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मैं अनुराग ‘समय’ कश्यप हूँ, मुझे हक़ीक़त से क्या, मेरी जिंदगी का एक्के मकसद है – प्रपंच और प्रलाप चलता रहे

नेटफ्लिक्स पर सेक्रेड गेम्स सीजन-2 के आने से ठीक पहले प्रधानमंत्री से ‘पत्राचार‘ के बाद अनुराग कश्यप की सोशल मीडिया से हाल ही में विदाई हुई है। यह विदाई बहुत ही ज्यादा द्रवित कर देने वाली थी। सोशल मीडिया से सिनेमा के विवादित नामों की जब भी विदाई का जिक्र होता है, AIB की विदाई भी याद आती है। लेकिन अनुराग कश्यप की विदाई इन सभी विदाइयों से ऊपर है। पहला कारण तो यह की गालियों के आविष्कार के लिए पूरी फिल्म और नेटफ्लिक्स सीरीज बना देने वाले अनुराग कश्यप को गालियों से डर लगता है, और दूसरा ये कि अनुराग कश्यप जाते-जाते एक फिल्म का जिक्र छेड़ गए। इस फिल्म का नामा है; राशोमोन!

राशोमोन से पहले अनुराग कश्यप के दर्द पर चर्चा करनी आवश्यक है। गालियों के शोध के लिए पूरी की पूरी फिल्म बना देने का जज्बा रखने वाले अनुराग कश्यप को सोशल मीडिया पर गाली देने वालों से डर लगता है। अनुराग कश्यप की मानें तो इसी कारण उन्हें सोशल मीडिया छोड़ना पड़ा। हालाँकि, ऐसा कहकर उन्होंने अपना सिर्फ ट्विटर एकाउंट डिलीट किया, लेकिन फेसबुक एकाउंट नहीं! ऐसा ही डर कुछ समय पहले ट्विटर पर पत्रकारिता की व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ कुलपति रवीश कुमार ने भी जाहिर किया था और ट्विटर से भाग खड़े हुए थे। भले ही इसके बाद रवीश ने खुलासा किया था कि डर से बचने के लिए वो कानों पर ईयर फोन लगाकर ड्राइव करते हैं और हिंदी नहीं पढ़ते और सुनते।

अनुराग कश्यप का सबसे मासूम डर, जिसके लिए बड़े प्यार से उनके दोनों गाल खींचे जाने चाहिए, ये है कि उन्हें ना ही कश्मीर, न अनुच्छेद 370 और ना ही किसी इतिहास की जानकारी है। लेकिन फिर भी उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का विरोध करना था। ये मैं नहीं कह रहा बल्कि, खुद अनुराग कश्यप ने अपने ट्वीट में कहा है। यह ट्वीट उनका इकबालिया बयान था, या फिर कोई सस्ता नशा फूँकने का दुष्परिणाम, यह घोषणा करने से पहले उनका ट्विटर एकाउंट डिलीट हो चुका था।

अनुराग कश्यप की मासूमियत देखिए कि सोशल मीडिया से उपजे डर की शिकायत करने के लिए भी वो सोशल मीडिया का ही इस्तेमाल करते हैं और पुलिस में शिकायत दर्ज करने की जगह प्रेस में जाकर यह प्रलाप करते हैं, कि उन्हें सोशल मीडिया पर डर लगता है। रही ज्ञान की बात, तो जिस अनुराग कश्यप को जनादेश से चुने गए प्रधानमंत्री और 1,200,000,000 लोगों के बीच सम्बन्ध पता न हो उसके ट्वीट मासूमियत भरे ही कहे जा सकते हैं। इनकी बुद्धि और विवेक को देखते हुए ये चर्चा योग्य हैं तो नहीं लेकिन दुर्भाग्यवश जिस स्तर पर ये लोगों को अपनी बेवकूफी से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं उसको देखते हुए अनुराग कश्यप पर बात करनी जरुरी हो जाती है।

सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति, चाहे वो नेता हो, लेखक, विचारक, कलाकार, पत्रकार, कोई भी जब आता है तो वो सिर्फ ये सोचकर नहीं आता कि उसे एक रक्षाकवच का आवरण दिया जाएगा क्योंकि वो दिल से बहुत नाजुक है। अगर आपको झालमूड़ी से लेकर तेल के कुँए रखने वालों पर ज्ञान और विचार रखने की आदत है तो आपको दूसरों के विचार पढ़ने का भी अभ्यास होना ही चाहिए। इसके लिए जब आप ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ जैसे शब्दकोष अपने राजनीतिक और सामाजिक पूर्वग्रहों के कारण गढ़ने शुरू करते हैं तब आप गाली परोसे जाने की पटकथा खुद रख चुके होते हैं।

क्योंकि अनुराग कश्यप जैसे लोग जब स्वयं भी अपने तर्कों और तथ्यों के साथ खड़े नहीं रह पाते हैं तब वो लोग बेहद सोफिस्टिकेटेड रहते हुए शब्दकोश रचते हैं। इसके बदले में जब वो लोग, जिन्हें सोशल मीडिया पर प्रगतिशील विचारक अपना विरोधी कहते हैं, अपने शब्दकोश और रचनात्मकता का प्रयोग करते हैं तब आपको उनके शब्दकोश को गाली कहने का अधिकार नहीं होता है।

अनुराग कश्यप ने ट्विटर से भागने से पहले जिस राशोमोन फिल्म का जिक्र किया, वो फिल्म जब 1950 में जापान में रिलीज हुई थी तो जापानी समीक्षकों को उसमें कुछ खास नजर नहीं आया था। राशोमोन फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह से एक समुराई की हत्या पर चार लोगों के अलग-अलग तर्क आते हैं और विरोधाभास के कारण किसी भी तर्क को गलत साबित कर देना मुश्किल होता है।

अंत में सत्य, कि समुराई की हत्या का असल गुनेहगार कौन है, अंत तक ठगा खड़ा रहता है और आज तक भी किसी को पता नहीं चल पाया है कि आखिर समुराई को किसने और किस हथियार से मारा था। ऐसे ही हॉलीवुड में बनी एक फिल्म थी- 12 एंग्री मैन। जिसमें 12 लोग एक अपराध पर दलीलें देते हैं और किसी के भी तर्क से असहमत हो पाना मुश्किल होता है।

अब यदि वापस अनुराग कश्यप पर चर्चा करें कि बेहद वाहियात से तथ्य और तर्कों के साथ सेक्रेड गेम्स जैसी नेटफ्लिक्स सीरीज के आने से ठीक पहले अनुराग कश्यप को डर क्यों लगा? तो इसके पीछे कारण उनकी बनी बनाई योजना पर अनुच्छेद-370 द्वारा पानी फेर दिया जाना है। देश में ‘जय श्री राम’ के इस्तेमाल से घबराने पर अनुराग कश्यप ने अपने ही जैसे अन्य बेरोजगार फिल्म निर्देशकों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री को एक चिठ्ठी लिखकर पत्राचार किया, जिसने हिन्दुओं द्वारा किए जा रहे अपराधों पर चल रहे डिबेट को हवा दी।

अनुराग कश्यप के साथ ही उनकी एक पूरी जमात ने अपने जहर को फेंकने के लिए अपनी कमर पेटिकाएँ कसी ही थीं कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 ने सब कुछ बदलकर रख दिया। अनुराग कश्यप के मानो एकदम से जज्बात बदल गए, जिंदगी बदल गई, सब कुछ बदल गया।

अब प्रोपेगेंडा और नैरेटिवबाजी में पीएचडी धारक यह समूह जान चुका था कि ये एकदम बैकफुट पर खड़ा है और इनकी सस्ती लोकप्रियता का इंतजाम तबाह हो चुका है। यही वजह है कि अनुराग कश्यप ने जाते-जाते एक विक्टिम कार्ड खेलकर जितनी सस्ती लोकप्रियता बटोर सकते थे वो भी बटोरी और पहली फुर्सत में निकल लिए।

अब सवाल यह है कि क्या लोगों ने अनुराग कश्यप को गाली देनी बंद कर दी है? जैसा कि एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार भी अक्सर कहते हैं- ‘मुझे हिंदी पढ़ने-लिखने वाले ‘भक्त’ और ‘ट्रोल’ गाली देते हैं’, अनुराग कश्यप ने भी ठीक वही किया।

असल में, इस प्रगतिशील लिबरल वर्ग का वास्तविक डर संवाद के साधनों का दोतरफा हो जाना है। अब यह संभव नहीं है कि आप टीवी स्क्रीन के पीछे बैठकर इकतरफा अपने कुतर्कों का ज्ञान बाँचें और श्रोता, दर्शक, पाठक आपसे सहमत होने के लिए मजबूर हों। यह समय त्वरित संचार और प्रतिक्रिया का है। जो प्लेटफॉर्म जितना ज्यादा प्रतिक्रिया करता है, ये प्रगतिशील वहाँ से अवश्य पलायन करेंगे।

यही एक बड़ी वजह है कि लेफ्ट-लिबरल्स ट्विटर जैसी माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट्स पर बहुत कम हावी हैं, जबकि फेसबुक पर इन लोगों ने बहुत बड़ा तंत्र विकसित किया है। दक्षिणपंथियों के संदर्भ में यह एकदम उलट है। कारण स्पष्ट है कि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियाओं से घबराते नहीं बल्कि उनका स्वागत करते हैं। क्या बस इतनी सी बात साबित करने के लिए नाकाफी है कि असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सबसे बड़े दुश्मन लेफ्ट-लिबरल्स ही हैं? जबकि ये लोग दावा इसके विपरीत करते हैं।

प्रतिक्रियाओं से घबराने और डरने वाले प्रगतिशीलों पर ही प्रसिद्ध व्यंग्यकार नीरज बधवार जी को पढ़ा जाना चाहिए। नीरज बधवार जी लिखते हैं- “दरअसल समस्या गाली भी नहीं है। रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी ज़िंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो, तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियाँ उड़ते नहीं देख सकते।”

अनुराग कश्यप जिस रोशोमन फिल्म का जिक्र कर के भागे हैं उन्हें वह अपने संदर्भ में देखनी चाहिए। वो खुद सत्य से कितना दूर हैं, उनका खुद का ट्वीट ये साबित करता है। देखा जाए तो अनुराग कश्यप का ट्वीट हर उस प्रगतिशील विचारक का चेहरा है जिसका एकमात्र लक्ष्य सरकार और समाधान विरोधी एजेंडा है। जब भी कोई ‘लेफ्ट-लिबरल विचारक’ किसी मुद्दे पर ज्ञान बाँचना शुरू करता है तो अनुराग कश्यप का ये बयान स्मरण हो जाना चाहिए जिसमें वो कह रहे हैं- “पता, मैंने इतिहास भी नहीं पढ़ा है लेकिन सरकार के इस कदम से मुझे आपत्ति है।”

यह सूचना और अभिव्यक्ति का सबसे सुनहरा दौर है। देश के लेफ्ट-लिबरल विचारक अपने विष का इतना प्रलाप कर चुके हैं कि उन्होंने स्वयं की विश्वसनीयता को स्वयं ध्वस्त कर दिया है। चाहे रवीश कुमार हों, अनुराग कश्यप हों या फिर जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद हों, इन्होंने अपने नैरेटिव को खुद ही एक्सपोज कर लिया है। एक समय तक इनसे प्रभावित रहने वाला इनका ही प्रशंसक अब इनके किसी भी बयान से सतर्क हो जाता है कि अगर फलां लेफ्ट-लिबरल इस बात का पक्ष ले रहा है तो वास्तविकता जरूर इसके उलट होगी।

अनुराग कश्यप को राशोमोन से पहले उस झूठे चरवाहे गड़रिए की देशी कहानी को 100 बार पढ़ना चाहिए, जिसमें गड़रिया बार-बार गाँव वालों को ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ कहकर बेवकूफ बनाता रहा, और जब एक दिन भेड़िया सच में आकर उसकी बकरी और भेड़ें उठा ले गया, तो गाँव वाले कहते रहे- ‘इग्नोर करो, ये परम-प्रलापी फिर से कोई प्रोपेगेंडा ही कह रहा होगा।’

असम बाढ़: चीन, रूस, फ्रांस ने बढ़ाया मदद का हाथ, साझा की सैटेलाइट तस्वीरें

असम में चल रहे बाढ़-राहत कार्य में चीन, रूस और फ्रांस ने तकनीकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है। तीनों देश अपनी-अपनी सैटेलाइटों से बाढ़ की तस्वीरें भारत को मुहैया कराएँगे, जिस से बाढ़-क्षेत्र के फैलाव का दायरा पता चले। भारत The International Charter Space and Major Disasters के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक है, जिसका सदस्य होने के नाते वह इस 32-सदस्यीय संगठन के सदस्यों को ‘रिक्वेस्ट’ भेज कर चार्टर का आह्वाहन कर सकता है। इसके अंतर्गत उन सदस्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों में मौजूद कोऑर्डिनेटरों के माध्यम से तस्वीरें मिल सकतीं हैं, जिन देशों की सैटेलाइटें सबसे अच्छे तरीके से आपदा-प्रभावित क्षेत्रों को देख पा रहीं हैं।

ISRO द्वारा 17 जुलाई को भेजी गई रिक्वेस्ट के जवाब में फ्रांस के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अध्ययन केंद्र (National Centre for Space Studies), चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (National Space Administration) और रूस के ROSCOSMOS ने अपने उपग्रहों से असम की मिल रहीं तस्वीरें साझा कीं। यह तस्वीरें धुबरी, मरीगाओं, बारपेटा, धेमाजी, लखमीपुर की थीं।

इसके अलावा अमेरिका के USGS (United States Geological Survey), ESA (European Space Agency) और तीन अन्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों से तस्वीरें मिलने की बात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कही। यह सभी तस्वीरें इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र ने प्राप्त कीं। इसरो के खुद के CARTOSAT उपग्रह ने भी बाढ़-प्रभावित क्षेत्र की तस्वीरें लीं।

आम बात है

मीडिया से बात करते हुए रवीश कुमार ने बताया कि विभिन्न अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच यह तालमेल और सहयोग न केवल त्वरित प्रतिक्रिया में सहायक होता है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में “आम बात” है। उन्होंने मीडिया को यह भी सूचित किया कि ISRO ने भी भूतकाल में ऐसा सहयोग अन्य देशों को दिया है। उन्होंने उदाहरण दिया कि 2014 के अगस्त में जब चीन के युनान प्रान्त में 398 लोगों की जान लेने वाला भूकंप आया था, उस समय इसरो ने भी CARTOSAT से ली हुई तस्वीरें चीन की एक्टिवेशन रिक्वेस्ट के बाद भेजी थीं।

हम 44 साल पुराने मिग-21 उड़ा रहे, इतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता: IAF चीफ

इंडियन एयरफोर्स में तकरीबन 44 साल पहले शामिल हुआ मिग-21 फाइटर जेट इस साल दिसंबर में फेजआउट हो जाएगा। इसके साथ ही मिग-27 भी फेजआउट हो जाएगा। एयरचीफ मार्शल बी एस धनोआ ने भारतीय वायु सेना के पुराने पड़ चुके फाइटर जेट्स और हथियारों पर बात करते हुए कहा कि वायुसेना 40 साल से भी ज्‍यादा पुराने फाइटर जेट्स उड़ा रही है। इतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता है।

एयरचीफ मार्शल ने कहा, “हम स्वदेशी तकनीक द्वारा पुराने हो चुके लड़ाकू उपकरणों को बदलने का इंतज़ार नहीं कर सकते, न ही हर रक्षा उपकरण को विदेश से आयात करना समझदारी होगी। हम अपने पुराने हो चुके हथियारों को स्वदेश-निर्मित हथियारों से बदल रहे हैं।” 

वायु सेना प्रमुख ने यह बात दिल्ली स्थित एयरफोर्स ऑडिटोरियम में एयरफोर्स के आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण पर आयोजित एक सेमिनार में कही। इस सेमिनार में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे। एयरचीफ मार्शल धनोआ ने कहा, “वायु सेना अभी भी 44 साल पुराने मिग-21 जेट्स उड़ा रही है, जबकि इतने साल बाद कोई अपनी कार तक नहीं चलाता। वायु सेना का मिग-21 विमान चार दशक से ज्यादा पुराना हो गया है। लेकिन अभी भी यह विमान वायु सेना की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। दुनिया में शायद ही कोई देश इतना पुराना फाइटर जेट उड़ाता है। वजह है वायु सेना के पास मिग 21 के विकल्प के तौर पर कोई फाइटर जेट नहीं है। इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वायु सेना पूरे दमखम के साथ इसके भरोसे न केवल सरहद की हिफाजत करती है, बल्कि दुश्मन की चुनौतियों का जवाब भी देती है।”

इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय वायुसेना एक पेशेवर वायुसेना है। बालाकोट हमले के बाद जिसका लोहा दुनिया ने माना है। भारत पाकिस्तान सीमा पर तनाव पर एयरफोर्स चीफ ने कहा कि वायुसेना हमेशा से सतर्क है। ऐसा नहीं है कि तनाव हुआ है तो सेना सतर्क है। एयर डिफेंस सिस्टम की जिम्मेदारी वायुसेना की है और वह चौकन्‍नी है।

न दलित सुरक्षित न महिला, राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार बनते ही चौपट हुई कानून-व्यवस्था

  • 13 अप्रैल 2019: जोधपुर में रामनवमी पर शोभायात्रा से लौट रहे लोगों पर एक समुदाय विशेष के लोगों ने पथराव किया। वाहनों को फूँक दिया।
  • 24 अप्रैल 2019: जयपुर जिले के चौमूं कस्बे में हिंदू नववर्ष समारोह समिति पर निकाली गई रैली पर समुदाय
    विशेष के लोगों ने पथराव किया।
  • 11 जुलाई 2019: राजस्थान यूनिवर्सिटी की 150 से ज्यादा महिला प्रोफेसरों को फोन कॉल के जरिए प्रताड़ित किया गया। बलात्कार की धमकियाँ दी गई।
  • 20 जुलाई 2019: अलवर में मुस्लिम भीड़ ने एक नेत्रहीन पिता के पुत्र हरीश जाटव को बेहरमी से मार दिया।
  • 8 अगस्त 2019: पुलिस प्रताड़ना से तंग आकर दलित महिला ने आत्महत्या कर ली।
  • 13 अगस्त 2019: जयपुर में कांवड़ियों पर पत्थर, डंडे, सरिया से मुस्लिम समुदाय के लोगों का हमला।

ये तो बस चुनिंदा उदाहरण हैं। बीते साल के अंत में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद से चौपट होती कानून-व्यवस्था की। समुदाय विशेष का उपद्रव और कानून को ठेंगा दिखाते उसके ही रखवाले। न महिलाएँ महफूज, न दलित और न पिछड़े।

बीते साल के मुकाबले इस साल के शुरुआती चार महीनों के आँकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। आँकड़े बताते हैं कि प्रदेश में गहलोत सरकार के आने के बाद अपराधों में बड़ा उछाल आया है। पुलिसिया आँकड़ों के मुताबिक बीते साल जनवरी से अप्रैल के बीच 55,102 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे, जो इस साल बढ़कर जनवरी से अप्रैल के बीच 62,666 हो गए।

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में पिछले साल के मुकाबले 40.56% उछाल आया। सिर्फ चार महीनों के भीतर बलात्कार के मामलों में 15.02% की वृद्धि दर्ज की गई है। दलितों पर अत्याचार में पिछले साल के मुकाबले 7.66% का इजाफा हुआ है।

इन आँकड़ों के बचाव में गहलोत सरकार का तर्क बेहद पुराना है। उनका कहना है कि पूववर्ती भाजपा सरकार के जमाने में एफआईआर ही दर्ज नहीं किए जाते थे। अब मामले दर्ज किए जाते हैं सो आँकड़ों में उछाल स्वभाविक है।

लेकिन उन मामलों का क्या जो गहलोत सरकार के इस दावे की चुगली करते हैं। पुलिसिया जॉंच से तंग आकर हरीश जाटव के नेत्रहीन पिता के जहर खाकर जान देने का मामला तो चंद दिन पुराना ही है। हरीश के परिजनों का कहना है कि पुलिस मॉब लिंचिंग के इस मामले को एक्सीडेंट साबित करने पर तुली है।

भरतपुर की वह महिला भी दलित ही थी जिसने पुलिस प्रताड़ना और पिटाई के कारण आत्महत्या कर ली। इस महिला का पति जुलाई 2019 में पड़ोस की एक लड़की के साथ भाग गया था। लड़की के परिजनों ने शिकायत दर्ज कराई तो पुलिस ने महिला को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

चूरू में चार बच्चों की मॉं 35 वर्षीय दलित महिला को कथित तौर पर तो पुलिस वालों ने बंधक बनाकर रख लिया। पुलिस स्टेशन में ही गैंगरेप किया। पीड़ित महिला की माने तो पुलिस ने चोरी के एक मामले में उसके देवर को 6 जुलाई को पकड़ा था। पुलिसवालों ने देवर को हिरासत में इतना प्रताड़ित किया कि उसकी मौत हो गई। अलवर में तो सामूहिक बलात्कार का मामला चुनाव का हवाला देकर दबा दिया गया।

फिर भी कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं। कोई शोर नहीं। हरीश जाटव की मौत की खबर तभी चर्चा में आई जब उसके पिता ने आत्महत्या की। जब उसके पिता के शव के साथ लोग सड़क पर उतरे। चर्चा है तो बस पहलू खान की हत्या के आरोपितों के बरी होने की। उसका दोष भी पुरानी सरकार पर गहलोत ने मढ़ दिया है।

राज्य के सुदूर इलाकों की तो छोड़िए राजधानी जयपुर में समुदाय विशेष के आगे प्रशासन बौना साबित हो रहा है। 12 अगस्त को बकरीद और सावन का आखिरी सोमवार एक साथ पड़ा। मुस्लिमों ने इतना उत्पात मचाया कि जयपुर-दिल्ली रोड जाम हो गया। भीड़ पर काबू पाने के लिए आँसू गैस के गोले दागने पड़े। साम्प्रदायिक तनाव के एक हफ्ते बाद भी जयपुर में हालात काबू में नहीं हैं। वहाँ धारा 144 लागू है।

देश की राजधानी दिल्ली से जयपुर करीब 281 किलोमीटर दूर है। फिर भी वहॉं की कानून-व्यवस्था की कोई चर्चा नहीं। जबकि, जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य जहॉं आतंकवाद का खतरा हर पल मौजूद है, वहाँ सुरक्षा के लिहाज से उठाए गए एहतियातन कदम पर हो रहे शोर को आप सुन ही रहे होंगे।

लेकिन, राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है तो किसी को भी न महिला के अधिकारों की चिंता है, न दलितों की और न ही मानवाधिकारों की। राज्य की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी जिन पर है वे आपसी राजनीतिक नूरा-कुश्ती में व्यस्त हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गॉंधी को नाराजगी जताते हुए कहना पड़ा था कि कुछ लोग अपने बेटे की ही चिंता में व्यस्त हैं।

स्ट्रिप शो के लिए 2000 से 1000 रु. का टिकट, मोहिउद्दुल अहमद और सुपर्णा दास की चाल में फँसे लड़के

स्ट्रिप शो के नाम पर कलकत्ता में बैठकर लोगों को लूटने वाले गिरोह का साइबर क्राइम सेल ने पता लगा लिया है। इस गिरोह को चलाने के पीछे एक दंपत्ति का हाथ है। सुपर्णा दास और संजीव दास नाम का ये जोड़ा मेरठ में कंकरखेड़ा क्षेत्र के एक रिसॉर्ट में स्ट्रिप शो का लालच देकर लोगों को ठग रहा था। जिसका पता चलते ही साइबर क्राइम सेल ने इनके 2 अकॉउंटों को बंद कर दिया। ये अकॉउंट सुपर्णा दास और मोहिउद्दुल अहमद के नाम पर थे।

साइबर सेल के मुताबिक उन्हें अपनी जाँच में मालूम चला कि जिन 2 खातों में पैसे डलवाए जा रहे हैं वो बैंक खाते कलकत्ता के हैं। जिसमें एक खाते में 70 हजार और दूसरे खाते में 40 हजार रुपए मौजूद है। जानकारी मिलते ही इसपर कार्रवाई हुई और दोनों अकॉउंट को पुलिस ने बंद करवा दिया।

एसपी ट्रैफिक ने बताया कि एमएम घोष रोड, नार्थ 24 परगना पश्चिम बंगाल की सुपर्णादास ने अपने पति संजीव दास के साथ मिलकर स्ट्रिप शो की फर्जी बुकिंग कराई। पुलिस ने महिला से संपर्क किया तो महिला ने अपने मोबाइल फोन बंद कर दिए। जिसके बाद उनपर मुकदमे के निर्देश दिए गए हैं।

एसपी के मुताबिक पश्चिम यूपी के अलावा मध्यप्रदेश और बंगाल में भी इस दंपत्ति ने ठगी का जाल बिछा रखा है, जिसके चलते भारी संख्या में ऑनलाइन टिकट बुक करवाए गए। इस दंपत्ति ने पैसे हड़पने के लिए ऑनलाइन 2000, 1500 और 1000 का टिकट रखा था। जो लोग इस शो के लिए बुकिंग करते थे उनके द्वारा दी गई राशि सीधा सुपर्णा और मोहउद्दुल के बैंक अकॉउंट में जाती थी।

मीडिया खबरों की मानें तो सुपर्णा का पति संजीव दास इस पूरे गिरोह का मास्टरमाइंड है। पुलिस का कहना है कि मेरठ में स्ट्रिप शो आयोजन का सपना दिखाकर केवल लोगों को ठगा जा रहा था। पुलिस का मानना है कि यह गिरोह पश्चिम बंगाल के नक्सली इलाके में छिपा हुआ है, जहाँ से बैठकर वह इस ऑनलाइन ठगी को अंजाम देने में लगा हैं।

क्या है मामला?

पिछले महीने मेरठ के कंकरखेड़ा क्षेत्र के एक रिसॉर्ट में स्ट्रिप शो के नाम पर ऑनलाइन बुकिंग का लिंक फेसबुक पर आ रहा था, जिसमें बाकायदा ऑनलाइन फॉर्म भरकर फीस जमा करानी होती थी। इसमें 2 बैंक खाते दिए गए थे। लेकिन जिस दिन स्ट्रिप शो का आयोजन होना था उस तारीख पर वहाँ कुछ नहीं हुआ। बल्कि रिसॉर्ट मालिक ने इस दौरान एसएसपी को इस पूरे मामले की तहरीर दी और ऐसे किसी आयोजन के होने से मना किया। इस दौरान रिसॉर्ट में आयोजन के नाम पर ठगी की आशंका जताते हुए वहाँ के मालिक ने जाँच की माँग की थी।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: कमलनाथ के भाँजे रतुल पुरी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

अगस्ता वेस्टलैंड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली की हाई कोर्ट ने कमलनाथ के भाँजे रतुल पुरी द्वारा दायर की गई अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। उल्लेखनीय है कि इस याचिका का प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कोर्ट में विरोध किया गया था।

न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सुनील गौड़ ने ईडी और पुरी के वकीलों की दलीलें सुनकर कहा था कि वह याचिका पर आज बाद में फैसला सुनाएँगे।

सुनवाई के दौरान रतुल पुरी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने निदेशालय पर आरोप लगाए थे कि उनका मुवक्किल पूरे मामले की जाँच में सहयोग करने को तैयार है। लेकिन एजेंसी का बर्ताव कानूनी दुर्भावना और प्रतिशोध से भरा हुआ था। जबकि ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिस्टर जनरल अमन लेखी ने पुरी की अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पुरी जाँच के दौरान सवालों का जवाब देने से बच रहे हैं और उनके उत्तर भी ईडी को भ्रामक लग रहे हैं।

बता दें 6 अगस्त को रतुल पुरी ने अधिवक्ता विजय अग्रवाल के माध्यम से अपनी याचिका में निचली अदालत में दायर की थी, लेकिन उस समय उनकी अग्रिम जमानत को निचली अदालत द्वारा खारिज कर दिया गया था। बाद में 9 अगस्त को अदालत ने पुरी के ख़िलाफ़ गैर जमानती वारंट जारी किया था।

इसके अलावा उनपर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने 354 करोड़ रुपए के बैंक घोटाले में मोजरबियर के पूर्व कार्यकारी निदेशक रतुल पुरी और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था

डियर शेहला सबूत तो जरूरी है, वरना चर्चे तो आपके बैग में कंडोम मिलने के भी थे

डियर शेहला रशीद शोरा,

आशा है आप सानंद होंगी। अब ये मत कहिएगा कि सेना की फटकार, सोशल मीडिया पर दुत्कार और कानून के कसते शिकंजे के बीच आनंद कैसा! पार्ट टाइम पढ़ाई और फुल टाइम पॉलिटिक्स की आपकी मेहनत को जानता हूॅं। दुख इस बात का है कि सोशल मीडिया ने लाइमलाइट में आने के आपके ट्रिक में गली के लौंडों को भी उस्ताद बना दिया है। फेक और फैक्ट का फर्क मिटा दिया है।

दुख इस बात का भी है कि आईएएस से नेता बने जिस शाह फैसल के साथ आप जम्मू-कश्मीर में दुकानदारी जमाने की ख्वाहिश पाल बैठीं थी, मोदी-शाह ने उस पर डाका डाल दिया। आपको अब्दुल्ला, मुफ्ती की तरह मलाई खाने का मौका नहीं मिला। अफसोस!

जानता हूॅं आप सदमे में हैं। इसलिए तो सबूत के नाम पर बहाने बना रही हैं। देती तो आप हैं नहीं और पूछ रहीं, दूॅंगी तो क्या सेना कार्रवाई करेगी। आप ही बताइए हवा-हवाई दावों से तो व्यवस्था नहीं चलेगी न। सबूत तो चाहिए ही। तब तो यकीनन चाहिए जब मामला देश से जुड़ा हो। लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा हो। या फिर हम मान लें कि दो जून की रोटी में बस ये पाकिस्तानी प्रोपगेंडा का रोना भर है।

वरना चर्चे तो बेगूसराय में पुलिस जॉंच के दौरान आपके बैग से भारी मात्रा में कंडोम बरामद होने के भी थे। हवा इतने जोर से फैली थी कि जिस सखा कन्हैया को जिताने आप बेगूसराय पहुॅंची थी वह ही चर्चे से हवा-हवाई हो गए थे।

लेकिन, किसी ने इस हवा पर भरोसा नहीं किया। मूढ़ मतियों की हवा में दम भी नहीं होता। अब इस मामले में कानून अपना काम कर रही है। उसे करना भी चाहिए, क्योंकि ऐसी बातें आपकी गरिमा, आपकी निजता पर आघात हैं।

पर हमने कभी इस अफवाह को लिबरलों की करतूत बता न हवा दी और न इस मामले में शिकायत दर्ज कराने वाली के चरित्र को खारिज किया। न उसकी निष्पक्षता पर शक किया। हमें तो आपके प्रति उसकी सद्भावना ही दिखी। लेकिन, आपने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले, पुलिस से शिकायत करने वाले वकील को भक्त बता दिया। एक ही झटके में उसकी निष्ठा और देश के प्रति उसके भाव को खारिज कर दिया।

आपके समर्थकों के ट्वीट को हमने गिरोह विशेष का कैंपेन नहीं कहा। और आपने ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड को पार्टी विशेष की करतूत बता दिया।

संवाद का आपका तरीका भी एकतरफा है। बस अपनी ही अपनी रटती हैं। मुश्किल में फँसती हैं तो अपने जैसों की ही रटती हैं। जब से लाइमलाइट में आईं हैं पक्ष में खड़े लोगों को ही रिट्वीट कर रही हैं। आजादी तो आपका पसंदीदा तराना है। हमारा भी है। इसलिए आपकी अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करते हैं। पर हमारी उन अपेक्षाओं का क्या जो आजादी को लेकर आपसे है?

आप भी न अच्छा खेलती हैं। पर खुदा कसम पकड़ी जाती हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि एक बार सबूत मारिए सरकार और सेना के मुॅंह पर। आपको यह करना भी चाहिए। क्योंकि आप व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा रहीं। कंडोम जैसी टुच्ची बात नहीं कर रहीं। आपका दावा है सेना कश्मीर में घरों में घुस कर लड़कों को उठा रही है। राशन जमीन पर बिखेर रही है। लोगों को आतंकित करने के लिए सार्वजनिक रूप से युवाओं को प्रताड़ित कर रही है। और ये सारे तथ्य आपने दिल्ली में बैठे-बैठे बड़ी मिहनत से जुटाए हैं। ट्वीट करने में अंगुलियों को हुआ दर्द अलग। आपकी इस मिहनत और दर्द का सम्मान होगा वह सबूत।

इससे उस पवित्र किताब पर हमारा भरोसा भी डोलेगा जिसे हम संविधान कहते हैं। जो हमें अपनी सेना और सरकार की बातों पर यकीन करने का भरोसा देती है। आप जैसी सुघड़ महिला भी इस किताब पर यकीन करती ही होंगी। यकीनन आप उस जमात में नहीं होंगी जो खुद को उड़ाकर, बेगुनाहों का खून बहाकर हूर पाने का रास्ता दिखाने वाली पवित्र किताब पर भरोसा करती है।

लाइमलाइट में आने और फिर खुद को पीड़ित बताने का स्टाइल पुराना हो गया। तो कुछ नया क्यूॅं नहीं करती। वैसे हम आपकी आजादी का सम्मान करते हैं। करना न करना आपकी मर्जी। लेकिन, नहीं चाहते कि य​ह आजादी उन टुच्चों को भी मिले जो आपके कंडोम प्रेम की अफवाहें फैलाते रहते हैं। बस यही हमारे और आपके बीच का फर्क है। यही भक्त और लिबरल होने का भी फर्क है।

आपके राजनीतिक भविष्य की उज्ज्वल कामनाओं के साथ!

आपका
…
(भक्त वगैरह जो आपकी मर्जी हो खुद डाल लीजिएगा)

वॉर होगा ही नहीं, हम तो शांति की बात करते हैं… और नेहरू ने ठुकरा दी थी CDS के गठन की सलाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS)’ का पद गठित करने की घोषणा की। सीडीएस भारत की तीनों सशस्त्र सेनाओं के बीच अच्छी तरह तालमेल बिठाने का कार्य करेगा। इसकी माँग कारगिल युद्ध के समय से ही चली आ रही थी। इससे पहले भी कई बार सीडीएस के पद के गठन की माँग उठी थी क्योंकि सेना के कई उच्चाधिकारियों ने भी इसकी ज़रूरत पर प्रकाश डाला था। कारगिल युद्ध के बाद बनी मंत्रीमंडलीय समिति ने भी यही सुझाव दिया था। लेकिन, किन्हीं कारणों से उस समय यह संभव नहीं हो पाया। अब इतिहास में थोड़ा और पीछे चलते हैं।

लॉर्ड माउंटबेटन ने लेफ्टिनेंट जनरल एमएल छिबर को इस बारे में 1977 में कुछ अहम जानकारियाँ दी थीं। तब माउंटबेटन ने छिबर को बताया था कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को शुरुआत में ही आगाह किया था कि अगर युद्ध की स्थिति आती है तो भारतीय सेना नहीं टिक पाएगी और तुरंत हार जाएगी। इसीलिए माउंटबेटन ने नेहरू को सलाह दी थी कि जनरल थिमय्या को सीडीएस नियुक्त कर दें। माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि उन्हें सैन्य स्तर पर काफ़ी समस्याएँ दिख रही हैं और इसीलिए वह ये निर्णय तुरंत लें। लेकिन नेहरू ने माउंटबेटन की बात को नकार दिया।

नेहरू ने माउंटबेटन को अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि युद्ध की स्थिति आएगी ही नहीं क्योंकि भारत तो सभी देशों के साथ शांति से रहना चाहता है। माउंटबेटन ने नेहरू को समझाया कि पाकिस्तान या चीन, किसी के साथ भी आपके देश का युद्ध हो सकता है क्योंकि युद्ध में दो पक्ष सम्मिलित रहते हैं, एक नहीं। भारतीय सेना के कई उच्चाधिकारियों द्वारा लिखी गई पुस्तक में कहा गया है कि नेहरू अपनी ख़ुद की ही बनाई एक दुनिया में रह रहे थे और उन्हें समसामयिक भौगोलिक-राजनीतिक परिस्थितियों का भान नहीं था।

और जब बात आई नेहरू के नेतृत्व क्षमता के परीक्षा की, अनुभवी सैन्य अधिकारी साफ़-साफ़ कहते हैं कि वे फेल हो गए। ‘Indian Defence Review Vol 30.2 Apr-Jun 2015‘ नामक इस पुस्तक में लिखा है कि न सिर्फ़ नेहरू, बल्कि उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन भी इस प्रस्ताव के खिलाफ़ थे। उत्तर पूर्वी राज्यों और भारत-चीन युद्ध पर पुस्तक लिख चुके शिव कुणाल वर्मा की एक पुस्तक का हवाला लें तो हमें साफ़ पता चल जाता है कि नेहरू द्वारा थिमय्या को सीडीएस न बनाने के पीछे कुछ और भी कारण थे। वर्मा लिखते हैं कि नेहरू जनरल थिमय्या को खतरे के रूप में देखते थे।

नेहरू सार्वजनिक रूप से ऐसा दिखाते थे कि थिमय्या उनके पसंदीदा व्यक्ति हैं लेकिन पीठ पीछे जनरल के ख़िलाफ़ साज़िश रचते थे। उन्हें ऐसा लगता था कि थिमैय्या भारतीय गणराज्य की सत्ता उनसे हथिया सकते हैं। थिमय्या को इस कारण इस्तीफा भी देना पड़ा था लेकिन नेहरू सार्वजनिक रूप से ख़ुद की वाहवाही कराने के लिए यह कहते रहे कि उन्होंने थिमय्या को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लिया है। अब यह सोचने लायक बात है कि जिस देश के नेता के मन में सेना के विरुद्ध जलन की भावना हो, वो रक्षा सम्बन्धी निर्णय सही से कैसे ले पाएगा?

अगर सीडीएस की बात करें तो अब तक सेना सम्बन्धी अधिकतर निर्णय केंद्रीय रक्षा सचिव लेते रहे हैं, जो कि ब्यूरोक्रेट होते हैं। केंद्रीय रक्षा सचिन को न तो सेना के आंतरिक मसलों का उतना ज्यादा अनुभव होता और न ही तीनों सेनाओं के बीच सही से तालमेल बिठाने में वो कामयाब रहते हैं। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय में नियुक्त ब्यूरोक्रेट किसी भी क्षेत्र से आया हुआ हो सकता है, इसीलिए ज़रूरी नहीं कि उसकी दक्षता सेना को लेकर सही ही हो। अभी तक कई देशों में सीडीएस की व्यवस्था है या फिर ऐसा ही एक समान पद है।

अधिकतर देश अपने शुरुआती युद्ध के दौर से ही समझ गए कि थल, जल और वायु सेनाओं के ऊपर एक व्यक्ति होना चाहिए, जो तीनों सेनाओं को समझे और फिर सरकार को उनकी राय के आधार पर सलाह दे। ध्यान दें कि यहाँ सेनाओं के बीच तालमेल बिठाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि तीनों आपस में लड़ते रहते हैं। हर परिस्थिति के लिए तीनों सेनाओं की अलग-अलग राय हो सकती है या फिर अधिकारीयों में रणनीतिक मतभेद हो सकते हैं। सीडीएस के रहते सरकार तक उनकी बात पहुँचाने और जल्दी उचित निर्णय लेने में सुविधा मिलेगी। कहते हैं, अगर कारगिल युद्ध के समय सीडीएस की व्यवस्था रहती तो वायुसेना का प्रयोग और अच्छी तरह हो सकता था।

आज जब आतंकी हर तरफ से घुसपैठ में लगे हैं और नभ, जल, थल- तीनों स्तर पर युद्ध की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं, एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी का होना ज़रूरी है जो तीनों सेनाओं के कार्यान्वयन में सरकार और सशस्त्र सेनाओं के बीच सेतु का कार्य कर सके। इसके लिए आपको मैनेजमेंट और कमांड के बीच अंतर समझने की ज़रूरत है। तक्षशिला इंस्टिट्यूट के सह-संस्थापक नितिन पाई के अनुसार, अगर सीडीएस कैबिनेट को सैन्य मुद्दों पर सलाह देगा तो ऑपरेशनल कार्यों में सेना को कमांड करने का कार्य सेना प्रमुख करेंगे।

कुल मिला कर हमने यह देखा कि जवाहरलाल नेहरू ने अगर सीडीएस पद गठन करने की की माँग या सलाह मान ली होती तो उसके बाद हुए युद्धों में भारत और भी बेहतर स्थिति में होता लेकिन, नेहरू सेना को भंग करने की बात करते थे। उनकी बनाई दुनिया में उन्हें लगता था कि सबकी सोच उनके जैसी ही है। शायद इसीलिए कई विश्लेषक कहते हैं कि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री किसी ऐसे व्यक्ति को होना चाहिए था, जिसे सैन्य प्रबंधन, संचालन और ऑपरेशन का अच्छा अनुभव और ज्ञान हो। शायद, सुभाष चंद्र बोस!

जनसंख्या नियंत्रण कानून ज़रूरी है, लेकिन 3 बच्चों तक इजाज़त दो: सपा नेता हसन

जनसंख्या नियंत्रण की प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद अब समाजवादी पार्टी के सांसद डॉ. एसटी हसन ने जनसंख्या नियंत्रण के विचार का समर्थन किया है। लेकिन मुरादाबाद के सांसद डॉ. हसन ने साथ में यह चेतावनी दी कि अगर भारत ने यह कानून बहुत समय तक लागू किया तो हमारी हालत चीन जैसी हो जाएगी, जहाँ वृद्धों की जनसंख्या में हिस्सेदारी बहुत अधिक हो गई है।

‘देश की जनसंख्या सेचुरेशन पर है’

मीडिया से बात करते हुए एसटी हसन ने कहा कि उनकी निजी राय है कि जनसंख्या नीति में तीन बच्चों तक की इजाज़त दी जानी चाहिए। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि कई बार लोगों के दोनों बच्चे एक ही लिंग के (दो बेटे या बेटियाँ) होते हैं, और वे बेटा-बेटी दोनों चाहते हैं, इसलिए ऐसे दम्पत्तियों के लिए एक बार और कोशिश का मौका होना चाहिए।

उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून की वकालत अवश्य की, लेकिन यह विचार भी रखा कि इसे केवल सीमित समय के लिए लागू किया जाना चाहिए। “अब हम देख रहे हैं कि देश की जनसंख्या सेचुरेशन पर है। देश के संसाधन अपने सेचुरेशन पर हैं लिहाजा ऐसे कानून बने जिससे इस पर रोक लगे। लेकिन ये कानून कुछ वक्त के लिए ही बनना चाहिए।”

उन्होंने साथ में इस कानून को अधिक समय तक चलाते रहने के खिलाफ भी चेताया। उनके अनुसार यदि भारत ने यह नीति बहुत दिनों तक अपनाई तो हमारा हाल चीन जैसा हो जाएगा। एक-बच्चा नीति कई पीढ़ियों से चली आने के चलते चीन ने जनसंख्या-वृद्धि को तो नियंत्रित कर लिया, लेकिन अब वह जनसंख्या में वृद्ध लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ जाने और उनकी देखभाल करने लायक युवाओं की कमी के चलते स्वास्थ्य और सामाजिक संकट से जूझ रहा है।

Breaking: चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका HC से ख़ारिज, ₹305 करोड़ के घोटाले का मामला

INX मीडिया घोटाले के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व गृह और वित्तमंत्री पी चिदंबरम को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस नेता के मामले में जस्टिस सुनील गौड़ ने 25 जनवरी को फैसला सुरक्षित कर लिया था, जिसे आज सुनाया गया है। इसके पहले कानून मंत्रालय ने भी उनके खिलाफ मामला चलाने की मंजूरी सीबीआई को दे दी थी। सीबीआई और ED दोनों ने ही अदालत से कहा था कि चिदंबरम से पूछताछ के लिए उन्हें हिरासत में लिया जाना ज़रूरी है क्योंकि सामान्य पूछताछ में वे गोलमोल जवाब दे रहे थे।

₹305 करोड़ का घोटाला

दरअसल यह पूरा मामला 2007 का है, जब पी चिदंबरम वित्त मंत्री थे। आरोप है कि कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता के जरिए आईएनएक्स मीडिया को विदेशी निवेश प्रमोशन बोर्ड से विदेशी निवेश की मंजूरी दिलाई थी। ज्ञात हो कि आईएनएक्स मीडिया को 305 करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हासिल हुआ था।

कार्ति चिदंबरम ने ही आईएनएक्स मीडिया की प्रमोटर इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी को पी चिदंबरम से मिलवाया था। इसके बदले कार्ति चिदंबरम ने घूस के तौर पर करोड़ो रुपए लिए थे। जबकि ऐसे मामलों में स्पष्ट निर्देश है कि विदेशी निवेश के लिए कैबिनेट की आर्थिक मामलों की सलाहकार समिति की इजाज़त लेना जरूरी है।

बता दें कि इस मामले में पी चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री (साल 2007) रहते हुए गलत तरीके से विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपने अलग आरोप पत्र में कहा है कि कार्ति चिदंबरम के पास से मिले उपकरणों में से कई ई-मेल मिली हैं, जिनमें इस सौदे का जिक्र है।