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पाकिस्तान को एक और झटका: अब नदी-पानी की जानकारी भी साझा नहीं करेगा हिंदुस्तान

370 हटने के बाद से पाकिस्तान के प्रोपेगंडा और जम्मू-कश्मीर पर नाजायज़ हक के खिलाफ हिंदुस्तान का रवैया दिन-ब-दिन सख्त होता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्रालय के दूसरे देशों को मामले से दूर रहने की सख्त हिदायत, पाकिस्तान के राजनयिक-व्यापारिक संबंध खत्म करने पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया न देने, सिंधु जल-संधि का अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को और न देने के फैसले के बाद अब पाकिस्तान को हिंदुस्तान से नदियों के बहाव-संबंधी हाइड्रोलॉजिकल जानकारी भी नहीं मिलेगी।

भारतीय सिंधु जल आयोग के आयुक्त पीके सक्सेना के हवाले से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दावा किया है कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच 1989 में पहली बार हुए और सालाना तौर पर नवीनीकृत होने वाले इस बाबत समझौते को हिंदुस्तान ने आगे न बढ़ाने का निश्चय किया है। यह समझौता हमारी पाकिस्तान के प्रति सद्भावना के भाव-प्रदर्शन के तौर पर चलता था। अब हिंदुस्तान केवल जलबहाव की अति होने और बाढ़ के मामले में पाकिस्तान को कोई सूचना देगा।

सिंधु समझौता नहीं तोड़ेंगे

हालाँकि, हिंदुस्तान इस समझौते को आगे न बढ़ा कर बाढ़ के वार्षिक मौसम (1 जुलाई से 10 अक्टूबर) के समय में इस समझौते के अंतर्गत जो जानकारियाँ दी जानी हैं, वह अब और नहीं देगा, लेकिन सक्सेना ने यह साफ़ किया कि इस समझौते का सिंधु जल समझौते पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा; दोनों अलग-अलग हैं। सिंधु जल समझौते के अंतर्गत जो कुछ सूचना जलबहाव की अति होने और बाढ़ के मामले में पाकिस्तान को दी जानी है, हिंदुस्तान केवल उतनी ही बात पाकिस्तान को बताएगा।

इसके पहले केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बयान दिया था कि हिंदुस्तान अब सिंधु जल समझौते के तहत अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान को और नहीं लेने देगा। बुधवार को ANI से बात करते हुए शेखावत ने कहा, “हिंदुस्तान के हिस्से के पानी में से काफी ज्यादा पाकिस्तान को चला जाता है। इनमें से कई नदियाँ रावी, व्यास और सतलज तंत्र की उपनदियाँ हैं, और इनके कैचमेंट एरिया (हौज़, जलग्रहण क्षेत्रों) में से पानी उस तरफ (पाकिस्तान को ) चला जाता है। हम इस पर तेज़ी से काम कर रहे हैं कि कैसे हमारे हिस्से का पानी जो पाकिस्तान में चला जाता है, उसे घुमा कर अपने किसानों, उद्योगों और लोगों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जा सके।”

उन्होंने इस योजना की तकनीकी और जलशास्त्रीय (हाइड्रोलॉजिकल) अनुकूलता पर शोध शुरू करने की भी बात कही। उनके अनुसार उन्होंने इस विषय पर अध्ययन जल्दी खत्म करने का निर्देश दिया है, ताकि योजना को अमली जामा पहनाया जा सके

‘कार्ति ने मुझसे 1 मिलियन डॉलर माँगे थे’- इन्द्राणी का वो वीडियो, जिसमें है ‘चिदंबरम मामले’ की असली कहानी

टाइम्स नाउ ने ट्विटर पर इन्द्राणी मुखर्जी का वो वीडियो शेयर किया है, जिसमें इंद्राणी ने बताया था कि चिदंबरम ने उनसे अपने बेटे कार्ति की मदद करने की बात की थी। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की गिरफ्तारी में इंद्राणी मुखर्जी बीच की एक अहम कड़ी हैं।

पी चिंदबरम से सीबीआई (CBI) ने गिरफ्तारी के बाद बृहस्पतिवार को करीब तीन घंटे से ज्यादा देर तक पूछताछ की। इस दौरान अधिकारियों ने उनसे आईएनएक्स मीडिया केस को लेकर कई सवाल पूछे। रिपोर्ट्स के अनुसार, सीबीआई ने उनसे पूछा कि चिदंबरम की इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी से कितनी मुलाकातें हुईं? और वो इन्द्राणी मुखर्जी को कैसे जानते हैं? CBI द्वारा चिदंबरम से पूछा गया- “क्या पैसों की लेन-देन को लेकर कोई बात हुई थी? जब INX मीडिया मामला से जुड़े महत्वपूर्ण फैसला हुआ था, तो कितने लोग बैठक में थे?”

टाइम्स नाउ द्वारा जारी किया गया यह वीडियो 2018 का है। आईएनएक्स मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग केस में इंद्राणी मुखर्जी ने जाँच एजेंसियों को दी गवाही में कहा था कि पी चिदंबरम से उनकी मुलाकात हुई थी। पूर्व वित्त मंत्री ने उनसे अपने बेटे के बिजनेस में मदद की बात कही थी। टाइम्स नाउ के पास इंद्राणी के साथ बातचीत का एक्सक्लूसिव वीडियो है। जिसमें इंद्राणी कहती दिख रही हैं कि उनकी चिदंबरम से मुलाकात हुई थी। चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम से मिलने और मदद की बात भी इंद्राणी ने स्वीकार की है।

इस विडियो में शुरुआत में इंद्राणी मुखर्जी कहती हैं- “आपको पता चल जाएगा… कल पता चल जाएगा।” लेकिन फिर वह मुलाकात की बात स्वीकार भी करती हैं।

वीडियो में बातचीत इस तरह से है –

रिपोर्टर: सिर्फ जानना चाहती हूँ, क्या आप चिदंबरम से 2008 में मिली थीं?
इंद्राणी: हाँ, कार्ति से
रिपोर्टर: नहीं, मिस्टर पी. चिदंबरम से
इंद्राणी: हाँ हाँ, 2007 में
रिपोर्टर: और पी. चिदंबरम ने क्या कहा था उस वक्त जब आप उनसे नॉर्थ ब्लॉक में मिलीं?
इंद्राणी: आपको पता चल जाएगा। मैं नहीं कर सकती हूँ प्लीज, ऐसा नहीं कर सकती। आप जानती हैं यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: लेकिन कार्ति कह रहे हैं कि आप लगातार झूठ बोल रही हैं?
इंद्राणी: आपको पता चल जाएगा, आपको पता चल जाएगा, यह बात, वो जो भी कहना चाहें कह सकते हैं।
रिपोर्टर: क्या मिस्टर चिदंबरम ने वाकई आपसे अपने बेटे कार्ति की मदद करने के लिए कहा था?
इंद्राणी: मैं यहाँ पर कुछ नहीं कह सकती, सब पता चल जाएगा। हाँ-हाँ, कहा था उन्होंने। मैं यहाँ पर कुछ नहीं कह सकती। आपको समझना होगा मैं क्या कह रही हूँ, यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: उन्होंने आपसे शब्दश: क्या कहा था?
इंद्राणी: मैं नहीं बता सकती हूँ, सीरियसली, यह गोपनीय है।
रिपोर्टर: हम सिर्फ समझने के लिए पूछ रहे हैं। मिस्टर चिदंबरम अपने वकीलों से बार-बार कह रहे हैं कि आप झूठ बोल रही हैं।
इंद्राणी: मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने वकीलों से क्या कह रहे हैं। यह मेरी प्रॉब्लम नहीं है। मैं एक गवाह हूँ, इसलिए मुझे कोई परेशानी नहीं है।
रिपोर्टर: उन्होंने आपसे क्या कहा? क्या उन्होंने आपसे बेटे की मदद करने को कहा था?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने कहा था।

रिपोर्टर: क्या जब आप कार्ति से मिली थीं, तो कार्ति ने सीधे आपसे पैसों की माँग की?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने ऐसा ही किया
रिपोर्टर: डिमांड कितनी थी?
इंद्राणी: 1 मिलियन डॉलर
रिपोर्टर: कार्ति ने स्पष्ट तौर पर अपने मुँह से यह कहा?
इंद्राणी: हाँ, उन्होंने कहा था
रिपोर्टर: क्या आपने यह सब कोर्ट में कहा है कैमरे के सामने?
इंद्राणी: हाँ, मैंने कहा है।

रिपोर्टर: पिता और बेटे दोनों का कहना है कि आप ऐसी महिला हैं जिस पर यकीन नहीं किया जा सकता?
इंद्राणी: ये उनकी समस्या है और वो दोनों मुझ पर यकीन नहीं करते हैं, इससे मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है।
रिपोर्टर: क्या पैसा आपने दिया था?
इंद्राणी: कोर्ट को मुझ पर यकीन करना है, ये (पैसा देने की बात) आपको पता चल जाएगा।

जाँच एजेंसियों के अनुसार इंद्राणी और पीटर ने अपने बयान में कहा है कि वे एफआईपीबी की मंजूरी दिलाने के लिए पी. चिदंबरम से उनके नॉर्थ ब्लॉक स्थ‍ित ऑफिस में मिले थे। तब चिदंबरम ने उनसे कहा था कि वह उनके बेटे कार्ति की कारोबार में मदद करें। इंद्राणी मुखर्जी पहले ही शीना बोरा मर्डर केस में जेल की सलाखों के पीछे है।

‘चिदंबरम चोर है’ कहने पर कॉन्ग्रेसियों ने पीटा; ‘चलो, किसी के लिए तो ख़ून खौला’-The Hindu की संपादक का बयान

यदि मुख्यधारा के मीडिया के पत्रकारों की बात की जाए, तो वो भी किसी राजनीतिक दल से कम नहीं होता। ग़ौरतलब है कि INX मीडिया घोटाले में पी चिदंबरम की संलिप्तता के चलते उन्हें CBI और ED ने हिरासत में लिया था। इस दौरान उनके आवास पर कई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी इकट्ठे थे। टाइम्स नाउ की पत्रकार पद्मजा जोशी ने कल (21 अगस्त) रात ट्वीट किया कि एक व्यक्ति जो ‘चिदंबरम चोर है’ चिल्ला रहा था, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी पिटाई कर दी।

लोकसभा चुनाव के दौरान, तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी राफ़ेल डील को लेकर पीएम मोदी की छवि धूमिल करने के लिए ‘चौकीदार चोर है’ के जुमले को ख़ूब भुनाया था, जबकि इस डील की हक़ीक़त सबके सामने आ चुकी थी जब मोदी सरकार ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट संसद में पेश की थी। तब यह बात स्पष्ट हो गई थी कि UPA के मुक़ाबले NDA के शासनकाल में 2.86% सस्ती डील फाइनल की गई थी। पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस के ‘चौकीदार चोर है’ के हमले का पलटवार करते हुए ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान शुरू किया, जहाँ उन्होंने कहा कि कुलीन वर्ग हमेशा मेहनतकश लोगों का मज़ाक उड़ाता आया है। अब बारी ‘चिदंबरम चोर है’ की है जिसका अभी विस्तार होना बाक़ी है।

हालाँकि, द हिंदू की पॉलिटिकल एडिटर, निस्तुला हेब्बर को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने पद्मजा जोशी के ट्वीट का पलटवार करते हुए लिखा, “चलो, किसी के लिए तो ख़ून खौला! पॉलिटिकल पार्टी होने का एहसास तो हुआ।”

निस्तुला हेब्बर को एक ट्विटर यूज़र ने आइना दिखाते हुए लिखा, “ऐसे ही कोई गौ तस्कर पकड़ में आ जाए और पीट दिया जाए तो ये मोहतरमा सबसे पहले असहिष्णु और मॉब लिंचिंग का रोना रोएँगी।”

हेब्बर ने अपने हिंसा के समर्थन वाले ट्वीट का बचाव यह कहकर किया कि उनके ट्वीट को ग़लत संदर्भ से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने यूज़र को जवाब में लिखा, “तुम्हारा दिमाग ख़राब है। यह टिप्पणी कॉन्ग्रेस की प्रतिक्रिया पर थी। इडियट।”

कुछ राजनेता पत्रकारों को ऐसा समझते हैं जैसे वो दूसरों की तुलना में अधिक ‘न्यूट्रल’ हों।

BJP को कश्मीर घाटी में मिली बड़ी जीत; बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर में पार्टी से जुड़े 23,000 कार्यकर्ता

भाजपा द्वारा 20 अगस्त को समाप्त हुए सदस्यता अभियान में तीन करोड़ से अधिक सदस्यों को शामिल किए जाने की ख़बर है, जो मौजूदा संख्या के 20 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक है।

पार्टी में 3,78,67,753 नए सदस्य शामिल हुए, जबकि नेताओं का कहना है कि इस आँकड़े को संशोधित किया जाएगा क्योंकि अभी कुछ विवरण आने बाक़ी हैं। यदि मौजूदा 11 करोड़ सदस्यों को ध्यान में रखा जाए तो सत्ताधारी पार्टी की वर्तमान सदस्यता संख्या 14,78,67,753 होगी।

इस बीच, जम्मू और कश्मीर में, पार्टी ने 3,50,174 नए सदस्यों (ऑनलाइन) का नामांकन किया है, जिनमें से 23,000 अशांत घाटी के तीन ज़िलों- बारामूला, श्रीनगर और अनंतनाग से हैं।

भाजपा के उपाध्यक्ष और अब केंद्र शासित प्रदेश के प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कहा कि यह संख्या बढ़ जाएगी जब अंतिम सात लाख सदस्यता पर्चियों की गिनती हो जाएगी। उन्होंने कहा कि पार्टी 20 प्रतिशत नए सदस्यों के लक्ष्य को पार कर जाएगी।

खन्ना का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा के 5,20,959 सदस्य थे, जिनमें से लगभग एक लाख अकेले घाटी में थे। उन्होंने कहा,

“जम्मू और कश्मीर में भी हम लक्ष्य से परे सदस्यों का नामांकन करने में सक्षम हैं। मुझे पूरा यकीन है कि नवगठित केंद्र शासित प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री भाजपा का होगा। केंद्र सरकार की योजनाओं से लोगों को वास्तव में लाभ हुआ है।” 

भाजपा के उपाध्यक्ष ने कहा कि वहाँ के लोगों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव आ रहा है। नेताओं को उम्मीद है कि देश भर से डेटा एकत्र होने के बाद देश भर में नए सदस्यों की संख्या लगभग 5 करोड़ तक बढ़ जाएँगे।

आजादी कॉन्ग्रेसियों की बपौती नहीं, कालिख पोत कर सावरकर को काला नहीं कर सकते

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन ‘नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI)’ ने आधी रात में वीर सावरकर की प्रतिमा को जूतों का हार पहनाया और चेहरे पर कालिख पोत दी। ऐसा करके वो यह सोच रहे होंगे कि सावरकर के पूरे योगदान पर कालिख पोत डाली। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि आजादी के इतिहास पर कॉन्ग्रेसियों की बपौती नहीं। भले ही, कॉन्ग्रेस चाटुकार, उपन्यासकार रुपी इतिहासकार और नेहरू घाटी सभ्यता में पले नेताओं के लिए नेहरू ही पिस्तौल लेकर अल्फ्रेड पार्क गए थे, 23 मार्च 1931 को फाँसी भी नेहरू ही चढ़े, लंदन में जनरल डायर को भी नेहरू ने ही मारा… वस्तुतः नेहरू दशावतार में 11वें थे, लेकिन वास्तविकता इससे ज्यादा दूर नहीं हो सकती थी।

मैं हाल ही में वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल का एक पुराना वीडियो देख रहा था जिसमें वह हिंदुस्तान का इतिहास हिन्दुस्तानियों द्वारा लिखे जाने पर बल देते हैं। अंग्रेजों द्वारा बोगस ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ (‘आर्यन इन्वेज़न थ्योरी’), भारत के इतिहास में केवल बाहरी संस्कृति और धर्म के लोगों के बारे में पढ़ाए जाने आदि को ब्रिटिश शासन का नैतिक औचित्य तैयार करने में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इस ओर इंगित किया किया कि आर्य आक्रमण सिद्धांत ने हिन्दुस्तानियों में यह भ्रान्ति भर दी कि हज़ारों वर्ष से बाहरियों से शासित होते रहना ही उनकी नियति है, तो एक और शासक (अंग्रेज़ों) के बूटों तले पिसने में अलग क्या है?

इसी तरह केवल आक्रांताओं की जीत का इतिहास पढ़ाना और इस देश के व्यक्तित्वों, जैसे ललितादित्य मुक्तपीड़, सुहेलदेव पासी (जिन्होंने 1033 में बहराईच की लड़ाई में मुहम्मद ग़ज़नवी के भतीजे को वह धूल चटाई कि अगले 170 साल इस्लामी आक्रांता हिंदुस्तान का रुख करने में घबराते रहे), डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना ही नहीं, कम्पनी तक की कब्र खोद देने वाले केरला के शासक मार्तण्ड वर्मा आदि को हटा देने से ‘हम जब सारी लड़ाईयाँ हार ही जाते रहे हैं तो अंग्रेज़ों से भी हार गए’ का झूठा कथानक (नैरेटिव) गढ़ना आसान हो गया।

कथानक की भूमिका के संदर्भ में उन्होंने एक पुरानी अफ़्रीकी कहावत उद्धृत करते हुए कहा, “जब तक शेरों के अपनी कहानी सुनाने वाले कहानीकार नहीं होंगे, शिकार का इतिहास हमेशा शिकारी की ही बड़ाई करेगा।” हिन्दुओं के लिए भी यह लागू होता है- जब तक हिन्दुओं की कहानी गैर-हिन्दू (विशेषतः अब्राहमी, मार्क्सवादी, हिन्दूफ़ोबिया पर आधारित भारतीय सेक्युलरिज़्म के कट्टरपंथी) सुनाते रहेंगे, विनायक दामोदर सावरकर जैसे हिन्दुओं के हितों की बात करने वाले किरदार ‘वीर’ की उपाधि खोते रहेंगे, उनके पत्र के एक वाक्य को उठाकर उन्हें ‘अंग्रेजों से माफ़ी के लिए गिड़गिड़ाने वाला चाटुकार’ कहकर अपमानित किया जाता रहेगा।

भ्रामक प्रोपेगेंडा पढ़ाएँगी किताबें

राजस्थान की इतिहास की किताबों में कॉन्ग्रेस लिखवा रही है कि सावरकर ने अपने साथ सेल्युलर जेल में हुए अत्याचार से टूट कर जेल से छूटने के लिए खुद को ‘पुर्तगाल का बेटा’ कह दिया, जेल से निकलने के बाद उन्होंने गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का समर्थन नहीं किया, हिन्दुओं को ‘मिलिटराइज़’ करने (सीधी भाषा में, हिन्दुओं में नक्सली और तालिबान जैसे तत्व खड़े करने) का आह्वाहन किया, और गाँधी जी की हत्या के बाद उन्हें भी उस हत्या के मुकदमे में नामजद किया गया था

ऊपरी तौर पर यह सभी ‘तथ्य’ सही मालूम पड़ते हैं- सिवाय इसके कि सावरकर ने खुद को ‘पुर्तगाल का बेटा’ (son of Portugal) नहीं, ‘भटका हुआ बेटा’ (Prodigal Son) कहते हैं। लेकिन इतिहास केवल सूखे तथ्यों से नहीं बनता, न ही परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि और परिणाम से काट कर किसी घटना का विश्लेषण किया जा सकता है। और इन सभी घटनाओं को, जो सावरकर के खिलाफ जाती हुई दिखतीं हैं, परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि और परिणाम के प्रकाश में देखें तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

सबसे पहले उनके खुद को ‘(अंग्रेज़ सरकार का) भटका बेटा’ कहने की अगर बात करें तो यकीनन उन्होंने ऐसा कहा ज़रूर (वैसे जिस दया-याचिका में यह कहा गया, वह 14 नवंबर 1911 की नहीं, 1913 की है। यह ‘भूल’ जान कर की गई, ताकि इंटरनेट पर ढूँढ़ने वालों को असली दस्तावेज मिलने में परेशानी हो, या फिर मात्र एक लिपिकीय/टाइपिंग की गलती है, वह अलग ही मसला होगा), लेकिन जिस पत्र में उन्होंने यह कहा, यदि उसे पूरा पढ़ा जाए तो हम पाएँगे कि यह ‘दया-याचिका’ कम, और राजनीतिक/मानवाधिकारों का माँग-पत्र अधिक है।

इसमें वे अंग्रेज सरकार के चरणों में नहीं गिर जाते। विनम्र लेकिन स्पष्ट शब्दों में अपने साथ हो रहे भेदभाव और अत्याचार, मसलन ‘विशेष कैदियों’ की श्रेणी के लाभ न देना लेकिन उसमें उल्लिखित प्रतिबंध अवश्य लगाना, कोल्हू में जोत कर काम कराना, उसी जेल में बंद दुर्दांत अपराधियों को सेल के बाहर खुली हवा में जाने का समय देना लेकिन सावरकर को न देना, का उल्लेख करते हुए वह सरकार पर न्यायपूर्ण तरीके से जेल प्रशासन चलाने का दबाव बनाते हैं। केवल और केवल अंत में जाकर वह खुद को ‘भटका हुआ बेटा’ बताते हुए सरकार को आश्वासन देते हैं कि यदि सरकार उन्हें रिहा कर दे तो वह सरकार के प्रति वफादार रहेंगे

लेकिन क्या महज़ इन शब्दों के आधार पर उन्हें कायर या गद्दार करार दिया जा सकता है? सावरकर के जीवनीकार जेडी जोगलेकर के अनुसार, “क्या लेनिन ने पूँजीपति जर्मन राजा कैसर विल्हेल्म का सील ट्रेन (में बैठकर जर्मनी से गुज़र कर रूस पहुँचने) का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया था (जबकि लेनिन पूँजीपतियों से घृणा करता था)? उस ट्रेन में बैठकर रूस पहुँचे लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व किया और सत्ता हासिल की। स्टालिन ने अपने परमशत्रु हिटलर के साथ समझौता किया। जो लेनिन और स्टालिन के मामले में प्रशंसा-योग्य है, वह सावरकर के मामले में निंदनीय हो जाता है। पीलिया की आँख से सब कुछ पीला ही दिखेगा।”

देश के अंदर भी उदाहरण हैं। शिवाजी ने भी बंदी बनाए जाने पर नम्रतापूर्ण पत्र लिखकर कैद से आजादी पाई, और उसके बाद मुगलों और आदिलशाही सल्तनत के पाँव भी उखाड़े, गर्दनें भी उड़ाईं। उसी तरह सावरकर ने भी अंततः आज़ाद होने के बाद अंग्रेज़ों की गुलामी नहीं की, हिन्दू महासभा का नेतृत्व किया। साक्ष्य अगर और चाहिए, तो और भी हैं। जिस अंग्रेज अफ़सर क्रेडॉक ने उनकी याचिका का विश्लेषण किया, उसने लिखा, ‘सावरकर कितना बड़ा खतरा होगा, इसका मूल्यांकन उसके जेल के अंदर व्यवहार से अधिक इस पर होगा कि बाहर क्या परिस्थितियाँ हैं। और बाहर 10-15-20 साल में क्या परिस्थितियाँ होंगी, कहा नहीं जा सकता।’

अब बाकी आरोपों को भी देखें तो वह भी पूरी तरह संदर्भ से परे तथ्यों को पकड़कर ‘फेक न्यूज़’ पढ़ाने से अलग कुछ नहीं है। गाँधी जी की हत्या में अगर ‘नामजद’ होने भर से सावरकर इतने बुरे हो गए तो सरकार उन्हें 1 महीने की भी सज़ा क्यों नहीं दिला पाई? क्यों गाँधी की हत्या के 18 साल बाद हुई सावरकर की मृत्यु के बाद भी उन्होंने सावरकर की स्मृति में डाक टिकट जारी किया, और उनकी स्मृति में ₹11,000 दान किए? हिन्दुओं को ‘मिलिटराइज़’ करने की जहाँ तक बात है तो ‘अहिंसक’ हिन्दुओं का नोआखली, कलकत्ता और पंजाब में जो हाल हुआ, उसे देखते हुए कहाँ तक गलत थे सावरकर? अपने सम्पूर्ण लेखन में सावरकर यह बार-बार साफ करते हैं कि वह हिन्दुओं को आत्मरक्षा में सक्षम होने का आह्वाहन कर रहे हैं, अन्य समुदायों के प्रति हिंसा शुरू करने का नहीं।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का समर्थन करने या न करने की जहाँ तक बात है तो उनकी किताब ‘हिन्दू राष्ट्र दर्शन‘ में वह साफ़ लिखते हैं कि उन्होंने समर्थन इसलिए नहीं किया क्योंकि कॉन्ग्रेस यह आश्वासन देने में नाकाम रही कि जिन्ना की विभाजन की माँग किसी भी कीमत पर नहीं मानी जाएगी, और किसी प्रान्त को अंग्रेजों के जाने के बाद भारतीय संघ से पृथक होने का अधिकार नहीं दिया जाएगा। आज अगर हम विभाजन को भूल मानते हैं, तो उसका विरोध करने की दूरदृष्टि रखना ही क्या सावरकर का अपराध था?

सावरकर का गलत चित्रण बिलकुल गलत है, लेकिन आप कर क्या लेंगे?

अब सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस अगर सावरकर का गलत चित्रण करने पर उतारू है ही तो पहले तो ऐसा क्यों, और दूसरा इसमें किया क्या जा सकता है।

तो पहले सवाल का जवाब तो एकदम साफ़ है- सावरकर से दुश्मनी केवल इसलिए है क्योंकि वह हिंदूवादी थे, और कॉन्ग्रेस की राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण की है। हिन्दूफ़ोबिया इनकी वैचारिक नसों में है, तो इसलिए हिन्दू हितों की बात करने वाले को खलनायक या कमज़ोर दिखाना तो हिन्दूफ़ोबिया की तार्किक परिणति होगा ही।

दूसरा सवाल यह कि इसके लिए किया क्या जा सकता है। तो इसका पहला जवाब ‘कॉन्ग्रेस हटाओ’ हास्यास्पद रूप से नाकाफ़ी है। यह नैरेटिव (कथानक) की लड़ाई है, और इसमें दिल्ली (या किसी भी प्रदेश की राजधानी) में बैठा शासनिक मुखिया का हस्तक्षेप अविश्वसनीय रूप से सीमित होता है। आज कम्युनिस्टों के मुट्ठी भर विधायक और साँसद होने के बावजूद उनका फ़र्ज़ी कथानक अकादमिक सत्य है, और सच हमारे साथ होते हुए भी हिन्दू जदुनाथ सरकार-आरसी मजूमदार के बाद एक अदद इतिहासकार और सीताराम गोयल के बाद एक पठनीय ‘राइट विंग बुद्धिजीवी’ के लिए तरस रहे हैं।

जैसा कि संजीव सान्याल ने ऊपर कहा, यह सवाल कहानी सुनाने का है, सत्ता की गद्दी कब्जियाने का नहीं। तो बेहतर होगा हिन्दू हर बात में राजसत्ता का मुँह देखने की बजाय खुद अपनी कहानियाँ पहले जानने और फिर सुनाने में समय, धन और श्रम का निवेश करें। जब तक यह नहीं होगा, परिवर्तनशील सत्ता के साथ सावरकर जैसे हिंदूवादियों का अपमान बदस्तूर जारी रहेगा, हम इस पर आउटरेज करते रहेंगे, आप फेसबुक पर ‘एंग्री रियेक्ट’ करते रहेंगे, लेकिन बदलेगा कुछ भी नहीं। एक तिनका भी नहीं।

चिदंबरम की गिरफ़्तारी: बौखलाए सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को सुनाई खरी-खोटी

पी चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया केस में गिरफ़्तार किया जा चुका है और उनसे पूछताछ जारी है। हालाँकि, उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए सीबीआई को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि उन्होंने अपने घर का दरवाजा बंद कर रखा था। उनके घर के कम्पाउंड में घुसने के लिए सीबीआई अधिकारियों को दीवार लांघनी पड़ी। कॉन्ग्रेस ने इस पूरे प्रकरण को ‘दिनदहाड़े लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया है और कहा कि असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए यह सब किया जा रहा है। कॉन्ग्रेस का दावा है कि चिदंबरम या उनके परिवार में किसी के ख़िलाफ़ इस मामले में कोई भी आरोप नहीं है।

भाजपा को कोसते-कोसते पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल एक क़दम और आगे बढ़ गए। उन्होंने हाईकोर्ट के उस जज पर सवाल उठाना शुरू कर दिया, जिन्होंने पी चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज की थी। जस्टिस सुनील गौड़ ने यह कहते हुए उन्हें गिरफ़्तारी से राहत देने से मना कर दिया कि इस मामले में प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता (पी चिदंबरम) ही मुख्य साज़िश रचने वाला प्रतीत होता है। कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने 25 जनवरी को ही फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था और जब उनकी रिटायरमेंट में 2 दिन बचे तो अपना निर्णय सुना दिया।

सिब्बल ने फैसले की टाइमिंग पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि 3.25 में जजमेंट सुनाया गया और जब वो लोग 4 बजे अग्रिम जमानत के लिए गए तो उनकी याचिका ख़ारिज कर दी गई। सिब्बल के अनुसार, ऐसा इसीलिए किया गया ताकि वे सुप्रीम कोर्ट न जा सकें। उन्होंने जज के ही तौर-तरीकों पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि ये पूरी प्रक्रिया चिंताजनक है। बता दें कि कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी के मामले में भी जस्टिस सुनील गौड़ ने अहम निर्णय सुनाया। इस मामले में उन्होंने आदेश दिया कि प्रभावशाली जाँच के लिए आरोपित को कस्टडी में लेकर पूछताछ करना ज़रूरी है।

वहीं अगर कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल की बात करें तो वह हाईकोर्ट और जस्टिस सुनील गौड़ पर ही नहीं रुके बल्कि सुप्रीम कोर्ट को भी अपने लपेटे में ले लिया। उन्होंने कहा, “हमें बताया गया कि सीजेआई इस पर फैसला लेंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट हैंडबुक के अनुसार, अगर सीजेआई संवैधानिक पीठ में व्यस्त हैं तो नियमानुसार दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश इसकी सुनवाई करें। हमें अपना अधिकार नहीं मिला।

कपिल सिब्बल को रजिस्ट्रार ने कहा कि सीजेआई गोगोई उनकी अपील पर शाम 4 बजे सुनवाई करेंगे। सिब्बल ने नाराज़गी जताई कि शाम 4 बजे के बाद तो सुनवाई के लिए समय ही नहीं बचता है। इस मामले में अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी अपना गुस्सा बाहर निकाला है। जहाँ सिंघवी ने चिदंबरम को भगोड़ा बताने के लिए मीडिया को खरी-खोटी सुनाई तो सुरजेवाला ने केंद्र सरकार को निशाने पर रखा।

‘जिया हो बिहार के लाला, पुलिस की 22 बंदूक में से एक भी गोली नहीं चली’- ट्विटर पर लोगों ने लिए मजे

तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे डॉ जगन्नाथ मिश्रा का 19 अगस्त को निधन हो गया। बुधवार (21 अगस्त) को सुपौर ज़िले के अंतर्गत आने वाले पैतृक गाँव बलुआ में उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन इस दौरान जब जवानों ने उन्हें 21 बंदूकों की सलामी देनी चाही तो ऐन मौक़े पर पुलिस का यह हथियार धोखा दे गया। हुआ यूँ कि इस दौरान एक भी बंदूक से गोली नहीं चल सकी। इस क्रम में पुलिस ने काफ़ी कोशिश की लेकिन किसी की कोशिश सफल न हो सकी।

ख़बर के अनुसार, जिस समय अंतिम संस्कार की प्रक्रिया हो रही थी उस दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी समेत कई विपक्षी दल के नेता भी मौजूद थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अधिकारियों ने भी पुलिस की समस्या जानने की कोशिश की कि फॉयरिंग क्यों नहीं हो पा रही है, लेकिन जब कोई उपाय नहीं सूझ सका तो बिना सलामी के ही अंत्येष्टि प्रक्रिया सम्पन्न की गई। फॉयरिंग न हो पाने का वीडियो वाायरल होने पर ज़िला पुलिस ने इसकी जाँच के आदेश दे दिए है।

इस मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कुछ नही कहा है, लेकिन सुपौल के पुलिस अधीक्षक मृत्युंजय चौधरी ने कहा कि पूरे मामले की जाँच की जाएगी और जो भी दोषी पाया जाएगा उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। 

इसके आगे उन्होंने कहा,

“उसमें ऐम्पटी कार्ट्रिज फायर किया जाता है, जिसमें सिर्फ़ आवाज़ होती है। लाइव कार्ट्रिज नहीं होता है। लाइव कार्ट्रिज ड्यूटी के दौरान इस्तेमाल करते हैं। यह ब्लैंक कार्ट्रिज होती है, इसमें पेंदे पर जब चोट पड़ती है तो स्पार्क के साथ महज़ आवाज़ उत्पन्न होती है। अब जाँच करके पता करा रहे हैं कि इस कार्ट्रिज में क्या दिक्कत थी, किस बैच की कार्ट्रिज थी, कब आई थी, कब से इसका इस्तेमाल नहीं हुआ था। हम इस मामले की जाँच कराने के बाद ही कुछ स्पष्ट कर पाएँगे।”

सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने इस वीडियो पर चुटकी ली है। एक यूजर ने लिखा, “ये देखिए कैसे अपने मुखिया नीतीश कुमार के सामने बिहार पुलिस के जवानो के राइफ़ल से एक गोली फ़ायर नहीं हुआ। ये मौक़ा था पूर्व मुख्य मंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा की अंत्येष्टि का जहाँ इन्हें सलामी देना था।”

एक अन्य यूजर ने ट्वीट किया, “जिया हो बिहार के लाला,पुलिस की 22 बंदूक में से एक भी गोली नहीं चल पाई। मौका था पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को अंत्येष्टि से पहले गार्ड ऑफ ऑनर देने का।”  

ग़ौरतलब है कि डॉ जगन्नाथ मिश्रा 1975 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे और 1977 अप्रैल तक इस पद पर आसीन रहे। उसके बाद 1980 में उन्होंने फिर तीन साल के लिए मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे। तीसरी बार उन्होंने 1989 में तीन महीने के लिए बिहार के सीएम पद की कमान संभाली। उनके कार्यकाल के दौरान कॉन्ग्रेस की बिहार में मज़बूत पकड़ थी। बाद में वह जेडीयू में शामिल हो गए। 1996 में सामने आए चारा घोटाले में उनका भी नाम सामने आया था।

चेतन भगत ने ट्विटर पर डाला J&K के गणित का ऐसा सवाल, जिसे देखते ही भड़क गईं गौहर खान

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 निष्प्रभावी होने के बाद वहाँ का माहौल धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। लोग अपने काम पर लौटने लगे हैं और स्कूल-कॉलेज खोल दिए गए हैं। लेकिन, बावजूद इन सबके ट्विटर पर जुबानी जंग थमने का नाम नहीं ले रही। बड़ी-बड़ी हस्तियाँ कश्मीर के हालात पर ट्वीट और रिट्वीट करके सुर्खियाँ बटोर रही हैं। अब इस सूची में नाम जुड़ा है चेतन भगत और गौहर खान का।

चेतन भगत ने 20 अगस्त को जम्मू-कश्मीर में नेताओं को नजरबंद किए जाने के समर्थन में एक ट्वीट किया, इसे उन्होंने गणित के सवाल की तरह पूछना। लेकिन बिग बॉस विनर गौहर खान से ये बर्दाश नहीं हुआ। वह तुरंत उन पर भड़क उठीं। जिससे बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया।

लेखक चेतन भगत ने ट्वीट किया, “गणित की सवाल। अगर कुछ लोग (हिरासत में हैं)= शांति, अगर कुछ लोग (हिरासत में नहीं हैं)= पत्थरबाजी, अशांति और भी बहुत कुछ, ये आपको कुछ लोगों के बारे में क्या बताता है?” स्पष्ट है चेतन भगत अपने ट्वीट के जरिए बताने की कोशिश कर रहे थे कि जम्मू-कश्मीर में नेताओं को नजरबंद करके सही किया गया, नहीं तो सरकार का फैसला आते ही कुछ भी हो सकता था।

लेकिन, इस ट्वीट पर गौहर खान का जवाब काफ़ी नाराजगी से भरा हुआ आया। उन्होंने लिखा, “आपके विचार!! उफ्फ!! आपकी अजीबोगरीब मैथ प्रॉब्लम में कुछ लोगों के बारे में मुझे नहीं पता। लेकिन कम से कम अब बहुत सारे लोग ये जान जाएँगे कि आप असल में क्या हैं।”

हालाँकि, बिना गौहर खान पर गौर किए अपने ट्वीट के बाद चेतन भगत ने बहुत सारे ट्वीट किए। उन्होंने कश्मीर के हालात बेहतर होने और रोजगार बढ़ने की बात कही। दूरसंचार व्यवस्था ठप्प होने को चेतन भगत ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

लेकिन, गौहर खान की ओर ट्विटर यूजर नाराजगी दिखाने लगे। किसी ने उनके बयानों को कॉन्ट्रोवर्सी क्रिएट करने वाला बताया। तो किसी ने उन्हें तीन तलाक और हलाला का समर्थन करने वाली मानसिकता का करार दिया।

किसी ने कहा कि वह चेतन भगत के बारे में नहीं जानते लेकिन दुनिया अब गौहर खान को जान-समझ चुकी है। एक यूजर ने चेतन भगत को सलाह भी दी कि वह गौहर को तवज्जों न दें क्योंकि उसके अंदर कोई टैलेंट नहीं है।

रात में अकेले डर लगता है चिदंबरम को… खाना भी नहीं खाया: CCTV वाले सुईट में ऐसे काटी रात

पूरे नाटकीय घटनाक्रम के बाद बुधवार सीबीआई ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम को उनके आवास से गिरफ्तार किया। सीबीआई उन्हें वहाँ से अपने मुख्यालय लेकर गई, जहाँ उनसे कई सवालों के जवाब तलब किए गए। इस दौरान चिदंबरम काफी अनमने ढंग से जवाब देते दिखे। कुछ सवालों पर तो उन्होंने जवाबी सवाल भी किया।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद पूरी रात वह ज्यादातर शाँत रहे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने सीबीआई अधिकारियों और डॉक्टरों से बात की। उन्हें इस बीच डिनर के लिए भी पूछा गया लेकिन उन्होंने खाना खाने से भी इनकार कर दिया।

डॉक्टरों ने उनसे इस दौरान उनकी तबीयत के संबंध में कुछ सवाल पूछे। डॉक्टरों ने पूछा कि क्या उनका किसी तरह का इलाज चल रहा है? जिसके बाद उनका ब्लड प्रेशर और बाकी नब्ज की जाँच हुई।

सीबीआई अधिकारियों ने उनसे पूछा कि क्या वो सहज हैं? इस पर भी उनका जवाब बहुत छोटा और चुप्पी से भरा हुआ था।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उन्होंने रात में अकेले डर लगने का हवाला देकर जेल जाने से मना कर दिया और सीबीआई के साथ उनके कमरे में ही रुके रहे। उन्हें 5 नंबर के सुईट में सीबीआई के 2 अधिकारियों और सीसीटीवी लगे कमरे में रखा गया। इस दौरान उनसे कई सीधे सवाल पूछे गए, मसलन FIPB के नियमों में बदलाव का विरोध क्यों नहीं हुआ? कार्ति और इंद्राणी मुखर्जी की मुलाकात कैसे हुई थी? घूसकांड का पैसा कहाँ से कहाँ गया? आदि। 

जानकारी के मुताबिक पी चिदंबरम को अब EOU (ईकॉनोमिक ऑफेंस यूनिट) ले जाया गया है, जहाँ उनसे आधिकारिक रूप से पूछताछ की शुरुआत होगी। पूछताछ के बाद उन्हें दिल्ली की राउज ऐवेन्यू कोर्ट में पेश किया जाएगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि सीबीआई पूर्व वित्त मंत्री की 14 दिन की हिरासत माँग सकती है। वहीं ईडी भी कोर्ट में चिदंबरम की हिरासत की माँग कर सकता है। 

मुस्लिमों ने ख़ुद कहा था कि राम मंदिर की ज़मीन हिन्दुओं को दे दी जाए, SC में पेश किया गया 20 एफिडेविट

राम मंदिर को लेकर आज गुरुवार (अगस्त 22, 2019) को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और इस दौरान वादी गोपाल सिंह विशारद की तरफ से दलीलें पेश की गईं। आज रोजाना सुनवाई के तहत 10वें दिन की सुनवाई हुई। वकील रंजीत कुमार ने अपना पक्ष रखते हुए रामलला विराजमान के वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सम्पूर्ण संपत्ति ही देवता है और श्रद्धालु पूरे जन्मस्थान की ही पूजा करते आ रहे हैं।

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि दिवंगत गोपाल सिंह विशारद ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने जनवरी 1950 में फैज़ाबाद कोर्ट में राम अमंदिर के लिए मुक़दमा दायर किया था। उन्होंने वहाँ स्थापित देवताओं की पूजा के लिए अदालत से अनुमति माँगी थी।

वकील रंजीत कुमार ने कहा कि देवता की पूजा करना उनका व्यावहारिक अधिकार है और कोई इस अधिकार को छीन नहीं सकता। कुमार ने कहा कि 1935 के बाद से ही मुस्लिमों ने इस जगह पर नमाज़ नहीं पढ़ी है और इसे गलत रूप में बाबरी मस्जिद कहा गया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष 20 ऐसे एफिडेविट पेश किए, जिनसे यह पता चलता है कि उस स्थल पर मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई थी।

हालाँकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने वकील रंजीत कुमार से कहा कि एफिडेविट देने वाले लोगों का उपस्थित होना ज़रूरी है ताकि क्रॉस-एग्जामिनेशन किया जा सके। जवाब में वकील रंजीत कुमार ने बताया कि ट्रायल बाद में शुरू हुए। उन्होंने बताया कि यह जजमेंट का हिस्सा है। उन्होंने अब्दुल गनी का वह एफिडेविट दिखाया, जिसमें कहा गया है कि राम मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद बनाए जाने के बावजूद हिन्दू यहाँ पूजा करते रहे और ज़मीन का अधिकार नहीं छोड़ा।

सारे एफिडेविट का सार देखें तो मुस्लिमों ने यह स्वीकार किया है कि 1935 के बाद से ही उस स्थल पर नमाज़ नहीं पढ़ी जा रही है और इसीलिए अगर हिन्दुओं को यह ज़मीन वापस कर दी जाती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। बुधवार की सुनवाई में सीएस वैद्यनाथन ने स्कन्द पुराण और पुरातत्व एजेंसी के सबूतों का जिक्र करते हुए कहा था कि मंदिर हमेशा मंदिर ही रहेगा और किसी के कुछ भी दावा करने से यह सत्य बदल नहीं सकता।