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Zomato वालो, हलाल के समय ‘Food has no Religion’ कहाँ गया?

ट्विटर पर एक और सांस्कृतिक लड़ाई शुरू हो गई है। फ़ूड डिलीवरी सर्विस Zomato ने ट्विटर पर खाने के साथ-साथ ज्ञान देना भी शुरू कर दिया है। आज जोमैटो ने बताया कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।

जोमैटो के एक ग्राहक ने खाने की डिलीवरी लेने से मना कर दिया क्योंकि खाना पहुँचाने वाला समुदाय विशेष से था, और श्रावण के महीने में वह गैर-हिन्दू के हाथ से खाना नहीं स्वीकार करना चाहता था। इसपर कैंसलेशन फ़ीस काटना ज़ोमाटो का हक़ था, जो उन्होंने काटी। लेकिन साथ ही पलट कर ‘ज्ञान’ देना शुरू कर दिया कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।

इतना नैतिक ज्ञान बघारना काफी नहीं था जोमैटो के लिए। उसके संस्थापक दीपिंदर गोयल ने भी नैतिक शिक्षा की क्लास ट्विटर पर लेनी शुरू कर दी। उनके अनुसार वह ‘idea of india’ के प्रति गौरवान्वित हैं और अपने ग्राहकों और साझीदारों की विभिन्नता का भी उन्हें गर्व है। साथ ही उनके कथित ‘मूल्यों’ के आड़े आने वाले किसी भी ग्राहक का बिज़नेस छोड़ने में उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है।

खोखले मूल्य

जोमैटो के तथाकथित मूल्य कितने खोखले हैं, इसकी नज़ीर यह है कि जब एक ख़ास मजहब वाले ने गैर-हलाल खाने के लिए शिकायत की, तो जोमैटो उसके चरणों में गिर गया। उस समय उसके ‘मूल्य’ हवा हो गए, जबकि हलाल गैर-हलाल का मुद्दा भी उतना ही मज़हब और आस्था का विषय है, जितना खाना पहुँचाने वाले का हिन्दू होना या न होना।

जिन्हें लग रहा है कि यह एकतरफ़ा राजनीति है, उन्हें यह याद दिलाया जाना ज़रूरी है कि संघियों का आर्थिक बहिष्कार करने की अपीलें भी हुईं हैं इस देश में, और उस समय आज ‘राजनीतिकरण मत करो’ बोलने वाले हमेशा की तरह नदारद थे।

मैं उस व्यक्ति ने जो ट्वीट किया उससे सहमति नहीं रखता। लेकिन तथ्य यह भी है कि ऐसी चीज़ों से निपटने का एक प्रोफेशनल तरीका होता है, सोशल मीडिया पर ज्ञान बाँटने और नैतिकता के ठेकेदार बनने का काम कॉर्पोरेट कंपनियों का नहीं होता।

अलवर में गो तस्करों ने ग्रामीणों पर चलाई गोली, सलीम गिरफ्तार

राजस्थान के अलवर जिले में गो तस्करों ने ग्रामीणों पर फायरिंग की। हमले में जीतनराम नाम के ग्रामीण के सीने में गोली लगी। उनका भतीजा रामजीत भी घायल हो गया। इसके बाद अन्य ग्रामीणों ने एक तस्कर को पकड़ लिया और उसकी जमकर पिटाई की। 2 अन्य तस्कर फरार हो गए।

तस्कर की पहचान सलीम खान के रूप में हुई है। गुस्साए ग्रामीणों द्वारा पिटाई के बाद उसकी हालत गंभीर बनी हुई है, उसे अलवर के राजीव गाँधी सामान्य अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों ने बताया कि उसकी छाती और सिर में गंभीर चोटें आई हैं। जिस कारण उसका सीटी स्कैन करवाया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस मामले में पुलिस ने बताया कि अलवर के कठूमर थाना क्षेत्र के गाँव पत्थर पहाड़ी में मंगलवार (जुलाई 30, 2019) की रात 3 तस्कर कच्चे रास्ते से 10-15 गायों को ले जा रहे थे। आस-पास के ग्रामीणों ने पूछताछ की तो गो तस्करों ने फायरिंग शुरू कर दी। इसमें 25 वर्षीय युवक गंभीर रूप से घायल हो गया।

घटना के बाद से इलाके में तनाव का माहौल है। मामले की सूचना मिलते ही अलवर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र सिंह सहित कई अधिकारी अस्पताल पहुँचे और घटना के बारे में जानकारी ली। खबर के मुताबिक तस्करों को पकड़ने के लिए टीम भेज दी गई है।

डेरेक ‘नो ब्रेन’: न तो विधेयक पिज़्ज़ा है और न ही संसद चुंगी का अखाड़ा

क्या भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह सोचा भी होगा कि संसद की त्वरित और जनता के मुद्दों के लिए समर्पित कार्यवाही भी एक दिन इसमें बैठे कुछ लोगों के लिए आपत्ति का विषय बन जाएगी? लेकिन ऐसा हो रहा है। देश के कुछ ऐसे नेता और सांसद, जिन्होंने वर्षों तक संसद को नारेबाजी और काम न होने का अड्डा बनाकर रखा था, अब इसकी प्रभावशाली कार्यप्रणाली से असहज नजर आने लगे हैं।

संसद में तेजी से पारित किए जा रहे विधेयकों को लेकर विपक्ष द्वारा आपत्‍ति जताई जा रही है। केंद्र सरकार के इस रवैये पर नाराजगी जताने वालों में से एक नाम तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद Derek-No Brain डेरेक ओ ब्रायन का भी है। डेरेक ओ ब्रायन संसद की क्रियाविधि से इतने हैरान हैं कि उन्हें एक विधेयक पास होने और पिज्जा डिलीवरी में अंतर समझ नहीं आ रहा है।

विवादित बयान देकर सस्ती लोकप्रियता बटोरने से ज्यादा डेरेक ओ ब्रायन की शायद ही कोई विशेष पहचान है। डेरेक ने एक ट्वीट में केंद्र सरकार पर निशाना साधने की कोशिश जरूर की है लेकिन इससे सिर्फ यही तथ्य सामने आता है कि वो किस तरह के सिस्टम के अभ्यस्त हैं और उनकी आपत्ति क्या हो सकती है?

डेरेक ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “संसद को विधेयकों की समीक्षा करानी चाहिए। हम पिज्‍जा डिलीवर कर रहे हैं या विधेयकों को पारित कर रहे हैं?”

जब सरकार संवैधानिक दायरे में रह कर, तय तरीके से, तय समय में, वोटिंग के जरिए बिल पास करा रही है तो एक हिस्से को इससे समस्या क्या है? डेरेक की आपत्ति का मूल बेहद खोखला है। उन्हें यह बताना चाहिए कि क्या किसी तरह का कोई गलत बिल पास हुआ है? क्या संसद में ऐसा कोई प्रावधान है कि निश्चित समय सीमा में ही कोई बिल पास हो? क्या सांसदों ने कुछ सवाल किए जिसका जवाब नहीं दिया गया? क्या विरोधी सांसद अपीजमेंट के चक्कर में बिलों को रोकना नहीं चाहते?

अगर सरकार तेज़ी से काम कर रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए न कि फर्जी नैरेटिव तैयार करने के लिए सांसदों द्वारा अख़बारों में लेख लिख कर लोगों में भ्रम फैलाना चाहिए।

डेरेक ओ ब्रायन के बयान का सीधा सा मतलब यही है कि वे अब संसद की कार्यवाही पर ही सवाल उठा रहे हैं। पहले इन्होंने तरह-तरह के फर्जी घोटालों की ख़बरें उड़ाई, फिर सबूत माँगते रहे, आतंकियों को डिफेंड किया, मोदी फिर भी जीत गया तो अब ईवीएम पर रोने के बाद सीधे संसद पर ही सवाल उठा रहे हैं।

दरअसल, डेरेक का वास्तविक दर्द यह है कि उन्हें संसद की सामान्य प्रक्रियाओं की आदत ही नहीं है। जनता के पैसों पर संसद सत्र को बेवजह नारेबाजी का अखाड़ा और चुंगी में तब्दील करने वालों के लिए पिज्जा डिलीवर करने और एक विधेयक के पास होने में शायद ही कोई अंतर पता चल पाए।

इस विधेयक को समय से पास कर लेने से आम आदमी को तो यही सन्देश मिलता है कि यह सरकार वर्षों से शोषण का शिकार होती आ रही महिलाओं और आम आदमी के मुद्दों के प्रति कितनी संवेदनशील है। इसके लिए यदि सरकार को विधेयक पास करने के लिए ‘पिज्जा डिलीवरी’ स्पीड से भी काम करना पड़े तो इसमें कोई बुराई नहीं है। बुराई महत्वपूर्ण संस्थाओं के विरुद्ध फर्जी नैरेटिव तैयार कर उनकी छवि को जनता की नज़रों में खराब करने का प्रयास करना और अविश्वास पैदा करना है।

संसद चलाने का कुल बजट प्रतिवर्ष लगभग 600 करोड़ रुपए होता है, इसका मतलब यह है कि प्रतिदिन की कार्यवाही पर लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च हो जाते हैं। सबसे साधारण शब्दों में इसका मतलब यह हुआ कि यदि भारत की संसद एक मिनट चले, तो जनता की कमाई का लगभग 2.5 लाख रुपया खर्च हो जाता है। इस तरह से हम जान सकते हैं कि जनता के पैसों का इस्तेमाल कुछ लोग सिर्फ सदन में बैठकर हो-हल्ला करने में व्यर्थ करना चाहते हैं और किसी विधेयक के पास हो जाने पर वे बौखला जाते हैं।

ब्रायन ने अपने बयान के बचाव में जिस तुलनात्मक ग्राफ को दिखाया है, वो बेहद फर्जी और अविश्वसनीय है जिसे एक मनगढंत तुलना से ज्यादा कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसमें प्रतिशत अंकों में दिखाया गया है कि अलग-अलग लोकसभा के दौरान कितने बिलों पर चर्चा की गई, लेकिन यह कहीं भी नहीं लिखा गया है कि यह तुलना किस आँकड़ें को किस संदर्भ में रखकर की गई है।

फिलहाल तो डेरेक ओ ब्रायन को यही सलाह दी जा सकती है कि वो पिज़्ज़ा-बर्गर-पॉपकॉर्न खाकर कुछ आत्मविश्लेषण कर लें। क्योंकि लगता नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही यह सरकार भी उनके काम करने की शैली को जरा भी भाव देने वाली है। विशेषकर तब, जब आपकी संख्या मात्र 22 पर सिमट कर रह गई हो। शायद आरामपरस्ती का समय अब इतिहास बन गया है। डेरेक ओ ब्रायन को जय श्री राम।

CCD संस्थापक ने स्वीकारी थी काले धन की बात: IT विभाग

CCD संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की मौत के मामले में IT (आयकर) विभाग के दावे से नया मोड़ आ गया है। IT विभाग ने कहा है कि उसके पास सिद्धार्थ का जो हस्ताक्षर, वह सोशल मीडिया पर चल रहे उनके कथित पत्र के हस्ताक्षर से अलग है। साथ ही विभाग ने जाँच के दौरान सिद्धार्थ को प्रताड़ित करने के आरोपों से भी इनकार किया है। विभाग के अनुसार पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के दामाद ने अपनी आय के कुछ हिस्से को छिपाने का आरोप भी स्वीकारा था

मालूम हो कि सोमवार से लापता चल रहे सिद्धार्थ का लाश उल्लाल के निकट नेत्रवती नदी किनारे मिला। उनका शव वहाँ मौजूद स्थानीय मछुआरों ने निकाला।

‘भरसक कोशिश की लेकिन…’

जिस पत्र की बात हो रही है, वह दावे के अनुसार उन्होंने CCD के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स) को लिखा था। इसमें वह लाभप्रद बिज़नेस का मॉडल खड़ा नहीं कर पाने के लिए निदेशक मंडल से माफ़ी माँग रहे हैं। पत्र में उन्होंने लिखा है कि भरसक कोशिश करते रहने के बाद आज (पत्र लिखते समय) वह हार मान रहे हैं, क्योंकि एक निजी इक्विटी पार्टनर उन्हें (सिद्धार्थ को) शेयर दोबारा खरीदने (‘buy back’) के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिसे आंशिक रूप से पूरा करने के लिए 6 महीने पहले उन्होंने एक मित्र से बड़ी रकम उधार ली थी। इसके अलावा अन्य देनदारों के भी भीषण दबाव की बात उन्होंने पत्र में कही है।

इस पत्र में वीजी सिद्धार्थ ने पूर्व आयकर महानिदेशक पर उत्पीड़न का आरोप लगाया है। इस मामले में 2017 में 4 दिन की छापेमारी के बाद आयकर विभाग को, रिपोर्टों के मुताबिक, तब बड़ी सफ़लता हाथ लगी थी जब सिद्धार्थ ने CCD की ₹650 करोड़ की छिपी आय का खुलासा किया था। इस मामले में आयकर विभाग ने सिद्धार्थ के 46 लाख निजी शेयर इन देनदारियों से अटैच किए थे। इसके अलावा सिद्धार्थ का दावा है कि CCD की माइंडट्री के साथ डील में भी आयकर विभाग ने उनके शेयर अटैच करके अड़ंगा लगाया था। 

RSS का आर्मी स्कूल : गुंडों की पार्टी सपा चिढ़ी, कहा-मॉब लिंचिंग सिखाएंगे

आम धारणा रही है कि उत्तर प्रदेश में जब-जब सपा की सरकार बनती है गुंडई का बोलबाला हो जाता है। सपा के खिलाफ एक बार बसपा ने नारा दिया था-चढ़ गुंडे की छाती पर…। महिलाओं को लेकर सपा नेता कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं यह जगजाहिर है। दुष्कर्म के आरोपियों का बचाव करते हुए इस पार्टी के पितृ पुरुष मुलायम सिंह यादव एक बार कह चुके हैं ‘लड़के हैं, गलती हो जाती है’।

अब जिस पार्टी का चाल-चरित्र ऐसा हो वह 1925 से राष्ट्र निर्माण में जुटी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ‘आर्मी स्कूल’ खोलने की पहल की विरोध तो करेगा ही। सपा ने अपने समर्थकों को निराश नहीं करते हुए कहा है कि संघ द्वारा उत्तर प्रदेश में आर्मी स्कूल खोलना शक पैदा करता है। साथ ही कहा है कि संघ संविधान के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर साज़िश रचना चाहता है।

सपा के अनुसार संघ की विचारधारा विभाजनकारी है। आज़ादी की लड़ाई में उसकी भूमिका नकारात्मक थी और आज भी आज़ादी की लड़ाई के मूल्यों से उसका कोई लेना-देना नहीं है। संघ ऐसे संस्थान केवल राजनीतिक फायदे के लिए खोलना चाहता है, जहाँ सद्भाव भंग करने और मॉब-लिंचिंग करने के तरीके सिखाए जाएँगे।

संघ खोल रहा है ‘रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर प्रदेश में डिफेन्स परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष स्कूल ‘रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर’ खोल रहा है। इस स्कूल की इमारत में तीन-मंजिला हॉस्टल, अकादमिक बिल्डिंग, दवाखाना, स्टाफ सदस्यों के लिए रिहायशी विंग और एक बड़ा स्टेडियम होगा। प्रोजेक्ट की कुल लागत ₹40 करोड़ है।

यह स्कूल आवासीय होगा। लड़कों के विंग का निर्माण पिछले अगस्त में ही शुरू हो चुका है। सीबीएसई पाठ्यक्रम का पालन करने वाले इस स्कूल में छठी से बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होगी। बकौल पश्चिम उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में विद्या भारती उच्च शिक्षा संगठन के क्षेत्रीय संयोजक अजय गोयल, “यह एक प्रयोग है जो देश में पहली बार हो रहा है। अगर यह सफ़ल रहा तो इसे देश के कई स्थानों पर दोहराया जा सकता है।”

समाजवादियों का योगदान क्या है?

आरएसएस पर सवाल उठाने से पहले समाजवादी पार्टी को यह सोचना चाहिए कि देश में उनका क्या योगदान हा है? गुंडई यूपी में उसके राज की पहचान रही, महिलाओं को लेकर उसके नेता कैसे बयान देते हैं यह सबको पता है। वहीं, हम अगर संघ को देखे तो उनके पोर्टफोलियो में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य, अपने स्वयंसेवकों में अनुशासन लाना और देश में राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाए रखना शामिल है। आरोप भले लगे हों, लेकिन आज तक कोई साबित नहीं कर पाया कि संघ कभी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा हो। ऐसे में समाजवादियों को ‘रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर’ पर सवाल उठाने से पहले अपना रिकॉर्ड झाँक कर देखना चाहिए।

उन्नाव रेप पीड़िता ऐक्सीडेंट: जहॉं ट्रक ने मारी थी टक्कर वहॉं पहुॅंची सीबीआई

उन्नाव रेप पीड़िता की गाड़ी को टक्कर मारने के मामले में सीबीआई हरकत में आ गई है। जॉंच एजेंसी की तीन सदस्यीय टीम ने बुधवार को रायबरेली में उस जगह पर जॉंच की, जहॉं 28 जुलाई को ऐक्सीडेंट हुआ था। हादसे में पीड़िता की चाची और मौसी की मौत हो गई थी, जबकि पीड़िता और उसके वकील की हालत गंभीर बनी हुई है।

इस मामले में सीबीआई ने विधायक कुलदीप सिंह सेंगर सहित 10 लोगों के खिलाफ नामजद और 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश की धाराओं में केस दर्ज किया है। रेप और पीड़िता के पिता की पिटाई का मामला सामने आने के बाद से सेंगर जेल में है।

पीड़िता के परिजनों ने कार ऐक्सीडेंट को साजिश बताते हुए मामले की सीबीआई जॉंच की मॉंग की थी। बताया जा रहा है कि पीड़िता और उसके परिजनों को सेंगर और उसके समर्थक लगातार धमकी दे रहे थे। जिस ट्रक ने कार में टक्कर मारी थी उसके नंबर प्लेट पर कालिख पुती थी। ट्रक का मालिक एक सपा नेता का भाई है। सेंगर सपा में भी रह चुका है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पीड़िता का पत्र नहीं मिलने के मामले में रजिस्ट्रार से जवाब मॉंगा है। वे कल इस मामले की सुनवाई करेंगे। पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट भी तलब की गई है। गोगोई ने कहा है, “हम प्रयास करेंगे कि पीड़िता के लिए इस विध्वंसकारी माहौल में कुछ बेहतर किया जा सके।” गौरतलब है कि पीड़ित परिवार ने 12 जुलाई को चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखकर सेंगर से मिल रही धमकियों का जिक्र किया था।

हमें छूने की हिमाकत मत करना दीदी, हम हैं ATOM BOMB: ओवैसी की पार्टी ने दी ममता को चेतावनी

असद्दुदीन ओवैसी के नेतृत्व वाले इस्लामी संघठन ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल ने फैसला किया है कि साल 2021 में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वे अपनी दावेदारी रखेंगे।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामिक संगठन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी से तय करने को कहा है कि वे AIMIM को दोस्त समझती हैं या फिर दुश्मन।

बता दें पार्टी ने राज्य में अभी तक कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है और न ही यहाँ इनकी आधिकारिक रूप से कोई कमेटी है। लेकिन हाल ही में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता असीम वकार ने अपनी ताकत का बखान करते हुए बयान जरूर दिया, “ये सच है कि तादाद में कम हैं, लेकिन हमें छूना मत। हम ATOM BOMB हैं। दीदी! हमें आपकी दोस्ती भी कुबूल और आपकी दुश्मनी भी। आपको तय करना है कि आप हमें दोस्त समझते हो या फिर दुश्मन।”

हालाँकि, जिस ट्विटर अकॉउंट से वकार ने ये बयान दिया है, वो सत्यापित नहीं हैं, लेकिन फिर भी ये बयान इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि वकार के इस अकॉउंट को ओवैसी द्वारा खुद फॉलो किया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार बंगाल में राज्य सरकार द्वारा संचालित नजरूल मंच ऑडिटोरियम में AIMIM के बंगाल कार्यकर्ताओं की मीटिंग आखिरी समय में कैंसिल होने के बाद AIMIM और TMC के बीच तनाव बढ़ गया है। नजरुल मंच के अधिकारियों ने इस मामले पर बात करने से इंकार कर दिया है क्योंकि ये ऑडिटोरियम सूचना एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन है जिसकी मुखिया खुद ममता बनर्जी हैं।

हालाँकि, इससे पहले AIMIM ने धर्मताल में 28 जुलाई को अपने कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक की थी। जहाँ AIMIM के महाराष्ट्र एमएलए वारिस पठान भी मौजूद थे। इस दौरान असीम वकार ने घोषणा करते हुए कहा था कि इस्लाम यहूदियों के ख़िलाफ़ अपने शुरुआती दौर से संघर्ष कर रहा है। यहाँ उन्होंने भीड़ को जोर से ‘अल्लाह-हू-अकबर’ चिल्लाने को भा कहा, ताकि उसकी आवाजें अमेरिका और इजराइल तक पहुँच सके।

वहीं, भाजपा बंगाल ईकाई के महासचिव सांतनु बासु ने इस पूरे मामले पर बयान देते हुए कहा है कि एआईएमआईएम केवल चुनावी समझ के लिए टीएमसी के साथ सौदेबाजी कर रही है।

गौरतलब है अगर बंगाल की राजनीति में AIMIM अपने किस्मत आजमाती है तो राज्य की राजनीति के साथ टीएमसी की राजनीति में भी बहुत बदलाव देखने को मिलेगा। क्योंकि बंगाल में मुस्लिमों की तादाद बहुत ज्यादा है और टीएमसी मुख्यत: इन्हें ही अपना वोट बैंक समझती हैं। ऐसे में अगर मुस्लिमों के सामने AIMIM जैसा इस्लामिक संगठन विकल्प के रूप में मौजूद होगा तो निसंदेह ही वे उसे वोट देंगे। इस तरह AIMIM के आने से बंगाल में मतदाताओं के वोट बँटने की संभावना बढ़ जाएगी। बता दें प्रदेश में हिंदुओं पर पहले से ही समर्थन देने के लिए भाजपा के रूप में विकल्प मौजूद है, जिसका असर हमने लोकसभा चुनाव में देखा है।

शिवरात्रि: काँवड़ चढ़ाने गई लड़कियों से आसिफ, नोमान, इसराइल, जुबैर, नईम, हाशिम ने की छेड़छाड़, मारपीट

हरियाणा के नूंह शहर के भूतेश्वर मंदिर में मंगलवार को शिवरात्रि के अवसर पर काँवड़ चढ़ाने के दौरान मुस्लिम समुदाय के युवकों द्वारा लड़कियों को छेड़ने का मामला सामने आया। जानकारी के मुताबिक जब लड़कियों के परिजनों ने इसका विरोध किया तो आसिफ, हुसैन, नोमान, इसराइल, जुबैर, सुब्बे, नईम और हाशिम ने उनसे मारपीट की।

इस मारपीट में एक युवक के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। जबकि अन्य घायलों का इलाज मेडिकल कॉलेज नल्हड़ में चल रहा है।

इस मामले की शिकायत वार्ड 7 में रहने वाले मनोज कुमार ने महिला पुलिस थाने में करवाई। जिसके बाद आरोपित इसराइल को गिरफ्तार कर लिया गया। अन्य आरोपित फिलहाल अभी फरार है। पुलिस के मुताबिक उनकी तलाश की जा रही है।

पूरे घटनाक्रम में मनोज, अमित सिंह, सागर मेहरा, परवेश आदि को चोटें आईं हैं, जिसके बाद मेवात के दूसरे समुदाय के लोगों में गुस्सा रोष बना हुआ है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले पर नूंह थाना प्रभारी महेंद्र सिंह ने बताया है यहाँ कुछ लड़कियों के साथ सड़क पर जाते समय छेड़छाड़ होने की बात सामने आई। जिसके मद्देनजर महिला थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जाँच की जा रही है। थाना प्रभारी ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। 

यूपी की पाकिस्तान वाली गली: हम भारतीय, मोदी जी बदल दीजिए हमारे मुहल्ले का नाम

देश की राजधानी से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक मोहल्ला है “पाकिस्तान वाली गली”। यहॉं के निवासियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर मोहल्ले का नाम बदलने की गुहार लगाई है। यहॉं कि निवासियों का कहना है कि नाम की वजह से उन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है।

असल में, विभाजन के दौरान कुछ लोग पाकिस्तान से आकर यहॉं बस गए थे, जिसके कारण इस गली का नाम ‘पाकिस्तान वाली गली’ पड़ गया। यहॉं रह रहे लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज पाकिस्तान से आकर बस गए थे, इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।

एक निवासी ने बताया, “हम भारतीय हैं। बहुत पहले हमारे चार पूर्वज यहॉं आकर बसे थे। लेकिन, अब भी हमारे आधार कार्ड पर पाकिस्तान वाली गली लिखा हुआ है। हम इस देश का हिस्सा हैं तो फिर क्यों हमें पाकिस्तान के नाम पर अलग किया जा रहा।”

निवासियों का कहना है कि वे रोजगार और अपने बच्चों के लिए शिक्षा चाहते हैं। स्थानीय निवासी भूपेश कुमार ने बताया, “आधार कार्ड दिखाने के बावजूद हमें काम नहीं मिलता। हमने अपने बच्चों की शिक्षा पर बहुत पैसे खर्च किए हैं, लेकिन फिर भी उनको नौकरी नहीं मिलती। हम बेहद परेशान हैं। हम पीएम नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस कॉलोनी का नाम बदलने और रोजगार की मांग कर रहे हैं।”

एक अन्य निवासी ने बताया, “लोग हमसे बहुत बुरा बर्ताव करते हैं, जैसे हम दूसरे देश के हों। यह सब ‘पाकिस्तान वाली गली’ नाम के कारण हो रहा है। हमें उम्मीद है कि पीएम मोदी तक हमारी गुहार पहुॅंची तो वे इस मामले पर एक्शन जरूर लेंगे।”

इस मोहल्ले में करीब 60-70 घर हैं और यहॉं के निवासी चाहते हैं कि उनके मोहल्ले का नाम सरकार बदल दे ताकि अपने ही देश में खुद को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस न करें।

गायों को बचाने के लिए अकेले ही जूझा गोपाल, तस्करों ने गोली मारकर की हत्या

हरियाणा के पलवल में सोमवार (जुलाई 28, 2019) की शाम करीब 7:30 बजे कुछ गो तस्करों ने एक गो रक्षक की गोली मारकर हत्या कर दी। मृतक का नाम गोपाल है और वह होडल थाना क्षेत्र के गाँव सोंदहद के निवासी थे। इसके अलावा सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वे तीन बच्चियों के भी पिता थे।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के मुताबिक घटना के बाद मृतक के परिजनों ने बताया कि गोपाल गौ रक्षक दल से जुड़े हुए थे। वह पहले भी कई गायों को तस्करों की पकड़ से छुड़ा चुके थे। उन्हें सोमवार (जुलाई 29, 2019) को किसी ने सूचना दी थी कि कुछ लोग गाय की तस्करी कर रहे हैं। जिसके बाद अपनी बाइक लेकर निहत्थे ही वे गायों को बचाने के लिए तस्करों का पीछा करने लगे। परिणाम स्वरुप रास्ते का रोड़ा बनता देख गो तस्करों ने उन्हें गोली मार दी और वहीं उनकी मौत हो गई।

इस घटना के बाद गोपाल के शव को पलवल के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ देखते ही देखते ही देखते बाहर भीड़ जमा हो गई। तनाव की आशंका देखते हुए अस्पताल के बाहर पुलिस को तैनात किया गया है। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में रखा और मामले की जाँच शुरू कर दी। पुलिस के मुताबिक आरोपितों को पकड़ने की कोशिश जारी है।