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गुजरात राज्यसभा उपचुनाव: जुगलजी ठाकोर, विदेश मंत्री जयशंकर जीते, कॉन्ग्रेस को मिला ‘लड्डू’

गुजरात के हिस्से की राज्यसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में विदेश मंत्री एस जयशंकर और भाजपा के दूसरे उम्मीदवार जुगलजी ठाकोर ने जीत हासिल की है। उन्हें भाजपा के 100 विधायकों के अतिरिक्त दो बागी कॉन्ग्रेसियों, एनसीपी और छोटे दलों का भी समर्थन मिला है। जयशंकर ने अपनी जीत के लिए भाजपा को धन्यवाद दिया है।

कॉन्ग्रेस का कानूनी दाँव नाकाम

कॉन्ग्रेस पर तंज़ कसते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने बताया कि कॉन्ग्रेस सुप्रीम कोर्ट तक गई, लेकिन उसके हाथ निराशा ही लगी; हमारे दोनों उम्मीदवार भारी मतों से विजयी हुए हैं। गौरतलब है कि जयशंकर और जुगलजी ठाकोर को 105-105 मत प्राप्त हुए, जबकि कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों चन्द्रिका चूड़ास्मा और गौरव पंड्या को 70-70 मतों से ही संतोष करना पड़ा। कॉन्ग्रेस दोनों राज्यसभा सीटों का चुनाव अलग-अलग कराए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई थी, लेकिन अदालत ने निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से साफ़ इंकार कर दिया। भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में मंतदान करने के तुरंत बाद कॉन्ग्रेस बागियों अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह झाला ने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके अलावा कॉन्ग्रेस की सहयोगी और संप्रग की अंग राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक विधायक और भारतीय ट्राइबल पार्टी के दो विधायकों का भी वोट मिला।

कॉन्ग्रेस ने नहीं मानी हार

कॉन्ग्रेस अभी भी हार मानने के मूड में नहीं दिख रही है। उसने विधानसभा अध्यक्ष और रिटर्निंग अफसर को लिखित आपत्तिपत्र देकर ठाकोर और झाला के मतों को ख़ारिज करने की माँग की है। आरोप लगाया है कि उन्होंने पारी व्हिप का उल्लंघन किया था। जयशंकर ने इस मौके पर कहा कि विदेशमंत्री होने के नाते विदेश में भारी तादाद में बसे भारतीयों से संपर्क अब वह गुजरात के प्रतिनिधि के तौर पर भी करेंगे।

सिर्फ़ पापा-पापा ही बोल पा रही है, 6 साल की मासूम जिसे मोहम्मद नन्हे ने बनाया शिकार

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शनिवार (6 जुलाई) को द्वारका में दरिंदगी की शिकार 6 साल की बच्ची से मिलने दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुँचे। इस दौरान उन्होंने परिवार के सदस्यों से मुलाक़ात की और पीड़ित परिवार को ₹10 लाख रुपए देने की घोषणा की। इसके अलावा केजरीवाल ने पीड़िता का इलाज कर रहे डॉक्टर से भी मुलाक़ात की जिससे पता चला कि बच्ची की हालत अभी स्थिर है और वो ख़तरे से बाहर है। अरविंद केजरीवाल ने परिवार से कहा, “हम केस लड़ने के लिए पीड़ित परिवार को वकील मुहैया कराएँगे।”   

पीड़ित बच्ची के पिता ने कहा, “दिल्ली का बड़ा नाम सुना था। दो वक़्त की रोटी कमाने आए थे। क्या बताएँ कि क्या हुआ। बिटिया आज ही थोड़ा-थोड़ा बोली है पापा-पापा। और कुछ नहीं बोल पा रही।” उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की हालत अभी भी ठीक नहीं है, कल तक वो कुछ नहीं कह पा रही थी। बच्ची का बयान लेने जज भी आईं थीं, लेकिन वो एक शब्द भी बोलने में असमर्थ थी। बच्ची की ऐसी हालत देखकर जज वहाँ से यह कहकर वापस चली गईं कि वो बयान लेने बाद में आएँगी। 

इसके अलावा उन्होंने बताया:

“मेरे चार बच्चे हैं। बिटिया दूसरे नंबर की है। इकलौती लड़की है। कमरे का किराया और बच्चों को पालने के लिए पैसों की ज़रुरत है, इसलिए दोनों काम करते हैं। दो साल पहले काफ़ी उम्मीदें लेकर दिल्ली आए थे, लेकिन यहाँ दिल्ली में ग़रीब के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। थोड़े दिन ठीक से चलता रहा, मगर अब बिटिया के साथ ग़लत काम हो गया।”

घटना वाले दिन पर उन्होंने बताया कि उनकी बिटिया मंदिर में खेल रही थी। बच्ची की माँ को एक घर में साफ़-सफ़ाई का काम मिला था। मेहनताने के रुप में 700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ था।

वहीं, मासूम बच्ची की माँ का कहना है कि वो (आरोपित) बच्ची को टॉफी का लालच देकर बहला-फुसला कर मंदिर ले गया था। इसके अलावा उन्होंने बताया कि बच्ची को अपने साथ ले जाने के दौरान मोहम्मद नन्हे ने उसके साथ खेलने वाले सभी बच्चों को वहाँ से भगा दिया था।  

अपनी आँखों में हताशा, निराशा का भाव लिए एक पिता के लिए यह दिन देखना कितना कष्टकारी है, इस बात का तो केवल अंदाज़ा मात्र ही लगाया जा सकता है।

गत शुक्रवार (5 जुलाई) को दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने भी मासूम बच्ची से सफदरजंग अस्पताल में जाकर मिली थीं।

दिल्ली के द्वारका सेक्टर-23 में 6 साल की मासूम को साथ मोहम्मद नन्हें ने अपनी जिस क्रूरता का परिचय दिया था उससे किसी की भी आत्मा काँप जाए। मासूम के साथ जिस बेरहमी से रेप किया गया उससे कलेजा मुँह को आ जाता है। घटना के बाद बच्ची की हालत काफ़ी नाज़ुक थी। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस मामले में भले ही आरोपित गिरफ़्तार हो गया हो लेकिन उसके जघन्य अपराध की जो भी सज़ा मिलेगी वो शायद कम ही होगी। इस घटना से मोहम्मद नन्हे की विकृत सोच उजागर होती है।

कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार पर संकट, 11 MLA इस्तीफा देने पहुँचे विधानसभा

कर्नाटक में जेडीएस-कॉन्ग्रेस गठबंधन सरकार का संकट बढ़ता जा रहा है। शनिवार (जुलाई 6, 2019) को सरकार पर यह संकट और गहरा गया है क्योंकि कॉन्ग्रेस के 3 और जेडीएस के 8 विधायक इस्तीफा देने के लिए विधानसभा पहुँच गए हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी फिलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं। इस बीच, उपमुख्‍यमंत्री जी. परमेश्‍वर और राज्‍य के मंत्री डीके शिवकुमार ने कॉन्ग्रेस के विधायकों और निगम सदस्‍यों की आपात बैठक बुला ली है।

वैसे, अगर ये 11 विधायक इस्तीफा दे देते हैं, तो कुमारस्वामी सरकार खतरे में पड़ जाएगी और कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन वाली कुमारस्वामी की सरकार गिर सकती है और ऐसे में राज्य में भाजपा के लिए सरकार के गठन का रास्ता साफ हो जाएगा। दरअसल, कर्नाटक में कुल 224 विधानसभा सीटें हैं। बहुमत के लिए 113 विधायक चाहिए। फिलहाल भाजपा के पास 105 विधायक हैं, जबकि कॉन्ग्रेस के पास 80 और जेडीएस के पास 37 विधायक हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और निर्दलीय विधायक भी गठबंधन का समर्थन कर रहे हैं।

इस्तीफे को लेकर कॉन्ग्रेस विधायक रामालिंगा रेड्डी का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि वो विधानसभा अध्‍यक्ष को अपना इस्‍तीफा सौंपने आए हैं। रेड्डी ने कहा कि वो अपनी बेटी (कॉन्ग्रेस विधायक सौम्‍या रेड्डी) के अगले कदम के बारे नहीं जानते। साथ ही उन्‍होंने कहा कि वो पार्टी में किसी को भी इसका दोष नहीं दे रहे हैं। रेड्डी का कहना है कि उन्हें लगता है कि कुछ मुद्दों पर उनकी उपेक्षा की जा रही है। इसीलिए उन्होंने इस्‍तीफा देने का फैसला लिया है।

इस बीच भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्‍हा राव ने कहा है कि कर्नाटक की जनता ने कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन को नकार दिया है। लोकसभा चुनावों में दोनों की दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा। इसके बावजूद भाजपा राज्‍य में भारी बहुमत हासिल करने में सफल रही। भाजपा की प्रचंड जीत राज्‍य के लोगों के मूड को स्‍पष्‍ट तौर पर बता रही है। निश्चित रूप से विपक्ष के विधायक भी गठबंधन के खिलाफ जनता के गुस्से का सामना कर रहे हैं।

धोती-कुर्ता और चप्पल पहने बुजुर्ग को TTE ने शताब्दी एक्सप्रेस में चढ़ने से रोका, रेलवे ने दिया जाँच का आदेश

साल 1893 में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से सिर्फ इसलिए उतार दिया गया था, क्योंकि वो अश्वेत थे। आजादी के 70 साल बाद ऐसा ही कुछ हमारे देश में हुआ है। खबर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में पैरों में हवाई चप्पल और बदन पर धोती-कुर्ता होने की वजह से एक बुजुर्ग शख्स को टीटीई ने ट्रेन में यात्रा नहीं करने दी।

दरअसल यह वाकया गुरुवार (जुलाई 4, 2019) की सुबह का है। बाराबंकी के ग्राम मूसेपुर थुरतिया के रहने वाले बुजुर्ग अवधदास ने 4 जुलाई को इटावा जंक्शन से गाजियाबाद जाने के लिए शताब्दी (12033) ट्रेन में अपनी सीट बुक कराई थी। उन्हें C-2 बोगी में 72 नंबर सीट मिली थी। जिसका उल्लेख टिकट चार्ट में भी था। ट्रेन जब गुरुवार सुबह 7:40 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर आई तो रामअवध दास बोगी में चढ़ने लगे। उसी समय गेट पर मौजूद सिपाही ने उन्हें ट्रेन में चढ़ने से रोका। तभी कोच अटेंडेंट भी आ गया और धोती कुर्ता ओर पैरों में रबर की हवाई चप्पल पहने अवधदास को ट्रेन में चढ़ने से रोकने लगता है। 

इस दौरान बुजुर्ग अपना कन्फर्म टिकट भी दिखाया, लेकिन तब तक 2 मिनट हो चुके थे और ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ चुकी थी। जिसके बाद इस अपमान से नाराज रामअवध दास ने स्टेशन मास्टर के पास जाकर शिकायत रजिस्टर में अपनी शिकायत दर्ज कराई और उसके बाद बस से गाजियाबाद के लिए रवाना हुए। फिलहाल रेलवे ने इस मामले में जाँच का आदेश दे दिया है।

ऐसी घटना निश्चित ही हमारे दिमाग में एक अलग छाप छोड़ जाती है। धोती-कुर्ता हमारा पारंपरिक परिधान है और सिर्फ पहनावे के आधार पर किसी को ट्रेन में सफर करने से रोकना असंवेदनशीलता की चरम सीमा है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को विश्व गुरु बनाने की बात करते हैं। हवाई चप्पल पहनने वाले शख्स को भी हवाई जहाज की यात्रा कराने की योजना ‘उड़ान’ देश भर में चल रही है। इस बीच इस तरह की घटनाएँ बेहद निंदनीय है।

बाबुल सुप्रियो को TMC नेता ने कहा बन्दर, ममता पुलिस ने किया 13 BJP नेताओं को गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही। ताजा मामला आसनसोल से सामने आया है। दोनों पार्टियों के लोगों के बीच झड़प के बीच टीएमसी नेता ने केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को बीजेपी का बंदर तक कह दिया। दरअसल, भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा कट मनी के मसले पर आसनसोल नगर निगम कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया जा रहा था। इस दौरान आसनसोल में शुक्रवार (जुलाई 5, 2019) को भड़की हिंसा के बाद पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और साथ ही भाजपा के 13 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया।

इस घटना के बाद आसनसोल के मेयर और टीएमसी नेता जे तिवारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और भाजपा कार्यकर्ता के बारे में बात करते हुए कहा, “वे हमला करने के इरादे से आए थे, लेकिन निगम के गेट को छू भी नहीं सके। बाबुल सुप्रियो, अगर तुम भाजपा के बंदर हो, तो हम आसनसोल में तुम्हारे लिए पिंजरा तैयार कर चुके हैं। हम तुम्हारे जैसे बंदरों को अपने पास रखने की क्षमता रखते हैं।”

शुक्रवार को आसनसोल के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के ही बर्धमान जिले में भी दोनों पार्टियों के समर्थकों में झड़प की खबर आई थी। जिसमें दो लोग घायल हो गए। घायलों को बर्धमान मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

मुस्लिम बहुल ट्यूनीशिया ने आत्मघाती आतंकी हमले के बाद नक़ाब पर लगाया प्रतिबंध

अफ्रीका के मुस्लिम देश ट्यूनीशिया के प्रधानमंत्री ने देश में हुए हमलों के बाद सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सरकारी कार्यालयों में नक़ाब पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रधानमंत्री यूसुफ़ चाहेद ने एक सरकारी परिपत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके अनुसार, “सरकारी प्रशासनिक कार्यालयों एवं सरकारी संस्थानों में किसी भी व्यक्ति के मुँह ढक कर आने पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध” लगाने की बात की गई है।

इस आदेश के अनुसार, सुरक्षा कारणों से देश के सभी स्त्री-पुरुषों के लिए अपना चेहरा खुला रखना अनिवार्य कर दिया गया, जिससे उनकी पहचान स्पष्ट हो सके। दरअसल, ट्यूनीशियान में 27 जून 2019 को हुए आत्मघाती हमले के बाद यह निर्णय लिया गया है। इस हमले में दो लोग मारे गए थे और सात घायल हुए थे।

वहीं, मानवधिकारों से जुड़ी संस्था ट्यूनीशिया लीग ने अनुरोध किया है कि यह प्रतिबंध स्थायी न होकर अस्थायी होना चाहिए। लीग के अध्यक्ष जामेल मुसल्लम का कहना है कि हमें इच्छानुसार, पोशाक पहनने की आज़ादी होनी चाहिए।

ट्यूनीशिया एक मुस्लिम देश है जहाँ इस्लाम राजकीय धर्म है। देश की सरकार को ‘इस्लाम का संरक्षक’ माना जाता है और संविधान में देश के राष्ट्रपति का मुस्लिम होना आवश्यक है।

ऐतिहासिक तौर पर भी ट्यूनीशिया में ज़िन अल अबिदीन बेन अली के शासनकाल के दौरान भी, किसी भी मजहब के प्रतीक चिह्नों का वाह्य प्रदर्शन, चाहे वो इस्लामी ही क्यों न हो प्रतिबंधित था। लेकिन, 2011 की ‘क्रांति’ के बाद स्थिति बदल गई। ऐसे मज़हबी प्रतीकों पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया था। हालाँकि, 2015 के आतंकी हमले के बाद, नक़ाब पर प्रतिबंध को फिर से लागू करने की माँग की गई।

कॉन्ग्रेस और मजहब विशेष के अवैध प्रवासियों की प्रेम कहानी: नेहरू से ‘गाँधी’ तक तुष्टिकरण का चरम

वैसे तो एनआरसी का मसला असम की राज्य सरकार, केंद्र की तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार और असम के राजनैतिक दलों से शुरू हुआ था, मगर इसकी जड़ें पंडित नेहरू के कार्यकाल तक जाती हैं- जो बहुत कम लोग जानते हैं।

1950 में बनाए गए अप्रवासी कानून के तहत सरकार के संज्ञान में लाया गया कि असम में अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो कि चिंता का विषय है। इसलिए इस कानून की स्थापना के पीछे का मूल ही असम से अवैध प्रवासियों को बाहर करना था। 1950 में बना अप्रवासी कानून उस समय की कार्यकारी सरकार ने बनाया था।

1951 में असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के लिए एक ऐसी सूची की आवश्यकता पड़ी, जिसमें भारतीय नागरिकों की जानकारी हो, इसलिए National Register of Citizens of India (NRC) भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार किया गया, जिसमें देश के सभी नागरिकों के नाम, आयु व पता लिखे गए थे। 

1951 की एनआरसी उस वर्ष की जनगणना के बाद तैयार की गयी थी। इसके बाद दूसरा कदम सरकार को यह उठाना था कि असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकाला जाए। लेकिन 1951 में जनगणना के बाद अंत में चुनाव शुरू हो गए, जो 1952 तक चले और इसके बाद नई सरकार ने इस काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया। 1952 में सरकार की ओर से एक बड़ा ही बेतुका कारण बताकर इस विषय को टाल दिया गया। 

‘विदेशी मामलों पर श्वेत पत्र’ में सरकार ने कहा कि अक्टूबर 1952 से भारत और पाकिस्तान के बीच वीज़ा और पासपोर्ट नियमों का कार्यान्वन शुरू हो चुका था जो अधिक महत्व का काम था इसलिए एनआरसी के काम को रोकना पड़ा। यह कारण बेतुका इसलिए भी है क्योंकि वीज़ा और पासपोर्ट के संचालन के बाद से तो काम और भी आसान हो जाना चाहिए था, ताकि विदेशी नागरिकों को अपने देश से वीज़ा और पासपोर्ट लाने की चेतावनी दी जा सके।

1961 की जनगणना के बाद भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने अपनी जनगणना की रिपोर्ट में बताया कि साल 1961 तक असम में 2 लाख से अधिक अवैध प्रवासी आ चुके थे। इसके करीब 4 साल बाद 1965 में (तब तक प्रधानमंत्री नेहरू का देहांत हो चुका था और इस गंभीर विषय को लाल बहादुर शास्त्री जी के ज़िम्मे छोड़ा गया) एनआरसी के अंतर्गत आने वाले सभी लोगों को एक राष्ट्रीय पहचान पत्र और राष्ट्रीय पहचान अंक दिए जाने थे। मगर इस काम की व्यापकता से डरते हुए और इसे अव्यवहारिक घोषित करते हुए इसे सन 1966 में भी टाल दिया गया।

1971 तक पूर्वी पाकिस्तान में स्थिति भयावह हो चुकी थी जिसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध हुआ। इस दौरान भी बहुत बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों ने भारत में प्रवेश किया। 1971 के बाद से यह प्रवेश बढ़ता ही गया। चार वर्षों बाद 1975 में देश में  आपातकाल लागू होने के बाद 1977 तक कोई बड़ी प्रगति इसमें नहीं हो सकी, लेकिन 1979 में असम के छात्र परिषदों ने इस मामले को बहुत ही व्यापक स्तर पर उठाया और काफी बड़ी संख्या को प्रभावित किया। 

छात्र संगठनों का असम के लिए संघर्ष

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) व ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) का संघर्ष भी अपने आप में एक कहानी है। असम में बढ़ते अप्रवासियों के कारण असम के संसाधनों का ह्रास हो रहा था। वे संसाधन जो राज्य की मूल निवासी जनता को मिलने चाहिए थे, उन्हें अवैध प्रवासियों को दिया जा रहा था। बांग्लादेश से भारत आने वाले अवैध प्रवासियों में समुदाय विशेष की आबादी ज़्यादा थी, और कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के कारण समुदाय विशेष को विशेष सत्कार मिलता था। राज्य की नौकरियाँ यदि कोई सबसे ज़्यादा खा रहा था तो वे अवैध प्रवासी थे।

राज्य में अगर अवैध बस्तियाँ बन रही थीं, ज़मीन पर कब्ज़ा बढ़ रहा था और कानून व्यवस्था चरमरा रही थी तो उसके पीछे भी अवैध प्रवासी थे। चोरी, हत्या, लूट, धमकी और अन्य अपराध भी राज्य में अवैध प्रवासियों के कारण बढ़ते ही जा रहे थे। दुःखद यह है कि एनआरसी के जिस काम को 1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी ने टाल दिया था, उसे दोबारा इंदिरा गाँधी ने शुरू तक नहीं कराया। 2 लाख से अधिक प्रवासी 1961 में असम में आ चुके थे, और इसके बाद भारत-पाक युद्ध और आगामी वर्षों में भी प्रवासियों का आगमन रुक नहीं रहा था, जिसके कारण अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ रही थी।

अंततः असम के छात्र संगठनों के आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। इस आंदोलन में भी काफ़ी हिंसा हुई और बहुत लोगों की जानें गईं। इस आंदोलन में ट्रेन भी रोकी गईं, और असम से बिहार रिफाइनरी भेजे जाने वाले तेल को भी रोका गया। आंदोलनकारियों की माँग थी कि 1951 के बाद आए सभी अवैध प्रवासियों को राज्य से बाहर निकाला जाए। आंदोलनकारियों की माँग केवल अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की ही नहीं, बल्कि अवैध वोटरों को भी निकालने की थी।

करीब 6 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद सन 1985 में AASU और AAGSP की बातें राज्य व केंद्र सरकार ने मान ली और राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के साथ AASU और AAGSP व राज्य सरकार का त्रिपक्षीय समझौता हुआ जिसे असम एकॉर्ड या ‘असम समझौते’ के नाम से जाना जाता है। राजीव गाँधी की सरकार में हुए इस समझौते के अनुसार सरकार ने यह वादा किया था कि दिनांक 25 मार्च 1971 (बांग्लादेश का स्वतंत्रता दिवस) के निर्णायक दिवस के बाद असम में आए शरणार्थियों को वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा। 

ध्यान रहे कि इससे पहले सरकार के संज्ञान में वर्ष 1965 में ही यह आ गया था कि 2 लाख से अधिक प्रवासी राज्य में प्रवेश कर चुके हैं और उन्हें हटाना है, मगर सरकार अपनी अक्षमता के कारण उन 2 लाख प्रवासियों को माफ करने की नीति बना चुकी थी और छात्र संगठनों ने भी यह महसूस किया कि 6 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद कुछ फ़ैसला तो हमारे हित में आया, इसलिए वे सरकार के साथ इस समझौते का हिस्सा बन गए और आंदोलन वापस ले लिया गया। 

अब तक असम की स्थिति 1951 से अलग हो चुकी थी, इसलिए 1951 में बनी एनआरसी की सूची अपडेट करने की ज़रूरत थी। अपडेट करने के बाद ही 1951-1971 के बीच आए अवैध प्रवासियों को राज्य में शरण दिए जाने की इजाज़त दी जाती और उसके बाद के कालखंड में आए प्रवासियों को बाहर निकाला जाता। मगर हमेशा की तरह कॉन्ग्रेस ने असम समझौता केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही किया था क्योंकि एनआरसी अपडेट करने को लेकर कॉन्ग्रेस ने कोई भी प्रगति नहीं दिखाई। 

इसके बाद सालों तक अवैध प्रवासियों पर चर्चा नहीं की गई, न उन्हें खोजा गया न ही उन्हें निकालने का प्रयास किया गया। हाँ, 2005 में एक बार मनमोहन सिंह ने प्रयास का दिखावा ज़रूर किया था। असम से ही राज्यसभा साँसद रहे मनमोहन सिंह ने 2005 में दिल्ली में त्रिपक्षीय बैठक की जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन का प्रतिनिधित्व रहा। लेकिन खुद रिमोट-कंट्रोल से चलने वाले मनमोहन सिंह इसके आगे कुछ न कर सके, और मात्र बैठक करके अपना राजनीतिक हित साध गए।

2009 में पड़ा सर्वोच्च न्यायालय का डंडा

2009 में ‘असम पब्लिक वर्क्स’ नामक एक ग़ैर सरकारी संगठन ने जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की। इस याचिका के माध्यम से संगठन ने सरकार से पूछा कि एनआरसी अपडेट होने का काम कहाँ तक पहुँचा, लेकिन दुर्भाग्य से यह काम तनिक भी आगे नहीं बढ़ा था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसके बाद सरकार से इस काम को तेज़ी से शुरू करने को कहा जिसके बाद सरकार ने वर्ष 2010 में दो प्रखंडों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। 

कामरूप और बारपेटा में एनआरसी अपडेट करने की शुरुआत के लिए गए अधिकारियों को मुँह की खानी पड़ी। असम में अवैध प्रवासी समुदाय समुदाय ने अधिकारियों, मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के विरुद्ध प्रदर्शन किया, नारे लगाए और जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो उन्होंने आगजनी भी की। इसके बाद माहौल और ख़राब हो गया जिससे यह काम पुनः रुक गया।  

उस समय की यूपीए सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन न कर सकी। इतना ही नहीं, पिछले प्रोजेक्ट्स को लटकाने का कॉन्ग्रेस का रवैया फिर सामने आया और इसके बाद 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने पूरा काम अपनी निगरानी में लिया। 2014 में चुन कर आई मोदी सरकार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर तेज़ी से काम करने का आदेश दिया। 

नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मामले में कोई ढिलाई नहीं बरती। कॉन्ग्रेस के रवैये के विपरीत, मोदी सरकार ने काम में तेज़ी दिखाई और वह काम जो 1985 में शुरू हो जाना चाहिए था, वह 30 वर्षों बाद 2015 में शुरू हुआ। एनआरसी को अपडेट करने के लिए मोदी सरकार ने आवेदन की शुरुआत 2015 से कर दी। लोगों ने आवेदन भरना शुरू किया और 31 अगस्त 2018 को आवेदन बंद होने तक, असम की आबादी के बराबर 3 करोड़ 29 लाख आवेदन आ चुके थे। 1 सितंबर से ही सरकार ने वेरिफिकेशन यानी जाँच का काम शुरू कर दिया। करीब दो वर्षों में यह काम पूरा हो गया, और 30 जुलाई 2017 को सरकार ने पहली ड्राफ्ट रिपोर्ट यानि प्रारूप तैयार कर दिया।

3 करोड़ की जनसंख्या में से केवल 1 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम इस रिपोर्ट में शामिल थे। इसके बाद सरकार ने लोगों को अवसर दिया कि जिनके नाम शामिल नहीं हैं, वे कोई भी प्रामाणिक दस्तावेज़ दिखा कर अपना नाम शामिल करा सकते हैं। साल भर बाद दोबारा वेरिफिकेशन हुआ और 30 जुलाई 2018 को सरकार ने फाइनल ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की, जिसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। 

इसके बाद भी सरकार ने एक और अवसर उन लोगों को दिया, जो नागरिक हैं और फिर भी अपने दस्तावेज़ जमा नहीं करा पाए। इस साल 2019 में सरकार फाइनल रिपोर्ट जारी करेगी, जो कि ड्राफ्ट रिपोर्ट नहीं होगी। यह ग़ौर करने वाली बात है कि पिछले 5 सालों में जिस तेज़ी के साथ काम हुआ है, पिछली सरकारों ने वह तेज़ी नहीं दिखाई। 30 सालों से अटके हुए काम को मोदी सरकार ने 5 साल में पूरा किया। अगर मोदी सरकार सत्ता में वापस नहीं आई होती तो शायद इस साल आने वाली एनआरसी की फाइनल रिपोर्ट की संभावना ही नहीं होती।

अब भी जिनके नाम इस एनआरसी में नहीं होंगे, और वे लोग देश के नागरिक हुए, उनके पास अवसर है कि वे ‘फॉरेनर ट्रिब्यूनल’ में अपनी याचिका दायर करें, ख़ुद को नागरिक साबित करें और सूची में अपना नाम दर्ज करवाएँ। यानि जिन लोगों के नाम सरकार ने सूची में नहीं रखे हैं, मगर वे फिर भी ख़ुद को देश का नागरिक मानते हैं, उन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपनी लड़ाई लड़नी होगी। यदि उन्होंने वहाँ साबित कर दिया कि वे भारतीय नागरिक ही हैं, तब उनका नाम एनआरसी में जोड़ दिया जाएगा। भारत सरकार द्वारा दो तीन मौके दिए जाने के बाद यही रास्ता बचेगा। 

अपने राजनीतिक हित के लिए समस्याओं को जारी रखना कॉन्ग्रेस का पुराना रवैया रहा है। 2017-18 में एनआरसी की ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद कॉन्ग्रेस असम में रहने वाले अवैध प्रवासियों के हक़ में आवाज़ उठाने लगी, कानूनी प्रक्रिया से इनकार करने लगी और यहाँ तक कहने लगी कि भाजपा से ज़्यादा काम हमने किया है। ख़ैर कॉन्ग्रेस की इसी नीति ने उसे देश में नकारा है और यदि आगे भी यही स्थिति रही तो कॉन्ग्रेस मुक्त भारत होना पक्का है। 

VIDEO: जब पाकिस्तानी एंकर ने Apple कंपनी को समझ लिया सेब, सोशल मीडिया पर हुई ट्रोल, खूब उड़ा मजाक

पाकिस्तानी न्यूज चैनल की एक महिला एंकर लाइव शो के दौरान एक ऐसी गलती कर बैठी, जिससे वो ट्विटर पर ट्रोल हो गई। दरअसल, यह महिला एंकर शो के दौरान कन्फ्यूज हो गई और Apple कंपनी को सेब (फल) समझ बैठी। इसके बाद इस प्रोग्राम का ये फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और एंकर का सोशल मीडिया पर जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। लोग इस पर तरह-तरह की मीम्स बनाकर एंकर और पाकिस्तान की खिंचाई कर रहे हैं।

बता दें कि, न्यूज चैनल पर बिजनस से जुड़ा कार्यक्रम चल रहा था। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर चर्चा चल रही थी। इस दौरान पैनलिस्ट एंकर को बताते हैं कि अमेरिकी मल्टीनैशनल कंपनी ऐपल के कारोबार की बात करें, तो वह पाकिस्तान के पूरे बजट से कहीं ज्यादा है। इसी बीच एंकर उन्हें टोकते हुए कहती हैं, “हाँ, मैंने भी सुना है कि सेब की कई किस्में होती हैं और अच्छा कारोबार कर रही हैं।” एंकर की इस बात से पैनलिस्ट हैरान रह जाते हैं और वो उन्हें करेक्ट करते हुए कहते हैं कि वो एप्पल मोबाइल कंपनी के बारे में बात कर रहे हैं, न कि खाने वाले फल सेब के बारे में। ये सुनते ही एंकर की शक्ल उतर गई और वो बेहद शर्मिंदा हो गईं।

पाकिस्तान की एक पत्रकार नायला इनायत ने अपने ट्विटर हैंडल से इस कार्यक्रम का एक वीडियो क्लिप शेयर किया। ट्विटर पर यह वीडियो शेयर होते ही यूजर्स ने इसे हाथों हाथ लिया और जमकर मजाक उड़ाया। लोगों ने कमेंट करते हुए कहा कि कहा कि ये न्यूज चैनल है या कॉमेडी शो। एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि इसलिए कहते हैं रोजाना एक सेब आपको डॉक्टर से दूर रखता है, लेकिन ये नहीं कहा कि सेब आपको मनोचिकित्सक से भी दूर रखता है। वहीं, सिद्धार्थ नाम के यूजर ने लिखा कि उस आदमी को सलाम जो महिला एंकर की सेब वाली बात सुनकर भी धैर्य के साथ कुर्सी पर बैठा रहा और हँसा नहीं।

‘जय श्री राम’ और ‘रामनवमी’ से पूरी तरह अनजान है ‘महान’ अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन

लोकसभा चुनाव के दौरान बंगाल में ‘जय श्री राम’ के नारे को लेकर चल रहा बवाल फिलहाल थमता हुआ नजर नहीं आ रहा। बंगाल में जय श्री राम के नारे को लेकर टीएमसी और भाजपा आमने-सामने हैं। अब इस विवाद पर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। 

अमर्त्य सेन ने कहा है कि ‘जय श्री राम’ के नारे का बंगाली संस्कृति से कोई संबंध नहीं है। सेन ने कहा कि ‘माँ दुर्गा’ के जयकारे की तरह ‘जय श्री राम’ का नारा बंगाली संस्कृति से जुड़ा हुआ नहीं है। उनका कहना है कि उन्होंने पहले कभी जय श्री राम का नारा नहीं सुना। अब इसका इस्तेमाल लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। सेन के अनुसार, जय श्री राम का बंगाली संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।

अमर्त्य सेन ने ये बात शुक्रवार (जुलाई 5, 2019) को जादवपुर विश्वविद्यालय में कही। उन्होंने कहा कि आज कल राम नवमी काफी लोकप्रिय हो रही है, मगर उन्होंने पहले कभी इसके बारे में नहीं सुना। उनका कहना है कि ‘माँ दुर्गा’ बंगालियों के जीवन में सर्वव्याप्त हैं और अब बंगाल में जय श्री राम का इस्तेमाल लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। साथ ही सेन ने कहा कि उन्होंने अपनी चार साल की पोती से पूछा कि आपका पसंदीदा भगवान कौन है, तो उसने जवाब देते हुए कहा कि ‘माँ दुर्गा’ उसकी पसंदीदा देवी हैं। सेन का कहना है कि रामनवमी के साथ माँ दुर्गा के महत्त्व की तुलना नहीं की जा सकती।

अमर्त्य सेन के इस बयान पर अब पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि शायद अमर्त्य सेन बंगाल को नहीं जानते हैं। क्या वो बंगाल और भारतीय संस्कृति के बारे में जानते हैं? जय श्री राम का नारा अधिकतर जगहों पर लगाया जाता है और अब पूरा बंगाल इसे कह रहा है।

गौरतलब है कि, जय श्री राम बीते लोकसभा चुनाव से ही बंगाल में चर्चा में बना हुआ है। आम लोगों से ज्यादा यह नारा सियासी गलियारों में गूँजता दिखाई दे रहा है। बंगाल में जय श्री राम का नारा भाजपा की पहचान का पर्याय बन गया है और इस नारे को लगाने वाले की पहचान भारतीय जनता पार्टी के समर्थक के तौर पर होने लगी है। ऐसा देखा गया है कि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्री राम के नारे से काफी चिढ़ती हैं और जय श्री राम बोलने पर वो लोगों को जेल भी भिजवा चुकी हैं।

PM मोदी Varanasi लाइव: पूर्व PM शास्त्री की प्रतिमा का अनावरण, 22 लाख पौधारोपण का लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी पहुँच गए हैं। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें पुस्तक भेंट करके उनका स्वागत किया। केंद्रीय मंत्री महेंद्रनाथ पांडे भी इस दौरान मौजूद रहे। इसके बाद पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा का अनावरण किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में पौधारोपण अभियान की शुरुआत की। इस अभियान के तहत 22 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है। प्रधानमंत्री मोदी बनारस आए थे एक भले आगंतुक की तरह, लेकिन अब यहाँ की गलियों में उनकी आत्मा निवास करती है। अपनी बनारस यात्रा में वो हर बार एक नई बस्ती से परिचय कराते हैं। इसके अलावा वो कई बार BHU भी जा चुके हैं। स्वतंत्रता भवन में भाषण भी दे चुके हैं।

अपने दौरे से पहले पीएम मोदी ने ट्वीट करके बताया था कि वो भाजपा का देशव्यापी सदस्यता अभियान शुरू करेंगे। यह अभियान समाज के सभी वर्ग के लोगों को भाजपा परिवार से जोड़ेगा। यह हमारी पार्टी को मज़बूत करेगा।

ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए उन्होंने लिखा, “महान शिक्षाविद् और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।” इसके अलावा उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि वो इस अभियान में काशी में शामिल रहेंगे। 

अपने वाराणसी दौरे में प्रधानमंत्री मोदी बड़ा लालपुर में दीनदयाल उपाध्याय व्यापार सुविधा केंद्र में लगभग 5,000 पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। इस अवसर पर वो सदस्यता अभियान शुरू करेंगे, साथ ही कुछ कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी करेंगे।

अपने पिछले कार्यकाल के दौरान पीए मोदी ने गंगा घाट में फावड़ा चलाकर अपने ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की थी।