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अयोध्या: अंग्रेज जज ने 356 साल पुरानी गलती नहीं सुधारी, 491 साल पुरानी भूल सुधारने का वक्त आया?

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। 6 अगस्त से शुरू हुई नियमित सुनवाई बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) तक चली। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने बनाने के पूरा घटनाक्रम ;

  • 1528: बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर ​मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • 1528-1731: इमारत पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुस्लिमों के बीच 64 बार संघर्ष हुए।
  • 1822: फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने सरकार को भेजी एक रिपोर्ट में कहा कि राम के जन्मस्थान पर बाबर ने मस्जिद बनवाई।
  • 1852: अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के शासन में पहली बार यहॉं मारपीट की घटना का लिखित जिक्र मिलता है। निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया कि बाबर ने एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी।
  • 1855: हनुमानगढ़ी पर बैरागियों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष हुआ। वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर आर्टम को अयोध्या के हालात पर एक पर्चा भेजा। इसमें 5 दस्तावेज लगाकर यह बताया गया कि इस विवादित इमारत को लेकर यहॉं अक्सर दोनों सम्प्रदायों के बीच तनाव रहता है।
  • 1859: ब्रिटिश हुकूमत ने इस पवित्र स्थान की घेराबंदी कर दी। अंदर का हिस्सा मुस्लिमों को नमाज के लिए और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को पूजा के लिए दिया गया।
  • 1860: डिप्टी कमिश्नर फैजाबाद की कोर्ट में मस्जिद के खातिब मीर रज्जन अली ने एक दरखास्त लगाई कि मस्जिद के परिसर में एक निहंग सिख ने निशान साहिब गाड़कर एक चबूतरा बना दिया है, जिसे हटाया जाए।
  • 1877: मस्जिद के मुअज्जिन मोहम्मद असगर ने डिप्टी कमिश्नर के दफ्तर में फिर से अर्जी देकर शिकायत की कि बैरागी महंत बलदेव दास ने मस्जिद परिसर में एक चरण पादुका रख दी है, जिसकी पूजा हो रही है। उन्होंने पूजा के लिए चूल्हा बनाया है। अदालत ने कुछ हटवाया तो नहीं लेकिन समुदाय विशेष के लिए मस्जिद में जाने का दूसरा रास्ता बनवा दिया।
  • 15 जनवरी 1885: पहली बार इस जमीन पर मंदिर बनवाने की मॉंग अदालत पहुॅंची। महंत रघुबर दास ने पहला केस फाइल किया। उन्होंने राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की इजाजत मॉंगी। संयोग से इसी साल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना भी हुई।
  • 24 फरवरी 1885: फैजाबाद की जिला अदालत ने महंत रघुबर दास की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह जगह मस्जिद के बेहद करीब है। जज हरिकिशन ने अपने फैसले में माना किया चबूतरे पर रघुबर दास का कब्जा है। उन्हें एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग करने को कहा, लेकिन मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी।
  • 17 मार्च 1886: महंत रघुबर दास ने जिला जज फैजाबाद कर्नल एफईए कैमियर की अदालत में अपील दायर की। कैमियर ने अपने फैसले में कहा कि मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है। पर अब देर हो चुकी है। 356 साल पुरानी गलती को सुधारना इतने दिनों बाद उचित नहीं होगी। यथास्थिति बनाए रखें।
  • 20-21 नवंबर 1912: बकरीद के मौके पर अयोध्या में गौहत्या के खिलाफ पहला दंगा हुआ। यहॉं 1906 से ही म्यूनिसिपल कानून के तहत गौहत्या पर पाबंदी थी।
  • मार्च 1934: फैजाबाद के शाहजहॉंपुर में हुई गौहत्या के विरोध में दंगे हुए। नाराज हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद की दीवार और गुंबद को नुकसान पहुॅंचाया। सरकार ने बाद में इसकी मरम्मत करवाई।
  • 1936: इस बात की कमिश्नरी जॉंच की गई कि क्या बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवाई थी।
  • 20 फरवरी 1944: आधिकारिक गजट में एक जॉंच रिपोर्ट प्रकाशित हुई। यह 1945 में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के फैजाबाद की रेवेन्यू कोर्ट में मुकदमे के दौरान सामने आई।
  • 22-23 दिसंबर 1949: भगवान राम की मूर्ति विवादित इमारत के भीतर प्रकट हुई। दोनों पक्षों ने केस दायर किए। सरकार ने इलाके को विवादित घोषित कर इमारत की कुर्की के आदेश दिए। लेकिन, पूजा-अर्चना जारी रही।
  • 29 दिसंबर 1949: फैजाबाद म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन प्रिया दत्त राम को विवादित परिसर का रिसीवर नियुक्त किया गया।
  • 1950: हिंदू महासभा के गोपाल सिंह विशारद और दिगंबर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्रदास ने अदालत में याचिका दायर कर जन्मस्थान पर स्वामित्व का मुकदमा ठोंका। दोनों ने वहॉं पूजा-पाठ की इजाजत मॉंगी। सिविल जज ने भीतरी हिस्से को बंद रखकर पूजा-पाठ की इजाजत देते हुए मूर्तियों को न हटाने के अं​तरिम आदेश दिए।
  • 26 अप्रैल 1955: हाई कोर्ट ने सिविल जज के अंतरिम आदेश पर मुहर लगाई।
  • 1959: निर्मोही अखाड़े ने एक दूसरी याचिका दायर कर विवादित स्थान पर अपना दावा जताया। स्वयं को रामजन्मभूमि का संरक्षक बताया।
  • 1961: सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद में मूर्तियों के रखे जाने के विरोध में याचिका दायर की। दावा किया कि मस्जिद और उसके आसपास की जमीन एक कब्रगाह है, जिस पर उसका दावा है।
  • 29 अगस्त 1964: जन्माष्टमी के मौके पर मुंबई में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना।
  • 7-8 अप्रैल 1984: मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति बनी। महंत अवैद्यनाथ अध्यक्ष बने। रथयात्राएँ निकाली गई। राम मंदिर आंदोलन ने जोर पकड़ा।
  • 1 फरवरी 1986: फैजाबाद की अदालत ने इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया। हिंदुओं को पूजा-पाठ की इजाजत मिली।
  • 3 फरवरी 1986: ताला खोले जाने के खिलाफ हाई कोर्ट में हाशिम अंसारी ने अपील की।
  • 5-6 फरवरी 1986: मुस्लिम नेता सैयद शहाबुद्दीन ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की अपील की। 14 फरवरी को शोक दिवस मनाने की अपील की।
  • 6 फरवरी 1986: लखनउ में मुस्लिम समुदाय की एक सभा हुई। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के गठन का ऐलान। मौलाना मुजफ्फर हुसैन किछौछवी अध्यक्ष और मोहम्मद आजम खान तथा जफरयाब जिलानी संयोजक बने।
  • 23-24 दिसंबर 1986: सैयद शहाबुद्दीन की अध्यक्षता में दिल्ली में बाबरी मस्जिद कोऑर्डिनेशन कमेटी का गठन। 1987 के गणतंत्र दिवस समारोह के बहिष्कार का ऐलान।
  • जून 1989: पालमपुर में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक। मंदिर आंदोलन पहली बार बीजेपी के एजेंडे में। एक प्रस्ताव पास कर राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया गया। कहा गया कि यह आस्था का सवाल है। अदालत फैसला नहीं कर सकती।
  • 1 अप्रैल 1989: विहिप ने धर्मसंसद बुलाई। 30 सितंबर को प्रस्तावित मंदिर के शिलान्यास का ऐलान।
  • 14 अगस्त 1989: हाई कोर्ट का आदेश यथास्थिति बरकरार रखी जाए।
  • अक्टूबर-नवंबर 1989: मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश से साढ़े तीन लाख रामशिलाएॅं अयोध्या पहुॅंची।
  • 9 नवंबर 1989: राम मंदिर का शिलान्यास प्रस्तावित मंदिर के सिंहद्वार पर हुआ।
  • फरवरी 1990: कारसेवा का ऐलान।
  • जून 1990: विहिप की बैठक में 30 अक्टूबर से मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने का ऐलान।
  • 25 सितंबर 1990: सोमनाथ से अयोध्या के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा शुरू।
  • 30 अक्टूबर-2 नवंबर 1990: कारसेवक लाखों की संख्या में अयोध्या पहुॅंचे। मुलायम सिंह की सरकार ने गोली चलवाई। 40 से ज्यादा कारसेवक मारे गए।
  • 7-10 अक्टूबर 1991: कल्याण सिंह की सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन का अधिग्रहण किया।
  • 6 दिसंबर 1992: बाबरी मस्जिद गिरा दी गई।
  • अप्रैल 2002: हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर सुनवाई शुरू की कि विवादित स्थल पर किसका अधिकार है।
  • 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को खुदाई करने के निर्देश दिए।
  • जुलाई 2005: विवादित स्थल पर आतंकी हमला। सुरक्षा बलों ने पॉंच आतंकियों को मार गिराया।
  • जून 2009: लिब्राहन आयोग ने बाबरी विध्वंस पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी।
  • 2010: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया। विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बॉंट दिया।
  • मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगाई। यथास्थिति बनाए रखने को कहा।
  • 21 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामला संवेदनशील है। समाधान कोर्ट के बाहर होना चाहिए। सभी पक्षों से एक राय बनाकर समाधान ढूॅंढ़ने को कहा।
  • 14 मार्च 2018: सुप्रीम कोर्ट ने सभी 32 हस्तक्षेप अर्जियों को खारिज कर दिया। वही पक्षकार बचे जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में शामिल थे।
  • 6 अगस्त 2019: मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में रोजान सुनवाई शुरू।
  • 16 अक्टूबर 2019: 40 दिन दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। 23 दिनों के भीतर फैसला आने की उम्मीद।

साभार: युद्ध में अयोध्या

आतंकी पालना छोड़ दो, वरना एक कौड़ी नहीं मिलेगी: पैसा माँगने पहुँचे थे इमरान, FATF ने भगाया

एक बार फिर पाकिस्तान को अपने किये के लिए मुँह की खानी पड़ी है, अड़ोस-पड़ोस के देशों में आतंकवाद की सप्लाई करने वाला पाकिस्तान आर्थिक तंगी से इस कदर बेहाल है उसने फाईनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) में भी गुहार लगाई थी मगर वहाँ से भी जनाब को खाली हाथ ही लौटना पड़ा है।

FATF एक अंतर-सरकारी निकाय है जो 1989 में आया, इस संगठन ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने से साफ़ इंकार कर दिया है क्योंकि उनके मुताबिक पाकिस्तान मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकी फंडिंग को रोकने पूरी तरह विफल रहा है। इसीलिए इस निकाय ने पाकिस्तान को फ़रवरी 2020 तक ग्रे-लिस्ट में रखने का निश्चय किया है।

दरअसल FATF वह अंतर-सरकारी निकाय है जिसे मनी लॉन्ड्रिंग तथा आतंकी फंडिंग को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था, बता दें कि मंगलवार को पेरिस में हुई बैठक में एफएटीएफ ने ऐसे कई उपायों की समीक्षा की जिनके बल पर पकिस्तान आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम करने का दावा करता है। पेरिस स्थित टास्क फोर्स ने पाकिस्तान से आतंकी फंडिंग को पूरी तरह रोकने के लिया अतिरिक्त उपाय करने के आदेश दिए हैं।

बता दें कि कुछ ही दिन पहले 10 अक्टूबर को जब इमरान खान को इस बात का अंदेशा होने लगा था कि FATF से पैसे माँगने पर पाकिस्तान को बेईज्ज़त होना पड़ सकता है तो आनन-फानन में दुनिया की नज़र में खुदको पाक-साफ दिखाने के लिए इमरान खान की सरकार ने टॉप 4 आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया था जिससे दुनिया के सामने यह ढोंग किया जा सके कि पाकिस्तान में आतंक-विरोधी माहौल है और वे इसका समर्थन बिलकुल नहीं करते।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कितनी ही रफ़्तार से क्यों न गिर जाए मगर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने अपने रुख से यह तो स्पष्ट कर दिया है कि वह अब अपना अगला और अंतिम फैसला फरवरी 2020 में ही लेगा। इससे पहले पाकिस्तान को कड़े शब्दों में चेतवानी देते हुए FATF ने पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए यह निर्देश दिए हैं कि टास्क फ़ोर्स की सारी सिफारिशों को कायदे से लागू किया जाए अन्यथा पाकिस्तान को अपनी इस फटेहाल अर्थव्यवस्था को सुधरने के लिए निकाय से एक कौड़ी की मदद भी नसीब नहीं होगी तब तक के लिए निकाय की ओर से समयावधि में चार महीने की राहत दी गई है। बता दें कि इस मामले की औपचारिक घोषणा सत्र के आखिरी दिन की जाएगी।

‘I luv Burhan Wani’, ‘Mere Jaan Imran Khan’, ‘Zakir Musa come back’ लिखे सेब भेज रहे कश्मीरी

कश्मीर से आप अगर फ़ल, खासकर कि कश्मीर की पहचान माने जाने वाले ‘कश्मीरी सेब’ खरीदने की सोच रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। आपके सेबों पर ‘ज़ाकिर मूसा वापस आओ, ‘मेरी जान इमरान खान’ लिखा हो सकता है।

खबरों के मुताबिक कश्मीर से जो सेब जम्मू की मंडियों में पहुँच रहे हैं, उन पर इस्लामी आतंकी ज़ाकिर मूसा, बुरहान वानी जैसे जिहादियों से लेकर पाकिस्तान और उसके तालिबान-समर्थक प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थन के नारे लिखे हुए मिल रहे हैं। यही नहीं, सेबों पर ‘Go back India-Go back India’ जैसे हिंदुस्तान-विरोधी नारे भी लिखे हुए हैं। बताया जा रहा है कि काले मार्कर से यह संदेश अंग्रेज़ी और उर्दू में लिखे जा रहे हैं।

कश्मीर के बहिष्कार की धमकी

इन संदेशों को पढ़ कर उबले जम्मू के फल व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। वे पाकिस्तान-विरोधी और जिहाद-विरोधी नारे लगाने लगे, और पुलिस और सरकार से यह हरकत करने वालों को ढूँढ़ने और उन पर कड़ी कार्रवाई करने की माँग करने लगे। साथ ही कश्मीर और कश्मीरी सेबों के बहिष्कार की भी धमकी दी। उनका नेतृत्व कठुआ होलसेल मार्केट के अध्यक्ष रोहित गुप्ता कर रहे थे।

कश्मीर पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है, और वह फल विक्रेताओं से भी मिल रही है। डीएसपी माजिद ने लोगों से मिल कर जाँच और कार्रवाई का आश्वासन दिया।

सरकार को ‘करारा जवाब’?

सरकार की उनके ‘दिल जीतने’ की कोशिशों को कश्मीर घाटी के शांतिदूतों का यह ‘करारा जवाब’ है। पिछले ही महीने सरकार ने मुस्लिम-बहुल कश्मीर घाटी के सेब उत्पादकों को सही मूल्य दिलाने के लिए समर्थन-मूल्य आधारित खरीद योजना शुरू की थी- यह राज्य में पहली ऐसी योजना है। इसके पहले राज्य के दूर-दराज के हिस्सों में सेब उत्पादकों को फलों को बेचने के लिए भंडारण और परिवहन से जुड़ी कई समस्याओं से जूझना पड़ता था। 3 कार्य दिवसों (working days) के भीतर खरीद का मूल्य उत्पादकों के खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफ़र प्रणाली के ज़रिए पहुँचाने का भी प्रावधान इस स्कीम में है। यही नहीं, सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लिए 85 ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएँ भी चिह्नित कर रखीं हैं जिनके लिए बजटीय प्रावधान असीमित होंगे।

कश्मीर में हमला कर सकता है इस्लामिक आतंकी संगठन: ख़ुफ़िया एजेंसी की रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 और आर्टिकल 35-ए हटने के बाद से ही कश्मीर की स्थिति नाज़ुक बनी हुई है, सरकार लगातार इस पूरे मामले को लेकर शांति और स्थिरता बनाये रखने के लिए एक ओर सेना, प्रशासन और पुलिस की मदद ले रही है तो वहीं दूसरी ओर घाटी में सीमा पार से आये घुसपैठिये आतंकवादी घटना को अंजाम देने वाले घात लगाए बैठे हैं।

सुरक्षाबलों को ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिली रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू-कश्मीर से सटे राज्य पंजाब में में आतंकवादियों के एक बड़े समूह ने घुसपैठ की है, सुरक्षाबलों को मिले इनपुट में कहा गया कि आतंकवादी रक्षा ठिकानों पर हमले करने के उद्देश्य से योजना बना रहे हैं। बता दें कि इस खबर के मिलने के बाद पठानकोट,श्रीनगर, अवन्तीपुरा रक्षा ठिकानों पर अलर्ट जारी कर दिया गया है।

साल 2016 में पंजाब के पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकवादी हमले के बाद यह खुलासा हुआ था कि घटना में संलिप्त चारों आतंकी जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी संगठन से ताल्लुक रखते थे। दरअसल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही पाकिस्तान से लेकर इस्लामिक आतंकवाद के बड़े-बड़े आका बौखलाए बैठे हैं। कश्मीर पर केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद हुर्रियत और अलगाववाद की राजनीति को हमेशा के लिए कुचल दिया है जिसके बाद से ही तमाम इस्लामिक आतंकवादी संगठन और पाक समर्थित हुर्रियत नेता इस तरह की घटना को अंजाम दे सकते हैं।

रेलवे ने ढूँढ़ा कमाई का नया तरीका, फिल्म प्रमोशन के लिए चलेंगी विशेष ट्रेनें: हाउसफुल 4 से शुरुआत

भारतीय रेलवे पिछले कुछ समय से कमाई के नए-नए तरीके ढूँढ़ने पर गम्भीर दिख रही है। इसी की ताज़ा बानगी मुंबई में तब देखने को मिली जब स्टार अभिनेता अक्षय कुमार समेत हाउसफ़ुल-4 फिल्म के सभी पात्र मुंबई के बोरीवली स्टेशन पर ट्रेन में बैठने जा पहुँचे। दरअसल यह सभी सितारे रेलवे की विशेष ट्रेन ‘प्रमोशन ऑन वील्स’ पर मुंबई से दिल्ली अपनी फिल्म के प्रचार के लिए यात्रा करेंगे।

गोयल की अपील, फ़िल्मकार उठाएँ लाभ

मोदी सरकार में रेलमंत्री और भाजपा नेता पीयूष गोयल ने ट्वीट कर इस प्रयोग के लिए रेलवे प्रशासन को बधाई दी है। साथ ही उन्होंने अन्य फिल्मकारों से भी अधिकाधिक जनता तक पहुँचने के लिए इस प्रचार माध्यम को अपनाने की सलाह दी। हाउसफ़ुल-4 की टीम आज और कल (16-17 अक्टूबर, 2019) इस ट्रेन में यात्रा करेंगे। ट्रेन के बाहरी हिस्से पर फिल्म के पात्रों और अभिनेताओं के चित्र लगे हुए हैं।

तेजस, IRCTC का आईपीओ और अब ये

एक ओर रेलवे का किराया बहुत ज़्यादा बढ़ा देना सरकार की राजनीतिक सेहत के लिए सही नहीं माना जाता, वहीं दूसरी ओर रेलवे का घाटा हमेशा बढ़ता रहा है। ऐसे में मोदी सरकार रेलवे को अधिक से अधिक गैर-किराया राजस्व पाने के लिए प्रोत्साहित करती रही है। इसी कड़ी में तेजस एक्सप्रेस जैसी निजी ट्रेन, IRCTC का आईपीओ और अब ‘प्रमोशन ऑन वील्स’ को देखा जा रहा है।

इसके अलावा IRCTC वेबसाइट का आधुनिकीकरण, ऍप जारी करना, जनरल टिकट भी ऑनलाइन पाने का प्रावधान जैसे कई कदम रेलवे ने मोदी सरकार के समय में उठाए गए हैं।

गुलबर्गा यूनिवर्सिटी से कन्हैया कुमार को ‘आंबेडकर’ ने भगाया, कार्यक्रम रद्द

फरवरी 2016 में जेएनयू कैंपस में देश विरोधी नारा लगाने और उसे जायज़ ठहराने के लिए हर-जगह घूम-घूमकर बोलने की आज़ादी का डंका पीटने वाले कन्हैया कुमार को कर्नाटक की गुलबर्गा यूनिवर्सिटी से तगड़ा झटका लगा है। देश भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का डंका पीटने वाले कन्हैया दरअसल गुलबर्गा यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम करने के सपने देख रहे थे मगर प्रशासन के एक ही निर्णय ने कन्हैया के पूरे ख्वाब पर पानी फेर दिया।

दरअसल जिस यूनिवर्सिटी में कन्हैया कुमार कार्यक्रम करने को उतावले थे और अपनी ओर से बहुत कुछ तैयारियाँ भी कर चुके थे वहाँ प्रशासन ने उन्हें उनकी करतूतों का आइना दिखाते हुए कार्यक्रम करने के लिए अनुमति देने से मना कर दिया है।

गुलबर्गा विश्वविद्यालय में कन्हैया कुमार के कार्यक्रम पर प्रशासन द्वारा अनुमति न देने को लेकर विश्वविद्यालय की वाइस-चांसलर परिमला आंबेडकर ने कहा कि ‘कैम्पस में इस कार्यक्रम के लिए अनुमति न देने में सबसे बड़ी वजह सुरक्षा को लेकर है, उन्होंने बताया कि इस बारे में उनसे सुरक्षा को लेकर उठने वाले सवालों के बारे में भी कहा गया था।’

स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय की सुरक्षा से बड़ा कुछ नहीं हो सकता, यही वजह है की विवादस्पद हरकतों से अपना इतिहास बनाने वाले कन्हैया कुमार को विश्वविद्यालय में किसी तरह का कार्यक्रम करने की परमिशन नहीं दी गई।

बता दें कि इस कार्रवाई को लेकर जब वाइस चांसलर परिमला आंबेडकर से पूछा गया तो उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसमें राज्यपाल की ओर से कोई आदेश नहीं दिया गया है बल्कि यह फैसला विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर किया गया है। वीसी परिमला आंबेडकर ने इस फैसले को अमल में लाए जाने के सन्दर्भ में किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव के होने से साफ़ इनकार करते हुए कहा कि कार्यक्रम रद्द करना विश्वविद्यालय स्तर का अपना फैसला है।

‘मुस्लिम पक्ष साबित नहीं कर पाए बाबर का दावा, उन्हें कबूल करना होगा कि रामलला ही असली मालिक’

दशकों से अटके पड़े अयोध्या विवाद की बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। 40 दिनों की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। 23 दिनों के भीतर फैसला आने की उम्मीद है। पीठ ने संबंधित पक्षों को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ (राहत में बदलाव) के मुद्दे पर लिखित दलील दाखिल करने के लिए 3 दिन का समय दिया है।

सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चन्द्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई की है। हाई कोर्ट ने अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बॉंटने का आदेश दिया था।

सुनवाई के 40वें दिन एक हिन्दू पक्षकार ने दलील दी कि सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकार यह साबित करने में विफल रहे हैं कि अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल पर मुगल बादशाह बाबर ने मस्जिद का निर्माण किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि मुस्लिम पक्ष का यह दावा था कि मस्जिद का निर्माण शासन की जमीन पर हुकूमत (बाबर) द्वारा किया गया था, लेकिन वे इसे सिद्ध नहीं कर पाए हैं।

वैद्यनाथन सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि पर मालिकाना हक के लिए 1961 में दायर मुकदमे का जवाब दे रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष प्रतिकूल कब्जे के सिद्धांत के तहत विवादित भूमि पर मालिकाना हक का दावा कर रहे हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि मूर्तियॉं या मंदिर पहले इसके असली मालिक थे।

वैद्यनाथन ने कहा कि अयोध्या में दूसरे समुदाय के पास नमाज पढ़ने के लिए अनेक स्थान हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुओं के लिए तो भगवान राम का जन्मस्थान एक ही है जिसे बदला नहीं जा सकता। एक अन्य हिंदू पक्षकार गोपाल सिंह विशारद की ओर से वकील रंजीत कुमार ने कहा कि इस जगह श्रद्धालुओं का पूजा-अर्चना करने पहले से ही अधिकार था। मुस्लिमों की आस्था के स्थान पर इस जमीन का स्वरूप नहीं बदला जा सकता है।

6 दिसंबर ‘शौर्य दिवस’ से शुरू हो जाएगा अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण: BJP सांसद ने किया दावा

भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने घोषणा की है कि राम मंदिर का निर्माण जन्मभूमि स्थल पर 6 दिसंबर से शुरू हो जाएगा। उन्नाव के दो बार के सांसद साक्षी महाराज सुप्रीम कोर्ट में जन्मभूमि विवाद की सुनवाई पूरी होने के मौके पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। मालूम हो कि सुनवाई पूरी कर अदालत ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। सीजेआई ने कहा है कि सुनवाई समाप्त होने के बाद अदालत को फ़ैसला लिखने के लिए कुछ समय चाहिए होगा।

6 दिसंबर है बाबरी दिवस

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है (फैसला सीजेआई रंजन गोगोई के 18 नवम्बर को रिटायर होने के एक-दो दिन पहले आने की उम्मीद है) लेकिन साक्षी महाराज की घोषणा से यह साफ़ है कि हिंदूवादी धड़ा मामले में अपनी जीत तय मानकर चल रहा है। इसीलिए साक्षी महाराज ने मंदिर निर्माण प्रारंभ करने की तारीख के तौर पर 6 दिसंबर की घोषणा की है। 1992 में इसी दिन जन्मभूमि पर खड़ी बाबरी मस्जिद को वहाँ जुटी कारसेवकों की भीड़ ने ढहा दिया था। जहाँ भाजपा-संघ परिवार-हिंदूवादी इसे ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं, वहीं लिबरल लॉबी और समुदाय विशेष वाले इसे ‘काला दिवस’ कहते हैं।

जलेंगे 5.5 लाख दीपक फ़ैसले के पहले ही

राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट 23 दिनों के भीतर अपना फ़ैसला सुना देगा। सीजेआई रंजन गोगोई 18 नवम्बर को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह रिटायरमेंट से पहले इस बहुप्रतीक्षित फ़ैसले की सुनवाई पूरी कर देंगे और फ़ैसला सुना देंगे। अयोध्या में भी हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है और यूपी में पुलिस एवं प्रशासन के सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं। अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की तैयारी में लगी योगी आदित्यनाथ सरकार दीपोत्सव के दौरान 5.5 लाख दीपक जलाने की तैयारी में है, जो गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल होगा।

अधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द, चाक-चौबंद तैयारी

अयोध्या में भव्य दीपोत्सव की तैयारी में जुटी योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी अधिकारियों की छुट्टियाँ 30 नवंबर तक रद्द कर दी है। पुलिस को किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश देते हुए उन्हें चौकन्ना रहने को कहा गया है। सरकार ने कहा है कि केवल किसी ‘अत्यधिक अपरिहार्य’ की ही स्थिति में अधिकारियों को छुट्टी दी जाएगी।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद केसी मूर्ति ने उप राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफा, BJP में शामिल होने के कयास

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस से राज्यसभा सांसद केसी राममूर्ति ने बुधवार (अक्टूबर 16, 2019) को उपराष्ट्रपति सचिवालय में अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया। उनका इस्तीफा उप राष्ट्रपति एवं राज्यसभा अध्यक्ष वैंकया नायडू ने स्वीकार कर लिया।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस सांसद ने अपनी सदस्यता से ये इस्तीफा उस समय दिया है, जब कयास लगाए जा रहे थे कि वो भाजपा में शामिल होने वाले हैं। कहा जा रहा है कि लंबे समय से कॉन्ग्रेस बैठकों और आयोजनों से नदारद चल रहे थे। इस बीच अपना इस्तीफा देने से पहले वो भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से भी मिल रहे थे। बता दें के सी राममूर्ति से पहले कॉन्ग्रेस नेता भुवनेश्वर कालिता और संजय सिंह भी उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं।

के सी राममूर्ति के बारे में बता दें कि वे कर्नाटक में और उसके आस-पास के कई शैक्षणिक संस्थानों के मालिक हैं। उन्हें साल 2016 में राज्य इकाई के विरोध के बावजूद भी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव ने दिग्विजय सिंह राज्यसभा का सदस्य बनाया था। लेकिन अब वह इस सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं। इसके अलावा के सी राममूर्ति पूर्व आईपीएस ऑफिसर हैं। उन्हें इस साल सितंबर में कर्मियों, सार्वजनिक शिकायतों, कानून और न्याय पर संसदीय समिति का सदस्य नियुक्त किया गया था।

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, नाम न बताने की शर्त पर भाजपा कर्नाटक के नेताओं ने बताया है कि इसकी कम संभावना है कि पार्टी अभी से राममूर्ति को उच्च सदन का सदस्य बनाए।

‘अंग्रेज तो इसे राम का जन्मस्थान मान चुके थे, रिकॉर्ड में घपला कर जोड़ा बाबरी मस्जिद’

इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya (2017) लिखीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की सदस्या डॉ. जैन ने ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती से बातचीत में इस विवाद को लेकर कई ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। साक्षात्कार का अंश;

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) पर मुस्लिम पक्ष के वकीलों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उठाए गए सवालों को जैन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने साफ़ किया कि कमल का फ़ूल, वराहमूर्ति, संस्कृत में दीवारों पर शिलालेख आदि से साफ़ तौर पर उस स्थल के हिन्दू होने को प्रमाणित करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि न तो ASI के खुदाई और सर्वेक्षण कार्य में कोई कमी थी, न ही उनकी रिपोर्ट में। खुदाई इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशानुसार हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की गई थी। खुदाई में मिली एक-एक चीज़ का हिसाब उसी दिन रजिस्टर में लिखा गया, और उस दिन के अंत में दोनों पार्टियों ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।

जैन के मुताबिक खुदाई में मिले साक्ष्यों से यह साफ़ है कि न केवल मस्जिद मंदिर तोड़कर बनी, बल्कि यह स्थल मस्जिद के सैकड़ों, हज़ारों साल पहले से धार्मिक स्थल यानी मंदिर रहा है। उस स्थान पर लगातार किसी-न-किसी मंदिर के उपस्थित होने के सबूत ASI की खुदाई ने दिए हैं।

उन्होंने बताया कि वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की इस विवाद को बढ़ने में अहम भूमिका रही। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उस समय कार्यरत हबीब ने खटराग अलापना शुरू किया कि यह शिलालेख एक ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, जिसे बाबरी ध्वंस के समय गुपचुप वहाँ ‘तस्करी कर’ लाया गया और मलबे के बीच रख दिया गया। मीनाक्षी जैन बतातीं हैं कि जब हबीब से सवाल पूछा गया कि वह शिलालेख आखिर किस व्यक्ति के ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, तो उन्होंने रंग बदल कर इसे ‘त्रेता के ठाकुर’ नामक अयोध्या में ही स्थित एक दूसरे मंदिर से मिला शिलालेख बता दिया। (‘त्रेता के ठाकुर’ मंदिर हालाँकि अयोध्या में ही स्थित है,लेकिन उसका जन्मभूमि से कोई सरोकार नहीं है। यह औरंगज़ेब द्वारा तोड़ा गया एक दूसरा मंदिर है/) उनके मुताबिक लखनऊ संग्रहालय से ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख को जन्मभूमि स्थल पर लाया गया और मलबे में ‘विष्णु हरि’ शिलालेख के नाम से ‘प्लांट’ कर दिया गया।

लेकिन उनका यह प्रोपेगंडा भी उनके दुर्भाग्य और हिन्दुओं के अच्छे कर्मों से तब ध्वस्त हो गया, जब किशोर कुणाल नामक एक संस्कृत विद्वान और रिटायर्ड आईपीएस ने लखनऊ के संग्रहालय में से वह शिलालेख खोज निकाला और उसकी तस्वीर प्रकाशित कर दी। ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख बेहद टूटा-फूटा और क्षतिग्रस्त है, जिसमें से बमुश्किल 2-3 शब्द पढ़े जा सकते हैं। वहीं ‘विष्णु हरि’ शिलालेख न केवल स्पष्ट और ठीक-ठाक हालत में है, बल्कि उसका अधिकाँश भाग पूरी तरह सुरक्षित और पठनीय भी है।

मीनाक्षी जैन कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी करतीं हैं। वह बतातीं हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद बने ब्रिटिश राजस्व रिकॉर्डों में विवादित स्थल को केवल ‘जन्मभूमि’ के नाम से दर्ज किया गया था, जो बाद में (अदालत में रिकॉर्ड मँगाए जाने पर?) बदला गया। जहाँ-जहाँ पुराने रिकॉर्ड में केवल जन्मभूमि का उल्लेख था, वहाँ “*” लगाकर ऊपर की ओर “और बाबरी मस्जिद” लिखा गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि दूसरे मजहब का भी उस भूभाग पर दावा उतना ही पुराना रहा है, जितने समय पहले से हिंदू इसे मंदिर स्थल बताते हैं। उन्होंने बताया कि न केवल वामपंथी इतिहासकारों ने ही मुस्लिमों को झूठा “तुम ये मुकदमा जीत सकते हो” का दिलासा देकर सुलझते-सुलझते मामले को दोबारा उलझा दिया, बल्कि उन्होंने अदालत को भी अपनी ‘राय’ को तथ्य बताकर बरगलाने की कोशिश की। हाई कोर्ट के पास समय की कमी नहीं थी, क्योंकि उस समय मामला ‘गर्म’ नहीं था- इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें आराम से सुनकर ख़ारिज कर दिया और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने समय की कमी के चलते उन्हें दो टूक किनारे कर दिया।

इसके अलावा डॉ. जैन ने 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” माने जाने वाले रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा के प्रपंच की भी पोल-पट्टी खोली। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में डॉ. जैन ने यह भी बताया कि वह अयोध्या की ही तरह मथुरा और काशी पर भी वह अध्ययन कर रहीं हैं। इन मामलों पर भी वे किताब लिखेंगी। इसके अलावा एक दूसरे सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हालाँकि तथाकथित ‘दक्षिणपंथ’ ने राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, लेकिन भाजपा की सरकार में भी अकादमिक जगत जस-का-तस है। आज भी बौद्धिक वर्ग पर कब्ज़ा वामपंथियों का है, और दक्षिणपंथी या हिंदूवादी होना तो दूर, उनसे भिन्न, गैर-वामपंथी मत वाला तक होना आज भी अकादमिक जगत में मुश्किल है।