वह इसके लिए तैयार है। चीन ने कहा है कि वह सुरक्षा परिषद में यह मामला उठाएगा। इमरान खान ने आईएसआई से पूरे मामले की जॉंच करवाने का ऐलान किया है।

बढ़ते दबाव के बीच कन्हैया ने ट्वीट किया है;

“कितनी बेशर्म सरकार है। पहले निर्णायक लोगों की सूची में मेरा नाम डलवाती है। फिर कॉमरेड येचुरी पर प्रेशर डाल पोलित ब्यूरो का बैठक बुलवाती है। बैठक में बोतल तुड़वाती है। फिर भी नहीं झुकने पर प्रियंका गॉंधी को सीधे रवीश के घर भेजती है। जब से ये सत्ता में आए हैं तब से लिबरलों की फाड़ कर रखी है।”

इस बीच दिल्ली वाले सर जी ने भी बयान जारी कर अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है- मैंने तो पहले ही कहा था सब मिले हुए हैं जी!

‘माँ’ को छोड़ ‘मर्दानगी’ पर अटके मुनव्वर, ‘मर्दाना कमज़ोरी’ के शर्तिया इलाज के लिए वामपंथियों ने लगाई लाइन

NDTV के पत्रकार ने इमरान खान को फेक वीडियो भेज कर कराई Pak की फजीहत, रवीश ने जारी किया बयान!

खोज उस क्रिएटिव डॉक्टर की, जिसने नकली पीड़ितों के हिजाब और जैकेट पर बैंडेज लगाया

22 जनवरी, सुबह 7 बजे: निर्भया के गुनहगारों की फाँसी का समय तय, माँ ने कहा- बेटी को मिला न्याय

दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया गैंगरेप मामले में पटियाला हाउस कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फ़ैसला आ गया है। कोर्ट ने चारों दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वारंट जारी कर दिया है। 2012 के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद बुधवार (जनवरी 22, 2020) को उन्हें फाँसी के तख्ते पर चढ़ा दिया जाएगा। इन चारों को पहले ही बलात्कार और हत्या के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। एडिशनल सेशन जज सतीश कुमार अरोड़ा ने कहा कि वो 14 दिनों के भीतर अन्य क़ानूनी विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस फ़ैसले के बाद निर्भया की माँ ने ख़ुशी जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट में निर्भया की माँ और दोषी मुकेश की माँ के बीच तीखी झड़प भी हुई। जज के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ। निर्भया का परिवार पिछले 8 वर्षों से दोषियों की फाँसी के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है। आज सुनवाई के दौरान चारों आरोपितों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश किया गया। फ़ैसला आने के बाद दोषियों के वकील ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट में क्यूरिटिव याचिका दायर करेंगे। फाँसी का समय सुबह 7 बजे तय किया गया है।

आज पटियाला हाउस कोर्ट के फ़ैसले पर पूरे देश की नज़र टिकी हुई थी। निर्भया गैंगरेप मामले में कुल 6 आरोपित थे, जिनमें से एक नाबालिग था। एक आरोपित की जेल में ही मृत्यु हो गई थी। आरोपितों को सितम्बर 2013 में ही ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहरा दिया था। मार्च 2014 में हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले पर मुहर लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2017 के फ़ैसले में फाँसी की सज़ा को सही ठहराते हुए दोषियों की सारी समीक्षा याचिकाएँ भी खारिज़ कर दी थी।

निर्भया के पिता बद्रीनाथ सिंह ने कहा कि दोषियों को फाँसी की सज़ा मिलने के बाद कोई और इस तरह का कुकृत्य करने से डरेगा। निर्भया की माँ आशा देवी ने कहा कि दोषियों को सज़ा मिलने से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों बाद उनकी बेटी को न्याय मिला है। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से न्यायपालिका में लोगों का विश्वास दृढ़ होगा।

‘माँ’ को छोड़ ‘मर्दानगी’ पर अटके मुनव्वर, ‘मर्दाना कमज़ोरी’ के शर्तिया इलाज के लिए वामपंथियों ने लगाई लाइन

भारत में जब भी हालिया दौर के शेरो-शायरी की बातें होती हैं तो राहत इंदौरी और मुनव्वर राना की चर्चा ज़रूर होती है। दोनों पिछले कई दशकों से देश-विदेश में घूम कर कई मंचों से अपना हुनर पेश कर चुके हैं। अब जब भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार दोबारा लौट कर आई है, दोनों के ही अंदर छिपा ‘मुसलमान’ बाहर आ गया है। और वो ‘डर का माहौल’ वाले समूह के मार्गदर्शक मंडल में शामिल हो गए हैं। अब इस उम्र में दोनों को वामपंथी तवज्जो देने से तो रहे, इसीलिए उनकी सेवाएँ मार्गदर्शक मंडल से ही ली जा रही हैं।

जहाँ इंदौरी ने अपना पूरा जीवन ‘बाप-बाप’ करते हुए गुज़ार दिया, राना विभिन्न मंचों से ‘माँ-माँ’ चिल्लाते हुए दिखे। जनता ने रात इंदौरी को बता दिया है कि ये किसके ‘बाप का हिंदुस्तान’ है, लेकिन मुनव्वर राना को उतनी तवज्जो नहीं दी गई। अपने आप को इंदौरी से पिछड़ना उन्हें कभी मंजूर नहीं रहा है, ऐसा वो कई बार स्वीकार भी कर चुके हैं। ऐसे में, भला वो यहाँ भी कैसे पीछे रहते। मुनव्वर राना ने ‘माँ से लेकर नामर्द तक’ का सफर तय करते हुए बता दिया कि उनकी शायरी का स्तर कहाँ जा पहुँचा है, ये देखिए:

अगर दंगाइयों पर तेरा कोई बस नहीं चलता,
तो फिर सुन ले हुकूमत, हम तुझे नामर्द कहते हैं।

इसमें कोई शक की बात नहीं है कि इस शेर में ताज़ा जेएनयू हिंसा के सम्बन्ध में बात की जा रही है। मुनव्वर राना इल्ज़ाम लगा रहे हैं कि केंद्र सरकार, मोदी के नेतृत्व वाली सरकार, दंगाइयों और उपद्रवियों से निपटने में नाकाम सिद्ध हो रही है। मुनव्वर राना का एक वीडियो भी आया है, जिसमें वो छाती ठोकते हुए इस शेर को पढ़ते दिख रहे हैं। उनकी आदत रही है कि जब वो एक शब्द को पकड़ते हैं तो उसे सालों नहीं छोड़ते। वैसे अब उन्हें अपने शेर भी याद नहीं रहते और मंच से लोग बार-बार याद दिलाते हैं, तब जाकर वो आधा-अधूरा कुछ पढ़ पाते हैं।

अब उनकी डिक्शनरी में ‘नामर्द’ शब्द आया है तो ये भी लम्बा चलेगा, ऐसा प्रतीत होता है। मुनव्वर राना कहते हैं कि वो ऐसा ही हिंदुस्तान देखना चाहते हैं, जैसा उन्होंने पैदा होने के समय देखा था। अब 1952 में उन्होंने पैदा होते ही कैसा हिंदुस्तान देख लिया था, ये तो नहीं पता, लेकिन उस समय इतना ज़रूर था कि अधिकतर स्वतंत्रता सेनानी देश के मार्गदर्शन के लिए ज़िंदा थे और उस साल हुए चुनाव में देश ने सत्ता की बागडोर कॉन्ग्रेस को थमाई थी। पैदा होते ही देश के हालात भाँपने की मुनव्वर वाली क्षमता शायद औरों में नहीं हो।

आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर ‘अपने अंदर के मुसलमान’ का इशारा पाकर राहत इंदौरी कल को राजीव चौक के किसी मेट्रो पिलर के नीचे बैठ कर ‘मर्दानगी की दवा’ बेचते हुए दिखें। आधुनिकता के झंडाबरदार तो ‘मर्दानगी’ को ‘पुरुष तानाशाही’ का प्रतीक मानते हैं, फिर ‘मर्द’ होना मुनव्वर राना जैसे वरिष्ठ शायर की नज़र में गर्व की बात कब से हो गई? और किस मेडिकल संस्थान द्वारा चेक किया जाएगा कि हुकूमत ‘मर्द’ है या फिर ‘नामर्द’? क्या मुनव्वर राना ख़ुद अपने ‘उपकरणों’ का प्रयोग कर के सर्टिफिकेट देंगे कि कौन ‘मर्द’ है और कौन ‘नामर्द’? मुनव्वर राना के अंदर के ‘मुसलमान’ का एक और शेर देखिए;

हमारे जैसे वफ़ादार कम ही निकलेंगे,
ज़मीन खोद के देखो तो हम ही निकलेंगे।

यहाँ मुनव्वर राना ये संकेत दे रहे हैं कि मुस्लिमों में दफनाने का रिवाज है, हिन्दुओं की तरह जलाने का नहीं, इसीलिए वो देश की मिट्टी में मिले हुए हैं, ज़्यादा वफ़ादार हैं। हिन्दुओं में जलाने का रिवाज है। मृत शरीर राख हो जाता है। राख मिट्टी में मिल जाता है। जलने से धुआँ होता है, जो हवा में मिल जाता है। हड्डियाँ पवित्र नदियों में बहाई जाती हैं। तो क्या अब कल को कोई हिन्दू शायर कह दे कि जल-थल-नभ में हम ही मिलेंगे, तो मुनव्वर जैसे शायर उसे सांप्रदायिक ठहरा देंगे। क्या अब वफादारी का फ़ैसला इसी आधार पर होगा कि किसको जलाया जाता है और किसको दफनाया जाता है? मुन्नवर राना के जवाब में कोई केंचुआ शायर कुछ यूँ शेर पढ़ सकता है:

तुम मिट्टी में दफ़न हो कर भी वफ़ादार हो गए,
आधी मिट्टी हमारी टट्टी है, हम कैसे बेकार हो गए?

इस हिसाब से केंचुआ तो इस देश का सबसे बड़ा वफादार हुआ क्योंकि उसकी टट्टी मिट्टी को उपजाऊ बनाती है, उसमें फसलें उपजती हैं और वही अन्न हमारी थालियों में आता है। मुनव्वर राना ने अब जब ‘मर्दानगी’ की बातें कर ही दी है और हमारे ‘सटायर विभाग’ के सूत्रों ने इसकी भी पुष्टि कर दी है कि वो जल्द ही ‘मर्दानगी’ वाली एक क्लिनिक खोलने वाले हैं, जिसका नाम होगा- ‘मुनव्वर की मर्दानगी क्लिनिक’। इसमें वो ‘मर्दानगी’ की दवाएँ देंगे और जाँच कर के बताएँगे कि कौन ‘मर्द’ है और कौन ‘नामर्द’। उनकी इस क्लिनिक में राहत इंदौरी की भी फंडिंग होगी। इसमें वामपंथियों का ‘इलाज’ मुफ़्त में किया जाएगा। हर बृहस्पतिवार को राना लाल कुआँ स्थित अपने तम्बू में भी मिलेंगे।

जाते-जाते एक और बात का जिक्र करना आवश्यक है। मुनव्वर राना ने दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने का आरोप लगा कर केंद्र सरकार को ‘नामर्द’ का तमगा दे दिया। जब यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार दंगाइयों से सख्ती से निपटती है तो यही मुनव्वर राना सबसे पहले बिलबिलाते हुए बिल से निकलते हैं। उपद्रवियों द्वारा फेंके गए एक-एक पत्थर का हिसाब लेने वाली यूपी की भाजपा सरकार की उन्होंने इसीलिए आलोचना की, क्योंकि वो दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है। यानी, सरकार दंगाइयों को छोड़ दे तो दिक्कत और उन पर कार्रवाई करे तो दिक्कत। मुनव्वर का ये शेर देखिए:

हमारे कासा-ए-सर को ना रौंदो इस तरह भाई,
हमारा बाप तुम लोगों की दस्तारें बनाता था।
मुसाहिब की सफ़ों में भी मेरी गिनती नहीं होती,
यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था।

मुनव्वर राना ने ये शेर तब ट्वीट किया था, जब योगी सरकार चुन-चुन कर दंगाइयों से सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करवा रही थी। वैसे भी, मार्गदर्शक मंडल में बयान देना, ट्वीट करना और शेरो-शायरी करने से ज्यादा कोई काम होता नहीं। फ़िलहाल हम ये पुष्टि करने में जुटे हैं कि ‘मुनव्वर की मर्दानगी क्लिनिक’ का फी कितना होगा क्योंकि इस सूचना के बाद कई वामपंथियों ने ‘ऑपइंडिया व्यंग्य विभाग’ को कॉल कर के इस बारे में जानकारी चाही है।

लिंगलहरी कन्हैया को फ़ोर्ब्स ने 20 प्रभावशाली व्यक्तियों में किया शामिल, गिराई अपनी साख

हाल ही में ‘फोर्ब्स इंडिया’ की एक सूची आई, जिसमें ऐसे 20 लोगों के बारे में बताया गया, जिन पर 2020 में नज़र रहेगी। ऐसे 20 लोग, जो इस साल ख़बरों में रहेंगे और इस वर्ष काफ़ी कुछ उन पर निर्भर करेगा। इस सूची के बारे में बता दूँ कि ये केवल भारतीय लोगों की सूची नहीं है, इसमें सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी हैं। ये युवाओं की भी नहीं है क्योंकि इसमें 55 वर्षीय बोरिस जॉनसन भी शामिल हैं। इस सूची को केवल और केवल दक्षिणपंथ को नीचा दिखाने और वामपंथी हस्तियों को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। ये काफ़ी ‘कन्फ्यूज्ड’ लिस्ट है, जिसका आधार ही नहीं पता।

सबसे पहले तो ‘फ़ोर्ब्स इंडिया’ ने बताया ही नहीं है कि इस सूची को तय करने का आधार क्या है और इसमें शामिल लोगों को उनके किन विशेषताओं के आधार पर तैयार किया गया है? अगर इसे मीडिया में स्पेस पाने वालों की सूची कहा जाए तो इसमें शेफ गरिमा अरोड़ा नहीं होतीं। इसमें मोहम्मद बिन सलमान को देख कर लगता है कि ये दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की सूची हो सकती है लेकिन फिर प्रशांत किशोर और दुष्यंत चौटाला सरीखे नेताओं को देख कर लगता नहीं कि इसका अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कोई लेना-देना है।

इस सूची को अगर इस आधार पर तैयार किया है कि इसमें केवल ‘Underrated’ लोग ही शामिल हों, अर्थात ऐसे लोग जिन्हें मीडिया स्पेस और चर्चा ज्यादा नहीं मिली, तो भी ये त्रुटिपूर्ण है। अगर ऐसा होता तो इसमें सालों भर मीडिया में बनी रहने वाली ग्रेटा थन्बर्ग और अमेरिका की सोशल मीडिया में लोकप्रिय नेता एलेक्जेंड्रिया (AOC) नहीं होतीं। अगर ये नेताओं की सूची है तो इसमें आदित्य मित्तल और गोदरेज परिवार को जगह नहीं मिलती। आइए, अब आपको बताते हैं कि इस सूची को किस आधार पर तैयार किया गया है? इसका एक ही आधार है- दक्षिणपंथ का विरोध।

इस सूची में कन्हैया कुमार क्यों हैं? फोर्ब्स इंडिया ने भी उनके चुनाव हारने का जिक्र किया है। भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने उन्हें 4.22 लाख मतों से हराया। ये सब तब हुआ, जब कन्हैया के लिए गुजरात के नेता जिग्नेश मेवानी ने कई दिनों तक कैम्प किया था। उनके लिए बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने प्रचार किया था। कन्हैया के लिए जावेद अख्तर और शबाना आज़मी जैसी हस्तियों ने काफ़ी प्रचार किया था। इन सबके बावजूद कन्हैया को 34% मतों से बुरी हार मिली। फिर भी उन्हें इस सूची में जगह क्यों दी गई?

फोर्ब्स इंडिया का एक अजीबोगरीब तर्क ये है कि हारने के बावजूद कन्हैया कुमार 22.03% वोट पाने में कामयाब रहे। क्या यही वो काबिलियत है, जो किसी व्यक्ति को उस सूची में शामिल कर दे, जिसमें सऊदी अरब, न्यूजीलैंड और यूके के राष्ट्राध्यक्ष हैं? भारत की 543 संसदीय क्षेत्रों में एक में हारने वाले व्यक्ति को मोहम्मद बिन सलमान जैसे शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय नेता के साथ एक ही सूची में डाला गया। कन्हैया कुमार को 22.03% वोट मिले ये तो बताया गया है लेकिन उनके हार का अंतर इसके डेढ़ गुना से भी ज़्यादा अर्थात 34.45% था, ये बड़ी चालाकी से छिपा लिया गया है।

इसके बाद फोर्ब्स इंडिया ने ‘राजनीतिक विश्लेषकों’ के हवाले से कन्हैया कुमार को लेकर बड़े दावे किए हैं। वो सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हैं, सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और पूरे देश में लगातार अपने विचार रखते रहते हैं- ये वो तीन काबिलियत की चीजें हैं, जिन्होंने कन्हैया को इस सूची में डाल दिया। इन काबिलियतों का जिक्र फोर्ब्स ने भी किया है। अगर ये तीनों विशेषताएँ ही फोर्ब्स की सूची में जगह पाने के लिए चाहिए, तब तो स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, उदित राज, फरहान अख्तर, सीताराम येचुरी, रामचंद्र गुहा और यशवंत सिन्हा के साथ तो बड़ी नाइंसाफी हुई है।

कन्हैया कुमार का प्रभाव अब इतना ही रह गया है कि ख़ुद सीपीआई उनसे प्रचार नहीं करवाती। वो ‘फ्रीलान्स प्रचारक’ बन कर दूसरे दलों के लिए प्रचार करते फिरते हैं। वो सीपीआई की ही बड़ी बैठकों और आन्दोलनों में नहीं देखे जाते हैं। जिस व्यक्ति को उसकी अपनी पार्टी भी नहीं पूछ रही है, उसे फ़ोर्ब्स इंडिया ने इतनी बड़ी सूची में लाकर रख दिया। इस हिसाब से तो वामपंथी पोलित ब्यूरो के सभी सदस्य इस सूची में आ जाने चाहिए थे। फोर्ब्स इंडिया लिखता है कि कन्हैया अच्छा बोलते हैं। अगर ‘अच्छा बोलना’ ही वो काबिलियत है तो फिर कुमार विश्वास और राहत इंदौरी को इस सूची में टॉप-5 में होना चाहिए था।

अब आइए बताते हैं कि इस सूची को कैसे तैयार किया गया। फोर्ब्स इंडिया के पैनल ने भाँग में ताड़ी मिला कर पी लिया और फिर वो इसे तैयार करने बैठे। इसमें जितने भी भारतीय हैं, उन्हें क्यों शामिल किया गया, आइए हम बताते हैं।

  • गोदरेज परिवार: बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के प्रस्तावित रास्ते में अपना इंफ़्रास्ट्रक्चर आने से गोदरेज समूह ने इसमें अड़ंगा लगाया। जुलाई 2019 में आदि गोदरेज ने बयान दिया था कि देश में हेट क्राइम बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा था कि असहिष्णुता के कारण आर्थिक विकास पर असर पड़ रहा है। मोदी के ख़िलाफ़ लगातार बयान देने के कारण गोदरेज परिवार को इस सूची में शामिल किया गया।
  • हसन मिन्हाज: कॉमेडियन हसन ने दावा किया था कि इन्हें अमेरिका में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में जाने से रोक दिया गया था। वो अक्सर पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का मज़ाक बनाने के लिए जाने जाते हैं। इसीलिए, इन्हें शामिल किया गया।
  • कन्हैया कुमार: मोदी के ख़िलाफ़ ट्वीट करना और हिंदुत्व को लेकर ज़हरीले बयान देने वाले कन्हैया को इस सूची में सीलिए शामिल किया गया, क्योंकि वामपंथ नेताओं की कमी से जूझ रहा है। कहावत है न- अँधों में काना राजा।
  • महुआ मोइत्रा: कॉन्ग्रेस से तृणमूल में गई महुआ संसद में सरकार के ख़िलाफ़ मुखर रहती हैं। उन्होंने मोदी सरकार पर फासिज्म का आरोप लगाते हुए 7 पॉइंट्स गिनाए थे। उनकी इसी ‘फासिज्म स्पीच’ के कारण फोर्ब्स ने उन्हें जगह दी है।
  • गरिमा अरोड़ा: इस सूची में एक ऐसा नाम डाल दिया गया है, जिनके बारे में बहुतों को नहीं पता। गरिमा एक काफ़ी टैलेंटेड शेफ हैं लेकिन कन्हैया जैसों के साथ उन्हें इस सूची में डाला गया है ताकि लिस्ट विश्वसनीय लगे। इसे ‘न्यूट्रल’ दिखाने के लिए ऐसा किया गया है।
  • प्रशांत किशोर: इनकी कम्पनी अरविन्द केजरीवाल, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसों का चुनावी कामकाज देख रही है। ऐसे में, उनका इस सूची में होना आश्चर्य पैदा नहीं करता क्योंकि अंदरखाने से मोदी विरोध की रणनीति तैयार करने वालों में वो अव्वल हैं।
  • दुष्यंत चौटाला: हरियाणा में किंगमेकर बन कर उभरे हैं और भाजपा सरकार का हिस्सा हैं। लोगों को लगता है कि वो किसी भी तरफ़ जा सकते हैं, इसीलिए मोदी-विरोधियों को उनसे उम्मीदें हैं। उन्हें हरियाणा का ‘नीतीश कुमार’ बना कर पेश करने का प्रयास चल रहा है।
  • आदित्य मित्तल: दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक है, जो सुर्ख़ियों में रहना पसंद नहीं करते। 43 वर्षीय मित्तल को इस सूची में डाला गया है। वो लक्ष्मी निवास मित्तल के उत्तराधिकारी हैं।

हमने देखा कि भारतीय अथवा भारतीय मूल के 8 लोगों में से 4 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर आलोचक हैं। एक उद्योगपति हैं, जिन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ लगातार बयान दिया है। 2 मीडिया में चर्चित न रहने वाले चेहरे हैं और 1 ऐसा चेहरा है, जिससे उम्मीदें हैं कि वो मोदी के ख़िलाफ़ जा सकता है। दक्षिण में भाजपा का युवा चेहरा बन कर उभर रहे तेजस्वी सूर्या, कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष को उनके ही गढ़ में हराने वाली स्मृति ईरानी और ओडिशा के ग़रीब परिवार से आने वाले केन्दीय मंत्री प्रताप सारंगी जैसे सैंकड़ों चेहरे हैं, जिन्होंने इस वर्ष कमाल किया और अगले वर्ष भी उनसे उम्मीदें रहेंगी। लेकिन, फोर्ब्स इंडिया ने एक भी, एक भी ऐसे व्यक्ति को इसमें जगह नहीं दी- जो दक्षिणपंथ से जुड़ा हो।

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रविवार शाम नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में नकाबपोश गुंडों की भीड़ ने ताबड़तोड़ लाठी, डंडे, रॉड चलाए जिससे परिसर में हिंसा के बीच अफरातफरी का माहौल रहा। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण कराने आए छात्रों को विरोध करने वाले प्रदर्शनकारी छात्रों के समूह ने उन्हें रजिस्ट्रशन करने से रोका तथा यहाँ कार्यरत कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाल दिया था और इसी के साथ सर्वर को निष्क्रिय कर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को बाधित किया था।

दरअसल इस साल अक्टूबर से जेएनयू में कुछ छात्र हॉस्टल फीस में वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। जो कि आखिर में आंशिक रूप से वापस हो गया था। लेकिन इसके बाद भी छात्रों ने तभी से कक्षाओं को चलने नहीं दिया है। वहीं 1 जनवरी से विश्वविद्यालय ने शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करना शुरू कर दिया था। लेकिन ज़्यादातर वामपंथी छात्रों द्वारा लगातार हो रहे हिंसक प्रदर्शनों को देखकर लगता है कि आंदोलनकारी छात्र विश्वविद्यालय में सामान्य स्थिति में वापस आने से बहुत खुश नहीं थे। जिससे विश्वविद्यालय का माहौल जल्द ही हिंसक रूप ले लिया। जिसमें लेफ्ट और ABVP एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे।

हिंसा भड़कने के तुरंत बाद व्हाट्सएप पर हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट्स का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर गोलबंदी शुरू करने के लिए बखूबी किया गया। इस बातचीत के एक हिस्से को विवादित पत्रकार बरखा दत्त ने रविवार देर रात ट्वीट करके सोशल मीडिया पर साझा किया। जिसमें यूजर आनंद को ग्रुप के अन्य सदस्यों से पूछते हुए देखा गया कि जेएनयू के समर्थन में कुछ लोग मुख्य द्वार पर आ रहे हैं क्या हमें वहाँ कुछ करना है?

यह मैसेज ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ नामक ग्रुप का था। जिसका अर्थ था कि संदेश भेजने वाला लेफ्ट के खिलाफ था। इसलिए माना गया कि इस पर एबीवीपी और राष्ट्रीय सेवा संघ के छात्रों का हाथ है। वास्तव में जेएनयू में हिंसा भड़कने के बाद से कुछ छात्र यह प्रचार करने और शोर मचाने में व्यस्त रहे कि हिंसा करने वाले एबीवीपी के गुंडे थे।

यहाँ यह बताना बेहद जरूरी है कि दिसंबर 2019 के आखिरी सप्ताह में लिबरल, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी गुट ने सीएए के ख़िलाफ दंगाइयों को मास्क पहन कर पहचान छुपाने के तरीके सुझाए थे। ताकि पुलिस द्वारा उनकी सही और आसानी से पहचान न हो सके। यही कारण था कि रविवार की रात जेएनयू कैंपस के अंदर हिंसा में शामिल अधिकांश हथियार धारी गुंड़ों ने अपनी पहचान को छुपाने के लिए नकाब पहन कर खुद को ढक रखा था।

‘Thequint’ ने बाकायदा इस पर पूरा मार्गदर्शन किया था दंगाईयों और हिंसा करने वालों का, जिसे आप उनके लेख में देख सकते हैं। यहाँ तक की फेसिअल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर से बचने के भी टिप्स दिए गए हैं।

वहीं बरखा दत्त ने अनजाने में ट्विटर पर जो मोबाइल नंबर साझा किया वह आनंद मंगनाले की थी। उस नंबर की जब जाँच पड़ताल की गई तो पता चला कि यह वही मोबाइल नंबर थी जिसे कॉन्ग्रेस ने क्राउडफण्डिंग के लिए इस्तेमाल किया था।

हालाँकि, इस पेज को बंद कर दिया गया। वैसे आपको बता दें कि आनंद मंगनाले ने पहले जेडीयू के प्रशांत किशोर के साथ काम किया था। वहीं उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा चुनाव से पहले यानि कि वर्ष 2016 में पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए भी रणनीतिकार के रूप में काम किया था। हालाँकि, यह साफ़ नहीं हो सका कि राहुल गाँधी के इमेज मेकओवर के लिए मंगनाले टीम का हिस्सा रहा या नहीं।


Anand Mangnale saying how the VC is ‘ours’

व्हाट्सएप पर बातचीत के ऐसे और भी कई स्क्रीनशॉट सामने आए जहाँ आनंद ने ‘भारत माता की जय’ जैसै कोटेशन को अपने नाम के साथ जोड़ा था ताकि यह दिखाई दे कि वह दक्षिणपंथ का समर्थन करता है।

आनंद ने व्हाट्सएप ग्रुप ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट के सदस्यों से पूछा था कि ‘गेट पर क्या किया जाना चाहिए क्योंकि मन में था कि कुछ किया जाना चाहिए’। जेएनयू हिंसा के बाद शुरुआत में ही कॉन्ग्रेस का लिंक सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस ने जल्द ही आनंद से अपने को अलग करने की कोशिश की और अपने साथी को एक झटके में त्याग दिया और आनन-फानन में कॉन्ग्रेस द्वारा देर रात एक ट्वीट करके कहा गया कि यह संख्या एक निजी वेंडर की है जिसे उन्होंने लोकसभा चुनाव के लिए काम पर रखा था लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया था।

हालाँकि यह पहले ही हमने बताया था कि कॉन्ग्रेस ने आनंद के नंबर का इस्तेमाल क्राउडफंडिंग के लिए किया था। यहाँ तक कि आनंद अभी भी कॉन्ग्रेस और कॉन्ग्रेस के नेताओं के लिए क्राउडफंडिंग का ही एक हिस्सा हैं। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव वल्लभ के लिए धन की डिमांड करने वाला यह ट्वीट नवंबर वर्ष 2019 का है।

हालाँकि, जेएनयू हिंसा के समन्वय समूह में कॉन्ग्रेस के साथ आनंद के संबंध सामने आने के बाद आनंद ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से स्पष्टीकरण भी दिया। अपने बचाव में, आनंद ने दावा किया कि उसने और जानकारी जुटाने के लिए कई “दक्षिणपंथी ग्रुप में घुसपैठ” की है। वाह…। कॉन्ग्रेस के क्राउडफंडिंग के प्रचारक भी एसीपी प्रद्युम्न की दोहरी भूमिका में आ गया है।

आनंद ने दावा किया कि जब ग्रुप में थोड़ी शांति हुई तो उसने यह पूछकर उसने उन्हें भड़काने की कोशिश की कि मुख्य द्वार पर क्या होना है क्योंकि वह जानना चाहता था कि लोग कहाँ हैं और उनकी योजना क्या है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि मंगनाले न तो जेएनयू का छात्र है और न ही कोई जाँच अधिकारी।

उसके द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण यह बताता है कि ग्रुप वास्तव में एबीवीपी और दक्षिणपंथी छात्रों द्वारा कैंपस में होने वाली हिंसा रोकने के लिए बनाया गया था। हालाँकि ऐसा लगता नहीं है।

एक ट्विटर यूजर ‘Gujju_Er’ ने एक ही व्हाट्सएप ग्रुप के कई स्क्रीनशॉट्स को पोस्ट किया जिसमें अत्यधिक डरा देने वाले तथ्य सामने आए। दरअसल व्हाट्सएप में एक सुविधा है जहाँ कोई भी व्यक्ति एक लिंक भेजकर ग्रुप में शामिल होने के लिए सार्वजनिक तौर पर आमंत्रित कर सकता है। कुछ ऐसा ही दूसरे स्क्रीनशॉट में देखा गया कि आनंद ने शामिल होने के लिए आमंत्रित लिंक पर क्लिक करके व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल नहीं हुआ। लेकिन जब इस ग्रुप को बनाया गया था तो उसे ग्रुप के एडमिन द्वारा जोड़ा गया था।

https://platform.twitter.com/widgets.js

इसका मतलब है कि आनंद ने ‘दक्षिणपंथी गतिविधियों’ पर नज़र रखने के लिए ग्रुप में घुसपैठ नहीं की बल्कि उसे एक ऐसे ग्रुप का हिस्सा बनाया गया था। जिसे ‘लेफ्ट-विरोधी’ के रूप में पेश किया गया था। इसीलिए उन्होंने लेफ्ट-विरोधी संदेशों को हिंसा भड़काने के लिए पोस्ट किया था ताकि जब स्क्रीनशॉट चुनिंदा रूप से जारी किए जाएँ तो यह ‘राइट विंग’ और एबीवीपी के छात्रों द्वारा सुनियोजित हिंसा की तरह दिखाई दे।

गुज्जू_ईआर द्वारा साझा किए गए तीसरे स्क्रीनशॉट में, एक कॉन्ग्रेस का आनंद, उबैद और एक बुल्ला आदिल के बीच बातचीत देख सकते हैं, जो चर्चा कर रहे हैं कि मुख्य द्वार पर क्या किया जा सकता है जहाँ जेएनयू समर्थक आने वाले थे। अब “उबैद” और “बुल्ला आदिल” एबीवीपी के कार्यकर्ता तो हो नहीं सकते। इससे पहले कि उनके कॉन्ग्रेस कनेक्शन सामने आते आनंद जेएनयू परिसर के अंदर से ही लाइव अपडेट ट्वीट करते रहे। जबकि उस समय जेएनयू में हिंसा हो रही थी।

यदि वह छात्र नहीं है या फिर सुरक्षा एजेंसियों के साथ नहीं है, तो फिर कॉन्ग्रेस का क्राउडफंडिंग अभियान समन्वयक क्या था? जो हिंसा फैलने पर कैंपस में ‘अपनी गतिविधियों पर नजर रखने’ के लिए ‘दक्षिणपंथी व्हाट्सएप ग्रुपों’ में घुसपैठ भी कर रहा था? खासकर जब उनकी खुद की बातचीत हिंसा भड़काने जैसी हो रही हो। आनंद आगे टी पॉइंट के बारे में कहता है कि जहाँ छात्र सुरक्षित महसूस करने के लिए एकत्र हुए थे। अब यह ‘टी पॉइंट’ कहीं और ही दिखाई देता है।

जेएनयू के छात्र, द वायर और द क्विंट के स्तंभकार ने फेसबुक पर कहा था कि लगभग 8 बजे उसने और उसके सहयोगियों ने हेलमेट पहना और गुंडों का पता लगाने के लिए हॉस्टल के पास घूमने लगे। उसका कहना है कि मुख्य गेट के पास पुलिस का नियंत्रण था। पुलिस छात्रों को हॉस्टल में वापस जाने के लिए कहती है इस बात को इमाम ने अपनी पोस्ट में लिखा है। इसलिए ध्यान में आता है कि इमाम और मंगनाले लगभग एक ही समय पर साबरमती हॉस्टल के टी-पॉइंट पर थे।


Sharjeel Imam, The Wire columnist and JNU student who was one of the organisers of Shaheen Bagh anti-CAA protests and had called for a ‘chakkajam’ in north Indian cities by Muslims.

शर्जील इमाम वही व्यक्ति है जो जेएनयू में संविधान को जलाना चाहता था और राम जन्मभूमि के फैसले के बाद कैंपस में ‘संविधान जलाने का समारोह‘ करना चाहता था। वह नई दिल्ली के शाहीन बाग में सड़क को जाम करने वाले लोगों में से भी एक था। यहीं सीएए के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने धरना दिया था। इमाम ने शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शनों को ‘हांगकांग शैली’ में आयोजित किया था। दरअसल हांगकांग के प्रदर्शनकारी हांगकांग सरकार द्वारा भगोड़े अपराधियों के संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। यहाँ भी प्रदर्शनकारियों ने बड़े पैमाने पर मुखौटे, हेलमेट का उपयोग खुद को आंसू गैस के गोलों से और साथ ही अपने चेहरे को छिपाने के लिए किया था।


Hong Kong protestors wearing masks (image: vox.com)

JNU हिंसा में शामिल गुंडों ने भी क्विंट के बताए रास्ते पर चलते हुए वैसे ही मास्क पहना है।

JNU हिंसा में वैसे ही मास्क पहने हुए गुंडे

जेएनयू हिंसा में कॉन्ग्रेस कैसे शामिल है? इस पर एक नज़र डालें तो कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा, एनएसयूआई पहले से ही सीएए विरोधी प्रदर्शनों को आयोजित करने में शामिल थी जो कि बाद में हिंसक हो गई थी। व्हाट्सएप ग्रुप का नाम ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ रखा जाता है। और बातचीत में शामिल लोग कॉन्ग्रेस से जुड़े हैं। इस बात का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं कि क्या “उबैद” और “बुल्ला आदिल” कभी एबीवीपी ग्रुप का हिस्सा हो सकते हैं।

यदि ये फर्जी ग्रुप हैं जो आपस की बातचीत के स्क्रीनशॉट को साझा करने के लिए बनाए गए हैं, जो कि जेएनयू हिंसा को अंजाम देने की वास्तविक बातचीत का दिखावा तो खुद करते हैं और दोष ABVP पर डालते हैं। निश्चित रूप से इस हिंसा से एबीवीपी को तो कोई फायदा नहीं है। किसको है ये आप सभी को पता है? कौन है जो देश में अराजकता, हिंसा और दंगे की स्थिति पैदा करना चाहता है? अब देखना यह होगा कि भारत में अराजकता पैदा करने के लिए कॉन्ग्रेस और वामपंथियों का यह इकोसिस्टम कितनी दूर तक जाएगा?

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वाजपेयी की सत्ता से विदाई को दो साल से ज्यादा हो गए थे। केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ​थी। उस राज्य की सत्ता पर भी पिछले दरवाजे से कॉन्ग्रेस आ गई थी। मुख्यमंत्री एक निर्दलीय हुआ करता था। उस शहर से तीन बड़े हिंदी अखबारों के संस्करण निकलते थे। शहर से बाहर निकलते ही रेड कॉरिडोर शुरू हो जाता था। उन दिनों करीब-करीब पूरा राज्य ही रेड कॉरिडोर था।

रात के करीब 9 बज रहे थे। वह रिपोर्टर अपनी खबरें फाइल कर निकलने की तैयारी में था। संपादक ने इशारों से केबिन में बुलाया। एक गाँव का नाम बताया। कहा सूचना मिली है कि नक्सलियों ने मुखबिरी के आरोप में एक ग्रामीण का गला रेत लाश टाँग दिया है। रात हो गई है इसलिए पुलिस सुबह जाएगी। यह खबर किसी के पास नहीं है (छोटे शहरों में जब जोखिम वाले मोर्चे पर रिपोर्टरों को लगाया जाता है तो कान में संपादक यही मंत्र फूँकता है। चंद हजार रुपए पाने वाला रिपोर्टर यह सुनते ही बड़ा पत्रकार बनने के सपने देखने लगता है)। तुरंत निकलिए। 2 बजे तक लौट आइएगा। सिटी एडिशन का लीड यही है। फिर फोटोग्राफर बुलाया जाता है। उसे निकलने का हुक्म मिलता है। संपादक जी अपनी एंबेसडर कार और ड्राइवर के साथ दोनों को भेजते हैं।

करीब डेढ़ किमी एंबेसडर चलती है तो हाइवे आ जाता। कार उस मशहूर ढाबे के पास रुकती है। अंदर घुसते ही रिपोर्टर की नजर एक टेबल पर बैठे प्रतिद्वंद्वी अखबार के रिपोर्टर पर पड़ती है। रिपोर्टर और फोटोग्राफर उनसे नजरें बचाकर टेबल खोजते हैं। जल्दी-जल्दी खाना निपटाकर बाहर निकलते हैं। पान की दुकान पर पहुँचते हैं। वहाँ पहले से ही वे मौजूद होते हैं जिनसे रिपोर्टर होटल में छिप रहा था। अब कहाँ भागे? इतनी देर में तीसरे अखबार के रिपोर्टर और फोटोग्राफर भी न जाने कहाँ से वहीं धमक पड़ते हैं।

5-10 मिनट के टालमटोल के बाद तीनों रिपोर्टर फूट पड़ते हैं। पता चलता है सब एक ही मोर्चे पर ​जा रहे हैं। संपादक ने फिर से ले ली है। बड़े पत्रकार बनने का सपना टूट जाता है। अब चर्चा इस बात पर होती है कि हम कहाँ जा रहे हैं। कितने जोखिम में जा रहे हैं। फिर तीनों अखबार की गाडियाँ साथ चलती हैं। हाइवे पर कुछ किमी चल गाड़ियाँ नीचे उतरती हैं। घुप्प अंधेरा। सर्द रात। तीन गाड़ियाँ। 9 सवार। कहीं कोई आहट नहीं।

रास्ते में अर्धसैनिक बल का एक कैंप होता है। उन्हें दूर से ही शायद दिख गया था कि तीन गाड़ियाँ एक साथ आ रही है। वे पहले से तैयार थे। गाड़ियॉं करीब आते ही तेज रोशनी के बीच चारों तरफ से संगीनों से घेर लेते हैं। गाड़ी से ही फोटोग्राफर कैमरा बाहर निकालकर हिलाता है। जवान जब हर तरीके से संतुष्ट हो जाते हैं तो सबको बाहर निकलने को कहा जाता है। उनका एक अधिकारी सामने आता है। वे थे सरदार जी। उन्होंने न कुछ पूछा, न कुछ जाना। नॉन स्टॉप गालियों की बौछार। माँ-बहन की। ठेठ पंजाबी में। फिर इतनी रात आने का कारण जाना। एक राउंड और गालियों की बौछार चली। फिर इस धमकी के साथ आगे बढ़ने को कहा- सालों खुद तो मरने आते ही हो किसी दिन हम सबको भी लेकर मरना। लौटते वक्त इस रास्ते से न आना। अगली बार पूछूँगा नहीं, सीधे ठोकूँगा।

गाड़ियॉं आगे बढ़ती हैं। गॉंव में पहुँचती हैं। एक पेड़ के पास पेट्रोमेक्स जलाकर कुछ लोग बैठे हैं। लाश टँगी है। वहाँ बैठे लोग सुबह का इंतजार कर रहे हैं। पुलिस आएगी तो लाश उतरेगी। पहले उतार लिया तो कल पुलिस अलग से पेलेगी। रिपोर्टर गाड़ी से उतरते हैं। वहाँ बैठे लोगों से मरने वाले का नाम वगैरह पूछते हैं। मोटी-मोटी जानकारी लेते हैं। फोटोग्राफर तेजी से तस्वीरें लेने लगते हैं। सब जल्दी में। फटाफट निपटे काम और भागे यहाँ से। जल्दबाजी में गाड़ी बैक करते समय एंबेसडर का फ्यूल टैंक वहाँ रखे किसी पत्थर से रगड़ खाता है। फ्यूल रिसने लगता है। ड्राइवर को पता भी नहीं चलता। उसे इसकी भनक रास्ते में लगती है। तय किया गया कि गाड़ी लेकर ड्राइवर अर्धसैनिक बल के कैंप के पास रुक जाएगा। रिपोर्टर और फोटोग्राफर दूसरे अखबार की गाड़ी से निकल लेंगे। ड्राइवर सुबह गाड़ी ठीक करवाएगा और लौटेगा।

लेकिन, कैंप के पास जैसे ही गाड़ियॉं पहुँचती हैं फिर तेज रोशनी और संगीनों से ही स्वागत होता है। इस बार, सरदार जी फट पड़ते हैं। एक फोटोग्राफर को (उसे होशियारी का सबसे ज्यादा भ्रम था) दो-चार जड़ देते हैं। एंबेसडर पार्क नहीं करने देते। बोलते हैं इसके साथ ही तुम लोगों को भी फूँक दूँगा। गालियों का ऐसा राउंड जो लिख नहीं सकता। पिट-पिटाकर कर तीनों गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं। पर कुछेक सौ मीटर के बाद एंबेसडर आगे बढ़ने से इनकार कर देती है। एंबेसडर में सवार तीनों फटाक से बाहर निकलते हैं और दूसरी गाड़ी में सवार हो जाते हैं। कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता है। खौफ की जवानों ने रुका देखा तो अब गोली ही मारेंगे।

अगली सुबह तीनों अखबार के सिटी एडिशन की लीड होती है यह खबर। किसी को पता भी नहीं चलता कि खबर किसकी है। असल में रिपोर्टरों के लौट आने के बाद संपादकों को पता चल गया होता है कि दूसरे के आदमी भी वहॉं थे। अब संपादक जी बाइलाइन देने से तो रहे। उन्हें अब यह पता करना है कि उनकी एक्सक्लूसिव सूचना रिपोर्टर और फोटोग्राफर में से किसने लीक की।

जेएनयू में उपद्रव के बाद से ही कुछ साथियों को लगातार सोशल मीडिया में लिखते देख रहा हूँ कि मुझे देशद्रोही कहा। मेरा मोबाइल छीन लिया। फोटो डिलीट करवा दी। पुलिस देखती रही। पुलिस ने कुछ नहीं किया। एक तरह से खुद को विक्टिम दिखाना। पुलिस-प्रशासन को विलेन बताना। असल में हालात कुछ ऐसे होते हैं कि कभी-कभी प्रशासन भी मजबूर हो जाता है। उन सरदार जी की बौखलाहट समझी जा सकती है। ऐसी ही गाड़ियों में नक्सली भी आते होंगे। घात लगाकर जवानों को मार जाते होंगे।

ये घटना केवल इसलिए बताई कि आप जान सकें कि महानगरों के बड़े पत्रकार जिन चीजों पर इतना शोर मचा लेते हैं, वे छोटे शहरों के पत्रकारों की आपबीती के सामने कुछ भी नहीं होते। लेकिन, वहाँ इन घटनाओं को लेकर इतना विलाप नहीं होता। कभी-कभी सोचने लगता हूँ कि उस रात ये सब होते थे तो उस ग्रामीण की लाश टँगी तस्वीर न छपी होती। छपती उस सरदार और उसके जवानों की फोटू! नक्सलियों द्वारा ग्रामीण का गला रेतना अखबार के किसी भीतरी पन्ने पर दबा होता है। लीड होती वे गालियाँ और उन रिपोर्टरों की चाशनी में लिपटा प्रोपेगेंडा।

पर क्या तब भी मनमोहन-सोनिया को उतनी ही गाली पड़ रही होती, जिस तरह आज मोदी-शाह की जोड़ी को गिरोह ने निशाने पर ले रखा है! शायद नहीं। क्योंकि छोटे शहरों के उन खबरनवीसों को खुद को खबर बनाकर बेचने की कला नहीं आती थी। ये खबरनवीस उन्हीं अखबारों में काम करते हैं, खबर निकालते हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए आपको रवीश कुमार रोकते हैं।

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₹7.73 करोड़ के लैंड डील मामले में जूनियर चिदंबरम दम्पति को कोर्ट से राहत नहीं, IT विभाग करेगा कार्रवाई

चेन्नई की विशेष अदालत ने पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को राहत देने से इनकार कर दिया है। कार्ति और उनकी पत्नी श्रीनिधि ने चेन्नई में ‘सांसदों एवं विधायकों के लिए विशेष अदालत’ में याचिका दायर कर के उन्हें इनकम टैक्स विभाग की जाँच में राहत दिलाने की अपील की थी। वित्तीय वर्ष 2015-16 में जूनियर चिदंबरम दम्पति ने अपनी कुल आय छिपाई थी और टैक्स देने से बचने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए थे। मुत्तुकादु में एक ज़मीन की बिक्री के बाद कार्ति को 6.38 करोड़ रुपए और उनकी पत्नी श्रीनिधि को 1.35 करोड़ रुपए कैश में प्राप्त हुए थे।

चेन्नई की स्पेशल कोर्ट ने जूनियर चिदंबरम दम्पति के ख़िलाफ़ चल रही इनकम टैक्स विभाग की जाँच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस आदेश के साथ ही आईटी डिपार्टमेंट अपनी जाँच जारी रखेगा और दोषी पाए जाने पर कार्ति व श्रीनिधि के ख़िलाफ़ कार्रवाई का रास्ता साफ़ हो जाएगा। ये मामला ‘एडवांटेज स्ट्रेटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड’ से जुड़ा है। आईटी विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तलाशी के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किया था। उन उपकरणों और उनसे मिले डेटा को दोनों जाँच एजेंसियों ने कोर्ट में पेश किया था।

कॉन्ग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम के पिता पी चिदंबरम हाल ही में साढ़े तीन महीने से भी अधिक जेल में समय बिता कर बाहर निकले हैं। तिहाड़ में उनसे मिलने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से लेकर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी तक पहुँचे थे। कार्ति और उनकी पत्नी के ख़िलाफ़ सितम्बर 2018 में मामला दर्ज किया गया था। इस मामले को विशेष अदालत को स्थान्तरित कर दिया गया था। अभी इस मामले में ट्रायल चल रही है। कुल मिला कर ये मामला 7.73 करोड़ रुपए का है। कार्ति आईएनएक्स मीडिया केस और एयरसेल-मैक्सिस केस में भी अपने पिता के साथ आरोपित हैं।

कई मामलों में कोर्ट की कार्यवाही का सामना कर रहे कार्ति जेएनयू और सीएए पर मोदी सरकार को घेरने में जुटे हुए हैं। उन्होंने जेएनयू में वामपंथी गुंडों की हिंसा के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए इसकी तुलना 1938 के नाजी अत्याचार से की, जिसमें यहूदियों का नरसंहार किया गया था। ‘क्रिस्टल नाईट ऑफ ब्रोकन ग्लास’ प्रोग्राम में क़रीब 100 यहूदियों को मार डाला गया था। कार्ति ने आरोप लगाया कि पूरी दुनिया में फासिस्ट और तानाशाही ताक़तें दक्षिणपंथी संगठनों के माध्यम से अपने आलोचकों पर अत्याचार करती है।

उन्होंने दावा किया कि जेएनयू में हिंसा करने वाले नकाबपोश भाजपा द्वारा भेजे गए थे। उन्होंने कहा कि जो लोग भाजपा का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें वास्तविकता का भान नहीं है। उन्होंने ‘सरकार समर्थिक गुंडों’ द्वारा आतंक फैलाने जाने का दावा किया। बता दें कि जेएनयू हिंसा में वामपंथी गुंडों का हाथ होने के कई वीडियो और फोटोज सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं, बावजूद इसके कई वामपंथी व विपक्षी नेता उन्हें बचाने के प्रयास में लगे हुए हैं।

पिता के ख़िलाफ़ लिखने वालों को इनबॉक्स में धमका रहे कार्ति चिदंबरम, ट्विटर पर ‘सड़क-छाप’ हरकत

‘एक भी सबूत दिखाओ’ – चिदंबरम के चैलेंज पर ED ने 16 देशों में 12 संपत्तियों और 12 बैंक खातों का दिया डिटेल

‘रुक मादर…’ वाले वामपंथी गुंडों से ABVP के शिवम ने ऐसे बचाई जान, शेयर किया Video Viral

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रविवार को हुई घटना के बाद सोशल मीडिया पर जोर-शोर से आरएसएस के छात्र संघ एबीवीपी को पूरे वाकये के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। हर ओर से भाजपा, आरएसएस, एबीवीपी की आलोचना हुई। लेकिन अगली ही सुबह लेफ्ट की करतूतों का पर्दाफाश करती कई वीडियोज और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं। इसी क्रम में एबीवीपी ने भी कल देर रात एक वीडियो जारी किया और दावा किया कि जेएनयू कैंपस में छात्रों एवं कार्यकर्ताओं के साथ लेफ्ट के लोग बदसलूकी करते हैं, मारपीट करते हैं।

एबीवीपी द्वारा वीडियो जारी करते हुए लेफ्ट पर आरोप लगाए गए कि वीडियो में एबीवीपी कार्यकर्ता शिवम को पहले दौड़ाकर उसका पीछा किया गया, फिर उन पर बर्बरता से हमला हुआ। एबीवीपी के मुताबिक अगर जेएनयू में कोई छात्र अधिकारों के लिए खड़ा होता है, तो वामपंथी यही सब करते हैं।

इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर एबीवीपी की ओर से हमले में घायल हुए शिवम की कुछ तस्वीरें भी शेयर की गईं। जिनमें दावा किया गया कि वामपंथी गुंडो द्वारा किए गए हमले में शिवम के सिर पर, गले पर चोटें आई हैं।

बता दें कि एबीवीपी की तरह इस वीडियो को एबीवीपी की राष्ट्रीय सचिव निधी त्रिपाठी ने भी शेयर किया है। जिन्होंने अपने ट्वीट में शिवम के साथ हुई घटना पर जानकारी दी है। उनके मुताबिक शिवम को कन्यूनिस्टों ने रविवार की दोपहर दौड़ाकर मारा। निधी के अनुसार, शिवम इस दौरान अपनी जान बचाने के लिए एक जूस की दुकान में घुसे। लेकिन,कम्यूनिस्टों ने उन्हें पकड़ने के लिए पहले दुकान में तोड़फोड़ कर दी और फिर उनकी वहाँ मॉब लिंचिंग करने की कोशिश हुई। इस हमले में उनका सिर फट गया। इस बात की जानकारी खुद चश्मदीदों ने दी।

गौरतलब है कि इन तस्वीरों को साझा करते हुए एबीवीपी द्वारा वामपंथी संगठनों को बैन करने की भी माँग उठाई गई। एबीवीपी ने कहा कि वामपंथी संगठनों को बंद करने से परिसर हिंसा-मुक्त हो जाएगा। साथ ही बच्चे अपनी शिक्षा और समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित कर पाएँगे।

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‘हिंदू जिन्ना’ बन गए हैं PM मोदी, चल रहे हैं दो राष्ट्र सिद्धांत पर: कॉन्ग्रेसी नेता और पूर्व CM का विवादित बयान

कॉन्ग्रेस नेता और असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का “हिंदू जिन्ना” करार देते हुए उन पर पाकिस्तान के “दो-राष्ट्र सिद्धांत” का पालन करने का आरोप लगाया। गोगोई ने प्रधानमंत्री पर जिन्ना की राह पर चलने का आरोप लगाया और कहा कि केंद्र नागरिकता कानून लागू कर ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की कोशिश कर रहा है जो लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता ने जेएनयू के छात्रों पर रविवार रात हुए हमले की निंदा करते हुए कहा कि भाजपा की यह ‘दमन की नीति’ देश के लिए और अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और प्रस्तावित एनआरसी के खिलाफ बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय वह हिंदुत्व नहीं चाहते हैं, जो भाजपा और आरएसएस देश में लाना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला करते हुए गोगोई ने कहा, “प्रधानमंत्री हम (कॉन्ग्रेस) पर आरोप लगाते हैं कि हम पाकिस्तान की भाषा में बात कर रहे हैं, लेकिन यही वो शख्स हैं, जिन्होंने खुद को पड़ोसी देश के स्तर तक गिरा लिया है। वह देश को धर्म के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का पालन कर रहे है और भारत के हिंदू जिन्ना के रूप में उभरे हैं।”

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गोगोई ने कहा, “हम हिंदू हैं, लेकिन हम नहीं चाहते हैं कि हमारा देश हिंदू राष्ट्र बने। विरोध प्रदर्शन करने वाले अधिकांश लोग हिंदू हैं। वे वह हिंदुत्व नहीं चाहते कि जिसका प्रचार-प्रसार भाजपा और आरएसएस कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि रविवार रात जेएनयू में जिस तरह की हिंसा हुई, उससे देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा हो गया। 

साथ ही गोगोई ने मोदी सरकार के तरीकों को अहंकारी करार देते हुए दावा किया कि यह नए नागरिकता कानून को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे। उन्होंने कहा कि असम समेत देश भर के लोगों ने संशोधित नागरिकता कानून का विरोध किया है क्योंकि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार लोगों को धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर बाँटने की कोशिश कर रही है।  

झारखंड में हाल ही में एक चुनावी रैली में की गई टिप्पणी के लिए मोदी पर निशाना साधते हुए गोगोई ने आरोप लगाया कि मोदी ‘‘जिन्ना भक्त’’ हैं। बता दें कि प्रधानमंत्री ने झारखंड में कहा था कि कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी नागरिकता कानून को लेकर आग लगा रहे हैं और उनका रुख दिखाता है कि संसद में यह विधेयक पारित करने का फैसला 1000 प्रतिशत सही था।

गोगोई ने कहा कि पीएम मोदी बाबा साहेब आंबेडकर, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों और सिद्धांतों की परवाह नहीं करते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जैसे जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए अलग देश बनाया वैसे ही मोदी भी ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के उनके रास्ते पर चल रहे हैं।’’

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