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कारगिल के 20 साल: गाथा चार वीरों की, जो हमें बार-बार सुननी चाहिए

कारगिल की बर्फ़ीली चोटियाँ न जाने कितने सैनिकों की जाँबाज़ी की कितनी ही गाथाएँ अपनी ख़ामोशी में समेटे हैं। उन सभी को जान पाना शायद मुमकिन नहीं होगा। लेकिन आज कारगिल विजय दिवस पर उन कुछ वीरताओं को याद तो किया ही जा सकता है जिनके चलते कारगिल पर चाँद-सितारे की जगह आज भी तिरंगा कायम है।

टाँग खोकर भी चैम्पियन बनने वाले सतेंद्र सांगवान

Captain Satendra Sangwan

2009 में ओएनजीसी के सर्वश्रेष्ठ विकलांग कर्मचारी और समाज के लिए प्रेरणा-स्रोत का राष्ट्रीय अवार्ड तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से पाने वाले कैप्टेन सतेंद्र सांगवान प्रोस्ठटिक टाँग के सहारे राष्ट्रीय विकलांग बैडमिंटन चैंपियनशिप लगातार तीन साल जीत चुके हैं, एवरेस्ट (हिन्दुस्तानी नाम: सागरमाथा) पर चढ़ने का प्रयास कर चुके हैं, और विश्व चैम्पियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। बारहवीं के बाद रेडियो टेक्नीशियन के तौर पर वायु सेना में भर्ती होने वाले कैप्टेन सांगवान ने उस्मानिया विश्वविद्यालय से डिस्टेंस लर्निंग द्वारा ग्रेजुएशन किया, और उसके बाद CDS/OTA इम्तिहान पास करने के बाद 16 ग्रेनेडियर रेजिमेंट में वह कमीशन-प्राप्त अफसर बने।

29 जून, 1999 को ब्लैक रॉक नामक क्षेत्र में दुश्मन के बंकरों को तबाह करने के बाद गश्ती (पैट्रोलिंग) ऑपेरशन से लौटते समय कैप्टेन सांगवान का पैर एक बारूदी सुरंग पर पड़ गया, जिसका धमाका उनके दाहिने पैर को उनसे छीन ले गया। उस समय तक उनकी टुकड़ी द्रास और बटालिक जैसे दुर्गम स्थलों पर दो महीने से अधिक समय बिता चुकी थी।

टीले पर कब्ज़े के लिए गोलियों की बौछार में सीधी छलाँग

लगभग सीधी चढ़ाई वाले टीले पर स्थित पॉइंट 4812 पर कब्ज़ा करने का निर्देश लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफ़र्ड नोंग्रुम की टुकड़ी को मिला था। तिस पर से यह चढ़ाई भी पाकिस्तानियों की नज़र में न आने के लिए छिप कर ही करनी थी। 30 जून-1 जुलाई 1999 की रात को दक्षिण-पूर्वी छोर से किसी तरह चढ़ते हुए चोटी के पास तो भारतीय सेना पहुँच गई, लेकिन बहुत कोशिश करने के बाद भी ऊपर की चट्टानों में खाई बनाकर छिपी पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी ने दो घंटे तक उन्हें आगे बढ़ने से रोके रखा

लेफ्टिनेंट नोंग्रुम की तस्वीर के साथ उनके माता-पिता (साभार: defencelover.in)

तब इस गतिरोध से पार पाने के लिए लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने अपनी जान हथेली पर लेकर गोलियों की बौछार में छलाँग लगा दी। दुश्मन की पहली पोज़ीशन पर पहुँच कर उन्होंने वहाँ ग्रेनेड फेंका, जिसके धमाके से 6 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। दूसरी पोज़िशन पर तैनात यूनिवर्सल मशीन गन को भी पाकिस्तानियों से छीनने की कोशिश में वह तो घातक रूप से घायल हो गए, लेकिन इस बीच पाकिस्तानियों का ध्यान बँटने का फायदा उठाकर भारतीय सैनिकों ने हमला बोलकर वह पोज़िशन हथिया ली। इसके बाद अपने घावों के साफ़ तौर पर जानलेवा होने के बावजूद लेफ्टिनेंट नोंग्रुम ने मैदान से दूर ले जाए जाने से साफ़ इंकार कर दिया, और आखिरी साँस तक लड़ते ही रहे। उनको सेना का दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महा वीर चक्र’ मरणोपरांत दिया गया

नायक ब्रिज मोहन सिंह- पाकिस्तानियों को समझ नहीं आया खाली हाथ झपटते को कैसे रोकें

BRIJ MOHAN SINGH

नायक ब्रिज मोहन सिंह ने मश्कोह सब-सेक्टर में “सैंड्स टॉप” टीले पर कब्ज़े के लिए जो रणनीति इस्तेमाल की, उसकी शायद ही कभी पाकिस्तानियों ने कल्पना भी की होगी, सामना तो दूर की बात है। जब उनकी 9 पैराशूट स्पेशल फोर्सेज़ की 30-सदस्यीय कमांडो टीम की बढ़त 30-जून-1 जुलाई, 1999 की रात टीले की छोटी के पास पहुँच कर भी लगातार हमले के चलते रुक गई, तो उन्होंने आत्मोत्सर्गी निर्णय लिया। अपनी टुकड़ी के भाले की नोंक बन उन्होंने पहले दुश्मन की पोज़िशनों पर ग्रेनेड से हमला किया, उसके बाद यकायक धमाके से बौखलाए सैनिकों पर खुद झपट्टा मार कर उन्हें ढेर करना शुरू कर दिया। ऐसी रणनीति से बौखलाए पाकिस्तानी जब तक कुछ समझ या पलट कर ब्रिज मोहन सिंह पर हमला कर पाते, भारतीय कमांडोज़ को हमले का वह मौका मिल चुका था जिसकी उन्हें तलाश थी। ऐसे ही ब्रिज मोहन सिंह ने गंभीर रूप से घायल होकर वीरगति को प्राप्त होने के पहले पाँच पाकिस्तानियों को मौत की नींद सुला दिया, जिसमें से दो को तो उन्होंने केवल अपने खंजर (कमाण्डो नाइफ़) से मारा। अपनी जान और सुरक्षा की परवाह किए बिना दिलेरी और शौर्य की मिसाल खड़ी करने वाले ब्रिज मोहन सिंह को वीर चक्र से नवाज़ा गया

हाथ पर लगी गोली ले गई टाइगर हिल के नायक की जान

कैप्टेन जेरी प्रेमराज को वीर चक्र से नवाज़ा गया

जब 6/7 जुलाई, 1999 की रात पाकिस्तानी गोली कैप्टेन जेरी प्रेमराज के सर, सीने और पेट को ‘बख्श’ बाँह पर लगी होगी तो उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि एक विषैले सँपोले की तरह वह ‘मामूली’ चोट उनकी जान की दुश्मन साबित होगी। लेकिन हुआ यही, क्योंकि गोली देश के दुर्भाग्य से नस को चीर गई, और वह चोट ऊँचाई पर ज़्यादा तेज़ी से होने वाले रक्त-स्राव के चलते अंततः प्राणघातक निकली। उस चोट के बाद भी कैप्टेन लड़ते रहे, क्योंकि उनका मिशन था 15,000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित चोटी 4875 पर हमला, जिससे पाकिस्तानियों पर गोलीबारी की जा सके। हमले के दौरान पाकिस्तानियों की ओर से हुई जवाबी गोलीबारी में उन्हें और गोलियाँ भी लगीं, लेकिन उन्होंने हमला पूरा होने के पहले मेडिकल सहायता के लिए मैदान छोड़ कर जाने से मना कर दिया। अंततः उसी दिन मात्र छह महीने की उम्र में अपने गाँव के सबसे तंदरुस्त बच्चे का ख़िताब जीतने वाले कैप्टेन आर. जेरी प्रेमराज की मौत हो गई।

खुद घायल होते हुए भी छह को मारा हवलदार गिल ने

Sis ram gill

हवलदार शीश राम गिल के नेतृत्व वाली कमांडो टीम को 17,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित “मंजू” नामक पाकिस्तानी चौकी पर कब्ज़े का निर्देश दिया गया। लगभग असम्भव चढ़ाई वाली यह चोटी बहुत ही दुर्गम थी, और दुश्मन ने गोलियों और मोर्टार के हमले लगातार चालू रखे। लेकिन हवलदार गिल ने भी अपनी टीम के जज़्बे को गोलियों की बारिश से बुझने नहीं दिया, और अपने पैर पर लगी गोली की चोट को भी खुद स्नाइपर और मशीन गन से एक पाकिस्तानी अफसर, दो जेसीओ, और तीन सैनिकों को ऊपर पहुँचाने के आड़े नहीं आने दिया। इसके अलावा उनकी गोलियों से चार अन्य पाकिस्तानी भी घायल हुए। हवलदार गिल को पता था कि उनके हटने से कमांडो टीम की लड़ने की ताकत घटेगी और मिशन फेल हो जाएगा, इसलिए वह लड़ते रहे। 9 जुलाई, 1999 को लेकिन वह अपनी ज़िंदगी की जंग हार गए, और उनका वीर चक्र मरणोपरांत उनके परिवार को मिला।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर गाय के गले में बम बाँधकर हो रही है तस्करी, 365 गायों को किया गया जब्त

पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर तस्करी के ख़िलाफ़ BSF जवानों द्वारा दिखाई जा रही सक्रियता से हताश होकर पशु तस्कर अब अपने मनसूबों को अंजाम देने के लिए नए-नए हथकंडे आजमाने लगे हैं।

जानकारी के मुताबिक अब ये तस्कर पशुओं को सीमा पार ले जाने के लिए गायों की गर्दन के पीछे केले के पत्तों के साथ सॉकेट बम लगा रहे हैं। ताकि जवान इसकी चपेट में आ जाएँ और वे आसानी से तस्करी कर पाएँ। लेकिन सीमा पर तैनात जवान उनके इन इरादों को कामयाब नहीं होने दे रहे हैं। नई दुनिया की खबर के अनुसार 24/25 की रात बीएसएफ जवानों ने 365 गायों को अपनी जान पर खेलकर सीमा पार जाने से बचाया।

पशु तस्करों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे इस नए तरीके को जानने के बाद बीएसएफ अधिकारी भी हैरान हैं। उनकी मानें तो बंगाल के साउथ बंगाल फ्रंटियर के जवानों ने 25 की रात को ऑपरेशन के दौरान सीमावर्ती मालदा, उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद और नदिया जिलों से होकर बांग्लादेश की सीमा पार होने वाले 365 मवेशियों को जब्त किया।

जिसके बाद तस्करों ने बीएसएफ के जवानों पर घातक हमला किया, लेकिन फिर भी जवानों ने हार नहीं मानी और सीमा पार होने वाली अवैध तस्करी को नाकाम कर दिया।

गौरतलब है कुछ दिन पहले सीमा पार होने वाली इस अवैध पशु तस्करी को रोकने के प्रयास में एक जवान को अपना पंजा गँवाना पड़ा था क्योंकि उस समय इन तस्करों ने लगातार दो बार जवान पर देसी विस्फोटक से हमला किया था। इस घटना के बाद बीएसएफ ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर दक्षिण बंगाल इलाके में अलर्ट जारी किया था, और दक्षिण बंगाल फ्रंटियर के इंस्पेक्टर जनरल ने इस मामले पर सख्त रुख अख्तियार करते हुए सभी फील्ड फॉर्मेशन को निर्देश दिए थे कि ट्रांस बॉर्डर क्रिमिनल के खिलाफ बेहद सख्‍त रुख अपनाते हुए कार्रवाई की जाए ।

आज़म खान पुरुष सांसदों पर धब्‍बा, उनका शर्मनाक बयान उनके चरित्र का प्रतिबिम्ब: स्‍मृति ईरानी

लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर चर्चा के दौरान सदन की अध्यक्षता कर रही भाजपा सांसद रमा देवी पर सपा सांसद आज़म खान द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणी की हर तरफ आलोचना हो रही है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी आज़म  खान के बयान की आलोचना करते हुए इसे शर्मनाक बताया है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “आज़म खान द्वारा दिया गया शर्मनाक बयान उनके चरित्र का प्रतिबिंब है; उनका बचाव करके अखिलेश यादव ने भी प्रमाणित कर दिया की उनकी सोच में भी कोई फ़र्क़ नहीं। जो सदन में महिला के साथ निंदनीय व्यवहार कर सकता है वह साधारण महिला से किस प्रकार का व्यवहार करता होगा, यह सोचने वाली बात है।” इसके साथ ही एक और ट्वीट में स्मृति ने आज़म खान को सभी पुरुष सांसदों पर धब्बा बताया।

गौरतलब है कि, आज़म खान ने गुरुवार (जुलाई 25, 2019) को सदन में भाजपा सांसद रमा देवी से कहा, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने भी आज़म खान के इस बयान को सही बताते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि आजम खान स्पीकर का असम्मान करना चाहते थे और उन्होंने जो कुछ भी बोला, उसमें कुछ भी गलत नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ एनसीपी नेता माजिद मेमन ने भी आजम खान का बचाव किया। माजिद मेमन ने कहा कि आज़म खान ने जो कहा वह कहीं से भी गलत नहीं लगता है। उन्होंने असम्मान की भावना से चेयरपर्सन को कुछ नहीं कहा है। यही नहीं माजिद मेमन ने तो यहाँ तक कह दिया कि आज़म खान के बयान की सराहना होनी चाहिए, उनके बयान को तारीफ के तौर पर देखना चाहिए।

बीजेपी सदस्यों ने आज़म खान के व्यवहार के लिए कड़ी आपत्ति जताई और माफी माँगने के लिए कहा। लेकिन आज़म खान ने माफी माँगने की बजाय सपा सदस्यों के साथ सदन से वॉकआउट कर लिया। उनका कहना था कि उन्होंने किसी असंसदीय शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है और अगर ऐसा हुआ है, तो वो इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं।

कारगिल: कहानी उन हीरोज की जिनके आगे पस्त हो गया पाकिस्तान का ‘डर्टी-4’

आज 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है। 20 साल पहले आज के ही दिन हमारे वीर जवानों ने पाक के ‘डर्टी-4’ जिसमें उस समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख रहे जनरल परवेज मुशर्रफ, जनरल अजीज, जनरल महमूद और ब्रिगेडियर जावेद हसन शामिल थे, के नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया था।

डर्टी-4 ने कारगिल का प्लान बनाया यह सोचकर बनाया था कि अगर भारत उन्हें कारगिल से खदेड़ने की कोशिश करेगा तो उसे कश्मीर से अपनी सेना को मूव कराना पड़ेगा। डर्टी फोर की प्लानिंग थी कि अगर भारत ने ऐसा कुछ किया तो कश्मीर में उसकी स्थिति कमजोर हो जाएगी। ऐसे में वे और ज्यादा मुजाहिदीन (आतंकवादी) कश्मीर भेजेंगे। जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के बाद आतंकी भयंकर मारकाट मचाएँगे, इस तरह भारत को दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी, भारत को गुरिल्ला वार में फँसाने की पूरी साजिश इन चारों के दिमाग की ही उपज थी। पहले तो कारगिल में पाकिस्तान अपने सैनिकों की संलिप्तता से इनकार करता रहा पाक लेकिन बाद में उसका झूठ बेनकाब हो गया।

बलिदान की गाथा

वैसे, युद्ध में पकड़े जाने वाले सैनिकों के साथ बर्बरता करने के मामले में पाकिस्तान का रिकॉर्ड हमेशा से खराब रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए पाकिस्तान के ऐसे कई कारनामे दर्ज़ हैं जहाँ उसने दरिंदगी की सारी हदें लाँघ दी। कारगिल के सन्दर्भ में भी पाकिस्तान की बर्बरता के तीन बड़े उदाहरणों की बात की जाए तो वह हैं स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, कैप्टन सौरभ कालिया और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता, हालाँकि फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता वापस लौट आए थे। लेकिन क्या किया था पाकिस्तानी सैनिकों ने इनके साथ, इन अफसरों के साथ क्या हुआ था, पढ़िए पूरी दास्तान…….

पहले हीरो सौरभ कालिया

कैप्टन सौरभ कालिया (1976-1999) कारगिल में मई 1999 में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सीमा के भीतर पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ के संबंध में रिपोर्ट करने वाले पहले सैन्य अधिकारी थे। उनको कारगिल का पहला हीरो भी कहा जाता है। कारगिल सेक्टर में 4-जाट रेजीमेंट में उनकी पहली पोस्टिंग थी। 15 मई, 1999 को वह अपने दल के पाँच जवानों अर्जुन राम, भँवर लाल बघेरिया, बीकाराम, मूलाराम और नरेश सिंह के साथ काकसर क्षेत्र में गश्त पर थे। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ गोलीबारी में उनका गोला-बारूद खत्म हो गया। इससे पहले कि भारतीय सैनिक उन तक पहुँच पाते पाक रेंजरों ने उनको घेरकर युद्ध बंदी बना लिया।

बलिदानी सौरभ कालिया के लिए आज भी न्याय की आस लगाए उनके माता-पिता

22 दिनों तक उनको भयानक यातनाएँ देने के बाद गोली मार दी गई। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने सभी जवानों के क्षत-विक्षत शव भारत को सौंपे। इन्हें वीभत्स तरीके से टॉर्चर किया गया था। तीन हफ्ते बाद उनका क्षत-विक्षत शव सेना को मिला था। इतना टॉर्चर किया गया था कि उनकी पहचान तक मुश्किल थी। पाकिस्तानियों ने उनकी आँखें तक फोड़ दी थी और गला काट दिया था। पाक ने जब कैप्टन कालिया का शव सौंपा तो उनके शरीर के कई अंग कटे हुए और गायब थे। उनके दोनों कानों में गर्म छड़ें घुसेड़ दी गई थी। फिर भी, झूठे और मक्कार पाकिस्तान ने दावा किया था कि सौरभ का शव एक गड्ढे में मिला था और उनकी मौत ख़राब मौसम की वजह से हुई।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा जो विंग कमांडर अभिनंदन की तरह ही मिग-21 फाइटर जेट उड़ाते हुए पाकिस्तान सीमा में पहुँच गए थे। बात 27 मई 1999 की है। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ लॉन्च किया था, जिसका मकसद एलओसी पर पाकिस्तानी सेना की स्थिति का पता लगाना था। वायुसेना की भटिंडा स्थित गोल्डन-एरोज स्क्वाड्रन में अजय आहूजा फ्लाइट कमांडर थे, सेना ने उन्हें जिम्मेदारी दी कि वह पाकिस्तानी सेना की सही स्थिति का पता लगाएं। वह मिग-21 लेकर निकले लेकिन बीच में ही उन्हें सूचना मिली कि फ्लाइट-लेफ्टिनेंट नचिकेता को अपना मिग-27 विमान आग लगने के कारण छोड़ना पड़ा है।


स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

आहूजा को पता चल गया था कि नचिकेता पाकिस्तानी सीमा में हैं और वहाँ उन्हें ढूँढने जाना जोखिम भरा हो सकता है फिर भी वह अपने साथी का पता लगाने सीमा में घुस गए। जब वह नचिकेता की तलाश कर ही रहे थे कि बारूद गोला उनके जेट से टकराया जिससे उसमें आग लग गई। उन्हें पाकिस्तानी सीमा में उतरना पड़ा। 27 मई शाम साढ़े आठ बजे तक यह कंफर्म हो गया था कि अजय आहूजा शहीद हो चुके हैं। लेकिन, जब पाकिस्तानी सेना ने उनका शव सौंपा तो पता चला कि उनकी मौत प्लेन से कूदने की वजह से नहीं, बल्कि बहुत नज़दीक से गोली मारने से हुई थी। मरने से पहले उन्हें भी पाकिस्तानी सैनिकों ने टॉर्चर किया था। कारगिल युद्ध की समाप्ति के बाद स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

8 दिन बाद लौटे फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता

1999 में कारगिल युद्ध के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था। हालाँकि, भारत सरकार के कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बाद उन्हें आठ दिन बाद छोड़ दिया गया था।


फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता

1999 में नचिकेता वायुसेना के नौवें स्क्वाड्रन जो कारगिल के बटालिक सेक्टर में है, पर तैनात थे। नचिकेता को 17 हजार फीट की ऊंचाई से 80 एमएम रॉकेट दागने की जिम्मेदारी दी गई थी। 27 मई के दिन भारतीय वायुसेना दुश्मन की चौकियों पर मिग-27 से लगातार हमले कर रही थी। लेकिन, एक रॉकेट के हमले में नचिकेता के विमान का इंजन बंद हो गया जिसकी वजह से उन्हें पाकिस्तानी सीमा में पैराशूट लेकर उतरना पड़ा। पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया और रावलपिंडी जेल में असंख्य यातनाएँ दी। 8 दिन की यातनाओं के बाद 3 जून, 1999 को नचिकेता को पाकिस्तान में रेड क्रास को सौंप दिया गया और वह वाघा बार्डर के रास्ते भारत लौट आए। ग्रुप कैप्टन नचिकेता को वर्ष 2000 में वायुसेना पदक से सम्मानित किया गया था।

जेनेवा संधि का उलंघन

भारतीय सैनिकों के साथ अमानवीय तरीके से पेश आने के कारण 15 जून, 1999 को भारत ने पाकिस्तान को कारगिल युद्ध के दौरान युद्ध बंदियों के साथ जेनेवा संधि का हनन संबंधी नोटिस दिया। 1949 के इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत युद्धबंदियों के साथ मानवतापूर्ण व्यवहार की शर्त रखी गई है। लेकिन पाकिस्तान न तब अपनी हरकतों से बाज आया था और न अब उससे सभ्य व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है।

इंसाफ की आस

आज जहाँ देश कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश एक बार फिर विजय दिवस मना रहा है वहीं 20 साल बाद भी इंसाफ न मिलने के कारण कारगिल युद्ध में शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों का दर्द रह-रह कर छलक उठता है। पाकिस्तान की अमानवीय यातनाओं से शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों को आज तक इंसाफ नहीं मिला है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है।

न्याय की आस लगाए पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया का कहना है कि जब तक विदेश मंत्रालय पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला सख्ती से नहीं उठाता, तब तक कुछ नहीं होने वाला। जिस तरह से भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव और विंग कमांडर अभिनंदन का मामला उठाया और उसके नतीजे भी सामने आए। लिहाजा, विदेश मंत्रालय को सौरभ कालिया का मामला भी पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीधा उठाना चाहिए।

डॉ. कालिया का कहना है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में यह मुद्दा सीधे पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठना चाहिए था। बाद में कॉन्ग्रेस के शासन काल में भी उन्हें न्याय नहीं मिला, लेकिन अब उन्हें मोदी सरकार से उम्मीदें हैं। पिता चाहते हैं कि उनके बेटे के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। भारत सरकार इस मामले में पाकिस्तान से माफी माँगने को भी कहे, क्योंकि इसमें युद्धबंदियों से संबंधित जेनेवा समझौते का उल्लंघन हुआ है।

धूर्त पाकिस्तान

“पाकिस्तान शायद यह भूल गया है कि 1971 में करीब 92 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण को विवश हुआ था, लेकिन भारत ने बतौर युद्धबंदी उनकी सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रखा था।” यह मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मुझे उनके साथ बतौर गार्ड तैनात किया गया था। उनके लिए जबलपुर में ऑफिसर मेस का एक बड़ा हिस्सा खाली कराया गया था। उस ऐतिहासिक विजय के बाद भी भारतीय सेना की विनम्रता और संस्कारपूर्ण व्यवहार को याद करते हुए भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल करतार सिंह ये बातें बड़े गर्व से कहते हैं। करतार सिंह सेना में उसी साल सैनिक के रूप में भर्ती होकर शकरगढ़ सेक्टर में युद्ध के मोर्चे पर तैनात थे।

इसका जिक्र यहाँ इसलिए क्योंकि 31 जुलाई 2013 को यू-ट्यूब पर एक वीडियो जारी हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी सैनिक गुल-ए-खांदन ने कैप्टन कालिया को मारने की बात कबूल की है। कांगड़ा के कोहाला गाँव में रहने वाले 59 वर्षीय करतार सिंह कहते हैं, “खुद पाकिस्तानी युद्धबंदी कह कर गए थे कि जितना सम्मान उन्हें भारत में बंदी होते हुए मिला, उतना तो सैनिक होते हुए पाकिस्तान में भी नहीं मिला। हम भले ही मांस खाते हों या नहीं, पाकिस्तानियों को ताजा मांस खिलाया गया था, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखा गया, लेकिन सच यह भी है कि वे नहीं सुधरेंगे।”

कर्नल करतार के मुताबिक सीमा पर हमेशा जंग नहीं होती, दुश्मन से बातचीत भी होती है। लेकिन पाकिस्तानी इतने दगाबाज और धूर्त हैं कि कई बार बातचीत के लिए भारतीय सैनिक को बुलाया और गोली चला दी। पाकिस्तानी फौजी ने सौरभ कालिया के बारे में जो कहा है वह पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करता है। पाकिस्तान तो अक्सर अपने सैनिकों के शव भी लेने से यह कहकर इंकार कर देता है कि ये तो मुजाहिद्दीन हैं।

कर्नल करतार भारतीय सैनिकों के मानवतावादी दृष्टिकोण के बारे में बात करते हुए बताते हैं कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करने के बाद एक भारतीय सैनिक को दुश्मन के अस्त्र-शस्त्रों के बीच कुछ हिलता दिखाई दिया। कुछ ही देर में अंदर से एक पाकिस्तानी कैप्टन हाथ जोड़े हुए दिखाई पड़ा। उसका कहना था कि उसकी शादी को चार दिन ही हुए हैं। भारतीय सैनिक ने उसका हथियार रख लिया और उसे जाने दिया। इसके विपरीत कैप्टन सौरभ कालिया की टुकड़ी के साथ वे लोग इतनी बर्बरता और वीभत्सता से पेश आए। यही चरित्र है पाकिस्तान का।

पाकिस्तान की हरकतें कितनी घिनौने हो सकती हैं इसका देर-सवेर खुलासा हो ही जाता है। चाहे वह कारगिल हो या फिर कश्मीर में भारतीय सैनिकों के सिर काटने की घटना। सौरभ कालिया और अन्य भारतीय सैनिकों पर किए गए बर्बर अत्याचार को पाकिस्तान के सैनिकों ने कई बार स्वीकार किया है। हालाँकि, धूर्त पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से कभी यह स्वीकार नहीं किया कि कारगिल युद्ध में उसके सैनिक शामिल थे। लेकिन सच तो जगजाहिर है।

तबरेज से फोन पर तलाक-तलाक-तलाक सुनने के बाद इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है नाजनीन

मोदी सरकार ने अपने वादे के मुताबिक गुरुवार (जुलाई 25, 2019) को लोकसभा में तीन तलाक कानून पास करवाया। लेकिन इसी बीच खबर आई कि मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में एक मुस्लिम महिला अपने पति तबरेज द्वारा तीन तलाक दिए जाने के बाद इंसाफ़ की गुहार लगाती दर-दर भटक रही है।

आजतक में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक साल 2019 की शुरुआत में ही होशंगाबाद निवासी नाजनीन की शादी इटारसी निवासी तबरेज से हुई थी, लेकिन निकाह के कुछ दिन बाद ही दोनों में कहा-सुनी शुरू हुई और 24 जून को तबरेज ने नाजनीन को फोन पर तलाक दे दिया। इसके बाद तबरेज ने अपने वकील के जरिए नाजनीन को डाक से एक नोटिस भिजवाया, जिसमें तीन तलाक का जिक्र था।

खबर के मुताबिक नाजनीन का कहना है कि उन्हें दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, जिसकी शिकायत उन्होंने पुलिस से भी की थी। पुलिस ने उस दौरान पीड़िता की शिकायत पर दहेज प्रताड़ना का केस भी दर्ज किया था। लेकिन अब नाजनीन ने तीन तलाक को लेकर अपनी शिकायत लिखवाई है।

बताया जा रहा है कि अभी तक इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पीड़िता इंसाफ़ के लिए दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि उनकी शिकायत पर पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई है। उनके मुताबिक उनके मामले को दहेज प्रताड़ना में दर्ज किया गया है जबकि अब कार्रवाई तीन तलाक पर होनी चाहिए।

इस मामले में होशंगाबाद के एडिशनल एसपी घनश्याम मालवीय का खुद भी कहना है कि नाजनीन की शिकायत पर दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज किया गया है, जिसकी जाँच चल रही है। लेकिन तीन तलाक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

कारगिल के 20 साल: देश का ऐसा शूरवीर, जिसे मारने के लिए पाकिस्तान ने चलाया ‘ऑपरेशन शेरशाह’

कारगिल का युद्ध शांति की पीठ पर धोखे से भोंके गए एक खंजर की कहानी है। इस युद्ध का अंत पाकिस्तान की हार और भारत की विजय के साथ हुआ। लेकिन, इस विजय की क़ीमत बहुत बड़ी थी। हमारे देश के कई जाँबाज़ जवानों को इस युद्ध में वीरगति मिली। इस लेख में हम आपको उस वीर सपूत के बारे में बताएँगे जिन्होंने ‘ये दिल माँगे मोर’ नारे को हिन्दुस्तानी फ़ौज का मंत्र बना दिया था। हम बात कर रहे हैं… 13 जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स के बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा की।

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के एक छोटे-से शहर पालमपुर में हुआ था। दो बहनों के बाद, जुड़वा बेटे यानी विक्रम बत्रा और विशाल बत्रा का जन्म पिता गिरधारी लाल बत्रा (जीएल बत्रा) और माँ कमल कांता बत्रा के लिए ढेरों ख़ुशियाँ लेकर आया था। रामायण का पाठ करने वाली माँ ने अपने दोनों बेटों को लव-कुश का नाम दिया और अपने घर का नाम रखा लव-कुश विला। विक्रम बत्रा का बचपन आम बच्चों जैसा ही था। लेकिन एक कहावत है- पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं…और पिता जीएल बत्रा को यह भान हो चुका था कि लव यानी विक्रम बत्रा में कुछ तो अलग है।

पालमपुर के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए विक्रम चंडीगढ़ चले गए। उनका सिलेक्शन मर्चेंट नेवी और इंडियन आर्मी दोनों में हुआ। एक तरफ आराम की ज़िदगी थी तो दूसरी तरफ, देश के लिए कुछ करने का जज़्बा। विक्रम बत्रा की माँ कमल कांता को आज भी वह दिन याद है जब उनके बेटे ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा, “माँ पैसा ही सब कुछ नहीं होता, मुझे देश के लिए कुछ करना है” इस बात पर विक्रम बत्रा के माता-पिता को आज भी बड़ा फक्र है।

पाकिस्तान की नीयत में ही खोट

विक्रम बत्रा बतौर लेफ्टिनेंट 13 जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स का हिस्सा बन गए और उनकी पोस्टिंग द्रास सेक्टर के कारगिल में हुई। भारत हमेशा से ही शांति का दूत रहा है, 1999 में भी भारत शांति ही चाहता था। शांति का संदेश लेकर ही तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर की बस यात्रा की थी। लेकिन पाकिस्तान की नीयत जैसी आज है वैसी ही तब भी थी। धोखा देने की नीयत। उसने चुपचाप जम्मू-कश्मीर के कारगिल में द्रास सेक्टर की पहाड़ियों में अपना क़ब्ज़ा जमा लिया। वहाँ अपने बंकर्स बना लिए। उसका इरादा भारत पर एक बड़ा हमला करने की थी। लेकिन, धोखे के इस दॉंव को हमारे जवानों ने विफल कर दिया।

‘शेरशाह’ यानी ‘शेरशाह ऑफ़ कारगिल’

विक्रम बत्रा और उनके साथियों को श्रीनगर लेह हाईवे के करीब प्वाइंट 5410 को हर हाल में दुश्मन से वापस छीनना था। इस लड़ाई में विक्रम बत्रा ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और बताया कि जज़्बा किसे कहते हैं, हिम्मत किसे कहते हैं। 20 जून 1999 की सुबह 3:30 बजे विक्रम बत्रा और उनके साथियों ने इस महत्वपूर्ण चोटी पर फिर से तिरंगा लहरा दिया। इस जीत के बाद विक्रम बत्रा ने कहा था, “यह दिल माँगे मोर।” और उसी वक़्त से यह नारा बन गया हिंदुस्तानी फ़ौज का मंत्र। विक्रम बत्रा के जज़्बे को देखते हुए यूनिट ने उनको नया नाम दिया ‘शेरशाह’ यानी ‘शेरशाह ऑफ़ कारगिल’

पाकिस्तानी फ़ौज में विक्रम बत्रा का काफ़ी ख़ौफ़ था। इस हद तक था कि उन्हें मारने के लिए उन्होंने जो योजना बनाई उसका नाम ‘ऑपरेशन शेरशाह’ रखा।

युद्ध में विक्रम बत्रा का काम अभी पूरा नहीं हुआ था। अभी और ऐसे कई इलाके थे जिन पर दुश्मन का क़ब्ज़ा था। उनका अगला टारगेट प्वाइंट 4875 से पाकिस्तानियों को मार भगाना था। इस ऑपरेशन पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी माँ से बात की थी। इसके अलावा, उन्होंने अपने जुड़वा भाई विशाल बत्रा को भी एक चिट्ठी लिखी थी।

धोखे से वार   

कैप्टन बत्रा अपने साथियों के साथ प्वाइंट 4875 को दुश्मन के क़ब्ज़े से छुड़ाने निकल गए। दरअसल, यह एक ऐसी जगह थी जहाँ से श्रीनगर लेह राजमार्ग पर दुश्मन अपना दबदबा बनाए रख सकता था। इसे खाली कराना बहुत जरूरी था। लेकिन, वहाँ पहुँचना बेहद जोख़िम भरा था। 17,000 फीट की ऊँची पहाड़ी और सीधी चढ़ाई कोई आसान काम नहीं था। लेकिन आसान काम विक्रम बत्रा को पसंद भी कहाँ था। गोलियाँ चल रही थीं, गोले बरस रहे थे। लेकिन, विक्रम बत्रा और उनके साथियों के पाँव एक क्षण के लिए भी नहीं डगमगाए, क्योंकि रुकना तो उन्होंने सीखा ही नहीं था। यह लड़ाई क़रीब 36 घंटे तक चली। 7 जुलाई 1999 को लड़ी गई इस लड़ाई में अपने जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते हुए विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हो गए।

माँ ने आज भी वैसा ही रखा है लव का कमरा

माँ ने विक्रम बत्रा के कमरे को आज भी वैसा ही रखा हुआ है जैसा उनके बलिदान से पहले था। विक्रम के जुड़वा भाई विशाल आज भी उनकी तस्वीर को सैल्यूट किए बिना घर से नहीं निकलते। उन्हें उस वक़्त बेहद गर्व महसूस होता है जब कोई कहता कि तुम विक्रम की तरह दिखते हो। विशाल आज जिस मुक़ाम पर हैं उसका पूरा श्रेय वो विक्रम बत्रा को ही देते हैं। लोग उन्हें विशाल बत्रा के तौर पर नहीं, बल्कि विक्रम बत्रा के भाई के तौर पर जानते हैं।

उनका कहना है कि भाई की याद तो हर पल आती है। वो हमारे रोम-रोम में बसा हुआ है। विक्रम के पिता का कहना है कि एक बेटे के तौर पर उसने हमारा जीवन धन्य कर दिया है। एक पिता को अपने बेटे से और क्या चाहिए।

कैप्टन बत्रा की बहन सीमा बत्रा सेठी की तो आज भी अपने भाई के बारे में बातें करते हुए आँखें डबडबा जाती है। भावुक होकर उन्होंने बताया वो हमारा रोल मॉडल है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि दुनिया में हर बहन को ऐसा ही भाई मिले…।

विक्रम बत्रा की माँ का कहना है कि देश के युवाओं को आर्मी ज्वॉइन करनी चाहिए और जब भी देश के लिए बलिदान होने का मौक़ा मिले तो उसे गँवाना नहीं चाहिए। 26 जनवरी 2000 को विक्रम बत्रा को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।


कानपुर छेडख़ानी की शिकायत करने गई युवती के साथ अभद्रता करने वाला पुलिसकर्मी निलंबित

कानुपर में एक मामला सामने आया है जिसमें एक पुलिसकर्मी महिला से बदसलूकी करते हुए पाया गया। बुधवार (जुलाई 24, 2019) को छेडख़ानी की शिकायत लेकर अपनी माँ के साथ गई युवती ही थाना में अभद्रता का शिकार हो गई। थाना में युवती तथा उसकी माँ से अभद्रता करने का वीडियो वायरल होने पर आरोपित दीवान तारबाबू को निलंबित कर दिया गया है।

दरअसल, कानपुर में छेड़छाड़ से परेशान होकर एक युवती थाने पहुँची थी। लेकिन थाने में उसके साथ अभद्रता की गई। बदसलूकी करने वाला कोई और नहीं थाने में ही मौजूद एक पुलिसकर्मी निकला। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसके बाद आरोपित पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की गई है।

वीडियो में पुलिसकर्मी युवती से कहते हुए सुना जा रहा है, “हाथ में पाँच-पाँच अँगूठियाँ और कड़ा पहनती हो, इसी से पता चलता है कि तुम क्या हो।” पुलिसकर्मी की पहचान थाने में तैनात दीवान के तौर पर हुई है, जिसका नाम तारबाबू है।

इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद तारबाबू को लाइन हाजिर कर दिया गया है।

सद्गुरु कनकधारा स्तोत्रम की बात कर रहे थे, ‘लिबरल्स’ ढूँढ रहे थे यौन सुख

20 दिनों में 5 गोल्ड जीत कर देश का नाम रोशन करने वाली हिमा दास परिचय की मोहताज नहीं। स्वर्णिम प्रदर्शन से लाखों भारतीयों को उन्होंने अपना मुरीद बना लिया है। इनमें सद्गुरु वासुदेव जग्गी भी हैं। सद्गुरु ने उन्हें गोल्डन शॉवर बताया है।

इस शब्द से सद्गुरु का अभिप्राय स्वर्ण वर्षा से था। लेकिन, लिबरलों ने इसे पोर्नोग्राफी से जोड़ दिया। असल में अर्बन डिक्शनरी में ‘गोल्डन शॉवर’ स्लैंग की तरह इस्तेमाल होता है। इसका अर्थ होता है ‘सेक्शुअल डिजायर के लिए किसी के ऊपर पेशाब करना।’

सद्गुरु ने ट्वीट किया, “हिमा दास, भारत के लिए गोल्डन शॉवर (सोने की बारिश) की तरह हैं। बधाई और आशीर्वाद।” सद्गुरु ने यह ट्वीट 18 जुलाई को किया था। मगर 23-24 जुलाई से अचानक उनके इस ट्वीट की आलोचना होने लगी।

उनका मजाक उड़ाने वाले कथित बुद्धिजीवियों में एक नाम ट्विंकल खन्ना का भी है। उन्होंने ‘गोल्डन शॉवर’ पर सद्गुरू का मज़ाक उड़ाते हुए उसी तरह के शब्दों के इस्तेमाल किया जिस तरह के शब्द पुलवामा के आतंकियों ने इस्तेमाल किए थे। हालाँकि लोगों की नाराजगी के बाद ट्विंकल ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

सद्गुरु ने ‘गोल्डन शॉवर’ का इस्तेमाल कनकधारा स्तोत्रम के लिहाज से किया था। कनकधारा स्तोत्रम आदि शंकराचार्य रचित है। कहा जाता है कि जब आदि शंकराचार्य ने इसकी रचना की थी तो तो देवी लक्ष्मी ने स्वर्ण पुष्पों की बौछार की थी।

आध्यात्मिक गुरु होने के नाते संभव है कि सद्गुरु को यह ज्ञात नहीं होगा कि ‘गोल्डन शॉवर’ एक स्लैंग है। ज्यादातर लोग इससे अनजान ही होंगे।

इसके अलावा, ‘गोल्डन शॉवर’ एक सुंदर फूल ‘कैसिया फिस्टुला’ को भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल सजावट और हर्बल चिकित्सा में किया जाता है। यह थाइलैंड का राष्ट्रीय फूल भी है। साथ ही केरल का राजकीय पुष्प भी है।

जाहिर है कि ट्विंकल खन्ना को देवी लक्ष्मी के आशीर्वाद या इस सुंदर फूल की विशेषताओं के बारे में कुछ नहीं पता था। लेकिन इस अनभिज्ञता ने उनकी कुत्सित मानसिकता को उजागर कर दिया है!

लोकसभा में तीन तलाक पर बिल पास, ओवैसी ने कहा- औरतों पर जुल्म है यह कानून

लोकसभा में बृहस्पतिवार को दिनभर चली चर्चा के बाद बहुप्रतिक्षित मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक यानी तीन तलाक पर रोक सम्बन्धी बिल पास हो गया। मत विभाजन के दौरान पक्ष में 303 और विपक्ष में 82 वोट पड़े। बिल में संशोधन के लिए विपक्षी दलों के तरफ से लाए गए प्रस्ताव भी ख़ारिज हो गए ।

असदुद्दीन ओवैसी की ओर से लाए गए संशोधन को सदन ने ध्वनिमत से खारिज कर दिया। एनके प्रेमचंद्रन का संशोधन प्रस्ताव भी खारिज हो गया।

लोकसभा में बिल को विचार के लिए पेश करने के प्रस्ताव पर विपक्षी सांसदों ने वोटिंग की माँग की थी। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ने इसकी अनुमति दी। पक्ष में 303 वोट मिलने के बाद तीन तलाक बिल पास होने की घोषणा स्पीकर ने कर दी।

लोकसभा में दूसरी बार पास हुआ है यह बिल

कॉन्ग्रेस, डीएमके, एनसीपी समेत कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया जबकि टीएमसी और सरकार की सहयोगी जेडीयू ने सदन से वॉक आउट कर दिया। इससे पहले फरवरी में भी लोकसभा में बिल को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन राज्यसभा ने इसे मंजूरी नहीं दी थी। सत्ता मैं लौटने के बाद सरकार ने विधेयक को दोबारा लोकसभा में पेश किया था। हालाँकि, राज्यसभा में तीन तलाक बिल पास कराना अब भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

ओवैसी ने कहा- यह कानून औरतों पर जुल्म जैसा

AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “तीन तलाक कानून महिलाओं के खिलाफ है। क्या शौहर जेल में रहकर भत्ता देगा? सरकार इस तरह औरतों को सड़क पर लाने का काम कर रही है। इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट की तरह होती है। यह जन्म-जन्म का साथ नहीं है। मैं सुझाव देता हूँ कि कानून न बनाकर मेहर की 500% रकम लौटाने का प्रावधान कर दिया जाए। हमको इस्लामिक देशों से मत मिलाइए वरना कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा।”

विधेयक में ये हुए थे बदलाव

  1. अध्यादेश के आधार पर तैयार नए बिल के मुताबिक, आरोपित को पुलिस जमानत नहीं दे सकेगी। मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा।
  2. बिल के मुताबिक, मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा माँ के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपित को उसका भी गुजारा देना होगा। तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य एफआईआर दर्ज कराएँ।

फरार गैंगस्टर अब्दुल नासिर बना केन्द्रीय राज्यमंत्री अठावले की पार्टी के यूथ विंग का अध्यक्ष

दिल्ली के गैंगस्टर अब्दुल नासिर ने केन्द्रीय राज्यमंत्री रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) ज्वाइन किया है। उसे पार्टी के यूथ विंग का प्रमुख बनाया गया है।

उसने 18 जुलाई को अठावले की मौजूदगी में पार्टी की सदस्‍यता ली। गैंगवार के मामले में तिहाड़ जेल में बंद रहा नासिर इसी साल अप्रैल में पेरोल पर तिहाड़ जेल से निकला था। बाहर निकलने के बाद वह फरार हो गया और अब दिल्ली पुलिस उसकी तलाश कर रही है।

33 साल के नासिर पर मकोका के तहत मामला दर्ज है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री
अठावले ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं थी। अब हम जॉंच कर रहे हैं।”

दिल्ली पुलिस के मुताबिक नासिर का छेनू पहलवान के साथ गैंगवार चल रहा था। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 2015 में हुए इस गैंगवार में 17 लोगों की हत्या हुई थी। इस गैंगवार में कड़कड़डूमा कोर्ट में दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की भी हत्या कर दी गई थी।