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BBC का नया ज़हर: रोहिग्याओं की तरह प्रवासी भारतीयों को भगाने का सपना देख रहे हैं वुसतुल्लाह

बीबीसी ने एक लेख प्रकाशित किया है। इस लेख को वुसतुल्लाह ख़ान ने लिखा है। ख़ान भारतीयों को धमकी दे रहे हैं। बीबीसी हमें धमका रही है। बीबीसी कह रही है कि अगर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन अपने देश में रह रहे सभी भारतीयों को बोरिया-बिस्तर समेटने का आदेश दे दें तो क्या होगा? इसी तरह कनाडा और अमेरिका में भी किया जाए तो क्या होगा? रोहिंग्या घुसपैठियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए बीबीसी लिखता है कि भारतीयों को भी विदेशों से निकाला जा सकता है।

हालाँकि, बीबीसी यहाँ रोहिंग्या घुसपैठियों और प्रवासी भारतीयों की तुलना करते समय इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर देता है कि भारतीय नागरिक जहाँ भी रहते हैं, वहाँ की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं। वे आतंकवादी नहीं बनते। एक प्रकार से वुसतुल्लाह ख़ान बीबीसी के मध्य से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और कनाडा के राष्ट्रपति जस्टिन ट्रुडो को यह आईडिया दे रहे हैं कि प्रवासी भारतीयों को निकाल बाहर किया जाए।

यह इतना आसान है क्या? आइए, देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 30 लाख के क़रीब भारतीय मूल के लोग रहते हैं। भारतीय कम्पनियाँ अमेरिका की जीडीपी में सालाना 57 बिलियन डॉलर से भी अधिक का योगदान देती हैं। अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की हाउसहोल्ड इनकम सभी प्रवासियों में सबसे ज्यादा है। इसके अलावा वे सबसे ज्यादा व्यापार-पसंद भी हैं। गूगल, फेसबुक, ओरेकल, एडोबी, सॉफ्टबैंक, कॉग्निजेंट और मास्टरकार्ड सहित कई बड़ी कंपनियों में सर्वोच्च पदों पर भारतीय काबिज हैं।

क्या बीबीसी की बातों में आकर डोनाल्ड ट्रम्प सत्य नडेला और सुन्दर पिचाई को यूएस से निकाल देंगे क्या? कोई भी देश सबसे ज्यादा आय वाले प्रवासी समाज, जो उस देश की जीडीपी में अहम योगदान दे रहा है, उसे निकाल सकता है क्या? अमेरिका में भारतीय सभी प्रवासी व एथनिक समूहों में सबसे ज्यादा शिक्षित हैं। वुसतुल्लाह ने सस्ता नशा कर के अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की उन रोहिंग्याओं से तुलना की है, जिनमें से कई आए दिन चोरी-डकैती से लेकर अन्य वारदातों में पुलिस के हत्थे चढ़ते रहते हैं।

यहाँ तक कि ख़ुद बीबीसी का अपना देश ब्रिटेन उसकी बात को नहीं मानेगा। बॉरिस जॉनसन ने वो सस्ता नशा नहीं किया है, जो बीबीसी के अधिकतर पत्रकार कर के आर्टिकल लिखने बैठते हैं। उर्दू वाले जम्मू कश्मीर को लेकर झूठी ख़बरें चलाते हैं, हिंदी वाले प्रवासी भारतीयों को धमकाते हैं। 15 लाख के क़रीब भारतीय रहते हैं ब्रिटेन में, जो राजनीति से लेकर मनोरंजन इंडस्ट्री तक में सक्रिय हैं। वे चोरी-डकैती नहीं करते, आतंक नहीं फैलाते। ब्रिटेन में भारतीय सबसे कम ग़रीबी दर वाले एथनिक समाज हैं।

जहाँ यूके में रोज़गार दर 74% है, वहाँ रहने वाला भारतीय समाज 73% रोज़गार दर के साथ कड़ी टक्कर देते हुए दिखता है। मीडियन टोटल संपत्ति की बात करें तो वाइट ब्रिटिशर्स के बाद प्रवासी भारतीय ही आते हैं। बीबीसी के इस भ्रामक लेख को देख कर तो यही लगता है कि इन्हें यही नहीं पता कि इनके देश की जीडीपी में भारतीयों का क्या योगदान है? इसी तरह कनाडा की भी बात की गई है। बीबीसी को यह बता देना ज़रूरी है कि 2015 में जब कनाडा में जब जस्टिन ट्रुडो की सरकार बनी थी, तो 4 सिख मंत्रियों ने शपथ ली थी।

जहाँ के 4 अहम मंत्रालय भारतीय मूल के लोग सँभाल रहे हों, वहाँ से भारतीयों को निकालने वाली बात या तो बीबीसी जैसा प्रोपेगंडाबाज पत्रकार ही कर सकता है और नहीं तो वुसतुल्लाह ख़ान जैसा कोई ऐसा व्यक्ति, जो भारतीयों से घृणा करता हो, भारतीयों के प्रति गन्दी सोच रखता हो। जिस देश की सत्ता भारतीय चला रहे हों, उस देश से भारतीयों को निकालोगे! वाह! अव्वल तो यह कि बीबीसी पूछता है कि ऐसी स्थिति में गृहमंत्री अमित शाह क्या करेंगे?

पहली बात तो यह कि ऐसी स्थिति आ ही नहीं सकती। ऊपर से अगर विदेश में रह रहे भारतीयों पर कोई आँच आती भी है तो भारत सरकार किस प्रकार का एक्शन लेती है, सुषमा स्वराज के मंत्रित्वकाल में हमने देखा है। उससे पहले भी जब ऐसी कोई भी दिक्कत आई, भारत सरकार ने कुवैत से लेकर यमन तक हस्तक्षेप किया है। अब आपको इस आर्टिकल की एक ऐसी बात बताते हैं, जिसकी चर्चा हमने अब तक इसीलिए नहीं की क्योंकि पहले हम डेटा के माध्यम से बीबीसी को जवाब देना चाहते हैं।

बीबीसी ने अपनी बात साबित करने के लिए बेहूदा उदाहरण लिया है। युगांडा का उदाहरण लेकर दिखाया गया है कि वहाँ से भारतीयों को निकाल दिया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी कुछ नहीं कर पाई थीं। लेकिन, बीबीसी ने इस कार्य को अंजाम देने वाले जिस सनकी तानाशाह का जिक्र किया है, उसे ‘युगांडा का कसाई’ भी कहते हैं। जी हाँ, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पूर्ण बहुमत से चुनी गई सरकार द्वारा लिए गए निर्णय की तुलना अफ्रीका के एक ख़ूनी तानाशाह से की गई है।

क्या मोदी सरकार द्वारा लिया गया निर्णय ‘युगांडा के तानाशाह कसाई’ के निर्णय से मेल खता है? बीबीसी के पूरे लेख का सार यही है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और मानवाधिकार संगठनों की मानें तो ईदी अमीन ने अपने कार्यकाल में 5 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मोदी सरकार जो भी अहम निर्णय ले रही है, वे सभी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में शामिल थे। भाजपा ने अप्रैल 2018 में लोकसंभा चुनाव से एक वर्ष पहले ही ऐलान किया था कि फेज के आधार पर पूरे भारत में एनआरसी लागू की जाएगी।

कुछ भी चोरी-छिपे नहीं हुआ है। घोषणापत्र से लेकर चुनावी भाषणों तक में जनता का मैंडेट लेकर तब निर्णय लिए गए। ऐसे में भी अगर विश्व की सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक पार्टी के मुखिया और सबसे बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री की तुलना एक तानाशाह मिलिट्री कमांडर से की जाती है तो या तो ये पागलपन है नहीं तो घृणा। इस मामले में दोनों है। बीबीसी यह देख कर पागल हो चुका है कि भारत में एक से एक बड़े निर्णय हो रहे हैं और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्धता आ रही है। वहीं वुसतुल्लाह की भारतीयों के प्रति घृणा साफ़ झलक रही है।

इससे पता चलता है कि पागलपन में अंधा हो चुका बीबीसी घृणा से पंगु भी हो गया है। बीबीसी तो क्या, अगर उनके गिरोह विशेष के सारे लोग मिल जाएँ फिर भी दुनिया के किसी भी देश से प्रवासी भारतीयों को नहीं निकाला जा सकता। ऐसे घटिया सपने देख कर उन्हें आर्टिकल की शक्ल देने वाले बीबीसी को ही भारत से निकालने का समय आ चुका है। लेकिन नहीं, अभी तो उन्हें घृणा से और पागल होना है। एक बार पागलपन की हदें पार करते हुए इनके सभी एडिटर सड़क पर नंगा नाचने लगे, ये ख़ुद भारत छोड़ने को मजबूर हो जाएँगे।

जाधव पर अत्यधिक दबाव बना कर झूठ बोलने को किया जा रहा मजबूर: भारतीय राजनयिक का खुलासा

आज कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान काउंसलर एक्सेस देने को मजबूर हुआ। भारतीय डिप्टी कमिश्नर ने जाधव से मुलाक़ात की। जाधव को पाकिस्तान ने अपहृत कर आतंकवादी ठहरा दिया था। पाक की सैन्य अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी, जिस पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पुनर्विचार करने को कहा। इंटरनेशनल कोर्ट में किरकिरी होने के बाद पाकिस्तान जाधव को काउंसलर एक्सेस देने को मजबूर हुआ। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ‘अत्यधिक दबाव’ बना कर पकिस्तान ने उन्हें झूठ बोलने को मजबूर किया।

भारतीय राजनयिक ने जाधव से एक जेल में मुलाक़ात के बाद पाया कि उन्हें पाकिस्तान द्वारा अत्यधिक दबाव देकर उसके झूठ को बढ़ावा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पूरी रिपोर्ट आने के बाद भारत यह देखेगा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुलभूषण जाधव की माँ से बात कर के उन्हें ताज़ा घटनाक्रम की जानकारी दी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने जाधव को सुनाई गई सज़ा के लिए जो प्रक्रिया चली, उसे ग़लत ठहराया। मंत्रालय ने कहा कि भारत सरकार इस दिशा में प्रयास कर रही है कि जाधव को जल्द से जल्द न्याय मिले और उनकी सकुशल वतन वापसी हो सके।

सातवाहन और चालुक्य वंश के बाद तिलक ने गणेश चतुर्थी को बना दिया था स्वतन्त्रता का जन आंदोलन

दास कपिताल लिखने वाले जर्मनी के क्रन्तिकारी विचारक कार्ल मार्क्स ने कहा था- ‘History repeats itself, the first as tragedy, then as farce.’ भारतीय इतिहास और भारतीयों के विदेशी आतताइयों से संघर्ष के संदर्भ में यह हमेशा सही साबित होता आया है। हम अक्सर अपने ही इतिहास से सबक सीखने में भूल कर बैठते हैं।

गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास और स्वतन्त्रता आंदोलन में भूमिका देखकर कुछ समय पहले दिल्ली के हौज काजी स्थित दुर्गा मंदिर में हुई सांप्रदायिक घटना की याद आती है। जब मंदिर में मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा मंदिर में तोड़फोड़ कर हिन्दू प्रतीकों को अपमानित करने के बाद कुछ हिन्दू एक्टिविस्ट्स ने मिलकर विशाल जागरण और सुंदरकांड का आयोजन किया था।

कुछ इसी तरह से लोगों को जोड़ने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के दौरान गणेश चतुर्थी को एक विशाल आंदोलन का आकार दे दिया था। गणेश पूजा या गणेशोत्सव महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह त्यौहार भाद्रपद मास के चतुर्थी से चतुर्दशी तक कुल दस दिनों तक चलता है। गणेश चतुर्थी की भारतीय इतिहास में अहम भूमिका रही है।

भारतीय इतिहास में गणेशोत्सव

बात चाहे ब्राह्मण साहित्य की हो या फिर भारतीय इतिहास में सातवाहन, चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों की, गणेश उत्सव हमेशा ही भारतीय और हिन्दू एकता का प्रमुख केंद्र रहा है। हिन्दू धर्म में पुराणों- अग्नि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, शिवपुराण, स्कंद पुराण आदि में भगवान गणेश का जिक्र मिलता है। भगवान शिव द्वारा माता पार्वती के प्रहरी बने गणेश का सर उनके धड़ से अलग करने और फिर हाथी के बच्चे का सर जोड़ने की घटना का जिक्र नारद पुराण में मिलता है।

मौर्य साम्राज्य के बाद सातवाहन वंश में गणेश पूजा

अगर भारतीय इतिहास की बात करें तो महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य जैसे राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलाई थी। सातवाहन एक वंश था जो मौर्य साम्राज्य के बाद उभरा था। महान सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद सातवाहनों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इस वंश की जानकारी मत्स्य पुराण में भी मिलती है। इस वंश ने ईसा पूर्व 230 से लेकर दूसरी सदी (ईसा के बाद) तक केन्द्रीय दक्षिण भारत पर राज किया।

छत्रपति शिवाजी के समय गणेश को राष्ट्रदेव का दर्जा दिया गया था

इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज भी गणेश की उपासना करते थे। इस दौरान पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना राजमाता जीजाबाई ने की थी।

महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी ने गणेशोत्सव को राष्ट्रीयता एवं संस्कृति से जोड़कर एक नई शुरुआत की थी। गणेशोत्सव का यह स्वरूप तब से इसी प्रकार कायम रहा और पेशवाओं के समय में भी जारी रहा। पेशवाओं के समय में गणेशजी को लगभग राष्ट्रदेव के रूप में दर्जा प्राप्त था, क्योंकि वे उनके कुलदेव थे। पेशवाओं के बाद 1818 से 1892 तक के काल में यह पर्व हिन्दू घरों के दायरे में ही सिमटकर रह गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: बाल गंगाधर तिलक और गणेश चतुर्थी

भारतीय इतिहास में एक समय आया जब भारतीय जनमानस को अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के अत्याचारों की त्रासदी से गुजरना पड़ा। यही वो समय था जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने लोगों के आत्मविश्वास को जगाने और उनके अंदर ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े होने के लिए गणेश पूजा को फिर से लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया। भारत से ब्रिटिश राज की समाप्ति के लिए उन्होंने सामाजिक आंदोलनों के ज़रिए सामाजिक चेतना का प्रवाह तेज़ करके अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ जनमत निर्माण का निर्माण किया।

गणेश महोत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम जनता को जागरूक करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। अंत में इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हालाँकि, बाल गंगाधर तिलक के इस अभियान से उस दौरान कॉन्ग्रेस सदैव किनारा ही करती रही। 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की स्थापना से ही कॉन्ग्रेस तिलक को निरंतर दरकिनार करती रही क्योंकि तिलक के व्यक्तित्व और उनके प्रति जनता के लगाव को देख अंग्रेज़ों को एहसास था कि अगर तिलक का सामाजिक चेतना का प्रयास मज़बूत हुआ तो, उनकी विदाई का समय और जल्दी आ जाएगा।

गणेश चतुर्थी बन गया था जन आंदोलन

ब्रिटिश काल में कोई भी हिन्दू सांस्कृतिक कार्यक्रम या उत्सव को साथ मिलकर या एक जगह इकट्ठा होकर नहीं मना सकते थे। पहले लोग घरों में ही गणेशोत्सव मनाते थे और गणेश विसर्जन करने का भी कोई रिवाज नहीं था। यही वो समय था जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया।

आगे चलकर उनका यह प्रयास एक विशाल आंदोलन बना और स्वतंत्रता आंदोलन में इस गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। आज गणेशोत्सव एक विराट रूप ले चुका है।

तिलक ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष कर रहे थे। तिलक के सार्वजनिक गणेशोत्सव से दो फायदे हुए, एक तो वह अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में कामयाब रहे और दूसरा यह कि इस उत्सव ने जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें आत्मविश्वास दिया।

गणेश पूजा का प्रचलन गणेश चतुर्थी के दिन नियत रहा है, लेकिन इसे विशाल गणेशोत्सव का रूप देने की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की। तिलक ने जनमानस को अंग्रेजों के खिलाफ करने के लिए इसे नया रूप दिया और दस दिन के आयोजन के बाद गणेश मूर्ती को चतुर्दशी के दिन जल में विसर्जित कर दिया जाता है। बावजूद इसके कि यह हिन्दू धर्म के अनुसार अनुचित माना गया है।

लेकिन तिलक जनता के हर वर्ग को साथ जोड़कर अंग्रेजों को जो सन्देश देना चाहते थे वो इसमें कामयाब रहे। और कालांतर में अब यही प्रथा धर्म का एक अंग बन गई है।

तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी दल के नेता बन गए थे। वह स्पष्ट वक्ता और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। यह बात ब्रिटिश अफसर भी अच्छी तरह जानते थे कि अगर किसी मंच से तिलक भाषण देंगे तो वहाँ खिलाफ उग्र होना तय है।

दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद स्वाधीनता आंदोलन में तिलक सबसे बड़ी भूमिका में रहे। कई लोग मानते हैं कि तिलक न होते तो आज़ादी पाने में कई दशक और लगते क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। यह भी सत्य है कि कॉन्ग्रेस के भीतर तिलक की घोर अवहेलना हुई। वह मोतीलाल नेहरू जैसे समकालीन नेताओं की तरह ब्रिटिश राज से समझौते की मुद्रा में नहीं रहे।

यही कुछ कारण थे कि वह ब्रिटिश राज के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे। तिलक की राय थी कि अंग्रेज़ों को यहाँ से किसी भी कीमत पर भगाना है। और वो कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं की तरह ब्रिटिश सत्ता के समक्ष हाथ फैलाने और याचना के बजाय उन्हें भारत से निकाल भगाने के पक्ष में रहते थे।

उनका मानना था कि स्वतंत्रता माँगने से नहीं बल्कि छीनने से मिलेगी और इसके लिए खुला संघर्ष कर बलिदान के लिए हर वक़्त तैयार रहना पड़ेगा। इसी बीच उन्होंने नारा दिया था जो स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे लकप्रिय नारा भी माना जाता है- ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा।’ तिलक की इस घोषणा ने वर्ष 1914 में जनमानस में ज़बरदस्त जोश भर दिया था। और इस आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ उनका हथियार बना गणेश चतुर्थी उत्सव।

हिन्दू धर्म के अधिकांश त्यौहार गणेश चतुर्थी की तरह ही लोगों के मन से जातिगत भेदभाव को हटाने से लेकर आपसी सौहार्द विकसित करने के लिए बने हैं। जिनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है।

मैं अपना सीवी नहीं दूँगी: रोमिला थापर ने JNU के नियम-क़ायदों को मानने से किया इनकार

जेएनयू ने अपने संस्थान के नियम-क़ायदों के अनुसार 75 की उम्र पार कर चुके सभी एमेरिटस प्रोफेसरों की सीवी माँगी है। यह एक रूटीन प्रक्रिया है, जिसे वामपंथियों ने रोमिला थापर के ख़िलाफ़ साज़िश कह कर प्रचारित किया। हालाँकि, उनकी पोल तब खुल गई जब यह पता चला कि जेएनयू के नियमानुसार जो भी एमेरिटस प्रोफ़ेसर 75 वर्ष से अधिक उम्र के हो जाते हैं, उनकी मान्यता के सम्बन्ध में समीक्षा की जाती है। उनके स्वास्थ्य, उपस्थिति और क्रियाकलापों को देखते हुए यह निर्णय लिया जाता है। 87 वर्षीय थापर ऑटोमैटिक रूप से इस सूची में आ जाती हैं।

हालाँकि, रोमिला थापर ने यूनिवर्सिटी के नियम-क़ायदों को मानने से साफ़ इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वह जेएनयू को अपनी सीवी नहीं देंगी। आजतक की एक रिपोर्ट के अनुसार, रोमिला थापर ने चैनल से कहा कि फिलहाल उनका जेएनयू के साथ अपना सीवी साझा करने का कोई इरादा नहीं है। बता दें कि उम्रदराज एमेरिटस प्रोफेसरों की समीक्षा वाले नियम कई अन्य अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में भी मौजूद हैं।

रोमिला थापर ने कहा कि उनको मिली मान्यता जीवन भर के लिए है और जेएनयू उनकी सीवी माँग कर मूल्यों का उल्लंघन कर रहा है। वहीं कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने रोमिला थापर का समर्थन करते हुए वीसी से कहा है कि वह उनसे माफ़ी माँगे। जेएनयू ने भी बयान जारी कर के यह साफ़ कर दिया है कि यूनिवर्सिटी को ऐसा क़दम उठाने का अधिकार है और सीवी माँगने का यह अर्थ नहीं है कि किसी एमेरिटस प्रोफेसर की मान्यता ख़त्म ही कर दी जाएगी।

यह भी जानने लायक बात है कि अधिकतर एमेरिटस प्रोफेसरों ने पिछले 3 वर्षों में एक बार भी यूनिवर्सिटी में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है और न ही विश्वविद्यालय के अकादमिक कार्यों में कोई योगदान दिया है। 

चिन्मयानन्द मामला: SC ने लॉ स्टूडेंट के आरोपों की जाँच के लिए योगी सरकार को SIT गठित करने का दिया आदेश

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में क़ानून की पढ़ाई करने वाली एक छात्रा की तरफ से बीजेपी नेता और पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। इस मामले में सोमवार (2 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह आदेश दिया है कि वे लॉ स्टूडेंट की तरफ से पूर्व केन्द्रीय राज्यमंत्री के ऊपर लगाए गए आरोपों की जाँच के लिए विशेष जाँच समिति (SIT) का गठन करें।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से कहा है कि छात्रा की तरफ से शिक़ायत की जाँच की वह मॉनिटरिंग करे। इसके अलावा, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वे अगले आदेश तक लड़की और लड़की के परिवार को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराए।

ग़ौरतलब है कि शाहजहाँपुर स्थित स्वामी शुकदेवानंद विधि महाविद्यालय से एलएलएम कर रही छात्रा ने 24 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो अपलोड किया था। इस वीडियो में उसने पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर कई लड़कियों की ज़िदगी बर्बाद करने का आरोप लगाया था एवं उनसे ख़ुद को और अपने परिवार को जान का ख़तरा बताया था।

इसके बाद चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ अपहरण और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया गया था। चिन्मयानंद महाविद्यालय की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हैं। हालाँकि, 72 वर्षीय स्वामी चिन्मयानंद ने दावा किया था कि उनकी छवि ख़राब करने के लिए षड्यंत्र रचा जा रहा है।

पूर्व कॉन्ग्रेसी मंत्री अब्दुल सत्तार शिवसेना में शामिल, कहा- पिछले 5 वर्षों से शिवसेना किसानों की लड़ाई लड़ रही है

महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार सोमवार (सितंबर 2, 2019) को शिवसेना में शामिल हो गए। औरंगाबाद जिले की सिलोद विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके सत्तार यहाँ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के आवास पर उनकी मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुए।

उन्होंने इसी साल हुए आम चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस विधायक की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्होंने भाजपा की राज्य इकाई के प्रमुख रावसाहेब दानवे की मदद की थी, जो कि जालना लोकसभा सीट से चुनाव जीते थे। 

बता दें कि, सत्तार पिछली कॉन्ग्रेस-राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) गठबंधन सरकार में पशुपालन मंत्री थे। सत्तार को शिवसेना में शामिल करने के बाद पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सिलोद विधानसभा क्षेत्र से सत्तार के नामांकन की घोषणा करते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि सत्तार एक बार फिर सीट जीतें। उन्होंने कहा कि यह सीट उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

वहीं सत्तार ने पार्टी में शामिल होने के बाद कहा कि वह शिवसेना में इसलिए शामिल हुए, क्योंकि पार्टी किसानों के हित के लिए काम कर रही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी की खिंचाई करते हुए कहा, “पिछले पाँच वर्षों से शिवसेना किसानों के लिए लड़ाई लड़ रही है। विपक्षी पार्टी होने के नाते, यह हमारी (कॉन्ग्रेस) जिम्मेदारी थी, लेकिन सरकार का हिस्सा रहने के बावजूद शिवसेना ने किसानों की दुर्दशा पर अपनी आवाज उठाई।”

बता दें कि, महाराष्ट्र में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और पिछले कुछ हफ्तों में कॉन्ग्रेस और राकांपा के कई नेता या तो भाजपा या फिर शिवसेना का दामन थाम चुके हैं।

ठीके तो है नीतीश कुमार: विकल्पहीनता की आड़ में JDU का नया नारा, अब ‘बिहार में बहार’ नहीं

बिहार की सत्ताधारी पार्टी जदयू ने विधानसभा चुनाव 2020 के लिए नए सिरे से तैयारी शुरू कर दी है और इसी क्रम में पार्टी ने नया नारा भी दिया है। आपको पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान जदयू का नारा ‘बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है‘ तो याद ही होगा। वहीं अब पार्टी का नया नारा है ‘क्यूँ करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार‘। बिहार में ‘ठीक’ और ‘ठीके’ के बीच बड़ा अंतर है। ‘ठीक’ मतलब अच्छा और ‘ठीके’ मतलब कामचलाऊ। अर्थात, इसे आप विकल्पहीनता भी कह सकते हैं।

क्या जदयू बिहार में विकल्पहीनता को भुनाना चाहती है? जदयू मुख्यालय के सामने इस नारे वाले पोस्टर को भी लगाया गया है। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव उपेंद्र कुमार सिंह ने ये नारा गढ़ा है। पिछले विधानसभा चुनाव में ‘बिहार में बहार’ वाला नारा प्रशांत किशोर के दिमाग की उपज थी। उस दौरान नीतीश राजद-जदयू-कॉन्ग्रेस महागठबंधन का चेहरा थे और प्रशांत किशोर उनके प्रमुख रणनीतिकार थे।

राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने विकल्पहीनता की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से बिहार में क़ानून-व्यवस्था की स्थिति है, उससे लगता है कि नीतीश कुमार को ‘ठीक ही है’ कहा जा सकता है। उन्होंने पिछले स्लोगन की याद दिलाते हुए कहा कि बिहार में एके-47 की बहार है और अपराधी जेल में जन्मदिन की पार्टी मना रहे हैं। इस सवाल का उठना तो ज़रूरी है कि क्या अब जेडीयू ने अपने मुखिया नीतीश को अंडरएस्टीमेट करना शुरू कर दिया है?

बिहार भाजपा में सुशिल कुमार मोदी जनाधार वाले नेता नहीं हैं और उन्हें लोकसभा या विधानसभा चुनाव लड़े भी काफ़ी वर्ष हो गए। इसी तरह लालू यादव के जेल जाने के बाद राजद के पास भी कोई दमदार चेहरा नहीं बचा है। कॉन्ग्रेस तो पूरे देश की तरह बिहार में भी अस्तित्व से जूझ रही है। रामविलास पासवान राजग का अंग हैं। मुकेश साहनी और जीतन राम माँझी जाति विशेष के नेता बन कर रह गए।

जिस तरह से बिहार में राजधानी पटना की सड़कों पर हत्या हो जा रही है और मुजफ्फरपुर शेल्टर हाउस काण्ड के तार जदयू नेताओं से जुड़े हैं, ऐसा लगता है कि जदयू अपने दामन में लगे दागों को धोने के लिए जनता को यह एहसास दिलाना चाहती है कि उनके पास नीतीश ही एक ठीक विकल्प है।

वेद-पुराण से नहीं चलेगा कोर्ट, परिक्रमा मंदिर का सबूत नहीं: SC में मुस्लिम पक्षकार

राम मंदिर पर चल रही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अजीबोगरीब दावे किए। राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा कि कि क्या कोर्ट वैदिक नियमों और स्कन्द पुराण के हिसाब से चलेगा? उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया कि कोर्ट वैदिक नियमों से नहीं चलता और जिस क़ानूनी सिस्टम के तहत न्यायपालिका कार्य कर रही है, उसकी शुरुआत 1858 में हुई। उन्होंने कहा कि हम जिस क़ानून का पालन करते हैं, वह वैदिक क़ानून नहीं है।

राजीव धवन ने इस्लामी आक्रांताओं वाली बात को काटते हुए कहा, “वे (हिन्दू पक्ष) आक्रमणों की बात करते हैं, ये आक्रांता-वो आक्रांता। मुझे उन सब में नहीं जाना है। मैं पूछता हूँ कि क्या आर्यन आक्रमण हुआ था?” राजीव धवन ने हिन्दू पक्ष के वकील के पराशरण के बारे में बात करते हुए कहा, “मीलॉर्ड आप उन्हें भीष्म पितामह कहते हैं और अब ये आपका ही काम है- आप यह निर्णय लें कि कौन सही है और कौन ग़लत।” राजीव धवन ने कहा कि मोर और कमल थे, इसका मतलब ये नहीं कि मस्जिद से पहले वहाँ कुछ और था।

हिन्दू पक्ष ने कहा था कि प्राचीन काल के किसी भी पर्यटक या घुमक्कड़ों ने वहाँ मस्जिद होने का दावा नहीं किया है या ऐसी कोई चर्चा नहीं की है। राजीव धवन ने इस बात को मजाक में उड़ा दिया। उन्होंने 13वीं सदी के उत्तरार्ध में सिल्क रोड पर यात्रा करने वाले व्यापारी मार्को पोलो का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भी ‘ग्रेट वाल ऑफ चीन’ का कहीं भी जिक्र नहीं किया है। हिन्दू पक्ष को जवाब देते हुए धवन ने कहा कि परिक्रमा पूजा तो है लेकिन वह कोई सबूत नहीं है।

मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने दावा किया कि वैदिक काल के दौरान मूर्तिपूजा नहीं होती थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वैदिक काल से पहले कोई मंदिर नहीं हुआ करता था। उन्होंने कहा कि मंदिर या मठ जैसी संस्थाएँ बौद्ध काल के बाद अस्तित्व में आईं। हालाँकि, उन्होंने इस बात को लेकर अस्पष्टता जताई कि मूर्तिपूजन कब से शुरू हुआ।

पाकिस्तानी जेल में कैद कुलभूषण जाधव से मिले भारतीय राजनयिक, 2 घंटे चली मुलाकात

पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव से सोमवार (2 सितंबर) को इस्लामाबाद में भारत के उप उच्चायुक्त गौरव अहलूवालिया ने मुलाक़ात की। मुलाकात पाकिस्तान की एक उपजेल में हुई। अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) के आदेश के अनुसार पाकिस्तान ने जाधव तक राजनयिक पहुँच की दी है।

सूत्रों के अनुसार, 2 घंटे का समय जाधव से मिलने के लिए दिया गया था। जाधव को ईरानी बंदरगाह से अगवा कर पाकिस्तान ने जासूसी और आतंकवाद के जुर्म में 2017 में मौत की सज़ा सुनाई थी। इसके खिलाफ भारत ने आईसीजे का दरवाजा खटखटाया था। भारत की अपील को मानते हुए अंतरराष्ट्रीय अदालत ने सजा के तामील पर रोक लगा दी थी।

जाधव से मुलाक़ात से पहले, अहलूवालिया ने पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल से विदेश मंत्रालय में मुलाक़ात की। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल ने रविवार को ट्वीट कर जाधव को राजनयिक पहुँच उपलब्ध करने की जानकारी दी थी।

इससे पहले, पाकिस्तान ने एक अगस्त को भी जाधव को राजनयिक पहुँच देने की बात कही थी। लेकिन उस वक़्त राजनयिक पहुँच की शर्तो को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेदों के चलते ऐसा नहीं हो पाया था।

7 सितंबर को चाँद पर होगी चंद्रयान की लैंडिंग, 60 बच्चों के साथ PM देखेंगे ये नजारा

भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के लिए आज (सितंबर 2, 2019) बहुत महत्त्वपूर्ण दिन है। आज चंद्रयान-2 का लैंडर ‘विक्रम’ सफलतापूर्वक अपने ऑर्बिटर से अलग हो गया। इसरो से खुद ट्वीट करके इस बात की पुष्टि की।

इसरो ने अपने ट्वीट में जानकारी देते हुए बताया कि भारतीय समय के अनुसार लैंडर ‘विक्रम’ दिन में करीब 1 बजकर 15 मिनट पर अपने ऑर्बिटर से अलग हुआ। जिसके बाद अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस अलगाव को मायके से ससुराल के लिए रवाना होने जैसा बताया।

खुशी की बात ये है कि वैज्ञानिकों ने उच्च स्तरीय बैठक में लैंडर के अलग होने का जो समय बताया था ये अलगाव उसी समय पर हुआ है। इसरो के अनुसार लैंडर विक्रम इस वक्त चन्द्रमा की 119 किमीx127 किमी कक्षा में चक्कर लगा रहा है, वहीं चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर उसी कक्षा में चक्कर लगा रहा है जिसमें वो रविवार को दाखिल हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसरो के वैज्ञानिकों ने रविवार को शाम 6:21 पर सफलतापूर्वक चंद्रयान-2 की कक्षा में बदलाव किया था। जो चाँद की कक्षा में पहुँचने के बाद से पाँचवा और अंतिम बदलाव था। इस बदलाव में महज 52 सेकंड का वक्त लगा। फिलहाल चन्द्रयान चाँद से महज 109 किलोमीटर की दूरी पर रह गया है।

अपने ऑर्बिटर से अलग होने के बाद लैंडर विक्रम अपने भीतर मौजूद प्रज्ञान रोवर को लेकर चाँद की ओर बढ़ने लगा है। 4 सिंतबर के बाद अगले तीन दिनों तक लैंडर विक्रम चाँद के सबसे नजदीकी कक्षा 35×97 में चक्कर लगाता रहेगा। इस बीच मे लैंडर और रोवर की जाँच चलती रहेगी। और इसके बाद 7 सिंतबर को तड़के 1:55 पर लैंडर विक्रम चन्द्रमा के साउथ पोल पर लैंड करेगा। इस लैंडिंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसरो के वैज्ञानिकों की टीम साथ देखेंगे। इस दौरान बंगलुरू स्थित इसरो के ऑडिटोरियम में देश भर से चुने गए 60 बच्चे और उनके अभिभावक भी मौजूद रहेंगे।

जानकारी के लिए बता दें कि इन 60 बच्चों का चयन इसरो द्वारा आयोजित एक ‘स्पेस क्विज़’ जीतने के बाद हुआ है। जिसे 10 अगस्त से 25 अगस्त के बीच आयोजित किया गया था। इसमें भाग लेने वाले सभी बच्चों को भागीदारी के लिए प्रोत्साहन सर्टिफिकेट दिए गए हैं। लेकिन चुनाव सिर्फ़ 60 का ही हुआ है।