Home Blog Page 5710

बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद एयरस्पेस बंद करने के कारण कंगाल PAK को हुआ ₹688 करोड़ का नुकसान

बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान ने अपना एयरस्पेस बंद किया हुआ है, जिसके कारण पिछले दिनों भारतीय एयरलाइंस के साथ विदेश में रहने वाले भारतीय छात्रों को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये नुकसान सिर्फ़ भारतीय छात्रों और भारतीय एयरलाइंस को ही हुआ हो, क्योंकि इस कदम को उठाने से पाकिस्तान को भी करोड़ों की चपत लगी है।

मीडिया खबरों के अनुसार पाकिस्तान को अपना एयरस्पेस बंद करने के कारण फरवरी से अब तक लगभग ₹688 करोड़ का नुकसान हुआ है। पहले से ही आर्थिक कंगाली का सामना कर रहे पाकिस्तान को यह नुकसान कुछ ज़्यादा ही भारी पड़ा है। इस कदम को उठाने से पाकिस्तान की जो कमाई एयरस्पेस से होती थी वो रुक गई है। साथ ही रोजाना करीब 400 विमान पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। पाकिस्तान ने 26 फरवरी को बालाकोट स्ट्राइक के बाद 11 में से केवल 2 एयरस्पेस खोले हुए हैं, जो कि दोनों दक्षिणी पाकिस्तान में आते हैं।

हालाँकि, पाकिस्तान के फैसले से भारत एयरलाइंस को भी काफ़ी नुकसान झेलना पड़ रहा है। खबरों के मुताबिक फरवरी से अब तक एयरलाइंस को ₹549 करोड़ का घाटा हुआ है, जिसमें एयरइंडिया को अकेले ₹491 करोड़ का घाटा झेलना पड़ा है। पहले खबरे थीं पाकिस्तान अपने हवाई क्षेत्र भारत के विमानों की आवाजाही के लिए 28 जून तक बंद रहेगा, लेकिन जुलाई आने के बाद भी अभी इसके खुलने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही है, जिससे घाटे के आँकड़े में और बढ़ौतरी मुमकिन है।

एयरस्पेस से किस तरह होती है कमाई?

बता दें किसी भी देश का एयरस्पेस इस्तेमाल करने के लिए एयरलाइंस कंपनियों को उस देश के सिविल एवियेशन एडमिनिस्ट्रेशन को पैसे चुकाने पड़ते हैं। ये रकम इस बात पर निर्भर करती है कि एयरक्राफ्ट किस टाइप का है और उससे कितनी दूरी कवर की जा रही है या फिर एयरक्राफ्ट का वजन कितना है।

अलग-अलग देशों में एयरस्पेस का चार्ज अलग-अलग होता है, जैसे कनाडा में एयरक्राफ्ट के वजन और ट्रैवल की दूरी के आधार पर चार्ज तय किया जाता है जबकि अमेरिका में सिर्फ़ ट्रैवल की दूरी के आधार पर चार्ज लिया जाता है। भारत में यही चार्ज ओवरलिफ्ट और लैंडिंग चार्ज डीजीसीए तय करता है, जिसके कारण हमारे देश में स्थानीय उड़ानों को अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।

हुसैन अली ने उपचार के नाम पर किया 2 लड़कियों का बलात्कार, महिलाओं ने गुस्से में मार डाला

असम के पश्चिम करबी अंगलोंग जिले में गुरुवार (जून 4, 209) को 2 बलात्कारों के आरोपित हुसैन अली को गाँव की महिलाओं ने गुस्से में घेरकर मार डाला। जिसकी जानकारी पुलिस ने शुक्रवार (जून 5, 2019 ) यानी कल दी।

जानकारी के अनुसार, हुसैन नाम का व्यक्ति 1 जुलाई को गाँव में पारंपरिक उपचार के नाम पर एक अंधी महिला की आँख ठीक करने उसके घर आया था, जहाँ आकर उसने पहले कुछ रिचुअल किए और फिर ‘बाद में’ आने को कहकर वहाँ से चला गया।

जिले के एसपी मृणाल तालुकदार के मुताबिक 3 जुलाई को हुसैन दोबारा उसी घर में आया, जहाँ उसने पहले कुछ रिचुअल किए और फिर महिला की 22 वर्षीय बेटी को ये कहकर अलग कमरे में ले गया कि उसे कुछ और उपचार करने हैं जिनसे उसकी माँ की आँखों का अंधापन दूर हो जाएगा।

कमरे में ले जाकर हुसैन ने लड़की को नशीला पदार्थ सुँघाया और बेहोशी की हालत में उससे रेप करके वहाँ से चला गया। इसके बाद अगले दिन वो फिर आया और पीड़िता की 16 साल की एक रिश्तेदार के साथ भी बिलकुल उसी प्रकार बलात्कार किया जैसे एक दिन पहले 22 वर्षीय पीड़िता के साथ किया था।

https://platform.twitter.com/widgets.js

हुसैन अली की इस घिनौनी हरकत का पता चलते ही इलाके की गुस्साई भीड़ (जिसमें ज्यादातर महिलाएँ थीं) का गुस्सा उस पर टूट पड़ा और उन्होंने उसे जमकर पीटा। इतना पीटा कि लगभग अधमरा कर दिया। असम ट्रिब्यूनल की खबर के अनुसार हुसैन अली को इस पिटाई में गंभीर चोटें आईं, जिसके कारण उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन गहरी चोट लगाने के कारण हुसैन ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

प्रिय अमर्त्य सेन जी, मजहबी नारा पढ़कर हत्या करने वालों पर आपके नोबल विचारों का सबको इंतजार है

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से अमर्त्य सेन अमूमन वाहियात बातें बोलने के लिए ही चर्चा में आते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर इन्होंने जो-जो कांड किए, उसके लिए भी इन्हें याद किया जाता है। लेकिन जब-जब लोग इनके विचित्र बयानों को भूलने लगते हैं, इनका नया बयान तुरंत आ जाता है।

हाल ही में उन्होंने बताया कि ‘जय श्री राम’ के नारे का बंगाल से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि उनकी चार साल की पोती की फ़ेवरेट देवी तो दुर्गा हैं। अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा बंगाल और भारत से अलग बिताने के कारण, सेन साहब शायद भूल रहे हैं कि बंगाल में देवी दुर्गा की पूजा की शुरुआत भी तब से हुई जब से कृत्तिवासी रामायण में राम की शक्तिपूजा का संदर्भ आता है। वही रामायण और रचनाकार जिनसे वो व्यक्ति (टैगोर) भी प्रभावित थे जिन्होंने अमर्त्य सेन को उनका नाम दिया था। कृत्तिवासी ओझा ने बाल्मीकि रामायण का बंगाली अनुवाद किया था और तुलसीदास तक उनकी कृति से प्रभावित थे। यही बकवास प्रीतिश नंदी ने भी की थी तब बंगाल में राम के महत्व और ऐतिहासिकता पर एक लेख हमने लिखा था, जो कि यहाँ पढ़ा जा सकता है।

आजकल लिबरल गिरोह, जिसके सेन साहब एक जानेमाने हस्ताक्षर हैं, ‘जय श्री राम’ के नारे से समस्या पाले बैठा है। कुछ दिनों पहले इसी नारे के फ़ालतू नैरेटिव के नाम पर कि ‘गली में एक समुदाय विशेष के शख्स को ‘जय श्री राम’ न बोलने पर हिन्दुओं ने मार डाला’, इस्लामी भीड़ इकट्ठा की गई और दुर्गा का मंदिर तोड़ दिया गया। ये वही दुर्गा हैं जो सेन साहब की पोती की फ़ेवरेट देवी हैं। अमर्त्य सेन ने इस पर कुछ बयान नहीं दिया क्योंकि ये उन्हें सूट नहीं करता होगा।

अमर्त्य सेन यह भूल जाते हैं कि ‘जय श्री राम’ का नारा भले ही किसी की जान न ले रहा हो, लेकिन उनके गिरोह के सदस्यों द्वारा इस नैरेटिव की हवाबाज़ी के कारण भीड़ इकट्ठा हो रही है, मंदिर तोड़ रही है, पुलिस के ऊपर हमला बोल रही है। कल ही सूरत में इसी नैरेटिव के दम पर, बिना प्राशसनिक अनुमति के समुदाय विशेष की एक भीड़ निकली और पुलिस पर हमला किया। पाँच पुलिसकर्मी घायल हुए, उनकी गाड़ियों में आग लगा दिया गया। अब अमर्त्य सेन ही बता दें कि इसको जलाते वक्त, पुलिस पर पत्थरबाज़ी के वक्त कौन सा नारा लगाया जा रहा होगा। उनको बोलने में परेशानी होगी क्योंकि वो नारा ‘जय श्री राम’ का तो बिलकुल नहीं था।

सेन साहब आप डेमोनाइज करते रहिए एक नारे को क्योंकि ये आपके गैंग के नैरेटिव को सूट करता है। लेकिन आप यह मत भूलिए कि आप जो कर रहे हैं वो बहुत घातक है। आप एक आग लगा रहे हैं फर्जी बातें फैला कर। आपके जैसे लोगों ने भीड़ों के हाथ में आहत होकर लड़ने का हथियार दे दिया है जो चंद मिनटों में कहीं भी इकट्ठा हो रही है और मंदिर तोड़ने से लेकर किसी की जान तक लेने को उतारू हो जाती है। दंगाइयों को अपनी हवाबाज़ी के माध्यम से लेजिटिमेसी मत दीजिए।

जब आप छींकते भी हैं तो वो महज आप नहीं छींकते, बल्कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित आदमी छींकता है। इसलिए जब आप कुछ भी कहते हैं तो उस पुरस्कार का लिहाज तो कीजिए। आपने कहा कि आपके विचार से, राम का बंगाल की संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। आपने कहा है, और भले ही आपको समाज शास्त्र, इतिहास या इंडोलॉजी के लिए नोबेल नहीं मिला है लेकिन आम जनता तो यही मानेगी कि सेन साहब ने कहा है तो सच ही कह रहे होंगे, पढ़े-लिखे आदमी हैं।

आज कल पढ़े-लिखे लोग आम जनता की इसी अनभिज्ञता का फायदा उठा कर अपनी धूर्तता से तथ्यों को अपने हिसाब से, ‘मेरे विचार से’ कह कर मोड़ लेते हैं। शोध के छात्र और अब प्रोफेसर बने सेन साहब को ये तो मालूम होगा कि किसी भी चीज को ‘सामान्यीकृत’ करने से पहले उस हिसाब से साक्ष्य या आँकड़े भी तो होने चाहिए। आपने दस ख़बरें सुनी या फिर आपके गैंग के लोगों ने जितनी बार ट्वीट किया, आपको लगा कि हर बार अलग घटना के बारे में कहा जा रहा है, और आप उसे ही आधार बना कर यह कह दिया कि आजकल इसका प्रयोग तो लोगों को पीटने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल होता है। ये ‘आजकल’ वाली बारम्बारता की दर कितनी है सेन साहब? उसमें भी पता चलता है कि दोनों एक मजहब वाले लोग ही एक दूसरे को वीडियो बनाने के लिए ‘जय श्री राम’ बुलवाते हैं ताकि आपके जैसों की दुकान चलती रहे।

अमर्त्य सेन साहब ने आगे कहा कि आजकल कोलकाता में रामनवमी ज्यादा मनाया जाता है जो उन्हें पहले देखने को नहीं मिलता था। सही बात है। आजकल जो हो रहा है, वो गलत क्यों है, कैसे है? दुर्गापूजा भी बंगाल में आदमी के बसते ही शुरु नहीं हुई थी। वो भी एक रामभक्त ने ही शुरु की थी। उसी तरह रामनवमी भी अगर पहले नहीं होती थी, जो कि स्वयं में एक झूठ है, तो अब होने में क्या समस्या है? ‘जय श्री राम’ बोल कर कोई देह में बम बाँध कर फट तो नहीं रहा। अगर एक त्योहार शुरु हो रहा है तो आपके पेट में मरोड़ें क्यों उठ रही हैं? आप ‘समय’ तो हैं नहीं कि आपके पैदा होने के साथ जो था वही सही और शाश्वत है, और बुढ़ापे में जो दिख रहा है वो ब्लासफेमी हो जाएगा!

सेन साहब नारा तो एक और है जिससे भारत नहीं पूरा विश्व परेशान है। वो नारा ‘जय श्री राम’ का नहीं है। आप दिमाग पर ज़ोर डालिएगा तो भी आपको याद नहीं आएगा क्योंकि वो आपके सिस्टम में है ही नहीं। वो आपने फ़ायरवाल से रोक रखा है। वो नारा न तो आपको सुनाई देता है, न ही उसके नाम पर होने वाली घटनाओं की खबर आप तक पहुँचती है, न ही आप उसे सुनना चाहते हैं।

वो नारा है ‘अल्लाहु अकबर’ का। इस नारे को चिल्लाती भीड़ मंदिर तोड़ती है, मॉब लिंचिंग करती है। इसे बुलंद आवाज में बोलते हुए बम धमाके किए जाते हैं, आत्मघाती विस्फोट होते हैं। इस नारे को चिल्लाते हुए हिंसा करने वाले पूरे विश्व के लिए एक कैंसर बन चुके हैं। यूरोप का हर बड़ा शहर इनके आतंकी दस्तखत से दहल चुका है। भारत के एक बड़े हिस्से में इसका आतंक बरक़रार है। अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक इस नारे से लड़ रहा है क्योंकि लोन वुल्फ़ हमले से लेकर सुसाइड बॉम्बिंग तक आम हो गई है।

लेकिन आपकी मति यहाँ भ्रष्ट हो जाती है। आपकी औकात नहीं है किसी भी पब्लिक स्टेज पर यह बोलने की कि ‘मजहबी नारे’ का प्रयोग आतंकी हमलों के लिए किया जाता है। एक तरफ हजारों लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार एक नारा है, दूसरी तरफ आपके पास बस इतना है कहने को कि आजकल इस नारे का प्रयोग लोगों को पीटने के लिए किया जा रहा है। पीटने के लिए उपयोग किए गए नारे में और काले झंडे पर लिख कर, अपने आत्मघाती हमले या टेरर अटैक के पहले लिखे पोस्ट या वीडियो में बोले जाने वाले नारे में ‘पीटने’ और ‘कई लोगों की जान ले लेने’ जितना का अंतर है।

आप तो ज्ञानी आदमी हैं। आपके लिए किसी को पीटना ज्यादा दुखदायी है, जान ले लेना तो दुखों का अंत करना है। एक ही दिल है सेन साहब, कितना जहर उसमें लेकर घूम रहे हो!

अनुमानों, फैंसी कल्पना पर आधारित राणा अय्यूब की ‘गुजरात फाइल्स’ को SC ने बताया बकवास

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (जुलाई 5, 2019) को हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए हरेन पांड्या हत्या मामले में मोहम्मद असगर अली समेत 11 आरोपितों को दोषी ठहराया है। जिसमें 7 आरोपितों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2003 के हरेन पांड्या हत्याकांड के सभी 12 आरोपितों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। आरोपितों के समर्थन में हरेन पंड्या मामले की नए सिरे से जाँच करने की माँग करने वाली एक याचिका में विवादास्पद पत्रकार राणा अय्यूब की पुस्तक का इस्तेमाल किया गया था, जिसे खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसकी कोई उपयोगिता नहीं है।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील की थी, और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ ने अपील को स्वीकार कर लिया। अपील के साथ, शीर्ष अदालत ने सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर की गई याचिका पर भी सुनावई की। एक लीगल एनजीओ ने हरेन पंड्या की हत्या की नए सिरे से जाँच करने की माँग की थी, जिसके आधार पर उच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया था।

उच्च न्यायालय के आदेश को पलटने के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें मामले की नए सिरे से जाँच की माँग की गई थी। शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने अपने मामले के समर्थन में विवादित पत्रकार राणा अय्यूब द्वारा लिखित पुस्तक गुजरात फाइल्स – एनाटॉमी ऑफ ए कवरअप’ प्रस्तुत की थी। इस पुस्तक और विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित कुछ अन्य लेखों के आधार पर, वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने तर्क दिया था कि यह आगे की जाँच के लिए एक उपयुक्त केस है।

हरेन पांड्या केस में सुप्रीम कोर्ट का आदेश

मगर, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में कोई योग्यता नहीं पाई। पीठ ने कहा कि राणा अय्यूब की पुस्तक कोई उपयोगिता नहीं है। यह पुस्तक अनुमानों, अटकलों और कल्पना पर आधारित है। जाहिर तौर पर इसका कोई महत्त्व नहीं है। अदालत ने कहा कि राणा अय्यूब ने अपनी पुस्तक में जो तर्क दिए हैं, वो उनके विचार हैं और किसी व्यक्ति के विचार या राय सबूतों के दायरे में नहीं आते।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके राजनीतिक रूप से प्रेरित होने की प्रबल संभावना है, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गुजरात में गोधरा कांड के बाद जिस तरह से चीजें घटित हुई हैं, उसके बाद इस तरह के आरोप और प्रतिवाद असामान्य नहीं हैं और कई बार इसे उठाने का प्रयास किया गया। हालाँकि, बाद में इसकी पुष्टि नहीं होती है। अदालत ने केस का निर्णय सुनाते हुए कहा कि याचिकर्चाओं द्वारा राणा अय्यूब की पुस्तक समेत प्रस्तुत की गई सामग्री के आधार पर कोई केस नहीं बनता है। कोर्ट ने कहा कि राणा अय्यूब की पुस्तक का कोई महत्त्व नहीं है। याचिका को खारिज करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

वैसे ये पहली बार नहीं है, जब राणा अय्यूब द्वारा गुजरात पर लिखी गई पुस्तक की तथ्यों के आधार पर न होने की आलोचना की गई है। यहाँ तक कि भाजपा विरोधी प्रोपेगेंडा साइट तहलका ने भी इस कहानी को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था। तहलका की संपादक सोमा चौधरी ने राजनीतिक दबाव के कारण राणा की कहानी प्रकाशित नहीं होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उनकी कहानी इसलिए प्रकाशित नहीं हुई थी, क्योंकि वो प्रकाशन के संपादकीय मानकों को पूरा नहीं करता था।

मजहब-ए-इस्लाम का मजाक बनाने वाली नुसरत इस्लाम से खारिज, बरेलवी मसलक ने जारी किया फतवा

इस्लाम को छोड़कर दूसरे धर्म में शादी करने के कारण नुसरत जहां लगातार इस्लामिक कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार हो रही हैं। बंगाली अभिनेत्री और टीएमसी सांसद नुसरत जहां कोलकाता में इस्कॉन रथयात्रा के दौरान आरती को लेकर बरेलवी मसलक के उलेमा के निशान पर आ गई हैं। उलेमा ने नुसरत जहां के इस किरदार को सियासी रूप दिया है।

आरती करते हुए नुसरत जहां का वीडियो, फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही उलेमा ने अपनी प्रतिक्रिया दी हैं। उलेमा ने कहा है कि मजहब-ए-इस्लाम के दायरे को जो भी पार करता है वो इस्लाम से खारिज हो जाता है। नुसरत जहां ने ऐसी गुस्ताखी की है कि यदि वे फिर से इस्लाम धर्म में आना चाहेंगी तो उन्हें तौबा करनी होगी। उलेमा ने कहा कि ऐसे लोग सियासत के लिए मजहब को बदनाम करते हैं।

इस्कॉन रथयात्रा में शामिल होने के बाद हाल ही में व्यवसायी निखिल जैन से शादी रचाने वाली नुसरत ने अपने खिलाफ जारी कथित फतवे पर कहा था, “फालतू चीजों पर मैं ध्यान नहीं देती। मैं अपना धर्म जानती हूँ। मैं जन्‍म से मुस्लिम हूँ और आज भी मुस्लिम हूँ। यह आस्‍था का मामला है। इसे आपको अपने अंदर से महसूस करना होता है न कि अपने दिमाग से।” लेकिन शायद उलेमा को उनका यह बयान ख़ास पसंद नहीं आया है।

‘सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए किया मजहब को बदनाम’

देवबंद के बाद बरेलवी मसलक के उलेमा ने आरती करने पर एतराज जताया है। उलेमा ने कहा कि सियासत करने या सुर्खियों में छाए रहने के लिए मजहब को बदनाम किया जा रहा है। मुफ्ती मुहम्मद गुलाम रजवी ने कहा कि इस्लाम ने औरतों को उनके अधिकार दिए हैं। सियासत करना अलग है लेकिन गैर शरई काम करना इस्लाम के खिलाफ है। जो भी शख्स मजहब-ए-इस्लाम का दायरा पार करता है, वो खुद बे खुद इस्लाम से खारिज हो जाता है। नुसरत जहां ने भी ऐसा ही किया है। अगर उन्हें फिर से इस्लाम धर्म में आना है तो तौबा करनी होगी।

‘इस्लाम में आरती करना है मना’

मुफ्ती सय्यद कफील अहमद हाशमी ने नुसरत को लेकर कहा कि आरती करना इस्लाम में मना है। इस तरह के काम करना शरीयत के खिलाफ माना जाता है। सियासत के लिए मजहब को बदनाम करना ठीक नहीं है। शरीयत कानून में इसकी सख्त मनाही है। नुसरत जहां ने गैर शरई काम किया है। बरेलवी मसलक के उलेमा ने कहा कि गैर शरई काम करने वालों के लिए दरगाह आला हजरत से फतवा भी जारी हो चुका है। इस तरह के फतवे सभी पर लागू हो जाते हैं।

जब स्वघोषित लिबरलों के फ़र्ज़ी नैरेटिव ने हत्याएँ करवाई, मंदिर तुड़वाए, दंगे भड़काए

श्री अमिताभ बच्चन जी का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसमें वो जुम्मे के दिन चुम्मा देने के लिए नायिका को याद दिलाते हैं। ये बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है और जुम्मे को हमेशा के लिए भारतीय जनमानस के भीतर चुम्मे के साथ लॉक कर दिया श्री बच्चन ने। लेकिन कालांतर में जब से लिबरलों के हाथ ट्विटर नामक उस्तरा लगा है, इन लोगों ने जुम्मे के दिन को भारत के अलग-अलग जगहों में हिंसा करने के लिए फर्जी नैरेटिव का अतिप्रज्जवलनशील इंधन देकर भीड़ों को उकसाया है।

चाँदनी चौक इलाके में, हौज काजी नामक जगह है जहाँ हाल ही में दुर्गा मंदिर को तोड़ा गया, मूर्तियाँ उखाड़ी गईं, और कुछ लोगों के अनुसार मूर्ति पर पेशाब भी किया गया। ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगे और भीड़ ने इन्हीं लिबरलों की फर्जी कहानीकारी को सत्य मान कर मंदिर तबाह कर दिया। बाद में इन्हीं रक्तपिपासु लिबरपंथियों ने यह नैरेटिव बनाया कि वो विवाद तो पार्किंग का था, साम्प्रदायिक नहीं।

स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल ने जब लोगों से बातचीत की तो एक जाहिद नाम के व्यक्ति ने जो बात कही वो साबित करती है कि इन लिबरपंथियों ने कितनी जानें कट्टरपंथियों को उकसा कर ले ली हैं। जाहिद ने कहा, “पूरे देश में मुस्लिमों की हर जगह भीड़ हत्या हो रही है और हमारा समुदाय ऐसे ही चुप नहीं बैठेगा।” ये जो मंदिर टूटा, उसके लिए जो भीड़ इकट्ठी हुई, वो किसी पार्किंग विवाद के नाम पर नहीं आई थी, उस गली में यह बात फैलाई गई कि एक मुस्लिम को मार दिया गया है क्योंकि उसने ‘जय श्री राम’ नहीं बोला।

ये शक्ति है नैरेटिव की। जिस प्रभाव की बात करते यह गिरोह और पत्रकारिता का समुदाय विशेष थकता नहीं है कि गौरक्षकों द्वारा छिट-पुट हिंसा की घटनाएँ इसलिए हो रही हैं क्योंकि इन अपराधियों को लगता है कि पावर में उनका अपना आदमी है। अगर यह बात सच भी मान ली जाए, तो क्या यही कपटी विचारक समाज को यह बताएँगे कि उनके द्वारा हर झूठ को, रैंडम अफवाहों को, छिट-पुट आपराधिक घटनाओं को मोमो के स्टॉलों की तरह हर नुक्कड़ पर होता हुआ बता देना क्या हिन्दुओं की हत्या नहीं करवा रहा? क्या ये धूर्त पत्रकार और लिबरल गिरोह हिन्दुओं की भीड़ हत्या का रक्त अपने हाथों पर लेगा या फिर ‘लहू मुँह लग गया’ गा कर एन्ज्वॉय करेगा?

जय श्री राम न कहने पर युवक की पिटाई‘ की खबरें खूब उछाली जा रही हैं। और जैसे-जैसे इन खबरों को ये गिरोह हवा देकर, साम्प्रदायिकता के मामले में संवेदनशील होने का दावा करते हुए शेयर करता है, इन दोगले विचारकों का लक्ष्य संवेदना नहीं, हिंसा होती है कि कहीं कोई ‘शांतिप्रिय’ जुम्मे की नमाज के बाद भीड़ बना कर निकले और किसी पर हमला करे।

क्योंकि आंदोलन तो वही सफल कहे जाते हैं जब दलितों की एक भीड़ इस अफवाह पर इकट्ठा होती है कि मोदी आरक्षण हटा रहा है और आगजनी, हिंसा और तोड़फोड़ के साथ 8 लोग मार दिए जाते हैं। वैसे ही इस नैरेटिव के बल पर सत्ता से दूर बैठा पत्रकार और पद्म पुरस्कारों को अपनी बपौती मानने वाले गैंग के सदस्य, चाहते हैं कि खूब साम्प्रदायिक माहौल हो, तनाव फैले और फिर यही लोग ट्विटर पर भारत की कानून व्यवस्था पर लेक्चर दें।

आप इन चम्पकों की कार्यशैली पर ध्यान दीजिए। एक सामाजिक अपराध कहीं हुआ, ये गिरोह सक्रिय हो जाता है। सबसे पहले यह गिरोह सूक्ष्मदर्शी से देखता है कि शिकार कौन है। अगर मतलब का शिकार, यानी मजहब विशेष से या दलित नहीं है, तो ये गालिब की शायरी से लेकर समुद्र के सामने डूबते सूरज की लालिमा पर कविता से लेकर पाउट वाली सेल्फी और बारिश की बूँदों पर कविताएँ करने लगता है।

अगर शिकार कथित अल्पसंख्यक या दलित है, तो अपराधी के नाम में पहचान ढूँढी जाती है। समुदाय विशेष वाले ने आने ही समुदाय के शख्स को मारा, तो ये मुन्नी बेगम की ग़ज़लें गाने लगते हैं। दलित ने दलित को मारा, तो ये भारतीय नारी किस-किस से, कितनी बार, और कब-कब सेक्स करे, इस चर्चा में लीन हो जाते हैं। अगर मरने वाले का नाम पता हो, लेकिन मारने वाले का नहीं, तो आँख मूँद कर आरएसएस से लेकर मोदी तक को इसकी जिम्मेदारी दे दी जाती है और इन विचारधाराओं के समर्थक इसी में व्यस्त हो जाते हैं कि ‘नहीं, हमने नहीं किया।’ ऐसा इतनी बार हुआ है कि हमें हालिया घटनाओं की लिस्ट बनानी पड़ी, जहाँ हिन्दुओं को हेट क्राइम का भागीदार बना दिया गया, जबकि मसला कुछ और ही था।

उसके बाद आता है वो मसला जब अपराधी सवर्ण हो, हिन्दू हो। ऐसे अपराधों का धर्म या मजहब से कोई मतलब न भी हो, तो भी अपराधी के किसी खास धर्म से होने के कारण ही उसे मजहबी घृणा के अपराध या हेट क्राइम के रूप में दिखाने के लिए ट्वीट पर ट्वीट, लेख पर लेख, और पोस्ट पर पोस्ट इस तरह से किए जाते हैं जैसे दिल्ली के प्रॉप्रटी डीलर ‘रूम ही रूम’ और ‘फ्लोर ही फ्लोर’ का दावा करते रहते हैं। फिर इनका गिरोह संगठित रूप से बताता है कि भारत का शांतिप्रिय डरा हुआ है और उस पर बहुसंख्यक अत्याचार कर रहे हैं।

जुम्मे की नमाज के बाद, झारखंड में कथित तौर पर चोरी करते पकड़े जाने पर तबरेज की भीड़ हत्या के विरोध में सूरत में इस्लामी भीड़ जमा हो जाती है, जिसे प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। ये भीड़ इसी कथित मॉब लिंचिंग को परम सत्य मान कर पुलिस पर पत्थर फेंकती है, दंगा करती है, उत्पात मचाती है और पाँच पुलिस वालों को घायल करने के साथ आगजनी से वाहनों को नुकसान पहुँचाती है।

मजहब विशेष के दो लड़के, आपस में ही ‘जय श्री राम’ बुलवाने का विडियो बना लेते हैं, और फिर लिबरलों को चरमसुख की सामग्री मिल जाती है। वो ‘आह अल्पसंख्यक, हाय अल्पसंख्यक’ करते हुए बताने लगते हैं कि एक धार्मिक नारे को हथियार बनाया जा रहा है, और देश का शांतिप्रिय डरा हुआ है। अरे भाई, शांतिप्रिय क्या खाक डरेगा! पचास घटनाएँ तो 2016 के बाद से दिन और समय के साथ गिना दूँगा, जहाँ इनके तथाकथित मजहबी उसूलों ने लोगों की जानें ले लीं, दंगे करवाए, हिंसा की और समाज में खौफ का माहौल बनाया।

‘डर का माहौल’ जानना है आपको? कैराना याद है? मेरठ के प्रह्लादनगर की दीवारें देखी हैं? कश्मीर याद है? ‘डर का माहौल’ यह है कि हिन्दू अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेज पाता क्योंकि समुदाय विशेष के इलाके में उस बच्ची पर फब्तियाँ कसी जाती हैं। लोग अपने दीवारों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर क्यों जा रहे हैं? वो क्या प्रेम का माहौल है कि जुम्मे को आकर कोई चुम्मा दे जाएगा?

ये लिबरल गिरोह ‘डर का माहौल‘ बोल कर जस्टिफाई करता है। ये बताता है कि अगर कट्टरपंथी बम बाँध कर खुद को उड़ा न दे तो बेचारा क्या करे! ये बताता है कि फलाँ आतंकी का बाप हेडमास्टर था! ये बताता है कि अहमद डार को सेना के अफसर ने उठक-बैठक कराई थी, तो उसने आरडीएक्स से भरी गाड़ी पुलवामा में भिड़ा दी। ये लिबरल हैं हमारे देश के जो न सिर्फ मजहब विशेष के लोगों को भड़काते हैं, बल्कि ये सुनिश्चित करते हैं कि वो अपराध करने के बाद भी सजा न पाए। सजा पाए, तो उसे मानवीय बताने की कोशिश की जाती है।

असली अपराधी तो यही गिरोह है जो संवेदनशीलता की आड़ में दंगाई बना बैठा है। चाहे ‘जय श्री राम’ कहलवाने की घटनाएँ हों, या भीड़ हत्या, जिसका कारण मजहब न रहा हो, ये गिरोह उसमें मजहब डालता है, माहौल बनाता है, उकसाता है, और दंगे कराता है।

हम तो रिपोर्ट करते हैं कि फलाँ इलाके में ये घटना हो गई। जबकि वो घटना सच होती है, फिर भी यह कहा जाता है कि ऑपइंडिया घृणा बाँट रहा है। हम तो नैरेटिव नहीं बनाते, हम तो बस रिपोर्ट करते हैं कि फलाँ आदमी ने फलाँ अपराध किया। ये तो तथ्य हैं। लेकिन लोगों को इससे भी समस्या है कि हम खबरें ही क्यों करते हैं। तो क्या करें, ये बताएँ कि वो नमाज पढ़ रहा है और लोगों से तीन बार गले मिल रहा है? अगर वो एक बच्ची का रेप करेगा तो बिलकुल लिखा जाएगा कि फलाँ आदमी ने रेप किया। अगर मजहब विशेष गाय काटेगा ताकि हर्ष विहार में तनाव फैले, तो बिलकुल लिखा जाएगा कि इमरान ने गाय काटी

लेकिन ये गिरोह चाहता है कि ऐसी रिपोर्ट ही न की जाए। कठुआ वाले रेप पर ये जरूर कहो कि हिन्दुओं ने मंदिर में रेप किया, लेकिन गाजियाबाद में मौलवी मदरसे में रेप करे तो वहाँ ‘समुदाय विशेष’ लिखो, या बेहतर है कि रिपोर्ट ही न करो। क्यों? क्यों रिपोर्ट न करें? क्या हम इंतजार करें कि ये धूर्त लिबरल जो नैरेटिव चलाएगा तब हम भी तख्ती लेकर मोमबत्ती निकाल कर खड़े हो जाएँ?

ये दोगलापन नहीं चलेगा। तुम्हारे नैरेटिव से लोगों की जानें जा रही हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं, हिन्दुओं को काटा जा रहा है और तुम इस पर अश्लील हँसी हँसते हो। तुम्हारे नैरेटिव से दंगाई सड़कों पर घूमता है क्योंकि सरकारें इस हिंसक भीड़ को पुलिसिया प्रक्रिया से इसलिए मुक्त कर देती हैं ताकि इनका विश्वास जीत सके। हम समझते हैं ये प्रेशर टैक्टिक। हम समझते हैं तुम्हारी ओपिनियन मार्केटिंग। हम समझते हैं तुम्हारा दोगलापन।

यही कारण है कि तुम्हारी हर नैरेटिव पर मुखरता से, बिना लाग लपेट के, रॉ फॉर्म में रिपोर्टिंग की जाएगी। समुदाय विशेष के शब्दों के पीछे की बेहूदगी खत्म होगी और इस भीड़ को लिबरलों के प्रोटेक्शन से मुक्त किया जाएगा।

सत्ता से तो तुम दूर हो चुके हो लेकिन फकफकाना बंद नहीं हुआ है। इसलिए सस्ते इंटरनेट का सहारा लेकर, व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के माध्यम से गलत सूचनाओं के द्वारा, भीड़ों को उकसाना जब तक जारी रहेगा, हम तुम्हारी नग्नता लोगों को बताते रहेंगे।

तुम्हारे पिया मिलन की रात तो मोदी के दोबारा चुने जाने पर भी नहीं आ पाई, जब तुमने सोचा था कि मोदी आएगा तो हिन्दू सड़कों पर तलवार लिए दौड़ेंगे, दंगे होंगे। वैसा हुआ नहीं तो पाँच सालों तक तुमने खूब कोशिश की कि दंगें फैलें, गैरभाजपा शासित प्रदेशों में हुई हत्याओं का ठीकरा, दंगों का भार भी मोदी के सर पर फेंका, समुदाय विशेष को बताते रहे कि तुम्हारे समुदाय को सताया जा रहा है, मारा जा रहा है।

तुमने ये सब बस इसलिए किया और आज भी कर रहे हो ताकि एक भयंकर-सी आग फैले और किसी कोने में तुम्हारा पिया मिलन हो सके। वो पिया मिलन तो हो नहीं पा रहा, और तुम्हारे भीतर की फ्रस्ट्रेशन बढ़ती जा रही है। ये अभी और बढ़ेगा क्योंकि तुम्हारे एकाधिकार वाले क्षेत्र में और लोग भी आ गए हैं जिन्हें लिखना भी आता है, बोलना भी आता है, और समुदाय विशेष का खुलकर जिक्र करना भी आता है।

न्यूजलॉन्ड्री की बेशर्मी: दूसरे मजहब को पाक-साफ बताने के लिए हिन्दू युवक के अगवा होने की खबर पर उठाए सवाल

दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके के हौज काजी में 30 जून 2019 को जो कुछ हुआ उसने ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के घिनौने चेहरे को बेनकाब कर दिया। इस्लामी भीड़ ने हौज काजी के एक मंदिर में घुसकर न सिर्फ मूर्तियों को तोड़ा बल्कि कथित तौर पर मंदिर में पेशाब की। इस विवाद की शुरुआत पार्किंग को लेकर झगड़े से हुई। स्थानीय हिन्दुओं का कहना है कि जिस हिन्दू व्यक्ति के साथ पार्किंग को लेकर बहस हुई थी उसे पीटा गया और उसके घर की महिलाओं को बाहर खींचकर प्रताड़ित किया गया।

सांप्रदायिक तनाव के बीच एक 17 साल के हिन्दू लड़के के गायब होने की खबर दबा दी गई। घटना के तीन दिन बाद जब 2 जुलाई को मैं इस इलाके में पहुँची तो स्थानीय हिन्दू खौफजदा थे। एक कोने में गायब हुए लड़के की माँ एफआईआर के साथ बेटे का रस्ता ताक रही थी। लड़के के पिता बेटे के नहीं मिलने पर अपनी जान देने की बात कर रहे थे।

मुस्लिम बहुल आबादी से घिरी उस छोटी सी हिन्दू बस्ती के लोगों के साथ की गई ज्यादतियों का हमने ब्यौरा जुटाया और उस घटना को लेकर दुसरे समुदाय का पक्ष भी जाना।

हालॉंकि, लड़के के गायब होने की खबर को मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं दी गई। अब हिन्दुओं के खिलाफ होने वाली ज्या​दतियों की अनदेखी के लिए कुख्यात वेबसाइट न्यूजलॉन्ड्री ने एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इसे झूठा साबित करने की कोशिश की है। वेबसाइट की लेख का शीर्षक है, “मुस्लिम भीड़ द्वारा एक लड़के को अगवा करने की खबर फुस्स”। वीना नायर ने यह रिपोर्ट लिखी है। लेख में उन्होंने ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मकसद पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आखिरकार जब लाल कुँआ में हालात पूरी तरह सामान्य हो चुके थे तो लड़का कैसे ‘अगवा’ किया जा सकता है।


NewsLaundry headline

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपइंडिया ने लड़के के अगवा होने का दावा किया था और लड़के के घर लौटने के बाद उसके इस दावे की हवा निकल गई है। एक बेहद असंवेदनशील टिप्पणी में न्यूजलॉन्ड्री ने कहा है कि-

पहले यह साफ कर दूँ कि ऑपइंडिया ने अपनी तरफ से कुछ भी ‘दावा’ नहीं किया है। हमने एफआईआर के आधार पर केवल सूचनाएँ दी न कि उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।


FIR filed by Keshav’s parents

न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि उनका रिपोर्टर 3 जुलाई को हौज काजी गया था। सांप्रदायिक तनाव में हालात करीब-करीब हर घंटे बदलते रहते हैं। ऐसे में न्यूजलॉन्ड्री का यह दावा कि ऑपइंडिया ने लड़के के गायब होने की खबर तब की जब “सब कुछ नियंत्रण में था” बेवकूफाना है। दो जुलाई को जब मैं मौके पर थी, हिन्दुओं और समुदाय विशेष के बीच मार-पीट होते-होते बची थी। जब गायब लड़के का पिता अपना दर्द बता रहा तो वहाँ पर इकट्ठा होकर दुसरे समुदाय ने ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाने लगे। इसके जवाब में पहले से ही उत्तेजित और घबराए हिन्दुओं ने भी ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। लाल कुँआ की गली में वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध था और जगह-जगह बैरीकेड लगे थे। इलाके के बहुसंख्यक मजहब के समूहों में खड़े होकर हालात पर चर्चा के सिवा कोई और बात नहीं कर रहे थे। दूसरी ओर हिन्दू भी उस दुर्गा मंदिर में जिसमें तोड़-फोड़ की गई थी के सामने वाली गली में अपने तरीके से विरोध जता रहे थे।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि लड़का गायब था। केशव सक्सेना को सांप्रदायिक हिंसा के तीन दिन बाद तक भी उसके माँ-बाप ने नहीं देखा था। यह लड़का आखिरकार तीन तारीख की शाम को अपने घर पहुँचा, यानी तनाव के चौथे दिन। यदि हौज काजी में हालात सामान्य होने का न्यूजलॉन्ड्री का दावा सही भी है (जैसा है नहीं), तो भी क्या लड़के के गायब होने की खबर को अन्य मीडिया संस्थानों की तरह ऑपइंडिया को भी दबा देनी चाहिए थी?

न्यूजलॉन्ड्री के लेख का मुख्य मकसद हौज काजी की सच्चाई बयाँ करने वाले रिपोर्टों का माखौल उड़ाने के साथ-साथ लड़के के खुद गायब होने की कहानी को हवा देकर उसके माता-पिता के दुखों का बेशर्मी से मजाक उड़ाना भी है। रिपोर्ट में कहा गया है, “एफआईआर के अनुसार भीड़ ने मंदिर में तोड़-फोड़ की और रात के 11.30 बजे लड़के को “अगवा” कर लिया। पुलिस और चश्मदीदों के अनुसार मंदिर में तोड़-फोड़ आधी रात के बाद की गई। लड़के ने खुद कहा है कि वह सुबह के 10.30 बजे अपनी गली से बाहर गया था। किसी मीडिया संस्थान ने इन विसंगतियों पर गौर नहीं किया।”

ऐसे में हर किसी को उस हालात पर गौर करना चाहिए जिसमें एफआईआर दर्ज कराई गई। खून की प्यासी हिंसक इस्लामी भीड़, जिसने मंदिर में तोड़-फोड़ और कथित तौर पर मंदिर में पेशाब की, मूर्तियाँ तोड़ दी। स्थानीय हिन्दुओं का कहना है कि गली का मुख्य दरवाजा समय रहते बंद नहीं किया गया होता तो वे मारे गए होते। ऐसे हालात में एक 17 साल का लड़का गायब हो जाता है। अपने बच्चे के गायब होने का दावा करने वाले माता-पिता को झूठा और ऑपइंडिया जैसे पोर्टल तथ्यों की पड़ताल नहीं करते, यह साबित करने के लिए न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में एफआईआर में दर्ज समय की विसंगतियों का सहारा लिया गया है। ऐसा करके अपरोक्ष तौर पर यह कहने की कोशिश की गई है कि यदि ऑपइंडिया ने “तथ्यों” पर गौर किया होता तो लड़के के गायब होने की ​रिपोर्ट नहीं करता।

अब, यह तर्क दिया जा रहा है कि माँ-बाप को दिनभर केशव सक्सेना की खबर नहीं थी। इसलिए, सामुदायिक तनाव के दौरान जब उन्हें लगाा कि उनका बच्चा गायब है, वे उसके सकुशल होने को लेकर व्याकुल हो गए। एफआईआर में गायब होने का जो समय बताया गया है उससे उनकी यही चिंता झलकती है।

शायद, अपने बच्चे के गायब होने पर चिंतित और नाराज माँ की आड़ लेकर न्यूजलॉन्ड्री यह कहने की कोशिश कर रहा है कि बच्चे के गायब होने के मामले की रिपोर्टिंग होनी ही नहीं चाहिए थी।

जबकि, न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट खुद यह बताती है कि उस दिन समुदाय विशेष ने केशव सक्सेना की भी पिटाई की थी। जैसा कि ऑपइंडिया की रिपोर्ट भी बताती है कि लड़के ने बताया कि समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने उससे पूछा कि क्या वह दुर्गा मंदिर वाली गली में रहता है और क्या वह हिन्दू है। जब उसने हिन्दू होने की बात बताई तो उसे पीटा गया। न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख है कि पार्किंग विवाद के बाद जब भीड़ इकट्ठा होने लगी तो कुछ लड़कों ने (जो शायद मुस्लिम थे) केशव को पीटा। वह उसी वक्त भाग खड़ा हुआ।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में जो तथ्य पेश किए गए हैं वे भी बताते हैं कि लड़के का गायब होना हौज काजी में सांप्रदायिक तनाव से जुड़ा हुआ है। माँ ने जब एफआईआर दर्ज कराई तब उनका यह दावा कि सांप्रदायिक तनाव की वजह से उनका बेटा गायब हुआ है, गलत नहीं था। न्यूजलॉन्ड्री को खुद से यह पूछना चाहिए कि खून-खराबे के ऐसे हालात में एक माँ अपने बच्चे के गायब होने का भला और क्या कारण समझ सकती थी। क्या यह कि उसका बच्चा घर से भाग गया है? या यह कि वह अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होगा? किसी माँ-बाप के लिए यह सोचना कैसे असामान्य हो सकता कि उनका बच्चा उन्मादी भीड़ के हत्थे चढ़ गया होगा?

पर न्यूजलॉन्ड्री की बेशर्मी देखिए, वह केशव की माँ मोना से सवाल कर रहा है कि उसने ऐसा क्यों सोचा कि समुदाय विशेष की भीड़ ने उसके बेटे को अगवा कर लिया। इसके अलावा वह उस वक्त और क्या सोच सकती थी? जरा सोचिए, घर लौटने के बाद केशव के अलग बयान के बावजूद क्या मीडिया का काम अगवा होने की रिपोर्ट करना नहीं है? क्या बच्चे के लौट आने का हवाला देकर मीडिया यह कह सकती है कि गायब होने की एफआईआर का उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए था?

यहाँ यह पूछा जाना भी मुनासिब है कि यदि हिन्दुओं की एक भीड़ मस्जिद में तोड़-फोड़ करे और इस दौरान एक मुस्लिम दंपती अपने बच्चे को भीड़ द्वारा अगवा करने का दावा करते हुए एफआईआर दर्ज कराए, तब भी मीडिया उस एफआईआर की रिपोर्टिंग पर इसी तरह शर्मिंदगी महसूस करेगी?

दिलचस्प यह है कि हिन्दू बच्चे के गायब होने की एफआईआर की ऑपइंडिया की रिपोर्ट को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही न्यूजलॉन्ड्री को मुस्लिम संगठनों मसलन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए), अमन बिरादरी और कारवां-ए-मोहब्ब्त की एफआईआर पर कोई एतराज नहीं है।

न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट कहती है:-

नतीजतन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए), अमन बिरादरी और कारवां-ए-मोहब्ब्त के प्रतिनिधियों ने हौज काजी थाने में गलत सूचनाएँ फैलाने के लिए मीडिया संस्थानों के खिलाफ शिकायत की। शिकायत में विशेष रूप से ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए यह आरोप लगाया गया है कि वह “हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दुश्मनी और दुर्भावना” को बढ़ावा दे रहा है। शिकायत में टाइम्स नाउ, बिजनेस स्टैंडर्ड और हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे संस्थानों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि वे मंदिर में तोड़-फोड़ करने के मामले में संलिप्त लोगों की संख्या को “बढ़ा-चढ़ाकर” पेश कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के डीसीपी (सेंट्रल) मंदीप सिंह रंधावा से शिकायत की गई और उन्होंने सब कुछ नियंत्रण में होने का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, “मैं इसे सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखता। मेरा काम सच और झूठ का पता लगाना है और हम ऐसा ही करेंगे।”

दिलचस्प यह है कि न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट के अनुसार हिन्दू बच्चे के गायब होने की रिपोर्ट उसके माता-पिता द्वारा दर्ज कराना “सांप्रदायिक” है, लेकिन उसी रिपोर्ट में मंदिर में तोड़-फोड़ करने वालों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर तथ्य पेश करने का दावा करने वाली शिकायत “हकीकत”?

मंदिर में तोड़-फोड़ करने वाली मुस्लिम भीड़ और हिन्दुओं के पक्ष की रिपोर्टिंग को “हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच वैर बढ़ाने वाला” बताना बेशर्मी की हद है। जब एक मंदिर में तोड़-फोड़ हुई हो तो हम किस सद्भाव की बात कर रहे हैं? यकीनन, न्यूजलॉन्ड्री को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसा उनकी रिपोर्ट से भी जाहिर है।

क्या न्यूजलॉन्ड्री यह चाहता है कि यह सब देखने के बाद हम भी उसकी तरह चुप रहें? एक गायब बच्चे के माँ-बाप जो कह रहे हैं, उसे अनसुना कर दें? क्या हमें भी अन्य “सेक्युलर” मीडिया हाउसों की तरह आँख मूँद कर उनका दुख-दर्द बयाँ नहीं करना चाहिए? क्या हमें मौके से लौट जाना चाहिए था? क्या उस माँ से यह कहना चाहिए था कि उसकी एफआईआर और अपने बच्चे को तलाशने के उसके प्रयास बेमानी हैं, क्योंकि अब “हालात काबू में” है और उसे इस घटना को भूल जाना चाहिए?

नीचे जो वीडियो हैं उसमें बच्चे के गायब होने से दुखी माँ-बाप का दर्द कैद है। जब यह रिकॉर्ड किया जा रहा था तो कई पत्रकार वहाँ आए और गए। उन्होंने उनसे मुँह फेर लिया और अपने बेटे के लिए परेशान एक माँ-बाप के दर्द को अनसुना कर दिया। सेक्युलर मीडिया चाहती है कि हम भी ऐसा ही करें। वे इसलिए नाराज हैं कि हमने ऐसा नहीं किया। इस घटना को लेकर केशव ने जो बयान दिया है उससे खुद कई सवाल खड़े होते हैं। मसलन, हरिद्वार के रास्ते में किसी स्टेशन पर जब वह रिश्तेदारों को मिला तो क्या संभव है कि उन्होंने उसके माता-पिता को फोन कर सूचना नहीं दी होगी? वह रेलवे स्टेशन पर क्यों था? क्या कुछ ऐसा है जिसे दबाने की कोशिश हो रही है?

पुलिस को ईमानदारी से इस बात की पड़ताल करनी चाहिए कि लड़का दो दिनों तक कहाँ था। लेकिन, लापता लड़के के गायब होने की खबर देने वाली रिपोर्ट को कठघरे में खड़ा करना एक चाल है ताकि हिन्दुओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को आवाज नहीं मिल सके। हम इन मंसूबों को पूरा नहीं होने देंगे।

(नूपुर शर्मा के इस मूल लेख का अनुवाद अजीत झा ने किया है)

हिंसक मजहबी भीड़ ने सूरत में किया पुलिस पर पथराव, दंगा और तोडफोड़ के बाद धारा 144 लागू

गुजरात के सूरत शहर में पुलिस को आज आधा दर्जन से अधिक आँसू गैस के गोले दागने पड़े, जब मुस्लिम समुदाय की विशाल भीड़ ने, अधिकारियों द्वारा अनुमति देने से इनकार करने के बावजूद, झारखण्ड के कथित मॉबलिंचिंग की घटना के खिलाफ रैली निकालने की कोशिश की। इस्लामी भीड़ के उग्र प्रदर्शन के दौरान 3 से 4 पुलिस कर्मियों के घायल होने की भी खबर आ रही है। इसके अलावा वाहनों को भी क्षति पहुँचाई गई है।

पुलिस आयुक्त सतीश शर्मा ने कहा कि मुस्लिम समुदाय के एक समूह ने दो दिन पहले इसी मुद्दे पर एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा था और उसके बाद एक अन्य समूह ने चौक बाजार इलाके से अठवा में कलेक्टर कार्यालय तक रैली निकालने की अनुमति माँगी थी।

सतीश शर्मा ने कहा, “उन्हें अनुमति देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि यह दिन वर्किंग डे था और जिस मामले पर प्रदर्शन की अनुमति माँगी गई थी, यह मामला भी गुजरात का नहीं था।” इसके बावजूद मुस्लिम समुदाय के लोग रैली निकालने पर अड़े थे। इसलिए उग्र मुस्लिमों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कम से कम 8 आँसू गैस के गोले दागने पड़े, क्योंकि समुदाय विशेष ने प्रदर्शन के दौरान पथराव और आगजनी करना शुरू कर दिया। जिससे 4 से 5 पुलिस कर्मी घायल हो गए और बस सहित कई वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस आयुक्त ने कहा कि इस संबंध में एक मामला दर्ज किया गया है और इस संबंध में कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया है। इलाके में धारा 144 लगा दी गई है।

इस बीच चश्मदीदों ने कहा कि मुस्लिम लोगों की भीड़ ने चौक बाजार इलाके से आज जुमा के दिन रैली शुरू की। जब वे विवेकानंद सर्कल के पास पहुँचे तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन पहले से तैयार भीड़ हिंसक हो गई और पथराव शुरू कर दिया।

फिलहाल, इलाके में अधिक से अधिक पुलिस बल तैनात कर दिए गए हैं और अब मौजूदा स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है।

‘द वायर’ की पत्रकार आरफा जैसों की वजह से ही मुस्लिम अभी भी पिछड़े: अभिषेक मनु सिंघवी

बॉलीवुड अभिनेत्री जायरा वसीम ने इस्लाम का हवाला देते हुए बॉलीवुड को अलविदा कह दिया। उनका करियर अभी सिर्फ 5 साल का ही था। धर्म के नाम पर उनके इस तरह फिल्मों को छोड़ने से एक नई बहस ने पैदा हुई है। कॉन्ग्रेस नेता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने भी बॉलीवुड छोड़ने के लिए ज़ायरा वसीम द्वारा दिए गए कारणों को लेकर निकाह-हलाला की समस्यात्मक इस्लामी प्रथा पर सवाल उठाया था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा था, “हलाला जायज और एक्टिंग हराम, क्या ऐसे तरक्की करेगा हिंदुस्तान का मुस्लिम?” अभिषेक मनु सिंघवी के इस ट्वीट पर बहस छिड़ गई।

कॉन्ग्रेस नेता के ट्वीट पर द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने ट्वीट करते हुए इसे शर्मनाक बताया था। इस ट्वीट में आरफा ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को टैग करते हुए पूछा था कि क्या उन्होंने सिंघवी के शर्मनाक बयान के लिए मंजूरी दी थी। अब इस मामले में मनु सिंघवी ने आरफा पर आक्षेप करते हुए जवाब दिया है। सिंघवी ने जोर देकर कहा कि उनके जैसे प्रभावशाली लोगों के प्रत्यावर्ती और पुरातन (पुराने)आदर्शों का समर्थन करने की वजह से ही देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पिछड़ी बनी रहेगी।

इससे पहले सिंघवी ने इस्लामिक शरिया कानून द्वारा वैध रूप से प्रचलित निकाह हलाला की इस्लामी प्रथा पर सवाल उठाया था। उन्होंने ये बात जायरा वसीम द्वारा सोशल मीडिया पर अकाउंट पर शेयर किए गए पोस्ट के संदर्भ में कहा था। जिसमें जायरा ने कहा था कि बॉलीवुड में अभिनय ने उन्हें अपने मज़हब इस्लाम से दूर कर दिया है। इसलिए वो अल्लाह और इस्लाम की खातिर बॉलीवुड को अलविदा कह रही हैं।

गौरतलब है कि, आरफा खानम शेरवानी को अक्सर फर्जी समाचारों और प्रोपेगेंडा को शेयर करने और समुदाय विशेष की नकारात्मक बातों को छिपाने की कोशिश करते हुए देखा गया है। इससे पहले उन्होंने सपा नेता आज़म खान की अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ जया प्रदा पर शर्मनाक और भद्दी टिप्पणियों का बचाव करने का भी प्रयास किया था।

स्वच्छ भारत, समृद्ध भारत: बजट में मोदी सरकार ने पेश किया दशक का एजेंडा

केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को बजट पेश करते हुए कहा कि इस साल देश की अर्थव्यवस्था 3 ट्रिलियन डॉलर की हो रही है। अगले पाँच वर्षों में यह 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था होगी। अब भारत दुनिया में छठी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है। पाँच साल पहले भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था 11वें पायदान पर थी। क्रय शक्ति के आधार पर तो भारत अभी से चीन और अमेरिका के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

बजट पेश करते हुए सीतारमण ने सरकार का 10 सूत्रीय दशक का एजेंडा भी सामने रखा। जो हैं-

  • वास्‍तविक और सामाजिक बुनियादी ढाँचा तैयार करना।
  • अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा।
  • हरियाली और प्रदूषण मुक्त भारत।
  • एमएसएमई, स्‍टार्ट-अप्‍स, रक्षा निर्माण, वाहनों, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, कपड़ों, बैटरियों और चिकित्सा उपकरणों के निर्माण सेक्टर में मेक इन इंडिया को विशेष तौर पर प्रोत्साहित करना।
  • जल का प्रबंधन और नदियों की सफाई।
  • ब्लू इकोनॉमी यानी जल आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ाना।
  • अंतरिक्ष के क्षेत्र में दखल बढ़ाना। जिनमें गगनयान, चन्द्रयान और अन्य उपग्रह कार्यक्रम शामिल हैं।
  • खाद्यान्‍नों, दालों, तिलहनों, फलों और सब्जियों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना।
  • नागरिकों की सुरक्षा पर फोकस। स्वस्थ समाज के लिए महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर करना।
  • मिनिमम गवनर्मेंट, मैक्सिम गवर्नेंस के मंत्र को जन भागीदारी के साथ बढ़ाना।

उन्होंने बताया कि सरकार की योजना अगले 5 वर्षों में बुनियादी ढाँचे में 100 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने की है। क्रेडिट को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने का प्रस्‍ताव भी उन्होंने दिया। इसके अलावा अंतिम पाँच वर्षां में खाद्य सुरक्षा बजट को दोगुना करना, 10 हजार करोड़ रुपए के खर्च से इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना, अफ्रीका में 18 नए भारतीय दूतावास मिशन खोलना,‍ विश्‍वस्‍तरीय पर्यटन स्‍थलों में 17 महत्‍वपूर्ण पर्यटन स्‍थलों का विकास और एक, दो, पॉँच, दस तथा बीस रुपए के सिक्कों की नई सीरिज जारी करना इस बजट की अन्य महत्वपूर्ण बातें हैं।

सीतारमण ने कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का पहला कार्यकाल काम करने वाली सरकार के तौर पर रहा है। इसका लाभ आखिरी छोर तक खड़े व्यक्ति को मिला है। पहले कार्यकाल में रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रॉन्सफॉर्म पर फोकस किया गया। उन्होंने बताया कि अनके कार्यक्रमों में पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में इस सरकार ने अभूतपूर्व काम किया है। मसलन, खाद्य सुरक्षा के लिए 2014 से पहले आवंटन 1.2 लाख करोड़ रुपए था, जो 2014 के बाद बढ़कर 1.8 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इसी तरह 2014 से पहले 4000 पेटेंट थे, जिसकी संख्या पिछले साल बढ़कर 13,000 हो गई।

  • बजट पेश करते हुए केन्द्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि निवेश को बढ़ावा देने के लिए कम लागत वाली पूँजी आसानी से मुहैया कराने की जरूरत है। सालाना 20 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। इसके लिए सरकार ने कई प्रस्ताव दिए हैं। ये हैं-
  • ऋण गांरटी संवर्धन निगम।
  • इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान।
  • दीर्घकालिक बॉन्डों को मजबूती देने के लिए योजना।
  • 2018-19 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में पिछले साल की तुलना में 6 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया। विदेशी निवेश को लुभाने के लिए बजट में कुछ और पहल की गई हैं। मसलन-
  • सरकार विमानन, मीडिया (एनिमेशन, एवीजीसी) और बीमा क्षेत्रों को एफडीआई के लिए और अधिक खोलने के सुझावों पर विचार करेगी।
  • बीमा मध्यस्थता कम्पनियों में 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी जाएगी।
  • एकल ब्रांड रिटेल में एफडीआई के लिए स्थानीय आपूर्ति नियमों को आसान बनाया जाएगा।

कनेक्टिविटी को अर्थव्यवस्था की धमनी बताते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, औद्योगिक गलियारों, समर्पित माल भाड़ा गलियारों, भारतमाला और सागरमाला परियोजनाओं, जलमार्ग विकास और उड़ान योजनाओं के जरिए संपर्क के सभी माध्यमों को काफी बढ़ावा दिया है। औद्योगिक गलियारों के बनने से उद्योग की संभावना वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक निवेश आने से इन्फ्रास्ट्रक्चर का बेहतर विकास होगा, समर्पित माल भाड़ा गलियारों से हमारे रेल नेटवर्क पर बोझ घटेगा, जिससे आम आदमी को लाभ होगा। भारतमाला कार्यक्रम से राष्ट्रीय सड़क गलियारों और राजमार्गों के विकास में मदद मिलेगी, जबकि सागरमाला से बंदरगाहों को जोड़ने और उनके आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी।

वित्त मंत्री ने कहा कि दुनिया के तीसरे सबसे बड़े घरेलू उड्डयन बाजार के रूप में अब भारत के लिए विमानन क्षेत्र के वित्त पोषण और जहाजों को पट्टे पर देने की गतिविधियों में शामिल होने का समय आ गया है। देश में रखरखाव और मरम्मत से जुड़े विमानन उद्योग (एमआरओ) के लिए बेहतर कारोबारी माहौल उपलब्ध कराने तथा इसमें आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं का लाभ उठाने का प्रस्ताव किया गया है।

उन्होंने कहा कि पारम्‍परिक उद्योगों के उन्‍नयन और पुनर्सजृन निधि योजना का लक्ष्‍य पारम्‍परिक उद्योगों को अधिक से अधिक उत्‍पादक, लाभदायक और निरंतर रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए सक्षम बनाने हेतु क्‍लस्‍टर आधारित विकास सुसाध्‍य बनाने के लिए अधिकाधिक सामान्‍य सुविधा केन्‍द्र स्‍थापित करना है। प्रमुख क्षेत्र बांस, शहद और खादी क्‍लस्‍टर है। स्‍फुर्ति के अंतर्गत 2019-20 के दौरान 100 नए क्‍लास्‍टरों की स्‍थापना की जानी है, जिससे 50,000 शिल्‍पकारों को आर्थिक मूल्‍य श्रृंखला में शामिल होने के लिए सम‍र्थ बनाया जाएगा। इसके अतिरिक्‍त ऐसे उद्योगों की प्रौद्योगिकी सुधारने के लिए आजीविका बिजनेस इंक्‍यूबेटर और प्रौद्योगिकी बिजनेस इंक्‍यूबेटर स्‍थापित करने के लिए नवाचार, ग्रामीण उद्योग और उद्यमिता के संवर्धन के लिए योजना को समेकित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कृषि, ग्रामीण उद्योग के क्षेत्रों में 75,000 कुशल उद्यमियों को तैयार करने के लिए 2019-20 में 80 आजीविका बिजनेस इंक्‍यूबेटर और 20 प्रौद्योगिकी बिजनेस इंक्‍यूबेटर स्‍थापित किए जाएँगे।

प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत अभी तक 2 करोड़ से अधिक ग्रामीणों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाया गया है। ग्रामीण-शहरी डिजिटल अंतर को पाटने के लिए भारत नेट देश की प्रत्‍येक पंचायत के स्‍थानीय निकायों में इंटरनेट कनेक्टिविटी लक्षित कर रहा है। इसे पीपीपी मॉडल से तेजी से बढ़ाया जाएगा।

उन्‍होंने कहा कि आदिवासियों के दस्‍तावेजों, लोक गीतों, उनके विकास क्रम के फोटोचित्रों और वीडियों, उत्‍पत्ति स्‍थल, जीवनशैली, वास्‍तुकला, शिक्षा स्‍तर, पारंपरिक कला, लोकनृत्‍य तथा अन्‍य मानव विकास का संग्रह करने के लिए एक डिजिटल संग्रह बनाया गया है। इस संग्रह को और अधिक समृद्ध और सुदृढ़ किया जाएगा।

  • 2014-2019 के दौरान की उपलब्धियाँ-
  • पिछले पाँच वर्षों में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में एक ट्रिलियन डॉलर की राशि जुड़ी है।
  • भारत विश्‍व की छठी बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था बन चुका है। पाँच वर्ष पहले यह 11वें स्‍थान पर था।
  • क्रय शक्ति की समानता की के दृष्टि से भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है।
  • 2014-19 के दौरान राजकोषीय अनुशासन को सुदृढ़ बनाया तथा केन्‍द्र-राज्‍य संबंधों को गतिशीलता प्रदान की गई।
  • अप्रत्‍यक्ष करों, दिवाला मामलों तथा रियल इस्‍टेट क्षेत्र में संरचनात्‍मक सुधार किए गए।
  • 2009-14 की तुलना में 2014-19 के बीच खाद्य सुरक्षा पर प्रतिवर्ष औसतन दोगुना खर्च किया गया।
  • 2014 की तुलना में 2017-18 में तिगुने से भी पेटेंट जारी किए गए।
  • नीति आयोग की योजनाओं और समर्थन से न्यू इंडिया के निर्माण की प्रक्रिया जारी है।
  • भविष्‍य के लक्ष्‍य-
  • प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
  • निष्‍पादन को प्रोत्‍साहित करना।
  • लालफीताशाही में कमी लाना।
  • प्रौद्योगिकी का बेहतर इस्‍तेमाल करना।
  • शुरू किए गए कार्यक्रमों और सेवाओं को गति प्रदान करना।