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370 तो गियो लेकिन J&K में तिरंगा सुरक्षित हाथों में, आँखें फाड़ कर देखो महबूबा कंधे की ज़रूरत किसे है

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि अगर अनुच्छेद 370 से छेड़छाड़ की गई तो राज्य में तिरंगे को कंधा देने वाला भी कोई नहीं बचेगा। पूर्व मुख्यमंत्री की यह धमकी ऐसे समय में आई थी, जब लोग अंदेशा लगा रहे थे कि कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है। और हुआ भी। अनुच्छेद 370 के उन सारे प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया, जिनके कारण जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार मिले हुए थे। राज्य का पुनर्गठन कर के अब्दुल्ला व मुफ़्ती परिवारों के एकछत्र राज्य का भी अंत कर दिया गया। अब जम्मू-कश्मीर की सत्ता में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख- तीनों क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व होगा।

महबूबा मुफ़्ती के बयानों को तूल देकर कुछ मिलने वाला नहीं लेकिन आज स्वतंत्रता दिवस के दिन चहुँओर लहराते तिरंगे को देख कर अचानक से उनके इस बयान का जेहन में आना लाजिमी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य को मिले विशेषाधिकार के साथ छेड़छाड़ की गई तो जम्मू-कश्मीर में तिरंगे को कोई कन्धा देने वाला भी नहीं मिलेगा। अब अनुच्छेद 370 के कई प्रावधान तो नहीं रहे लेकिन तिरंगा आज भी लहरा रहा है। जम्मू- कश्मीर विशेष राज्य नहीं रहा लेकिन तिरंगे के प्रति प्यार मौजूद है। हाँ, जिहाद को (चार) कंधे की ज़रूरत पड़ गई है।

जरा नीचे संलग्न की गई इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। ये कुपवाड़ा की छात्राएँ हैं। इन्होने अपने स्कूल की ड्रेस पहन रखी है और स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के लिए रिहर्सल कर रही हैं। ये तस्वीर स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) से 2 दिन पहले की है। इस तस्वीर को देख कर हिमालय से निकलने वाली किशनगंगा नदी (नीलम नदी) भी ख़ुशी से मचल रही होगी और इन बच्चियों को आशीर्वाद दे रही होगी। कुपवाड़ा से गुजरती नीलम भारत की सीमाओं को पार करते हुए पाकिस्तान में पहुँचती है और झेलम में मिल जाती है। खैर, वह नदी है। उसके लिए आज भी भारत अखंड भारत ही है। आप तस्वीर देखिए:

तिरंगा झंडा ऊँचा लहरा रहा है। यह सुरक्षित है। देश के नौनिहालों को इसे कंधा देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने दिल इस पर न्योछावर कर दिया है। आज इन्हें रोकने के लिए महबूबा मौजूद नहीं है। अपनी हरकतों के कारण महबूबा मुफ़्ती आज नजरबन्द हैं। अपने ही देश की सत्ता को धमका कर रखने वाला अब्दुल्ला गिरोह भी नजरबन्द है। अलगावादियों को न तो दिल्ली के सत्ताधीश पूछ रहे हैं और न ही जम्मू-कश्मीर की जनता। शाह फैसल तो भागने की फ़िराक़ में थे लेकिन पुलिस ने उन्हें भी शिकंजे में ले लिया है। ऐसे में डर लाजिमी है। डर जिहादियों में है क्योंकि आज वो न तो कश्मीर में सुरक्षित हैं और न ही सीमा पार।

महबूबा मुफ़्ती के बयान में अगर तिरंगे को निकाल कर जिहादी कर दें तो यह आज की वास्तविकता में फिट बैठ जाता है। कंधे की ज़रूरत आतंकियों को पड़ रही है। पिछले 3 वर्षों में 700 से भी अधिक आतंकियों को एक नहीं बल्कि चार-चार कंधों की ज़रूरत पड़ी है। यह आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है और कुछ दिनों बाद वह स्थिति भी आएगी जब इन्हें कोई कन्धा भी नहीं मिलेगा। पत्थरबाजों को उकसाने वाले सैकड़ों अलगाववादी आज जेल में बंद हैं। डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार को ब्लैकमेल कर अपने आप को सत्ताधीशों का फेवरिट बना कर रखने वाला यासीन मलिक आज तिहाड़ जेल में सजा काट रहा है।

हाँ, यासीन की बीवी ज़रूर इस्लामाबाद की सभाओं में कविताएँ पढ़ने में व्यस्त हैं। ये वही मोहतरमा हैं, जिन्होंने टेरर फंडिंग के मामले में एनआईए द्वारा अपने शौहर को गिरफ़्तार किए जाने के बाद अपनी 7 वर्षीय बेटी को लाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठा दिया था। रोना-धोना काम नहीं आया, ब्लैकमेलिंग का जमाना बीत गया और अब दिल्ली दलालों को नहीं पूछती और आतंकवाद के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम किया जा रहा है। अपने बच्चों को विदेश भेज कर कश्मीरी युवाओं को पत्थर थमाने वाले अलगाववादियों को आज कंधे की ज़रूरत है।

आज अलगाववादियों, आतंकियों और भारत विरोधी कश्मीरी नेताओं को कंधे की ज़रूरत है लेकिन कोई कन्धा देने को तैयार नहीं। ऐसा इसीलिए, क्योंकि इन्हें कन्धा देने की सोच रखने वाले लोगों को बखूबी पता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो कल को उन्हें भी कन्धों की ज़रूरत पड़ सकती है। कन्धों के इस खेल में बाजुओं ने बाजी मारी है क्योंकि कश्मीर के बच्चे-बच्चियों ने अपने हाथों में तिरंगा थाम रखा है। हो सकता है कि इन विद्यार्थियों को देख कर गिरोह विशेष के कुछ सदस्य कहें कि अरे ये तो कश्मीरी नहीं हैं।

तो फिर कश्मीरी कौन होते हैं? क्या जो लड़कियाँ हिजाब में और जो महिलाएँ बुर्क़े में होंगी, उन्हें ही कश्मीरी माना जाएगा? क्या स्कूल ड्रेस में लड़कों से भी ज्यादा दमखम दिखाते हुए स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में अपना शानदार प्रदर्शन दिखने वाली छात्राएँ सिर्फ़ इसीलिए कश्मीरी नहीं मानी जाएँगी क्योंकि वे पत्थर नहीं फेक रहीं? क्या मॉडर्न कपड़े पहनने, स्वछन्द विचरण करने और फोटोशूट कराने का हक़ सिर्फ़ इर्तिजा इक़बाल और इर्तिका इक़बाल को ही है? इन दोनों का परिचय जानने के लिए आपको गूगल न करना पड़े, इसीलिए बताना ज़रूरी है कि ये दोनों ही महबूबा मुफ़्ती की बेटियाँ हैं।

2004 में इन्हीं महबूबा मुफ़्ती के पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने ‘परमानेंट रेसिडेंस डिसक्वालिफ़िकेशन बिल’ पास कराया था, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर से बाहर के व्यक्ति से शादी करने वाली कश्मीरी महिलाओं का अपने पिता की सम्पत्ति में सारे अधिकार छीन लिए गए थे। उस समय कश्मीरी महिलाओं ने बुलंद आवाज़ में पूछा था, “मुफ़्ती कौन होते हैं यह निर्णय लेने वाले कि हमें किस से शादी करनी है और किस से नहीं?” इस बिल का सबसे ज्यादा खामियाजा कश्मीरी पंडित लड़कियों को उठाना पड़ा था क्योंकि सारे कश्मीरी पंडितों को घाटी से भगा दिया गया था।

महबूबा मुफ़्ती आज भी वही शासन चलाना चाहती है, अब्दुल्ला परिवार आज भी दिल्ली को वैसे ही ब्लैकमेल करना चाहता है जैसे शेख अब्दुल्ला नेहरू को किया करते थे। वे भूल गए हैं कि जनता ऐसा नहीं चाहती क्योंकि जनता ने ऐसे नेताओं को भारी बहुमत से चुना है, जो तिरंगे का अपमान करने वाले और भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने वालों पर कहर बन कर टूटे हैं। अंत में हम एक बार फिर कहना चाहेंगे, “देखो महबूबा, आज अनुच्छेद 370 के प्रावधान तो नहीं रहे लेकिन तिरंगा सुरक्षित है, कश्मीरी बच्चों के हाथों में। लेकिन, तुम्हें कन्धा देने वाले को भी ये डर है कि उसे कन्धा कौन देगा?“

Article 370 हटाने का तरीका बेहतरीन रणनीति का नमूना: रजनीकांत

सुपरस्टार और तमिल राजनीति के नवागंतुक रजनीकांत ने मोदी सरकार की अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर से हटाने के लिए अपनाई गई रणनीति की तारीफ़ की है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए इसे ‘मास्टर स्ट्रेटेजी’ करार दिया है।

‘पहले 144 लगाई ताकि हंगामा न हो’

अपने फैंस में ‘रजनी अन्ना’ के नाम से प्रख्यात रजनीकांत ने कहा कि मोदी सरकार ने जिस तरह से पूरे मसले पर तैयारी की, वह ‘मास्टर स्ट्रेटेजी’ है। पहले उन्होंने (सरकार ने) धारा 144 लगा दी, ताकि लोगों मुसीबत न खड़ी करें। फिर उन्होंने बिल पहले राज्य सभा में रखा, जहाँ उन्हें बहुमत भी प्राप्त नहीं है। और वहाँ से पास कराने के बाद उसे लोक सभा में पास कराया गया।

2016 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से पद्म-विभूषण प्राप्त करने वाले रजनीकांत शुरू में (1995 में) कॉन्ग्रेस-समर्थक हुआ करते थे। बाद में जब 1996 में कॉन्ग्रेस ने अन्नाद्रमुक का हाथ थम लिया तो वे द्रमुक समर्थक हो गए। 2017 के अंत में राजनीति में आगमन करने वाले रजनीकांत ने घोषणा कर रखी है कि तमिल नाडु के आगामी 2021 विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी सभी 234 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।

Breaking: पाकिस्तान ने की थी 13-14 अगस्त की रात घुसपैठ की कोशिश, सेना ने किया नाकाम

जम्मू-कश्मीर में 370 हटने के बाद से संवेदनशील हालातों में पाकिस्तान की साज़िशें जारी हैं। ताज़ा खबरों के अनुसार कल रात (13-14 अगस्त, 2019 की रात) पाकिस्तान ने जिहादियों की घुसपैठ कराने की कोशिश की थी, जिसे हिंदुस्तान की सेना ने नाकाम कर दिया। मीडिया सूत्रों के मुताबिक घुसपैठ में पाकिस्तानी सेना ने भी सहयोग किया था।

उड़ी सेक्टर में हरकत

पाकिस्तान ने यह हरकत जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक उरी सेक्टर में की थी। समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक हिंदुस्तानी सेना ने मुँहतोड़ जवाब देते हुए घुसपैठ की कोशिश को नाकाम कर दिया। सेना के सूत्रों के हवाले से ANI ने यह दावा भी किया है कि हमले में पाकिस्तानी सेना ने भी अपनी सैन्य चौकियों से भारी कवर फायरिंग देते हुए सहयोग किया था।

(यह डेवलपिंग स्टोरी है। और जानकारी मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा। )

रक्षाबंधन का इतिहास: फ़र्ज़ी नारीवादियों के कुतर्कों के नाम (लम्पट वामपंथी भी पढ़ें)

फ़र्ज़ी नारीवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों और स्वीकृति के लिए लालायित लोगों की कई समस्याएँ होती हैं, उनमें से एक है कि उन्हें हर बार उस चीज़ के मायने पता नहीं होते जिसका वो ज़बरदस्ती विरोध कर रहे होते हैं। आजकल रक्षाबंधन पर बहुत लोग आपको तरह-तरह की बातें करते दिखेंगे। इसमें आपको दो-चार प्रचलित शब्द फेंककर हीरो बनता आदमी दिखेगा, मोहतरमा दिखेंगी जिनके पास नया एंगल होता है जो कि बहुत पुराना हो चुका है। कोई इसे पितृसत्ता का प्रोडक्ट बताता है, तो कोई इसे एक घटिया प्रथा कहता मिल जाता है। किसी को ‘बहन ही राखी क्यों बाँधती है’ का जवाब चाहिए, तो कोई ‘भाई पर बहन की रक्षा का दायित्व होता है’ ऐसा मानकर विरोध जता रहा है।

जो लोग गाँवों में रहे हैं, ख़ासकर उत्तर भारत वाले, उन्होंने अपने घर में आए पंडित जी द्वारा सावन पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बाँधते हुए एक श्लोक पढ़ता सुना होगा:

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

इसका अर्थ यह है कि ‘जिस रक्षासूत्र से राजा बलि जैसे दानवीर और महाशक्तिशाली व्यक्ति को बाँधा गया था, उसी रक्षासूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अपने पथ से, संकल्प से अचल और अडिग रहना।’ इस मंत्र का प्रयोग भविष्य पुराण में मिलता है जब इंद्राणी ने देव-दानवों के युद्ध के दौरान इंद्र द्वारा देवों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते गुरु बृहस्पति के समक्ष पाया। तब उन्होंने एक रक्षासूत्र बनाया और देवगुरू बृहस्पति ने इस मंत्र को पढ़ते हुए इंद्र की कलाई पर वो रक्षासूत्र बाँधा और अंततः देवता विजयी हुए।

इसका प्रसंग आपको वामनावतार में मिलेगा जब राजा बलि ने यज्ञादि करके स्वर्ग छीनने की कोशिश की थी। तब विष्णु ने वामन अवतार लेकर ‘तीन पग’ का दान माँगा था। चूँकि राजा बलि दानवीर थे तो गुरु के मना करने पर भी दान के संकल्प से बँधे होने के कारण दान दिया। विष्णु ने तीन पग (क़दम) में क्रमशः आकाश, पाताल और धरती नाप दी और फिर राजा बलि का घमंड चूर कर दिया। बलि के पास रसातल जाने के सिवा और कोई चारा ना मिला। बहुत समय बाद उसने अपनी भक्ति से विष्णु को प्रसन्न कर लिया और हमेशा साथ रहने का वरदान माँगा। घर ना लौटने पर लक्ष्मी जी को चिंता हुई तो नारद ने पूरा प्रसंग सुनाकर उन्हें एक सुझाव दिया कि वो बलि को रक्षासूत्र बाँधकर भाई बना लें, और पति को वापस ले आएँ।

यहाँ पर अब ये देखने योग्य है कि विष्णु ने लक्ष्मी की रक्षा नहीं की, बल्कि उल्टे लक्ष्मी ने विष्णु की रक्षा की। ऐसा ही प्रसंग महाभारत में है कि शिशुपाल वध के दौरान सुदर्शन चक्र चलाते हुए कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने लगा तो द्रौपदी ने अपने वस्त्र का एक टुकड़ा निकाल कर बाँधा था, तब से कृष्ण उन्हें अपनी बहन मानते थे। यहाँ भी स्त्री ने पुरुष की रक्षा की और उसका बदला कृष्ण ने चीरहरण में चुकाया। महाभारत में ही कुन्ती ने पौत्र अभिमन्यु को राखी बाँधी है, द्रौपदी ने कृष्ण को बाँधी है। महाभारत में ही जब युधिष्ठिर कौरवों से विजय पाने की युक्ति हेतु कृष्ण से सलाह माँगते हैं तो वो उन्हें राखी का त्योहार मनाने को कहते हैं कि ‘ये कच्चा धागा सारी विपत्तियों को हटाता है।’

अभी तक जितने प्रसंग हुए वो सब के सब श्रावण की पूर्णिमा को हुए। इसी कारण से ये त्योहार इसी दिन मनाया जाता है। इतने प्रसंगों में से एक में भी स्त्री कहीं से हीन नहीं है। उसके उलट स्त्रियों ने अपनी शक्ति से अपने भाई, पति या समाज की रक्षा की है। भाई की कलाई पर बँधी राखी उसकी रक्षा के लिए होती है ना कि वो बहन की रक्षा का वचन देता कहीं भी दिखता है। बहन की रक्षा भाई के लिए उतनी ही सहज प्रक्रिया है, जितनी सहज बात बहन द्वारा भाई को मुसीबत में देखकर मदद करने की। सामान्य विवेक के इस्तेमाल से ये पता चल जाता है कि जो जिसकी रक्षा करने की स्थिति में होगा, वो करेगा। उसके लिए बहन उसको राखी की याद नहीं दिलाती कि तुमको ही रक्षा करनी होगी।

पितृसत्ता और ‘रक्षा’ की गलत विवेचना

दूसरी बात, ‘रक्षा’ शब्द को लेकर है। इसको हमेशा ही शारीरिक रक्षा के दायरे में संकुचित कर दिया जाता है। ऊपर के तीनों विशिष्ट प्राणियों की – फ़र्ज़ी नारीवादियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों और ‘अटेंशन सीकिंग नवोदित कूल डूड-हॉट चिक’ की भीड़ – पूरी विवेचना और विश्लेषण इसी शब्द और उसके तोड़े-मरोड़े अर्थ पर जाते हैं। जब वो चर्चा करते हैं तो रक्षा का मतलब सीधा ‘भाई, बहन की रक्षा क्यों करेगा’ से शुरू करते हैं और इसको फिर ये सिद्ध करने में इस्तेमाल करते हैं कि बहनों को भाई, या ये समाज (सॉरी पितृसत्तात्मक समाज) शारीरिक दृष्टि से अक्षम और हीन समझता है।

मुझे ये पूछना है कि कौन-सा भाई राखी बँधवाए, या बिना बँधवाए अपनी बहन की, या अपने घर के कुत्ते की भी मदद नहीं करेगा जब वो विपत्ति में हो? इसके उलट कौन सी बहन, चाहे उसने भाई को राखी बाँधा हो या ना बाँधा हो, अपने भाई, या घर के कुत्ते की ही, मदद को न आएगी जब वो मुसीबत में हो? इसमें राखी कहाँ से आ गया? कौन सी बहन ये वादा कराती है कि मेरी रक्षा करना? मैं तो ऐसी बहनों से आजतक नहीं मिला। कुछ कूढ़मगज अब बहन और कुत्ते को एक लाइन में रखने पर भी मुझसे उलझने की कोशिश करेंगे, इसके लिए न सिर्फ दूसरी लाइन में भाई और कुत्ते को साथ रखा है बल्कि ये भी बता रहा हूँ कि वैसी मूर्खतापूर्ण चर्चा का हिस्सा मैं नहीं बनूँगा। उसका अर्थ बस इतना है कि आदमी अपने पालतू जानवर की भी मदद करता है, तो फिर बहन या भाई, या और संबंधियों की क्यों नहीं करेगा!

अब आते हैं ‘रक्षा’ शब्द के मायने पर। भारत के अलग-अलग हिस्सों में रक्षासूत्र (या राखी) बाँधने का प्रचलन अलग-अलग रूप में है। कहीं भाई को बहन बाँधती है, कहीं पति को पत्नी बाँधती है, कहीं घर की स्त्री/लड़की अपने आराध्य को बाँधती है, तो कहीं पुत्री अपने पिता को बाँधती है। इन सब में उच्च स्थान बाँधने वाले को दिया जाता है कि उसका दिया गया सूत्र (धागा) बँधवाने वाले की रक्षा करेगा क्योंकि इसमें उसने अपनी अराधना, आत्मीयता, स्नेह आदि की शक्ति संचित कर दी है। फिर यहाँ स्त्री हीन कैसे है ये समझ से परे है। किसने ये किया, ये भी समझ के बाहर है।

प्रचलन की ही बात करें तो आज भी श्रावण पूर्णिमा को हर पुरोहित अपने यजमान को घर-घर घूमकर ‘येन बद्धो बलिराजा’ का उच्चारण करते हुए रक्षासूत्र बाँधते हैं। हर अनुष्ठान में एक दूसरे के सम्मान की रक्षा का संकल्प करते हुए यजमान और पुरोहित एक-दूसरे को रक्षासूत्र बाँधते हैं। प्राचीन समय में गुरू अपने शिष्य/शिष्या को, तथा शिष्य/शिष्या अपने गुरू को रक्षासूत्र बाँधते थे। यहाँ रक्षा का अर्थ व्यापक हो जाता है। जब विधार्थी स्नातक हो जाता था तो अपने गुरू से विदा लेते समय आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु रक्षासूत्र बाँधता था। फिर गुरू उसे रक्षासूत्र बाँधते थे कि वो शिक्षार्थी अपने ज्ञान का सदुपयोग करते हुए अपने आचार्य/आचार्या के सम्मान एवम् अपने ज्ञान की रक्षा कर सके।

कहीं भी सिर्फ शारीरिक रक्षा की बात नहीं दिखी है। हर जगह रक्षा का दायरा व्यापक है। कहीं भी ये नहीं दिखता कि स्त्री हीन है, दयापात्र है और पुरुष को राखी बाँधकर दया की भीख की कामना करती है, जैसा कि ये अल्पज्ञानी दावा करते दिखते हैं।

इतिहास से अलग, बॉलीवुड की अपनी कहानी

इतिहास में हुमायूँ को कर्मावती द्वारा राखी भेजने का प्रसंग है जो कि बच्चों की पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया जाता रहा है। यहाँ पर एक स्त्री को मदद की गुहार लगाते दिखाया जा रहा है। ये पुस्तकें किस सरकार ने लिखवाईं ये सबको पता है। दूसरी बात, इस प्रसंग का एक अर्थ राखी को सेकुलर त्योहार बनाने की इच्छा भी रही होगी। इससे मुझे कोई आपत्ति नहीं है। ये अकेला वाक़या है जहाँ एक स्त्री ने राखी भेजकर मदद की इच्छा की है। उसी पुस्तक में आपको ये भी संकेत मिलेगा कि भारत में तभी से ये त्योहार मनाया जाने लगा। ये क्यों है, मुझे नहीं पता।

बची कसर बॉलीवुड ने रक्षा की भीख माँगती हिरोइनों को गीत गवाकर पूरी कर दी। किताबों में तुमने वही किया। बाकी का रेडियो और फ़िल्मों के ज़रिए से दिमाग में घुसा दिया कि राखी का बंधन निभाना ही पड़ेगा। वैसी कहानियाँ लिखीं जहाँ कमज़ोर बहनों को भाई बचाने आता है। ये दिमाग़ी कल्पना तो किसी पुराण में, धार्मिक पुस्तक में नहीं दिखती। ये तो तथाकथित उन्मुक्त बॉलीवुड के लेखकों, गीतकारों और फ़िल्मकारों की कल्पना है।

इस लँगड़े प्रचलन के पीछे तो तुम्हारे समाज को वो हिस्सा है जिससे तुम समाज की दिशा और दशा तय कराने के लिए मुँह ताकते हो। पेट्रियार्की तो वो फूँक रहा है जो इस पर सबसे ज्यादा चिल्लाता है जब उसका मतलब नहीं सधता। यही तो वामपंथियों के विकृत दिमाग के सतत प्रयास का प्रतिफल है जो आज भी नई-नई पत्रकार बनी लड़की चार जुमले उछालकर पितृसत्ता चिल्लाते हुए इसकी त्योहार को ‘रीवैम्प’ करने की गुहार लगाती है! गुहार क्यों लगा रही हो, कर लो ना अगर सक्षम हो तो! उसमें भी तुम्हें इसी हिन्दू समाज की ही मदद चाहिए।

खैर, जिस हिसाब से हिन्दुओं के हर प्रतीक को, हर त्योहार को पर्यावरण-विरोधी से लेकर स्त्री-विरोधी और अंधविश्वास का समर्थक दिखाने की कोशिश होती रही है, उसी कड़ी में आपको अज्ञानता के महाकुम्भ इस तरह की बातें करते दिखेंगे। इनके बनाए गए तथ्यों को असली तथ्यों से काटिए। इनसे पूछिए कि कितनी लड़कियों को जानते हैं जो भाई से रक्षा का वचन करवाती हैं राखी बाँधते वक़्त। इनसे पूछिए कि पितृसत्ता का प्रॉडक्ट बताने के पीछे का तर्क क्या है? इनसे पूछिए की रक्षा शब्द से वो क्या समझते हैं।

ये आपको ऐसा कहते मिलेंगे कि ‘आज तो मायने बदल गए हैं ना!’ तो इनको बताइए कि मायने भी तो तुम्हारे चाचा और ताऊ ने बदले हैं, क्योंकि हिन्दू समाज तो इसे भाई-बहन के स्नेह का एक बंधन मानता है। लेकिन ‘बंधन’ शब्द सुनकर ही ऐसे नक़ली नारीवादियों के कान खड़े हो जाते हैं कि ‘बंधन है, बंधन है’। अरे भाई! जैसे ‘दाग अच्छे हैं’ वैसे कुछ बंधन का मतलब सकारात्मक बॉण्ड भी हो सकता है। रक्षा का एक बंधन है, जो कि ना टूटे तो बेहतर है।

त्योहारों के कई उद्देश्य होते हैं समाज में। घर से दूर रहते भाई-बहन को एक-दूसरे से एक दिन मिलने, याद करने का एक ज़रिया है ये। अब आप कहेंगे कि इसकी क्या ज़रूरत है, साल भर क्यों नहीं याद करते। तो मेरा कहना है कि साल भर तो आप प्रेम भी करते हैं, फिर वैलेंटाइन एक दिन क्यों जबकि वो ख़ालिस बाज़ारवाद की उपज है? उसको मनाने पर जब कोई बवाल काटता है तो कैसे ‘अभिव्यक्ति’ का ढोल बजाने लगते हो! फ़्रेंडशिप डे का ‘बंधन’ चलेगा, रक्षा वाला नहीं। यही दोमुँहापन तो तुमको एक्सपोज़ करता है।

तुमको तो किसी ने ज़बरदस्ती राखी नहीं बाँधी, या बँधवाने आ गया? तुम अपने घर में भी चुनाव कर सकते हो अगर तुम्हारा भाई या बहन ऐसे हैं कि तुम्हें नहीं बाँधनी/बँधवानी। कोई नहीं रोकेगा, कोई उपहास भी नहीं करेगा। क्योंकि आस्था में इतनी छूट है। वो दायरा इतना संकुचित नहीं है कि यही करने पर तुम वो हो, असली वाले वो। ये नहीं करोगे तो वो नहीं कहलाओगे। ये तो करना ही पड़ेगा का झंझट नहीं है। मन है करो, मन नहीं है मत करो।

रक्षाबंधन मनाइए। राखी बाँधिए, बँधवाइए। ऐसे चिरकुटों, अल्पज्ञानियों को इनके अज्ञानता में जीने दीजिए। इनको सही मत करिए, कहिए ‘एकदम सही कह रहे हो’। ये कहते ही उसके ईगो की तृप्ति हो जाएगी, जो कि उसका मुख्य उद्देश्य है। यही चाह होती है कि कोई कहे ‘वाह! क्या लिखा है, ये वाला एकदम नया एंगल है।’ इसी एंगल की तलाश में ऐसे आलेख लिखे और लिखवाए जाते हैं। बाद में आपको पता चलेगा कि वही लिखने वाली अपने भाई को राखी बाँध रही है, और लिखने वाला राखी बँधवाने के बाद बहन को गिफ़्ट देने के लिए दुकान छान रहा है।

ऐसा है कि ये लोग ऑफ़िस को ऑफ़िस में ही छोड़ देते हैं। एक्सेप्टेंस की मजबूरी है बेचारों की। ऐसे भी दक्षिणपंथियों को अब टाइप करना आ गया है और वो ऐसे-ऐसे शब्द टाइप कर रहे हैं कि ऐसे लिखने वाले हर साल कम होते जा रहे हैं। मैं तो आपको पूरा इतिहास ही पकड़ा रहा हूँ, इनके मुँह पर खींच-खींच कर मारिए।

देसी लिबरलों की भाषा बोलने लगे Pak PM, कहा- मोदी हिटलर है

अब तक देखा ये जाता था कि हिंदुस्तान के देसी लिबरल पाकिस्तान की भाषा बोलते थे, उसके सुर में सुर मिलाते थे। लेकिन 370 हटने के बाद से पाकिस्तान के तोते ऐसे उड़े हैं कि यह गंगा भी उलटी बहने लगी है। हिंदुस्तान में नरेंद्र मोदी को हिटलर बताने वाले लिबरलों के सुर-में-सुर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी मिला लिया है।

‘दुनिया नाज़ियों की तरह झुक रही एंडिया के आगे’

कश्मीर को हिंदुस्तान का आंतरिक मसला बताने की वैश्विक प्रतिक्रिया की शिकायत करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इसकी तुलना दूसरे विश्व युद्ध के पहले 1930 के दशक में नाज़ी जर्मनी के तुष्टिकरण से की। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान ने आरोप लगाया कि कश्मीर में ‘ethnic cleansing’ (जातीय हत्याकाण्ड) के ज़रिए जनसांख्यिकीय बदलाव करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने ट्वीट किया, “क्या दुनिया ऐसे ही देखती रहेगी जैसे म्यूनिख में हिटलर को देखती रही थी?”

इमरान खान ने राग ‘लिबरल नैरेटिव’ में गाना यहीं बंद नहीं किया। उन्होंने ‘डरा हुआ शांतिप्रिय’ वाले आलाप को भी छेड़ते हुए RSS पर निशाना साधा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने लिखा, “हिंदुस्तान के ‘कब्ज़े’ वाले कश्मीर में कर्फ्यू, कार्रवाई और आने वाला सामूहिक हत्याकांड नाज़ी विचारधारा से प्रेरित संघ की विचारधारा के हिसाब से ही हो रहे हैं /मुझे डर है कि नाज़ी आर्यन श्रेष्ठतावाद जैसी हिन्दू श्रेष्ठतावाद की विचारधारा कश्मीर में ही नहीं रुक जाएगी; इसके चलते पूरे हिंदुस्तान में मुस्लिमों का दमन होगा, और अंत में पाकिस्तान निशाने पर होगा।”

कोई जवाब नहीं दे रहा

इमरान खान ने कसम खाई थी कि वे राष्ट्राध्यक्षों के बीच पैरवी करेंगे और अपनी शिकायत संयुक्त राष्ट्र ले जाएँगे, लेकिन किसी भी देश ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया है। यहाँ तक कि इस्लामी देश ईरान के प्रधानमंत्री हसन रूहानी ने भी, गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, केवल इतना ही कहा कि कश्मीरियों को अपने कानूनी हक इस्तेमाल करने देना चाहिए ताकि वे शांतिपूर्वक रह सकें।

Article 370: BBC के लिए कश्मीर पर अब सिर्फ यूगांडा-लोसोटो से ही बयान लेना बाकी

देश त्यौहार मना रहा हो और बीबीसी जैसे ‘प्रगतिशील’ मीडिया को इस से समस्या न हो, यह संभव नहीं है। शायद कम लोग यह बात जानते होंगे कि औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य भारत से जाते-जाते यहाँ पर जो विष्ठा छोड़ गए थे, BBC उसी से अंकुरित बीजों का एक उदाहरण मात्र है। जो कसर बाकी थी, वो नेहरुघाटी सभ्यता के विचारकों ने इसे अपने कुत्सित विचारों और कुतर्कों से खूब सींचा।

वास्तव में होना तो यह चाहिए था कि सरकार के अनुच्छेद-370 को इतनी सावधानी और सुरक्षित तरीके से, बिना किसी रक्तपात, हिंसा और विरोध के ही निष्क्रीय करने के फैसले पर मोदी सरकार की इच्छाशक्ति पर उनकी पीठ थपथपाई जाए और कॉन्ग्रेस से पूछा जाए कि जब यही कार्य इतनी आसानी से किया जा सकता था, तो फिर उसने आखिर इतने वर्षों तक इस विषय पर मूक रहकर इतनी सारी लाशें आखिर क्यों बिछने दीं?

लेकिन सिर्फ अपने नमक का कर्ज अदा कर रहे बीबीसी (BBC) का सबसे ताजा मर्म तो यही है, यानी बिना शोर-शराबे के मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निष्क्रीय कर दिया गया। देखा जाए तो सिर्फ बीबीसी ही नहीं बल्कि देश में एक ऐसा पूरा ‘प्रगतिशील’ वर्ग है जिसे बीबीसी ने आवाज देने का काम किया है। इस वर्ग की ख़ास बात सरकार विरोधी और सदैव असंतुष्ट रहने की प्रवृत्ति है।

BBC की जिंदगी का फिलहाल सिर्फ एक ही मकसद है और वो है ‘पत्थरकारिता’

मसलन, यदि आप कहें कि सूर्य पूरब से उगता है, तो यह वर्ग अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल पिक्चर को यह कहकर काला कर देगा कि आखिर सदियों से चली आ रही पूरब दिशा की पितृसत्ता और मोनोपोली नहीं चल सकती, सूर्योदय पर मात्र पूर्व का एकाधिकार नहीं हो सकता है। आप इसके पीछे तर्क पूछेंगे तो जवाब मिलेगा कि हमें बने बनाए नियमों के विरोध में खड़े होने के लिए कुछ मुद्दा तो पकड़ना ही होगा न साथी? आखिर विचारधारा के अस्तित्व का सवाल है। अपने विरोध के अजेंडे के लिए यह प्रगतिशील विचारक वर्ग सूर्योदय जैसी काल्पनिक घटनाओं में यकीन करता है यही जानकर संतुष्टि कर लेनी चाहिए।

बीबीसी ने अनुच्छेद-370 पर प्रलाप करके इस बार अपने अस्तित्व को बहुत ही सावधानीपूर्वक बचा लिया है। रही बात राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था की तो उस पर तो बाद में भी बात की जा सकती है। बीबीसी ने अल जज़ीरा का सहारा लेकर सौरा-श्रीनगर से एक ऐसे वीडियो को ‘विरोध प्रदर्शन’ बताया, जिसका ओरिजिनल वीडियो गृह मंत्रालय उनसे माँग रहा है लेकिन न ही बीबीसी और न ही अल जज़ीरा ने इस वीडियो का रॉ (Raw/Unedited) वर्जन अभी तक सरकार को सौंपा है।

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वीडियो पर स्पष्टीकरण के उलट, बीबीसी ने अपनी क्लिकबेट पत्रकारिता की करामात से अपनी भ्रामक रिपोर्टिंग को सबूत के तौर पर जरूर पेश किया है, जिसकी हेडलाइन भी उन्हें बाद में बदलनी पड़ी। कठुआ रेप पीड़ितों के नाम पर कथित तौर पर चंदा अकेले डकार जाने वाली जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर का कहना है कि उन्हें सरकार से ज्यादा बीबीसी पर विश्वास है।

ये वही शेहला रशीद हैं जिन्होंने पुलवामा आतंकी हमले के वक़्त ट्विटर पर अपने फर्जी आरोपों से अफवाह फैलाने का काम किया। हालाँकि, मैं उस दिन देहरादून में ही था और इस वजह से यह बात भी अच्छी तरह से जानता हूँ कि सच्चाई शेहला रशीद के आरोपों से एकदम अलग थी। पुलिस को लगातार स्पष्टीकरण देना पड़ा कि देहरादून में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है जैसा कि शेहला रशीद और उनका पसंदीदा मीडिया दावा करता रहा। कम से कम यह स्पष्ट था कि शेहला रशीद किस प्रकार की खबर देखना और आगे बढ़ाना पसंद करती हैं।

अब बीबीसी के जीवन का ‘एक्के मकसद’ सिर्फ जनमानस को यह सन्देश देना हो चुका है कि अनुच्छेद-370 के फैसले का श्रीनगर की जनता तो सरकार का विरोध कर ही रही है, लेकिन उनके साथ-साथ पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, ‘लोसोटो’, यूगांडा, बुर्किना फासो यहाँ तक कि निकारागुआ तक की जनता भी परेशान है और भयानक प्रदर्शन कर रही है।

हालात ये हैं कि ख़ुदा-न-ख़ास्ता आज की डेट पर अगर यूगांडा में कहीं जोर से 2 लोग खाँस भी दें तो Big BC की खबर यही होगी- “अनुच्छेद-370 पर यूगांडा में भी उठी भारत सरकार की दमनकारी अमानवीय नीतियों के खिलाफ आवाज, जनता पर मोदी सरकार कर रही है आँसू गैस का इस्तेमाल।”

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हमारे देश के प्रगतीशील बुद्धिपीड़ित वर्ग का भी अपना ही अलग दर्द और दुनिया है। मीडिया के इस ख़ास वर्ग का दर्द यह है कि इतना बड़ा ऐतिहासिक फैसला बिना किसी हिंसा और संघर्ष के इतने शानदार होम वर्क के साथ आखिर कैसे सम्भव हो गया? बुद्धिपीड़ितों को तो अभी भी यह उम्मीद है कि काश कहीं तो कुछ खूनखराबा हो, ताकि सरकार के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सके।

एक और ख़ास बात यह कि श्रीनगर के लोगों की आवाज को उठाने की बात वह मीडिया कर रहा है जिसके मालिकों की मानसिक विकृति से हुए मानवाधिकारों के हनन ने युगों तक विश्व के मानचित्र पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी है। यह उत्पीड़न इतना भीषण था कि इसका नतीजा लोग आज तक भुगत रहे हैं। ये वही देश है जिसकी नस्लीय और औपनिवेशिक नीतियों की वजह से कई महाद्वीप आज भी प्रभावित हैं।

मीडिया और विपक्षी दलों की ताजातरीन हरकतों पर व्यंग्यकार नीरज बधवार जी लिखते हैं- “कश्मीर में 2 दिन हिंसा और न हुई, तो कॉन्ग्रेसी हवन कराने भी बैठ सकते हैं।” यह व्यंग्य इस वक़्त अनुच्छेद 370 के विरोध में कमर कस कर बैठे हर दूसरे व्यक्ति की मानसिक स्थिति को सटीक रूप से बयाँ करता है। उम्मीद बस इतनी की जा सकती है कि घाटी में शांति और कानून व्यवस्था इसी तरह बनी रहे और यह देखकर उन परम-प्रलापी मीडिया चैनल्स की मानसिक शांति के लिए दुआएँ करते रहिए, जिनके अनुच्छेद-370 जैसे बड़े फैसले को इतना आसानी से लागू होते देखकर डिप्रेशन में जाने के समीकरण बनते जा रहे हैं।

पाकिस्तान पूरे विश्व में इस समय अलग पड़ चुका है। ऐसा लग रहा है मानो अनुच्छेद-370 के फैसले ने पाकिस्तान की विश्व स्तर पर उसकी हैसियत की पोल खोल दी हो। खैर, इस समय पाकिस्तान को मानसिक दिलासा देने की सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसे में बीबीसी और तमाम ऐसे ही संस्थान उसके साथ अगर खड़े हैं भी, तो हमें मानवीय आधार पर कम से कम उनकी तारीफ़ करनी चाहिए। क्योंकि, हारे का सहारा, बीबीसी नेटवर्क हमारा …

राजस्थान: अलवर के पहलू खान मामले में कोर्ट ने 6 आरोपितों को किया बरी

राजस्थान के अलवर में पहलू खान केस में अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश (क्रम संख्या-1) सरिता स्वामी ने इस केस में फैसला सुनाते हुए सभी आरोपितों को बरी कर दिया है। गो-तस्करी के शक में अप्रैल 01, 2017 को कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा पहलू खान की पिटाई की गई थी। डेयरी बिजनस करने वाले पहलू की 2 दिन बाद मौत हो गई थी।

पहलू खान की हत्या के मामले में अलवर जिला न्यायालय ने बुधवार (अगस्त 14, 2019) को अपना फैसला दिया है। पहलू खान की हत्या की वारदात में 9 आरोपित पकड़े गए, जिनमें से 2 नाबालिग हैं। इनमें से बुधवार को कोर्ट ने 6 आरोपितों पर फैसला सुनाया है। विपिन यादव, रविन्द्र कुमार, कालूराम, दयानंद, योगेश कुमार उर्फ धोलिया और भीम राठी को लेकर यह फैसला सुनाया गया है। जबकि, नाबालिग आरोपितों पर सुनवाई जुवेनाइल अदालत में की जा रही है।

फैसला आने के बाद कोर्ट से बाहर निकले पहलू खान पक्ष के वकील कासिम खान ने कहा कि केस की जाँच सही ढंग से नहीं की गई है। उन्होंने पुलिस पर राजनीतिक दबाव में चार्जशीट पेश करने का भी आरोप लगाया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस वक्त पहलू खान पर हमला हुआ, उस वक्त वह राजस्थान में गाय खरीदने के बाद हरियाणा जा रहे थे। पुलिस ने उनको भीड़ से छुड़ाकर बहरोड़ के कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया था। वहाँ इलाज के दौरान पहलू खान की अप्रैल 04, 2017 को मौत हो गई थी। इस मामले में कोर्ट में चालान के बाद नियमित सुनवाई हुई थी।

राहुल गाँधी ने लिया U-Turn कहा- अब कोई शर्त नहीं, कश्मीर कब आ सकता हूँ

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड सांसद राहुल गाँधी ने कश्मीर दौरे की अपनी सारी शर्तें हटाते हुए कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक को उन्हें राज्य के दौरे पर आने देने की चुनौती दी है। उन्होंने यह जवाब जम्मू-कश्मीर राज्यपाल के उस बयान के जवाब में दिया है, जिसमें कल रात (13 अगस्त) मलिक ने कहा था कि उन्होंने आकर कश्मीर के हालात अपनी आँखों से देखने का राहुल गाँधी को जो न्यौता दिया था, उसमें तमाम शर्तें लगाकर कॉन्ग्रेस नेता राजनीति कर रहे हैं, इसलिए वे (मलिक) न्यौता वापिस लेते हैं। एक दिलचस्प चीज़ आज सुबह किए गए राहुल गाँधी के ट्वीट में यह है कि उन्होंने मलिक को अंग्रेजी में ‘मालिक जी’ (‘Maalik ji’) से सम्बोधित किया है, जो टाइपिंग की गलती की बजाय सूबे के राज्यपाल पर तंज़ अधिक लगता है।

‘प्लेन भेज रहा हूँ, खुद आ कर देख लो’

दरअसल पूरा मामला शुरू तब हुआ जब कॉन्ग्रेस नेताओं के पाकिस्तान के साथ सुर मिलाकर कश्मीर में हो रहे कथित ‘मानवाधिकार हनन’ और अशांति के प्रोपेगंडा को ध्वस्त करने के लिए कश्मीर के राज्यपाल मलिक ने विपक्ष के (फ़िलहाल) सबसे बड़े और मुखर नेताओं में से एक राहुल गाँधी को कश्मीर दौरे का न्यौता भेजा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबक उन्होंने कहा था, “मैंने राहुल गाँधी को यहाँ (कश्मीर ) आने का निमंत्रण भेजा है। मैं आपके लिए हवाई जहाज भेजूँगा, ताकि आप यहाँ आकर (स्थिति को) देखें और फिर बोलें। आप एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं, और आपको ऐसे नहीं बोलना चाहिए।”

उस समय राहुल गाँधी ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा की रिपोर्टों पर टिप्पणी की थी, जिसका मलिक जवाब दे रहे थे।

‘आ तो जाऊँगा, लेकिन मेरी एक शर्त है’

सत्य पाल मलिक के बयान की एनडीटीवी रिपोर्ट को रीट्वीट करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि वे राज्यपाल का निमंत्रण स्वीकार कर आने के लिए तैयार हैं लेकिन उन्होंने इसमें अपनी शर्तें भी जोड़ दीं। वे अपने साथ विपक्ष के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर आना चाहते थे। उन्होंने चतुराई से सत्य पाल मलिक द्वारा मुहैया कराए जा रहे परिवहन को भी ठुकरा दिया, और बता दिया कि वे (राज्य में लागू सुरक्षा प्रतिबंधों के बावजूद) पूरी ‘आज़ादी’ के साथ राज्य का दौरा करना चाहते हैं। उन्होंने साथ ही आम लोगों, ‘मुख्यधारा’ के नेताओं और सैनिकों से मिलने की भी शर्त रख दी थी।

‘निमंत्रण कैंसल’

सत्य पाल मलिक ने मीडिया से बात करते हुए राहुल गाँधी की शर्तों को सिरे से ख़ारिज कर दिया था। उनके मुताबिक निमंत्रण देते हुए उन्हें राहुल गाँधी की इतनी सारी ‘pre-conditions’ का कोई अंदेशा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि अपने साथ प्रतिनिधिमंडल लाकर राहुल गाँधी मामले का राजनीतिकरण कर रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने इससे घाटी में उपद्रव फैलने और आम लोगों के लिए दिक्कतें खड़ी होने की आशंका भी जताई।

ममता के एक और सहयोगी नेता कोलकाता के पूर्व मेयर ने थामा बीजेपी का हाथ

तृणमूल कॉन्ग्रेस सुप्रीमो को एक और ज़ोरदार झटका लगा है। उनके करीबी माने जाने वाले कोलकाता के पूर्व मेयर और बंगाल के फायर एंड इंजीनियरिंग और हाउसिंग विभागों के पूर्व मंत्री सोवन चटर्जी भाजपा में शामिल हो गए हैं। समाचार एजेंसी ANI ने तृणमूल से भाजपा में आए मुकुल रॉय के साथ बीजेपी के मुख्यालय पर उनकी फ़ोटो ट्विटर पर जारी की है।

बड़े दिनों से लग रहे थे दिल्ली के चक्कर

चटर्जी के पार्टी बदलने के कयास बहुत दिनों से लगाए जा रहे थे। दिल्ली के उनके कई दौरों ने कयासों को और हवा दे रखी थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा में शामिल होने के लिए दिल्ली निकलने के पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा की मत्स्यपालन पर स्टैंडिंग कमेटी से इस्तीफ़ा मंगलवार को ही भेज दिया। पिछले साल नवंबर में ममता बनर्जी ने उन्हें कोलकाता के मेयर के पद से इस्तीफ़ा देने को कहा था, जिसके बाद से वह तृणमूल नेताओं से कटे-कटे चल रहे थे।

मनाने की हुईं कोशिशें

भाजपा में शामिल होने के समय सोवन चटर्जी के साथ उनकी करीबी सहयोगी बैसाखी बनर्जी भी थीं। माना जा रहा है कि सोवन को वापस तृणमूल में सक्रिय कराने के लिए मंयता बनर्जी ने कई कोशिशें की थीं। मुख्यमंत्री के संदेशवाहक और बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कई बार सोवन से मुलाकात की लेकिन वे नहीं पिघले।

एक समय ममता के बहुत करीबी सहयोगी माने जाने वाले सोवन के ममता के साथ सियासी रिश्तों में खटास का कारण मीडिया में उनके निजी जीवन की समस्याओं का सुर्खियाँ बन जाना माना जाता है। इसके अलावा उनपर आरोप यह भी था कि सोवन मंत्रिपद पर होते हुए भी, और मेयर के तौर पर भी, अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरतापूर्वक नहीं ले रहे थे।

कविता कृष्णन के साथ चरम-वामपंथी गिरोह कश्मीर पर फैलाना चाहता था प्रोपेगंडा, प्रेस क्लब ने भगाया

जम्मू-कश्मीर पर प्रोपेगंडा फ़ैलाने की कोशिश कर रहे एक्टिविस्टों का एक समूह अपना-सा मुँह लेकर रह गया, जब प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने उन्हें प्रोपेगंडा करने के लिए अपने प्रांगण का इस्तेमाल करने देने से मना कर दिया।

टाइम्स नाउ के अनुसार प्रेस-क्लब ने चरम-वामपंथी एक्टिविस्टों के एक समूह को अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर के हालातों पर झूठा प्रोपेगंडा फ़ैलाने देने से मना कर दिया। इस गिरोह में कविता कृष्णन, सोनिया गाँधी के पूर्व सहयोगी ज्याँ द्रेज़, और दो अन्य भारत-विरोधी ब्रिगेड के सदस्य थे।

इन ‘एक्टिविस्टों’ का दावा था कि उन्होंने कश्मीर जाकर 370 हटने के बाद से उसके हालात का जायज़ा लिया था, और उसे रिकॉर्ड किया था। चरम-वामपंथियों का यह समूह प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इनका इरादा भड़काऊ वीडियो और फ़ोटो रिलीज़ कर जनता को उकसाने का था। कविता कृष्णन ने इस बाबत ट्वीट भी किया:

कविता कृष्णन के 5-दिनी ‘दौरे’ की रिपोर्ट जारी करने के लिए उनके साथ ज्यां द्रेज़ के अलावा मैमूना मुल्ला और विमल भी थे। लेकिन प्रेस क्लब ने फुर्ती से हरकत में आते हुए उनकी रिपोर्ट की रिलीज़ रोक दी। जब सरकार जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की कोशिश कर रही है, तो यह ‘एक्टिविस्ट’ घाटी की एक नकारात्मक छवि बनाने में लगे हुए हैं। इसीलिए प्रेस क्लब ने उन्हें उन रिपोर्टों की रिलीज़ के लिए ज़मीन देने से मना कर दिया, जिनकी पुष्टि नहीं की जा सकती।