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41 साल पहले इस्माइल ने की थी ₹20 की चोरी: कोर्ट में चला केस, अंत में आपस में ही निपटाया मामला

हमारे देश का न्यायिक तंत्र किस धीमी गति से काम करता है, इसकी बानगी हाल ही में मध्य प्रदेश में देखने को मिली। ₹20 के जेबकतरी के मामले का निपटारा 41 साल में भी नहीं हो सका, और अंत में फरियादी को ही यह याचना करनी पड़ी कि वह अब इस मुकदमे का अंत चाहता है। अंततः लोक अदालत में यह मामला समाप्त हो गया।

15 साल बाद 4 महीने जेल में भी बिताए

आरोपित इस्माइल के ख़िलाफ़ बाबूलाल ने बस टिकट की लाइन में अपनी जेब से ₹20 चुराने का आरोप लगाते हुए माधोगंज (मध्य प्रदेश) के पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। जांच और न्यायालय में चालान पेश होने के बावजूद मामला न्यायालय में लंबित ही रहा। इस्माइल ने न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा नियत तारीख पर अदालत आना भी बंद कर दिया। आखिरकार 2004 में अदालत ने इस्माइल की गिरफ़्तारी का वारंट जारी किया और 15 साल ढूँढ़ने के बाद पुलिस ने उसे जेल भेज दिया। इस्माइल ने 4 महीने जेल में बिताए।

‘साहब, मैं आरोपी को नहीं जानता। अब मामला खत्म कीजिए’

गत शनिवार (13 जुलाई, 2019) को मामला लोक अदालत के सुपुर्द कर दिया गया। प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट अनिल कुमार नामदेव की अदालत ने 64-वर्षीय बाबूलाल से कहा कि 41 साल पुराने मामले को, जहाँ आरोपित चार महीने जेल काट भी चुका है, और खींचने का मतलब नहीं है। बाबूलाल ने भी सहमति जताते कि वे आरोपित को नहीं जानते। इसके बाद मामले को खत्म कर दिया गया। नवभारत टाइम्स से बात करते हुए मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ के सरकारी वकील ऋषिकेश मिश्रा ने भी कहा कि लोक अदालतों में ऐसे ही आपसी सहमति से निराकरण होता है।

‘हामिद अंसारी के क़रीबी ने वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन के ख़िलाफ़ साज़िश रच उनका करियर तबाह किया’

पूर्व रॉ अधिकारी ने भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकार चिरंजीवी भट ने पूर्व रॉ अधिकारी एनके सूद से बातचीत की, जिसमें उन्होंने हामिद अंसारी के क़रीबी द्वारा वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को बदनाम करने और उनका करियर तबाह करने की बात का खुलासा किया। (आप पूरे इंटरव्यू को हूबहू यहाँ पढ़ सकते हैं) पूर्व रॉ अधिकारी ने पत्रकार चिरंजीवी भट से बात करते हुए कहा:

“रतन सहगल नामक व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी रहा है। आपने नाम्बी नारायणन का नाम ज़रूर सुना होगा। उन पर जासूसी का आरोप लगा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे सारे आरोपों को निराधार पाया था। वे निर्दोष बरी हुए। लेकिन, किसी को नहीं पता है कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश किसने रची? ये सब रतन सहगल ने किया। उसने ही नाम्बी नारायणन को फँसाने के लिए जासूसी के आरोपों का जाल बिछाया। ऐसा उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने के लिए किया। रतन जब आईबी में था तब उसे अमेरिकन एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हुए धरा जा चुका था। अब वह सुखपूर्वक अमेरिका में जीवन गुजार रहा है। वह पूर्व-राष्ट्रपति अंसारी का क़रीबी है और हमें डराया करता था। वह हमें निर्देश दिया करता था।”

क्या हुआ था वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन के साथ?

आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी यदि मैं आपको बताऊँ कि दशकों पहले, हमारे पास एक ऐसा असाधारण वैज्ञानिक था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा था? साथ ही यह कि उन्हें नौकरी से ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप लगाकर निकाल दिया गया और हमारी तत्कालीन ‘सेक्युलर’ सरकार द्वारा उनका जीवन बर्बाद कर दिया गया? क्या आप उन लोगों को कभी माफ़ कर पाएंगे?

मिलिए इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण से, जिन्हें 25 जनवरी 2019 को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

विद्वान और देशभक्त वैज्ञानिक नम्बी नारायणन

पीएसएलवी (PSLV) को याद करिए, जिसने वर्ष 2014 में मंगलयान को संचालित किया था और मंगल ग्रह पर भारतीय ध्वज लहराया था। पीएसएलवी, जिसने वर्ष 2008 में चंद्रयान को संचालित किया और इस बात की पुष्टि की कि चंद्रमा पर निश्चित रूप से पानी की बर्फ है।

जनवरी 5, 2014 को भारत ने अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाकर नया इतिहास रचा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के बूते रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने का परीक्षण 100% ख़रा उतरा था। इस लम्बी छलांग के पीछे असल में कौन था? लेकिन उस दौरान पूरी खबरों में कहीं भी उस वैज्ञानिक का उल्लेख तक नहीं था। उस वैज्ञानिक का नाम है प्रोफैसर नम्बी नारायणन।

सबसे पहले 1970 में ‘तरल ईंधन रॉकेट’ तकनीक लाने वाले वैज्ञानिक रहे नम्बी नारायणन 1994 में इसरो में क्रायोजेनिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी थे। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया। हमारे देश की विडम्बना है कि जो लोग देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला रखते हैं, उनको किसी न ​किसी तरह से हतोत्साहित कर रोक दिया जाता है।

नम्बी नारायणन और उनके साथी डी. शशिकुमार को वर्ष 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट प्रौद्योगिकी शत्रु देशों को बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब मीडिया ने इन ख़बरों को बहुत उछाला था। मीडिया ने बिना जाँचे-परखे पुलिस की इस ‘थ्योरी’ पर विश्वास करके उन्हें राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत किया था। पुलिस ने इसे सैक्स जासूसी स्कैंडल की तरह पेश किया था। सीआईए ने मालदीव की 2 ऐसी महिलाओं को तैयार किया जिनके पास ऐसे रहस्य थे, जिनकी जानकारी न पुलिस को थी, न मीडिया को।

PSLV ने हमें हमेशा गौरवान्वित किया है। पीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी “विकास इंजन” पर चलता है और नम्बी नारायणन ने इसे बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1990 के दशक में, नम्बी नारायणन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक थे, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे। इससे पहले, भारत ने रूस से इस तकनीक को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकियों ने पूरी लड़ाई लड़ी और इसे रोक दिया। स्वाभाविक है कि जिन लोगों के पास यह तकनीक होगी, वे अन्य देशों से ईर्ष्या के कारण इस तकनीक की रक्षा करेंगे।

अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी नारायणन ने ही सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएँगे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।

हैरानी की बात तो यह है कि केन्द्र में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही थी, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ साजिश पर ख़ामोशी अख्तियार कर ली थी। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट वर्णित थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भारत में ऊपर से नीचे तक के नेताओं और अफ़सरों को मोटी रकम पहुँचाती थी।

फिर, यह सब हुआ।

वर्ष 1994 में, नम्बी नारायणन पर अचानक जासूसी और विदेशी एजेंटों को रॉकेट सम्बंधित संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया गया था। उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके साथ ही उनका करियर ख़त्म हो गया।

नाम्बी नारायणन के ख़िलाफ़ लगे आरोप झूठे साबित हुए

एक दिन सुबह अचानक ख़बर आनी शुरू हुई कि मालदीव की दो सुंदरियों मरियम रशीदा और फव्जिया हसन ने भारत के दो वैज्ञानिकों को हनी ट्रैप में फँसा लिया है। ज़िस्म और कुछ लाख डॉलर के बदले में इन वैज्ञानिकों ने भारत के क्रायोजेनिक इंजन का प्रोग्राम बेच डाला था! 

मलयालम मीडिया से शुरू हुई इस ख़बर को राष्ट्रीय मीडिया में भी जगह मिली। फिर बी ग्रेड की फिल्मों जैसा कथानक लिखने वालों की ख़ोज हुई और मालदीव की औरतों, वैज्ञानिकों और मुख्यमंत्री के क़रीबी कहे जाने वाले बड़े पुलिस अधिकारियों की मसालेदार कहानियाँ गढ़ी गयीं। थोड़े ही दिन में लोगों को भी लगने लगा कि इसरो के इस जासूसी काण्ड में मुख्यमंत्री की भी मिली भगत है। आईजी रमन श्रीवास्तव और करुणाकरण पर शिकंजा कसने लगा।

लगातार अख़बारों में आती ख़बरों के मद्देनजर हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और ओमन चंडी ने इसी वक़्त इस्तीफ़ा दे दिया। आख़िरकार करुणाकरण को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा और एंटनी मुख्यमंत्री बने। उन्हें पता था कि मामला तो कुछ है ही नहीं इसलिए केस सीबीआई को सौंप दिया गया।

नारायणन और शशि कुमार की घनघोर भर्त्सना हुई। ऑटो रिक्शा वाले तक नारायणन की पत्नी को पहचानकर बिठाने से इनकार करने लगे। यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी जासूस-गद्दार का बच्चा बताया गया। सीबीआई ने जाँच शुरू की तो पहले ही हफ़्ते में पता चल गया कि शुरूआती सबूत ही फ़र्ज़ी हैं और इसमें कोई मुक़दमा नहीं बनता। फिर भी, मीडिया में वैज्ञानिकों के घर से काफ़ी नगद मिलने की ख़बरें उड़ाई गयी जो कि सीबीआई को कभी मिली ही नहीं थी।

सीबीआई ने अदालत में कहा कि ये केरल पुलिस की काफ़ी सोची समझी साज़िश थी। केरल पुलिस के सीबी मैथ्यूज, विजयन और के के जोशुआ के अलावा आईबी के आर बी श्रीकुमार पर मुक़दमा चलाने की सिफ़ारिश सीबीआई ने कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को रिहा किया और केरल सरकार को पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई करने कहा। 

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सुनवाई पूरी न होने तक रिटायर न हों जज

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या-राम जन्मभूमि मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को आगामी 19 जुलाई तक जवाब देने के लिए कहा है कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश के रिटायर होने पर क्या-क्या नियम और क़ानून हैं। कोर्ट ने यूपी सरकार को पूछा है कि CBI जज एसके यादव जब तक फ़ैसला नहीं दे देते, तब तक उन्हें रिटायर न करने के लिए क्या प्रावधान है?

दरअसल, इस मामले की सुनवाई कर रहे CBI जज एसके यादव ने मई में सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर सूचित किया था कि वो 30 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं। उन्होंने इस केस की सुनवाई पूरी करने के लिए छ: महीने का और समय माँगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह आवश्यक है कि CBI जज एसके यादव इस मामले की सुनवाई पूरी कर फ़ैसला सुनाएँ। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि हम अनुच्छेद-142 के तहत आदेश जारी करेंगे कि उन्हें 30 सितंबर तक रिटायर न किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल 2017 को मामले की रोजाना सुनवाई कर उसे दो साल के अंदर पूरा करने का आदेश दिया था। इस मामले में वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी आरोपित हैं। इसके अलावा, रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता पैनल के चेयरमैन जस्टिस इब्राहिम कलीफुल्ला से गुरुवार (18 जुलाई) तक स्टेटस रिपोर्ट माँगी है।

बता दें कि कोर्ट ने बातचीत के ज़रिए हल निकलने के लिए रिटायर्ड जज एफएमआई कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल गठित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट अब 25 जुलाई से इस मामले पर रोज़ाना सुनवाई पर विचार कर रहा है।

IANS ने BJP विधायक की बेटी और पति के अपहरण की गलत रिपोर्ट प्रकाशित की

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस (IANS) ने आज सुबह एक कपल के अपहरण की एक घटना को गलत तरीके से पेश किया। शुरुआत में उन्होंने रिपोर्ट किया था कि भाजपा विधायक राजेश मिश्रा की बेटी साक्षी मिश्रा और उनके पति का इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बाहर बंदूक की नोक पर एक काली एसयूवी में अपहरण कर लिया गया। बाद में पता चला कि जिस कपल का अपहरण किया गया था, वो साक्षी और अजिताभ नहीं, बल्कि एक दूसरा कपल था। हालाँकि, पुलिस ने किडनैपर को पकड़ लिया और उस दंपती को उसकी चंगुल से छुड़ा लिया।

नेशनल हेराल्ड द्वारा प्रकाशित की गई गलत खबर का स्क्रीनशॉट

साक्षी और उनके पति अजितेश दोनों को अदालत की सुनवाई में भाग लेने के लिए ले जाया गया था। उनके वकील ने दावा किया था कि कोर्ट परिसर के बाहर अजितेश के साथ मारपीट की गई। वकील का कहना है कि इनको किडनैप नहीं किया गया था।

जो कन्फ्यूजन IANS न्यूज़ एजेंसी को हुई, वही कन्फ्यूजन कुछ अन्य न्यूज़ पोर्टलों को भी हुआ। जिसमें इंडिया टुडे, द ट्रिब्यून और कॉन्ग्रेस मुखपत्र नेशनल हेराल्ड आदि शामिल हैं। इन्होंने भी IANS की तरह ही यही गलत खबर चला दी। हालाँकि, IANS ने बाद में अपनी खबर को सही कर लिया। जिसके बाद ये साफ हो गया कि दोनों घटनाएँ अलग-अलग थीं।

गौरतलब है कि IANS ने पिछले साल पीएम मोदी का ज़िक्र करते हुए एक अपशब्द का इस्तेमाल किया था। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित एक नई योजना के बारे में बताते हुए IANS के पत्रकार ने नरेंद्र मोदी के मिडिल नेम में ‘Bakhch**d’ शब्द का इस्तेमाल किया था। हालाँकि उस पत्रकार को बाद में निलंबित कर दिया गया था।

इससे पहले, ऑपइंडिया ने बताया था कि कैसे उत्तर प्रदेश में पीएमएमवीवाई पर खर्च किए गए पैसे पर
IANS द्वारा दायर एक आरटीआई का कथित जवाब आधिकारिक सरकारी आँकड़ों से काफी अलग था।

IANS ने 12 मई 2019 को चुनाव आयोग के आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए व्यापक स्तर पर एक एग्जिट पोल प्रकाशित किया था। IANS ने ये एग्जिट पोल चुनाव के अंतिम चरण शुरू होने से पहले ही प्रकाशित कर दिया गया था। जबकि चुनाव आयोग द्वारा 1998 से रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 के तहत मतदान शुरू होने के समय से लेकर मतदान के सभी चरणों के समाप्त होने के आधे घंटे बाद तक एक्जिट पोल प्रकाशित करने पर प्रतिबंध है।

केरल में छात्र को चाकू मारने का मुख्य आरोपित SFI नेता नसीम गिरफ्तार

केरल के तिरुवनंतपुरम में प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी कॉलेज के परिसर के अंदर एक छात्र के ऊपर चाकू से हमला करने वाले मुख्य आरोपित नसीम को सोमवार (जुलाई 15, 2019) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। नसीम वामपंथी छात्र संगठन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) का नेता है। नसीम के साथ ही इस घटना के एक और आरोपित आर शिवरंजीत को भी गिरफ्तार किया गया।

पुलिस ने कहा कि दोनों आरोपित को मध्य रात्रि में केशवदासपुरम से हिरासत में ले लिया गया, जब ये दोनों छिपने के लिए नए ठिकाने की तलाश में थे। एक पुलिस अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि उनकी गिरफ्तारी दर्ज की गई है और उनसे पूछताछ जारी है। इसके साथ ही मामले में गिरफ्तार एसएफआई नेताओं की कुल संख्या 6 हो गई है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को एसएफआई नेता ने अखिल नाम के छात्र के ऊपर चाकू से हमला किया। जिसके बाद उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहाँ उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है। पीड़ित अखिल तृतीय वर्ष का बीए (राजनीति) का छात्र है । अखिल के ऊपर हमला करने के बाद से ही दोनों आरोपित फरार थे।

जानकारी के मुताबिक, अखिल और उसके मित्र कॉलेज कैंटीन में गाते-बजाते थे, जो कैंटीन के बगल में ही स्थित SFI की स्थानीय इकाई के कमरे में रहने वाली एक महिला SFI सदस्या को पसंद नहीं आया। उसने SFI की स्थानीय इकाई में गाना बंद कराने की शिकायत कर दी और इसके चलते अखिल की SFI के बाकी सदस्यों से जुबानी जंग कई दिन तक चली। इसके बाद 10 जुलाई को एक छोटी-मोटी हाथापाई हुई लेकिन शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को समझौते के लिए बैठक बुलाई गई थी। लेकिन सुलह के लिए बुलाई गई इस बैठक में मामला हाथ से निकलता गया और देखते-ही-देखते अखिल के एक दोस्त पर हमला हो गया। इसके बाद बाहर से भी एक बड़ा गुट अंदर आया और अखिल के ग्रुप धावा बोल दिया। इस हाथापाई में अखिल के सीने पर चाकू से वार किया गया।

इस घटना की जानकारी फैलते ही छात्रों का एक बड़ा समूह SFI के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने लगा। प्रदर्शन करने वालों में SFI के भी सदस्य थे। उनका कहना था कि कॉलेज में SFI के 13 यूनिट सदस्यों का व्यवहार फासिस्टों जैसा ही है, हालाँकि वे SFI समर्थक हैं। छात्रों को कॉलेज में अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आने-जाने की अनुमति नहीं है और कहीं भी वे पेड़ों के आस-पास बैठें या गाना गाएँ तो उन्हें मार-पीटकर भगा दिया जाता है।

हिमाचल और गुजरात को मिले नए राज्यपाल, जानिए कौन हैं कलराज और देवव्रत

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कलराज मिश्र को हिमाचल प्रदेश का नया राज्यपाल नियुक्त किया है। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत को गुजरात का राज्यपाल बनाया गया है। आइए यहाँ हम दोनों नेताओं के राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं। राष्ट्रपति के दफ्तर के अनुसार, दोनों जब अपना कार्यभार संभालेंगे, तभी से उनका कार्यकाल शुरू हो जाएगा।

हिमाचल प्रदेश के नए राज्यपाल कलराज मिश्र

2014 में बनी मोदी सरकार में कलराज मिश्र को लघु उद्योग मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया था। 2014 में देवरिया से जीते कलराज मिश्र ने उम्र के कारण 2019 लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने सितंबर 2017 में मंत्रिपद से इस्तीफा दे दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि भाजपा में 75 की उम्र पार कर चुके नेताओं को मंत्री न बनाने का निर्णय (अनाधिकारिक रूप से) लिया है, इसी कारण उन्होंने इस्तीफा दिया। कलराज मिश्र 3 बार राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं।

कलराज मिश्र भाजपा के सबसे अनुभवी व वयोवृद्ध नेताओं में से एक रहे हैं

मिश्र 2012 में लखनऊ ईस्ट विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा चुनाव भी जीत चुके हैं। 78 वर्षीय मिश्र को उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी नेताओं में एक माना जाता है। बचपन से ही संघ से जुड़े रहे मिश्र भाजयुमो के गठन के बाद संगठन के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके मिश्र का उत्तराखंड राज्य के गठन में भी अहम योगदान रहा है। अब उन्हें उनके लम्बे अनुभव को देखते हुए हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है।

गुजरात के राज्यपाल देवव्रत

आचार्य देवव्रत की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति नई नहीं है। उन्हें अगस्त 2015 में ही हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था। अब वो गुजरात के राज्यपाल के रूप में कार्यभार संभालेंगे। वह कुरुक्षेत्र में स्थित गुरुकुल के लम्बे समय तक प्राध्यापक भी रहे हैं। उन्हें छात्रों के बीच अनुशासन और ईमानदारी को पसंद करने वाले अध्यापक के रूप में जाना जाता है। वह गुरुकुल में विभिन्न पदों को संभालते रहे हैं।

बाबा रामदेव के साथ राज्यपाल आचार्य देवव्रत

हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए 60 वर्षीय आचार्य देवव्रत ने सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए सक्रियता दिखाई और सीधे अधिकारियों के साथ बैठकें कर इस क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों का समय-समय पर जायजा लिया। उन्हें बाबा रामदेव के साथ उनके घनिष्ठ संबंधों के कारण भी जाना जाता है।

खानदानी सेलेब्स के पाँव पर लोटने वाली मीडिया को कंगना ने दिखाया आइना, इस बेचैनी का कारण क्या?

मनोरंजन इंडस्ट्री को कवर करने वाले पत्रकारों ने एक नया गिल्ड या यूँ कह लीजिए, गिरोह बनाया है। अब से कोई भी सेलिब्रिटी इनसे टेढ़ी बात करता है तो ये गिल्ड इसका विरोध करेगा और निर्णय लेगा कि पत्रकारों को आगे क्या करना है? सवाल है कि इन सब की ज़रूरत क्यों आन पड़ी? इसका जवाब है कि जिस तरह एक व्यक्ति ने देश की मुख्यधारा की मीडिया में हलचल मचा रखी है और उसके विरोध में लिखने के लिए आम लूटपाट की घटनाओं को भी भाजपा, हिंदुत्व और ब्रह्मणवाद से जोड़ा जाता है, ठीक उसी तरह एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में भी कोई है, जिसने मीडिया की हिपोक्रिसी पर नकेल कस दी है। एक ऐसी महिला ने मीडिया को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, जो बॉलीवुड की खानदानी परिपाटी से नहीं आती।

कई बात खानदानी सेलेब्रिटीज के आगे दंडवत होने वाला मीडिया आज एक महिला के आगे बेबस नज़र आ रहा है। एक सुदूर पहाड़ी राज्य के कस्बे में जन्मी कंगना रनौत ने बॉलीवुड में अपनी बुलंदी का झंडा ऐसा गाड़ा है कि आज वह अकेले अपने दम पर किसी भी फ़िल्म को हिट कराने की ताक़त रखती है। वह अपने दम पर ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ का नेट बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 150 करोड़ रुपए तक पहुँचा सकती हैं और ‘मणिकर्णिका’ को 100 करोड़ रुपए तक पहुँचा सकती हैं। यह सब मीडिया को खल रहा है क्योंकि कंगना नेपोटिज्म पर सवाल खड़े करती हैं। वह बनी-बनाई राह से जुदा चलती हैं।

ऐसा नहीं है कि कंगना की सारी फ़िल्में अच्छी होती हैं। इस पर बहस हो सकती है कि उनकी कौन-सी फ़िल्म अच्छी थी और कौन सी बुरी? किस फ़िल्म में क्या अच्छे थी और क्या बुराई, इस पर बात करने का सबको हक़ है। कंगना ने उस पत्रकार ने क्या पूछा था? उन्होंने बस पूछा था कि एक फ़िल्म की समीक्षा करते समय इसके लिए किसी अभिनेत्री को हिंसाप्रिय या जिन्गोइस्टिक कैसे ठहराया जा सकता है? उन्होंने पूछा था कि उनके साथ वैन में बैठ कर खाना खाने और मैसेज भेजने वाले पत्रकार सामने मित्र और पीछे दुश्मन होने का दिखावा क्यों करते हैं? बस इतनी सी बात पर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का मीडिया भड़क गया।

यहाँ हम इस घटनाक्रम पर चर्चा करेंगे लेकिन सबसे पहले मीडिया से सवाल है कि जब बॉलीवुड के खानदानी सेलेब्स ने पत्रकारों, कैमरामैन और समीक्षकों के साथ दुर्व्यवहार किया, तब उन्हें गिल्ड बनाने की ज़रूरत क्यों नहीं महसूस हुई? क्योंकि अगर स्तर की बात करें तो कंगना ने तो सिर्फ़ 2-4 शब्द ही बोले थे, जबकि कई सेलेब्स ने पत्रकारों की पिटाई तक भी की, तब मीडिया को उनकी सुरक्षा की चिंता क्यों नहीं सताई? क्या खानदानी हीरो और हीरोइन का विरोध करने से मीडिया का ही घाटा है? क्या मीडिया अगर इन सेलेब्स के सीरियल दुर्व्यवहारों का विरोध करने लगे तो उसका दाना-पानी बंद हो जाएगा? आइए एक नज़र ऐसी घटनाओं पर डालते हैं।

मुंबई के चेम्बूर में स्थित आरके स्टूडियो कभी पूरी इंडस्ट्री का मुख्यालय हुआ करता था। राज कपूर से इसका गहराने नाता होने के कारण अब भी मीडिया वहाँ जुटता है। इसी तरह 2016 में गणेश विसर्जन के दौरान भी यहाँ मीडिया का मेला लगा था। यहाँ वरिष्ठ अभिनेताओं ऋषि कपूर व उनके भाई रणधीर कपूर ने पत्रकारों के साथ वैसा ही व्यवहार किया, जैसा लोग गली के आवारा कुत्तों के साथ करते हैं। पत्रकारों को थप्पड़ मारा गया, उन्हें धक्का देकर बाहर निकला गया। यहाँ तक कि एक वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक को भी बॉडीगार्ड्स ने धकेल दिया। भरी बारिश में कपूर भाइयों के हाथों ज़लील होने वाले पत्रकारों के पक्ष में क्या गिरोह विशेष एक हुआ?

शायद मीडिया को इस बात का डर होगा कि कल को रणबीर की शादी होगी तो उसे फुटेज कहाँ से मिलेगा? मीडिया अगर कपूर खानदान के विरुद्ध जाता है तो वो करिश्मा कपूर के वैवाहिक जीवन से जुड़ी चटपटी ख़बरें कहाँ से आएँगी? इसी वर्ष जून में एक टीवी पत्रकार ने सलमान ख़ान के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। ख़ान पर आरोप है कि उन्होंने उस पत्रकार को गाली दी, धमकी दी और दुर्व्यवहार किया। तब मीडिया को एकता बनाए रखने की क्यों नहीं सूझी? राजीव मसंद और अन्य समीक्षकों ने इस पर क्या कुछ बोला? नहीं। इसी तरह एक कार्यक्रम के दौरान फोटोग्राफर्स और ख़ान के बॉडीगार्ड्स के बीच लड़ाई हुई। आहत कैमरा पर्सन्स ने सलमान को बैन किया।

क्या बॉलीवुड को कवर करने वाले पत्रकारों ने तब किसी गिरोह को बनाने की घोषणा की? सलमान ने पत्रकारों को साफ़-साफ़ कहा कि उन्होंने जैसा व्यवहार किया, अगर वो ख़ुद वहाँ उपस्थित रहते तो पत्रकारों के साथ न जाने क्या होता। प्रतिबन्ध का मज़ाक उड़ाते हुए सलमान ने कहा कि वो कुछ दिनों बाद घुटने के बल बैठ कर फोटोग्राफर्स से निवेदन करेंगे कि उनका करियर डूबने से बचा लें। इतना सब कुछ होने के बावजूद कोई ठोस एक्शन नहीं लिया गया। या तो वो फोटोग्राफर्स गिरोह विशेष के किसी काम के नहीं थे या फिर सलमान का विरोध उन पर भारी पड़ सकता था। उन्हें ख़ूब पता है कि ऐसा कर के सलमान के नए लुक्स में पिक्स लेने का मौका वो गँवा सकते हैं।

इसी तरह जब जया बच्चन के सामने पत्रकार ऐश्वर्या राय से बात कर रहे थे तब जया ने उन्हें कड़ी डाँट पिलाई। जया ने पत्रकारों से कहा, “क्या ऐश्वर्या-ऐश्वया बुला रहे हो, तुम्हारे क्लास में पढ़ती है क्या?” जया बच्चन को ये बात अखर रही थी कि पत्रकार उनकी बहू ऐश्वर्या राय को पहले नाम से क्यों सम्बोधित कर रहे हैं? इसी तरह जया बच्चन ने एक बार एक पत्रकार के माइक को धक्का दे दिया। लेकिन, ये सब बस एंटरटेनमेंट शो में एक छोटी सी चटपटी ख़बर बन कर रह गई। कंगना के मामले में ऐसा नहीं है। कंगना बॉलीवुड की इलीट वर्ग के विपरीत अधिकतर हिंदी में बात करती हैं और पत्रकारों को ख़ुश रखने के लिए फ़िल्में नहीं बनातीं। वह गिरोह विशेष की पसंददीदा विषय नहीं चुनतीं।

इसी तरह 2012 में जब ईशा देओल की शादी के दौरान मीडिया ने धर्मेद्र से उनके दोनों बेटों की अनुपस्थिति के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “आप बकवास मत कीजिए।” लेकिन, यह आई-गई बात थी। अगर इस चीज को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है तो फिर कंगना वाले मुद्दे पर इतना हाय-तौबा मचाने की क्या ज़रूरत है? कंगना ने तो बस मीडिया को एक आइना दिखाया है, बाकियों ने तो समय-समय पर पत्रकारों को ‘उनकी औकात दिखाने’ का काम किया है। आज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट गिल्ड एक पेज पर खड़े हैं, सिर्फ़ कंगना को बॉयकॉट करने के लिए। आख़िर एक महिला ने ऐसा क्या कर दिया कि इतने बड़े-बड़े संगठनों की नींद उड़ गई है?

एक पत्रकार ने जब दीपिका पादुकोण के बारे में कुछ लिखा, तो रणवीर को उस पर गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा कि अगर वो पत्रकार उनके सामने आ गया तो उसके साथ मारपीट की नौबत न आ जाए, इसके लिए उन्हें ख़ुद पर कड़ा नियंत्रण रखना पड़ेगा। उन्होंने अप्रैल 2015 में कहा था कि वो उस पत्रकार से बहुत ही ज्यादा गुस्सा हैं। रणवीर की इस ‘फिजिकल असॉल्ट’ वाली बात के ऊपर पत्रकारों का ख़ून ठंडा बना रहा, उबला नहीं। लेकिन, कंगना ने कुछ सवाल क्या पूछ दिए, पूरे गिरोह में खलबली मच गई। चड्डियाँ कितनी बार बदली जाती हैं और उनका रंग क्या होता है, अगर मीडिया ने यह दिखाने और फ़िल्मों में फ़र्ज़ी विचारधारा ढूँढने की कोशिश न की होती तो शायद आज उनकी बेइज्जती की नौबत ही नहीं आती।

जो भी हो, एक सेल्फ-मेड अभिनेत्री ने मीडिया को बता दिया है कि दो अलग-अलग लोगों के मामले में सिर्फ़ इसीलिए दोहरा रवैया नहीं चलेगा क्योंकि एक खानदानी परिवार से आता है और एक ने गाँव-कस्बों से आकर इंडस्ट्री में अपना पाँव जमाया है। कंगना के सवालों का अब भी जवाब देना पड़ेगा मीडिया को- ये फ़िल्मों में ब्राह्मणवाद और मर्दवाद जैसी चीजें ढूँढना कब बंद करोगे? आज एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री ने एक गिरोह बनाया है, एडिटर्स गिल्ड के रूप में मुख्यधारा की मीडिया में ऐसा एक गिरोह पहले से ही सक्रिय है जो बंगाल में पत्रकारों की पिटाई पर तो चुप रहता है लेकिन कहीं किसी भाजपा शासित राज्य में कोई पत्रकार गिरफ़्तार भी हो जाए तो इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाता है।

कंगना रनौत के साथ मीडिया ज्यादतियाँ कर रहा है। देश के हर मुद्दों को लेकर उनसे ज़बरदस्ती बयान देने को कहा जाता है और उनके बयान गिरोह विशेष की राय से मिलते जुलते नहीं हैं, इसीलिए उनको निशाना बनाया जाता है। खानदानी सेलेब्स के पैरों पर लोटने वाली मीडिया को एक महिला ने ऐसा आइना दिखाया है कि औपचारिक रूप से एक गिरोह का गठन करने की नौबत आ गई है। शायद यही टाँग खींचने की परम्परा का दुष्परिणाम है कि बॉलीवुड में सुदूर शहरों से आए हुए उतने अभिनेता नहीं हैं जितने खानदानी और नेपोटिज्म से आए अभिनेता-अभिनेत्री हैं। या तो मीडिया अपना रवैया बदले नहीं तो कंगना जैसी और भी आएँगी। अब देश की महिलाएँ जवाब देना जानती हैं, चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हों।

₹10000 करोड़ की ज़मीन की हेराफेरी: प्रयागराज के ईसाई संगठनों द्वारा ‘देश का सबसे बड़ा घोटाला’

प्रयागराज में इंडियन चर्च ट्रस्टीज, डायसिस ऑफ लखनऊ के अंतर्गत आने वाली 100 अरब रुपए की ज़मीन को धोखाधड़ी के जरिए बेचने का मामला सामने आया है। इतनी बड़ी क़ीमत वाली ज़मीन को बेचने के बाद रुपए का बंदरबाँट भी कर लिया गया। ये ज़मीनें सिविल लाइन्स के अधीन थीं। फ़र्ज़ी काग़ज़ात और जाली दस्तावेजों का सहारा लेकर सौ अरब रुपए की ज़मीन को दूसरे संस्थानों को बेच डाला गया। इस मामले में सम्बंधित संगठनों ने मामला दर्ज कराया है, जिसमें बिशप समेत 16 लोगों पर मुक़दमा दर्ज किया गया है।

इन संस्थाओं की सम्पत्तियाँ पहले भी विवादों में रही हैं और इस बार बिशप जॉन अगेस्ट्रिन ने मुक़दमा दर्ज कराया है। जिन लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है, उनमें कई बड़े पदाधिकारी और अज्ञात भी शामिल हैं। आरोपितों में एक बिशप पीटर बलदेव भी शामिल है। इन लोगों ने फ़र्ज़ी सोसाइटी और फेक दस्तावेज बना कर ज़मीन बेचने के मामले में हेराफेरी की।

प्रयागराज के शहरी व देहाती इलाक़ों में ईसाई संगठनों की अरबों की ज़मीनें हैं। इससे पहले ऐसे कई मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें एक संस्था के अंतर्गत दूसरी संस्था बनाई गई और फिर ज़मीन का बंदरबाँट किया गया। संस्थाओं को ज़मीन ट्रांसफर कर के कुछ वर्षों बाद उन्हें बेच दिया जाता था। इससे पहले जॉन अगेस्ट्रिन सोसाइटी के नाम पर भी करोड़ों का घोटाला किया गया था। इसी तरह छात्रावास के नाम पर भी करोड़ों रुपए का घोटाला किया गया।

प्रयागराज के ईसाई प्राइवेट स्कूलों व ईसाई संगठनों के पदाधिकारियों पर ज़मीन घोटाले व हेराफेरी से जुड़े कई मामले दर्ज हैं। ईसाई संस्थाएँ इन मामलों में आपस में ही लड़ रही हैं और एक-दूसरे पर ही मुक़दमा दर्ज करा रही हैं। कीडगंज में एक ईसाई कम्पाउंड की ज़मीन को एक बिल्डर को बेच डाला गया था। इस मामले में एक बुजुर्ग ने फाँसी भी लगा ली थी। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि उन्हें ज़मीन खाली करने को मजबूर किया जा रहा है।

बिशप अगेस्ट्रिन ने कहा है कि यह खेल देश भर में चल रहा है, जहाँ ईसाई संगठन और उनके पदाधिकारी फ़र्ज़ी संगठन बना-बना कर ज़मीन की हेराफेरी कर रहे हैं। प्रयागराज ज़मीन घोटाले को उन्होंने देश का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया। यह खेल कई दशकों से चल रहा है। 1971 में ही फ़र्ज़ी संगठन बनाया गया था और 1991 में फ़र्ज़ी पदाधिकारी बन कर ज़मीनें इधर-उधर ट्रांसफर की गई थीं।

सेक्स चेंज करवाने पर मिलेंगे ₹1.5 लाख रुपए: किन्नरों पर मेहरबान हुई बिहार सरकार

बिहार सरकार ने सेक्स बदलवाने पर वित्तीय मदद देने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने किन्नर कल्याण बोर्ड का भी गठन किया है। सरकार ने आश्वस्त किया है कि किन्नरों के हितों की रक्षा हर हाल में किए जाएगी। बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा, “किन्नर हमारे समाज के ही अंग हैं। अगर कोई व्यक्ति सेक्स परिवर्तित कराता है तो बिहार सरकार डेढ़ लाख रुपए वित्तीय मदद के रूप में देगी।“

पटना के प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित किन्नर महोत्सव को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति किन्नरों को किराए पर मकान देने से इनकार करता है, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ देने में भेदभाव करता है, इसके अलावा इनके अधिकारों का हनन करता है, तो उन्हें छह माह से लेकर दो साल तक की सज़ा दी जा सकती है।” राज्य सरकार द्वारा नवगठित बोर्ड अन्य राज्यों में किन्नरों को मिल रही सुविधाओं का अध्ययन करेगा। इसके बाद बिहार के किन्नरों को सुविधाएँ देने के लिए योजनाएँ बनाई जाएँगी।

कार्यक्रम के मंच पर किन्नरों ने अपनी कलाकारी दिखाई। कई राज्यों से आए कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। उद्योग मंत्री श्याम रजक ने इस महोत्सव को किन्नरों को आत्मबल देने वाला कार्यक्रम बताया। किन्नर महोत्सव 2016 से ही प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता रहा है। कला एवं संस्कृति मंत्री प्रमोद कुमार ने किन्नरों को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया।

उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी द्वारा किन्नर महोत्सव को लेकर साझा की गई जानकारियाँ

बता दें कि इंसेफ्लाइटिस के कारण राज्य में 150 से भी अधिक बच्चों की मौत हो गई है और केंद्र से लेकर राज्य स्तर के नेताओं द्वारा दौरे करने के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नज़र नहीं आया। इसके अलावा गर्मी में लू के कारण भी 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण लोगों के निशाने पर आई बिहार सरकार ने बाढ़ को लेकर भी ज़रूरी इंतजाम नहीं किए हैं। बिहार के कई जिलों में पानी भर चुका है और जल-निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण कई इलाक़े जलमग्न हो चुके हैं।

24 सेकंड का Video वायरल: CRPF जवानों ने 14 साल की नगीना को नदी में डूबने से बचाया

केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (CRPF) के जवानों की बहादुरी के क़िस्से तो हम आए दिन सुनते रहते हैं। देश की सुरक्षा में तो ये जवान मुस्तैदी के साथ खड़े ही रहते हैं, लेकिन मुश्किल में फँसे किसी शख़्स की जान बचाने में भी ये जवान अपने क़दम पीछे नहीं लेते। अपने अदम्य साहस का परिचय कराने की एक ऐसी ही घटना जम्मू-कश्मीर के बारामूला से सामने आई है। ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया गया है जिसमें एक लड़की को नदी में डूबने से बचाने के लिए वहाँ मौजूद जवानों ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी और लड़की को सही-सलामत बचा लिया।

14 साल की नगीना नाम की लड़की को CRPF कॉन्स्टेबल्स एमजी नायडू और नल्ला उपेंद्र द्वारा (बारामूला, जम्मू-कश्मीर) में नदी में डूबने से बचाया गया। जवानों की इस बहादुरी के लिए CRPF के महानिदेशक द्वारा 176 बटालियन के एमजी नायडू और उपेन्द्र को पुरस्कृत करने की घोषणा की गई है।

ख़बर के अनुसार, सोमवार (15 जुलाई) को दोपहर के समय नगीना बारामुला ज़िले के चनपोरा कुंजर टंगमर्ग गई थी। वहाँ नदी के तट पर वो कपड़े धो रही थी तभी अचानक उसका पाँव फ़िसल गया और वो नदी की तेज़ धाराओं के साथ बहने लगी। इस दौरान वो ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी। तभी वहाँ ड्यूटी पर तैनात CRPF के जवानों ने उसकी आवाज़ सुनी। उन्होंने बिना देरी किए नगीना को बचाने के लिए नदी में छलाँग लगा दी। 

लड़की की पहचान नगरोटा (जम्मू-कश्मीर) के मोहम्मद शरीफ़ की बेटी नगीना के रूप में हुई। नगीना को बचाए जाने के बाद, CRPF के जवानों ने उसे इलाज के लिए तुरंत उप-ज़िला अस्पताल टंगमर्ग में स्थानांतरित कर दिया, जहाँ डॉक्टर्स ने उसकी स्थिति स्थिर बताई। नगीना के परिजनों ने सभी जवानों के तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।