Home Blog Page 550

भारत ने घर में घुसकर बांग्लादेश को सुनाया, कहा- हिंदुओं और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करो: शेख हसीना के तख्तापलट के बाद पहली बार ढाका पहुँचे विदेश सचिव

बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद जारी हिंदुओं के नरसंहार के बाद भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने सोमवार (9 दिसंबर 2024) को ढाका में अपने बांग्लादेशी समकक्ष मोहम्मद तौहीद हुसैन से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों एवं उनके धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा। साथ ही हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर भी चर्चा की।

दरअसल, शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने के बाद 8 अगस्त को बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली उच्चस्तरीय बातचीत है। यह बैठक बांग्लादेश की राजधानी ढाका के राजकीय अतिथि गृह जमुना में संपन्न हुई।

विदेश सचिव ने हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को लेकर बांग्लादेश के विदेश सचिव के समक्ष आपत्ति उठाई। दरअसल, दास को एक रैली के दौरान बांग्लादेशी राष्ट्रीय ध्वज का कथित रूप से अपमान करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया है। उनकी गिरफ्तारी के कारण उनके समर्थकों में आक्रोश फैल गया और सुरक्षाबलों के साथ हिंसक झड़पें हुईं।

विदेश सचिव मिस्री ने कहा, “मैंने महसूस किया कि भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ सकारात्मक, रचनात्मक और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध चाहता है, जैसा कि हमने अतीत में हमेशा देखा है और भविष्य में भी देखते रहेंगे। यह संबंध जन-केंद्रित और जन-उन्मुख संबंधों पर आधारित हैं, जिसका केंद्रीय लक्ष्य सभी लोगों का लाभ है।”

उन्होंने कहा कि दोनों के बीच के रिश्ते बांग्लादेश में जारी परियोजनाओं में दिखते हैं। उन्होंने कहा, “यह व्यापार, वाणिज्य, संपर्क, बिजली, पानी, ऊर्जा, विकास सहयोग और सांस्कृतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर हमारे पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंधों में भी परिलक्षित होता है।” उन्होंने कहा कि ऐसा कोई कारण नहीं है कि पारस्परिक लाभकारी सहयोग दोनों देशों के लोगों के बीच जारी ना रहे।

विदेश सचिव ने कहा कि उन्होंने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा, “हमने हाल के घटनाक्रमों पर भी चर्चा की और मैंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और कल्याण सहित अपनी सभी चिंताओं से अवगत कराया। हमने सांस्कृतिक और धार्मिक संपत्तियों पर हमलों की खेदजनक घटनाओं पर भी चर्चा की।”

आज कनाडा को 51वाँ स्टेट बनने का ‘ऑफर’ दे रहे डोनाल्ड ट्रंप, कभी कब्जा करने को तैयार था अमेरिका: जानिए क्या था ‘वॉर प्लान रेड’, क्यों नहीं हुआ पूरा

डोनाल्ड ट्रंप का नाम जब भी सुर्खियों में आता है, वह अपने विवादित बयानों और अनोखे अंदाज के लिए चर्चा का विषय बनते हैं। हाल ही में ट्रंप ने ऐसा ही एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने कनाडा को अमेरिका का 51वाँ राज्य बनने की पेशकश कर डाली। इसके साथ ही उन्होंने एक एआई-जनरेटेड तस्वीर भी पोस्ट की, जिसने लोगों को और ज्यादा चौंका दिया। लेकिन इस मजाक के पीछे एक ऐतिहासिक सच छिपा है-अमेरिका और कनाडा के बीच एक समय ऐसा भी था जब दोनों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाई की तैयारी कर चुके थे।

ट्रंप का बयान: मजाक या इशारा?

दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको को सालाना अरबों डॉलर की सब्सिडी दे रहा है, तो बेहतर है कि ये दोनों देश अमेरिका का हिस्सा बन जाएँ। उनके शब्द थे, “हम कनाडा को हर साल $100 बिलियन और मेक्सिको को $300 बिलियन सब्सिडी देते हैं। क्यों न ये हमारे राज्य बन जाएँ?”

ट्रंप का यह बयान जहाँ मजाकिया लगा, वहीं इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट कर इसे और बड़ा बना दिया। तस्वीर में वह एक पहाड़ की चोटी पर खड़े थे, हाथ में कनाडा का झंडा था। लेकिन मजेदार बात यह थी कि पहाड़ स्विस आल्प्स के लग रहे थे, न कि कनाडा के। तस्वीर के साथ ट्रंप ने लिखा, “ओह, कनाडा!”

कनाडा को 51वाँ राज्य बनाने की ‘जोक डिप्लोमेसी’

ट्रंप ने यह बयान उस वक्त दिया जब उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के साथ मार-ए-लागो में डिनर किया। दोनों में टैरिफ विवाद भी चल रहा है। इसी डिनर के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने मजाक करते हुए ट्रूडो से कहा, “अगर कनाडा ट्रेड टैरिफ से बचना चाहता है, तो उसे अमेरिका का हिस्सा बन जाना चाहिए।” इस पर ट्रूडो और वहाँ मौजूद अन्य लोगों ने हंसने की कोशिश की, लेकिन यह हंसी थोड़ी ‘नर्वस’ थी। ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने मजाक में कहा कि अगर कनाडा अमेरिका का हिस्सा बनता है, तो इसे दो राज्यों में बाँटा जा सकता है-एक ‘लिबरल’ और एक ‘कंजरवेटिव’।

अमेरिका का ‘रेड प्लान’: कनाडा पर हमले की थी तैयारी

हालाँकि ट्रंप का यह बयान मजाक था, लेकिन इतिहास में एक ऐसा समय भी था जब अमेरिका और कनाडा ने एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाई की प्लानिंग कर ली थी। केविन लिपर्ट ने अपनी किताब ‘वार प्लान रेड-द यूनाइटेड स्टेट्स’s सीक्रेट प्लान तो इनवेड कनाडा एंड कनाडा’s सीक्रेट प्लान टू इनवेट द यूनाईटेड स्टेट्स’ में इस बारे में विस्तार से बताया है।

इस किताब में बताया गया है कि साल 1930 में अमेरिका ने ‘रेड प्लान’ नाम से एक खुफिया दस्तावेज तैयार किया, जिसमें कनाडा पर हमले का पूरा खाका बनाया गया था। इस योजना के तहत अमेरिकी सैनिकों को तीन तरफ से हमला कर कनाडा पर कब्जा करना था।

कनाडा के प्रमुख शहरों पर कब्जा: योजना में टोरंटो, मॉन्ट्रियल, वैंकूवर और हलिफ़ैक्स जैसे शहरों को निशाना बनाया गया था।

आर्थिक दबाव: कनाडा के पावर ग्रिड और व्यापारिक मार्गों को बाधित करने का सुझाव दिया गया था।

रसायनिक हथियारों का इस्तेमाल: अमेरिका ने युद्ध में केमिकल वेपन का भी विकल्प रखा था।

जासूसी का जाल: अमेरिका ने कनाडा के कमजोर क्षेत्रों की जानकारी जुटाने के लिए सीक्रेट मिशन भी चलाए।

कनाडा की ‘डिफेंस स्कीम नंबर 1’

अमेरिका की इस योजना का जवाब कनाडा ने भी तैयार किया। कनाडा ने ‘डिफेंस स्कीम नंबर 1’ नामक योजना बनाई, जिसमें अमेरिका पर पांच अलग-अलग मार्गों से हमला कर न्यूयॉर्क और वर्मोंट जैसे शहरों को कब्जे में लेने की योजना थी।

कनाडाई सेना के अधिकारियों ने यह मान लिया था कि अगर अमेरिका हमला करेगा, तो ब्रिटेन से मदद मिलने में समय लगेगा। इसलिए उन्होंने खुद ही अमेरिका को जवाब देने की तैयारी शुरू कर दी।

हालाँकि, दोनों देशों के बीच यह युद्ध कभी नहीं हुआ। 1935 में ‘रेड प्लान’ का खुलासा हो गया, जिससे इसे रोक दिया गया। साथ ही, दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक निर्भरता इतनी ज्यादा थी कि युद्ध अव्यवहारिक हो गया।

कनाडा ने जलाया था व्हाइट हाउस

यहाँ यह बताना जरूरी है कि अमेरिका-कनाडा के बीच दुश्मनी का इतिहास नया नहीं है। 1812 के युद्ध के दौरान, जब कनाडा ब्रिटिश उपनिवेश था, कनाडाई सैनिकों ने वॉशिंगटन डीसी पर हमला कर व्हाइट हाउस को आग लगा दी थी। यह घटना अमेरिका-कनाडा संबंधों में सबसे कड़वी घटनाओं में से एक थी।

आज, अमेरिका और कनाडा के रिश्ते मजबूत हैं। दोनों देश व्यापारिक साझेदार हैं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप का बयान और उनकी एआई-जनरेटेड तस्वीर भले ही मजाक के तौर पर देखी जाए, लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगालने पर यह साफ होता है कि अमेरिका-कनाडा के रिश्ते हमेशा इतने सरल नहीं थे।

निकाह का कार्ड और नाम नौशाद अहमद ‘दुबे’… UP के एक गाँव में अलग तरीके से ‘घर वापसी’ कर रहे मुस्लिम: कहा- शेख-पठान-सैय्यद हमारे नहीं विदेशियों के टाइटल

भारत के मुस्लिम अब पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक नजर आ रहे हैं और वे अपनी जड़ें अरब-तुर्की या अफगानिस्तान-ईरान में खोजने के बजाय भारत में खोज रहे हैं और इस पर गर्व भी कर रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के कुंदरकी उपचुनाव में इसकी झलक भी मिली। यहाँ के हिंदू और भारतीय जड़ों वाले लोगों ने भाजपा के ठाकुर रामवीर सिंह को मत देकर चुनाव जीताया, जबकि इस पर अब तक प्रभावी रहे तुर्क मुस्लिमों को हरा दिया।

ये भारत में बदले माहौल का उदाहरण भर है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, इस देश में जहाँ हिंदू से मुस्लिम बने लोग अपनी जड़ों से आज भी जुड़े हुए हैं। पहले क्षत्रिय समाज के मुस्लिम लोग खुलकर अपने नाम में राणा, चौहान, तोमर आदि लगाते रहे हैं। अब ब्राह्मण समाज के धर्मांतरित मुस्लिम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वे भी अपने पूर्वजों के उपनाम और गोत्र को अपने नाम में जोड़ रहे हैं। इसका उदाहरण यूपी का डेहरी गाँव है।

जौनपुर शहर से करीब 30 से 35 किलोमीटर की दूरी पर केराकत तहसील में एक छोटा सा गाँव है डेहरी। डेहरी गाँव के लोग अपने नाम में मिश्रा, दुबे, शुक्ला जैसे अपने पुरखों के उपनाम जोड़ रहे हैं। यहाँ के रहने वाले 60 साल के नौशाद अहमद ने अपने घर की शादी के कार्ड पर नौशाद अहमद दुबे लिखा तो लोग चौंक गए। इसके बाद यह गाँव सुर्खियों में आ गया। मीडिया उन तक पहुँच गई।

नौशाद अहमद का कहना है कि उनके पूर्वज हिंदू थे, इसलिए अब वे अपने नाम के साथ अपने पूर्वजों के उपनाम और गोत्र लिख रहे हैं। नौशाद अहमद दुबे ने बताया कि लगभग सात पीढ़ी पहले उनके पूर्वजों में से एक लाल बहादुर दुबे मुस्लिम बन गए थे। वो अपना नाम लाल मोहम्मद शेख लिखने लगे थे। उनका कहना है कि उनके पूर्वज आजमगढ़ के रानी की सराय से आए थे।

नौशाद दुबे ने यह भी बताया कि आजमगढ़ के मार्टिनगंज तहसील में एक गाँव है बीसवाँ। वहाँ के रहने वाले सुभाष मिश्रा के करीब 14 पीढ़ी पहले मिश्रा से शेख हो गए थे। वहाँ के मिश्रा और शेख को लोग जानते हैं कि वे पहले हिंदू ब्राह्मण थे। नौशाद दुबे भी खुद को गर्व से मुस्लिम ब्राह्मण कहते हैं। वहीं, इसी गाँव के अशरफ अपने नाम में दुबे और शिराज अपने नाम में शुक्ला लगाते हैं।

डेहरी के ही रहने वाले इसरार अहमद दुबे का कहना है कि वे सभी लोगों से अपील करेंगे कि वे अपनी जड़ों से जुड़े। इसरार दुबे ने कहा, “शेख, पठान, सैय्यद… ये सब हमारा टाइटल नहीं है। विदेशों से आए शासकों ने ये टाइटल दिया है। इसलिए अपने टाइटिल को खोजकर अपने जड़ों से जुड़ें। इससे हमारा देश मजबूत होगा और हम आपस में सौहार्द्रपूर्वक रह सकेंगे।”

नौशाद अहमद दुबे की घर में निकाह का कार्ड (साभार: आजतक)

नौशाद दुबे ने आजतक को बताया कि लोग उनसे पूछते हैं कि वे अपने नाम में दुबे क्यों लगाते हैं। इस पर नौशाद कहते हैं, “अपने नाम में दुबे नहीं लिखें तो क्या लिखें… लोगों के पास इस बात का जवाब नहीं होता… अरबी का टाइटल शेख है, तुर्कों का टाइटल मिर्जा है, मंगोल या मुगलों का टाइटल खान है। ऐसे में हम उनका टाइटल क्यों अपनाएँ? मेरे पास अपना टाइटल है और मैं उसे अपनाऊँगा।”

गौसेवा करने वाले नौशाद कहते हैं कि वे अपनी जड़ों से अपनी चीजें ले रहे हैं और उधार की चीजें छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म को मानने वालों के अंदर मानवता होनी चाहिए। नौशाद का मानना है कि तिलक लगाने से उन्हें कोई एतराज नहीं है। पूजा में उनकी आस्था एक ईश्वर की आस्था है। नौशाद का कहना है कि उनके खिलाफ बार फतवे भी जारी हुए। हालाँकि, उन्होंने उसकी परवाह नहीं की।

नौशाद दुबे आगे कहते हैं, “पैगंबर साहब का नाम गलत तरीके से लेने पर लोग ‘सर तन से जुदा’ की बात करते हैं। उन्हीं मोहम्मद साहब को उनके अनुयायियों के सामने गाली दी जाती थी और कीचड़ फेंका जाता था, लेकिन वो गुस्सा नहीं करते थे।” वो कहते हैं, “अपने आपको मैं मुस्लिम ब्राह्मण कहलाने में खुशी महसूस करता हूँ। मुझे नौशाद अहमद नहीं, नौशाद दुबे ही कहा जाए।”

नौशाद दुबे के यहाँ 10 नवंबर को निकाह था। उन्होंने निकाह का कार्ड हिंदी में छपवाया था और उस पर नाम लिखा था नौशाद अहमद दुबे। उनका कहना है, “मुसलमान कार्ड या तो अंग्रेजी में छपवाते हैं या उर्दू में, चाहे उर्दू कोई पढ़ ना पाए। उन्होंने पूछा कि हिंदी से इतनी नफरत क्यों? हम भारतीय हैं और हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा है।” वे बांग्लादेश में हिंदुओं के नरसंहार के भी गलत मानते हैं।

मुस्लिमों में अपनी जड़ों की ओर लौटने को लेकर नौशाद अहमद दुबे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, जौनपुर और मऊ मिलाकर लगभग 100 से अधिक ऐसे लोग हो हैं, जिन्होंने अपनी जड़ें खोजीं। ये बताते हैं कि उनके पूर्वज दुबे, तिवारी, पांडे, शुक्ला या यादव हैं। नौशाद दुबे की तरह ना जाने कितने और लोग होंगे, जो अपनी जड़ें तलाश रहे होंगे और वे संभवत: आगे चलकर इससे जुड़ जाएँगे।

नाम- अली इंटरनेशनल सर्विसेज, काम- विदेशों में नौकरी के नाम पर भारतीयों से साइबर फ्रॉड करवाना: दिल्ली पुलिस ने कामरान हैदर को दबोचा, 2500 किमी तक करना पड़ा पीछा

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने शनिवार (7 दिसंबर 2024) को मानव तस्करी केस में लम्बे समय से वांछित अपराधी कामरान हैदर को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। कामरान हैदर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) का वांटेड मुल्जिम था जिसे 2500 किलोमीटर तक पीछा करके हैदराबाद से पकड़ा गया। उस पर आरोप है कि वह लोगों से फ्रॉड करके उन्हें फर्जी कॉल सेंटरों में काम करने भेजता था और पुलिस से बचने के लिए लंबे समय से अपनी लोकेशन बदल रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कामरान हैदर दिल्ली में ‘अली इंटरनेशनल सर्विसेज’ नाम से एक कंसल्टेंसी फर्म चलाता था। इस काम में उसके साथ मंजूर आलम, अखिल और अफ़ज़ल भी जुड़े थे। ये सभी मिल कर लोगों को विदेश में नौकरी लगवाने का लालच देते थे। हालाँकि इन सभी का असल काम मानव तस्करी हुआ करता था। ये गिरोह नौकरी के जरूरतमंद भारतीयों को लाओस और थाईलैंड जैसे देशों में भेजा करता था।

दिल्ली के रहने वाले नरेश लखावत भी इसी नेटवर्क के झाँसे में आ गए। इन्हें अली इंटरनेशनल की तरफ से लाओस और थाईलैंड में काम करने का ऑफर मिला। नरेश इस झाँसे में आकर थाईलैंड पहुँच गए। यहाँ उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया। बाद में उन्हें साइबर फ्रॉड करने वाली चीन की एक कम्पनी में जबरन काम करवाया गया। भारत लौट कर नरेश ने जून 2024 में पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई।

मानव तस्करी से रैकेट जुड़ा होने के कारण यह केस राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया गया। NIA की जाँच में पता चला कि कामरान की कम्पनी ने मानव तस्करी के शिकार लोगों को उन कॉल सेंटरों में भेजा जहाँ अमेरिकी और यूरोपीय नागरिकों से ऑनलाइन ठगी की जाती थी। वह क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट के जरिए अवैध तौर पर पैसे भी निकाल चुका था। NIA ने यह भी पाया कि कामरान हैदर की कम्पनी का आपराधिक नेटवर्क दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में खासतौर से फैला था।

आगे की जाँच में NIA ने यह भी पाया कि अली इंटरनेशनल द्वारा पीड़ितों से अमानवीय ढंग से काम करवाया गया था। अपने खिलाफ जाँच शुरू होते ही कामरान हैदर फरार हो गया। NIA के साथ दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भी उसकी खोजबीन शुरू कर दी। गिरफ्तारी से बचने के लिए कामरान लगातार ठिकाने बदल रहा था। आखिरकार NIA ने कामरान पर 2 लाख रुपयों का इनाम रखा। शनिवार को उसकी लोकेशन हैदराबाद के नामपल्ली रेलवे स्टेशन के पास मिली।

दिल्ली पुलिस ने 2500 किलोमीटर दूरी का फासला तय करके कामरान को दबोच लिया। कामरान को आगे की पूछताछ के लिए दिल्ली लाया गया है। यहाँ पुलिस के साथ NIA की टीमें भी उससे पूछताछ कर रही हैं। पूछताछ में पता चला कि कामरान थाईलैंड और लाओस भागने की फिराक में था। जाँच में अभी कुछ और पीड़ितों के नाम सामने आ सकते हैं। कामरान के गिरोह से जुड़े अन्य लोगों की भी पड़ताल जारी है।

बताते चलें कि नवंबर 2024 में ऑपइंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे झाँसा दे कर थाईलैंड ले जाए गए भारतीयों को नर्क से भी बदतर जीवन बिताना पड़ता था। इन्हें खाने में सुअर का माँस और पीने के लिए टॉयलेट का पानी तक शामिल होता है। इन सभी को लाखों में सैलरी और आईटी से जुड़ा हल्का-फुल्का काम जैसे सपने दिखा कर ले जाया गया था। पीड़ितों ने अपने दर्दनाक अनुभवों में उलटा लटकाने और बिजली के झटके देने जैसी प्रताड़ना का हवाला दिया है।

CAA उस हिंदू की बनी ढाल जिसे ममता सरकार ने रिटायर होने से 2 महीने पहले नौकरी से निकाला, सुप्रीम कोर्ट ने माना भारत का नागरिक: पाकिस्तानी फौज के अत्याचार से बचकर भागे थे

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे हिन्दू व्यक्ति को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के प्रावधानों का फायदा दिया है, जिसकी पश्चिम बंगाल सरकार ने नौकरी छीन ली थी। पीड़ित शख्स वर्ष 1969 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से अपने पिता के साथ भाग कर भारत आया था। उसकी नौकरी रिटायरमेंट से 2 महीने पहले छीनी गई थी। पश्चिम बंगाल सरकार का कहना था कि उस शख्स की भारतीय नागरिकता पर गहरा शक है। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की सरकार को आदेश दिया है कि उसकी नौकरी से जो भी फायदे उसे मिलने थे, उसे तुरंत दिए जाएँ।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उस व्यक्ति की नौकरी बिना कारण बताए छीनने का पश्चिम बंगाल सरकार को कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपनाई गई प्रक्रिया पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि पीड़ित व्यक्ति को बिना कोई मौका दिए ही मात्र एक पुलिसिया रिपोर्ट के आधार पर उसकी नौकरी छीन ली गई, जो कि कानूनन ठीक नहीं हैं। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जेके माहेश्वरी की बेंच ने दिया है।

क्या था मामला?

यह पूरा मामला हरिनंद दत्ता की तरफ से दायर किया गया था। दत्ता ने बताया कि 1969 में वह अपने पिता के साथ पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आए थे। उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान में फ़ौज बंगालियों और विशेषकर हिन्दुओं पर अत्याचार कर रही थी। दत्ता ने बताया कि भारत आने पर उनके पिता को एक प्रवासी प्रमाण पत्र मिला था, जिसमें उनका भी नाम था। इसके बाद उनका वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड और बाकी कागज भी बने।

इसके बाद उन्होंने कलकत्ता में अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और 1985 में उन्हें स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई। वह यह नौकरी लगातार करते रहे। उनको इस नौकरी के साथ ही वेतन भत्ते और बाकी सुविधाएँ भी मिलती रहीं। हालाँकि, 2010 में उनके रिटायरमेंट से मात्र 2 महीने पहले ही उनके विभाग को भेजी गई एक पुलिसिया रिपोर्ट के आधार पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। पुलिस की रिपोर्ट में उन्हें नौकरी के लिए ‘अनुपयुक्त’ करार दिया गया था। यह पुलिस रिपोर्ट उनकी नागरिकता सम्बन्धी जाँच के बाद दी गई थी।

हरिनंद दत्ता को ना ही यह पुलिस रिपोर्ट दी गई और ना ही उन्हें उनके अपने स्वास्थ्य विभाग ने अपनी सफाई पेश करने का मौक़ा दिया। इस फैसले के खिलाफ वह सेवा ट्रिब्यूनल चले गए जहाँ उन्हें राहत मिली लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए उनको नौकरी से निकाले जाने को सही ठहराया। वह इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए जहाँ उन्होंने अपने नागरिकता संबधी कागज रखे और विभाग का फैसला पलटने की माँग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया उनके दादा भी भारत के ही निवासी थे, ऐसे में वह भारत के नागरिक हुए।

पश्चिम बंगाल की सरकार क्या बोली?

सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की सरकार ने कहा कि भले ही हरिनंद दत्ता ने पैन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड और बाकी कागज रखे हैं लेकिन इससे उनकी नागरिकता प्रमाणित नहीं होती। पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि उनका पुलिस सत्यापन करने में 25 वर्ष की देरी उनकी नौकरी ना खत्म करने का आधार नहीं मानी जा सकती। पश्चिम बंगाल सरकार ने यह सब कारण देते हुए कहा कि उनकी नौकरी का पुलिस की रिपोर्ट के बाद खत्म किया जाना सही था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता हरिनंद दत्ता की दलीलों को सही पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दत्ता के दादाजी भी भारत के नागरिक थे। ऐसे में उसके पिता भी नागरिक माने जाएँगे। इसके अलावा वह भारत में नागरिकता के लिए आवेदन करने से पहले 7 वर्ष तक रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा 2020 से लागू हुआ CAA कानून भी उनका पक्ष लेता है और वह अवैध प्रवासी नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि दत्ता ने आवेदन दे दिया था लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं हुआ, ऐसे में पूरा मामला दत्ता के पक्ष में है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी प्रश्न उठाए कि आखिर उनको भेजी गई नोटिस में कोई कारण क्यों नहीं बताया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया जिससे पता नहीं चलता कि आखिर किस आधार पर उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला लिया गया। कोर्ट ने कहा कि हरिनंद दत्ता को नौकरी से निकालने का आदेश अवैध, कानून के खिलाफ और न्याय के खिलाफ है, ऐसे में इसे लागू नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार उन्हें नियमानुसार अब पेंशन समेत बाकी फायदे दे।

वक्फ बिल का विरोध कर रहा ईसाई सांसदों का समूह, केरल में बिल पास होने के लिए चर्चों में हो रही प्रार्थना: पीड़ित बोले- हमने रेत भरकर रहने लायक बनाया, वे कर रहे दावा

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित वक्फ संशोधन बिल के विरोध में मुस्लिमों का साथ ईसाई संगठनों ने दिया है। वहीं, केरल में ईसाई और हिंदुओं की आबादी वाली 404 एकड़ पर वक्फ बोर्ड द्वारा दावा करने के बाद लोग इस संशोधन बिल के संसद में पास होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं। इस तरह की प्रार्थना सिर्फ केरल ही नहीं, बल्कि कर्नाटक एवं तमिलनाडु सहित कई राज्यों के हजारों परिवार कर रहे हैं, क्योंकि उनकी जमीनों पर वक्फ के दावों से उनके सामने जीवन का संकट उत्पन्न हो गया है।

दरअसल, ईसाई सांसदों के एक वर्ग ने भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) से वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े होने के लिए कहा है। विपक्षी ईसाई सांसदों ने कैथोलिक चर्चों का प्रतिनिधित्व करने वाली CBCI से कहा कि चर्च को अल्पसंख्यक अधिकारों का समर्थन करने के अपने उसी रुख को अपनाना चाहिए, जो संविधान में दिए गए हैं। इस संबंध में CBCI ने दिल्ली में एक बैठक भी की।

बैठक में भाग लेने वाले एक सांसद ने कहा कि चर्च के नोटिस में ये बात लाई गई कि वक्फ संशोधन विधेयक संवैधानिक मूल्यों पर उल्लंघन करता है। एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम तट में 404 एकड़ पर वक्फ के दावे जैसे व्यक्तिगत मामलों के बावजूद इसका विरोध किया जाना चाहिए। दरअसल, जिस जगह पर केरल वक्फ बोर्ड ने दावा किया है, वहाँ कुछ 600 ईसाई और हिंदू परिवारों पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं।

इस विवाद में मुख्य रूप से मुनम्बम, चेराई, और पल्लिकाल द्वीप के इलाके शामिल हैं, जो कई दशकों से इन परिवारों की संपत्ति रही है। अब यह इलाका वक्फ बोर्ड की नज़र में है, जिससे इन परिवारों को अपनी जमीन खोने का डर सताने लगा है। करीब पाँच साल पहले साल 2019 वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके उनकी संपत्ति हैं।

यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। इन लोगों के पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। इन परिवारों ने अपनी जमीन को वैध रूप से खरीदा था, लेकिन अब उन्हें जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

दरअसल, 1341 ईस्वी में केरल में भयानक बाढ़ आई। इस दौरान वाइपिन आईलैंड के ऊतरी हिस्से पर मुनम्बम बना। साल 1503 में पुर्तगालियों ने यहाँ हमला किया और 1663 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया। यह डचों के अधिकार में लंबे समय तक रहा। इसके बाद 1789 ईस्वी में डचों ने मुनम्बम को त्रावणकोर के महाराजा को बेच दिया। इसके बाद विवाद की शुरुआत होती है।

साल 1902 में त्रावणकोर के महाराजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सैत को यहाँ की 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी एवं दामाद सिद्दीक सैत ने यह जमीन अपने नाम पर पंजीकृत करवा ली।

इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया और साल 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। हालाँकि, सिद्दीक सैत द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए। साल 1950 में सिद्दीक सैत ने यह जमीन फरूख कॉलेज को उपहार में दे दी, जो मुस्लिमों को शिक्षित करने के लिए 1948 में बनाया गया था।

इसके साथ ही सिद्दीकी सैत ने शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है तो जमीन वापस सिद्दीकी सैत के वंशजों को लौटा दी जाएगी। हालाँकि, दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है। कहा जाता है कि 1 नवंबर 1950 को कोच्चि के एडापल्ली में उप-पंजीयक कार्यालय में एक वक्फ पंजीकृत किया गया था। इसमें सैत ने फारूक कॉलेज के अध्यक्ष के पक्ष में पंजीकृत कराया था।

विवाद की शुरुआत और आयोग का गठन

फारूख कॉलेज के प्रबंधन को करीब एक दशक बाद जमीन का मालिकाना हक मिल गया। साल 1960 के दशक के आखिर में जमीन पर कब्जा करने वालों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। कॉलेज प्रबंधन यहाँ रहने वाले लोगों को बेदखल करना चाहता था। कैथोलिक ईसाई और दलित हिंदू समुदाय के ये लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, लेकिन उनके पास स्वामित्व साबित करने के लिए कानूनी दस्तावेज नहीं थे।

आखिरकार, अदालत के बाहर समझौते में कॉलेज प्रबंधन ने बाजार दर पर जमीन को अपने कब्जेदारों को बेचने का फैसला किया। दस्तावेजों से पता चलता है कि बिक्री के कामों में कॉलेज प्रबंधन ने यह उल्लेख नहीं किया कि विचाराधीन भूमि वक्फ संपत्ति थी, जिसे शिक्षा के उद्देश्य से कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष को दिया गया था। इसके बजाय उन्होंने कहा कि यह संपत्ति 1950 में गिफ्ट डीड में मिली थी।

निसार आयोग और नया विवाद: केरल राज्य वक्फ बोर्ड के खिलाफ कई शिकायतों मिलने के बाद वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) सरकार ने 2008 में एक आयोग गठित किया। यह आयोग सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश एमए निसार के नेतृत्व में नियुक्त किया गया। आयोग का काम बोर्ड द्वारा परिसंपत्तियों के नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करना था।

इसके अलावा, अयोग को इन परिसंपत्तियों की वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश करना भी शामिल था। आयोग ने साल 2009 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने मुनंबम में जमीन को वक्फ संपत्ति माना और कहा कि कॉलेज प्रबंधन ने बोर्ड की सहमति के बिना इसकी बिक्री को मंजूरी दे दी थी। इसने इसकी वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश की थी।

वक्फ बोर्ड ने घोषित कर दी वक्फ संपत्ति: इसके बाद साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने खुद ही मुनंबम भूमि को वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 40 और 41 के अनुसार वक्फ संपत्ति घोषित कर दी। बोर्ड ने राजस्व विभाग को निर्देश दिया कि वह भूमि के वर्तमान कब्जेदारों (जो कई वर्षों से कर का भुगतान कर रहे थे) से भूमि कर स्वीकार ना करे।

राजस्व विभाग को दिए गए इस निर्देश को राज्य सरकार ने साल 2022 में खारिज कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने राज्य सरकार के फैसले को केरल हाई कोर्ट में उसी साल चुनौती दी। न्यायालय ने फिलहाल राज्य सरकार के फैसलों पर रोक लगा दी है। वर्तमान में, इस विवाद को लेकर भूमि के कब्जेदारों के साथ-साथ वक्फ संरक्षण समिति की ओर से एक दर्जन से अधिक अपीलें न्यायालय में लंबित हैं।

हालात को लेकर असमंजस में लोग

केरल के एर्नाकुलम जिले में कोच्चि से लगभग 38 किलोमीटर दूर अरब सागर के किनारे मुनम्बम स्थित है। यहाँ 610 परिवारों रहते हैं, जिनमें 510 कैथोलिक ईसाई और 100 हिंदू परिवार हैं। इन लोगों कहना है कि इन लोगों ने फारूख कॉलेज के मैनेजमेंट से यह जमीन खरीदी थी। इसको लेकर वे पिछले 60 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं, साल 2019 में वक्फ ने इसे अपनी संपत्ति घोषित कर दी।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मुनम्बम में रहने वाले समर समिति (एक्शन काउंसिल) के संयोजक जोसेफ बेनी ने बताया कि यहाँ पर अधिकतर मछुआरा समुदाय के लोग रहते हैं। वे पीढ़ियों से यहाँ रह रहे हैं और सालों से भूमि कर भर रहे हैं। बेनी का कहना है कि साल 2022 में उन्हें बताया गया था कि वे टैक्स नहीं भर पाएँगे और ना ही जमीन बेच या गिरवी रख सकते हैं।

लगभग 68 साल की ओमाना यायी का कहना है कि वह पिछले 50 साल से मुनम्बम में रह रही हैं। उनकी शादी यहीं से हुई थी। उन्होंने कहा कि जब कॉलेज वालों से जमीन खरीदी गई थी, तब यहाँ पानी भरा हुआ था। उन्होंने कहा, “हम आधी रात को मछली पकड़ने जाते थे और लौटते समय सिर पर रेत लेकर आते थे। रेत भर-भरकर जमीन ऊँचा किया, तब यह जमीन रहने लायक हुई। इसमें वक्फ कहाँ से आ गया?”

जॉर्ज सोरोस से लिंक पर घिरीं सोनिया गाँधी, जिस फाउंडेशन की को-चेयरपर्सन वह ‘आजाद कश्मीर’ की पैरोकार: BJP ने पूछा- भारत विरोधियों से कॉन्ग्रेस का कैसा रिश्ता?

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर विदेशी ताकतों से जुड़ाव का गंभीर आरोप लगाया है। बीजेपी ने कहा है कि सोनिया गाँधी का संबंध ‘फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन एशिया पैसिफिक’ (FDL-AP) से है, जिसे जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन द्वारा वित्तीय मदद मिलती है। बीजेपी का दावा है कि यह संगठन कश्मीर को भारत से अलग करने की वकालत करता रहा है। इस मुद्दे को लेकर संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ और कई बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

सोनिया-सोरोस मुद्दे पर संसद में हंगामा

सोमवार (9 दिसंबर 2024) को संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस देखने को मिली। जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी दलों ने इसे बेबुनियाद आरोप बताते हुए जोरदार हंगामा किया। स्पीकर ओम बिरला ने विपक्ष को शांत करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार, लोकसभा की कार्यवाही को दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दिया गया। इसी तरह, राज्यसभा में भी भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी।

बीजेपी ने सोनिया गाँधी पर लगाए गंभीर आरोप

बीजेपी ने दावा किया है कि सोनिया गाँधी, एफडीएल-एपी की सह-अध्यक्ष होने के नाते, उस संगठन से जुड़ी रही हैं जो कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र मानने का समर्थन करता है। बीजेपी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “सोनिया गाँधी और जॉर्ज सोरोस के बीच का यह संबंध भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप को दर्शाता है।” बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और सोरोस फाउंडेशन के बीच साझेदारी हुई थी, जो इस विदेशी प्रभाव को और पुष्ट करती है।

बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गाँधी ने अडानी समूह के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओसीसीआरपी (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) की रिपोर्ट का हवाला दिया था। ओसीसीआरपी को भी सोरोस फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, “राहुल गाँधी और ओसीसीआरपी के बीच यह संबंध दिखाता है कि विपक्ष किस तरह से भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है।”

निशिकांत दुबे ने संसद में अपनी आवाज दबाने का आरोप लगाया और एक्स पर लिखा, “आज लोकसभा में मुझे बोलने का अवसर शून्य काल में था, लेकिन विपक्ष ख़ासकर कॉॉन्ग्रेस पार्टी ने सोरोस के सम्बन्ध में पोल खुलने के डर से मेरी आवाज़ को दबाया। संसद में नियम के अनुसार यदि आवाज़ उठाने पर हल्ला कर दबाया जाए तो लोकतंत्र ख़तरे में है। संविधान कैसे बचेगा?”

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी दलों से की एकजुटता की अपील

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले को ‘भारत की संप्रभुता पर हमला‘ बताया। उन्होंने कहा, “अगर कोई भारत-विरोधी ताकतों के साथ काम करता है, तो सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर उसका विरोध करना चाहिए। यह सिर्फ कॉन्ग्रेस का मुद्दा नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।” रिजिजू ने कॉन्ग्रेस नेताओं से अपील की कि अगर उनकी पार्टी का कोई सदस्य देशविरोधी तत्वों से जुड़ा है, तो उसे सामने लाएँ।

वहीं, कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इन आरोपों को ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया। कॉन्ग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “जब सरकार को कुछ छिपाना होता है, तो वह ऐसे मुद्दे उछालती है। अगर उनके पास कोई ठोस सबूत है, तो जाँच कराएँ।” वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने कहा, “सरकार को पहले अपने घर की सफाई करनी चाहिए। विपक्ष को डराने-धमकाने की यह कोशिश अब नहीं चलेगी।”

ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन पर क्या हैं आरोप?

ओसीसीआरपी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन है, जो अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करता है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि यह संगठन भारत की छवि खराब करने और मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए विपक्ष के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालाँकि, अमेरिका ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ओसीसीआरपी जैसे संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और उनकी संपादकीय नीति पर किसी का नियंत्रण नहीं होता।

बीजेपी के आरोपों पर अमेरिकी दूतावास ने बयान जारी कर कहा, “यह निराशाजनक है कि भारत की सत्ताधारी पार्टी इस तरह के आरोप लगा रही है। अमेरिकी सरकार पत्रकारों को पेशेवर प्रशिक्षण और विकास के लिए मदद करती है, लेकिन इसका संपादकीय स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं है।” बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इस बयान को आधार बनाते हुए कहा, “अमेरिका ने खुद स्वीकार किया है कि ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन को उनके फंड मिलते हैं। यह साफ दिखाता है कि विपक्ष और विदेशी ताकतें भारत के खिलाफ साजिश रच रही हैं।”

संसद में सोरोस चैप्टर कैसे शुरू हुआ

संसद में सोरोस का मुद्दा सबसे पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 6 दिसंबर को उठाया था। उन्होंने राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सोरोस के करीबियों के साथ मुलाकात का जिक्र किया और इसे ‘भारत-विरोधी ताकतों’ से जोड़ा। उन्होंने संसद में कहा, “कॉन्ग्रेस का हाथ जार्ज सोरोस के साथ, राहुल गाँधी जी की भारत जोड़ो यात्रा का खर्च सोरोस ने दिया या नहीं, सोरोस ने 1000 भारतीय बच्चों को विदेश में पढ़ाई का खर्च दिया, उसमें कितने कॉंग्रेस नेताओं के बच्चे हैं? मेरा कॉन्ग्रेस पार्टी से प्रश्न पूछने का सिलसिला जारी रहेगा।” इसके बाद, यह मुद्दा संसद में हंगामे का कारण बन गया।

बीजेपी ने यह भी कहा है कि जॉर्ज सोरोस की फंडिंग से चलने वाले खोजी पत्रकारों ने ही अडानी पर हमले को लेकर राहुल गाँधी के भाषणों का प्रसारण किया। राहुल गाँधी भी इसे अपने सोर्स के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाए। बीजेपी ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर भी जॉर्ज सोरोस को अपना दोस्त बता चुके हैं।

बहरहाल, सोरोस और सोनिया गाँधी के बीच कथित संबंधों को लेकर संसद में उठा यह मुद्दा राजनीतिक संघर्ष का नया अध्याय बन गया है। जहाँ बीजेपी इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का सवाल बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘ध्यान भटकाने की चाल’ करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद संसद के बाहर जनता के बीच कितना असर डालता है।

कुवैत में नर्स का काम करने गए, गल्फ बैंक से किया ₹700 करोड़ फ्रॉड: केरल के 1425 लोग जाँच के दायरे में, भारी-भरकम लोन लेकर दूसरे देशों में हो गए शिफ्ट

केरल के कुछ लोगों द्वारा कुवैत के गल्फ बैंक के साथ 700 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने का मामला प्रकाश में आया है। इस धोखाधड़ी केस में करीबन 1425 मलयालियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। आरोप है कि ये सारे लोग गल्फ बैंक से बड़े अमाउंट का लोन ले-लेकर अलग-अलग देशों में शिफ्ट हो गए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन आरोपितों ने फर्जी दस्तावेजों और पहचान पत्रों का इस्तेमाल करते हुए बैंक से ऋण प्राप्त करने का प्रयास किया। अब पुलिस ने कानूनी कार्रवाई करते हुए इनके खिलाफआई आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज किया है।

मामले में कुल 1425 आरोपित हैं, सबके खिलाफ जाँच जारी है और अन्य संभावित आरोपितों की पहचान की जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन आरोपितों ने धोखाधड़ी करने के क्रम में बैंक से पहले 50 लाख रुपए से 2 करोड़ रुपए तक का लोन लिया। इसके बाद इस वाले लोन को इन लोगों ने समय से लौटा दिया लेकिन बाद में बड़े लोन ले लेकर फरार हो गए।

कहा जा रहा है कि ये आरोपित गल्फ बैंक को चूना लगाने के बाद ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में जाकर बसे हुए हैं। वहीं बैंक ने इस मामले में अपनी छानबीन को तीन महीने पहले ही करना शुरू किया। तब शुरू किया है जब कर्ज चुकाने की तारीख लेट होती गई। बैंक के अधिकारी केरल आए। यहाँ उन्होंने सीनियर पुलिस अधिकारी से मुलाकात की और सारा मामला बताया। इसके बाद शिकायत के आधार पर एर्नाकुलम और कोट्टायम जिलों में 10 मामले दर्ज किए गए हैं।

अभी तक की जाँच में सामने आया है कि इस घटना में 800 ऐसे लोग हैं तो कुवैत के स्वास्थ्य मंत्रालय में बतौर नर्स काम करते थे। बैंक का मानना है कि शायद शुरुआत में कुछ लोगों ने इस गड़बड़ी को अंजाम दिया हो और बाद में उनसे सीखकर दूसरे मलयाली भी इस अपराध को किए हों।

जहाँ से PM मोदी ने फूँका था ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का बिगुल, अब वहीं से लॉन्च किया ‘बीमा सखी’: 10वीं पास महिला भी करेंगी कमाई, LIC की योजना के बारे में जानिए सब कुछ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा के पानीपत में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बीमा सखी योजना का शुभारंभ किया है। केंद्र सरकार की योजना का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार का साधन देना और उन्हें वित्तीय तौर पर साक्षर बनाना है। इस योजना के तहत महिलाओं को ट्रेनिंग भी मिलेगी और साथ ही में उन्हें हर महीने स्टाइपेंड भी मिलेगा। इस योजना के जरिए देश की हजारों महिलाएँ लाभान्वित होंगी। पीएम मोदी ने इस योजना को उसी पानीपत से चालू किया है, जहाँ से उन्होंने 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी।

क्या है बीमा सखी योजना?

बीमा सखी योजना 18-70 वर्ष की आयु की उन महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बनाई गई है जो 10वीं कक्षा तक पढ़ी हुई हैं। इस महिलाओं को LIC तीन वर्षों तक ट्रेनिंग देगी। इन महिलाओं को लोगों को वित्तीय साक्षरता के साथ ही बीमा के बारे में जानकारी देने के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी। यह महिलाएँ 3 वर्ष तक ट्रेनिंग लेने के बाद LIC एजेंट के तौर पर काम कर सकेंगी। इन्हें सिर्फ एजेंट के तौर पर ही नहीं बल्कि LIC अधिकारी के काम का भी मौका मिला सकेगा। इन्हें बीमा अधिकारी बनने के लिए स्नातक की योग्यता होनी चाहिए होगी।

इस योजना के तहत भर्ती की गई बीमा सखी निगम की स्थायी कर्मचारी नहीं होंगी। हालाँकि, वह निगम की एजेंट के तौर पर काम कर सकेंगी और इससे होनी वाली आय से वह स्वयं और अपने परिवार को सशक्त कर सकेगी। उन्हें LIC के लिए काम करने के दौरान स्टाइपेंड मिलता रहेगा और साथ ही उन बीमा पॉलिसी का कमीशन भी मिलेगा, जो उन्होंने बेचीं होंगी।

क्या-क्या फायदे मिलेंगे?

LIC के जरिए बीमा सखी बनने वाली महिलाओं को ट्रेनिंग के 3 वर्ष तक लगातार फायदे मिलते रहेंगे। उन्हें पहले वर्ष प्रतिमाह ₹7000 दिए जाएँगे। जबकि दूसरे वर्ष प्रतिमाह ₹6000 और तीसरे वर्ष ₹5000 मिलेंगे। इनके तीनों वर्ष के लिए ट्रेनिंग के दौरान कुछ मानक भी पूरे करने हैं। इसके अलावा वह पॉलिसी बेच कर कितना भी पैसा कमा सकती हैं। इसमें काम करने के घंटे भी तय नहीं हैं। यानी महिलाएँ अपनी सुविधा के अनुसार, काम कर सकेंगी।

कौन महिला बन सकेगी बीमा सखी?

बीमा सखी बनने के लिए 18-70 की वह सभी महिलाएँ पात्र होंगी जो 10वीं पास हैं। महिलाओं को इसके लिए ऑनलाइन आवेदन देना होगा। महिलाओं को इसके बाद LIC खुद ही आगे बढ़ने में सहायता करेगी। हालाँकि, उन महिलाओं को इसमें योग्य नहीं माना जाएगा, जिनके परिवार में पहले से कोई LIC का एजेंट है। LIC में काम कर चुकी महिलाएँ भी इस योजना की पात्र नहीं होगी। यह योजना पूरी तरह से इस आयाम रही महिलाओं के लिए लाई गई हैं।

जो कभी कहते थे शपथ राम की खाते हैं, वे अब पीर बाबर शेख की ले रहे कसम: उद्धव ठाकरे के प्रति वफादारी जताने दरगाह पहुँचे शिवसेना (UBT) के कार्यकर्ता

उद्धव ठाकरे के गुट वाली शिवसेना (यूबीटी) के कार्यकर्ताओं ने 8 दिसंबर 2024 (रविवार) को एक दरगाह पर जाकर पार्टी के प्रति वफादारी की शपथ ली। यह दरगाह रत्नागिरी जिले के हाटिस में स्थित है और इसका नाम पीर बाबर शेख दरगाह है। इस तरह की शपथ लेने के लिए एक महजबी जगह चुनने पर सोशल मीडिया यूजर की भौहें टेढ़ी हो गई हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह आयोजन महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर उपजे कलह को शांत करने का प्रयास था। दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक का दावा किया जाता है। ABP न्यूज ने अनाम सूत्रों के हवाले लिखा है कि प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए शपथ एक महजबी स्थल को चुना गया और यहाँ पर शपथ ली गई।

शिवसेना के कार्यकर्ता दरगाह क्यों गए?

शिवसेना (यूबीटी) को हाल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गंभीर झटका लगा है। पार्टी राज्य भर में सिर्फ 20 सीटें जीतने में कामयाब रही। वहीं, महाविकास अघाड़ी गठबंधन में शिवसेना (UBT), कॉन्ग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) शामिल हैं। इस गठबंधन को कुल 60 सीटें ही मिलीं। शिवसेना को विशेष रूप से कोंकण में हुआ नुकसान चुभ रहा है। यह ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट का गढ़ माना जाता था।

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पैदा हो गया। कई कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर आरोप लगाया कि वरिष्ठ नेताओं की लापरवाही और अक्षमता के कारण विधानसभा चुनावों में इस तरह की हार हुई। इस असंतोष के परिणामस्वरूप बैठकों और प्रमुख पदों से इस्तीफे के दौरान गर्मागर्म चर्चा हुई। इसके कारण पार्टी कैडर के भीतर गुस्सा बढ़ गया।

पार्टी के भीतर उथल-पुथल का समाधान वरिष्ठ नेता एवं उद्धव ठाकरे के करीबी विश्वासपात्र विनायक राउत ने निकालने की सोची। पार्टी के नेताओं द्वारा पीर बाबर शेख दरगाह में वफादारी की शपथ लेने का एक निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य जनता को यह दिखाना था कि पार्टी में विश्वास और एकता है। कार्यकर्ताओं से इसमें भाग लेने के लिए कहा गया था। सोर्स ने बताया कि जो व्यक्ति अनुपस्थिति रहे उन्हें असंतुष्ट या पार्टी विरोधी माना जाएगा।

दरगाह का एक संक्षिप्त इतिहास

डीप्रा दांडेकर द्वारा लिखित ‘ग्रे लिटरेचर ऐट दि दरगाह ऑफ पीर बाबर शेख ऐट हैटिस’ के अनुसार, पीर बाबर शेख दरगाह कोंकण क्षेत्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में एक अनूठा स्थान रखता है। यह हैटिस गाँव में स्थित यह दरगाह सूफी संत पीर बाबर शेख को समर्पित है। कहा जाता है कि वह सदियों पहले इस गाँव में आए थे। वे आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे।

जब पीर बाबर शेख का निधन हो हुआ तो ग्रामीणों के उन्हें दफनाने को लेकर दुविधा उत्पन्न हो गई, क्योंकि स्थानीय लोग मुख्य रूप से हिंदू थे। आखिरकार, पास के इब्राहिम्पट्टन के मुस्लिमों ने उनके अंतिम संस्कार करने में सहायता की। उन्हें दफन करने के बाद कब्र को एक दरगाह का रूप दे दिया गया और उस स्थान को ‘सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक’ के रूप में स्थापित किया गया।

कहा जाता है कि यहाँ पर हिंदू और मुस्लिम दोनों सक्रिय रूप से इसके रखरखाव और यहाँ के अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यहाँ सालाना होने वाले उर्स मेले में पूरे क्षेत्र के हजारों भक्त आते हैं, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग शामिल हैं। हालाँकि, दरगाह कोंकणी मुस्लिमों के लिए महत्व रखता है, लेकिन इस स्थान का प्रशासन और गतिविधियाँ स्थानीय हिंदू नागवेकर कबीले से बहुत प्रभावित हैं।

‘सांप्रदायिक एकता’ की अपनी कथा के बावजूद इस दरगाह का इतिहास भी तनाव को प्रकट करता है। चूँकि हैटिस में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति कम है तो यहाँ धार्मिक सह-अस्तित्व के इतिहास पर सवाल उठता है। हैटिस में एक स्थायी मुस्लिम समुदाय की अनुपस्थिति, अनुष्ठान गतिविधियों के लिए पड़ोसी गाँवों के मुस्लिमों पर निर्भरता दरगाह की विरासत को परिभाषित करती है।

राजनीतिक निहितार्थ और भविष्य के दृष्टिकोण

पार्टी की आंतरिक चुनौतियों का समाधान करने और कार्यकर्ताओं के बीच एकता को बनाए रखने के लिए एक दरगाह का चुनाव करना शिवसेना के हिंदुत्व विचारधारा के साथ मेल नहीं खाता। इसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए हैं। इसको लेकर सवाल किया जा रहा है कि क्या पार्टी ने अपनी पारंपरिक विचारधारा को अब पूरी तरह से छोड़ने का फैसला कर लिया है।