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बीकानेर और जोधपुर में 2433 बच्चों की मौत, गहलोत सरकार की नाकामी पर मीडिया मौन

राजस्थान में मासूमों की मौत का आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब जब कोटा के जेके लोन हॉस्पिटल में एक वर्ष में 970 बच्चों की मृत्यु की ख़बर आई है, बीकानेर और जोधपुर से भी भयानक तस्वीर सामने आ रही है। प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के बयान के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। पायलट ने कहा कि सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। अगर बीकानेर के आँकड़ो की बात करें तो पीबीएम हॉस्पिटल में दिसंबर महीने में 261 बच्चों की मौत का आँकड़ा सामने आया है। पूरे साल का आँकड़ा और भी भयानक है।

बीकानेर में पिछले एक साल में 1681 बच्चों की मौत हो गई है। इनमें नवजात शिशु से लेकर 13 वर्ष तक के बच्चे भी शामिल थे। राज्य के सरकारी तंत्र ने जो वजह बताई, वो है – कई बच्चों को देरी से अस्पताल लाया गया, कई नवजात कम वजन वाले थे। लेकिन सरकारी बयान के उलट की सच्चाई यह है – एक बेड पर तीन-तीन बच्चों को रख कर इलाज किया गया क्योंकि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में बेड नहीं हैं। जिन बच्चों की मौत हुई, उनमें से 1267 नवजात थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, हॉस्पिटल में 40 में से 10 वेंटिलेटर ख़राब पड़े हैं। हॉस्पिटल के शिशु रोग विभागाध्यक्ष ने कहा कि बच्चों को ऐसी स्थिति में लाया जाता है, जहाँ से उन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है।

बीकानेर में बच्चों की मौत का आँकड़ा भयावह: दैनिक भास्कर के स्थानीय संस्करण की ख़बर

वहीं अगर जोधपुर की बात करें तो वहाँ भी सम्पूर्णानन्द मेडिकल कॉलेज में दिसंबर महीने में 146 बच्चों की मौत की ख़बर सामने आई है। जोधपुर के आँकड़े इसलिए भी चौंकाने वाले हैं क्योंकि ये मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह जिला है और हाल ही में वो यहाँ 2 दिवसीय दौरे पर भी आए थे। अस्पताल का कहना है कि ये आँकड़े सामान्य हैं। यहाँ पूरे वर्ष में 752 बच्चों की मौत का आँकड़ा सामने आया है।

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से ये आँकड़े काफ़ी कम हैं। जोधपुर स्थित मेडिकल कॉलेज की नर्सरी को लगातार दो साल से अवॉर्ड मिल रहा है लेकिन यहाँ अक्सर डॉक्टरों की कमी पड़ जाती है।

राजस्थान के विभिन्न अस्पतालों में बच्चों की हो रही मौत पर मीडिया की चुप्पी ख़तरनाक है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं है। वहीं प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने कहा था कि भाजपा सीएए से ध्यान भटकाने के लिए आरोप लगा रही है। उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का कहना है कि पिछले एक साल से सत्ता में रही सरकार जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों को दोष देने से काम नहीं चलेगा। कोटा के प्रभारी मंत्री प्रताप सिंह ने तो स्थानीय अधिकारियों और डॉक्टरों को लापरवाह बता कर इतिश्री कर ली।

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मदरसा छात्रों और मौलवी के मलद्वार से बहा था खून, UP पुलिस का टॉर्चर: मीडिया गिरोह की साजिश का भंडाफोड़

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ देश भर में हुए दंगों के बाद ‘लिबरल-सेक्युलर’ मीडिया ने इस्लामी और वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज़ों के साथ हाथ मिला लिया है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यूपी में विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर दंगों को अंजाम देने के दौरान पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए, उन्हें ज़िंदा जला देने की कोशिश तक की गई। लेकिन, इन सब बातों से बे-ख़बर प्रोपेगेंडाबाज़ों ने फ़र्ज़ी ख़बरों के ज़रिए पुलिस को बदनाम करने का दुष्प्रचार शुरू किया।

लिबरल मीडिया गैंग ने पुलिस को लेकर यह झूठ फैलाया कि दंगों के दौरान पुलिस ने मुस्लिम भीड़ पर अत्याचार किए, उन्हें गिरफ़्तार किया। यह भी झूठ फैलाया किया कि पुलिस ने दंगे पर क़ाबू करते हुए लोगों को चोटिल किया, उनका ख़ून बहाया।

ऐसी ही एक एक ख़बर हाल ही में सामने आई कि CAA के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के बाद सआदत मदरसे के छात्रों को पुलिस ने 20 दिसंबर को हिरासत में लिया था। इस दौरान उन्हें चोटें आईं थी, उनकी हड्डियाँ टूट गईं थी और यहाँ तक ​​कि उनके मलाशय से ख़ून बह रहा था। लेकिन, ये ख़बर झूठी हैं क्योंकि इस मामले पर पीड़ितों ने ख़ुद इस बात से इनकार किया कि पुलिस ने उनका शोषण किया। अब जब उन छात्रों ने ही पुलिस पर लगे आरोपों का खंडन कर दिया तो इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस को बदनाम करने के लिए लिबरल मीडिया ने षड्यंत्र रचा था।

टेलीग्राफ ने इस प्रकरण को लेकर एक के बाद एक कई झूठी ख़बरें फैलाई। ऐसी ही एक ख़बर थी 29 दिसंबर की। इसमें यह दावा किया गया था कि एंटी-सीएए दंगों के दौरान, उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुजफ्फरनगर शहर के सआदत हॉस्टल-कम-अनाथालय के लगभग 100 बच्चों को हिरासत में लिया और उन्हें प्रताड़ित किया।

टेलीग्राफ ने अपनी ख़बर में लिखा कि हिरासत में लिए गए लड़कों को टॉयलेट जाने से कई बार मना कर दिया गया था और उनमें से कुछ को इतना टॉर्चर किया गया कि उन्हें रेक्टल ब्लीडिंग (मलाशय से खून) हुई थी।

टेलीग्राफ में प्रकाशित ख़बर का स्क्रीनशॉट

कॉन्ग्रेस पार्टी के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें यह भी बताया गया कि मदरसा के नाबालिग छात्रों को गिरफ़्तार किया गया था और कुछ को कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया, इस वजह से उन्हें रेक्टल ब्लीडिंग (मलाशय से खून) हुई थी।

नेशनल हेराल्ड की ख़बर का स्क्रीनशॉट

यहाँ तक कि British Daily- The Guardian ने भी इस घटना के बारे में आधा-सच ही बताया। उस आधे सच में यह दावा किया गया था कि पुलिस ने मौलवी और उसके 35 छात्रों को हिरासत में लिया, जिनमें 15 कथित तौर पर नाबालिग और अनाथ थे और उन्हें पास के पुलिस बैरक में ले जाया गया, जहाँ उनके कपड़े उतारे गए और मारपीट की गई। इस ख़बर में यह दावा भी किया गया था कि पुलिस ने मौलवी (असद रज़ा हुसैनी) की गुदा में रॉड डाल दी, जिससे उनके गुदा से ख़ून बहने लगा।

The Guardian की रिपोर्ट का स्क्रीशॉट

कविता कृष्णन जो कि अति-वामपंथी कट्टरपंथी तत्व के रूप में भारत विरोधी प्रचार के लिए जानी जाती हैं, उन्होंने भी यूपी पुलिस के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाना जारी रखा। उसने दावा किया कि मदरसा के बच्चों को यूपी पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जिससे उनके गुदा से ख़ून बह रहा था।

वामपंथी स्वरा भास्कर ने भी इसी तरह के बयान दिए, जिसमें दावा किया गया कि ‘कथित’ बलात्कार मुजफ्फरनगर में हुआ और इस घटना के लिए उन्होंने यूपी पुलिस को ज़िम्मेदार ठहराया।

इन सभी झूठी ख़बरों का खंडन द प्रिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में किया और यह स्पष्ट किया कि सआदत छात्रावास के नाबालिग लड़कों ने ख़ुद दावा किया कि उनके गुदा से ख़ून बहने की ख़बरें झूठी हैं। सीतापुर के रहने वाले 21 साल के इरफ़ान हैदर ने द प्रिंट को बताया कि ‘कुछ मदरसा छात्रों को पुलिस यातना का दंश झेलना पड़ा’ जैसी सारी ख़बरें झूठी थी, इनका कोई आधार नहीं था।

मदरसे के मौलवी असद रज़ा हुसैनी के एक रिश्तेदार और विश्वासपात्र नावेद आलम ने, द प्रिंट को बताया कि यह सच नहीं है। न तो बच्चों और न ही मौलाना साहब को रेक्टल ब्लीडिंग हुई, न ही उन्हें बेरहमी से पीटा गया, जो अपने आप में एक भयानक अनुभव होता। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं, इसलिए हमें कोई आरोप लगाने की ज़रूरत नहीं है।

एक अन्य रिश्तेदार, मोहम्मद आज़म ने कहा, “हमें अपना मुँह ख़ुदा को दिखाना है। इसलिए झूठ बोलने का कोई मतलब नहीं है। जो हुआ वह अपने आप में एक बड़ी बात थी।”

ग़ौर करने वाली बात यह है कि मीडिया गिरोह हो या फिर कोई खास वर्ग, CAA की आड़ में विरोध-प्रदर्शन के नाम पर दंगा करने वालों की पोल पुलिस खोल ही देती है। मुज़फ़्फ़रनगर के एसपी सतपाल अंतिल ने बताया था, “मीनाक्षी चौक और महावीर चौक के बीच कम से कम 50000 लोगों की भीड़ थी, जो पुलिस पर हमला कर रही थी और हिंसा और बर्बरता में लिप्त थी। जब हमने भीड़ को रोकने की कोशिश की, तो दंगाइयों एक समूह परिसर के अंदर गया और परिसर के अंदर से हम पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद हमने परिसर में प्रवेश किया और फिर 70 लोगों को गिरफ़्तार किया।”

यूपी पुलिस ने भी ट्विटर के माध्यम से मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस के ख़िलाफ़ झूठी अफ़वाहों और दुर्भावनापूर्ण अभियान के बारे में लोगों को सच्चाई से अवगत कराया था। पुलिस ने बताया था कि 20.12.2019 को मुज़फ़्फ़रनगर की घटनाओं में पुलिस कार्रवाई के कारण कोई हताहत नहीं हुआ था। बल्कि इसके उलट, दंगाइयों ने आगजनी कर वाहनों में आग लगाई, एक हिंसक भीड़ ने पुलिस पर फायरिंग की। इसके लिए FIR दर्ज की गई। फिर पुलिस ने विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर उपद्रवियों को गिरफ़्तार किया।

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दंगाई भीड़ में शामिल 7-14 साल के बच्चों ने की पत्थरबाज़ी, जबलपुर के SP का चौंकाने वाला ख़ुलासा

दंगों से कुछ तस्वीरें, जो बताती हैं पुलिस वाले भी चोट खाते हैं, उनका भी ख़ून बहता है…


प्रेमजाल में फँसा शादीशुदा शाहनवाज़ ने सीता से किया निक़ाह, फिर जीजा और दोस्तों संग मिल कर दी हत्या

सोशल साइट्स पर नए लोगों से चंद दिनों की मुलाक़ात कभी-कभी जानलेवा भी बन जाती है। किसी अनजान शख़्स को एकाएक अपना समझ लेने की भूल कई बार मौत का सबब भी बन जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ कानपुर की सीता उर्फ़ नेहा के साथ। सोशल मीडिया के जरिए शाहनवाज़ से हुई उसकी चंद दिनों की मुलाक़ात न जाने कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। बात इस हद तक पहुँच गई कि सीता ने अपने परिवार से बग़ावत कर शाहनवाज़ से निक़ाह भी कर ली। सीता को इस बात की बिल्कुल भनक नहीं कि उसके इस फ़ैसले का अंजाम अगले ही पल उसकी मौत का कारण बनने वाला था।

दरअसल, बिठूर-गंगा बैराज रोड पर 27 दिसंबर को पुलिस को दुल्हन के जोड़े में एक युवती के शव मिला। उसके हाथों में मेहंदी लगी हुई थी, शव देखकर यह साफ़ पता चलता था कि पहले युवती की हत्या की गई और उसके बाद शव फेंक दिया गया। जाँच के बाद पता चला कि शव आजमगढ़ के जवाहिर की चौथे नंबर की बेटी सीता का है। मृतका के पिता ने पुलिस को बताया कि कानपुर के शाहनवाज़ के साथ उनकी बेटी का प्रेम-प्रसंग चल रहा था।


दैनिक जागरण के कानपुर संस्करण में प्रकाशित ख़बर

उन्होंने बताया कि अपनी बेटी को समझाया था कि लड़का दूसरे धर्म का है वो उससे शादी न करे। लेकिन, लड़की नहीं मानी और परिवार के ख़िलाफ़ जाकर उसने पहले निक़ाह किया और फिर कोर्ट मैरिज भी की। इसके बाद सीता को लेकर शाहनवाज़ कानपुर चला गया। 

सीता का शव मिलने के बाद पुलिस ने शाहनवाज़ की खोजबीन शुरू कर दी। इसके बाद, पुलिस ने उसे बजरिया के शौक़त अली पार्क स्थित घर से गिरफ़्तार कर लिया। सख़्ती से पूछताछ करने पर उसने अपना ज़ुर्म क़बूल कर लिया। शनिवार (4 जनवरी) को पुलिस उसे लेकर सीता के जेवर बरामद करने के लिए घटनास्थल पर पहुँची। वहाँ पहुँचकर शाहनवाज़ ने जेवर बरामदगी के वक़्त झाड़ियों में छिपाए तमंचे से पुलिस टीम पर फायरिंग कर दी। पुलिस ने भी जवाब में फायरिंग की। शाहनवाज़ के दाहिने पैर में गोली लग गई जिससे वो ज़ख़्मी हो गया और उसे पकड़ लिया गया।

ख़बर के अनुसार, शाहनवाज़ ने पुलिस को बताया कि सीता से उसकी जान-पहचान सोशल साइट पर हुई थी। जान-पहचान के दौरान सीता, शाहनवाज़ से प्यार करने लगी। शाहनवाज़ ने सीता को बताया था कि वो पहले से शादीशुदा है और उसने अपनी बीवी को तलाक़ दे दिया है। इसके बाद वो उससे मिलने आजमगढ़ गया जहाँ वो सीता के परिजनों से भी मिला। 23 जून 2019 को उसने सीता से निक़ाह किया। अक्टूबर के महीने में वो सीता को कानपुर ले आया जहाँ वो एक किराए के कमरे में रहने लगा।

सीता ने शाहनवाज़ से कई बार कहा कि वो उसे उसकी ससुराल ले जाए, लेकिन शाहनवाज़ हमेशा आनाकानी करता रहता था। सीता की यह ज़िद जब ज़्यादा ज़ोर पकड़ने लगी, तो वो परेशान हो गया और इस बारे में उसने अपने बहनोई आमिर ख़ान से मदद माँगी। इसके बाद दोनों ने मिलकर उसे मारने की योजना बनाई। इसके तहत 26 दिसंबर को शाहनवाज़, सीता को लेकर गंगा बैराज पहुँच गया। वहाँ उसने अपने बहनोई आमिर खान और दोस्तों के साथ मिलकर सीता की गला दबाकर हत्या कर दी और शव फेंक दिया।

शाहनवाज़ ने पुलिस को बताया कि वो सीता को गंगा बैराज ससुराल ले जाने के बहाने से ले गया था। ससुराल जाने की बात पर सीता बेहद ख़ुश हुई थी और इसका ज़िक्र उसने अपनी बहन सुशीला से भी किया था। सीता ने अपनी बहन को बताया था कि वो ससुराल जा रही है, इसलिए उसने अपने हाथों और पैरों में मेहंदी लगवाई है। 27 दिसंबर को जब सुशीला ने अपनी बहन का हाल जानना चाहा तो शाहनवाज़ ने उसे यह कह कर टाल दिया कि वो (सीता) व्यस्त है, जुमे के बाद बात कराएगा। इसके बाद से सीता का फोन लगातार ऑफ़ रहा। सीता का शव मिलने की घटना का पता जब उसके घरवालों को लगा तो मानों उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।

इस मामले पर जानकारी देते हुए सीओ अजीत सिंह ने बताया कि शहनवाज़ व उसके बहनोई को जेल भेज दिया गया। वारदात में शामिल शहनवाज़ के दोस्त शारिक उर्फ़ मोनू व जीशान और आमिर के दोस्त हसीब की तलाश की जा रही है।

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बच्चे कह रहे मम्मा आपके टॉप होने का क्या फायदा। आप हमें ज्यादा पढ़ने के लिए मत कहा करो। यह दर्द है सीमा सूर्यवंशी का। सीमा का नाम मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग (MPPSC) की सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा की चयनित सूची के मेरिट लिस्ट में हैं। लेकिन, उन्हें अब तक नियुक्ति पत्र नहीं मिला है।

उनके जैसी आरक्षित वर्ग की 91 महिलाएँ मेरिट लिस्ट में होकर भी नियुक्ति पत्र से वंचित हैं। ऐसी ही एक महिला हुमा अख्तर ने ऑपइंडिया को बताया, “मेरिट लिस्ट में जगह बनाने पर हमें प्रोत्साहन मिलना चाहिए था। लेकिन वह भी नहीं मिल रहा जिसके हम हकदार हैं। क्या पिछड़े वर्ग से होकर मेरिट लिस्ट में आना हमारा गुनाह है?”

असल में आरक्षित वर्ग की इन महिलाओं को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित करने का फैसला किया गया। फिर मामला कोर्ट में चला गया। इन महिलाओं का कहना है कि उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी कोर्ट के फैसले की गलत तरीके से व्याख्या कर उनकी नियुक्ति में अड़चनें डाल रहे हैं। राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी से मिलकर भी ये कई बार फरियाद लगा चुकी हैं। थक-हार कर रविवार (5 जनवरी 2020) को इन्होंने भोपाल के नीलम पार्क में धरना दिया। इस दौरान कुछ महिलाएँ अपने बच्चों के साथ ही बैठी थीं। इन्होंने बताया कि 7 जनवरी को होने वाली सुनवाई के दौरान मंत्री जीतू पटवारी के वादे के अनुसार यदि उच्च शिक्षा विभाग ने एफि​डेविट दायर नहीं किया तो वे आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर होंगी।

लेकिन, क्या लंबे समय तक आंदोलन से इन्हें इनका हक मिल जाएगा?

अतिथि विद्वानों के अनुभव को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। इस कड़ाके की ठंड में भी अतिथि विद्वान राजधानी के शाहजहाँनी पार्क में 28 दिन से धरने पर बैठे हैं। कफन ओढ़कर प्रदर्शन कर चुके हैं। खून से दीया जला चुके हैं। शहर की सड़कों पर शनिवार को शू पॉलिश कर विरोध जताया। लेकिन, सरकार ने अब तक इनकी सुध नहीं ली है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शनिवार को राज्य कैबिनेट की बैठक में इस मसले पर चर्चा हुई तो कमलनाथ कैबिनेट ही दो खेमों में बँट गई। बैठक के दौरान तय किया गया कि आंदोलनरत करीब 5000 अतिथि विद्वानों को एडजस्ट करने के लिए कॉलेजों में एक हजार नए पद स्वीकृत किए जाएँ। लेकिन इसके खर्च को लेकर वित्त विभाग की आपत्ति और नियमितीकरण को लेकर मंत्रियों जीतू पटवारी, गोविंद सिंह राजपूत, डॉ. गोविंद सिंह और बाला बच्चन की अलग-अलग राय होने के चलते कोई फैसला न हो सका। इसका समाधान खोजने के लिए पॉंच मंत्रियों की जो समिति बनी थी उसने भी बैठक में सुझाव रखे। लेकिन सबके सुझाव अलग-अलग थे। आखिर में सीएम कमलनाथ ने मंत्री जीतू पटवारी, मुख्य सचिव एसआर मोहंती और अपर मुख्य सचिव वित्त अनुराग जैन की एक और कमेटी बना दी।

गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए 2017 में एमपीपीएससी ने सहायक प्राध्यापकों, लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया। 1992 के बााद पहली बार सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू की गई थी। विधानसभा चुनाव के कारण परीक्षा 2018 में हुई। लेकिन रिजल्ट आते ही विवाद शुरू हो गए। करीब सालभर नियुक्ति ही नहीं दी गई। फिर सहायक प्राध्यापक के चयनित उम्मीदवारों ने पद यात्रा निकाली। राजधानी भोपाल पहुॅंचकर सिर मुॅंडवाए। इसके बाद 3 दिसंबर को सीएम कमलनाथ ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएससी से चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दे दिए हैं।

इस बीच कई मामले कोर्ट भी गए। इनमें से ही एक मामला मेरिट लिस्ट में आने वाली आरक्षित वर्ग की 91 महिलाओं से जुड़ा है। परीक्षा के दौरान ज्यादा अंक पाने वाले आवेदकों को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित किया गया। सामान्य वर्ग की महिला आवेदकों ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 18 सितंबर 2019 को हाई कोर्ट का आदेश आया। मेरिट लिस्ट में शामिल श्वेता हार्डिया ने ऑपइंडिया को बताया कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि आरक्षित वर्ग की मेरिट लिस्ट में आने वाली महिला उम्मीदवारों का समायोजन सामान्य श्रेणी के कोटे में होगा।

हार्डिया के अनुसार इस आदेश की तरीके से व्याख्या नहीं की गई और उन्हें महाविद्यालयों की च्वाइस फिलिंग की प्रक्रिया से रोक दिया। इसके बाद 14 अक्टूबर को ये महिलाएँ हाई कोर्ट पहुॅंची और आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार लगाई। 17 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने मेरिटोरियस महिलाओं को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग को दिया। हार्डिया के अनुसार फिर भी उनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है, जबकि ऐसे लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं जिनके नाम चयन सूची के आखिर में हैं।

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फैज थे कट्टर पाकिस्तानी, हजारों साल पुराना इतिहास बताते थे Pak का: हरिशंकर परसाई की किताब से खुली पोल

फैज़ अहमद फैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ को लेकर आजकल देश में एक नई जंग छिड़ी हुई है। आईआईटी कानपुर ने एक समिति बना कर कैम्पस में इस कविता के पाठ, यूनिवर्सिटी के नियम-कायदे और कविता पाठ के बाद सोशल मीडिया पर देश-विरोधी बातों संबंधी जाँच करने का फ़ैसला लिया। जाँच की बात आने के बाद से ही वामपंथियों ने फैज़ को ‘भारत का राष्ट्रभक्त’ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया। ट्विटर पर जावेद अख्तर सरीखे लोगों ने फैज़ के गुणगान में ट्वीट्स किए। फैज़ की कविताएँ शेयर की जाने लगीं।

ऐसे में, दैनिक जागरण के पत्रकार अनंत विजय ने हरिशंकर परसाई की एक रचना का जिक्र किया, जिससे साफ़ पता चलता है कि फैज़ किस सोच वाले व्यक्ति थे और कैसे वो भारत के प्रति घृणा से भरे हुए थे। ‘मार्क्सवाद का अर्धसत्य’ के लेखक अनंत विजय ने ‘हरिशंकर परसाई: चुनी हुई रचनाएँ’ नामक पुस्तक से उद्धरण लेकर फैज़ की सोच के बारे में बताया। उन्होंने लिखा कि फैज़ को ‘भारत-भक्त’ मानने वालों को ये ज़रूर देखना चाहिए। परसाई की इस रचनावली में एक घटना का जिक्र है, जो ताशकंद की है।

दरअसल, इस घटना का अनुभव मलयाली लेखक तकषि शिवशंकर पिल्लई ने साझा की थी। दर्जनों उपन्यास और 600 से भी अधिक कहानियाँ लिख चुके पिल्लई एक लोकप्रिय साहित्यकार थे, जिन्हें साहित्य कदमी अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था। पिल्लई के हवाले से महान व्यंगकार परसाई ने लिखा है कि ताशकंद में एफ्रो-एशियाई लेखकों का एक सम्मलेन हुआ था। इस सम्मलेन में पिल्लई ने प्रस्ताव दिया था कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लेखकों को मिल कर एक संयुक्त वक्तव्य जारी करना चाहिए। उस वक्तव्य में ये होगा कि तीनों ही देश साझा संस्कृति, इतिहास और साहित्य-परंपरा का निर्वहन करते हैं।

बकौल हरिशंकर परसाई, पिल्लई के इस प्रस्ताव को पाकिस्तानी फैज़ अहमद फैज़ ने तुरंत नकार दिया। जबकि वहाँ मौजूद बांग्लादेश के लेखक ने कुछ भी टिप्पणी नहीं की थी। तब फैज़ ने स्पष्ट कहा था कि पाकिस्तान का इतिहास 1947 से शुरू नहीं होता है बल्कि ये तो हज़ारों वर्ष पुराना है। दरअसल, पिल्लई ने जब उन्हें याद दिलाया कि पाकिस्तान तो 1947 में भारत से विभाजित होकर अलग हुआ था, तो फैज़ तमतमा गए। पिल्लई ने कहा कि हदें भले ही बन गई हों लेकिन दोनों देशों की संस्कृति तो वही है। पिल्लई के प्रस्ताव पर फैज़ ने कहा- “नहीं। यह हरगिज़ नहीं हो सकता।“

इसके बाद फैज़ ने अपने फ़ैसले के पक्ष में जो तर्क दिया, उसे आप भी जानिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की हज़ारों वर्ष पुरानी संस्कृति का भारत से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का इतिहास भी अपना है, जो हज़ारों साल पहले जाता है। फैज़ ने कहा कि पाकिस्तान की संस्कृति या इतिहास का भारत से कोई भी संबंध नहीं है। इसके बाद पिल्लई और फैज़ के बीच जोरदार बहस हुई थी।

दरअसल, उस समय पिल्लई भी नहीं जानते थे कि फैज़ अहमद फैज़ कौन हैं, क्योंकि वो दक्षिण भारतीय थे। बाद में उन्होंने अपने कुछ उत्तर भारतीय मित्रों से बातचीत की तो उन्हें पता चला कि उनके साथ बहस करने वाले फैज़ ही थे। इस संस्मरण को पिल्लई ने लिखा है और हरिशंकर परसाई ने ‘इकबाल की बेइज्जती’ में इसका जिक्र किया है।

फैज़ अहमद फैज़: उनकी नज़्म और वामपंथियों का फर्जी नैरेटिव ‘हम देखेंगे’

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

शादी के 1 हफ्ते पहले Pak में सिख युवक की हत्या, पत्रकार भाई ने कहा- ‘हमें हर साल उठानी पड़ती हैं लाशें’

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहा उत्पीड़न थमने का नाम नहीं ले रहा है। पाकिस्तान के खैबर पख़्तूनख़्वा में स्थित पेशावर में एक सिख युवक की हत्या के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति एक बार फिर सामने आ रही है। ख़बर के अनुसार, पेशावर में एक सिख युवक की हत्या कर दी गई है लेकिन अब तक हत्यारे का कोई सुराग नहीं मिला है। चमकनी पुलिस थाना क्षेत्र में रविवार (जनवरी 5, 2020) को हुई इस वारदात को लेकर इलाक़े के हिन्दुओं व सिखों में भय का माहौल व्याप्त है। डेड बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए हॉस्पिटल भेजा गया है।

वहीं सोशल मीडिया के माध्यम से मृतक के भाई ने न्याय की गुहार लगाई है। मृतक के भाई हरमिंदर सिंह ने कहा कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार के मामलों को पाकिस्तानी पुलिस द्वारा दबा दिया जाता है। हरमिंदर ने अपने मृत भाई के लिए न्याय की भावुक गुहार लगाते हुए कहा कि वो चाहते हैं कि लोग उनकी आवाज़ बनें। उन्होंने कहा कि एक तरफ पाकिस्तान की सरकार अल्पसंख्यकों के नाम पर बड़ी फंडिंग उठाती है और दूसरी तरफ सिखों, हिन्दुओं व ईसाईयों पर अत्याचार किया जाता है।

“पाकिस्तान में हमारी हालत ये है कि आज मुझे अपने मरे हुए भाई की बॉडी उठानी पड़ रही है”- ये बोल पीड़ित हरमिंदर के हैं, जिन्होंने ट्विटर पर अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने कहा कि वो तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक पाकिस्तानी सरकार उनके भाई के कातिलों को सज़ा नहीं दे देती। हरमिंदर ने कहा कि वो न्याय के लिए जहाँ भी जाना होगा, जाएँगे। हरमिंदर ने भावुक अपील करते हुए कहा:

“आज मुझे अपने भाई की लाश उठानी पड़ रही है। कल को मेरे और भी हिन्दू, सिख और ईसाई भाइयों को इस स्थिति से गुजरना पड़ सकता है। पाकिस्तान दुनिया भर में ढिंढोरा पीटता है कि यहाँ अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं लेकिन असलियत ये है कि हमें हर साल लाशें उठानी पड़ती हैं। कभी पेशावर में तो कभी स्वात में, ये सिलसिला लगातार चल रहा है। मैं जनता से अपील करता हूँ कि आप हमारी आवाज़ बनें। हमारे नाम पर हर साल अरबों डॉलर की फंडिंग खाई जाती है। हमारी हालत देखिए, हम रोते-बिलखते आपके सामने ही खड़े हैं।”

मृतक का नाम रविंदर सिंह है। मृतक के भाई हरमिंदर सिंह पब्लिक न्यूज़ इस्लामाबाद में बतौर रिपोर्टर कार्यरत हैं। परविंदर की शादी अगले ही हफ्ते होनी थी। ऐसे समय में उनकी हत्या होने से परिवार सदमे में है। वो शादी की तैयारी के सिलसिले में ही पेशावर गए हुए थे, जहाँ उनकी हत्या कर दी गई। 25 वर्षीय परविंदर की हत्या को लेकर पाकिस्तान पुलिस ने कहा है कि वो जाँच कर रही है। अस्पताल में मृतक के परिजन रोते-बिलखते नज़र आए, जिन्हें परिचित ढाँढस बँधा रहे थे।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति पर चिंता जताई थी। वहीं पाक पीएम इमरान ख़ान लगातार कहते हैं कि वहाँ अल्पसंख्यक ख़ुशी से रह रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान स्थित पंजाब के ननकाना साहिब को घेर कर मुस्लिमों ने पत्थरबाजी की। भड़काऊ नारेबाजी कर रही मुस्लिम भीड़ ने गुरु नानक के जन्मस्थल को तहस-नहस करने की चेतावनी दी। ऐसे में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

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उमर ने कबाब से तो महबूबा ने चिकन सूप से की तौबा: नजरबंदी में कश्मीरी नेताओं का बदला जायका

अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में एहतियातन नजरबंद किए नेताओं को रिहा करने का क्रम जारी है। शुक्रवार को चार नेता रिहा किए गए। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के अशफ़ाक़ जब्बार और गुलाम नबी, पीडीपी के जहूर मीर और यासिर रेशी तथा कॉन्ग्रेस के बशीर मीर शामिल हैं। सरकार ने कहा है कि धीरे-धीरे सभी नेता रिहा कर दिए जाएँगे।

24 नेता अभी भी नज़रबंद हैं। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती भी शामिल हैं। इनके अलावा, सज्जाद लोन, नईम अख्तर और शाह फैसल सहित अन्य नेता श्रीनगर के एमएलए हॉस्टल में नज़रबंद हैं। मीडिया की खबरों की मानें तो नजरबंदी ने नेताओं के जीवनशैली को काफी हद तक बदल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्रियों नेशनल कॉन्फ्रेन्स के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला और PDP अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती का ज़ायका तक बदल गया है। उमर अब्दुल्ला न अब कबाब की इच्छा जताते हैं और न महबूबा को चिकन सूप या गोश्ताबा और रिसता चाहिए।

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार, उमर अब्दुल्ला को कबाब बेहद पसंद है। वहीं महबूबा मुफ़्ती को चिकन, चिकन सूप और वाजवान में रिसता व गोश्तबा के अलावा चाइनीज़ खाना पसंद है। ख़बर के अनुसार दोनों नेताओं को जब हिरासत में लिया गया था, तब उन्हें कई दिनों तक उनकी इच्छानुसार मांसाहारी खाना दिया गया था। दरअसल, जेल मैन्युअल के मुताबिक़ शाकाहारी और मांसाहारी दोनो तरह का खाना क्रमानुसार उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन, पिछले एक महीने से दोनों नेता मांसाहार को छू तक नहीं रहे।

दोनों नेताओं की सुरक्षा में तैनात अधिकारियों ने बताया कि उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती की खुराक में साग, दाल, सब्जी, चपाती और चावल शामिल है। इसके अलावा, वो फलों का सेवन भी करते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं को जहाँ रखा गया है वहाँ खाना पकाने की अनुमति नहीं है। लेकिन, चाय के लिए प्रावधान किया गया है। दोनों नेताओं को जब चाय और हल्का नाश्ता लेने की इच्छा होती है तो संबंधित कर्मियों द्वारा उनके लिए चाय व हल्का नाश्ता दिया जाता है। यह सुविधा उनसे मिलने-जुलने वाले लोगों के लिए भी है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इन नेताओं से मिलने वाला कोई निकट संबंधी हो तो वो खाना भी ला सकता है, लेकिन उस खाने की जाँच अनिवार्य होती है।

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‘अल्लाह का शुक्र है कि ‘पापा मोदी’ की कोई औलाद नहीं, वरना…’ – JNU वाली शेहला रशीद ने फिर उगला जहर

जेएनयू के पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की है। शहेला ने सोशल मीडिया के माध्यम से पीएम मोदी पर टिप्पणी की। शेहला रशीद ने ट्विटर पर लिखा- “अल्लाह का शुक्र है कि नरेंद्र मोदी की कोई औलाद नहीं है। अगर उनके बच्चे होते तो उन्हें स्कूल में काफ़ी शर्मिंदा होना पड़ता।” ये पहली बार नहीं है जब शेहला रशीद ने पीएम मोदी को लेकर ऐसी टिप्पणी की हो। शेहला ने 2018 में भाजपा समर्थकों को ट्रोल करते हुए लिखा था कि वो अपने ‘पापा मोदी’ को कहें कि वो अनुच्छेद 370 हटा कर दिखाएँ और राम मंदिर बना कर दिखाएँ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर उनके वैवाहिक जीवन या परिवार को लेकर कई विपक्षी नेता व एक्टिविस्ट टिप्पणी करते रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने पीएम मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया हो, वो पारिवारिक सिस्टम का सम्मान कैसे कर सकता है? यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने भी कहा था कि भाजपा की महिला नेताओं को डर है कि पीएम मोदी की संगत में आकर उनके पति भी उन्हें छोड़ देंगे, इसीलिए वो अपने पति को प्रधानमंत्री से नहीं मिलने देती हैं। इसी तरह एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी कहा था कि पीएम मोदी के बाल-बच्चे और बीवी नहीं हैं, इसीलिए वो ये नहीं जानते हैं कि परिवार क्या होता है?

शेहला रशीद ने इसी श्रृंखला में नया बयान जोड़ा है। कई लोगों ने शेहला के इस बयान से आपत्ति भी जताई, वहीं कई अन्य लोगों ने जवाब भी दिया। एक व्यक्ति ने लिखा कि अगर शेहला के बच्चे होते तो वो अभी तक आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग के लिए भेज दिए गए होते। एक यूजर ने पूछा कि शेहला अपने ख़ुदा से ज़्यादा मोदी को क्यों याद करती हैं? एक व्यक्ति ने याद दिलाया कि पीएम मोदी के बेटे-बेटी अगर होते भी तो वो कब का स्कूल की पढ़ाई पूरी कर चुके होते। एक ट्विटर यूजर ने कहा कि बच्चे तो राहुल गाँधी के भी नहीं हैं।

शेहला रशीद ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में क़दम रखा ही था कि उनके नेता शाह फैसल तुर्की भागते हुए पकड़े गए। वो फ़िलहाल पुलिस की हिरासत में हैं। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के साथ ही शेहला की राजनितिक महत्वाकांक्षाएँ भी धूमिल हो गईं और उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली। फ़िलहाल वह ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ के रूप में अजीबोगरीब टिप्पणियाँ करती रहती हैं।

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देखती रह गई कॉन्ग्रेस और शिवसेना, पवार की जेब में चला गया ‘घर और खजाना’

महाराष्ट्र में सभी मंत्रियों के विभाग के बँटवारा कर दिया गया। इसके साथ ही उद्धव ठाकरे सरकार के मंत्रियों ने अपने-अपने मंत्रालयों का प्रभार संभालने की शुरुआत कर दी। मंत्रियों के नामों की घोषणा तो पहले ही कर दी गई थी, जिसमें एनसीपी का दबदबा रहा था। इसी तरह सारे मलाईदार विभाग भी पवार के मंत्रियों के पास गया है। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर मलाईदार विभाग एनसीपी को दिया गया है। वहीं शिवसेना ने शहरी क्षेत्रों से जुड़े विभाग अपने पास रखे हैं। कॉन्ग्रेस को बचे-खुचे मंत्रालयों को देकर संतुष्ट कर दिया गया है। मंत्रिमंडल में एनसीपी का दबदबा दिख रहा है।

सबसे पहले कॉन्ग्रेस की बात करते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को पीडब्ल्यूडी विभाग और प्रदेश अध्यक्ष बालासाहब थोराट को राजस्व मंत्रालय दिया गया है। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे अमित देशमुख को चिकित्सा एवं संस्कृति मंत्रालय दिया गया है। बाकी कॉन्ग्रेस नेताओं को आदिवासी विकास, स्कूली शिक्षण, जनजातीय विकास, मत्स्य, ओबीसी कल्याण और डेयरी विकास देकर निपटा दिया गया है। कॉन्ग्रेस पार्टी की एक तरह से फजीहत ही हुई है क्योंकि जो भी विभाग शिवसेना और एनसीपी से बच गए, वो सोनिया गाँधी की पार्टी को थमा दिए गए हैं।

मंत्रिमंडल में सबसे जबरदस्त उपस्थिति शरद पवार की एनसीपी की है। पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल को उपभोक्ता मामले और जयंत पाटिल को जल संसाधन मंत्रालय मिला है। सबसे बड़ी बात ये है कि एनसीपी ने वित्त और गृह- ये दोनों ही महत्वपूर्ण मंत्रालय अपने पास रखा है। उपमुख्यमंत्री अजित पवार को वित्त मंत्रालय दिया गया है, वहीं पवार परिवार के क़रीबी अनिल देशमुख को गृह मंत्रालय दिया गया है। ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय, आवास और अल्पसंख्यक मामले सहित कई महत्वपूर्ण मंत्रालय शरद पवार की पार्टी के पास रहेगा।

शिवसेना ने शहरी इलाक़ों में अपनी पैठ और मजबूत करने के लिए उससे जुड़े मंत्रालयों को अपने ही मंत्रियों की झोली में डाला है। आदित्य ठाकरे ने पर्यटन और पर्यावरण रखा है। अर्बन क्षेत्रों से जुड़े शहरी विकास और उद्योग मंत्रालय भी शिवसेना ने ही रखा है। कृषि मंत्रालय भी शिवसेना ने ही रखा है। वहीं ख़ुद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पास कोई बड़ा विभाग नहीं है। उनके पास न्यायपालिका और जनसम्पर्क सरीखे मंत्रालय हैं। यानी, उद्धव भले ही मुख्यमंत्री हों और कॉन्ग्रेस भी सरकार में शामिल हो, लेकिन मंत्रिमंडल में पवार का पावर ही दिख रहा है।

बता दें कि कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायक ग्रामीण क्षेत्रों से ही जीत कर आए हैं लेकिन उसे इससे जुड़ा एक भी मंत्रालय नहीं दिया गया। तीनों पार्टियों के कई नेताओं में मंत्रिमंडल के गठन के समय से ही असंतोष उपज रहा था, जो विभागों के बँटवारे के बाद और तेज़ हो गया है।

सत्ता के लिए तीन-तिकड़म में लगी थी शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी, महाराष्ट्र में 300 किसानों ने कर ली आत्महत्या

सावरकर पर एक सुर में बोली भाजपा-शिवसेना, राहुल गाँधी के विवादित बोल से दाँव पर महाराष्ट्र सरकार

‘न्यूट्रल पत्रकार’ राजदीप ने कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम में अपनी पुस्तक को किया प्रमोट, दिया महाराष्ट्र पर लेक्चर

दिल्ली की सुनहरी मस्जिद पर लहरा रहा था लाल झंडा और मचा था कत्लेआम, अब उसी से ललकार रहा ईरान

वह साल 1739 का था। पर्सिया से आया नादिरशाह ​ने चॉंदनी चौक की सुनहरी मस्जिद पर लाल झंडा फहराया। वहीं से खड़े होकर वह अपनी फौज को दिल्ली की गलियों को खून से रंगते निहार रहा था। यही झंडा अब ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर लहरा रहा है। इसे अमेरिका के खिलाफ ईरान के जंग के ऐलान के तौर पर देखा जा रहा है।

ख़बर के अनुसार, लाल झंडा शिया परंपरा में ख़ूनी प्रतिशोध का प्रतीक होता है। झंडे पर लिखा था, ‘जो लोग हुसैन के ख़ून का बदला लेना चाहते हैं’। शिया परंपरा के अनुसार, लाल झंडे पर लगे ख़ून के छींटे मारे गए व्यक्तियों का बदला लेने का प्रतीक है।

शुक्रवार को अमेरिका ने बगदाद में एक एयर स्ट्राइक में ईरान के कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था। इसके बाद शनिवार की रात बगदाद में अमेरिकी दूतावास के बाहर रॉकेट से हमला किया गया। माना जा रहा है कि ये हमला ईरान की ओर से किया गया। ये हमला अमेरिकी दूतावास के नजदीक और अमेरिकी एयरबेस पर हुआ। दो रॉकेट दूतावास के नजदीक गिरे।

इस हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने फिर ईरान को अत्याधुनिक और ब्रैंड न्यू हथियारों से हमला करने की धमकी दी है।  ट्रम्प ने ईरान को सलाह देते हुए ट्वीट किया, “उन्होंने हमला किया और हमने उसका जवाब दिया। अगर वो फिर से हमला करेंगे, जो कि मैं उन्हें सलाह देता हूँ कि वो ना करें तो हम उन पर और ज़ोरदार हमला करेंगे जैसा अब तक कभी नहीं हुआ।”

अमेरिका के राष्ट्रपति ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी तरह के हमले का जवाब देने में सक्षम है। ट्रम्प ने अपने ट्वीट में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने दो ट्रिलियन डॉलर अपने सैन्य उपकरणों पर ख़र्च किए हैं। हम सबसे बड़े (सैन्य शक्ति के सन्दर्भ में) और अब तक पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। अगर ईरान अमेरिकन बेस पर हमला करता है या किसी अमेरिकन पर हमला करता है, तो हम अपने ब्रैंड न्यू और बेहद सुंदर उपकरण उनके पास भेजेंगे… बिना किसी संकोच के।”

इधर, सुलेमानी के परिजनों से ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी ने मुलाकात की। कासिम सुलेमानी की बेटी जेनाब सुलेमानी ने राष्ट्रपति हसन रोहानी से कहा, “मिस्टर रोहानी जब मेरे पिता के दोस्तों को ख़ून बहता था तो वो बदला लेते थे। अब मेरे पिता के ख़ून बहने का बदला कौन लेगा?” इसके जवाब में राष्ट्रपति रोहानी ने कहा, “बिल्कुल मिलेगा, शहीद के ख़ून का बदला लिया जाएगा, चिंता मत करो।”

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने एक अन्य ट्वीट के ज़रिए ईरान को चेतावनी दी है कि यदि वो अमेरिकी जवानों या सम्पत्ति पर हमला करेगा, तो अमेरिका 52 ईरानी स्थलों को निशाना बनाएगा और उन पर बहुत तेज़ी से और ज़ोरदार हमला करेगा। उन्होंने कहा कि ईरान के 52 ठिकाने हमारे निशाने पर हैं, जो ईरान और ईरानी संस्कृति के लिए काफ़ी अहमियत रखते हैं। हम किसी भी तरह के हमले का मुँहतोड़ जवाब देने को तैयार हैं।

ईरानी कमांडर मरा तो उबल पड़े ‘शांतिदूत’, ट्रंप ने बताया- दिल्ली में भी हमले की रची थी साजिश

पाकिस्तान ने F-16 का किया था दुरुपयोग, अमेरिका के विदेश विभाग ने पत्र लिखकर लगाई फ़टकार