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कविता कृष्णन का ईमेल लीक: देश विरोधी एजेंडे के लिए न्यायपालिका, सेना, कला..के लोगों को Recruit करने की योजना

वामपंथी एक्टिविस्ट कविता कृष्णन के लीक्ड ईमेल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। इनमें उनकी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 से मिला विशेष दर्जा हटने के विरोध की रणनीति का ब्यौरा मौजूद है। स्क्रीनशॉट्स के रूप में लीक इन ईमेल में पुलिस थानों पर जाकर गिरफ़्तारी के ब्यौरे की माँग करने और अपने कार्य के लिए किस-किस गणमान्य व्यक्ति से बात हो सकती, इसके बारे में बात की गई है। यह ईमेल हाल ही में कश्मीर दौरे से लौटी उनकी ‘फैक्ट-फाइंडिंग टीम’ से जुड़ा लग रहा है।

‘कुछ लोग मैटेरियल लेकर आगे निकलो’

एक स्क्रीनशॉट में कविता कृष्णन ने तीन लोगों को निर्देश दिया कि पहले उनमें से कुछ बाकी की इकट्ठी की गई ‘सामग्री’ (फ़ोटो, वीडियो, दस्तावेज़ आदि) लेकर कश्मीर से निकल जाएँ, और फिर कोई एक-आधे लोग पुलिस के पास जाकर गिरफ़्तारियों के ब्यौरे की माँग करें।

फ़ौज से लेकर न्यायपालिका तक फैली जड़ें

चरम-वामपंथियों की जड़ें कितनी गहरी हैं, इन स्क्रीनशॉट्स में इसकी भी नज़ीर है। दूसरे स्क्रीनशॉट में कविता कृष्णन पूर्व-सैन्यकर्मी कपिल काक, जस्टिस शाह के बारे में बात करतीं, उनका नाम लेतीं नज़र आतीं हैं। इसका संदर्भ क्या है, यह पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अनुमान इस ट्वीट से लगाया जा सकता है:

ट्वीट में वायुसेना के पूर्व उप-प्रमुख यह वामपंथी प्रोपेगंडा फैलाते नज़र आते हैं कि कैसे भारत ने कश्मीर की आशाओं पर खरा उतरने में असफलता पाई है, न कि कश्मीर ने भारत की।

न्यायपालिका में सेंधमारी की लगातार कोशिश

तीसरे स्क्रीनशॉट में फिर से किसी “जस्टिस शाह” का ज़िक्र होता है। राकेश शुक्ला नामक कृष्णन के सहयोगी बताते हैं कि जस्टिस शाह के अलावा और भी सेवानिवृत्त जजों को ‘अप्रोच’ किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों, जैसे कला, कानून, लेखन आदि के भी गणमान्यों को भी अपनी तरफ़ करने के बारे में चर्चा होती है।

सोशल मीडिया पर कर रहा ट्रेंड

कविता कृष्णन के ईमेल्स के यह स्क्रीनशॉट सोशल मीडया पर वायरल हो गए हैं, जहाँ इनकी कड़ी आलोचना हो रही है।

कश्मीर में पंडित सुरक्षित है और कट्टरपंथी आतंक में हैं: भारतीय मीडिया की पाक अकुपाइड पत्रकारिता

फातिमा इतनी छोटी है कि उसे पता भी नहीं कि कश्मीर में क्या हो रहा है। वो अपने भाई मूसा से बात नहीं कर पा रही। उसके भाई ने कहा था कि इस बार ईद में आएगा तो उसके लिए गुब्बारे ले कर आएगा। फातिमा हर आहट पर बार-बार दरवाजे तक जाती है और लौट आती है कि शायद मूसा आया होगा। अम्मी और अब्बू जानते हैं कि फोन बंद हैं, और बिटिया इतनी छोटी है कि उसे समझाया नहीं जा सकता कि अनुच्छेद 370 के क्या मायने हैं। वो मासूम यह नहीं जानती कि उसका स्कूल कब खुलेगा, वो वहाँ कब पढ़ने जाएगी और उसके डॉक्टर बनने का सपना कब पूरा होगा।

ये एक फर्जी ‘दुख भरी कहानी’ है जो आपको नाम बदल कर हर पाक अकुपाइड पत्रकार लिखता मिलेगा। ये न लिख पाए, तो दस लोगों का नाम लिख कर यह बताता मिलेगा कि ‘स्थानीय कश्मीरी नवयुवक ने बताई अपनी व्यथा’। वो सारे नवयुवक फर्जी होते हैं, जैसे कि इन लिबरपंथियों का पूरा नैरेटिव है। उन्हें तैयार किया जाता है बोलने के लिए।

ऐसी दुख भरी कहानियों का इस्तेमाल ट्रैफिक वालों के चालान से बचने के लिए बहुत लोग करते हैं। ऐसी कहानी आपको भावुक ज़रूर कर देगीं, लेकिन वो पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। जिस देश में 95% लोग या तो गरीब हैं, या बहुत गरीब, वहाँ आपको ऐसे दस करोड़ परिवार मिल जाएँगे जिनके सामने दैनिक जद्दोजहद से ले कर शिक्षा, स्वास्थ्य और घर की छत जैसी समस्याएँ होती हैं। सवा अरब जनसंख्या वाले गरीब देश में ये एक सच्चाई है लेकिन इसे ऐसे सामने लाना, जैसे ऐसे बस दस ही परिवार हैं, और उन्हें सरकार सता रही है, बताता है कि कुछ लोगों की पत्रकारिता बियॉन्ड रिपेयर हो चुकी है।

पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस तरह के इंतजाम नेहरू घाटी सभ्यता की शुरुआत से ही करता आ रही है। ‘सूत्रों के हवाले से’ लिख कर इन्होंने इतना मूत्र विसर्जन किया है कि लोगों को इस गिरोह के पोर्टलों से ज्यादा विश्वास व्हाट्सएप्प पर फॉरवर्ड होने वाले मीम पर होने लगा है। पाक अकुपाइड पत्रकारों के गिरोह ने पिछले कुछ सालों में एक ही पक्ष की बड़ाई और एक ही पक्ष की बुराई में जितनी सक्रियता दिखाई है, वो अतुलनीय है।

पिछले दिनों ‘फैक्ट फाइंडिंग टीम’ के नाम पर लम्पट पत्रकारों और एक्टिविस्टों का एक गिरोह कश्मीर गया था। कश्मीर का मतलब क्या है, वो वही जानें, क्योंकि इनके लेख और विडियो में कई गड़बड़ियाँ हैं। पहली बात तो यह है कि जिस राज्य का बँटवारा हुआ उसमें जनसाँख्यिकी के हिसाब से मुस्लिम बहुल कश्मीर, बौद्ध बहुल लद्दाख और हिन्दू बहुल जम्मू आते हैं। तो सिर्फ कश्मीर जा कर लोगों से पूछना कि उनकी क्या राय है, बताता है कि आपने निष्कर्ष पहले से ही तय कर दिया है और बाद में अपनी जासूसी कहानी बना रहे हैं।

एक विडियो शेयर किया गया है जिसमें लोगों के पैर दिख रहे हैं, और वो कह रहे हैं कि मोदी का इतना खौफ है कि वो चेहरा नहीं दिखाना चाह रहे। ये आइडिया बहुत सही है क्योंकि आप किसी भी चार आदमी से कुछ भी बुलवा कर पूरे जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के लोगों का प्रतिनिधित्व करवा सकते हैं। ये आइडिया ज्यादा से ज्यादा क्यूट कहा जा सकता है, तार्किक तो ये बिलकुल नहीं है।

पत्रकारिता में सिर्फ एक पक्ष को दिखाना ही सही नहीं होता। अपनी सहूलियत के हिसाब से आप चार जगह जाते हैं, जो कि घोषित रूप से आंतक ग्रस्त हैं और अलगाववाद की आवाज वहीं से सबसे ज्यादा उठती रही है। सरकार का फैसला भी इलाके को अलगाववाद और आतंक से मुक्त करने को लिए है। जाहिर है कि ऐसे इलाके में आपको आपके मन के लायक दसियों लोग बयान देते मिल जाएँगे।

लेकिन, जिस इलाके में ये लोग गए गए हैं वहाँ के नवयुवक तो हजारों की संख्या में आतंकियों के जनाजे में शामिल होते हैं, पत्थरबाजी करते हैं, और चेहरा दिखाने में बिलकुल संकोच नहीं करते। फिर अपनी बात कहने का मौका ये लोग कैसे छोड़ रहे हैं? ये तो आजादी के परवाने हैं न, तो कैमरे पर आ कर पूरी दुनिया को अपनी बात बताने में डर गए? इसका मतलब तो यही है कि भारतीय सेना देशविरोधी आतंकियों के खिलाफ अपने अभियान में सफल हो रही है क्योंकि ये वही इलाके हैं जहाँ आतंकी की लाश देख कर बाप बोलता है कि और बेटे होते तो उसे भी शहीद कर देता।

ये कुछ नहीं है, बस जहर भरने की कोशिश है। कश्मीर का मसला अव्वल तो सिर्फ चार जिले के मुस्लिमों का मसला नहीं है। अगर उनके भी हिसाब से देखें तो पूर्व राज्य के तीनों भूभागों, जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, के लोगों से राय ली जानी चाहिए न कि दस-पचास आतंकियों या अलगाववादियों को पकड़ लाए और कहा कि हम तुम्हारे चप्पल पर कैमरा रखेंगे, तुम बोलते रहो। ये सब भावनात्मक उबाल लाने के लिए सही लगता है, लेकिन इसे पत्रकारिता तो बिलकुल नहीं कहते।

कश्मीर का मसला या समुदाय विशेष का मसला?

आप इस गैंग की ताकत देखिए कि ये वाशिंगटन पोस्ट में नैरेटिव छापने से लेकर लंदन स्थित भारतीय दूतावास तक में सैकड़ों मुस्लिमों की भीड़ ले आते हैं। और जब भीड़ जमा होती है तो आपको पता ही क्या होता है: पत्थरबाजी। चूँकि हर जगह पत्थर उपलब्ध नहीं होते तो लंदन में जुटे लोगों ने अंडे, पानी की बोतल और बाकी चीजों को भारतीय स्वतंत्रता दिवस के आयोजन पर फेंकने का निर्णय लिया।

इसलिए, यह बात कश्मीर की रहने ही नहीं दी गई। यह बात मजहब विशेष की बना दी गई है। इस बात पर व्हाइट हाउस के बाहर समुदाय विशेष के किसी आदमी की ईसाई पत्नी हाथ में पोस्टर लेकर पागल हो रही है कि कश्मीर में गलत हो रहा है। ऐसे में, आज के समय में कश्मीर के कुछ हिस्सों के कुछ मुस्लिमों से चार बातें कहलवाना मुश्किल नहीं है।

आज किसी को जम्मू के लोगों की आशाओं की बात नहीं करनी, लद्दाख की बात नहीं करनी, कश्मीर में हिन्दुओं का क्या हुआ, इस पर बात नहीं करनी। कश्मीर में दलितों की क्या हालत है, इस पर दलित विचारक भी नहीं बोल रहे। कोई यह बताने में सक्षम नहीं है कि क्या हमारे देश की जियो-पोलिटिकल स्थिति ऐसी है कि हम कश्मीर के चार जिलों के लोगों की राय ले कर उनकी बात मान लें? फिर तमिलनाडु के लोगों को, बिहार के मिथिला के लोगों को, गोवा के लोगों को, मणिपुर के लोगों को भी यही आजादी दे दी जाए?

लम्पट मंडली कहेगी कि ‘हाँ, दे दी जाए’। ये हमेशा चिल्लाते हैं कि भारत राष्ट्र नहीं, संघ है। जैसे कि ऐसा बोलने से वास्तवकिताएँ बदल जाती हैं। संघ तो अमेरिका भी है, वो हमसे बड़ा भी है, विकसित भी है, विविध भी है। वहाँ तो सब ठीक चल रहा है, फिर यहाँ ‘संघ’ वाली बात ला कर हर बात पर अमेरिका का मुँह ताकने वाले गिरोह के लोग भारत के मामले में इसे ऐसे कैसे देखते हैं कि सारे राज्यों को, हर व्यक्ति को ‘सेल्फ डिटर्मिनेशन’ का अधिकार होना चाहिए।

मेरे ख्याल से वो अधिकार मिला हुआ है। हर राज्य के लोग लोकसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक अपना मत, यानि अपना विचार, वोट के रूप में प्रकट करते रहे हैं। उन्होंने कभी ऐसी बात नहीं की कि उन्हें भारत का हिस्सा नहीं बनना है। ये ‘भारत एक यूनियन’ है, नक्सलियों और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वालों की बेहूदी हरकत है, जिसका कोई खरीदार नहीं है।

आजादी दे भी दें तो होगा क्या? एक तरह से कश्मीर तो अलग देश था ही अब तक। वहाँ बाकी देश के लोगों पर तमाम तरह की पाबंदियाँ थीं, अपना कानून था, अपना संविधान और झंडा था। इसका हासिल क्या रहा? आतंकवाद और अलगाववाद जिसे पाकिस्तान हवा देता रहा। जब उस अलगाववाद और इस्लामी आतंक के दंश को भारतीय सेना ने प्रत्यक्ष और भारतीय जनता ने अप्रत्यक्ष रूप से, आतंकी हमलों के रूप में झेला है, तो फिर कश्मीर पर बोलने का हक सिर्फ कश्मीरियों का वैसे भी नहीं रहा।

वहाँ के अल्पसंख्यकों की हालत पर कौन बोलेगा?

कश्मीर को नेहरू की मनमानी से कुछ भी नहीं मिला। इसका लाभ पाकिस्तान ने उठाया और इस्लामी आतंकियों ने हिन्दुओं को वहाँ से भगा कर अपने इरादे जाहिर कर दिए। और इन चिरकुट पत्रकारों की हिम्मत तो देखिए कि ये कश्मीर और जम्मू में बसे दो-एक कश्मीरी पंडितों से पूछ लेते हैं कि वो कैसे रह रहे हैं, और वो अचानक से सारे हिन्दुओं के प्रतिनिधि हो जाते हैं। वहाँ ये लॉजिक नहीं लगाते कि मजहबी कट्टरपंथियों के बीच बसे दो हिन्दू परिवारों के पास उनके खिलाफ बोलने में कितना डर लग रहा होगा।

ये एक स्थापित सत्य है कि एक ख़ास शांतिप्रिय समुदाय की आबादी जहाँ भी बहुसंख्यक है, चाहे वो कश्मीर हो, पाकिस्तान हो, बंग्लादेश हो, या फिर कैराना या मेरठ, अल्पसंख्यकों का जीना हराम कर देती है। लोग घरों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर निकल जाते हैं। तो क्या लद्दाख के बौद्ध लोगों का डर नाजायज है कि जब कश्मीरी आतंकी वहाँ लहसुन-ए-हिन्द चिल्लाकर नारा-ए-अदरक लगाते आएँगे तो उन्हें वहाँ से भाग कर कहीं और नहीं जाना पड़ेगा?

फिर लद्दाख के लोगों की चिंता कौन करेगा? उनके पैरों को दिखाते हुए विडियो कौन बनाएगा कि वो क्या चाहते हैं और वो चेहरा इसलिए नहीं दिखा रहे कि कश्मीर से कुछ आतंकी आएँगे और उनके घर पर बम फेंक देंगे। याद कीजिए कि जस्टिस नीलकंठ गंजू, सब इंस्पेक्टर अमर चंद, पंडित टिकाराम जैसे लोगों को किसने मारा था और क्यों मारा था। इनकी हत्याओं के बाद जब दसियों कश्मीरी पंडितों के हत्या का सिलसिला चला, उसके बाद क्या हुआ ये भी याद दिलाना जरूरी है।

इसलिए, ये मसला कश्मीर का अब रहेगा भी नहीं। ये मसला समुदाय विशेष के पूरी दुनिया के लोगों के सर पर फेंका जा रहा है। इसे ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे कि ये बात खास समुदाय पर अत्याचार की है जबकि बगल के पाक अधिकृत कश्मीर में क्या हो रहा है, उसकी चिंता समुदाय के इन्हीं लोगों की नहीं है। बात समुदाय विशेष पर हो रहे अत्याचार की नहीं है, बल्कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस निर्णय को कश्मीर के लोगों की बेहतरी का ही मानेगा। हाँ, ये बात और है कि बेहतरी की परिभाषा बदल कर पाँच सौ रुपए के लिए पत्थर फेंकना, और साल भर में आतंकी बन कर सेना की गोलियों का शिकार होना कर दिया जाए, तो वाकई ये निर्णय गलत है।

किस बात की आजादी?

इसलिए, सहूलियत से सैंपल उठा कर, अपने मतलब की बातें बुलवा कर, चार लोगों को पूरे कश्मीर के लिए बोलने वाला नहीं माना जा सकता। उसके लिए चुनाव होंगे, और कश्मीरियों को उसी हिसाब से चलना होगा। वहाँ वो बेशक ऐसे लोगों को वापस चुन लें जिन्होंने अपनी पारिवारिक संपत्ति में वृद्धि जरूर की और अपने परिवार के बच्चों को बाहर पढ़ने को भेजा।

कश्मीरी मुस्लिम ये बात तो भूल जाएँ कि उनकी ‘आजाद कश्मीर’ जैसी वाहियात कल्पना को सुना भी जाएगा क्योंकि ये भारत की संप्रभुता पर हमला है। भारत के भीतर कश्मीर है, और कश्मीर में भारत विरोध में उठे स्वर का विरोध हर भारतीय करेगा क्योंकि कश्मीर से जो आता है, वो सिर्फ़ कंबल नहीं होता। वहाँ के रास्ते से आतंकी भी आते हैं, उनके बमों से कश्मीर के खास मजहब के लोग नहीं मरते, भारत के हर कोने के लोग मारे जाते हैं।

इसलिए कश्मीर का मसला कश्मीर तक ही सीमित नहीं है। कश्मीर का मसला मजहब विशेष का नहीं है इसलिए वो पूरी दुनिया में अपनी बीवियों को दूतावासों और राष्ट्राध्यक्षों के निवास पर बुर्के में पोस्टर ले कर भेजते रहें, उससे होगा कुछ भी नहीं। लंदन वालों को भारत की नहीं सोचनी चाहिए, उन्हें यह देखना चाहिए कि बर्मिंघम के पार्कों में नमाज पढ़ी जा रही है, जो कि लंदन की सड़कों पर भी फैलेगी। तब उसका सामना कैसे करोगे। हम तो कश्मीर संभाल लेंगे। जब 370 के साथ संभाल लिया, तो अब तो हालात बिलकुल बदल गए हैं।

कश्मीर का मसला पूरे भारत का है, और हर भारतीय को उस पर बोलने का उतना ही हक है जितना कश्मीर के लोगों का। और हाँ, भारत का कोई एक हिस्सा आजाद नहीं है, भारत पूरी तरह से आजाद है।

तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री ने लिया U-Turn कहा- जाति सूचक कलाई बैंड जारी रहेंगे, लिबरल गैंग चुप

तमिलनाडु सरकार द्वारा कुछ दिन पहले जाति दर्शाने वाले कलाई बैंड पर बीजेपी नेताओं के कड़े विरोध के बाद प्रतिबंध लगाया गया था लेकिन अब तमिलनाडु के स्कूलों में बच्चों की जाति पहचानने के लिए कलाई बैंड का विवाद अब यू-टर्न लेता नजर आ रहा है। जानकारी के मुताबिक राज्य के शिक्षा मंत्री के ए सेनगोट्टियन, जिन्होंने कलाई बैंड के प्रतिबंध पर पहले बयान दिया था कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है इसलिए इसे राज्य में कार्यान्वित नहीं किया जाएगा। वो अब बिलकुल अलग मत रख रहे हैं।

दो दिन पहले पास किए गए सर्कुलर में हवाला दिया गया था कि तमिलनाडु के कुछ स्कूलों में रंगीन कलाई बैंड बाँधने के लिए कहा जाता है। जैसे लाल, पीला, हरा, केसरी। इन रंगों से पता चलता था कि बच्चा अनुसूचित जाति से है या फिर किसी ऊँची जाति से।

इस भेदभाव पूर्ण प्रथा पर पर बीजेपी नेताओं के विरोध के कारण प्रतिबन्ध लगाया गया था लेकिन अब तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री के ए सेनगोट्टियान ने कहा, स्कूल में जाति की पहचान के लिए पहने जाने वाले कलाई बैंड पर कोई प्रतिबंध नहीं लगेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने ये फैसला उनको जानकारी दिए बिना लिया है। क्योंकि इसका उद्देश्य सिर्फ़ विवाद उत्पन्न करना था।

उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा जारी बयान में सिर्फ़ कलाई बैंड के ऊपर प्रतिबंध लगाने की बात नहीं कही गई थी बल्कि अंगूठी पहनने की और माथे पर तिलक लगाने की बात पर भी प्रतिबंध था। क्योंकि वो भी एक तरह से जाति सूचक हैं।

स्कूल शिक्षा निदेशक ने इस फैसले के बाद अधिकारियों से शुरुआती पहल में उन स्कूलों की पहचान करने के लिए भी कहा था जहाँ इस तरह के भेदभाव किया जाता है। जारी किए गए निर्देशों में बताया गया था कि इस तरह के सूचकों को स्कूल की स्पोर्ट टीम के गठन के दौरान देखा जाता है। साथ ही क्लास में और लंच के समय उन बच्चों को पहचानने के दौरान भी ये सूचक अहम भूमिका निभाते हैं।

लेकिन, एच राजा द्वारा किए गए ट्वीट में कहा गया कि स्कूल में कलाई बैंड पहनने पर और माथे पर तिलक लगाने पर कोई प्रतिबंध नहीं हैं।

गौरतलब है कि शिक्षा मंत्री के बयान के इतर जब तमिलनाडु के मंत्री डी जयकुमार से स्कूलों में जाति आधारित बैंड इस्तेमाल किए जाने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि स्कूलों में जाति के आधार पर किसी भी छात्र के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इसके लिए काम भी कर रही है। 

ऐसी भेदभाव पूर्ण प्रथा के बाहर आने के बाद भी किसी भी लिबरल गैंग का इस पर कोई विरोध या प्रतिक्रिया नहीं आ रही है। शायद आए भी नहीं क्योंकि यहाँ बीजेपी नेता जहाँ इस आदेश का विरोध कर रहे हैं तो वहीं लिबरल गैंग बीजेपी विरोध में घोर जातिवादी प्रथा का मौन समर्थन।

खुश हूँ कि 370 के विरोध में कश्मीरी लड़के सड़क पर नहीं उतरे, हमारे पास और रास्ता है: शेख अब्दुल्ला की पोती

जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) के संस्थापक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला की बड़ी पोती और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद शाह की बेटी की आलिया अब्दुल्ला ने कश्मीर मुद्दे पर सरकार द्वारा लिए गए फैसले पर
शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) को अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की। उन्होंने राज्य से अनुच्छेद 370 के निष्क्रिय होने के बाद कश्मीरी लड़कों के सड़कों पर विरोध प्रदर्शन में न उतरने को लेकर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि
उन्हें खुशी है कि इसके विरोध में कश्मीरी लड़के सड़क पर नहीं उतरे।

उन्होंने कहा कि उनके पास एक और रास्ता है। मगर, फिलहाल शांत रहने की जरूरत है। आलिया ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सब कुछ खुलने के बाद भी लोग शांत रहेंगे। केंद्र सरकार द्वारा राज्य के विशेष दर्जा को खत्म करने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेश-जम्मू कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करने को लेकर उन्होंने एएनआई से बात करते हुए ये बातें कहीं।

हालाँकि, उन्होंने प्रदेश में लगाए गए प्रतिबंधों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें लॉकडाउन करके रखा गया है और परिवार के उन सदस्यों से भी नहीं मिलने दिया जा रहा है, जिनका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। उनका कहना है कि अब इस फैसले के 12 दिन हो गए हैं और सरकार को इसमें छूट देनी चाहिए। साथ ही उन्होंने राज्य के एक और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के नजरबंद न करने की बात को झूठा बताया और सरकार पर आरोप लगाया कि फारूक के सांसद होने के बावजूद उन्हें नजरबंद रखा गया था।

आलिया ने कहा, “मेरा मानना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोगों को एक दूसरे के साथ बात करने की छूट होने चाहिए। हमारे ऊपर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।” आलिया ने जम्मू कश्मीर के नेताओं द्वारा राज्य में हिंसा के लिए उकसाने की बातों का भी खंडन किया और कहा कि लॉकडाउन से ठीक एक दिन पहले सभी लोगों से गुप्कर डेक्लरेशन (Gupkar declaration) के माध्यम से शांति बनाए रखने के लिए कहा गया था। इसके साथ ही बोलने के संवैधानिक अधिकार को रेखांकित करते हुए आलिया ने कहा कि सरकार को घाटी के राजनेताओं से अपनी भाषा बोलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और उनके (घाटी के राजनेताओं) विचारों का सम्मान करना चाहिए।

Video Viral: वीरगति प्राप्त सैनिक की पत्नी के लिए बनवाया नया घर, हथेलियों पर चलाकर कराया गृह-प्रवेश

मध्य प्रदेश के इंदौर में एक बलिदानी के परिवार के लिए युवाओं ने इंसानियत की जो मिसाल पेश की, वो तालियों की हक़दार है। दरअसल, बेटमा गाँव के युवाओं ने 27 साल पहले वीरगति को प्राप्त हुए जवान के घर को कच्चे मकान से बदलकर पक्के मकान में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने गृह प्रवेश के रास्ते में जवान की पत्नी के आगमन पर अपनी हथेलियाँ तक सजा दीं, जिन पर चलकर वो घर में दाखिल हुईं। सोशल मीडिया पर युवाओं के इस बेहतरीन अंदाज़ का एक वीडियो वायरल हो गया है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि बलिदानी की पत्नी ने हथेलियाँ सजाए रास्ते से गुज़र कर अपने नए घर में प्रवेश किया। 21 सेकंड के इस वीडियो के वायरल होते ही यूज़र्स ने युवाओं की जमकर तारीफ़ की। किसी ने लिखा, ‘इंसानियत अभी भी ज़िंदा है, जय हिंद जय भारत’, तो किसी ने अपील की कि इस तरह की न्यूज़ को अधिक से अधिक प्रसारित किया जाना चाहिए।

एक अन्य यूज़र ने लिखा, “मैं बहुत भावुक था और मैंने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों को खोजने के लिए संघर्ष किया। एकदम अनोखा अंदाज़। उन्हें (पत्नी) अपने हाथों पर चलाना अद्वितीय है। इन सभी युवाओं ने भारत को गौरवान्वित किया है। बहुत धन्यवाद।”

दरअसल, 27 साल पहले बेटमा गाँव के निवासी मोहन सिंह सुनेर BSF में तैनात थे। 31 दिसंबर 1992 को असम में पोस्टिंग के दौरान उन्हें वीरगति प्राप्त हुई थी। उसके बाद से ही मोहन सिंह का परिवार झोपड़ी में किसी तरह से गुज़र-बसर कर रहा था। उनकी इस स्थिति को देखते हुए गाँव के युवाओं ने उनके परिवार के लिए पक्का घर बनवाने का बीड़ा उठाया।

युवाओं ने पक्का घर बनाने के लिए ‘वन चेक-वन साइन’ नाम से अभियान चलाया। इस अभियान के माध्यम से युवाओं ने 11 लाख रुपए जुटाए। इसमें से 10 लाख रुपए से पक्का मकान तैयार किया गया और बचे हुए 1 लाख रुपए से हुतात्मा मोहन सिंह की प्रतिमा बनवाई गई। 73वें स्वतंत्रता दिवस के ख़ास मौक़े पर युवाओं ने बलिदानी मोहन सिंह के परिवार को यह घर तोहफ़े के रूप में सौंप दिया।

कश्मीर पर छलका गौहर खान का दर्द, लोगों ने घाटी के 30 साल का इतिहास बता कर दिया शांत

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का पावर खत्म के बाद विशेष गिरोह के लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से इस फैसले पर विरोध जताया जा रहा है। राजनेता से लेकर पत्रकार इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इस सूची में कई बॉलीवुड सितारों का नाम भी शामिल हैं। जिसमें हालिया नाम बिग-बॉस सेलेब्रिटी गौहर खान का है।

गौहर ने अपने हालिया ट्वीट में कश्मीर के लोगों के प्रति चिंता जताई है। उन्होंने कश्मीर में लगी पाबंदियों के बीच अनुच्छेद 370 हटाने का पर्याय पूछा है। जिसके बाद उनका ये ट्वीट सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

गौहर खान ने अपने ट्वीट में कहा, “हमारे देश की करीब 80 लाख से ज्यादा आबादी बाहर की दुनिया से किसी भी तरह का संपर्क नहीं कर पा रही है। क्या अनुच्छेद 370 हटाने और कश्मीर को हमारे साथ मिलाने का यही मूल कारण था? कश्मीर की पूरी जनता को संपर्क रहित बनाकर हम उन्हें एक साथ लाने का आत्मविश्वास कैसे ला सकते हैं?”


गौहर के इस ट्वीट के बाद यूजर्स ने उन्हें उनके ट्वीट पर जमकर घेरा। लोगों ने उनसे पूछा, “जब कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया था तब तुम कहा थीं और कहाँ था ये दुख-दर्द।”

एक यूजर ने उन्हें समझाने का भी प्रयास किया कि जिस परेशानी से भारत पिछले 70 सालों से गुजरा है उसे सही होने में कुछ समय लगेगा। प्रधानमंत्री मोदी अपने कर्तव्य पूर्ण रूप से निभा रहे हैं, हमें अपने देश की सरकार पर विश्वास करना चाहिए।

बौखलाए Pak को अमेरिका ने दिया एक और झटका, आर्थिक मदद में की 44 करोड़ डॉलर की कटौती

आर्थिक संकट से गुज़र रहे पाकिस्तान को अमेरिका ने एक और क़रारा झटका दिया है। अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद में भारी कटौती की है। 2009 के ‘केरी लूगर बर्मन’ एक्ट के तहत पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद की आधिकारिक घोषणा पाक पीएम इमरान ख़ान के अमेरिकी दौरे के तीन सप्ताह पहले ही कर दी गई थी।

दरअसल, अमेरिका ने आज से 9 साल पहले केरी लूगर बर्मन एक्ट के तहत पाकिस्तान को दी जाने वाली प्रस्तावित आर्थिक मदद में पूरे 44 करोड़ डॉलर की कटौती कर दी है। अब पाकिस्तान को जो आर्थिक मदद मिलेगी वो 4.1 अरब डॉलर होगी। पाकिस्तान को दी जाने वाली यह धनराशि ‘पाकिस्तान एन्हांसमेंट पार्टनरशिप एग्रीमेंट (PEPA) 2010’ के तहत मिलती थी। ख़बर के अनुसार, 90 करोड़ डॉलर की बची हुई अमेरिकी मदद पाने के लिए पाकिस्तान ने पिछले सप्ताह ही PEPA की समय-सीमा बढ़ा दी थी।

अक्टूबर 2009, में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने ‘केरी लूगर बर्मन एक्ट’ पास किया था और इसे लागू करने के लिए सितंबर 2010 में PEPA में हस्ताक्षर किए थे। इस एक्ट के तहत, पाकिस्तान को पाँच साल की अवधि में 7.5 अरब डॉलर की मदद दिए जाने की व्यवस्था की गई थी। इस एग्रीमेंट को पाकिस्तान की आर्थिक संरचना में निवेश करने के मक़सद से लाया गया था और इसके दायरे में देश के ऊर्जा और जल संकट को दूर किया जाना था।

पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के अनुसार, PEPA उन चार माध्यमों में से एक है जिसके ज़रिए अमेरीका पाकिस्तान को नागरिक आर्थिक मदद पहुँचाता है। ख़बर है कि वर्ष 2001 के बाद से पाकिस्तान को सभी माध्यमों से अमेरिका ने क़रीब 8.2 अरब डॉलर की आर्थिक मदद का वादा किया है, जिसमें से 6.6 अरब डॉलर की मदद पाकिस्तान को दी जा चुकी है।

अब ये और बात है कि PEPA समझौते के लागू होने के बाद से ही पाकिस्तान और अमेरिका के मध्य संबंध बिगड़ने शुरू हो गए थे। इसका सीधा असर अमेरिका की प्रतिबद्धताओं और आर्थिक मदद पर भी पड़ा। इसके अलावा एक दूसरी वजह यह भी है कि हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटा लिए जाने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान के लगातार अनुरोधों के बावजूद अमेरिकी, कश्मीर को द्विपक्षीय स्तर पर मामले को सुलझाने के अपने पुराने रुख़ पर अभी क़ायम है।

अब तक कोई मौत नहीं, ना कोई गंभीर रूप से घायल – अगले सप्ताह खुल जाएँगे स्कूल भी: J&K मुख्य सचिव

जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव ने वहाँ के अब तक के हालातों और आर्टिकल 370 के पर कतरने के बाद की स्थिति पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ताजा जानकारी दी। J&K मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने बताया कि पूरे राज्य के 22 में से 12 जिलों में स्थिति सामान्य है। पूरी प्रक्रिया में अब तक किसी भी नागरिक की मौत नहीं हुई है, ना ही कोई गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ है।

मुख्य सचिव सुब्रह्मण्यम के अनुसार आम जनों की सुरक्षा को देखते ऐहतियातन लोगों के इकट्ठा होने और उनके मूवमेंट पर रोक लगाई गई थी। साथ ही कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया था ताकि स्थिति को कंट्रोल में रखा जा सके। उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे ये सभी प्रतिबंध हटाए लिए जाएँगे और इस सप्ताह के बाद स्कूल-कॉलेज भी खुल जाएँगे।

सरकार की प्राथमिकता से अवगत कराते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक की जान नहीं जाए, इसके लिए सरकारी तंत्र के द्वारा काफी मेहनत और प्लानिंग की गई। मीडिया की मदद के लिए मीडिया सेंटर भी खोला गया।

जैसे-जैसे घाटी में स्थिति नियंत्रण में हो रही है, उसी के अनुसार सरकार अगला कदम उठा रही है। इसी क्रम में मुख्य सचिव सुब्रह्मण्यम ने बताया कि कल यानी शनिवार (17 अगस्त 2019) से श्रीनगर में लैंडलाइन फोन शुरू कर दिए जाएँगे और इसी प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे बाकी जिलों के भी फोन शुरू किए जाएँगे।

कॉन्ग्रेस की लापरवाही की वजह से छूटे सभी आरोपित: पहलू खान मामले में गहलोत पर बरसीं मायावती

राजस्थान के अलवर में 2017 में हुए पहलू खान हत्याकांड मामले में आरोपितों को निचली अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर बसपा प्रमुख मायावती ने घोर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। उन्होंने आरोपितों की रिहाई पर कॉन्ग्रेस पार्टी और राजस्थान सरकार पर निशाना साधा है। मायावती ने राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर इस मामले में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार की लापरवाही की वजह से ही मामले के आरोपित रिहा हो सके। मायावती ने अपने ट्वीट के जरिए राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार पर सवाल उठाया है।

मायावती ने अपने ट्वीट में लिखा, “राजस्थान कॉन्ग्रेस सरकार की घोर लापरवाही व निष्क्रियता के कारण बहुचर्चित पहलू खान माब लिंचिंग मामले में सभी 6 आरोपित वहाँ की निचली अदालत से बरी हो गए, यह अतिदुर्भाग्यपूर्ण है। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के मामले में वहाँ की सरकार अगर सतर्क रहती तो क्या यह संभव था, शायद कभी नहीं।”

गौरतलब है कि, पहलू खान हत्याकांड मामले में अलवर की जिला अदालत ने बुधवार (अगस्त 14, 2019) को फैसला सुनाते हुए सभी 6 आरोपितों को बरी कर दिया। अदालत ने इन आरोपितों को पुलिस जाँच में गंभीर कमियों के चलते संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। इस मामले में कुल 9 आरोपित पकड़े गए, जिनमें से 3 नाबालिग हैं। अदालत ने बुधवार को 6 बालिग आरोपितों- विपिन यादव, रविन्द्र कुमार, कालूराम, दयानंद, योगेश कुमार उर्फ धोलिया और भीम राठी को लेकर फैसला सुनाया। जबकि, नाबालिग आरोपितों पर जुवेनाइल अदालत में सुनवाई की जा रही है।

वहीं, राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि इस मामले में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी जाएगी। बता दें कि, पहलू खान 1 अप्रैल 2017 को अपने दोनों बेटों के साथ जयपुर के एक मेले से मवेशियों को खरीद कर हरियाणा के नूह स्थित अपने घर ला रहे थे। इसी दौरान कुछ लोगों ने उन पर हमला कर दिया। पुलिस ने उनको भीड़ से छुड़ाकर बहरोड़ के कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया था। जहाँ इलाज के दौरान पहलू खान की अप्रैल 04, 2017 को मौत हो गई थी।

मोदी 2002 फिर से करना चाहता है: इमरान खान- देसी लिबरलों की जुगलबंदी जारी

कश्मीर मुद्दे पर ऐसा लग रहा है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की स्क्रिप्ट वहाँ के सेना नहीं, हिंदुस्तान वाला पत्रकारिता का समुदाय विशेष और लिबरल गैंग लिख रहा है। तभी मोदी को गरियाने में भी इमरान खान अपने देश की नहीं, हिंदुस्तानी मोदी-विरोधियों की भाषा बोले जा रहे हैं। पहले उन्होंने मोदी-RSS की तुलना हिटलर और उसकी नाज़ी पार्टी से की, और अब दुनिया को बताते फिर रहे हैं कि मोदी कश्मीर में 2002 जैसा दंगा कराने वाले हैं।

हिंदुस्तान के बहाने दुनिया को दी जिहाद की धमकी

हिंदुस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर इमरान खान ने ट्विटर पर न केवल “कश्मीरियों पर अत्याचार हो रहा है” का पुराना राग अलापा, बल्कि आरोप यह भी लगाया कि कश्मीर में “आरएसएस के गुंडे” भेजे जा रहे हैं, और “गुजरात के मुस्लिमों का मोदी द्वारा जैसा जातीय हत्याकांड किया गया”, वही कश्मीर में होगा। यही भाषा मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले देसी लिबरलों की होती थी, जब वे मुस्लिमों को आतंकित करना चाहते थे।

इमरान खान इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने 1995 में स्रेबेनिका में बोस्नियाई मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हुए सामूहिक और जातीय हत्याकांड और उस पर तत्कालीन विश्व समुदाय की तथाकथित चुप्पी के बहाने अपने देश के दुनिया में अलग-थलग पड़ जाने पर खीझ उतारी। साथ ही इसका बदला जिहाद से लेने की धमकी भी “कश्मीर के जवाब में इस्लामी जगत में उग्रवाद और अंतहीन हिंसा” के नाम पर दी।

वैश्विक हिन्दू समुदाय ने लताड़ा

ट्विटर पर वैश्विक हिन्दू समुदाय के कई जाने-माने चेहरों और हैंडल्स ने इमरान खान को आईना दिखाया। लेखक संक्रांत सानु ने गुजरात मामले के प्रोपेगंडा को आड़े हाथों लेते हुए इमरान को याद दिलाया कि गुजरात दंगों में मारे जाने वालों में से एक तिहाई हिन्दू थे, जिनमें से कई दंगा रोकने की कोशिश कर रही “मोदी की पुलिस” (गुजरात पुलिस) की गोलियों का शिकार हुए थे। उन्होंने साथ ही कश्मीर में हिन्दुओं के हुए असली हत्याकांड की भी याद दिलाई।

अमेरिकी हिन्दुओं के संगठन ‘हिन्दू अमेरिकन्स’ ने भी खुद अपने देश में हिन्दुओं की हत्याएँ और उनपर अत्याचार करने के बाद दूसरे देशों को अल्पसंख्यकों के बारे में उपदेश देने के दोगलेपन पर इमरान को लताड़ा। संगठन ने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान-बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से लेकर कश्मीर तक पाकिस्तान ने गैर-मुस्लिमों की हत्याएँ की हैं, और दुनिया आज हिंदुस्तान के साथ खड़ी है, जिहादी पाक के साथ नहीं।

हिन्दू अमेरिकन्स ने पाकिस्तान को यह भी याद दिलाया कि मुस्लिम-बहुल देशों में से भी किसी ने उसका इस मामले में साथ नहीं दिया है। इमरान खान के दुनिया को दहशतगर्दी की धमकी देने की तुलना भी अलकायदा और आईएस (दाएश) जैसे जिहादी संगठनों की धमकी से की।