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डियर सेकुलरों, जिन्हें बाँधकर गौ माता की जय बुलवाया गया, वे ‘सिर्फ़ 25 लोग’ नहीं… बल्कि गौ तस्कर थे

मध्यप्रदेश के खांडवा जिले से कुछ दिन पहले खबर आई थी कि 7 जुलाई को वहाँ कुछ ग्रामीणों ने 22 गायों को ले जा रहे 8 वाहनों के साथ 25 गौ तस्करों को पकड़ा और फिर उन्हें रस्सी से बाँध दिया। गाँव वालों ने इसके बाद उन्हें सड़क पर बिठाया और उनसे ‘गौ माता की जय’ के नारे लगवाए। इतना ही नहीं, गुस्साए ग्रामीणों ने इस दौरान 2 किलोमीटर दूर स्थित पुलिस थाने तक इन गौ तस्करों की परेड भी करवाई। बाद में पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए इन गौ तस्करों के वाहन, और पशु समेत कुछ कीमती गहने और रुपए जब्त करके पुष्टि की कि हिरासत में लिए गए लोगों के पास न तो पशुओं को ले जाने की अनुमति थी और न ही ऐसे कोई भी दस्तावेज..। इस मामले में पुलिस ने ग्रामीणों पर भी मामला दर्ज किया था क्योंकि वे लोग आरोपितों को सीधे थाने नहीं लाए थे।

अब इस खबर में जहाँ हर एंगल स्पष्ट था वहाँ कुछ लोगों ने इस को हिंदुओं द्वारा की मॉब लिंचिंग का चेहरा देने की कोशिश की। अलग-अलग मीडिया हाउस से लेकर, पत्रकारों और राजनेताओं ने इस पूरे मामले में इस तथ्य को छुपाने का प्रयास किया कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े गए ये 25 लोग ‘गौतस्कर’ थे। इन लोगों ने अपनी बातों के जरिए ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कि ये 25 लोग निर्दोष हैं, जो सिर्फ़ वाहन के जरिए गायों को ले जा रहे थे और गाँव वालों ने उन्हें बेवजह पकड़कर प्रताड़ित किया।

वकील प्रशांत भूषण ने तो इस मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जोड़कर अलग तरीके से पेश करना चाहा और ग्रामीणों को बजरंग दल का बताया।

शेखर गुप्ता ने भी इस मामले को आगे पहुँचाना तो जरूरी समझा, लेकिन ये बताना जरूरी नहीं समझा कि जिन लोगों को ग्रामीणों ने पकड़ा वे गौ तस्कर थे।

अन्य मीडिया संस्थानों ने भी इस मामले को इस तरह पेश किया जैसे गायों को वाहनों के जरिए ले जाने वाले निर्दोष पशु व्यापारी थे, जिन्हें कुछ गौ रक्षकों ने पकड़ लिया और मिलकर प्रताड़ित किया।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में तो इस खबर को हिंदू-मुस्लिम एंगल देने का भी प्रयास किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े गए 25 लोगों में 7 लोग मुस्लिम थे, जबकि सच्चाई ये है कि पकड़े गए लोगों में अधिकतर हिंदुओं का होना और उनके साथ समान बर्ताव होना, इस बात का सबूत है कि पूरे मामले में हिंदू-मुस्लिम जैसा एंगल बिलकुल नहीं था।

खैर, ये सारे सबूत इसलिए ज्यादा हैरान करने वाले नहीं है क्योंकि जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है तबसे ‘हिंदुओं द्वारा मॉब लिंचिंग’ का एक नैरेटिव गढ़ा जाना और आपराधिक मामले में पकड़े गए आरोपितों पर लोगों द्वारा की गई कार्रवाई को ‘निश्चित’ एंगल देना आम हो चुका है

उपर्युक्त मामले में ग्रामीणों द्वारा कानून को हाथ में लेना किसी रूप में जस्टिफाई नहीं किया जा सकता, लेकिन ये जरूरी है कि हम खबर को उचित तथ्यों के साथ दर्शकों और पाठकों के समक्ष पेश करें। क्योंकि मामले में एक भी बिंदु से की गई छेड़-छाड़ खबर की प्रमाणिकता पर सवाल तो उठाती ही है, साथ में समाज पर भी गलत प्रभाव छोड़ती है।

इसका हालिया उदहारण हम तबरेज की मौत के मामले से लगा सकते हैं। जहाँ तबरेज को लोगों की भीड़ ने चोरी के आरोप में मारना शुरू किया, लेकिन 4 दिन बाद जब पुलिस हिरासत में उसकी मौत हुई, तो इस एंगल को बिलकुछ छिपा लिया गया कि उसे लोगों ने चोरी के आरोप में मारा था, और जो नैरेटिव तैयार किया वह ये कि हिंदुओं की भीड़ ने मुस्लिम को मारा।

हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है: भारत में रहने वाले अलगाववादी नेता का Video Viral

जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है। जिसमें वो ‘हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है’ कहते सुने जा रहे हैं। बता दें कि यह वीडियो सैयद अली गिलानी के नाम से ही मौजूद एक गैर-वेरिफायड ट्विटर अकाउंट से 23 मई को शेयर किया गया था।

इस वीडियो में गिलानी एक रैली में भड़काऊ भाषण देते हुए सुने जा रहे हैं। वीडियो की शुरुआत में वो इंशाल्लाह, इंशाल्लाह का नारा लगाते हैं और लोगों से भी लगवाते हैं। फिर आगे वो कहते हैं, “इस्लाम के मोहब्बत से, इस्लाम के ताल्लुक से हम पाकिस्तानी हैं, पाकिस्तान हमारा है।” यह नारेबाजी काफी देर तक चलती रहती है। हालाँकि, अभी यह नहीं पता चल पाया है कि यह रैली कश्मीर के किस हिस्से में कब और कहाँ आयोजित की गई थी। इस वीडियो को देखकर रैली के आयोजन के वक्त और स्थान के बारे में बता पाना काफी मुश्किल है।

गौरतलब है कि हाल ही में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा था कि हुर्रियत नेता केंद्र सरकार से बातचीत को तैयार हैं। मलिक ने कहा था, “पहले हुर्रियत कॉन्फ्रेंस बातचीत के लिए तैयार नहीं थी। रामविलास पासवान (2016 में) उनके दरवाजे पर खड़े थे, लेकिन वे बातचीत के लिए तैयार नहीं थे। अब वे बातचीत को तैयार हैं और वार्ता करना चाहता हैं। सबमें बदलाव आया है।”

सत्यपाल मलिक के बयान के बाद जम्मू- कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी काफी एक्टिव नज़र आईं। उन्होंने हुर्रियत नेताओं की पैरवी करते हुए कहा था कि यदि वो (हुर्रियत) बातचीत के लिए तैयार हैं, तो भारत सरकार को उनके साथ बातचीत करनी चाहिए। महबूबा मुफ्ती पहले भी हुर्रियत के साथ बातचीत की पैरवी कर चुकी हैं।

वीडियो वायरल होने के बाद इस पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। लोगों का कहना है कि जब वह खुद यह कह रहे हैं कि वह पाकिस्तानी हैं तो उन्हें भारत में रहने का अधिकार नहीं, उन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाए।

खुद की करनी से हारी पार्टी, 10% आरक्षण पर नहीं सुनी थी मेरी बात: कॉन्ग्रेस के पूर्व महासचिव

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद पार्टी नेताओं की आपसी खींचतान भी सामने आने लगी है। पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी भीतरी कारणों से हारी है। राहुल के इस्तीफे को आदर्श बताते हुए कहा है कि अन्य लोग जो जिम्मेदारी के पदों पर हैं उन्हें इससे सीख लेनी चाहिए। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफे के बाद भी स्थिति जस की तस है।

द्विवेदी ने कहा है की तकनीकी तौर पर राहुल अब भी पार्टी अध्यक्ष हैं और अपने उत्तराधिकारी के नाम का सुझाव देने के लिए उन्हें एक समिति बनानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि मौजूदा वक़्त में अध्यक्ष के नाम पर अनौपचारिक चर्चा कर रही पैनल के मुकाबले यह समिति ज्यादा विश्वसनीय होगी। उन्होंने कहा है, “कार्यसमिति की बैठक बुलाकर अध्यक्ष के नाम पर जल्द फैसला किया जाना चाहिए।’

जनार्दन द्विवेदी ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस संगठन में उन्होंने पूरा जीवन लगाया, उसकी स्थिति देख कर पीड़ा होती है। उन्होंने कहा कि हार के कारण पार्टी के भीतर हैं, न कि बाहर। उन्होंने कहा कि पार्टी में कई ऐसी बातें हुईं, जिससे वो सहमत नहीं थे और उन्होंने इससे पार्टी नेतृत्व को अवगत कराया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग की थी, तब पार्टी अध्यक्ष ने इससे किनारा कर लिया। बाद में जब मोदी सरकार 10% आरक्षण लेकर आई तो सारी पार्टियों ने चुप्पी साध ली। उनका कहना है कि भारतीयता और भगवाकरण को लेकर उनके विचार से पार्टी सहमत नहीं थी और फिर बाद में भारतीय संस्कृति से नजदीकी दिखाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए गए।

जनार्दन द्विवेदी सबसे लंबे समय तक कॉन्ग्रेस महासचिव रहे हैं। उन्होंने 5 कॉन्ग्रेस अध्यक्षों इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिम्हा राव और सोनिया गाँधी के साथ काम किया है। द्विवेदी को सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का करीबी माना जाता है। उन्होंने 2018 में स्वेच्छा से रिटायरमेंट ली थी। 

जनार्दन ने कहा कि वे 15 सितंबर 2014 को सोनिया गाँधी को लिखे पत्र, जिसमें उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की थी, सार्वजानिक कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि जिस समाज, संगठन, देश में स्वतंत्र विचार और मुक्त आत्मा का स्वर नहीं सुना जाता, वो समाज, वो देश मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं रह सकता और वहाँ लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता।

RaGa ने लगाए We Want Justice के नारे, स्पीकर बोले- सदन को नगर निगम न बनाएँ

राहुल गाँधी आज सदन में अपने स्थान से बैठे-बैठे ही नारा लगाते देखे गए। 17वीं लोकसभा में राहुल गाँधी ने पहली बार नारेबाजी की। लोकसभा में मंगलवार (जुलाई 09, 2019) को कॉन्ग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर कर्नाटक में जेडीएस+कॉन्ग्रेस गठबंधन सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ‘षड्यंत्र रचने’ और ‘शिकार की राजनीति’ करने का आरोप लगाया, जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘कॉन्ग्रेस के घर की समस्या’ कहते हुए खारिज कर दिया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि कॉन्ग्रेस सदस्यों को सोमवार को भी इस विषय को उठाने का मौका दिया गया था। इस बारे में कार्यस्थगन प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया है। इस पर कॉन्ग्रेस सदस्य अपने स्थान से ही नारेबाजी करने लगे। कुछ देर बाद कॉन्ग्रेस सदस्य आसन के पास आकर नारेबाजी करने लगे। कॉन्ग्रेस सदस्यों के साथ द्रमुक सदस्य भी आसन के समीप आकर नारेबाजी कर रहे थे।

इस दौरान राहुल गाँधी की माताजी सोनिया गाँधी भी सदन में मौजूद थीं। राहुल गाँधी को भी अपने स्थान पर बैठकर ‘वी वांट जस्टिस (हमें न्याय चाहिए)’ कहते सुना गया। उनके साथ ही सदन में कॉन्ग्रेस सदस्य ‘वी वांट जस्टिस’, ‘लोकतंत्र की हत्या बंद करो’, ‘शिकार की राजनीति बंद करो’ के नारे लगा रहे थे। इस पर लोकसभाध्यक्ष ने हंगामा कर रहे सदस्यों से कहा कि सभी को सदन की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन में वाद-विवाद करें, संवाद करें, चर्चा करें लेकिन नारेबाजी और तख्ती लेकर आना बंद होना चाहिए। ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने सदस्यों को बिना बारी भी बोलने की अनुमति दी है और सदन को नगर निगम जैसा बनाना ठीक नहीं है, पूरा देश आपको देख रहा है।

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा, “नियम में स्पष्ट है कि अगर किसी विषय पर चर्चा हो चुकी है तब उस पर फिर चर्चा नहीं हो सकती है, इस विषय (कर्नाटक) को उठाया जा चुका है, रक्षा मंत्री जवाब दे चुके हैं। जोशी ने कहा कि कर्नाटक के मुद्दे से हमारा कोई लेना देना नहीं है। यह राहुल गाँधी के इस्तीफा देने के आह्वान के कारण हो रहा है। सदन में महत्वपूर्ण विधेयक आने हैं, चर्चा होनी है। यह पहला सत्र है और इस तरह से इसे बाधित करना ठीक नहीं है।”

दरअसल, कर्नाटक में जेडीएस-कॉन्ग्रेस सरकार गठबंधन के 13 विधायकों द्वारा राज्य विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय को इस्तीफा सौंपने के बाद प्रदेश सरकार संकट का सामना कर रही है। राज्यसभा में भी कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सदस्यों ने हंगामा किया। इसके कारण मंगलवार को राज्यसभा की बैठक दो बार के स्थगन के बाद दोपहर दो बजे पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

40 वर्षों बाद जल-समाधि से निकाले गए भगवान: देश-विदेश से पहुँचे लाखों श्रद्धालु, सिर्फ़ 48 दिन होंगे दर्शन

भारत विविधताओं का देश है और यहाँ प्राचीन काल से ऐसी-ऐसी परम्पराएँ चली आ रही हैं, जो हर क्षेत्र को अलग-अलग पहचान देती हैं। इसी क्रम में आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहाँ के मुख्य देवता 40 वर्षों में सिर्फ़ 1 बार दर्शन देते हैं। पिछली बार उन्होंने 1979 में दर्शन दिया था, तब श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। अब जब 2019 में वह निकले हैं, उनके दर्शन के लिए लाखों लोग पहुँच रहे हैं। हम जिस मंदिर की बात कर हैं, उसका नाम है- भगवान वरदराजा स्वामी मंदिर। यह मंदिर तमिलनाडु के कांचीपुरम में स्थित है।

और जिस देवता की बात हम कर रहे हैं, उनका नाम है- भगवान अति वरदार। अति वरदार प्रत्येक 40 वर्षों में 1 बार दर्शन देकर वापस जल समाधि में चले जाते हैं। यहाँ तक कि विदेशों से भी उनके दर्शन के लिए लोग आते हैं। हम उनकी चर्चा अभी इसीलिए कर रहे हैं, क्योंकि अभी वह समय आया है जब भगवान अति वरदराज को जल समाधि से निकाला गया है और इस ख़ुशी में वहाँ ‘कांची अति वरदार महोत्सव’ चल रहा है। 19 अगस्त तक लोग उनके दर्शन कर सकेंगे, जिसके बाद वह वापस मंदिर के पवित्र तालाब में रख दिए जाएँगे।

ताजा महोत्सव के बाद श्रद्धालुओं को दर्शन देने भगवान अति वरदार 40 वर्षों बाद 2059 में ही प्रकट होंगे। इस बार भी जब उनकी मूर्ति को पवित्र तालाब से निकाला गया, तब हज़ारों की संख्या में भक्तगण इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए वहाँ मौजूद थे। तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ख़ुद विशेष पूजा-अर्चना का गवाह बनने के लिए वहाँ उपस्थित थे। प्रतिमा को फूल-माला पहना कर मंदिर प्रांगण में घुमाया गया और फिर वसंत मंडप में स्थापित किया गया।

48 दिनों तक चलने वाली दर्शन की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए स्थानीय प्रशासन ने पूरी व्यवस्था की है। ढाई हज़ार से भी अधिक पुलिसकर्मियों की देखरेख में महोत्सव चल रहा है। दर्शन के लिए मुफ्त से लेकर अलग-अलग मूल्य तक के टोकन जारी किए गए हैं। हालाँकि, भगवान अति वरदार की 40 वर्षीय जल समाधि के पीछे स्थानीय तौर पर कई कहानियाँ प्रचलित हैं लेकिन इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। भगवान की मूर्ति अंजीर के पेड़ की लकड़ी से बनी हुई है।

कहते हैं, 16वीं शताब्दी में मुग़ल आक्रमण के दौरान 9 फ़ीट की इस प्रतिमा को तालाब में छिपा दिया गया था। एक बहुत ही प्रचलित कथा है कि माँ सरस्वती यहाँ नाराज़ होकर आई थीं, तब यहाँ अंजीर के जंगल हुआ करते थे। पीछे से भगवान ब्रह्मा उन्हें मनाने आए और अश्वमेध यज्ञ किया। सरस्वती ने नदी के रूप में इस यज्ञ को भंग करने का प्रयास किया, तब यज्ञ वेदी की अग्नि से प्रकट हुए भगवान विष्णु (अति वरदराजा) ने उनका क्रोध शांत किया।

मुग़ल आक्रमण का दौर बीतने के बाद इस प्रतिमा को पूजा के लिए वापस निकाला गया था, लेकिन मान्यता है कि प्रतिमा 48 दिनों बाद फिर अपने-आप वापस तालाब में चली गई। मान्यता है कि देवगुरु बृहस्पति तालाब के भीतर विष्णु की आराधना करते हैं। तब से अब तक हर 40 वर्ष बाद ही इस प्रतिमा को दर्शन हेतु निकाला जाता है। मंदिर के पास स्थित वेगवती नदी को ही सरस्वती का रूप माना गया है।

एयर स्ट्राइक इफ़ेक्ट: आतंकी संगठनों को नहीं मिल रहे कश्मीरी युवा, भर्ती में 40% व घुसपैठ में 43% की कमी

पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक ने आतंकी संगठनों की कमर तोड़ दी है। आतंकी संगठनों को भर्ती के लिए कश्मीरी युवा नहीं मिल रहे। संसद में सरकार ने बताया है कि स्थानीय युवकों की भर्ती में 40% की कमी आई है। बीते साल के मुकाबले सीमा पार से घुसपैठ में 43% की कमी आई है। ये आँकड़े इस साल के शुरुआती 6 महीने के हैं। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा है कि सुरक्षा बलों के प्रयासों और सरकार की इच्छाशक्ति के कारण इस वर्ष घुसपैठ में कमी आई है।

संसद में सरकार द्वारा पेश किए गए आँकड़ों के अनुसार:

  • पाकिस्तान से होने वाले घुसपैठ में 43% कमी आई है।
  • आतंकी हमलों में 28% कमी आई है।
  • आतंकी संगठनों में स्थानीय युवकों की भर्ती में 40% कमी आई है।
  • आतंकियों के सफाए में 22% की बढ़ोतरी हुई है।

बता दें कि पुलवामा में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। जवाबी कार्रवाई में भारत ने बालाकोट में एयर स्ट्राइक किया था। हमले के पीछे जैश-ए-मोहम्मद का हाथ सामने आने के बाद भारतीय वायुसेना ने इस आतंकी संगठन के सबसे बड़े कैम्प को निशाना बनाया और सैंकड़ों आतंकी मार गिराए थे। मोदी सरकार शुरू से कहती आ रही है कि आतंकवाद पर उसकी नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा है कि सरकार पाकिस्तान में स्थित आतंकवाद की जड़ों को निशाना बनाने में यकीन रखती है। बीते दिनों उन्होंने जम्मू-कश्मीर का दौरा कर सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा लिया था। उन्होंने राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भी हालात पर चर्चा की थी। शाह ने भारत-पाकिस्तान सीमा पर बंकरों के निर्माण में तेज़ी लाने की भी बात कही थी।

बिहार: अब गया में पसरा चमकी बुखार का खौफ, 6 बच्चों की मौत

बिहार के मुजफ्फरपुर में 145 से अधिक मासूमों की मौत के बाद अब गया में ‘चमकी बुखार’ से 6 बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। सभी मौतें जिले के अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हुई हैं।
अस्पताल अधीक्षक वीके प्रसाद ने बताया कि 2 जुलाई के बाद से ये मामले सामने आए हैं। 6 बच्चों की मौत की उन्होंने पुष्टि की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दो जुलाई के बाद से अस्पताल में 22 बच्चे भर्ती किए गए हैं। इनमे से 14 में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी AES के लक्षण पाए गए हैं।

प्रसाद ने बताया, ” 2 जुलाई से अब तक अस्पताल में 22 मरीज भर्ती किए गए हैं। शुरुआती लक्षण AES के लग रहे हैं। लेकिन जब तक जांच रिपोर्ट नहीं आती मुकम्मल तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।”

बता दें मौसम में बदलाव के कारण मुजफ्फरपुर में AES के मामलों में कमी देखी गई है। लेकिन, गया में नए मामले सामने आने से प्रशासन सकते में है। बिहार में अब तक 180 से अधिक बच्चे चमकी बुखार के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का ख़त्म होगा एकाधिकार, जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक बिल लोकसभा में पेश

सोमवार (जुलाई 8, 2019) को लोकसभा में कॉन्ग्रेस के विरोध के बीच जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019 पेश किया गया। इस विधेयक को लाने का मकसद जलियाँवाला बाग मैमोरियल ट्रस्ट को गैर राजनीतिक रूप देना है। इस विधेयक में ट्रस्टी के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष को हटाकर उसके स्थान पर लोकसभा में मान्यता प्राप्त विरोधी दल के नेता या उस स्थिति में सदन में सबसे बड़े एकल विरोधी दल के नेता को ट्रस्टी बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।

यह विधेयक नॉमिनेटेड ट्रस्टी के कार्यकाल को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार को और अधिक शक्ति प्रदान करता है, जो कि अब तक ट्रस्ट स्मारक का प्रबंधन ही करता है। इस विधेयक का उद्देश्य ट्रस्ट में किसी विशेष राजनैतिक दल के प्रभुत्व को खत्म करना है। इस विधेयक के पारित होने के बाद कॉन्ग्रेस का इसके स्थाई ट्रस्टी के तौर पर एकाधिकार समाप्त हो जाएगा।

इस विधेयक को केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने लोकसभा में पेश किया, जिसका कॉन्ग्रेस ने जबर्दस्त तरीके से विरोध किया। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इस का विरोध करते हुए कहा कि यह देश की विरासत के साथ खिलवाड़ है। देश के इतिहास व उसकी विरासत के साथ विश्वासघात नहीं होना चाहिए। थरूर ने कहा कि जब से स्मारक बनाया गया तब से ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को स्मारक का पदेन ट्रस्टी बनाया गया है। कॉन्ग्रेस ने इस ट्रस्ट के लिए पैसा जुटाया था।

कॉन्ग्रेस के विरोध का जवाब देते हुए संस्कृति मंत्री ने कहा कि इतिहास की बात कर रहे कॉन्ग्रेस सदस्य रिकॉर्ड पलट कर देख लें। कॉन्ग्रेस ने पिछले 40-50 वर्षों में स्मारक के लिए कुछ भी नहीं किया है। साथ ही पटेल ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस सदस्य विधेयक पर चर्चा के दौरान अपने सवाल उठा सकते हैं। उनके सारे सवालों के जवाब दिए जाएँगे। प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि विधेयक फरवरी में लोकसभा में पारित हो गया था, लेकिन राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था, इसलिए सरकार फिर से इसे लोकसभा में लेकर आई है। बता दें कि, वर्तमान में
जलियाँवाला बाग ट्रस्ट में कुल नौ ट्रस्टी हैं। जिसमें प्रधानमंत्री के बाद दूसरे नंबर के ट्रस्टी भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष होते हैं।

VHP ने जारी की एंटी-हिन्दू हेट क्राइम की सूची, कहा- इतिहास बताता है रक्तपात किसकी प्रवृत्ति है

विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने सोमवार (जुलाई 08, 2019) को बयान जारी कर पत्रकारों और ‘सेक्युलर’ नेताओं के गठजोड़ पर हिन्दुओं के खिलाफ दंगे भड़काने की साजिश का आरोप लगाया है। विहिप के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर जारी इस बयान में आरोप लगाया गया है कि यह गठजोड़ न केवल समुदाय विशेष के डरे हुए होने का झूठा नैरेटिव बना रहा है, बल्कि कट्टरपंथियों को उकसा कर हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा कराना भी इसका ध्येय है। विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल को इस लिखित बयान में हस्ताक्षरकर्ता बताया गया है।

‘हिन्दू शांतिप्रिय न होते तो इतने मंदिर तोड़े जाने पर…’

अंग्रेजी और हिंदी में जारी बयान में विहिप ने सवाल किए हैं कि क्या ये लोग (खान मार्केट पत्रकार, सेक्युलर गैंग आदि) आगामी चुनावों को प्रभावित करने के लिए देश को दंगों की आग में झोंकना चाहते हैं? परिषद ने समुदाय विशेष के नेताओं से मंदिरों को तोड़ने निकले जिहादी तत्वों पर रोक लगाने की पहले के लिए भी अपील की। यह भी कहा कि अगर हिन्दू समाज शांतिप्रिय न होता तो मंदिरों में होने वाले हमलों की इतनी घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया क्या होती, इसकी कल्पना की जा सकती है।

अपने संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन के हवाले से परिषद ने कहा कि पूरी दुनिया जानती है मॉब-लिंचिंग हिन्दुओं का स्वभाव नहीं है। ‘सम्प्रदाय विशेष’ पर कटाक्ष करते हुए विहिप ने यह भी कहा कि इतिहास और वर्तमान की घटनाएँ स्पष्ट कर देतीं हैं कि गैर-मतावलम्बी का रक्तपात किसकी प्रवृत्ति और मज़हबी कर्त्तव्य हैं। मजहबी नेताओं को भी इतिहास से सीख लेने की नसीहत देते हुए उन्होंने पूछा कि हिंसक कार्यवाही से उनका क्या भला होगा?

5-6 अर्धसत्य ही समूचा आधार

हिन्दू संस्था ने यह आरोप लगाए कि 5-6 घटनाओं के अर्धसत्य को आधार बना कर जिस प्रकार हिन्दू-विरोधी माहौल बनाया जा रहा है, वह एक राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा प्रतीत होता है। परिषद ने पत्रकारिता के समुदाय विशेष और ‘सेक्युलर’ राजनीतिज्ञों से पूछा है कि अगर मस्जिदों पर ऐसे ही हमले होते तो कथित अल्पसंख्यक समाज, इन पत्रकारों और नेताओं की क्या प्रतिक्रिया होती। इन सभी से विहिप ने यह भी पूछा कि जिहादियों के कारनामों पर पर्दा डालकर और हिन्दू समाज को बदनाम कर आखिर वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।

‘मॉब लिंचिंग और साम्प्रदायिक हत्या हिन्दुओं की भी होती है… उस पर चुप्पी क्यों?’

विहिप ने चावड़ी बाजार (दिल्ली) के दुर्गा मंदिर, अटाली (हरियाणा), मुजफ्फरनगर आदि का उदाहरण देकर दावा किया कि हिंसक भीड़ द्वारा हमले के शिकार असल में हिन्दू और उनके धार्मिक स्थल हैं। उन्होंने इसे हिन्दुओं को उकसाने वाली कार्यवाही बताया। गुरुग्राम, बेगूसराय, कानपुर आदि में समुदाय विशेष पर भीड़ द्वारा हमले की घटनाओं के नकली निकलने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इनके नकली निकलने पर भी दुष्प्रचार जारी रखना ऐसा करने वालों के इरादे साफ कर देता है।

हिन्दुओं की मॉब-लिंचिंग का मामला उठाते हुए विहिप ने यह भी पूछा कि लिबरल गैंग आखिर इस पर चुप क्यों रहता है? कश्मीर में पंडितों के सामूहिक हत्याकाण्ड को हिन्दुओं की मॉब-लिंचिंग का सबसे बड़ा उदाहरण विहिप ने बताया। अन्य जिन घटनाओं का उसने ज़िक्र किया, वह थीं अरुण माहौर की हत्या, दिल्ली में ध्रुव त्यागी और अंकित सक्सेना की हत्याएँ आदि। विहिप ने पूछा कि दादरी को अपना ‘तीर्थ स्थल’ बनाने वाले पत्रकार इन घटनाओं पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? विहिप ने हिन्दू-विरोधी हिंसक घटनाओं का एक नमूना संग्रह भी ट्वीट किया।

‘बिहारी खा जाते हैं हमारी नौकरी, इसे रोकने के लिए MP के मूल निवासियों को 70% आरक्षण’

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार प्रदेश के युवाओं को बड़ी सौगात देने पर विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार (जुलाई 09, 2019) को विधानसभा में एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने यह जानकारी दी। निजी क्षेत्र की नौकरियों में सरकार राज्य के युवाओं को 70% आरक्षण देगी और इसके लिए जल्द ही कानून लाया जाएगा।

मंगलवार को विधानसभा में एक सवाल पर कॉन्ग्रेस और बीजेपी विधायकों की नोकझोंक के बीच मुख्यमंत्री ने सदन को यह जानकारी दी। कमलनाथ ने कहा कि मध्य प्रदेश की गुजरात या पश्चिम बंगाल से तुलना नहीं हो सकती क्योंकि उन राज्यों में वहीं की भाषा में पेपर होते हैं।

स्थाई निवासियों को देगी प्राथमिकता

सीएम कमलनाथ ने मध्य प्रदेश विधानसभा में कहा कि निजी क्षेत्रों में राज्य के स्थाई निवासियों को ही प्राथमिकता दी जाएगी। नई औद्योगिक नीति और निवेश प्रोत्साहन योजना में आरक्षण के प्रावधान को रखा गया है। उन्होंने बताया कि औद्योगिक इकाई के शुरू होने पर इसे लागू किया जाएगा। इसके मुताबिक, कुल रोजगार का 70% मध्य प्रदेश के स्थाई निवासियों को ही देना होगा।

‘यूपी-बिहार के प्रवासी कामगार MP के लोगों की नौकरियों पर कब्जा जमा लेते हैं’

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली जीत के तुरंत बाद कमलनाथ ने कहा था कि मध्य प्रदेश की नौकरियाँ अन्य राज्य के लोगों के पास जा रही हैं। उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग मध्य प्रदेश की नौकरियों पर कब्जा जमा लेते हैं और उनकी सरकार इसे रोकने के लिए प्राथमिकता से काम करेगी।