कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी का हमनाम होना मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाले एक युवक के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। नाम की वजह से लोग उन्हें शक की नजर से देखते हैं। नाम के कारण न कोई सिम कार्ड देने को तैयार है और न ही लोन मिल रहा। मजबूरन, अब वे अपना उपनाम बदलने पर विचार कर रहे हैं।
इंदौर के राहुल गॉंधी ने बताया कि सरकारी दस्तावेज बनवाते वक्त उन्हें अधिकारी शक की नजर से देखते हैं। उन्होंने बताया, “मेरे पास अधार कार्ड है। लेकिन, जब सिम कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या लोन वगैरह के लिए आवेदन करता हूँ तो मना कर दिया जाता है। नाम की वजह से मेरे आधार कार्ड को लोग फर्जी बता देते हैं।”
Rahul Gandhi: In school, I was enrolled as Rahul Gandhi instead of Rahul Malviya. My documents aren’t being made as concerned depts call it a fake name. They make fun of me. People don’t even issue a SIM card, driving license, loan or any other needed papers to me by this name https://t.co/ZZc7eqyE8e
उन्होंने बताया कि उनका पारिवारिक उपनाम मालवीय था। बीएसएफ में कार्यरत उनके पिता को अच्छे आचरण की वजह से साथी ‘गाँधी’ कहकर पुकारते थे। बाद में पिता ने इसे ही उपनाम बना लिया और इस तरह राहुल मालवीय से गॉंधी हो गए।
बकौल राहुल जब वे किसी अपरिचित को फोन कर अपना नाम बताते हैं तो वे उन्हें झूठा समझ लेते हैं। यहॉं तक कि लोग उन्हें ‘पप्पू’ भी कहते हैं, जिसका अक्सर इस्तेमाल कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष का उपहास उड़ाने के लिए किया जाता है।
सरदार उधम सिंह (26 दिसम्बर 1899 से 31 जुलाई 1940) का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के क्रान्तिकारी के रूप में दर्ज है। उन्होंने जलियाँवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर जनरल रहे माइकल ओ’ ड्वायर को लन्दन में जाकर गोली मारी। (नोट: कुछ लोग ओ’ड्वायर को जनरल डायर समझ लेते हैं। जनरल डायर ने गोलियाँ चलाने का हुक्म दिया था, वहीं माइकल ओ’ड्वायर ने जनरल डायर को जलियाँवाला बाग़ में ऐसा करने का आदेश दिया था। डायर बाद में पैरालिसिस से मारा गया।)
कैसे मारा ओ’ड्वायर को
उधम सिंह अप्रैल 1919 को घटित जलियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहाँ 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ’ड्वायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।
उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के कऑक्सटन हाल में बैठक थी, जहाँ माइकल ओ’ड्वायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे ओ’ड्वायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा सँभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ’ड्वायर पर गोलियाँ दाग दीं। दो गोलियाँ माइकल ओ’ड्वायर को लगी जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फाँसी दे दी गई।
उधम सिंह खुद का नाम मोहम्मद सिंह आजाद लिखते थे
विदेशों में वे फ्रैंक ब्राजील और बावा सिंह के नाम से रहते रहे, अपनी निजी डायरी में वे अपना नाम सिर्फ मोहम्मद सिंह आजाद (एमएस आजाद) ही लिखते थे। अपने हस्तलिखित पत्रों में उन्होंने एमएस आजाद के नाम के हस्ताक्षर किए थे।
सरदार उधम सिंह के अंतिम शब्द
उधम सिंह के शब्दों में उनके समय के क्रांतिकारियों, करतार सिंह सराभा और भगत सिंह, की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। ओ’ड्वायर को मारने से पहले उन्होंने कहा था:
“मुझे फर्क नहीं पड़ता, मरने से मुझे कोई समस्या नहीं है। बुढ़ापे तक इंतज़ार करने का क्या मतलब है? उससे कुछ नहीं होनेवाला। मरना ही है तो जवानी में मरना बेहतर है। ये बेहतर है क्योंकि मुझे पता तो है कि मैं क्या कर रहा हूँ!”
थोड़ी देर रुकने के बाद उन्होंने फिर कहा: “मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूँ।”
13 मार्च 1940 को दिए गए एक बयान में उन्होंने कहा था:
“मैंने अपना विरोध जताने के लिए गोली चलाई थी। मैंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भारत में लोगों को भूख से मरते हुए देखा है। मैंने ही वो किया (गोली चलाई)… पिस्तौल तीन या चार बार चली। मैं अपने विरोध के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा। ऐसा करना मेरा कर्म था। थोड़ा और बढ़ा दो (मेरी सज़ा)। सिर्फ इसलिए कि मैंने अपनी मातृभूमि के लिए ये विरोध किया, मुझे इस सज़ा से कोई समस्या नहीं। दस, बीस या पचास साल या कि मुझे टाँग ही दो (फाँसी पर)… मैंने अपना कर्म किया है।”
जब जज एटकिन्सन ने पूछा कि उन्हें ‘क्यों ना उन्हें कानून के मुताबिक़ सज़ा दी जाए ‘, तो उन्होंने कहा:
मैं कहता हूँ ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो। तुम कहते हो भारत में शांति नहीं है! हमारे हिस्से सिर्फ ग़ुलामी है। तथाकथित सभ्यताओं की पीढ़ी दर पीढ़ी ने हमारे हर तरह के घटिया और नीच क़िस्म के अत्याचार किए। तुम्हें बस ये करना है कि अपना इतिहास पलट कर पढ़ लो। अगर तुम्हारे अंदर रत्ती भर भी मानवीय शालीनता है, तो तुम्हें शर्म से मर जाना चाहिए। जिस क्रूरता और रक्तपिपासु प्रवृति के तथाकथित बुद्धिजीवी हैं और खुद को सभ्यताओं का शासक कहते फिरते हैं, वो दोगले हैं…”
जस्टिस एटकिन्सन: मैं तुम्हारे राजनैतिक भाषण को नहीं सुनने वाला। अगर इस केस से जुड़ी कुछ काम की बात हो, तो कहो।
उधम सिंह: मुझे ये कहना है। मैं विरोध करना चाहता हूँ। (उधम सिंह ने अपने हाथों में पकड़े काग़ज़ के पन्नों को लहराकर कहा)
जस्टिस एटकिन्सन: क्या वो अंग्रेज़ी में है?
उधम सिंह: मैं तो पढ़ रहा हूँ तुम्हें बख़ूबी समझ में आएगा।
जस्टिस एटकिन्सन: मुझे बेहतर समझ में आएगा अगर तुमने मुझे वो पढ़ने को दे दिया।
उधम सिंह: मैं चाहता हूँ कि पूरी ज्यूरी इसे सुने।
जस्टिस एटकिन्सन: तुम ये जान लो कि तुम जो भी कह रहे हो, उसमें से कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जाएगा। जो भी कहना है केस के संदर्भ में संक्षिप्त रूप में कहो। चलो, बोलो।
उधम सिंह: मैं विरोध कर रहा हूँ। यही मेरा मानना है। मैं तो उस भाषण के संदर्भ में निर्दोष हूँ। ज्यूरी को उस भाषण को लेकर बहलाया गया है। मैं अब इसे पढ़ रहा हूँ।
जस्टिस एटकिन्सन: ठीक है, पढ़ो। और ध्यान रहे उतना ही बोलो कि ‘क्यों ना तुम्हारे ऊपर कानून के हिसाब से सज़ा सुनाई जाए।’
उधम सिंह: (चिल्लाते हुए) मुझे सज़ा से कोई लेना-देना नहीं। ये मेरे लिए कोई मतलब नहीं रखता। मुझे मौत या किसी अन्य चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता। मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं है। मैं एक उद्देश्य के लिए मर रहा हूँ। (कटघरे पर ज़ोर-ज़ोर से हाथ मारकर आवाज़ करते हुए उधम सिंह बोलते रहे) हम इस ब्रिटिश साम्राज्य से त्रस्त हैं। (धीमी आवाज़ में पढ़ना जारी रहा) मुझे मरने से डर नहीं लगता। मुझे तो मरने पर गर्व है, गर्व है कि मैं अपने देश को आज़ाद करा पाऊँगा। मुझे आशा है कि जब मैं चला जाऊँगा तो मेरे जैसे हज़ारों मेरी जगह लेंगे और तुम्हारे जैसे घटिया कुत्तों को अपने देश से निकाल बाहर करेंगे; देश को आज़ाद कराएँगे।
मैं एक अंग्रेज़ी ज्यूरी के समक्ष हूँ। मैं एक अंग्रेज़ी कोर्ट में हूँ। तुम लोग भारत जाते हो, और जब वहाँ से आते हो तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाता है और हाउस ऑफ कॉमन्स में चुना जाता है। जब हम इंग्लैंड में आते हैं, तो हमें मौत की सज़ा सुनाई जाती है!
मेरा कोई मतलब था ही नहीं; लेकिन मैं इसे भी स्वीकार करूँगा। मुझे इसके किसी भी हिस्से से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन जब तुम्हारे जैसे नीच कुत्ते भारत आएँगे, तो एक समय आएगा जब तुम्हारा भारत से सफ़ाया हो जाएगा। तुम्हारा सारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद चकनाचूर कर दिया जाएगा।
भारत की सड़कों पर मशीनगनें हजारों गरीब औरतों और बच्चों को मार देती है, ताकि तुम्हारे तथाकथित प्रजातंत्र और ईसाइयत का ध्वज लहराता रहे।
तुम्हारा व्यवहार, तुम्हारा व्यवहार– मैं ब्रिटिश सरकार की बात कर रहा हूँ। मुझे ब्रिटिश लोगों से कोई रंजिश नहीं है। मेरे तो भारत की अपेक्षा ज्यादा अंग्रेज़ मित्र यहाँ हैं। मुझे इंग्लैंड के मज़दूरों से सहानुभूति है। मैं इस साम्राज्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ हूँ।
आप लोग तो स्वयं पीड़ित हैं, जो मज़दूर हैं। हर कोई इन गंदे कुत्तों से पीड़ित है; ये पागल जानवर हैं। भारत (में) सिर्फ ग़ुलामी है। क़त्लेआम, लाशों के टुकड़े करना, तबाही फैलाना – यही ब्रिटिश साम्राज्यवाद है। लोग इन बातों को अख़बारों में नहीं पढ़ते। हमें पता है कि भारत में क्या हो रहा है।
जस्टिस एटकिन्सन: मैं अब और नहीं सुनने वाला।
उधम सिंह: तुम और नहीं सुनना चाहते क्योंकि तुम मेरे भाषण को सुनते-सुनते थक गए हो, क्यों? मुझे अभी और भी बहुत कुछ कहना है।
जस्टिस एटकिन्सन: मैं उस बयान से एक भी शब्द और नहीं सुनने वाला।
उधम सिंह: तुमने पूछा कि मुझे और क्या कहना है। मैं कह रहा हूँ। क्योंकि तुम लोग नीच हो। तुम्हें ये नहीं सुनना कि तुम भारत में क्या कर रहे हो।
फिर उधम सिंह ने अपनी ऐनक जेब में रखी और तीन शब्द हिन्दुस्तानी में कहे। और फिर ज़ोर से चिल्लाकर कहा ‘डाउन विथ ब्रिटिश इम्पीरियलिज़्म, डाउन विथ ब्रिटिश डर्टी डॉग्स!’ फिर जब वो जाने के लिए मुड़े तो सॉलिसिटर की टेबल पर थूक दिया। जब वो कठघरे से बाहर आ गए तो जज ने प्रेस से कहा:
“मैं प्रेस को ये निर्देश देता हूँ कि इस बयान का कोई भी हिस्सा रिपोर्ट ना किया जाए जो कि अभियुक्त ने कटघरे से कहा। क्या आप समझ रहे हैं, प्रेस के मेम्बरान?”
(इस लेख का कुछ हिस्सा विकिपीडिया से लिया गया है। साथ ही, कोर्ट रूम के भीतर की जिरह का अनुवाद अजीत भारती ने अंग्रेज़ी से हिन्दी में किया है।)
गुजरात के अहमदाबाद में बाप-बेटी के पाक रिश्ते को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। यहाँ वटवा क्षेत्र के रहने वाले एक 32 वर्षीय मुस्लिम व्यक्ति पर उसकी पत्नी ने आरोप लगाया है कि उसका शौहर पिछले 4 महीने से अपनी 9 वर्ष की बेटी के साथ लगातार दुष्कर्म कर रहा है।
महिला के मुताबिक शनिवार (जुलाई 27, 2019) को वह खरीददारी करने बाजार गई थी, लेकिन जब घर लौटी तो सामने वाले कमरे में उसे कोई नहीं दिखा। उसने दूसरे कमरे में जाकर देखा तो वहाँ उसका शौहर बेटी के साथ दुष्कर्म कर रहा था।
महिला को देखते ही आरोपित पिता उसके आगे हाथ-पैर जोड़ने लगा। लेकिन महिला ने उसे पीटा और बेटी को अपने घर लेकर चली गई। पुलिस को दिए बयान में बच्ची ने बताया कि पिछले 4 महीने से उसके साथ ये सब हो रहा था। पिता उसे मुँह न खोलने के लिए धमकी देता था कि अगर उसने किसी को बताया तो वो उसका गला घोंट देगा
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वटवा पुलिस थाने के प्रभारी एचवी सिसारा ने मंगलवार को इस मामले के बारे में बताया कि माँ की तहरीर पर बेटी का मेडिकल चेकअप करवाया गया । जिसके बाद मेडिकल रिपोर्ट्स में भी बच्ची के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई।
वटवा पुलिस ने आरोपित मुस्लिम व्यक्ति पर पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धारा 376 के तहत मामला दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया है। मामले में एसएफएल टीम द्वारा जाँच जारी है।
सोमवार से लापता चल रहे कैफे कॉफी डे के संस्थापक और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसएस कृष्णा के दामाद वीजी सिद्धार्थ की लाश उल्लाल के निकट नेत्रवती नदी किनारे मिली। उनका शव वहाँ मौजूद स्थानीय मछुआरों ने निकाला। मेंगलुरु के विधायक यूटी खादर के मुताबिक सिद्धार्थ के मित्र और संबंधियों ने उनके शव की पुष्टि की। पुलिस पोस्टमार्टम के बाद सिद्धार्थ का शव उनके परिवार को सौंप देगी।
जानकारी के मुताबिक स्थानीय मछुआरों ने ही पुलिस को नदी किनारे शव होने की सूचना दी थी। जिसके बाद पुलिस वहाँ पहुँची और संदेह जताते हुए कहा कि ये शव वीजी सिद्धार्थ का प्रतीत हो रहा है। उन्होंने बताया, “हमें आज सुबह लाश मिली। इसकी पहचान के लिए हमने परिवार के सदस्यों को सूचित कर दिया है। अभी शव को पोस्टमार्टम के लिए वेनलॉक हॉस्पिटल ले जा रहे हैं।”
Karnataka: Body of #VGSiddhartha founder of Café Coffee Day found near Hoige Bazaar beach in Mangaluru. He was missing since Monday pic.twitter.com/38BbWo2YjK
गौरतलब है वीजी सिद्धार्थ के गायब होने के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि उन्होंने नेत्रवती नदी के पुल पर से छलांग लगा दी होगी क्योंकि सोमवार को अपने ड्राइवर के साथ नेत्रवती नदी के पुल पर पहुँचने के बाद वह अकेले निकल पड़े थे। इस दौरान उन्होंने पुल घूमने की इच्छा जताई थी। लेकिन डेढ़ घंटे बाद भी जब वह अपनी गाड़ी के पास नहीं पहुँचे तो ड्राइवर ने उनकी चिंता में खोजबीन शुरू कर दी। उनका मोबाइल भी बंद आ रहा था।
इसके बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। ड्राइवर के बयान पर मंगलुरु में एफआईआर दर्ज की गई। ड्राइवर ने बताया कि सिद्धार्थ हसन जिले में स्थित सकलेशपुर के लिए निकले थे लेकिन वे मंगलुरु चले गए। इसके बाद माना गया कि उन्होंने नदी से छलांग लगा दी।
Founder & owner, Cafe Coffee Day (CCD), #VGSiddhartha‘s letter to employees and board of directors of CCD, states, “Every financial transaction is my responsibility…the law should hold me & only me accountable.”; He has gone missing from Mangaluru, search operation underway. pic.twitter.com/0GJc5vmvYt
बता दें विजय सिद्धार्थ बीते दिनों बिजनेस में होते घाटे से काफ़ी परेशान थे। उन्होंने अपने कर्मचारियों और अधिकारियों के नाम लिखी चिट्ठी में देनदारों का अत्यधिक दबाव होने की बात कही थी और बताया था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया। इसके अलावा उन्होंने असत्यापित पत्र में आयकर विभाग के पूर्व डीजी पर आय संबंधी जाँच के दौरान काफ़ी प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया था। हालाँकि हालिया बयान में आयकर विभाग ने अपनी जाँच के दौरान उन्हें प्रताड़ित करने के आरोपों से इंकार कर दिया और बताया कि उनकी जाँच के दौरान उद्योगपति ने अपने और अपने प्रतिष्ठानों पर छापों के बाद कुछ आय छिपाकर रखना स्वीकार किया था।
विभाग ने अपनी ओर से जारी बयान में कहा कि उन्होंने जो किया वो आयकर कानून के प्रावधानों के अनुरूप किया। उनके मुताबिक सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे पत्र की सत्यता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता क्योंकि सिद्धार्थ का हस्ताक्षर ‘‘उससे मेल नहीं खाता’’ जो कंपनी के वार्षिक रिपोर्ट के रूप में विभाग के पास उपलब्ध हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर प्रदेश में डिफेन्स परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष स्कूल खोलेगा। संघ के शैक्षिक अंग विद्या भारती के तत्वाधान में खोले जाएँगे। इस स्कूल का नाम पूर्व सरसंघचालक राजेंद्र सिंह के नाम पर ‘रज्जू भैया सैनिक विद्या मंदिर’ रखा जाएगा।
पूर्व-सैनिक ने दी ज़मीन
भूतपूर्व सैनिक और बुलन्दशहर के किसान राजपाल सिंह ने इस स्कूल के लिए संघ को 20,000 स्क्वायर मीटर की अपनी ज़मीन दान की है। इस ज़मीन को एक ट्रस्ट, राजपाल सिंह जनकल्याण सेवा समिति, को सुपुर्द की गई है। इस स्कूल की इमारत में तीन-मंजिला हॉस्टल, अकादमिक बिल्डिंग, दवाखाना, स्टाफ सदस्यों के लिए रिहायशी विंग और एक बड़ा स्टेडियम होंगे। प्रोजेक्ट का कुल लागत ₹40 करोड़ होगा।
An ‘Army’ school is being set up by Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) in Shikarpur, Bulandshahr. Rajpal Singh, who donated his land for the school says, “Central Board of Secondary Education curriculum will be followed in the school, students will be trained for defence forces” pic.twitter.com/PRqGvC9hT1
यह स्कूल आवासीय प्रकार का होगा। लड़कों वाले विंग का निर्माण पिछले अगस्त में ही शुरू हो चुका है। सीबीएसई पाठ्यक्रम का पालन करने वाले इस स्कूल में छठी से बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होगी। बकौल पश्चिम उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में विद्या भारती उच्च शिक्षा संगठन के क्षेत्रीय संयोजक अजय गोयल, “यह एक प्रयोग है जो देश में पहली बार हो रहा है। अगर यह सफ़ल रहा तो इसे देश के कई स्थानों पर दोहराया जा सकता है।”
वीरगति प्राप्त जवानों के बच्चों के लिए आरक्षण
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पहले बैच के लिए विवरण पुस्तिका (प्रोस्पेक्टस) लगभग तैयार है और अगले महीने से स्कूल में भर्ती के लिए आवेदनपत्र स्वीकार होने लगेंगे। गोयल के अनुसार छठी कक्षा के पहले बैच में 160 छात्र होंगे। वीरगति को प्राप्त जवानों के बच्चों के लिए 56 सीटें (35%) आरक्षित होंगी।
पूर्व सैन्य अधिकारी देंगे सुझाव
इसके अतिरिक्त संघ सितंबर में सेवानिवृत्त अफसरों में मिल कर इस स्कूल को बेहतर बनाने के लिए सुझाव लेगा। गोयल के अनुसार कई सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी संघ और अनुषांगिक संगठनों के सम्पर्क में हैं। मीटिंग की तारीख हफ्ते भर में निर्धारित हो जाएगी। विवरण पुस्तिका के अनुसार देश में सैन्य अफसरों की न्यूनतम अर्हता पूरी करने वाले युवाओं की कमी के चलते सेनाएँ जनबल की कमी से जूझ रहीं हैं। यहाँ तक कि सैनिक स्कूलों का नेटवर्क भी आवश्यकता पूरी नहीं कर पा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में सुरक्षाबलों ने आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में बड़ी कामयाबी हासिल की। यहाँ मंगलवार (जुलाई 30, 2019) को सुरक्षाबलों ने पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड समेत दो खूँखार आतंकियों को मार गिराया।
जानकारी के मुताबिक 14 फरवरी को CRPF काफ़िले पर हुए हमले की साजिश में शामिल फयाज़ पंजू के साथ सुरक्षाबलों ने उसके साथी शानू शौकत को भी मुठभेड़ में ढेर कर दिया। पंजू जैश का शीर्ष का कमांडर था।
इन दोनों आतंकियों पर हुई कार्रवाई के बाद भारतीय सेना ने ट्वीट के जरिए इस बड़ी कामयाबी की सूचना दी। उन्होंने अपने ट्वीट में लीडरलेस जैश का दावा किया। साथ ही बताया कि आतंकियों के शव के साथ उनके हथियारों को भी बरामद कर लिया गया है।
— Chinar Corps – Indian Army (@ChinarcorpsIA) July 30, 2019
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि अनंतनाग के बिजबहेड़ा में आतंकियों के होने की सूचना मिलने के बाद एनकाउंटर शुरू किया गया था, जिसमें पंजू अपने एक साथी के साथ मारा गया। पंजू पुलवामा के खूंखार आतंकी हमले में शामिल था, जिसमें 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गए थे। इसके अलावा वह 12 जून को अनंतनाग में सीआरपीएफ पर हुए आतंकी हमले में भी शामिल था, जिसमें हमारे 5 जवानों ने अपनी जानें गँवाईं थी।
सुरक्षाबलों द्वारा की गई इस कार्रवाई के बाद भी अभी क्षेत्र में और आतंकियों के छिपे होने की आशंका है। इसलिए इलाके में सुरक्षाबलों ने घेराबंदी कर रखी है और तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।
मोदी सरकार ने आखिरकार संसद के दोनों सदनों से तीन तलाक बिल को पास करवा ही लिया। राज्यसभा में बिल पास होना आश्चर्यजनक इसलिए रहा क्योंकि वहाँ पर सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं था। इस बिल के पास होते ही तमाम विरोधी दल अपने-अपने अनुसार अपनी भड़ास निकालते हुए देखे जा रहे हैं।
वहीं, अब इस बिल के पास होने के बाद उमर अब्दुल्ला ने अपने ही राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पर निशाना साधते हुए कहा कि महबूबा मुफ़्ती की पार्टी की गैरमौजूदगी ने राज्यसभा में बिल पास कराने में सरकार की मदद की। वहीं तीन तलाक बिल के पास होने पर ओवैसी की पार्टी AIMIM ने आज के दिन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काला दिन बताया है।
राज्यसभा में मंगलवार (जुलाई 30, 2019) को तीन तलाक बिल पास होने के कुछ देर बाद जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने महबूबा मुफ्ती को ट्वीट करते हुए कहा-
“महबूबा मुफ्ती जी, आप को यह चेक करना चाहिए कि इस ट्वीट से पहले आपके सदस्यों ने कैसे वोट किया। मुझे लगता है कि उन्होंने सदन में अनुपस्थित रहकर सरकार की मदद की क्योंकि बिल पास कराने के लिए उन्हें सदन में नंबर चाहिए थे।”
Mehbooba Mufti ji, you might want to check how your members voted on this bill before tweeting. I understand they abstained which helped the government with the numbers needed to pass the bill. You can’t help the government & then “fail to understand need to pass”! https://t.co/Z0Ma5ST5ko
इससे पहले पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) नेता महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट कर कहा था कि वो तीन तलाक बिल को पास कराने की जरूरत को समझने में नाकाम हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इसे अवैध करार दिया था। महबूबा ने इसे मुस्लिम समुदाय को दंडित करने के लिए अनावश्यक का हस्तक्षेप कहा है।
गुजरात के दहेज, भरूच में हुई रोड-रेज की घटना को इंडियन एक्सप्रेस ने साम्प्रदायिक रंग दे दिया है। उनके अनुसार पीड़ित को (केवल) मुस्लिम होने के लिए पाँच लड़कों द्वारा पीटा गया। वहीं पुलिस ने ऑपइंडिया से हुई बातचीत में मामले के किसी भी साम्प्रदायिक एंगल से इंकार किया है।
फैसल खान के अनुसार शनिवार (27 जुलाई, 2019) को वह जोलवा गाँव में टायरों का निर्माण करने वाली अपनी कंपनी के दफ़्तर से कुछ खरीदारी करने निकले थे। ऑफ़िस से 100 मीटर ही वह आगे बढ़े थे कि उन्होंने पाँच लड़कों को एक दूसरे लड़के से बहस करते देखा। वह ध्यान न दे साइड से आगे बढ़ने वाले थे कि उन पाँचों में से एक ने उन्हें पकड़ लिया और नाम-पता पूछने लगे।
उन्होंने जब अपनी कम्पनी का नाम बताया तो उन लोगों ने फैसल के साथ हिंसा शुरू कर दी। विरोध करने और कारण पूछने पर और भी मारा। “मैं वहाँ से किसी तरह निकल भागा क्योंकि मेरी बाइक चालू थी, मैं थोड़ी दूर जा कर छिप गया और अपने सहकर्मी इम्तियाज़ शेख को घटना के बारे में बताया।”
इसके थोड़ी देर बाद जब वह उन गुण्डों को गया हुआ समझ कर लौटने लगे तो दो गुण्डे वहीं मौजूद थे। उन्होंने फिर से फैसल की पिटाई शुरू कर दी और अपने तीनों बाकी साथियों के साथ फैसल को उनकी कंपनी के गेट की तरफ भागते हुए रोक कर अगवा कर लिया, और पास के एक स्थान पर ले जाकर उनके साथ और मारपीट की। उसके बाद वे गुण्डे फैसल को वहीं छोड़ कर भाग खड़े हुए। उनके सहकर्मी उनके फ़ोन करने पर वहाँ पहुँचे और उन्हें अस्पताल ले गए। अस्पताल में अस्पताल वालों ने पुलिस को इत्तला कर दी।
निश्चय ही यह गलत ही नहीं, बहुत ही घृणित हरकत है। और उन गुण्डों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा मिलनी भी चाहिए। लेकिन यह समझ पाना मुश्किल है कि इंडियन एक्सप्रेस ने इसमें साम्प्रदायिकता का एंगल कैसे तलाश लिया। ऑपइंडिया ने जब दहेज पुलिस स्टेशन में फ़ोन कर घटना के बारे में जानना चाहा तो वहाँ के पुलिस अफसर ने घटना में साम्प्रदायिकता का पुट होने से इंकार किया। बकौल पुलिस, यह रोड रेज की घटना थी और अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
इंडियन एक्सप्रेस का इसमें साम्प्रदायिकता का एंगल अविष्कृत कर लेना कोई नई बात नहीं है। मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता ही आ रहा है। इसके पहले भी गुरुग्राम में हुई निंदनीय लेकिन गैर-साम्प्रदायिक मारपीट की घटना को TOI ग्रुप ने साम्प्रदायिक रंग दे दिया था। यही नहीं, जुनैद खान मामले में तो जब तक अदालत का फैसला नहीं आ गया, पत्रकारिता का समुदाय विशेष सीट के झगड़े को लेकर हुई इस हत्या के साम्प्रदायिक कारणों से हुए होने का दावा करता ही रहा।
‘Subjective’ का मतलब होता है विषयनिष्ठ, यानी जो हर इंसान के लिए अलग-अलग हो। ‘Objective’ होता है वस्तुनिष्ठ, यानी जिसे कोई भी इंसान, किसी भी दृष्टिकोण से देखे, तो वह एक जैसा ही दिखे। जेएनयू के अध्यापक अविजित पाठक The Wire में छपे लेख ‘JNU: The Story of the Fall of a Great University’ में अपने सब्जेक्टिव ‘दर्द’ के ऑब्जेक्टिव कारण गिनाते हैं। माने उनके दर्द से भले आप सहमत हों या न हों (क्योंकि वह ऑब्जेक्टिव नहीं है, निजी है), लेकिन उसका कारण ऑब्जेक्टिव है- उससे असहमति की गुंजाईश ही नहीं हो सकती।
अपने लेख की शुरूआत में ही अविजित स्टाइलिश ओपनिंग देने और सहानुभूति लूटने के लिए बताते हैं कि जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा किए गए प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए उनका नाम चार्जशीट में है। लेकिन इसमें शायद वह सिक्के का दूसरा पहलू वह भूल गए कि जब उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल है, तो ज़ाहिर सी बात है चार्जशीट फाइल करने वालों के खिलाफ कही गई उनकी किसी बात में पूर्वग्रह की गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। और यह पूर्वग्रह, यह पक्षपात उनके पूरे लेख में दिखता है।
अपना ‘डर’ डर है, अपनी बेइज़्ज़ती चुभती है…
लेख के पहले खंड की शुरूआत अविजित उसी “डर का माहौल” टेम्पलेट से करते हैं, जो आजकल चरम-वामपंथियों का आखिरी सहारा बचा है। आँकड़े उनके खिलाफ हैं, जनता का मूड उनके खिलाफ है, दशकों की मेहनत से खड़े किए नैरेटिव झूठ के पुलिंदे साबित हो रहे हैं, चारु मजूमदार और किशनजी से लेकर माओ और लेनिन तक उनके हीरो देश के ही नहीं, इंसानियत के भी विलेन निकल रहे हैं। तो ऐसे में हवाई “डर का माहौल” ही उनके पास सबसे ठोस आधार बच रहा है।
वह बताते हैं कि “डर का माहौल” इसलिए है क्योंकि ‘एकतरफ़ा’ अकादमिक काउन्सिल में वरिष्ठ प्रोफ़ेसरों की कथित बेइज़्ज़ती हो रही है। इस एक वाक्य में कितने सारे विरोधभास हैं! आप तो वामपंथी हैं न, अविजित साहब? या कम-से-कम एंटी-राइट? तो आप तो हायरार्की, वरिष्ठ-कनिष्ठ जैसी चीज़ों के खिलाफ हुए न? आपके हिसाब से तो यह शोषकों द्वारा शोषण के लिए गढ़े गए फ़र्ज़ी वर्गीकरण हैं! तो वरिष्ठता का हवाला कैसे दे सकते हैं?
और अगर बात बेइज़्ज़ती की करनी है तो जेएनयू में, जो वामपंथियों का गढ़ है, ज़रा दक्षिणपंथी, एंटी-वामपंथी, ABVP/संघ-परिवार समर्थक शिक्षकों और छात्रों से मिलकर पूछिए उन्हें कितनी ज़िल्लत आपके वामपंथी देते हैं, और कितने पहले से देते थे। आप तो इतनी जल्दी घबरा गए, उन लोगों की सोचिए जो सालों नहीं, दशकों से ऐसे ही माहौल में आते थे, किसी तरह पढ़-लिखकर निकल जाते थे।
आप वरिष्ठों के होते हुए कनिष्ठ और युवा प्रोफ़ेसर को स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज का डीन बनाए जाने का विरोध करते हैं। क्यों? केवल इसलिए कि वह युवा है? वामपंथ तो युवा खून का समर्थक रहा है न? उम्र और वरिष्ठता जैसे चीज़ें तो बूढ़े और दकियानूसी दक्षिणपंथ की परिचायक हैं न?
आप उद्धरण चिह्नों (‘ ‘) के भीतर competent authority को रखते हैं। केवल authority (प्राधिकार) नहीं, competent authority को। यानी आप competence (योग्यता) को भी प्रश्नचिह्नों में रखते हैं, जो कि आपकी वामपंथी विचारधारा है- कि योग्यता महज़ एक सामाजिक छलावा है। तो अगर योग्यता छलावा है, प्राधिकार के खिलाफ वामपंथी होने के कारण अंध-विरोध में खड़े ही रहना है, तो बन जाने दीजिए किसी को भी! क्या दिक्कत है?
बदरंग दीवारें और हत्यारा शे गुवेरा ही हैं आपके ‘aesthetics’?
आप अगला मुद्दा दीवारों से पोस्टर हटाने का उठाते हैं, और बताते हैं कि वह पोस्टर बड़े ही एस्थेटिक (कलात्मक) थे। इससे बड़ी हास्यास्पद विडंबना क्या हो सकती है कि एक तरफ़ आप बात ‘कलात्मकता’ और सुरुचिपूर्णता की कर रहे हैं, और दूसरी ओर आपके ही लेख में जो मुख्य तस्वीर लगी है, उसमें घोर अरुचि पैदा करने वाली, बदरंग दीवार की तस्वीर है। और उसे बदरंग किसी पोस्टर ने ही किया है।
इसके अलावा आप शे गुवेरा का पोस्टर लगाते हैं। वही शे, जो समलैंगिकता को ‘बुर्जुआओं की नौटंकी’ मानता था और समलैंगिकों को नाज़ियों जैसे लेबर कैम्प में भेज देता था। वही जो शेखी बघारता था कि क्रांति के लिए बंदूक चलाते समय बेगुनाहों के बारे में नहीं सोचा जा सकता, जो सामने हो भून दो। जो आपके पसंदीदा नारे ‘free speech’ और आज़ाद प्रेस का दुश्मन था। इसी ‘रुचिपूर्ण’ कलात्मकता के खो जाने का मातम मना रहे हैं?
बायोमेट्रिक से डर क्यों?
आप बताते हैं कि बायोमेट्रिक हाजिरी से जेएनयू के अध्यापक डरे हुए हैं? क्यों? क्या इसलिए कि आप लोग अभी तक अपनी मनमर्जी से कभी मन हुआ तो क्लास लेने आए, नहीं मन हुआ तो छात्रों को पार्ट-टाइम एक्टिविस्ट बना कर किसी भी मुद्दे पर धरना देने भेज दिया? यह तो कामचोरी है, हराम का खाना यानी हरामखोरी है! और अगर आप यह नहीं कर रहे, अगर आप हराम की सैलरी नहीं ले रहे, तो बायोमेट्रिक से किस चीज़ का डर?
ऑब्जेक्टिव और MCQ आपका भेदभाव रोकने के लिए हैं
इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक ओर आप अपने सब्जेक्टिव डर के कारणों को सत्यता देने के लिए उन्हें ‘ऑब्जेक्टिव कारण’ बताते हैं, और दूसरी ओर आप आगामी फ्रेशर्स के बैच के लिए छद्म-रूप से अपमानजनक ‘MCQ generation’ का इस्तेमाल करते हैं। आपको MCQ से दिक्क्त है, समझ में आता है। वामपंथी नैरेटिव गेम में स्ट्रॉन्ग हैं, लेकिन तथ्यों के मामले में कमज़ोर पड़ जाते हैं।
आज तक आप सब्जेक्टिव इम्तिहान लेकर (शायद) केवल अपनी राजनीतिक सोच से मेल खाने वाले या वैचारिक रूप से ढाले जा सकने वाले लोगों को ही प्रवेश देते थे। अब MCQ के ज़रिए वो छात्र भी प्रवेश पाएँगे जो वामपंथियों के झूठे नैरेटिव, और झूठे तथ्यों को चुनौती देंगे। इसीलिए आप दुःखी हैं?
आपका काम पढ़ाना है, एक्टिविस्ट तैयार करना नहीं
अविजित पाठक दुःख जताते हैं कि अब वह होने छात्रों में एक्टिविस्ट तैयार नहीं कर सकते। 29 साल (उनका ही दिया हुआ आँकड़ा) पढ़ाने के बाद भी उन्हें समझ नहीं आया कि शिक्षक का काम शिक्षा देना होता है, उस शिक्षा को किसी एक राह पर ही इस्तेमाल करने के लिए छात्र को धकेलना या बरगलाना नहीं। और जेएनयू ने यही किया है- ईमानदार विचारक और बौद्धिक कम, बौद्धिकता और विचारधारा को हथियार बनाकर एक्टिविज़्म करने वाले एक्टिविस्ट, या नक्सली आतंकी, ज़्यादा तैयार किए हैं।
और अंत में आपको उसी इंसान का लेखन याद दिलाना चाहूँगा, जिसे आप उद्धृत करते हैं- दोस्तोवस्की। ‘नोट्स फ़्रॉम द अंडरग्राउंड’ से लेकर ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘द डेविल्स’ तक अपने हर मशहूर उपन्यास में वह ‘एक्टिविस्ट-टाइप’, यूटोपिया के पुजारी आदर्शवादियों का खोखलापन ज़ाहिर करते हैं। केवल उन्हें उद्धृत करने की बजाय अविजित पाठक और उनके एक्टिविस्ट अकादमिक साथी दोस्तोवस्की को पढ़ना और ईमानदारी से उनके लेखन के आलोक में आत्म-चिंतन करना शुरू कर दें तो बेहतर होगा।
राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर तीखी बहस के बाद ये बिल पास हो चुका है। ये बिल 26 जुलाई को लोकसभा से पास हो चुका था। इस बिल में तीन तलाक को गैर कानूनी बनाते हुए 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इस बिल के ज़रिए जहाँ सत्ता पक्ष मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के प्रतिबद्ध है। वही विपक्ष इसका हर तरह से विरोध कर रहा है जिसका मुख्य मकसद वोट बैंक की राजनीति है। सदन में तीन तलाक बिल पर बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा कि मुस्लिम परिवारों को तोड़ना इस बिल का असली मकसद है।
Union Minister of Law & Justice Ravi Shankar Prasad: Today is a historic day. Both the Houses have given justice to the Muslim women. This is the beginning of a transforming India. #TripleTalaqBillpic.twitter.com/rXwPsfAtBF
आज आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि जन सरोकार और महिला मुद्दों पर भी किस तरह वोट बैंक और मजहब के नाम पर राजनीति होती है। इस बिल के विरोध में आजाद ने यह भी कहा, “कई इस्लामी देशों में तो गर्दन काटने का भी कानून है, आप वहाँ से वो कानून भी लेकर आएँगे क्या? उन्होंने कहा कि हमारा मुल्क किसी मुस्लिम मुल्क का मोहताज नहीं है और न ही किसी मुस्लिम के कहने से चलता है। देश के मुस्लिमों को देश पर गौरव है और हजारों सालों से साथ मिलकर रहते हैं। न हम मुस्लिम देशों की नकल करते हैं और न उनकी सोच रखते हैं।”
राज्य सभा में जारी बहस के दौरान, सदन के नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा, “विधेयक शादी पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए है, लेकिन इसका असली मकसद परिवारों का विनाश करना है। उन्होंने कहा कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित बिल है। पति-पत्नी अपने-अपने लिए वकील हायर करेंगे। वकील को पैसे देने के लिए जमीन बेची जाएगी। जेल का समय खत्म होने पर दोनों दिवालिया हो जाएँगे।
आज़ाद ने कहा कि सरकार मुस्लिम महिलाओं के नाम मुसलमानों को निशाना बना रही है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। अब इस बिल के जरिए सरकार घर के चिराग से ही घर में आग लगाना चाहती है। घर भी जल जाएगा और किसी को आपत्ति भी नहीं होगी।
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि जब वे सजा काटकर जेल से बाहर आएँगे वे या तो आत्महत्या कर लेंगे या चोर और डकैत बन जाएँगे। इस बिल के प्रति आपकी यही मंशा है। सदन में बोलते हुए गुलाम नबी आजाद ने कहा कि किसी धर्म को खत्म करने के लिए कानून नहीं बनना चाहिए, बल्कि देश के लिए कानून बनना चाहिए।
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि आपने हमारी आपत्तियों को हटाया नहीं है, थोड़ी-बहुत सर्जरी जरूर की है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में शादी सिविल अनुबंध है, जिसे आप क्रिमिनल शक्ल दे रहे हैं। वॉरंट के बैगर पुलिस को जेल में डालने का हक दे रहे हैं। साथ ही तीन साल की सजा, भत्ता और बच्चों-बीवी का ख्याल रखने का प्रावधान भी आपने बिल में डाल दिया है। अगर किसी पति को सजा होती है तो क्या महिलाओं को सरकार अपनी तरफ से पैसा देगी, लेकिन सरकार इसके लिए राजी नहीं है। आप एक पैसा नहीं देंगे, लेकिन उसके पति को जेल में डालने के लिए तैयार हैं।
Ghulam Nabi Azad, Leader of Opposition in Rajya Sabha, on Triple Talaq Bill: When they will come out of jail they will either commit suicide or become dacoits and thieves, that is the intention of your bill. https://t.co/H0fJ7r9UAP
इस मुद्दे पर और भी नेताओं ने विरोध दर्ज़ कराया साथ ही तमाम मुस्लिम नेताओं, मौलवियों ने भी देश के कानून के ऊपर शरियत के कानून को ही वरीयता देने की बात कही। गरीब नवाज फाउंडेशन के अंसार रज़ा ने कहा, “पार्लियामेंट में तीन तलाक़ का मुद्दा बार बार उठाना ये हल नही चाहते ये कुछ हिंदुओं को ख़ुश करने के लिए है कि देखो मुसलमानों को हमने डरा दिया, रविशंकर जी कुछ भी करलो मुसलमान शरियत की ही मानेगा।”
पार्लियामेंटमें तीन #तलाक़ का मुद्दा बार बार उठाना ये #हल नही चाहते ये कुछ #हिंदुओं को ख़ुश करने के लिए है कि देखो मुसलमानो को हमने #डरा दिया,#रविशंकर जी कुछ भी करलो मुसलमान #शरियत की ही मानेगा
बीजेपी के नेता रविशंकर प्रसाद ने सभी के आरोपों का विधिवत जवाब देते हुए तमाम कट्टरपंथियों के साथ ही कॉन्ग्रेस और नेता प्रतिपक्ष गुलाम नवी आज़ाद को भी आड़े हाथों लिया।
राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने चर्चा में हिस्सा लेने वाले सभी सांसदों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि पैगम्बर साहब ने हजारों साल पहले इसे गलत बता दिया था लेकिन हम इस पर 2019 में बहस कर रहे हैं। विपक्षी के लोग ‘लेकिन’ के साथ तीन तलाक को गलत बता रहे हैं क्योंकि ये लोग इसे चलने देना चाहते हैं। प्रसाद ने कहा कि गुलाब नबी जी अपनी पार्टी के अच्छे काम भी भूल गए। उन्होंने कहा कि दहेज कानून को गैर जमानती बनाया तब किसी के जेल जाने की चिंता क्यों नहीं हुई। आपकी ओर से प्रगतिशील कानून लाए गए उनका विरोध नहीं हुआ लेकिन शाहबानो के मामले में कॉन्ग्रेस के पैर क्यों हिलने लगते हैं, इसका जवाब आजाद साहब को देना चाहिए।
तमाम बहसों और विपक्षी नेताओं और शरीयत के हिमायतियों के विरोध के बाद भी तीन तलाक़ बिल राज्य सभा में पास हो चुका है। देश की मुस्लिम महिलाओं में इस बिल के पास होने पर ख़ुशी का माहौल है। अब उन्हें तीन तलाक़ के क्रूर चक्र से मुक्ति मिलने के आसार नज़र आने लगे हैं।