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BJP-शिवसेना के बीच जारी गतिरोध से उभरे इन विकल्पों को लेकर महाराष्ट्र में बढ़ी हलचल, ‘मातोश्री’ से हटे पोस्टर

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के गठबंधन को बहुमत तो मिल गया, लेकिन अभी तक राज्य में सरकार नहीं बन पाई है। दोनों पार्टियों के बीच मुख्यमंत्री पद और कैबिनेट में हिस्सेदारी को लेकर खींचतान चल रही है। भाजपा-शिवसेना के बीच सरकार गठन को लेकर जारी गतिरोध के बीच अन्य विकल्पों को लेकर भी सरगर्मियाँ तेज हो गईं हैं। इस सबके बीच गुरुवार (अक्टूबर 31, 2019) को शिवसेना नेता संजय राउत ने राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस के शरद पवार से मुलाकात की, जिसने सियासी गर्मी को और बढ़ा दिया।

बता दें कि राज्य में बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कॉन्ग्रेस को 44 सीटों पर जीत हासिल हुई है। मौजूदा परिस्थिति में बीजेपी और शिवसेना को बहुमत है। वो आसानी से सरकार बना सकती है, लेकिन शिवसेना के 50-50 फॉर्मूले को लेकर पेंच फँसा हुआ है। अगर शिवसेना इस पर अड़ी रहती है और एनसीपी-कॉन्ग्रेस विपक्ष में बैठने पर कायम रहती है, तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है। लेकिन यदि कॉन्ग्रेस और एनसीपी का गठबंधन शिवसेना का साथ देने के लिए राजी हो जाती है, तो शिवसेना आराम से सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है।

इसके साथ ही कयास लगाए जा रहे हैं कि राज्य में अल्पमत की सरकार बन सकती है, जिसे बाहर से एनसीपी समर्थन दे सकती है। जिस तरह से 2014 के चुनाव के बाद 288 सदस्यीय विधानसभा में जब 122 विधायकों वाली फड़नवीस की अल्पमत सरकार ने शपथ ली थी तो एनसीपी ने उसे बाहर से समर्थन दिया था।

वहीं मौजूदा सियासी समीकरण को देखते हुए ये भी बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र में शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की संयुक्त सरकार बन सकती है। बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता पृथ्वीराज चह्वाण ने शिवसेना को उकसाते हुए कहा था कि विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। इसके बावजूद यदि वह सरकार बनाने में अक्षम रहती है तो दूसरे बड़े दल के रूप में शिवसेना को मौका मिलना चाहिए। 

चह्वाण का कहना है कि ऐसी स्थिति में यदि शिवसेना सरकार बनाने के लिए कॉन्ग्रेस से समर्थन माँगती है तो वो पार्टी आलाकमान से इस पर विचार करने को कहेंगे। एस तरह से प्रदेश में शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की संयुक्त सरकार की संभावना भी दिखाई दे रही है।

इस बीच बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (BMC) ने ठाकरे परिवार के आवास ‘मातोश्री’ के बाहर लगे उन होर्डिंग को हटा दिया है, जिनमें आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की बात लिखी गई थी। इन होर्डिंग में लिखा था- सिर्फ आदित्य ठाकरे ही महाराष्ट्र के सीएम। बता दें कि बीएमसी में शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी है, ऐसे में इन पोस्टरों को हटाया जाना सरकार गठन के लिए जारी उठापटक को एक नया मोड़ दे सकता है।

ISIS से खतरा अब भी कायम: अबू हमजा ने की बगदादी के मारे जाने की पुष्टि, अल-हाशिमी नया सरगना, दी धमकी

दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने नया ऑडियो जारी कर अपने सरगना अबु बकर अल-बगदादी के मारे जाने की पुष्टि कर दी है। साथ ही अपने नए सरगना का भी ऐलान कर दिया है। इस्लामिक स्टेट ने अबु इब्राहिम अल-हाशिमी को नया सरगना घोषित किया है। नए ऑडियो में बगदादी के बेहद क़रीबी अबु हसन अल-मुहाजिर के मारे जाने की भी पुष्टि की गई है।

अल-मुहाजिर को रविवार (27 अक्टूबर) को उत्तरी सीरिया के जारबिलस में अमेरिकी ऑपरेशन में मार गिराया गया था। अबू हमजा अल-कुरैशी नाम के वक्ता ने इस्लामिक स्टेट के अनुयायियों से नए खलीफ़ा के प्रति निष्ठा रखने का आग्रह किया और अमेरिकियों को संबोधित करते हुए कहा कि जश्न मत मनाओ।

इससे पहले अमेरिका ने ISIS चीफ अबू बकर अल बगदादी के संभावित उत्तराधिकारी को भी एयरस्ट्राइक में मार गिराने का ऐलान किया था। इसकी जानकारी ट्रंप ने ट्वीट कर दी थी जिसमें कहा गया था कि बगदादी के नंबर एक उत्तराधिकारी को भी ढेर कर दिया गया।

ख़बर के अनुसार, बगदादी के मारे जाने के बाद भी ख़तरा टला नहीं है। एक शीर्ष अमेरिकी जनरल ने कहा है कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट अभी भी ख़तरनाक है और यह अपने लीडर अबू बकर-बगदादी के की मौत का बदला लेगा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल केनेथ मैकेंजी ने पेंटागन द्वारा जारी किए वीडियो और अमेरिकी विशेष बलों की रेड में बगदादी की मौत को स्वीकारते हुए संवाददाताओं से बात करते हुए बताया कि आतंकी संगठन के नेतृत्व को बगदादी की मौत से झटका लगा है। इससे उभरने में भले ही उन्हें थोड़ा वक़्त लगे, इसलिए यह नहीं मान लेना चाहिए कि ख़तरा टल गया।

ग़ौरतलब है कि उत्तर-पश्चिम सीरिया में अमेरिका के विशेष अभियानों में बगदादी मारा गया था। बगदादी के मारे जाने की भी पुष्टि डोनाल्ड ट्रंप ने ह्वाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि बगदादी कुत्ते की मौत मारा गया।

इस अभियान में अमेरिकी जवानों को किसी तरह का नुकसान नहीं उठाना पड़ा। ट्रंप ने बताया था कि बगदादी के साथ उसके तीन बच्चों, दो बीवी और एक सुरक्षा गार्ड भी मारा गया। इस सफल मिशन के लिए उन्होंने रूस, तुर्की और सीरिया का शुक्रिया भी अदा किया। साथ ही बताया कि इस ऑपरेशन से अमरीकी सेना को ‘बहुत सी संवेदनशील जानकारियाँ और चीज़ें’ भी मिली थी।

कमलेश तिवारी हत्याकांड: कामरान के बाद अब सौदागरन मोहल्ला आया रडार पर, दाउद कनेक्शन भी आ रहा सामने

कमलेश तिवारी हत्याकांड में हत्यारोपियों की मदद करने वालों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि आए दिन पुलिस किसी न किसी को गिरफ्तार कर रही है। इस कड़ी में अभी हाल में पुलिस ने पेशे से वकील नावेद और उसके 3 साथियों को गिरफ्तार किया। लेकिन अब खबर है कि एटीएस, एसटीएफ समेत तमाम जाँच एजेंसियों की नजर सौदागरन नाम के मोहल्ले पर है। मीडिया खबर के अनुसार यहाँ कादरी होटल से लेकर कई संगठन सक्रिय है, जिनपर कार्रवाई करने के लिए पुलिस उनके नाम और नंबर की लिस्ट जुटा रही है।

उल्लेखनीय है कि बीते दिनों नावेद की गिरफ्तारी के बाद मौलाना सैयद कैफी अली को भी एटीएस गिरफ्तार कर चुकी है। इसके अलावा अशफाक का फोन ट्रेन में रखकर पुलिस को भ्रमित करने वाले कामरान को भी जाँच में जुटी टीम ने गिरफ्तार कर लिया है। इसी तरह के तमाम खुलासे होने के बाद अब जाँच टीमों ने सौदागरान मोहल्ले की हर गतिविधि पर अपनी नजर टिकाई हुई है।

जानकारी के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों ने ऐसे तमाम संगठन और मशहूर लोगों के नाम की सूची बनाकर उनके नंबर जुटाने शुरू कर दिए हैं, जिनसे मामले के संबंध में पूछताछ होनी है। कहा जा रहा है पुलिस इन लोगों से पूछताछ में उन नामों के बारे में पूछेगी, जिन्होंने बरेली में हत्यारों की हर मुमकिन मदद की।

फिलहाल बता दें कि कमलेश तिवारी हत्याकांड हालिया जाँच के दौरान पूरा नया मोड़ लेता नजर आ रहा है। दरअसल, जाँच एजेंसियों की रडार पर इस मोहल्ले के अलावा एक नया कोड वर्ड भी आया है, जिसे अभी तक ‘दाउद इब्राहिब’ की डी कंपनी से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। न्यूज 18 की खबर के अनुसार हत्याकांड की जाँच में जुटी टीम इस संबंध में जल्द ही नया खुलासा कर सकती है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जाँच एजेंसियों ने अपनी जाँच में कुछ फोन कॉल ट्रेस किया है। जिसमें प्रमोद नाम का खुलासा हुआ। जिसके बाद बताया गया कि प्रमोद नाम का शख्स हकीकत में मुस्लिम समुदाय का है, जो देश से बाहर है और जाँच एजेंसियों से बचने के लिए हिंदू नाम का इस्तेमाल कर रहा है। प्रमोद के मिडिल ईस्ट कंट्री में होने की आशंका जताई जा रही है। वहीं जाँच एजेंसियों का दावा है कि वो जल्द ही प्रमोद नाम के कोड को डिकोड कर लेंगे और इस शख्स का असली नाम का पता लगा लेंगे।

किरण बेदी ‘राक्षस’ हैं, क्योंकि कॉन्ग्रेसियों के लिए नारी सम्मान बस मैडम जी की चमचई है

  • इंदिरा माँ का बलिदान युग-युग याद करता रहेगा हिंदुस्तान। 35वीं पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि।
  • केंद्र ने यहाँ एक राक्षस को नियुक्त कर दिया है। वह योजनाओं को लागू करने में बाधा पहुँचा रही है।

एक देश की पहली और इकलौती महिला प्रधानमंत्री। दूसरी, पहली महिला जिसने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) को चुना। दोनों ही महिला सशक्तिरण की मिसाल। लेकिन, शुक्रवार यानी 31 अक्टूबर 2019 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी की पुण्यतिथि पर ही दूसरी महिला यानी पुडुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी की तुलना ‘राक्षस’ से की गई।

ट्वीट कर इंदिरा को माँ बताने वाला भी कॉन्ग्रेसी और बेदी को भरी सभा में राक्षस कहने वाला भी कॉन्ग्रेसी। फर्क केवल इतना कि एक नया-नया बना कॉन्ग्रेसी, तो दूसरा पार्टी की मुखिया सोनिया गाँधी का पुराना वफादार। दिल्ली कॉन्ग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद ने इंदिरा गॉंधी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें ‘माँ’ कहा। वहीं, पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी नारायणसामी ने पुण्यतिथि पर कॉन्ग्रेस की ओर से आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “हम विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के जरिए लोगों की प्रगति के लिए कड़े प्रयास कर रहे हैं। लेकिन केंद्र ने यहाँ एक ‘राक्षस’ को नियुक्त कर दिया है और वह योजनाओं को लागू करने में बाधा पहुँचा रही हैं।”

इंदिरा गाँधी से आपके वैचारिक मतभेद हो सकते हैं। उनके फैसलों की भी आलोचना हो सकती है। यह भी सच है कि अपने ही सुरक्षाकर्मियों के हाथों उनके मारे जाने के बाद देश भर में सिखों का नरसंहार हुआ था। लेकिन, इस तथ्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वे देश की प्रधानमंत्री थीं। उनके नेतृत्व में देश ने कई मुकाम हासिल किए। इसलिए, कीर्ति आजाद की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने इंदिरा को श्रद्धांजलि देते हुए माँ कहा। वरना, पूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद ने दिसंबर 2013 में बकायदा ऐलान किया था, “सोनिया गाँधी सिर्फ राहुल गाँधी की माँ नहीं हैं। वे हमारी भी माँ हैं और पूरे देश की माँ हैं।” गनीमत यह थी कि उस वक्त प्रियंका गाँधी ने खुद को रायरबेली और अमेठी तक ही सीमित कर रखा था। नहीं तो खुर्शीद साहब इस बयान में यकीनन प्रियंका गाँधी का नाम भी एडजस्ट कर लेते।

असल में, यही कॉन्ग्रेसियों का चरित्र है। उनके लिए नारी सम्मान का मतलब ही मैडम जी की चाटुकारिता है। इसलिए, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे का मजाक उड़ाने से वे नहीं चूकते। वे एक एयरहोस्टेस की अकाल मौत का इस्तेमाल अपनी सुविधा से राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कर लेते हैं। चंद दिन ही बीते हैं जब महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने भाजपा अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पूछा था कि उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है? सत्ता या महिला सुरक्षा? सुष्मिता देव ने यह पत्र इस बिना पर लिख दिया था कि एयरहोस्टेस की आत्महत्या के मामले में आरोपित निर्दलीय विधायक ने बिना माँगे भाजपा को समर्थन का ऐलान कर दिया था, जबकि यह निर्दलीय विधायक कॉन्ग्रेसी सरकार में मंत्री रह चुका है।

इस निर्दलीय विधायक के समर्थन को ठुकरा कर भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसके लिए महत्वपूर्ण क्या है। अब बारी कॉन्ग्रेस की है। नारायणसामी के बयान के बाद उसे बताना चाहिए कि कॉन्ग्रेस के लिए नारी सम्मान का मतलब क्या है? क्या कॉन्ग्रेस का नारी सम्मान गॉंधी परिवार की चौखट तक ही बॅंधा है?

आखिर वो कौन सी सोच हो सकती है जिससे प्रेरित होकर एक सीएम पद का लिहाज न रखे। मर्यादाओं को भूल जाए। नारी के सम्मान का ख्याल न करे। इंदिरा, सोनिया और आने वाले कल में प्रियंका में माँ तलाशने वाली परंपरा के नेता को यह भी याद नहीं रहा कि जिस महिला को वे राक्षस कह रहे हैं, वह एक बेटी की मॉं भी हैं। शालीनता की कथित प्रतिमूर्ति मनमोहन सिंह की कैबिनेट की शोभा रहे नारायणसामी को शायद यह भी याद नहीं रहा होगा कि जिस महिला की तुलना वे राक्षस से कर रहे हैं, नाश्ते की मेज पर कभी उसकी मेजबानी इंदिरा गॉंधी ने की थी। 1975 में 26 जनवरी की परेड के अगले दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा ने किरण बेदी को नाश्ते पर बुलाया था। बकौल किरण बेदी, “पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी इस बात से खुश थीं कि परेड में एक दस्ते का नेतृत्व महिला कर रही थी।” खैर, परिवार के बाहर की जो सोच लें वो भला कॉन्ग्रेसी कैसा!

मुस्लिमों को गिरोह बना लेना चाहिए, कमलेश की हत्या है ‘अब भी रहस्य’: The Wire का जहरीला वीडियो

वामपंथी प्रोपेगंडाबाज द वायर ने कमलेश तिवारी हत्याकांड पर झूठ फैलाना बंद नहीं किया है। “भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह” के नारे लगाने-लगवाने के लिए देशद्रोह के आरोपित उमर खालिद और अर्बन नक्सली आतंकवादियों के पक्ष में बोलने के आरोपित दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के द वायर के यूट्यूब वीडियो में कमलेश तिवारी हत्याकांड की जमकर लीपापोती की गई है। वीडियो का शीर्षक “क्या मुसलमान, मुसलमान की तरह बोल सकता है?” है।

The Wire का शीर्षक

इस बातचीत में उमर खालिद ने साफ़ कहा है कि मुस्लिम अपने मज़हब में हजरत माने जाने वाले मुहम्मद का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं (यानी अगर किसी ने अपमान कर दिया तो उसका गला रेतना, शरीर चाकू से जीते जी फाड़ डालना, और उसके बाद चेहरे पर गोली मार देना ‘बट नैचुरल’ प्रतिक्रिया हुई तब तो??), भले ही उस अपमान से कोई भौतिक नुकसान न हो। उन्होंने कहा कि इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का अपमान मुस्लिमों की अस्मिता पर हमला है, जिससे मुस्लिमों को लड़ने की ज़रूरत है।

हालाँकि इतनी हिंसक और उकसावे वाली बातों को वे “इन सबको ‘शांतिपूर्ण’ तरीके से किए जाने की ज़रूरत है।” के लबादे में ढँकने की कोशिश ज़रूर करते हैं, लेकिन असली संदेश छिपता नहीं है। वे अंत में उसी नैरेटिव का ही समर्थन करते दिखते हैं, जिसमें इस्लाम में पैगंबर माने जाने वाले मोहम्मद की शान में गुस्ताखी करना इतना बड़ा जुर्म है कि उसकी सज़ा चाकुओं से गोद कर किसी जानवर की तरह हलाल कर दिया जाना है।

खुद अर्बन नक्सली कहे जाने वाले अपूर्वानंद भी इसमें कम सहयोग नहीं करते हैं। वे कमलेश तिवारी की हत्या को कमलेश तिवारी, उनके परिवार, उनके सहधर्मी हिन्दुओं की बजाय मुस्लिमों के लिए ‘परेशानी का सबब’ बता देते हैं। और इसका सबूत? इस्लाम में पैगंबर माने जाने वाले मोहम्मद के खिलाफ कमलेश तिवारी की हत्या की खबर आने पर एक ‘अपमानजनक’ ट्विटर ट्रेंड चल गया था। यानी अपने विश्वास में अल्लाह के आखिरी दूत के खिलाफ चले एक ट्विटर ट्रेंड से मुस्लिमों को हुआ ‘कष्ट’ अपूर्वानंद के लिए कमलेश तिवारी को मरते समय हुई तकलीफ़, अपने बेटे, पति, बाप की कटी-फ़टी लाश देखने वाले परिवार के दुःख और अपने सहधर्मी की ऐसी हत्या और उसके बाद भी पसरे भयावह सन्नाटे से हिन्दुओं में बसी दहशत न केवल खूँखार नक्सलियों के पैरोकार कहे जाने वाले अपूर्वानंद के लिए बराबर के स्तर पर हैं, बल्कि मुस्लिमों का ‘कष्ट’ हिन्दुओं में पसरे आतंक से बढ़कर है।

अपूर्वानंद यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने दिवंगत कमलेश तिवारी को भी नफ़रती (हेटफुल) करार दे दिया, जब कि उनका मामला अदालत में अभी विचाराधीन था। उन्होंने यह झूठ भी बोला कि यह हत्या पुलिस के लिए अभी भी ‘रहस्य’ है, जब कि सच्चाई यह है कि इस मामले में पुलिस ने लखनऊ से लेकर गुजरात और राजस्थान तक से मजहब विशेष के आरोपितों की गिरफ्तारियाँ कर ली हैं। अब तक इस मामले में कुल 8 गिरफ्तारियाँ पुलिस ने की हैं। इसके अलावा पुलिस ने खुलासा यह भी किया है कि ये जिहादी दर्जनों अन्य जिहादियों से WhatsApp ग्रुपों के ज़रिए सम्पर्क में थे, और साज़िश में सबकी कोई न कोई भागीदारी थी।

और इतना सब हो जाने के बाद भी कमलेश तिवारी हत्याकांड को अपूर्वानंद न केवल अपने लिए, बल्कि इतनी सारी गिरफ्तारियाँ करने वाली पुलिस के लिए भी ‘रहस्य’ बता रहे हैं! यानि इस हत्या को अंजाम देने वाले जिहादियों और उनकी जिहादी विचारधारा को क्लीन चिट!

इसके बाद ट्रैक बदल कर उमर खालिद सीधे-सीधे झूठ बोलने पर उतर आते हैं। कल तक नास्तिक और कम्युनिस्ट रहे उमर खालिद जब कमेश तिवारी हत्याकांड के बाद ट्विटर पर अपने असली रंग में, कट्टर मजहबी के रूप में सामने आए तो ज़ाहिर तौर पर लोगों ने उनकी जमकर भद्रा उतारी। उसके बारे में बात करते हुए उमर खालिद ने कहा कि उनका इस्लाम यह ज़रूरी नहीं करता कि वे अपनी मज़हबी पहचान सबको साफ़-साफ़ बताएँ। यह सौ फीसदी झूठ है। इस्लाम में अल्लाह और पैगंबर माने जाने वाले मोहम्मद का रास्ता छोड़ने वालों को ‘काफ़िर’ हिन्दुओं से भी गया बीता मानते हुए उनके लिए केवल मौत की सज़ा मुक़र्रर की गई है। दरअसल इस झूठ का इस्तेमाल उमर तिवारी हत्याकांड के तुरंत बाद अपना रंग बदलने को जस्टिफाई करने के लिए करना चाहते थे।

इसके बाद एक तरफ़ उमर खालिद एक तरफ़ “नफरत का जवाब मोहब्बत से देने” की बात कर के दर्शकों को बरगलाने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी ओर वे समुदाय विशेष से आह्वाहन करते हैं कि वे गुस्से में भड़क कर उठ खड़े हों और सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपनी माँगों (जिसमें वे चालाकी से आर्थिक अधिकार, अपने आत्मसम्मान आदि की बकवास भर देते हैं, जबकि मकसद केवल मुस्लिमों को गिरोह और गुट बनाकर उठ खड़े होने का आह्वाहन करना है) का अहसास कराएँ। हैशटैग में ‘लव’ की बात करने वाले उमर की इस वीडियो में सारी की सारी बातें उसी काफ़िरों से नफ़रत से पड़ीं हैं, जिसकी परिणति कमलेश तिवारी की हत्या के रूप में हुई।

निर्भया के बलात्कारियों और फाँसी के बीच अब सिर्फ दया याचिका, जेल अधीक्षक ने दे दिया नोटिस

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के मुनिरका में हुए निर्भया गैंगरेप के दोषियों को जेल अधीक्षक ने अपनी ओर से फाँसी का नोटिस 29 अक्टूबर को दे दिया है। इस नोटिस के ज़रिए उन्हें बताया गया है कि फाँसी की सज़ा के खिलाफ राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने के लिए उनके पास सात दिन का वक़्त है। बता दें कि 29 अक्टूबर को जारी एक कानूनी नोटिस में दोषियों से कहा गया था कि अपनी मौत की सजा के विरुद्ध दया याचिका दाखिल करने के लिए उनके पास 7 दिन का वक़्त है।

नोटिस में कहा गया, “सूचित किया जाता है कि यदि आपने अब तक दया याचिका दायर नहीं की है और यदि आप मामले में फाँसी की सजा के खिलाफ राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करना चाहते हैं तो आप यह नोटिस पाने के सात दिनों के भीतर ऐसा कर सकते हैं। इसमें नाकाम रहने पर माना जाएगा कि आप दया याचिका नहीं दायर करना चाहते हैं और जेल प्रशासन कानून के मुताबिक आगे की आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू करेगा।”

बता दें कि 16 दिसंबर 2012 को 23 वर्षीय छात्रा के साथ दिल्ली में एक बस में छ लोगों ने दुष्कर्म कर उसके साथ मार-पीट कर चलती बस ने नीचे फेंक दिया था। 29 दिसंबर 2012 को जिंदगी और मौत की जंग के बीच सिंगापुर में इलाज के दौरान पीड़िता की मौत हो गई थी। इस घटना में पकड़े आरोपियों में से एक राम सिंह ने जेल में ही ख़ुदकुशी कर ली थी।

दिल्ली गैंगरेप घटना को अंजाम देने वाला एक दोषी उस वक़्त नाबालिग था, जिसे न्यायालय ने बाल सुधार गृह में 3 साल की सजा सुनाई थी। वह अब अपनी सज़ा पूरी कर रिहा हो चुका है। जबकि सर्वोच्च न्यायलय ने 9 जुलाई को मामलें के तीन दोषियों मुकेश (31), पवन (24) और विनय शर्मा (25) की याचिकाएँ ख़ारिज कर दी थीं। अपनी इस याचिका में तीनों ने 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा फाँसी की फैसले को बरक़रार रखने को चुनौती दी थी। जबकि मौत की सजा का सामना कर रहे चौथे दोषी अक्षय कुमार सिंह (33) ने सर्वोच्च न्यायलय में पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की थी।

पीड़िता की माँ ने जेल प्रशासन के कदम पर ख़ुशी ज़ाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। उन्होंने बताया कि वे 7 साल से इसके लिए लड़ रही थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला 2017 में ही दे दिया था।

छठ में प्लास्टिक और पटाखों से बचें: पूजा कमिटियों के लिए केजरीवाल सरकार ने जारी की एडवाइजरी

दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने छठ पूजा कमिटियों को पर्व के लिए एक एडवाइजरी जारी की है। एडवाइजरी में छठ पूजा के मौके पर दिल्ली सरकार द्वारा पर्व के मनाए जाने के लिए सजाए गए 1,108 घाटों पर त्यौहार को प्लास्टिक और पटाखों से दूर रखने की सलाह दी गई है। आज से (गुरुवार, 31 अक्टूबर, 2019) शुरू हो रहे इस चार दिन के त्यौहार में घाटों पर तैनात नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों और सरकारी अधिकारियों की ज़िम्मेदारी होगी कि वे इन घाटों पर प्लास्टिक के उत्पादों के प्रयोग और आतिशबाजी को हतोत्साहित करें। मुख्य पर्व आगामी शनिवार-रविवार (2-3 नवंबर, 2019) को होना है।

दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री कैलाश गहलोत ने डीएम, एसडीएम और अन्य अफसरों के साथ कई घाटों का मुआयना किया और पर्व के लिए किए गए इंतजामों की जानकारी ली। उन्होंने भीड़ नियंत्रण के लिए अधिकारियों को विशेष तौर पर निर्देश दिए। गहलोत ने हाथी घाट, कुदेसिया घाट और गीता घाट का दौरा किया।

इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने भी ट्वीट कर जानकारी दी कि श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार ने घाटों की संख्या 72 से बढ़ाकर 1,108 कर दी है।

इसके अलावा तीर्थ यात्रा विकास समिति के अध्यक्ष कमल बंसल के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकार ने सभी घाटों पर मोबाइल शौचालय और दवाखानों के भी इंतज़ाम किए हुए हैं। उन्होंने भी छठ पूजा में प्लास्टिक और पटाखों का इस्तेमाल रोकने की बात दोहराई। “हमने छठ पूजा कमिटियों को एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें उनसे त्यौहार के दौरान प्लास्टिक और पटाखों का इस्तेमाल न करने की बात कही गई है।”

इसके अलावा बंसल ने 30 घाट यमुना नदी के किनारे बनाए जाने की बात बताई है। दिल्ली सरकार द्वारा लगाए गए 1,108 घाटों में से 266 दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली (पटेल नगर-द्वारका साइड, ‘ब्लू लाइन’), 184 पश्चिमी दिल्ली (‘ग्रीन लाइन’) और दक्षिणी दिल्ली (जोरबाग-छतरपुर, ‘येलो लाइन’) में 83 घाट लगाए गए हैं।

‘निष्पक्ष’ पत्रकार रवीश कुमार को एक और अवॉर्ड, इस बार अपनी कॉन्ग्रेसी सरकार द्वारा

छत्तीसगढ़ में राज कर रही कॉन्ग्रेस सरकार ने एनडीटीवी के जाने माने और ‘निष्पक्ष’ पत्रकार रविश कुमार को सम्मानित करने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने रवीश को उनकी पत्रकारिता के लिए सम्मान देने का निश्चय किया है।

छत्तीसगढ़ राज्य में स्थापना दिवस के मौके पर तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में तमाम क्षेत्रों से 23 लोगों को सम्मानित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में पत्रकारिता क्षेत्र के लिए पंडित माधवराव सप्रे राष्ट्रीय रचनात्मकता सम्मान दिया जाना है, जो एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर रवीश कुमार को दिया जाना तय किया गया है।

उल्लेखनीय है कि कथित ‘निष्पक्ष’ पत्रकार रवीश कुमार ने हाल ही में अयोध्या में हुए दीपोत्सव की रिपोर्टिंग को लेकर हिंदी अख़बार हिंदुस्तान के शीर्षक पर फेसबुक के माध्यम से अपनी टिप्पणी दी थी। रवीश ने हिन्दुओं के त्योहार को हर्षोल्लास से मनाए जाने पर आपत्ति दिखाई थी और तंज मारते हुए अपनी टिप्प्णी में लिखा था कि ऐसी रिपोर्टिंग को पुलित्ज़र प्राइज़ मिलना चाहिए। बता दें कि पुलित्ज़र सम्मान साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में दिया जाने वाला एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। एक समय रवीश ने अपने शो में ज्यादा लोगों के न देखने की वजह का कारण पीएम मोदी को बताया था। इसी दौरान रवीश ने पीएम मोदी को हिटलर भी कहा था।

जम्मू-कश्मीर हमारा मामला, हम चीन के मामले में नहीं बोलते, वह भी चुप रहे: भारत का करारा जवाब

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने चीन के उस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसमें चीन ने लद्दाख और जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन पर आपत्ति जताते हुए इसे अपने इलाके में हस्तक्षेप बताया था। रवीश कुमार ने दो टूक कहा कि जैसे भारत दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी नहीं करने की नीति पर चलता है, वैसी ही उम्मीद वह दूसरे देशों से अपने आंतरिक मामलों के लिए भी करता है। उनका इशारा चीन की शिनजियांग, तिब्बत और अब हॉन्ग कॉन्ग में दमनकारी नीति की ओर था।

प्रेस को सम्बोधित करते हुए रवीश कुमार ने कहा, “चीन को पता है कि इस मुद्दे पर भारत की स्थिति स्पष्ट और सतत है। पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को लद्दाख व जम्मू और कश्मीर के दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील करना भारत का आंतरिक मामला है।” उन्होंने आगे जोड़ा, “हम आशा नहीं करते कि चीन समेत अन्य देश उन मामलों पर टिप्पणी करें जो भारत के अंदरूनी हैं, जैसे भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचता है।”

इसके पहले चीन ने जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन पर आपत्ति जताते हुए “इसमें हमारे हिस्से को भी हड़प लिया” का प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग को इसके लिए आगे किया गया था। गौरतलब है कि चीन लद्दाख को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा मानते हुए भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता के आधार पर उस पर दावा ठोंकता है। लेकिन उसी भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता के आधार पर गिलगित, बाल्टिस्तान, पीओके और पाकिस्तान द्वारा खुद को बेचे हुए पीओके के भूभाग के मामले में इसी आधार को खारिज कर देता है।

जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बुधवार (30 अक्टूबर) मध्यरात्रि को ख़त्म हो गया। इसके साथ ही दो नए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख आस्तित्व में आ गए। अनुच्छेद-370 के तहत मिले विशेष दर्जे को संसद द्वारा निरस्त किए जाने के बाद आज से यह निर्णय प्रभावी हो गया है। गृह मंत्रालय ने बुधवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी थी।

इसी साल 6 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को पारित कर दिया था। इसके तहत तय हुआ था कि दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्यों जम्मू-कश्मीर व लद्दाख के रूप में 31 अक्टूबर 2019 से अस्तित्व में आएगा। ऐसा पहली बार है जब किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया गया है। इस सिससिले में श्रीनगर और लेह में दो अलग-अलग शपथग्रहण समारोह का आयोजन किया गया। पहला समरोह लेह में हुआ जहाँ आरके माथुर ने लद्दाख के उपराज्यपाल के तौर पर शपथ ली। मुर्मू को जम्मू और कश्मीर घाटी के उपराज्यपाल का पद भार सौंपा गया है, और उनके पूर्ववर्ती सत्यपाल मलिक गोवा के गवर्नर के तौर पर भेजे जाएँगे।

84 के उलट 48 में भी हुआ था एक दंगा, कॉन्ग्रेसी नेताओं ने कराया था ब्राह्मणों का नरसंहार

इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि को याद करने के दो कारण हैं – पहला कारण जिससे सभी वाकिफ हैं कि देश ने एक प्रधानमंत्री खोया, जिसे खुदके ही सुरक्षाकर्मियों ने गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया। मगर कुछ ही लोग याद रख पाते हैं कि आज के ही दिन से दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने में सिख विरोधी दंगा हुआ। यह एक ऐसा नरसंहार था, जिसे भारत के इतिहास में दर्ज सबसे सुनियोजित नरसंहार कहना गलत नहीं होगा। लेकिन क्या यही एक धब्बा है, जो कॉन्ग्रेस के गाल पर लगा है? ऐसा नहीं है कि पीएम इंदिरा की हत्या पर सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस ने ऐसी दुर्भावना से नरसंहार को पहली बार बढ़ावा दिया हो। इंदिरा के बेटे और बाद में प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गाँधी ने तब बयान दिया था, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलती ही है।”

उनका यह बयान इतना समझने के लिए काफी है कि इंसानियत को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी की नीयत कैसी रही है और किस तरीके से इन्होंने सुख-दुःख में साथ देने वाली जनता को ही समय-समय पर मौत के घाट उतार दिया। समय-समय पर इसलिए लिखा गया ताकि याद रहे कि 84 के उलट 48 में भी एक दंगा हुआ था, कॉन्ग्रेसियों ने ही कराया था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो हुआ, वो लगभग सबको याद है या सोशल मीडिया की पहुँच से सब तक जानकारी के रूप में पहुँच चुकी है लेकिन 1948 को भी याद रखना जरूरी है, ताकि कॉन्ग्रेस के असली DNA को पहचाने सकें। तब महात्मा गाँधी की हत्या के बाद हजारों ब्राह्मणों का नरसंहार कॉन्ग्रेस ने करवाया था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद देश में एक भयावह नरसंहार हुआ था। गाँधी के मुस्लिम तुष्टिकरण के रवैये से नाराज़ होकर नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी को उन्हें गोली मार दी थी। नाथूराम पर जब मुकदमा चला तो उसे अपनी करनी की सज़ा अदालत ने दी। इस हत्याकांड के लिए गोडसे को अम्बाला की एक जेल में फाँसी दे दी गई मगर तत्कालीन सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस पार्टी ने गाँधी की हत्या होते ही नरसंहार की आग को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गाँधी के भक्तों और पार्टी के अनुयाइयों ने गोडसे की जाति के लोगों को निशाना बनाया।

नाथूराम गोडसे पुणे (आज के महाराष्ट्र) में जन्मे थे और हिन्दू धर्म के चितपावन ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखते थे। इसी को मोहरा बना कर तत्कालीन सत्तारूढ़ दल और कॉन्ग्रेस हाईकमान के इशारे पर पूरे राज्य में निवास करने वाले चितपावन ब्राह्मणों का क़त्ल किया गया। 31 जनवरी से लेकर 3 फरवरी तक पुणे में ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा का ज़बरदस्त नंगा नाच चला। देखते ही देखते हिंसा की यह चिंगारी जंगल की आग की तरह आग चितपावन ब्राह्मणों की बहुतायत वाले इलाको में फ़ैल गई। इनमें सांगली, कोल्हापुर, सातारा शामिल हैं जहाँ सैंकड़ों लोग मारे गए, हज़ारों घरों को आग के हवाले कर दिया गया, स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए ।

आज़ाद भारत का सबसे पहला नरसंहार यही था, जिसमें असंख्य ब्राह्मणों की नृशंस हत्या कर दी गई। अहिंसा के पुजारी गाँधी का पार्थिव शरीर जिस वक़्त माटी का अपना अंतिम क़र्ज़ चुकाने के लिए चिता पर रखा जाना था, उस वक़्त पुणे और आसपास के इलाकों में न जाने कितने ब्राह्मणों का नरसंहार हो रहा था। यह नरसंहार हिंदुस्तान के इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जिसके घटनाक्रमों का ज़िक्र किसी ने कभी नहीं किया। उस ज़माने में भी इस सम्बन्ध में अखबार में खबरें कम ही आईं हालाँकि विदेश के अख़बारों ने इस पर रिपोर्ट छापी थी। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक हत्या की घटना के अगले ही दिन 31 जनवरी 1948 को मुंबई में 15 लोगों की हत्या की गई थी।

उस वक्त की घटनाओं का वर्णन करने वाली किताब ‘गांधी एंड गोडसे’ में भी इसके प्रमाण मिलते हैं कि ब्राह्मणों के खिलाफ उस वक़्त काफी भयंकर माहौल बना दिया गया था, चितपावन ब्राह्मण समुदाय के लोगों की हत्याएँ आम हो गई थीं। इस पर भी जब कॉन्ग्रेस का मन नहीं भरा तो वहाँ ब्राह्मणों का सामूहिक बहिष्कार किया गया।

किताब ‘गांधी एंड गोडसे’ किताब के चैप्टर-2 के उप-शीर्षक 2.1 में मॉरिन पैटर्सन के उद्धरणों में इस बात का ज़िक्र किया गया है। अपने उद्धरण में मॉरिन ने बताया है कि कैसे गाँधी के अनुयाइयों द्वारा फैलाई जा रही इस हिंसा में ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलाने वाले संगठनों ने भी हवा दी। इनमें कुछ ऐसे संगठन भी थे जिनका नाम ज्योतिबा फुले से जुड़ा है।

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इस किताब में बताया गया है कि महात्मा गाँधी और सावरकर दोनों ही लोग वैचारिक रूप में एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न थे। इस असहमति को आधार बनाकर अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के अनुयाइयों की भारी संख्या वाली भीड़ ने स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वीर सावरकर के घर को ही घेर लिया। इस किताब में ज़िक्र है कि खुद को गाँधी और उनकी पार्टी का कहने वालों की उस भीड़ में करीब 500-1000 लोग थे, जिन्होंने हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दफ्तर में भी तोड़फोड़ की थी।

उस वक़्त लेखक मॉरीन ने दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया था। उस समय के अपने संस्मरण को उद्धृत कर उन्होंने लिखा है कि पुलिस के दखल के बाद जाकर कहीं इस भीड़ से सावरकर को शारीरिक क्षति से बचा लिया गया हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि दंगे को लेकर पुलिस ने कभी कोई भी सरकारी रिकॉर्ड उनसे शेयर नहीं किया। कई विश्लेषक मानते हैं कि अगर इस नरसंहार का आँकलन किया जाय तो 1948 का ब्राह्मण नरसंहार 1984 में हुए सिख दंगे से किसी मायने में भी कम नहीं है।

देश में दंगों का सिलसिला बँटवारे के पहले से होता आ रहा है मगर आज़ादी के बाद इसे नियंत्रित कर ख़त्म कर देना जिनके जिम्मे था, उन्होंने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी सिर्फ़ किसी विरासत की तरह आगे बढ़ाया। अफसोस कि ये सत्ता की मलाई भी चापते रहे!