Home Blog Page 5616

जब कश्मीरी बैंड की लड़कियों को रेप की धमकी मिलती रही, CM अब्दुल्ला पलट कर कठमुल्लों की गोद में बैठ गए

श्रीनगर के राजबाग में एक स्कूल है, प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट, जिसके कॉन्वेंट नाम से अंदाजा हो गया होगा कि इसे इसाई मिशनरी चलाते हैं। यह कोई इतिहास में प्रसिद्ध, 19वीं शताब्दी का स्कूल हो ऐसा नहीं है। 2009 तक यह सेकेंडरी स्कूल था, उसके बाद ही हायर सेकेंडरी स्कूल बना है। अब आप कह सकते हैं कि मेरी आज की कहानी इतिहास में बहुत पीछे नहीं जाती। जब मिशनरी स्कूल है तो जाहिर है इसके अन्दर व्यवस्था उतनी कट्टरपंथी नहीं थी, जितना कि लड़कियों के लिए बाकी के कश्मीर में होता था। यहाँ लड़कियाँ संगीत भी सीख सकती थीं।

इसी स्कूल में नोमा, अनीका और फराह हसन ने मिलकर एक म्यूजिक बैंड शुरू कर रखा था। ये लोग अक्सर रॉक म्यूजिक गाते-सुनते थे। रॉक की ख़ास बात ही यही होती है कि वो सत्ता का विरोधी भी होता है। इस लिहाज से सोचा जाए तो प्रगाश नाम के उनके इस बैंड को अलगाववादी ताकतों का समर्थन मिलना चाहिए था। लेकिन, हकीकत की जमीन पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। जब 2012 में इस रॉक बैंड ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया तो वो श्रीनगर का ही “बैटल ऑफ़ बैंड्स” का आयोजन था। ये रॉक का एक खास आयोजन होता है जिसमें जनता की आवाज से जीत हार का फैसला होता है।

10 दिसम्बर 2012 को जब प्रगाश ने इस मुकाबले में हिस्सा लिया तो मौजूद श्रोताओं ने एक स्वर से इसकी जीत घोषित की। अफ़सोस की लड़कियों का जीतना कठमुल्लों को रास नहीं आया। धमकियाँ मिलने लगीं। चोट पहुँचाने या कत्ल की नहीं, ये किशोरियों को दी जा रही बलात्कार की धमकियाँ थीं। आखरी खलीफा ऑट्टोमन के दौर में हर राज्य के लिए एक मुफ़्ती का जो इस्लामिक चलन आया था उसके हिसाब से बने राज्य के मुख्य मुफ़्ती ने लड़कियों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया। जब 370 लागू हो तो लड़कियाँ राज्य से भागकर भी कहाँ जातीं? भागती भी तो पूरा खानदान लेकर भागती क्या?

3 फ़रवरी 2013 को जारी किए गए इस इस्लामिक फतवे के बाद लड़कियों की आवाज़ पर बूट पड़ गई थी। उस दौर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुरू में तो किशोरियों के समर्थन की बात की थी मगर बाद में वो कायरों की तरह पलट गए और प्रगाश के समर्थन के अपने ट्वीट भी डिलीट कर डाले। शुरुआत में इस मामले में बलात्कार की धमकियाँ देने के लिए तीन लोगों की गिरफ्तारियाँ हुई थी। मगर बाद में उमर अब्दुल्ला को याद आया कि वो मजहबी पहले और मुख्यमंत्री बाद में हैं। जब सरकार ने सुरक्षा देने से भी इनकार कर दिया हो तो लड़कियाँ कितनी देर टिकती? इस्लामिक कट्टरपंथ से संगीत हार गया और बैंड चुपचाप, खामोश हो गया।

इस दौर में कश्मीर में कोई म्यूजिक बैंड नहीं होता था ऐसा बिलकुल नहीं है। कम से कम दर्जन भर म्यूजिक बैंड रहे होंगे तभी तो “बैटल ऑफ़ बैंड्स” में मुकाबला हो रहा था। उन्हें दिक्कत लड़कियों के बैंड से थी। आखिर नोमा नज़ीर गिटार बजा कर गाएगी क्यों? आखिर फराह दीबा ड्रम कैसे बजा सकती है? आखिर अनीका खालिद गिटार क्यों बजाए? उमर अब्दुल्ला के ट्वीट डिलीट करने और कठमुल्लों के फतवे, बलात्कार की धमकियों से जो दसवीं की लड़कियों का बैंड बंद हुआ था, उसके नाम प्रगाश का मतलब भी “रौशनी” ही होता है।

कश्मीर में जब तक 370 था तबतक लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु के बाद ही हो, ऐसा कोई कानून नहीं चलता था। बाल विवाह भी होता था इसलिए करीब दस साल पहले दसवीं में पढ़ने वाली ये बच्चियाँ आज कहाँ होंगी ये तो पता नहीं। संभव है कि कठमुल्लों के खौफ़ से इनके परिवारों ने जल्दी-जल्दी इनकी शादी करके कहीं और भेज दिया हो। आज इनका जिक्र इसलिए क्योंकि कभी-कभी कुछ दोमुँहे, जो इनकी आवाज दबाए जाने पर चुप रह गए थे, वो पूछते हैं कि तुम्हें जो डल झील में छठ मनाने की छूट मिल गयी, उसके बदले में कश्मीरियों को क्या मिला?

ऐसे दोमुँहों को हम याद दिला दें कि हम बिहार में रहते हैं। यह वो राज्य है जहाँ मैथली ठाकुर जैसी बच्चियों के गाने पर उन्हें जबरन चुप कराने के कोई फतवे नहीं दिए जाते। संगीत के लिए यहाँ कोई बलात्कार की धमकी दे, तो उसे सुधारने के लिए शुद्ध “गांधीवादी” तरीके ही इस्तेमाल किए जाएँगे। अगर हमारे पास वहाँ जाने का अधिकार है तो बदले में हम भी प्रगाश को बिहार आकर गाने का आमंत्रण देते हैं। इतने वर्षों में “प्रगाश” की छूटी हुई म्यूजिक प्रैक्टिस, रियाज़ से क्या हुआ होगा उससे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। गाने के बोल समझ में आए न आए। टूटे फूटे उच्चारण पर हमने लद्दाख वाले सांसद के लिए तालियाँ तो बजाई ही हैं न? आपके गाने पर इससे ज्यादा बजाई जाएँगी।

बाकी आमंत्रण सिर्फ प्रगाश के लिए हो ऐसा भी नहीं है, वादी की सभी बच्चियों के लिए लागू होगा। लड़कों के गाने पर उन्हें वैसे भी दिक्कत नहीं थी, लड़कियों को अगर कट्टरपंथियों से दिक्कत हो तो वहाँ गाने के बदले यहाँ आकर गाना। यहाँ हम तारीफ ही करेंगे।

राम मंदिर पर नवंबर तक फैसला संभव, अब सुप्रीम कोर्ट में हफ्ते के पॉंचों दिन सुनवाई

अयोध्या मामले में पिछले तीन दिनों से सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट (SC) ने फैसला लिया है कि संविधान पीठ अब से इस मामले की सप्ताह के पाँचो दिन सुनवाई करेगी। आमतौर पर संविधान पीठ सिर्फ़ तीन (मंगलवार, बुधवार और गुरुवार) दिन मामले की सुनवाई करती है। लेकिन, इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने परंपरा से हटते हुए यह फैसला लिया है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही कि 17 नवंबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के रिटायर होने से पहले इस मामले में फैसला आ सकता है।

इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने राम लला विराजमान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन से जानना चाहा कि इस मामले में एक पक्षकार के रूप में क्या ‘राम जन्मस्थान’ कोई वाद दायर कर सकता है। पीठ ने जानना चाहा, “क्या जन्म स्थान को कानूनी व्यक्ति माना जा सकता है। जहां तक देवताओं का संबंध है तो उन्हें कानूनी व्यक्ति माना गया था।”

पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ के सवाल के जवाब में परासरन ने कहा, “हिन्दू धर्म में किसी स्थान को उपासना के लिए पवित्र स्थल मानने के लिए वहॉं मूर्तियों का होना जरूरी नहीं है। नदी और सूर्य की भी पूजा होती है और जन्म स्थान को भी कानूनी व्यक्ति माना जा सकता है।”

इस दौरान जस्टिस बोबडे ने उत्तराखंड के हालिया फैसले का हवाला दिया उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक फैसले का भी जिक्र किया जिसमे पवित्र गंगा नदी को एक कानूनी व्यक्ति माना गया है जो मुकदमे को आगे बढ़ाने की हकदार है।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में कि निर्मोही अखाड़ा की ओर से सुशील जैन ने सुनवाई के दूसरे दिन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने बड़ी रोचक दलीलें रखी थी। सुनवाई के दूसरे दिन सर्वोच्च न्यायालय ने जब निर्मोही अखाड़ा से अयोध्या में रामजन्मभूमि पर कब्जे के सबूत माँगे तो इस पर हिंदू परिवार ने दावा किया कि उसने 1982 में की एक डकैती में पैसों के साथ उन रिकॉर्डों को खो दिया है। अब उनके पास काेई रिकाॅर्ड नहीं है।

इसके बाद जब मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने फिर पूछा कि अगर आपके पास इस मुद्दे से जुड़े कोई दूसरे सबूत हैं तो वे पेश करें। इस पर निर्मोही अखाड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने कहा कि राम जन्मभूमि देवताओं की भूमि बन गई है। यह स्थान हिंदुओं के लिए पूजा स्थल बन गया है। इसके साथ ही कहा कि वाल्मीकि रामायण में तीन स्थानों पर उल्लेख है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। 

सुशील कुमार जैन ने सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि पूजा और प्रार्थना में बाधा ने उन्हें सिविल सूट दायर करने के लिए मजबूर किया। यह मालिकाना हक नहीं बल्कि कब्जे की लड़ाई है। 

सबरीमाला मंदिर में चोरी-छिपे घुसने वाली महिला की बेटी का जबरन धर्म परिवर्तन, पति ने ही…

स्कूल के जमाने में ऐसा होता था कि जो सबक याद न हो उसे बार बार दोहराने को कहा जाता था। पढ़ाई से छुट्टी तभी मिलती थी जब सबक याद हो जाए। इस मामले में कुछ शायर उल्टा सोचते हैं, वो कहते हैं कि –

मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा,
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक याद हुआ!

(*मकतब – स्कूल, पाठशाला)

जीवन शायरी के हिसाब से नहीं चलता, यहाँ जो आप नहीं सीखेंगे, वो बार-बार दोहराया जाएगा। नमूने के तौर पर पृथ्वीराज चौहान की कहानी को लीजिए। इस जानी-मानी कहानी में घोरी जब पृथ्वीराज से हारा तो राजा पृथ्वीराज उसे जिन्दा भाग जाने देते हैं।

बाद में जब घोरी जीत जाता है तो वो कोई दरियादिली दिखाने की बेवकूफी नहीं करता। चंदबरदाई की रचना के मुताबिक काफी यातनाओं से पीड़ित, अंधे कर दिए गए पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण से घोरी को मार गिराते हैं। इस कहानी से वैसे तो दुश्मन को अधमरा न छोड़ने की सीख दी जाती है। “घर का भेदी लंका ढाए” कहकर जयचंद की याद भी दिलाई जाती है, मगर इस कहानी में बीच का एक हिस्सा और भी है। पृथ्वीराज पर जीत पाते ही घोरी रुका नहीं था। उसने सबसे पहले जयचंद का ही सफाया किया था।

अब जब अपनों का साथ छोड़कर परायों से हाथ मिलाने का ये नतीजा याद आ गया हो तो कहानियों के दौर से वापस आज के युग में लौटते हैं। आक्रमणकारियों ने हाल ही में दक्षिण भारत के सबरीमाला मंदिर पर चढ़ाई की थी। हजारों श्रद्धालुओं ने डटकर इन हमलावरों का मुकाबला भी किया था। इन हमलावरों का साथ देने वाले घर के भेदियों में से प्रमुख थी बिन्दु थनकम कल्याणी नाम की एक महिला। अक्टूबर 2018 की बाईस तारीख को इस दस्यु ने जबरन सबरीमाला मंदिर में घुसने की असफल कोशिश की थी।

इसने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया नाम के एक मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन और अपने पति पर अब अपनी बेटी को अगवा करके उसका धर्म परिवर्तन कर डालने का आरोप लगाया है। उसने कहा है कि उसके पति ने चंद नोटों के बदले अपनी बेटी का धर्म परिवर्तन करवाना स्वीकार कर लिया। पहले तो वो बेटी को छुट्टी के बहाने अपने साथ ले गया और फिर लौटाने से इनकार कर दिया। बिन्दु का कहना है कि इसी बीच बेटी का स्कूल भी बदलवा कर एक मुस्लिम स्कूल में भर्ती करवा दिया गया है।

अब उसकी बेटी बुर्के में स्कूल जाती है और उसे बेटी से मिलने से रोकने के लिए एसडीपीआई के गुंडे छोड़ दिए गए हैं। बारह साल की उनकी बेटी भूमि से उन्हें चार महीने से मिलने नहीं दिया गया। सबरीमाला में घुसने की कोशिश करने वाली बिन्दु थनकम कल्याणी का कहना है कि उनके पति ने भी उन्हें मारा पीटा है। वो राज्य के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री से मदद की गुहार लगा रही हैं। ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि कॉमरेड मुख्यमंत्री उनकी कितनी मदद करेंगे।

बाकी पृथ्वीराज – जयचंद – घोरी की कहानी में से जयचंद का क्या हुआ था, ये याद रखना भी जरूरी है। इतिहास खुद को दोहराता रहता है वाली जो कहावत है, वो यूँ ही तो नहीं बनी होगी न?

मेरे राज्य में नई तकनीकों में निवेश करिए: मुकेश अम्बानी से बोले CM कमलनाथ

कॉन्ग्रेस नेताओं की कथनी और करनी में कितना बड़ा फर्क है यह आए दिन दिखता ही रहता है। जिस अम्बानी और रिलायंस परिवार को कोसते कॉन्ग्रेसी अघाते नहीं उनकी पैरवी करते कॉन्ग्रेस सांसद
कपिल सिब्बल अदालत में नजर आते हैं। अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश में निवेश की संभावनाओं को लेकर मुंबई में रिलायंस इंडस्ट्री के चेयरमैन मुकेश अम्बानी से मुलाकात की है।

कमलनाथ ने अम्बानी से मुलाक़ात कर मध्य प्रदेश में औद्योगिक संभावनाओं पर चर्चा की। कमलनाथ ने अम्बानी से मध्य प्रदेश में निवेश करने और उद्योग स्थापित करने का आग्रह किया। अम्बानी ने भी राज्य में ग्लोबल लॉजिस्टिक हब स्थापित करने का आश्वासन दिया। बैठक के दौरान अम्बानी ने कहा कि मध्य प्रदेश में ब्रिटेन और साउथ कोरिया से ज्यादा डेटा की खपत होती है और वह नई तकनीकों का प्रयोग महिला सुरक्षा और अपराध नियंत्रण हेतु करने के इच्छुक हैं।

रिलायंस का लॉजिस्टिक हब मुंबई और बेंगलुरू में पहले से ही है। अगर मध्य प्रदेश में इसे स्थापित किया जाता है तो यह राज्य के लिए बड़ी बात होगी। कमलनाथ ने कहा कि मध्य प्रदेश में फ़ूड प्रोसेसिंग, डेटा प्रोसेसिंग और एनर्जी प्रोसेसिंग का हब बनने की क्षमता है। कमलनाथ ने अम्बानी से आग्रह किया कि वह राज्य में नई-नई तकनीकों में निवेश करें। कमलनाथ ने कृषि क्षेत्र के विकास के लिए भी रिलायंस से भागीदार बनने का आग्रह किया।

मुकेश अम्बानी के अलावा कमलनाथ अन्य उद्योगपतियों से भी मुलाक़ात करेंगे। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के हर जिले के लिए अलग-अलग तरीके से निवेश की योजनाएँ तैयार की जा रही हैं।

समझौता एक्सप्रेस बंद: सीमा पर ट्रेन छोड़ भागा पाकिस्तानी ड्राइवर-गार्ड, भारतीय फिल्मों पर भी प्रतिबंध

आर्टिकल 370 के निष्प्रभावी होने से बौखलाए पाकिस्तान ने गुरुवार को समझौता एक्सप्रेस का परिचालन बंद कर दिया। भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर भी रोक लगा दी है। हालाँकि भारत के कदम से वह कितना डरा-सहमा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी ड्राइवर और गार्ड समझौता एक्सप्रेस के साथ भारतीय सीमा में दाखिल होने का हौसला नहीं जुटा पाए। सीमा पर ही ट्रेन छोड़ दोनों भाग खड़े हुए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज पाकिस्तान से समझौता एक्सप्रेस को वापस आना था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे वाघा बॉर्डर पर रोक दिया। इससे कई लोग सीमा पर फॅंस गए। पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रसीद अहमद ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि जिन लोगों ने पहले से टिकट खरीद रखा है वे अपने पैसे वापस ले सकते हैं। यह ट्रेन हफ्ते में दो दिन चलती है।

पाकिस्तान की इस घटिया हरकत से 62 मुसाफिर रास्ते में फँस गए। सीमा से ट्रेन लाने के लिए भारत ने अपना गार्ड और ड्राइवर भेजा है। अंतरराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन के सुपरिटेंडेंट अरविंद कुमार गुप्ता ने बताया कि आज (अगस्त 8, 2019) पाकिस्तान से समझौता एक्सप्रेस को भारत आना था लेकिन इस दौरान पाकिस्तान से संदेश आया कि भारतीय रेल अपने ड्राइवर और क्रू मेंबर को भेज कर ट्रेन को बॉर्डर से ले जाए।

कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा: थूक कर चाटने वाली कॉन्ग्रेसी परम्परा के नए वाहक बने अधीर रंजन

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी अब अपने ही बयान से पलट गए हैं। अधीर रंजन ने लोकसभा में जोर-जोर से चिल्ला कर जो बातें कही थीं, बाहर मीडिया के सामने वह उसके ठीक विपरीत सुर में राग अलापते नज़र आ रहे हैं। संसद में उन्होंने कहा था कि चूँकि जम्मू कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र देख रही है, ऐसे में भारत इससे सम्बंधित विधेयक कैसे ला सकता है? बता दें कि पाकिस्तान का भी कमोबेश इस मामले में यही रुख है और वह जम्मू कश्मीर को द्विपक्षीय मसला बताता है।

देशद्रोह क़ानून: थूक कर चाटने का नाम है कपिल सिब्बल

अब अधीर रंजन चौधरी ने अपने पुराने बयान से मुकरते हुए कहा है कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा है। वह पाकिस्तान द्वारा भारत के साथ व्यापार ख़त्म करने वाली ख़बर पर टिप्पणी कर रहे थे। अधीर रंजन ने कहा कि उन्हें पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि पाकिस्तान इस तरह का क़दम उठा सकता है।अब उन्होंने कहा है कि कश्मीर को लेकर कौन सा क़ानून पारित किया जाएगा, यह निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार हमारे देश के पास है।

संसद में उन्होंने पूछा था कि जिस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र देख रहा है, उस पर भारत सरकार क़ानून कैसे बना सकती है? वहीं अब संसद के बाहर उन्होंने कहा है कि यह अधिकार पूर्णतया भारत सरकार के पास है। संसद में उन्होंने कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बताया था, लेकिन अब मीडिया के सामने वह इसे भारत का आंतरिक मुद्दा बता रहे हैं (जो कि सही है और भारत का स्टैंड भी है)। आख़िर अधीर रंजन को ये समझने में इतने दिन क्यों लग गए? अगर उन्हें यह पता था तो संसद में बयान देकर उन्होंने पाकिस्तान के रुख को क्यों आगे बढ़ाया?

अधीर रंजन ने प्रधानमंत्री के उस बयान को याद किया जिसमें पीएम मोदी ने कहा था कि कश्मीर समस्या का हल गोली से नहीं बल्कि वहाँ की जनता को गले लगाने से होगा। अधीर रंजन ने कहा कि आज उसके ठीक विपरीत हो रहा है और जम्मू अक्ष्मीर को एक कंसंट्रेशन कैम्प में बदल दिया गया है। वैसे भी ज्योतिरादित्य सिंधिया, कर्ण सिंह और दीपेंद्र हुड्डा जैसे बड़े नेताओं ने अनुच्छेद 370 पर कॉन्ग्रेस के रुख के उलट जाकर केंद्र सरकार के निर्णय का स्वागत किया है।

AAP-कॉन्ग्रेस एक-दूसरे पर थूक कर चाटने की रेस में, बीच में कूदे 4 महान दरबारी पक्षकार

‘भागो बिहारी इधर से, कल दिखे तो मारूँगा और जला डालूँगा’ – J&K में प्रवासियों को धमकी

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्फल होने के बाद बिहार के अधिकतर प्रवासियों को वहाँ के समुदाय विशेष के स्थानीय लोगों द्वारा डरा-धमका कर भगाया जा रहा है। विडंबना यह कि इन प्रवासी कर्मियों में अधिकतर दूसरे मजहब वाले ही हैं। राहुल पंडिता द्वारा ओपन मैग्जीन में लिखे गए लेख में इस संबंध में बताया गया है कि बिहार के प्रवासी इन दिनों हड़बड़ी में कश्मीर को हजारों की तादाद में छोड़ने के लिए मजबूर हैं।

जानकारी के मुताबिक एक 56 वर्षीय व्यक्ति सुरेंद्र महतो बताते हैं कि वहाँ के स्थानीय लोगों ने उन्हें गाली दी और वहाँ से जाने के लिए मजबूर किया। महतो की मानें तो उन्हें ऐसा नहीं करने पर मार देने की धमकी भी दी गई।

वहीं, 25 वर्षीय असलम बताते हैं कि श्रीनगर में रहने वाले कुछ स्थानीय लोगों ने उनसे मारपीट की और उनका बैग लेकर कहा, “भागो बिहारी इधर से।”

एक दूसरे प्रवासी का कहना है कि पिछली रात एक स्थानीय कश्मीरी उनके पास आया और कहा, “अगर तुम मुझे कल दिखे तो मैं तुम्हें मारूँगा और केरोसीन से जला दूँगा।”

गौरतलब है कि इनमें से अधिकतर प्रवासी कश्मीर की ओर वहाँ के ठंडे मौसम के कारण रुख करते हैं, साथ ही उनका मानना होता है कि वो कश्मीर में अन्य जगहों के मुताबले ज्यादा बचत कर पाएँगे। लेकिन कश्मीर में जीवनयापन की संभावनाएँ ढूँढने वाले लोगों की ऐसी दुर्दशा देखकर कश्मीरी अलगाववाद के काले सच का पता चलता है, जो नस्लीय और धार्मिक वर्चस्व का एक विषैला मिश्रण है।

Pak के पूर्व PM नवाज शरीफ की बेटी मरियम हिरासत में, 370 मुद्दे पर इमरान खान की कर चुकी हैं निंदा

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज शरीफ को नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) ने हिरासत में लिया है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) की नेता मरियम नवाज शरीफ को चौधरी शुगर मिल मामले में हिरासत में लिया गया है।

बुधवार (अगस्त 07, 2019) को ही मरियम नवाज शरीफ ने आर्टिकल 370 पर भारत के फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता की बात करके प्रधानमंत्री इमरान खान को मूर्ख बनाया और वे अनुमान नहीं लगा पाए कि भारत में क्या योजना चल रही है।

मरियम नवाज के खिलाफ पिछले महीने पाकिस्तानी ब्यूरो एनएबी ने फिर से जाँच शुरू की थी। नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (एनएबी) मेसर्स चौधरी शुगर मिल्स लिमिटेड में भ्रष्टाचार को लेकर मरियम, उनके पिता नवाज शरीफ, पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष शहबाज शरीफ, उनके चचेरे भाई हमजा शहबाज और युसुफ अब्बास के खिलाफ जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एनएबी को कथित तौर पर शरीफ परिवार द्वारा लाखों रुपए (पाकिस्तानी मुद्रा) के टेलीग्राफिक हस्तांतरण का पता चला था। आय से अधिक धन के मामले में शहबाज शरीफ और उनके बेटों के खिलाफ जाँच के दौरान चौधरी शुगर मिल्स के मालिकों के खिलाफ धनशोधन के सबूत मिले थे।

J&K पर मलाला ने रोया मानवाधिकार का रोना, लोगों ने दिलाई बलूचिस्तान, POK की याद

नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफजई ने कश्मीर को लेकर चिंता जताई है। मलाला ने जम्मू कश्मीर की जनता के बारे में बार करते हुए लिखा कि वह ‘कश्मीर की महिलाओं व बच्चों के लिए चिंतित हैं जो हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार बनते हैं।‘ मलाला ने लिखा कि कश्मीर के बच्चे कई दशकों से हिंसा के बीच बड़े हो रहे हैं। उन्होंने दक्षिण एशिया को अपना घर बताते हुए लिखा कि वह क्षेत्र के 1.8 बिलियन लोगों के साथ रहती हैं, जिनमें कश्मीरी भी शामिल हैं। मलाला ने संयुक्त राष्ट्र से अपील की कि वह ‘कश्मीरी जनता की पीड़ा’ पर ध्यान दें और उचित क़दम उठाएँ। मलाला ने मानवाधिकार का भी रोना रोया।

हालाँकि, लोगों ने मलाला पर बलूचिस्तान पर भी मुँह खोलने को कहा, जहाँ पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा खुलेआम अत्याचार किया जा रहा है। बलूचिस्तान में पाक फ़ौज की करतूतों पर संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समितियाँ भी रिपोर्ट्स दे चुकी हैं, जिनमें महिलाओं की प्रताड़ना की बात भी कही गई थी। आंतरिक मुद्दा होने के कारण भारत हमेशा से कश्मीर मामले में किसी भी प्रकार की मध्यस्तथा का विरोधी रहा है लेकिन मलाला ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की है।

वकील प्रशांत पटेल उमराव ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा। ज्ञात हो कि वहाँ हिन्दुओं, सिखों और बौद्धों पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं और वहाँ का क़ानून भी इस तरह से तैयार किया गया है जिससे पीड़ित अल्पसंख्यकों को कोई मदद भी नहीं मिल पाती।

पत्रकार मानक गुप्ता इस बात से नाराज़ दिखे कि मलाला ने कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने लिखा कि मलाला के लिए उनके मन में जो सम्मान था, अब वह ख़त्म हो गया है।

अंकित जैन ने मलाला से पूछा कि वह पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा किए जा रहे अत्याचारों पर कुछ नहीं बोल रही हैं? मलाला युसुफजई के इस सेलेक्टिव बयान के कारण कई लोग नाराज़ दिखें और उन्होंने लिखा कि यह बयान जानबूझ कर भारत के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे एजेंडे के हिस्सा मालूम होता है।

रवीश जी, पत्रकार तो आप घटिया बन गए हैं, इंसानियत तो बचा लीजिए!

रवीश कुमार का सुषमा स्वराज वाला प्राइम टाइम देख कर ऐसा लगा कि बेचारा एक मोदी को अटैक करने के चक्कर में किसी की मौत तक को बदरंग करने से नहीं हिचकता! शब्द बनाते हैं, और गिराते हैं। शब्द घाव भी होते हैं, मरहम भी। जख्म भी देते हैं, उन्हें सिल भी सकते हैं। संदर्भ पा कर वही शब्द सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं, और संदर्भ से अलग वो किसी व्यक्ति को दानव जैसा दिखा सकते हैं। इसलिए, शब्दों के व्यापार से जुड़े लोग, उनका इस्तेमाल नाप-तौल कर करते हैं। पत्रकारिता शब्दों के व्यापार का एक उद्योग है। समाज का कितना भला हुआ है इससे, इस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन आज के दौर में इसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता।

शब्दों के ऐसे ही व्यापारी हैं रवीश कुमार। उन्होंने जब वो प्राइम टाइम किया तो उन्होंने उन शब्दों को पढ़ने से पहले लिखा होगा, लिखने से पहले सोचा होगा। अनुभवी आदमी शब्दों को अपने हिसाब से लिख सकता है कि वो एक स्तर पर श्रद्धांजलि लगे, एक स्तर पर राजनैतिक समझ की परिचायक, और गहरे जाने पर वैयक्तिक घृणा से सना हुआ दस्तावेज। रवीश अनुभवी हैं, इसमें दोराय नहीं।

हर दिन इस व्यक्ति (पत्रकार नहीं, व्यक्ति) के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है। मैं ये भी नहीं कह रहा कि यार वो मर गईं, उनको उस दिन तो बख़्श देते। नहीं, क्योंकि ये आदमी ‘किया होगा’, ‘हुआ होगा’, ‘ऐसा तो होता ही होगा’ जैसे वाक्यांशों के सहारे अपनी नफ़रत को अपने मलिन, संस्कार मंद पड़ते चेहरे के साथ बोलता रहा। ऐसी काल्पनिक बातें जिसे एक चेहरे ने टीवी पर पब्लिक के लिए हवा में छोड़ दिया, और उनके भक्त सत्य मान कर अपनी घृणा का छौंक लगा कर हर जगह लिख-बोल रहे होंगे।

4:16 से उसका वीडियो देखिए प्राइम टाइम। ये निहायत ही बेकार और घृणा में डूबे हुए इन्सान के शब्द हैं। सिर्फ पत्रकार होना बेहतर नहीं होता, भले ही आपके करियर में कुछ अच्छे काम रहे हों। सुषमा स्वराज कम से कम रवीश से बेहतर इन्सान थीं, और अपने क्षेत्र का चमकता सितारा थी। वहीं रवीश, घृणा में डूबा वो आदमी है जो प्रधानमंत्री आवास का अगर कुत्ता भी मर जाए तो इंट्रो में कुछ ऐसा लिखेगा:

मर गया कुत्ता। कुत्ते तो मर ही जाते हैं। ये कुत्ता पीएम आवास पर दुम हिलाता रहता होगा। 2014 तक भले ही मनमोहन कुछ बोलते नहीं होंगे, लेकिन उसे भी देख कर वो खुश होता होगा। लेकिन 2014 के बाद मालिक बदलने पर कुत्ता भी तो बदल गया होगा… क्या 18 घंटे काम की बात करने वाले मोदी उस कुत्ते का ख्याल रख पाते होंगे? क्या वो कुत्ता मोदी को देख कर भी उतना ही खुश होता होगा? क्या 2014 के बाद मोदी उसे ऐसे तो नहीं देखते होंगे कि ये तो मनमोहन का कुत्ता था 10 सालों से, मेरा क्या, मेरा वश चले तो इसका एनकाउंटर करवा दूँ… और क्या पता कि ये कुत्ता मरा भी कैसे होगा क्योंकि नेशनल सीक्रेट के नाम पर कुत्ते का पोस्टमार्टम तो हुआ नहीं। सबूत आप माँग नहीं सकते क्योंकि आपको एंटीनेशनल करार दे दिया जाएगा। हम और आप इसमें कुछ नहीं कर सकते क्योंकि सत्ता जिसके पास है, उसका क्या इतिहास है, ये किसी से छुपा तो नहीं।

जब इस देश में जस्टिस लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या हो जाती है, तो कुत्ता तो फिर भी कुत्ता है, और वो कुत्ता भी कॉन्ग्रेस का है जिससे मुक्ति के लिए प्रधानमंत्री पिछले छः सालों से लगे हुए हैं। आप सोचिए, कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि कुत्ता मर गया? जानता हूँ कि ये समय सवालों का नहीं है, लेकिन ऐसे कठिन समय में ही ऐसे सवाल पूछे जाने चाहिए। अगर हर मौत पर हमने बस मातम मना कर, अच्छी बातें कह कर, किसी के कथित अपराधों को, भले ही वो बाद में गलत साबित हो जाएँ, याद करने का मौका छोड़ दिया तो पत्रकारिता कैसी?

रेमॉन मैग्ससे अवार्ड इसीलिए सबको नहीं मिलता। हमें कठिन सवाल पूछने चाहिए, वरना सवाल पूछने वाली पत्रकारिता गायब हो जाएगी। क्या इस देश के नागरिकों को ये जानने का हक नहीं कि उस कुत्ते ने सुबह में ऐसा क्या खाया? क्या हमें यह जानने का हक नहीं कि यह कुत्ता 2019 में ही क्यों मरा? मैं जानता हूँ। दस सालों से कॉन्ग्रेस और देश का वफादार कुत्ता 2014 की मई में ही मार डाला जा चुका होता लेकिन मोदी वो नहीं करते जो लोग उनसे उम्मीद करते हैं कि वो करेंगे। वो पहले विश्वास दिलाते हैं कि सब कुछ ठीक है। और एक दिन कुत्ता मर जाता है। और वो दिन 2019 में आता है ताकि किसी को शक न हो। मैं शक नहीं कर रहा, मैं तो बस आपको दूसरा पक्ष, कुत्ते का पक्ष दिखाना चाह रहा हूँ कि इसकी टाइमिंग देखिए। जब कुत्ते खुद को डिफेंड नहीं कर सकते तो मैं करता हूँ, करता रहूँगा।

कुत्ते की उम्र सत्रह साल थी। यूँ तो इस उम्र में कुत्ते स्वभाविक मौत से भी मरते हैं, लेकिन ये तो प्रधानमंत्री का कुत्ता था। प्रधानमंत्री का कुत्ता तो आम कुत्तों से अलग होता होगा। उसे तो गली-गली खाने के लिए भटकना तो नहीं पड़ता होगा, वो तो बाज़ार से, यूट्यूब पर चलने वाले विज्ञापनों में आने वाला पैकेज्ड खाना खाता होगा, मिनरल वाटर पीता होगा… फिर तो उसकी उम्र भी ज्यादा होगी। पाँच साल तो बढ़ ही जाती होगी उम्र। इंसान भी संयमित भोजन करे तो उसकी भी उम्र बढ़ जाती है। तो फिर इसकी क्यों नहीं।

आप कहेंगे कि रवीश जी आप तो कुत्ते की मौत को इतना बड़ा बना रहे हैं। जिसका कोई नहीं होता, उसका रवीश होता है। ‘हैशटैग रवीश जी आपसे उम्मीद है’ लिख कर हजारों लोग मुझे रोज मैसेज करते हैं। ये कुत्ता भी करना चाहता होगा लेकिन आधार कार्ड और मोबाइल नंबरों के जुड़े होने के इस दौर में क्या प्रधानमंत्री कार्यालय को कुत्ते पर शक नहीं होता? शक क्या, वो तो पूरा मैसेज ही पढ़ लेते। इसलिए, एक पत्रकार के तौर पर मेरी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि मैं उसका भी पक्ष रखूँ।

दूसरी बात, ये कुत्ता हमारे, आपके, हम सब के पैसों पर पलता होगा। प्रधानमंत्री आवास का खर्चा टैक्स भरने वाले उठाते हैं। इसलिए, हमें ये जानने का हक है कि उस पैसे का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा था। उस कुत्ते को सुबह के खाने में जो जहर दे दिया गया होगा, वो किसके पैसे से आया होगा? कोई आदमी एक मूक जानवर को जहर दे कर कैसे मार सकता है! कितना निर्दयी रहा होगा वो!

इसका जवाब कौन देगा? इस बात को क्यों छुपाया जा रहा है? मैं जानता हूँ। कुत्ता गाय नहीं होता। कुत्ता तो कुत्ता होता है। इसलिए, उसके मरने पर शोर नहीं होता। संघ वाले बेहतर बताएँगे कि गाय और कुत्ते का फर्क क्या होता है। मोदी भी जानते होंगे कि क्या फर्क होता है। भले ही उस कुत्ते ने कितने प्रधानमंत्रियों, नेताओं, सत्ता के शक्तिशाली लोगों का हाथ अपनी गर्दन पर महसूस किया होगा, लेकिन आज वो मर चुका है। सत्ता, पावर, नेता का करीबी होना उसके काम नहीं आया। उसे मार दिया गया जैसे लोग मार दिए जाते रहे हैं।

लेकिन आपको क्या! आप टीवी देखते रहिए। हिन्दू-मुस्लिम करते रहिए। अर्थ व्यवस्था पर डिबेट शुरु नहीं होता है कि ध्यान हटाने के लिए कश्मीर से 370 हटाने की बातें शुरु हो जाती हैं। उस पर डिबेट शुरु होता है तो कोई नेता अचानक मर जाता है। आपको मूर्ख बनाया जा रहा है। जब आप लिखते हैं कि रवीश जी आपसे उम्मीद है, तो मेरी उम्मीद आपसे यही होती है कि आप भी रवीश बन जाएँ। आप भी चीजों को वैसे देखें, जैसे मैं देखता हूँ। आप भी वैसे ही चर्चा करें जैसे मैं करता हूँ। आप भी कुत्ते को देख कर सोचें कि ये किसका है, ये क्या खाता होगा, जीडीपी बढ़ने से इसके जीवन पर क्या फर्क पड़ता होगा, क्या इसे पता भी होगा कि जीडीपी के मनुष्य करते क्या हैं?

जब तक दर्शक जागरूक नहीं होगा, ऐसे ही आपको डराया जाएगा कि यहाँ प्रधानमंत्री आवास का कुत्ता भी चला जाता है, और किसी को पता नहीं चलता। चिल्लाने वाले एंकर से पूछिए तो वो कहेंगे, कौन सा कुत्ता, किसका कुत्ता… मंटो की एक कहानी है ‘टिटवाल का कुत्ता’। पढ़िए उसको। लेकिन मंटो तो पाकिस्तान के थे। क्या पता आप पढ़ते रहेंगे और कोई कहेगा कि ये पढ़ना है तो पाकिस्तान जाओ। लेकिन आप पढ़ते रहिए। आपातकाल आ चुका है। आज कुत्ते मर रहे हैं, कल को मुझे सड़क पर रौंदती हुई कोई गाड़ी निकल जाएगी। आप लोग दो दिन दुखी रहेंगे, मेरे बारे में अच्छी-अच्छी बातें कहेंगे, और फिर सब भूल जाएँगे।

लेकिन आपको भूलना नहीं चाहिए। अगर रवीश मर जाएगा तो आपके हैशटैग पर भी वही गाड़ी चल चुकी होगी, आपके उम्मीदों की भी हत्या हो चुकी होगी। तब आप शोक मत करिएगा। मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद आप सवाल पूछिएगा कि वो गाड़ी किसकी थी, उसमें कौन बैठा था, क्यों बैठा था! तब आप किसी भी तरह से उसका एक कनेक्शन निकालिएगा ताकि पता चले कि उसके पूरे खानदान में भाजपा से जुड़ा कोई वार्ड कमिश्नर भी तो नहीं। फिर आप उसमें भाजपा, संघ, अमित शाह, मोदी और मेरी गजब की पत्रकारिता के बिन्दुओं को जोड़ दीजिएगा। कहानी बन भी जाएगी, और चल भी जाएगी।
नमस्कार! हें हें हें

अपने ही गिरने के पैमाने को तोड़ता है ये व्यक्ति

रवीश कुमार अपने ही गिरने के पैमाने हर दिन तोड़ते हैं। नौकरी, कॉलेज, एसएससी, बैंकिंग, स्कूल आदि पर खबरों की शृंखला चलाने वाले रवीश हर दिन एक अंधेरे कुएँ में गिरते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि उनका करियर बेकार रहा है, लेकिन जिस ‘2014 के बाद’ से वो सुषमा को मोदी द्वारा दरकिनार करते देखते हैं, जिस तरह एक किडनी ट्रांसप्लांट के बाद अस्वस्थ रहने वाली नेत्री के राजनीति से दूरी बनाने को मोदी की चाल जैसा दिखाते हैं, उसी 2014 के बाद रवीश ने स्वयं की पत्रकारिता के साथ क्या किया, ये छुपा नहीं है।

रवीश के भक्त जो अपने गॉड के ‘टीवी मत देखिए’ कहने के बाद भी रोज टीवी देखते हैं, और रवीश द्वारा स्वयं ही गढ़ी गई परिभाषाओं को परम सत्य मानते हैं, वो समझते हैं कि रवीश की पत्रकारिता का स्वर्णिम काल पिछला छः साल ही है। जबकि इन छः सालों में एक पत्रकार के मानसिक पतन की जो कहानी हर रात टीवी की स्क्रीनों पर दिखी है, वो सबके सामने है।

रवीश के चेले और ट्रोलों की फौज भले ही आज सुषमा स्वराज की मृत्यु में कोई चाल देख ले, भले ही उसे लगे कि सुषमा को तो प्रधानमंत्री बनना था, मोदी ने पत्ता काट दिया, लेकिन उससे सत्य नहीं बदलता। रवीश कुमार पत्रकारिता को दोनों छोर को जी चुके हैं। अच्छी पत्रकारिता की बड़ाई उनके आज के विरोधी भी करते हैं, लेकिन जितनी घटिया पत्रकारिता अब उनकी हो गई है, वाकई टीवी देखना बंद कोई करे या नहीं, रवीश के धीमे जहर से तो जरूर बचे।

रवीश जी, आप बीमार हो चुके हैं। आप जब कैमरे में देखते हैं, और बोलते हैं, तो लगता है कि दया कर रहे हैं किसी पर। आपको अपने ही दर्शक मूर्ख लगते हैं, जिन्हें आप हर रात पट्टी पढ़ाते हैं। साथ ही, कैमरे के सामने आपका एटीट्यूड अब तिरस्कार वाला हो चुका है। रवीश जी की भावभंगिमा अपने ही दर्शकों को मानो ललकारती है कि ‘अबे तुम लोग हो क्या! मैं तुमसे महान हूँ, तुम सुन भी रहे हो तो मेरी दया के कारण।’ आपको लगने लगा है कि आप रवीश कुमार हैं और आपको अपना काम भी गंभीरता से करने की जरूरत नहीं है। स्क्रिप्ट पढ़ते हुए लगातार फ़म्बल करना, चेहरे पर ऐसे भाव कि दस बजे घर जाना है, ‘विषय’ कुछ भी हो, उसमें ‘य’ हटा कर ‘विष’ रख लेना, ये सब आपकी दिनचर्या है।

कुछ समय पहले तक आपको लौट आने का सुझाव दिया करता था। अब वो मत कीजिए। आप कहीं चले जाइए क्योंकि मैं नहीं चाहता कि कोई आपके कारण, आपकी घटिया पत्रकारिता के कारण आपस में लड़े, किसी को गाली दे। क्योंकि, आप एक भीड़ को उन्मादी बना चुके हैं। ये भीड़ हर मुस्लिम की हत्या पर खड़ी होती है, और हर हिन्दू की मुस्लिमों द्वारा हत्या पर चुप हो जाती है।

आपने ऐसी ही खतरनाक, जानलेवा परंपरा को हवा देना शुरु किया था, अब वो बवंडर बन कर पूरे समाज को लीलता जा रहा है। आपके प्रशंसकों में सहिष्णुता नहीं है, वो बात-बात पर हिन्दू-मुस्लिम ही करते हैं। वो सामान्य अपराध में धर्म जोड़ देते हैं, क्योंकि आपने उन्हें प्रशिक्षण दिया है, हर रात टीवी से और दिन में कई बार अपने लेखों से। शहर में अगर मजहबी भीड़ पुलिस पर पत्थर फेंकती है, दंगे करती है, जान लेती है, तो उसका रक्त आपके हाथों पर भी है।

आपने तैयार किया है ऐसे लोगों को जिन्हें शायद ऐसे अपराधों में बस अपराध दिखता था, लेकिन जबसे आपने जुनैद को बीफ के साथ जोड़ी, सक्सेना की मौत पर चुप रहे; जबसे तबरेज पर खूब बोला गया और गोपाल पर चुप रहे; जबसे पहलू खान आपके लिए ज़रूरी था लेकिन बीफ माफिया द्वारा की गई कई हत्याओं पर आप चुप रहे, तब से आपको पत्रकारिता का मापदंड मानने वाली भीड़ हिंसक होती गई। यही कारण है कि हिन्दुओं को लगातार, बेखौफ हो कर एक खास धर्म के लोग मार रहे हैं। काँवरियों पर पत्थरबाजी की जा रही है, ग्यारह मामलों में ‘जय श्री राम’ जबरदस्ती बुलवाने की बातें गलत साबित हुई हैं

ये आप पर इसलिए है क्योंकि आपने बस एक पक्ष लिखा। आपने जान-बूझ कर चुप्पी साधी क्योंकि आप पत्रकारिता कर ही नहीं रहे थे। आपको अजेंडा बढ़ाना था। आप आदर्श ज़रूर हैं, लेकिन उन लोगों के जो बातों को मरोड़ कर पेश करता है, उसमें धर्म और जाति निकालने के बाद ही चर्चा का पहला वाक्य कहता है। आप एक खोखले आदर्श हैं, नकारात्मकता से भरे हुए।

इसीलिए, आपको सुषमा स्वराज की मृत्यु के दिन भी मोदी को टारगेट करना उचित लगा। आपने शब्दों की शृंखला से साबित किया कि केन्द्र से हाशिए पर सुषमा को कैसे ढकेला गया। रवीश जी, आपकी ज़रूरत है समाज को, पत्रकारिता के छात्रों को, टीवी को। ताकि, वो जान सकें कि पत्रकारिता का एक बेकार उदाहरण कैसा होता है, उन्हें निजी घृणा से खोखला होने से कैसे बचना चाहिए।