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हाई TRP के बावजूद अनिल अम्बानी के स्वामित्व वाला BTVi चैनल अचानक बंद

अनिल अम्बानी के स्वामित्व वाली बीटीवीआई लाइव चैनल अचानक से बंद कर दिया गया है। बिजनेस-इकोनॉमी जॉनर के इस चैनल की टीआरपी रेटिंग भी अच्छी थी। ऐसे में इसे अचानक बंद किया जाना लोगों की समझ में नहीं आया। चैनल ने शनिवार (अगस्त 31, 2019) की अर्धरात्रि से प्रसारण ठप्प किए जाने की घोषणा की। बिजनेस टेलीविजन इंडिया (बीटीवीआई) ने उन सभी लोगों का धन्यवाद किया, जो पिछले 3 वर्षों में चैनल के साथ रहे और इसमें योगदान दिया।

बीटीवीआई की टीआरपी काफ़ी अच्छी थी और अंग्रेजी भाषा के बिजनेस चैनलों में ये लगातार दूसरे स्थान पर रहा था। बीटीवीआई ने बिना किसी चैनल का नाम लिए कहा कि उसने टीआरपी के मामले में कई ऐसे चैनलों को भी पीछे छोड़ दिया, जो पिछले 2 दशक से सक्रिय थे। बीटीवीआई की टीआरपी ‘एनडीटीवी प्रॉफिट’ से काफ़ी अच्छी थी।

बीटीवीआई को 2008 में यूटीवी द्वारा लॉन्च किया गया था और इसका नाम यूटीवीआई था। इसके बाद ब्लूमबर्ग ने इसमें हिस्सेदारी ख़रीदी, जिसके बाद 2009 में इसका नाम ब्लूमबर्ग यूटीवी हो गया। 2012 में अनिल अम्बानी की कम्पनी द्वारा हिस्सेदारी खरीदे जाने के बाद इसका नाम ब्लूमबर्ग टीवी इंडिया हो गया। इसके बाद 2016 में अनिल अम्बानी की कम्पनी और ब्लूमबर्ग के बीच का लाइसेंस एक्सपायर हो गया और इसे रिन्यू नहीं कराया गया। इसी वर्ष चैनल का नाम बीटीवीआई रखा गया।

इंडिया टुडे के पत्रकार शिव अरूर ने ट्वीट कर लिखा कि तिरंगा टीवी और बीटीवीआई का बंद होना बताता है कि मीडिया जगत के लिए यह कठिन परिस्थिति है। बीटीवीआई के पत्रकार आदित्य राज कौल ने लिखा कि हर यात्रा का एक अंत होता है और रात के अँधेरे के बाद ही नया सवेरा निकलता है।

‘जानता है मेरा बाप कौन है’ – यह बीमारी सिर्फ कॉन्ग्रेस में नहीं, हिंदी साहित्य के ठेकेदारों में भी

श्रीलाल शुक्ल जी की महान कृति राग दरबारी में वैद्य जी के पुत्र रुप्पन बाबू के पात्र का परिचय एक कालजयी वाक्य से किया गया है। रुप्पन बाबू का परिचय करवाते हुए शुक्ल जी लिखते हैं, “वे पैदायशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे।”

जिस समय 1968 में शुक्ल जी ने राग दरबारी लिखा था, परिवारवाद नया ही था और स्वतंत्र भारत में कॉन्ग्रेस के प्रथम परिवार की दूसरी ही पीढ़ी उतरी थी। हालाँकि कॉन्ग्रेस के भीतर प्रथम परिवार के लिए नेतृत्व की तीसरी पीढ़ी थी, परन्तु अंग्रेजी राज से ताजा जमींदारी बना देश तब परिवारवाद के दुर्गुणों से पूर्णतया अवगत नहीं हुआ था। यह परिवारवाद राजनीति के अलावा और भी क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा था, यह खुलने में समय लगा जब सम्मान में झुके आम नागरिकों के सर और कृतज्ञता के तले दबे कंधे सीधे होने लगे। तब दिखने लगा कि राजनीति ही नहीं, कला, साहित्य, सिनेमा में भी कई लोग शक्ति का गल्ला थामे इसलिए बैठे हैं, क्योंकि उनके बाप भी सिनेकार या साहित्यकार थे।

साहित्य और भाषा के क्षेत्र में ऐसे सुधिजनों को साहित्य का ठेकेदार या भाषा का दारोगा कहा जा सकता है। भारत की स्थापना के बाद से ही एक शासक दीर्घा बना दी गई और चुने हुए गणमान्य इसमें स्वयं को स्थापित करके बैठ गए। जब-जब ये सत्ता और महत्ता से दूर हुए, इन्होंने प्रयास किया कि भारत विखंडित हो जाए और उससे निकले एक छोटे से भाग में इनकी सत्ता निर्बाध चले। ऐसे लोगों ने भाषा को भाला बनाया और जब-जब इनकी स्थिति पर प्रश्न उठा, ये उससे भारतीय आत्मा को कोंचते रहे। भारतीय भाषा को सूत्र रूप में बाँधने का विरोध करने वाले ये लोग विदेशी भाषा को गौरव पूर्वक अपनाने को तैयार दिखे।

इस सब के बाद भी भाषा का जैसा नुक़सान तथाकथित हिंदी के ठेकेदारों ने किया है, वह संभवतः हिंदी विरोधियों ने नहीं किया। स्वतन्त्रता के बाद के भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमे ठेकेदारों का विशेष स्थान होगा। जब भारत में कोई पुल बनाया जाता है, सबसे पहले अभियन्ता, श्रमिक और सीमेंट वाला नहीं ठेकेदार ढूँढा जाता है। यह ठेकेदार बड़े साहब का साला या साला तुल्य व्यक्ति होता है, जिसकी साहब से सेटिंग होती है जो पुल बनाने की ज़िम्मेदारी प्राप्त करने की प्राथमिक आवश्यकता होती है। ऐसे ही साहित्य के ठेकेदार होते हैं जो स्वयं तो कम लिखते हैं, परन्तु साहित्य के समाज के दरबान बन कर चुँगी वसूलते हैं।

जिस प्रकार पुल का नक्शा पास करवाने की चाभी ठेकेदार के पास होती है, नए लेखकों के लेखन को पास कराने की चाभी इनके पास होती है। आम तौर पर ये उसी कर्तव्यनिष्ठता के साथ अकादमियों पर राज करते हैं जैसे राजनेता आदमियों पर शासन करते हैं। दीक्षा और समीक्षा के मध्य इनका बुद्धिजीवी अस्तित्व होता है। जिसकी दीक्षा इन्हें भाती है, उसकी सकारात्मक समीक्षा ये करते हैं और एक सफल लेखक का निर्माण करके ठेकेदारों की अगली पीढ़ी का निर्माण करते हैं।

पुस्तक प्रदर्शनियों में ये मास्टरशेफ की भॉंति एक प्रकाशक पंडाल से दूसरे पंडाल की ओर शाल संभालते हुए, पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए पाए जाते हैं। जुगाड़ वाले लेखक की अनपढ़ी पुस्तकों को ये क्रांतिकारी और ऐतिहासिक घोषित करते हैं और जुगाड़विहीन लेखक भीड़ में इनके पीछे धकियाए जाते हुए, बमुश्किल संतुलन रख कर सेल्फ़ी खिंचा कर धन्य हो जाता है, क्योंकि वह भी मानता है कि ये महान हैं, क्योंकि इनके बाप भी महान थे और हमारे बाप भी इनके बाप को महान जानते थे।

इसी महानता के दम पर इन्हें “चूहा, फ्रिज, चाय का पतीला” जैसे गद्य और पद्य के मध्य संतुलित संकलन के लिए मित्र सरकारें इन्हें पुरस्कार देती हैं, जिन्हें ये शत्रु राजनैतिक दल के सरकार में आने पर लौटा कर अपने कर्त्तव्य और राजनैतिक निष्ठा का निर्वहन करते हैं। ये अपने खेमे को ऐसे दौर में रचनात्मक निष्पेक्षता का वज़न देते हैं जिसे आम तौर पर इंटेलेक्चुअल हेफ्ट या बौद्धिक पौष्टिकता कहा जा सकता है। क्योंकि इनके पास खाली समय बहुतायत में होता है। ये अमरीका जाकर भारत में हिंदी के विस्तार पर विचार करते हैं।

इस खाली समय में ये हिंदी लिखने में प्रयासरत सामान्य जन के हिज्जे और मात्राएँ सुधारते हैं। सोशल मीडिया इसमें इनकी मदद करता है, जहाँ भोले-भाले लोग निर्दोषमना कुछ लिखते हैं और ये अपने चंद्र बिंदुओं से लैस हो कर उस गरीब पर आक्रमण कर देते हैं। हिंदी के प्रति इनकी प्रतिबद्धता इसी से परिलक्षित होती है कि गंभीर लेखन के नाम पर इन्हें सबसे मौलिक विचार वह लगता है, जिसमें अंग्रेजी लेख के माध्यम से हिंदी को मैथिली और अवधी जैसी भाषाओं का हत्यारा घोषित किया जाता है।

अपने आप में भाषा के उचित उपयोग को सार्वजनिक विस्तार देना बहुत अच्छा कार्य है। किन्तु यह महती कार्य ये केवल विपरीत राजनैतिक दृष्टिकोण के व्यक्तियों के लिए सुरक्षित रखते हैं। हिंदी में हर स्वर के लिए अक्षर और मात्राएँ हैं। यह भी सत्य है कि भाषा में मात्रा का वही महत्व है जो कॉन्ग्रेस में पारिवारिक उपनाम का और दादी जैसी नाक का। मात्रा के बदलने से मातृ भाषा मात्र भाषा रह जाती है। ऐसे में यदि भाषा में सुधार का ज्ञान विरोधी दृष्टिकोण वालों को धमकाने को न किया जाए तो निस्संदेह सम्मान-योग्य है। परन्तु अनुकूल राजनैतिक दृष्टिकोण के व्यक्तियों की त्रुटियों को ‘नर-मादा’ के प्रसाद की भाँति शिरोधार्य करके ये नरपुंगव विपरीत विचारों वालों को पाणिनि बनाने पर डँटे रहते हैं।

जैसे एक कुशल ठेकेदार सीमेंट में रेती मिलाने का विरोध करने वाले इंजीनियर को तत्काल पहचान कर उसे साइट से भगा देता है, हमारे ये भाषायी ठेकेदार नवागंतुक लेखकों को डरा धमका कर भगाने में व्यस्त रहते हैं। दुख का विषय है कि वर्तमान में हिंदी की हिंदी, ऐसी रुप्पन बाबू-नुमा संतानों ने कर रखी है। ये स्वयं को प्रधानमंत्री की अवमानना के लिए स्वतंत्र मानते हैं परन्तु अपने विरोध में उठे एक स्वर पर भी दिल्ली-सुलभ ‘जानता है मेरा बाप कौन है’ का फ़िकरा फ़ेंक के मारते हैं। यह संसार रुप्पनों का है और इसी रुप्पन रीति से चलेगा। प्रसिद्ध पिता के प्रताप से वंचित लेखक व्यंग्य ही लिखेगा और आशा करेगा कि बिना दीक्षा और समीक्षा के न सिर्फ वह छपे वरन पढ़ा भी जाए, इससे पहले कि कोई नाके पर चुँगी वसूलने को प्रस्तुत हो जाए।

घाटी में रक्तपात की पाकिस्तान की नई साजिश, AUM को हमलों के लिए तैयार कर रहा

अपने आतंकी मंसूबों को पूरा करने के लिए पाकिस्तान नई साजिश रच रहा है। घाटी और उसके बाहर भारत के अलग-अलग हिस्सों में रक्तपात की इस साजिश को अंजाम देने की फिराक में बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई जुटा है।

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के बाद से ही पाकिस्तानी घुसपैठ को लेकर लगातार खुफिया इनपुट आ रहे हैं। हालॉंकि सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के कारण पाकिस्तान अब तक अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाया है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जैश और लश्कर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पोल खुलने के कारण आईएसआई ने एक नए नाम से आतंकी संगठन तैयार किया है। इसका नाम अल-उमर-मुजाहिद्दीन (AUM) है। इसका अगुआ मुश्ताक अहमद जरगर उर्फ मुश्ताक लातराम है।

12 जून को अनंतनाग में जवानों पर हुए हमले के पीछे इसका ही हाथ माना जाता है। आईबी की रिपोर्ट के मुताबिक जरगर ने पीओके से नए लड़कों की बहाली की है। AUM का मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है, जहां वह ISI की निगरानी में एक आतंकी शिविर चलाता है। बताया जाता है कि आईएसआई फिदायीन हमले और बड़े शहरों में अंधाधुंध फायरिंग करवाना चाहता है।

एक अन्य मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आईएसआई अधिकारियों और मौलवियों के एक दल ने बीते हफ्ते बलूचिस्तान और पाकिस्तानी पंजाब के इलाकों का दौरा किया है। इसका मकसद आतंकी मंसूबों को पूरा करने के लिए नए लड़कों की बहाली करना है। बताया जाता है कि आईएसआई निहत्थे पाकिस्तानियों की कश्मीर में घुसपैठ कराकर रक्तपात की एक और साजिश पर काम कर रहा है।

सूत्र के हवाले से बताया गया है कि आईएसआई चाहता है कि भारतीय सेना मजबूर होकर निहत्थे लोगों पर गोली चलाए ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के प्रोपगेंडा को मजबूती मिल सके। सूत्रों के मुताबिक इसी कड़ी में फेक तस्वीरें और न्यूजों को भी योजनाबद्ध तरीके से फैलाया जा रहा है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के प्रोपगेंडा को अभी तक दुनिया में किसी ने समर्थन नहीं दिया है। सभी मुल्कों ने कश्मीर को भारत का आंतरिक मसला बताया है। इससे पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। इस बौखलाहट में उसके प्रधानमंत्री इमरान खान परमाणु जंग की धमकी भी दे चुके हैं।

भामाशाह पर राजनीति: वसुंधरा राजे के काम को CM गहलोत ने बताया – क्रांति, किया राजीव गाँधी को याद

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में वसुंधरा राजे सरकार के दौरान लागू किए गए भामाशाह स्वास्थ्य योजना को बंद कराने के बाद अब उसी भामाशाह के नाम पर उसी सरकार द्वारा शुरू किए गए भामाशाह टेक्नो हब की जमकर तारीफ की है। बता दें कि सीएम गहलोत ने भामाशाह स्वास्थ्य योजना को बंद करने के पीछे तर्क दिया था कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना लागू की जाएगी। मगर, गहलोत सरकार ने राजस्थान में लागू होने वाली केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना का नाम बदल कर आयुष्मान भारत महात्मा गाँधी स्वास्थ्य योजना कर दिया था।

शनिवार (अगस्त 31, 2019) को उन्होंने भामाशाह के नाम पर ही चल रहे टेक्नोहब और स्टेट डेटा सेंटर का निरीक्षण किया। इस दौरान सीएम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक टेक्नोलॉजी, थ्री-डी प्रिंटर तकनीक एवं एक्स आर-वी आर तकनीक पर हो रहे काम की काफी प्रशंसा की।

उन्होंने कहा कि वो इसे आईटी की क्रांंति के रूप में देखते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि इस प्रोजेक्ट को देखकर उन्हें राजीव गाँधी की याद आती है और इस प्रोजेक्ट के जरिए उनके उस समय के सपने अभी भी पूरे होने की संभावना बनी हुई है। अशोक गहलोत ने कहा कि राजीव गाँधी ने जो सपना देखा था, उसे यह सेंटर पूरा कर रहा है। उन्होंने इस काम और भी आगे बढ़ाने की बात कही। सीएम गहलोत के ट्वीट को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने री-ट्वीट करते हुए उनका आभार जताया।

गौरतलब है कि साल 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए जयपुर में भामाशाह टेक्नो हब (BTH) का उद्घाटन किया था। वसुंधरा राजे ने कहा था कि इसमें 700 उद्यमियों को एक छत के नीचे काम करने की सुविधा मिलेगी। इस योजना के तहत 1,000 से अधिक स्टार्टअप पंजीकृत करने के साथ ही स्टार्टअप को सभी तरह की सुविधाएँ देने के लिए कई ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनियों जैसे सिस्को नेटवर्किंग एकेडमी, आईबीएम आईएक्स एकेडमी, एचपी एकेडमी, इंफोसिस कैंपस कनेक्ट व ओरेकल वर्कफोर्स के साथ साझेदारी की गई थी।

मीडिया में बने रहने के लिए PAK की भाषा बोलते हैं दिग्विजय और उनके नेता: शिवराज सिंह चौहान

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मीडिया में बने रहने के लिए दिग्विजय सिंह और उनके नेता पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं। भाजपा उपाध्यक्ष ने कह कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के बयान का जिक्र पाकिस्तान अपने पत्र में करता हैं। जहॉं तक भाजपा और आरएसएस का सवाल है तो उनकी देशभक्ति से पूरा देश वाकिफ है।

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री​ दिग्विजय सिंह के बयान पर पलटवार करते हुए उन्होंने यह बात कही है। दिग्विजय ने मध्य प्रदेश के भिंड में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि भाजपा और बजरंग दल के लोग पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से पैसा लेते हैं। साथ ही कहा था कि ISI के लिए जासूसी समुदाय विशेष वाले कम और दूसरे धर्म वाले ज्यादा कर रहे हैं।

इसके जवाब में शिवराज सिंह ने ट्वीट किया, “दिग्विजय सिंह जानबूझकर ऐसी बयानबाज़ी करते हैं। वह और उनके नेता पाकिस्तान की भाषा बोलते हैं। उनकी विश्वसनीयता बची नहीं है। मैं उनके बयान को इसलिए गंभीरता से नहीं लेता, क्योंकि सारा देश संघ और भाजपा की देशभक्ति से परिचित है, हमें दिग्विजय सिंह के प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। दिग्विजय सिंह, ओसामा जी और हाफीज़ जी कहने वाले नेता हैं। वह विवादित बयान इसलिए देते हैं, ताकि सुर्खियों में बने रहें। वे और उनके नेता जो पाकिस्तान चाहता है, वो बोलते हैं। ऐसे नेता को मैं गंभीरता से नहीं लेता और न देश लेता है।”

वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने मीडिया से बात करते हुए दिग्विजय सिंह के बयान को बेहद आपत्तिजनक बताया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को इस बारे में अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने दिग्विजय सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि वो पहले भी भाजपा और संघ को लेकर आधारहीन बयान देते आए हैं।

आरिफ मोहम्मद ने कहा- भारत में पैदा होना खुशनसीबी, लोग बोले- आप सच्चे मुस्लिम

केरल के राज्यपाल नियुक्त किए जाने पर आरिफ़ मोहम्मद खान ने खुशी जाहिर की है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, “यह सेवा करने का अवसर है। मैं खुशनसीब हूँ कि भारत जैसे देश में जन्म लिया, जो अपनी व्यापकता और अपनी विविधताओं के कारण धनी है। मेरे लिए भारत के इस हिस्से को जानने का ये बहुत बड़ा अवसर है, ये भारत की सीमा का निर्माण करता है, जिसे भगवान का अपना देश भी कहा जाता है। “

गौरतलब है कि 1986 में शाह बानो मामले में राजीव गाँधी की कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले आरिफ़ मोहम्मद अभी हाल ही में ‘द वायर’ के एक इंटरव्यू में बेबाकी से अपनी राय रखते नजर आए थे। इस साक्षात्कार में केरल के नए राज्यपाल ने कई भ्रांतियों को ध्वस्त करते हुए अपनी बात रखी थी। इसके अलावा बीते दिनों तीन तलाक को गैर कानूनी बनाने जैसे कई मुद्दों पर मोदी सरकार के फैसलों का समर्थन कर चुके हैं।

उनके राज्यपाल नियुक्त होने से सोशल मीडिया पर यूजर्स भी काफी खुश नजर आ रहे हैं। लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कह रहे हैं कि वो इस पद के काबिल थे और वो एक सच्चे मुस्लिम हैं, जिन्होंने हमेशा भारत के लिए सोचा।

यूजर्स इस खबर के बाद मोदी सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि आरिफ मोहम्मद जैसे नेताओं को राजनीति में बढ़ावा देकर देशभक्ति को परिभाषित करे।

इसके अलावा केरल के नए राज्यपाल की सोच और उनके ज्ञान को भी लोग खूब सराह रहे हैं और उनके केरल के गवर्नर के रूप में उत्कृष्ट विकल्प मान रहे हैं।

प्रगतिशील मुस्लिम चेहरे के तौर पर पहचान रखने वाले आरिफ़ मोहम्मद ख़ान वंदे मातरम का उर्दू में अनुवाद कर चुके हैं। शाहबानो मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया था और मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार का विरोध किया था। तीन तलाक बिल पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री ने उनके बयान का हवाला भी दिया था।

हमारे पास सभी आकार के स्मार्ट बम हैं, भारत के 22 टुकड़े करेंगे: करंट लगने के बाद पाक मंत्री का नया दावा

पाकिस्तान के रेलमंत्री शेख रशीद अहमद ने अजीबोगरीब दावे किए हैं। लंदन में अंडों से पिट चुके पाकिस्तानी मंत्री ने दावा किया कि उनके देश के पास बड़ी संख्या में ‘स्मार्ट बम’ हैं। शेख रशीद वही मंत्री हैं, जिन्हें मोदी का नाम लेते ही करंट लगा था। जम्मू-कश्मीर की जनता के प्रति कथित एकजुटता दिखाने समय शेख रशीद ने जैसे ही माइक लेकर पीएम मोदी को कोसना शुरू किया, उन्हें जोर का झटका लगा। हमेशा विवादों में रहने वाले शेख रशीद सुर्ख़ियों में रहने के लिए अपना ही मज़ाक बनाते रहते हैं।

शेख रशीद ने दावा किया कि पाकिस्तान के पास हर आकार के ‘स्मार्ट बम’ हैं। पाकिस्तानी मंत्री ने भारत के टुकड़े कर के 22 पाकिस्तान बनाने का दावा भी किया। उन्होंने एनआरसी जैसे भारत के आंतरिक मुद्दों पर भी टिप्पणी की। रशीद ने कहा कि एनआरसी का उद्देश्य उनके मजहब वालों को रास्ते से हटाने के लिए किया गया है। बता दें कि घुसपैठियों को चिह्नित कर उन्हें वापस प्रत्यर्पित करने के लिए भारत सरकार ने एनआरसी सूची तैयार की है।

पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि भारतीय अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने के लिए एनआरसी तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि असम, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में उनके मजहब के लोगों को नीचा दिखाया जा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिटलर और मुसलोनी जैसे तानाशाहों की सूची में रखते हुए कहा कि उनके लिए समुदाय विशेष के 25 करोड़ का सामना करना असंभव होगा। उन्होंने इमरान ख़ान की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्हीं की बदौलत आज अंतरराष्ट्रीय मीडिया जम्मू-कश्मीर पर ध्यान दे रहा है और उसके बारे में आर्टिकल लिख रहा है।

पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद ने दावा किया कि पाकिस्तानी फ़ौज की तैयारियों पर बयान देने के लिए फ़ौज ने उन्हें रखा हुआ है। हालाँकि, आधिकारिक रूप से पाकिस्तान में यह काम आसिफ गफूर का है लेकिन आजकल वे बॉलीवुड पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हाल ही में गफूर ने शाहरुख़ ख़ान को कश्मीरियों के लिए कथित आवाज़ उठाने को कहा था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के पास 75% ‘मिसाइल टेक्नोलॉजी’ है और 25% ‘एयर टेक्नोलॉजी’ है।

शेख रशीद ने अपने देश के विदेश मंत्री से अपील की कि वे जम्मू-कश्मीर को लेकर इस्लामी राष्ट्रों को लगातार पत्र लिखते रहें और प्रतिदिन ऐसा करें। ख़ुद को फ़ौज द्वारा नियुक्त बताते समय शेख रशीद ये भूल गए कि पाकिस्तान की सरकार लोकतान्त्रिक रूप से चुनी होने का दावा करती है।

हिन्दू होने के नाते भारत की राष्ट्रीयता मिल जाने का प्रावधान जब तक लागू नहीं होगा, तब तक…

थोड़े ही दिन पहले सोशल मीडिया की बड़ी बहसों का मुद्दा रहा – ज़ोमैटो। मेट्रो ही नहीं, टायर टू कहे जाने वाले पटना, इंदौर, भोपाल, लखनऊ जैसे शहरों में भी इसके कर्मी सड़कों पर निकलते ही बड़ी आसानी से नजर आ जाते हैं। हाल में इनके बारे में परिवहन विभाग में पूछताछ की तो पता चला कि वैसे तो मोटरसाइकिल के लिए भी कमर्शियल और प्राइवेट के नियम बने हैं, मगर ये कंपनी अपने लिए चलने वाली मोटरसाइकिल को कमर्शियल की लिस्ट में डालती है या नहीं ये आरटीआई के लायक मुद्दा है। इस बारे में कोई भी सीधा बताने को तैयार नहीं हुआ।

मोटे तौर पर खाना पहुँचाने वाली ये कंपनी करती क्या है? इनके खुद के कोई किचन-रेस्तरां हैं क्या? जी नहीं, इनका खुद का खाना बनाने का कोई इंतजाम नहीं होता। इनके पास एक लिस्ट ग्राहकों की होती है और दूसरी शहर भर के रेस्तरां की लिस्ट होती है। उन्हें पता है कि आपके बजट में आपकी पसंद का व्यंजन कहाँ मिलेगा। वो बस आपके लिए आपकी पसंद का व्यंजन आपके घर पहुँचाने के दलाल हैं। बिलकुल ऐसे ही दलाल ओला/उबर या फिर ओयो वाले भी हैं। ओला/उबर वालों के पास अपनी कोई टैक्सी नहीं, ओयो वालों के पास अपना कोई होटल नहीं। ये आपकी जरुरत को आपके बजट में पूरा कर देने की दलाली लेते हैं।

दलालों का ये परिष्कृत और स्वीकार्य रूप जब देख चुके तो सोचिए कि सरकारी दफ्तरों पर क्या होता है? आपको फॉर्म भरना नहीं आता, फॉर्म कहाँ जमा करना है ये नहीं पता। ऐसी दर्जन भर जरुरतें होती हैं जिसकी वजह से पासपोर्ट ऑफिस, ड्राइविंग लाइसेंस बनने की जगह या ऐसे दूसरे सरकारी दफ्तरों के बाहर दलालों की पूरी एक व्यवस्था ही काम करती है। ऐसे ही दलालों ने पिछले दशकों में वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक बनवा डाले होंगे। यानी आप जिसे घुसपैठिया समझ रहे हैं, वो सरकारी दस्तावेजों के हिसाब से एक साधारण नागरिक से ज्यादा नागरिकता रखता है। ऐसे में एनआरसी का क्या होगा?

बात यहीं ख़त्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी। एनआरसी के हालिया समाचार बताते हैं कि करीब-करीब 19 लाख लोगों का आँकड़ा जो उन्होंने निकाला है, उसमें से अधिकांश हिन्दू ही हैं। ये संभवतः वो गरीब मजदूर होंगे, जो एक पीढ़ी पहले वहाँ गए और वहीं के होकर रह गए। दूसरी तरफ बांग्लादेश पहले से ही अड़ा हुआ है कि उसकी सीमा से भारत में कोई अवैध घुसपैठ हुई ही नहीं है! पिछले महीने मंत्री एस जयशंकर कह चुके हैं कि एनआरसी एक आतंरिक प्रक्रिया है और इससे बांग्लादेश को चिंतित होने की जरूरत नहीं। वहीं अमित शाह कहते हैं कि अवैध घुसपैठ बांग्लादेश से जुड़ा मुद्दा ही है!

जिन उन्नीस लाख लोगों को एनआरसी से बाहर किया गया है, उनकी अपील को अगर फोरेनर ट्रिब्यूनल ने ठुकरा दिया तो उन्हें लम्बी कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ेगी। इन सबके बीच याद दिला दें कि एक सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल भी आया था, जिसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। करीब पाँच साल का वक्त और 1000 करोड़ से ऊपर की धनराशी खर्च करने के बाद अगर एनआरसी के जरिए भारतीय नौकरशाही कोई फायदा नहीं पहुँचा पाई है, तो उसके निकम्मेपन पर ये एक और मेडल ही होगा। अगर गौर से सोचा जाए तो शायद एनआरसी की सोच में ही कमी है। सेक्युलर सोच के साथ बने इस नियम के बदले भारत को हिन्दुओं का नैसर्गिक देश मान कर काम शुरू होना चाहिए था।

वो बांग्लादेश या पाकिस्तान में जारी शोषण और लड़कियों के जबरन अपहरण, बलात्कार, और फिर विवाह का सामना नहीं कर सकते, ये काफी पहले ही तय हो गया था। जब इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल इस जय भीम के साथ जय मीम को जोड़ने के मुगालते से बाहर आए, तभी वो सब कुछ छोड़ कर 1950 के दौर में भारत लौट आए थे। गुमनामी की मौत मरे जोगेंद्र नाथ मंडल की गलतियों से सीखकर सिर्फ हिन्दू होने के नाते भारत की राष्ट्रीयता मिल जाने का प्रावधान जब तक लागू नहीं होगा, तब तक ऐसी समस्याएँ जारी रहेंगी।

बाकी रहा कागज़ी तौर पर नागरिकता सिद्ध करने का सवाल तो उसके लिए दलाली की अर्थव्यवस्था को तोड़ना होगा। अफसरशाही के शामिल रहते और नागरिकों के दलाली को एक जीवनशैली मानने के दौर में ये दलाली ख़त्म होगी, ये सोचना भी एक सपने जैसा ही है!

बंगाल: BJP सांसद अर्जुन सिंह की कार पर TMC गुंडों का हमला, पार्टी कार्यालय पर कब्जे की कोशिश

पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद अर्जुन सिंह की कार पर हमला हुआ है। हमलावार सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस से जुड़े बताए जा रहे। हमला उत्तर 24 परगना के श्यामनगर रेलवे स्टेशन के पास हुआ।

अर्जुन सिंह के मुताबिक टीएमसी के लोग भाजपा के कार्यालय पर कब्जे की कोशिश कर रहे थे। इसकी जानकारी मिलने पर जब सिंह मौके पर पहुॅंचे तो उनकी कार में तोड़फोड़ की गई। सिंह ने बताया कि घटना के वक़्त पुलिस भी मौके पर मौजूद थी।

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गौरतलब है कि राजनीतिक हिंसा के लिए बदनाम रहे पश्चिम बंगाल में अरसे से भाजपा से जुड़े लोगों को टीएमसी कार्यकर्ता निशाना बनाते आ रहे हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष पर बीते शुक्रवार को ही हमला किया गया था। उसी दिन उत्तर 24 परगना जिले के उत्तर बनगांव क्षेत्र के विधायक व भाजपा नेता विश्वजीत दास पर भी हमला हुआ था।

सांसद अर्जुन सिंह पर भी पूर्व में हमला हो चुका है। अर्जुन सिंह पहले TMC में ही थे। वो 14 मार्च 2019 को बीजेपी में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें बैरकपुर लोकसभा सीट से दिनेश त्रिवेदी के ख़िलाफ़ खड़ा किया था। कड़े मुक़ाबले में अर्जुन सिंह ने त्रिवेदी को 14857 मतों से हरा दिया था।

ख़बर के अनुसार, 25 जुलाई की रात अर्जुन सिंह के आवास पर गोलीबारी करते हुए बम फेंक कर हमला किया गया था। इस घटना से संबंधित मामला 24 परगना ज़िले में जगतदल पुलिस थाने में दर्ज है। लोकसभा चुनाव में वोटिंग के दौरान भी बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने ख़ुद पर TMC के कार्यकर्ताओं के द्वारा हमले का आरोप लगाया था।

‘Oxford English’ से नहीं, मोदी-विरोध से ही जीते हो लोकसभा चुनाव: थरूर को कॉन्ग्रेस सांसद ने लताड़ा

कॉन्ग्रेस वालों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंधे विरोध की कितनी बुरी लत लग गई है, इसका नज़ारा हर दूसरे-तीसरे दिन सामने आ रहा है। केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी द्वारा स्पष्टीकरण माँगने, सोनिया गाँधी द्वारा ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताए जाने और वीरप्पा मोइली द्वारा ‘पब्लिसिटी का भूखा’ कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर अब केरल के साथी सांसद के मुरलीधरन के निशाने पर हैं।

वडकर से सांसद मुरलीधरन ने कहा है कि थरूर मोदी विरोध के चलते ही सांसदी जीते हैं, अपनी ‘Oxford English‘ से नहीं। गौरतलब है कि शशि थरूर आम तौर पर अंग्रेज़ी शब्दावली के शीर्ष समकालीन जानकारों में गिने जाते हैं और इसी के चलते कभी प्रशंसा तो कभी मज़ाकिया आलोचना का भी केंद्र बने रहते हैं।

मुरलीधरन ने बिना थरूर का नाम लिए कटाक्ष करते हुए कहा कि (थरूर की लोकसभा सीट) तिरुवनंतपुरम के पूर्व सांसद ए चार्ल्स “Oxford English” नहीं जानते थे, तब भी वे वहाँ से तीन बार जीतने में सफल रहे थे।

बवाल काटना शुरू हुआ जब शशि थरूर ने अपने साथी जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा दी गई नसीहत का समर्थन किया। रमेश ने कहा था कि हर समय मोदी की आलोचना करने से कुछ हासिल नहीं होगा। उनकी सरकार के सही कामों की तारीफ होनी चाहिए। उसी में जोड़कर सिंघवी ने कह दिया कि उज्ज्वला योजना सहित मोदी सरकार के अच्छे काम भी हैं और थरूर ने उस पर एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में लिखा कि वे तो 6 साल से मोदी की न्यायोचित तारीफ पर ज़ोर दे रहे हैं, ताकि जब वे आलोचना करें तो उसमें कोई विश्वसनीयता हो।

आलोचनाओं का बवंडर

उसके बाद मोदी की आलोचना तो थमी नहीं, थरूर के खिलाफ कॉन्ग्रेस नेताओं का पूरा सैलाब उमड़ पड़ा। ‘अंतरिम’ अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने उनके बयान को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया, पार्टी के सांसद ही उन पर टूट पड़े और फिर केरल की प्रदेश कॉन्ग्रेस ने उनसे स्पष्टीकरण माँग लिया। वीरप्पा मोइली ने उन्हें ‘पब्लिसिटी का भूखा’ बताया। इस बीच खिसियाए थरूर ने भी कॉन्ग्रेस वालों को नसीहत दे डाली।

“मैं नरेंद्र मोदी सरकार का एक कठोर आलोचक रहा हूँ और मुझे उम्मीद है कि सकारात्मक आलोचक रहा हूँ। समावेशी मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के कारण ही मैंने लगातार 3 बार चुनाव जीता है। मैं अपने कॉन्ग्रेस के साथियों से निवेदन करता हूँ कि मेरे विचारों की कद्र करें, यदि वे उससे सहमत नहीं हैं, तब भी।”