‘द प्रिंट’ में लिखे एक लेख में सलमा युसूफ हुसैन ने दावा किया है कि मुगलों ने भारत को अंगूर जैसे फल दिए। ख़ुद को खानपान और इससे जुड़े इतिहास का दक्ष बताने वाली सलमा युसूफ हुसैन ने यह लेख लिखा है। इसमें मुगलों व फलों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाते-दर्शाते यह बताया जाता है कि भारत के लोगों का अंगूर से परिचय मुगलों ने ही कराया। जबकि यह सरासर ग़लत है। धीरेन्द्र कृष्णा बोस ने अपनी पुस्तक “Wine in Ancient India” में इसे लेकर बेहद महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने लिखा है:
“क्षत्रिय अंगूर का जूस और गन्ने के रस को काफ़ी पसंद करते थे। 629 ईस्वी में चीन से भारत की यात्रा पर आए हुएन सांग ने लिखा है कि बौद्ध भिक्षु और ब्राह्मण एक प्रकार के रस को पीते हैं, जिसे अंगूरों से बनाया जाता है। सांग ने आगे लिखा है कि वैश्य भी इस प्रकार का जूस पीते हैं लेकिन वह फेर्मेंटेड नहीं होता।”
Grape has 1000s year old references in Charak Samhita, in Charak Sutra Sthan 25th chapter, pharmaceutical preparation by the name of “Draksharishta” (Draksha is Grape)
— Emerr GencyExitOnly (@alladeen_mofo) June 4, 2019
अगर मुगलों की बात करें तो बाबर ने 16वीं शताब्दी में दिल्ली में राज करना शुरू किया, जबकि चीनी यात्री ने उससे लगभग 900 वर्ष पूर्व भारत में अंगूरों और अंगूर के रस का जिक्र किया है। इससे पता चलता है कि ‘द प्रिंट’ के लेख में किया गया दावा बिलकुल ही ग़लत है और झूठ है। इतिहास के नाम पर ग़लत चीजें बताई जा रही हैं ताकि मुगलों का झूठा महिमामंडन किया जा सके।
I found this reference of Houen Tsang (629-645AD) who says Kshatriyas were fond of juice of grapes and sugar cane..and Brahmans used a sort of syrup made from grapes. So grapes were not brought by Moghals. Ref- wine in ancient india, p 43, D K Bose ,1922, pic.twitter.com/JdI9oYnx95
इसी तरह ट्विटर पर हमसा नंदी नामक व्यक्ति ने याद दिलाया कि 1025 ईस्वी में लिखी गई पुस्तक “लोकोपकार” में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों को बनाने के लिए अंगूरों का प्रयोग करने की रेसिपी बताई गई है। यह भी मुगलों के भारत में आने से कई शताब्दी पहले की पुस्तक है। इस तरह से ‘द प्रिंट’ में सलमा युसूफ हुसैन के दावे लगातार झूठे साबित हुए। मुगलों के आने से कई शताब्दी पहले की कई पुस्तकों में अंगूर व अंगूर से बने खाद्य पदार्थों का जिक्र यह बताता है कि मुगलों ने भारत को अंगूर नहीं दिया, यहाँ के लोग पहले से ही इसका सेवन कर रहे थे।
केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक करके एक अहम और बड़ा फैसला लिया है। दरअसल, उन्होंने ईद के मौक़े पर घोषणा की है कि आने वाले 5 सालों में 5 करोड़ अल्पसंख्यक छात्रों को ‘प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति’ दी जाएगी। जिसमें 50 प्रतिशत छात्रवृत्ति छात्राओं को दी जाएगी। छात्रवृत्ति का लाभ लेने की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बना दिया गया है।
नकवी के मुताबिक आने वाले पाँच वर्षों में विकास की गाड़ी को विश्वास के हाईवे पर दौड़ाना उनकी प्राथमिकता है, ताकि हर जरूरतमंद की आँखों में खुशी और जीवन में समृद्धि लाई जा सके। उनका कहना है कि वो विश्वास के हाइवे पर न कोई स्पीड ब्रेकर आने देंगे और न ही कोई रोड़ा।
“Padho-Badho” campaign will be launched across the country to encourage education of Minority girls. Educational infrastructure will be developed on war footing in those areas of the country where people don’t send their daughters to schools due to socio-economic reasons. pic.twitter.com/omyXucHkkC
— Mukhtar Abbas Naqvi (@naqvimukhtar) June 4, 2019
केंद्रीय मंत्री नकवी का कहना है कि 3E यानी एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट और एम्पावरमेंट उनका लक्ष्य है, जिसको पूरा करने के लिए वो मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने बताया है कि मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करने हेतु ‘पढ़ो-बढ़ो’ अभियान भी चलाया जाएगा। इसके अलावा दूरगामी इलाकों में जहाँ कई कारणों से लोग लड़कियों को शिक्षित होने नहीं भेजते, वहाँ शैक्षणिक संस्थानों को सुविधाएँ एवं साधन उपलब्ध कराने का कार्य किया जाएगा। मोबाइल वैन के जरिए लोगों को शिक्षा-रोजगार से जुड़े सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी देने के लिए देश भर में अभियान चलाए जाएँगे।
Our target is to provide “Pradhanmantri Scholarship” to 5 crore students in next 5 years, which will include more than 50 % girl students. Entire process of “Pradhanmatri Scholarship” has been made easier and transparent through DBT mode. pic.twitter.com/Ru31poR4SX
— Mukhtar Abbas Naqvi (@naqvimukhtar) June 4, 2019
केंद्रीय मंत्री ने छात्रवृत्ति की घोषणा करने के साथ ही रोजगार पर भी 5 साल का रोडमैप पेश किया है। नकवी ने बताया है कि शिल्पकारों/कारीगरों/दस्तकारों को रोजगार दिलाने और बाजार मुहैया करवाने के लिए अगले पाँच वर्षों में 100 से अधिक ‘हुनर हाट’ का आयोजन होगा। उनके स्वदेशी उत्पादनों को ऑनलाइन बेचने की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा 5 साल में 25 लाख नौजवानों को रोजगारपरक कौशल उपलब्ध करवाने की बात और ‘सीखो और कमाओ’ ‘नई मंजिल’ ‘गरीब नवाज कौशल विकास’ और ‘उस्ताद’ जैसे रोजगारपरक कौशल विकास कार्यक्रमों को प्रभावकारी बनाने की बात कही गई है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जब से गृह मंत्रालय सम्भाला है, तब से यह देखा जा रहा है कि जम्मू कश्मीर पर उनका विशेष ध्यान है। राज्य में विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन किए जाने की बात सामने आ रही है, जिसके बाद कश्मीरी नेताओं में हाहाकार मच गया है। राज्य के नेताओं ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वो सांप्रदायिक रास्ते पर चलते हुए कश्मीर का विभाजन करना चाहती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, परिसीमन के बाद जम्मू और कश्मीर को बराबर का हक मिलेगा। अभी विधानसभा सीटों की संख्या की बात करें तो कश्मीर का पलड़ा ज्यादा भारी है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ये ख़बर सुन कर कहा कि वो व्यथित हैं।
It’s rather surprising that the BJP, which talks about bringing J&K at par with other states by removing 370 & 35-A now wants to treat J&K differently from other states in this one respect.
मह्बूब्स मुफ़्ती ने ट्विटर पर लिखा, “केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन किए जाने की ख़बर सुन कर व्यथित हूँ। जबरदस्ती थोपा जाने वाला परिसीमन सांप्रदायिक राह पर चलते हुए राज्य का भावोत्तेजक विभाजन करने का प्रयास है। केंद्र सरकार हमारे पुराने घाव भरने की बजाए हमें नया दर्द दे रही है।” हालाँकि, अधिकारियों ने कहा कि किसी तरह का गठन या उनसे सलाह लेने सम्बन्धी कोई चर्चा अभी तक नहीं हुई है। राज्य भाजपा लगातार कई दिनों से परिसीमन की माँग कर रही है लेकिन अभी तक इस पर कुछ ठोस कार्य नहीं हुआ है।
Distressed to hear about GoIs plan to redraw assembly constituencies in J&K. Forced delimitation is an obvious attempt to inflict another emotional partition of the state on communal lines.Instead of allowing old wounds to heal, GoI is inflicting pain on Kashmiris
वहीं जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि वह ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि जनता की राय लिए बिना ऐसे किसी भी निर्णय का विरोध करने के लिए उनकी पार्टी पूरा ज़ोर लगा देगी। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि आर्टिकल 370 और 35A को ख़त्म कर जम्मू कश्मीर को भारत के बाकी राज्यों की तरह बनाने की बात करने वाली भाजपा अब राज्य के साथ अलग तरह का व्यवहार कर रही है, यह आश्चर्यजनक है। उन्होंने कहा कि अगर परिसीमन किया जाता है तो देश के सभी राज्यों में किया जाना चाहिए। वहीं पीपल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने कहा कि वो इस ख़बर की झूठी होने की आशा करते हैं।
आखिरी बार जम्मू कश्मीर में 1995 में परिसीमन किया गया था। राज्य के संविधान (जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान है) के मुताबिक यहाँ हर 10 साल के बाद परिसीमन होना तय था। मगर तत्कालीन फारुक अब्दुल्ला सरकार ने 2002 में इस पर 2026 तक के लिए रोक लगा दी थी। ऐसे में उमर अब्दुल्ला जो यह तर्क दे रहे हैं कि “अगर परिसीमन किया जाए तो पूरे देश में किया जाए” क्या वो अपने पिताजी और पूर्व मुख्यमंत्री से पूछेंगे कि क्यों उन्होंने 2026 तक इस पर रोक लगा दिया था, क्या यह रोक पूरे देश में एक साथ लगा था?
Requesting the central government @PMOIndia@HMOIndia to address the anxieties of the people of J&K on the proposed Delimitation exercise in violation of the Constitutional provisions. pic.twitter.com/H9HAbzs58B
सज्जाद लोन ने कहा, “मैं आशा करता हूँ कि कश्मीर के बारे में मीडिया में चल रही ख़बरें झूठी हैं। मैं इतनी ज्यादा जल्दबाज़ी का कारण नहीं समझ पा रहा हूँ।” वहीं पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल ने इसे गंभीर और विक्षुब्ध करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि अगर राज्य के सभी हिस्सों को बराबर हक़ देना है तो इसका निर्णय राज्य की जनता को ही करना चाहिए।
Hope and pray that media reports about Kashmir aren’t true. Don’t understand the earth shattering hurry. And this perception of being wronged at a provincial level. If thousands of graves in Kashmir dont add up to people being wronged. Wonder what wronged means.
बता दें कि राज्य में आखिरी बार 1995 में परिसीमन किया गया था, जब गवर्नर जगमोहन के आदेश पर जम्मू-कश्मीर में 87 सीटों का गठन किया गया था। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में अभी कुल 111 सीटें हैं, लेकिन 24 सीटों को रिक्त रखा गया है। जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक, इन 24 सीटों को पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ गया है और बाकी बची 87 सीटों पर ही चुनाव होता है। बता दें कि जम्मू-कश्मीर का अलग से भी संविधान है। हर 10 साल बाद परिसीमन किए जीने की व्यवस्था पर फारूक अब्दुल्ला सरकार ने रोक लगा दी थी।
राज्य में राजनीतिक असंतुलन की बात करें तो कश्मीर में 346 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधानसभा है, जबकि जम्मू में 710 वर्ग किलोमीटर पर। अगर परिसीमन किया गया तो जम्मू में क्षेत्रफल व मतदाता के आधार पर 15 सीटें बढ़ सकती हैं।
टाइम्स नाउ ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए यह बताया है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और छिंदवाड़ा के पूर्व सांसद कमल नाथ ने फरवरी 2010 से नवंबर 2011 के बीच ₹99 करोड़ से ज्यादा की नकदी की मनी लॉन्ड्रिंग की है। यह खुलासा चैनल की एंकर नाविका कुमार अपने रात के न्यूज़ शो न्यूज़ आवर में कर रहीं हैं।
आयकर विभाग का दावा, बहनोई के साथ चलाते थे हवाला रैकेट
आयकर विभाग ने यह दावा किया है कि कमलनाथ अपने बहनोई दीपक पुरी (मोज़रबियर कंपनी के मालिक) के साथ मिलकर काले धन को सफेद करने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग का रैकेट चलाते थे। इस साल अप्रैल में पड़े छापों के सुराग से उन्हें इसकी जानकारी मिली है। इसके अलावा उन्हें कुछ डायरीनुमा दस्तावेजी सबूत भी मिले जिनकी पुष्टि दीपक पुरी की ही कम्पनी के एक कर्मचारी ने की है।
आधिकारिक निवास से ‘सफाई’ हुई 99 करोड़ की
दावे के अनुसार ₹99 करोड़ से ज्यादा की मनी लॉन्ड्रिंग कमलनाथ के तत्कालीन आधिकारिक निवास 1, तुगलक रोड से हुई है। यह बंगला कमलनाथ को छिंदवाड़ा के सांसद के तौर पर मिला था। आयकर विभाग के अनुसार यहीं से नकदी को हवाला के लिए उठाया जाता था। इसके अलावा अपने आरोपों की पुष्टि के लिए आयकर विभाग मोज़रबियर के कर्मचारी के के खोंसला की निशानदेही को भी पेश कर रहा है।
पहले भी पड़ी है कमलनाथ पर रेड
इससे पहले भी कमलनाथ के करीबियों पर आयकर विभाग के छापे पड़ चुके हैं। अप्रैल में कमलनाथ के OSD के घर पड़े छापे से ₹9 करोड़ नकदी बरामद हुई थी। उनके भतीजे की कम्पनी पर पड़े आयकर के छापे में भी ₹1350 करोड़ की कर चोरी पकड़ी गई थी।
(यह डेवलपिंग स्टोरी है। अधिक जानकारी मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा।)
जब से 30 मई को नरेंद्र मोदी ने पीएम पद की शपथ ली है तब से ही बिहार की सियासत के सुर बदलने लगे थे। लगातार बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डाला जाए तो बिहार में राजनीतिक उठापटक साफ नज़र आएगी। इसी उठापटक का परिणाम है कि बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने कह दिया है कि अगर नीतीश कुमार महागठबंधन में आने की सोचते हैं तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा।
राबड़ी देवी के इस कथन के वर्तमान सियासी हालात में मायने कुछ ज़्यादा ही हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में नीतीश कुमार ने 30 मई को नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि मात्र एक सीट के लिए JDU मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बनेगा। उसी दिन नीतीश अमित शाह के ऑफर को ठुकरा कर चुपचाप पटना लौट गए थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि जब 2 जून को नीतीश ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तो बीजेपी को इससे बाहर रखकर बदला ले लिया।
ऐसे में इस राजनीतिक परिदृश्य में आरजेडी नेता राबड़ी का यह कहना कि अगर जेडीयू महागठबंधन में आने की पहल करता है तो महागठबंधन इस पर विचार करेगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी द्वारा सोमवार (जून 3, 2019) को पटना में दी गई इफ्तार पार्टी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी शामिल थे लेकिन दोनों के बीच मुलाकात नहीं हो सकी थी। फिर भी ऐसे बयान राजनीतिक पलटूपन का शानदार उदाहरण है। क्योंकि इससे पहले नीतीश को आरजेडी नेता ‘पलटू चाचा’ कह चुके हैं। पर यहाँ मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आरजेडी मौजूदा हालात के मद्देनज़र नीतीश की बीजेपी से तल्खी का फायदा उठाना चाहती है।
बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले आरजेडी ने दावा किया था कि नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होने के मात्र 6 महीने बाद ही दोबारा महागठबंधन में वापस आना चाहते थे, लेकिन इसके लिए लालू यादव और तेजस्वी यादव तैयार नहीं हुए। जून 2018 में तेजस्वी ने यहाँ तक कहा था कि नीतीश कुमार की विश्वसनीयता नहीं बची है। अगर मान भी लिया जाए कि हम फिर से नीतीश को गठबंधन में ले लेते हैं तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे कुछ समय बाद हमें धोखा नहीं देंगे। उनके लिए महागठबंधन के दरवाजे बंद हो चुके हैं। इसी पर, तेजस्वी यादव ने नीतीश को कई बार ‘पलटू राम’ और ‘पलटू चाचा’ की उपाधि भी दे डाली है।
बिहार की सियासत गज़ब के मोड़ पर है, एक तरफ जहाँ आरजेडी नीतीश को एक बार फिर से महागठबंधन में लेने को बेताब है क्योंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार से नीतीश के मन में पैदा हुए असंतोष को भुनाना चाहती है। लोकसभा के परिणामों से आरजेडी जान चुकी है कि नीतीश के कंधे पर सवार होकर शायद पार्टी को एक बार फिर बिहार की सत्ता मिल सकती है।
इधर नीतीश कुमार की स्थिति साँप-छछूंदर वाली हो गई है। कायदे से वो अगले पाँच साल तक केंद्र सरकार के साथ न कोई सौदा करने की स्थिति में हैं और न ही दबाव डलवाकर अपनी माँगे मनवा सकने की स्थिति में हैं। लिहाजा अगर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वे एक बार फिर से आरजेडी के साथ आ जाएँ तो शायद अगले पाँच साल तक वे एक बार फिर से सीएम बन सकते हैं।
लोकसभा चुनाव के बाद की प्रक्रियाएँ पूरी होते ही मोदी 2.0 पूरे एक्शन मोड में आ चुकी है। देश की जनता की निगाहें गृह मंत्री अमित शाह पर टिकी हुई हैं। पदभार संभालने के बाद अमित शाह एक्शन मोड में आ गए हैं। शाह ने गृहमंत्री का पद संभालने के बाद सबसे पहले, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय टॉप 10 आतंकियों की सूची तैयार कराने का काम किया है। शाह के इस फैसले से संदेश चला गया है कि वह आतंकवादियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने वाले हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने जो लिस्ट तैयार करवाई है, उसमें हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अल-बदर जैसे आतंकी संगठनों के प्रमुख आतंकियों को शामिल किया गया है। ये आतंकवादी जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में आतंक फैला रहे हैं।
गृह मंत्री की टॉप 10 लिस्ट में शामिल आतंकवादियों की सूची :
वसीम अहमद उर्फ ओसामा – वसीम अहमद लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी है और शोपियाँ डिस्ट्रिक्ट का कमांडर है।
रियाज अहमद नाईकू – यह हिजबुल मुजाहिदीन का चीफ कमांडर है।
मुहम्मद अशरफ खान – मुहम्मद अशरफ हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकवादी और अनंतनाग का डिस्ट्रिक्ट कमांडर है।
मेहराजुद्दीन – यह भी हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकवादी है और बारामूला डिस्ट्रिक्ट का कमांडर है।
डॉ. सैफुल्ला – डॉ. सैफल्ला हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़ा है और इसका काम संगठन में नए लोगों को भर्ती करने का है।
अरशद-उल-हक – अरशद उल हक हिजबुल का आतंकवादी है और पुलवामा का डिस्ट्रिक्ट कमांडर है।
हाफिज उमर – ये जैश-ए-मोहम्मद का आतंकवादी है और पाकिस्तान का रहने वाला है।
जाहिद शेख – जाहिद शेख भी जैश-ए-मोहम्मद का ही आतंकवादी है।
जावेद अहमद मट्टू – जावेद अहमद मट्टू आतंकवादी संगठन अल बदर से जुड़ा हुआ है।
एजाज अहमद मलिक – सुरक्षा एजेंसियों को अंदेशा है कि हिजलुब ने एजाज को कुपवाड़ा का कामांडर नियुक्त किया है।
286 आतंकी अभी भी सक्रिय हैं घाटी में
मंत्रालय ने दावा किया है कि घाटी में इस साल 102 आतंकवादी मारे गए हैं। जबकि 286 आतंकी अभी भी सक्रिय हैं। गौरतलब है कि पदभार संभालने के बाद अमित शाह ने तुरंत जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक से मुलाकात की। इस मुलाकात में शाह ने राज्य में सुरक्षा स्थिति के बारे में जानकारी दी। जम्मू-कश्मीर में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लागू है। 15 मिनट की मुलाकात में राज्यपाल ने गृह मंत्री अमित शाह को अमरनाथ यात्रा की तैयारी से अवगत कराया। 46 दिन तक चलने वाली यह यात्रा 1 जुलाई को मासिक शिवरात्रि के दिन से शुरू होगी और 15 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा के दिन संपन्न होगी।
‘हिन्दू’ नाम होते हुए भी हिन्दूफ़ोबिया का गढ़ अख़बार ‘द हिन्दू’ हिंदुत्व के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है। गौड़िया वैष्णव संप्रदाय/इस्कॉन के एनजीओ ‘अक्षयपात्र फाउंडेशन’ के खिलाफ बच्चों के मिड-डे मील को प्याज-लहसुन, दलित कुक और पता नहीं क्या-क्या लेकर प्रोपेगैंडा किया था, और अब उनका जगन्नाथ पुरी के खिलाफ ‘हिट जॉब’ सामने आया है। इसमें जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में विघ्न डालने के लिए पर्यावरण की झूठी चिंता के बहाने रथ बनाने पर रोक लगाने की ज़मीन तैयार की जा रही है। एक संदिग्ध दिख रहे एनजीओ के हवाले से यह माँग की जा रही है कि पुरी की रथयात्रा के रथ बनाने के लिए पेड़ काटना बंद कर दिया जाए।
एकतरफ़ा कवरेज
पत्रकारिता के ककहरे में से एक होता है ‘संतुलित कवरेज’। यानि कि किसी भी स्टोरी के किसी एक पहलू को पकड़ने की बजाय हर पक्ष को अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है, उसके बाद सभी के उत्तर प्रकाशित किए जाते हैं। 140 साल पुराने और 12 लाख प्रतियाँ रोज़ प्रकाशित करने वाले अख़बार की स्टोरी में यह सन्तुलन, यह निष्पक्षता पूरी तरह गायब हैं। केवल उस एनजीओ, वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर, के निराधार, अनर्गल आरोपों को ऐसे छापा गया है मानो वह ब्रह्म-वाक्य हों।
कोई आँकड़े नहीं
एनजीओ दावा करता है कि पेड़ों के कटने से होने वाले ‘असली नुकसान’ की कभी भी भरपाई नहीं हो सकती- तब भी नहीं जब यह धूर्त एनजीओ खुद मानता है कि जगन्नाथ पुरी आगामी वर्षों में रथ-निर्माण के लिए जरूरी लकड़ी के लिए खुद पहले से पेड़ लगाता है। लेकिन यह कौन सा ‘असली नुकसान’ है, इसका क्या पैमाना है, इसे कौन नाप रहा है, कैसे नाप रहा है, इसका कोई भी हिसाब नहीं है। और हो भी नहीं सकता, क्योंकि ऐसा कोई ‘असली नुकसान’ है ही नहीं। एनजीओ को छपास की पिपासा है, और ‘द हिन्दू’ जैसे हिन्दूफ़ोबिक पत्रकारिता के समुदाय विशेष के अख़बार को कोई चाहिए जिसके हवाले से हिन्दूफ़ोबिक प्रोपेगैंडा फैलाया जा सके।
एनजीओ की भी कोई विश्वसनीयता नहीं
जिस एनजीओ, वैदिक साइंस रिसर्च सेंटर, का हवाला द (एंटी-)हिन्दू देता है, वह खुद भी विश्वसनीयता के किसी भी पैमाने पर खरा नहीं उतरता। जैसा कि ऊपर बताया गया है, वह ‘असली नुकसान’ का कोई आँकड़ा या प्रमाण नहीं देता, केवल दावा फेंक देता है। इसके अलावा भी इसकी कहानी में कई छेद हैं। द हिन्दू इसे ओडिशा स्थित एनजीओ बताता है, लेकिन इसके फेसबुक पेज पर अगर देखें तो यहाँ अधिकतर तमिल भाषा के अन्य लोगों के पोस्ट्स साझा होते हैं। न ही बहुत ज्यादा इस पेज के खुद के पोस्ट्स हैं, न ही इसकी कथित स्थानीय भाषा ओड़िया में पोस्ट्स हैं।
इसके अलावा इस लेखक ने जब इस एनजीओ की वेबसाइट पर जाने की कोशिश की तो कंप्यूटर के एंटी-वायरस सॉफ्टवेयर ने चेतावनी दी कि इस वेबसाइट पर जाने में निजी जानकारी के अनधिकृत प्रयोग, ऑनलाइन पहचान की चोरी (आइडेंटिटी थेफ़्ट) आदि का खतरा है। यह इस एनजीओ पर, और उसके ‘विरोध’ पर आधारित द (एंटी-)हिन्दू की रिपोर्ट पर और भी सवालिया निशान खड़े करता है।
हिन्दुओं की आस्था और परंपराओं पर सीधा हमला
हिन्दुओं की आस्था पर, उनकी परंपराओं पर हमला, उन्हें खत्म करने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करना ही इस लेख का असली मकसद है, और उपयुक्त ज़मीन तैयार करने के बाद द (एंटी-)हिन्दू सीधे-सीधे यही करने पर उतर भी आता है। लेख में द (एंटी-)हिन्दू आगे लिखता है (संदिग्ध एनजीओ के हवाले से)- यह परंपरा आम लोगों के मानस में पेड़ों की महत्ता को कम करती है जो पेड़ों के परिपक्व होने में लगने वाले समय और उनके धरती के रक्षक होने को समझ नहीं पाते। यानि सीधे-सीधे रथयात्रा की परंपरा को अवैध साबित कर खत्म करने के लिए आह्वाहन किया जाता है।
अकेला अपवाद नहीं, पूरी शृंखला है
यह लेख कोई अपवाद नहीं, बार-बार आजमाया हुआ फार्मूला है हिन्दुओं की हर परंपरा को खत्म करने का- पहले सालों तक धीरे-धीरे उस पर परंपरा पर कभी समाजशास्त्रीय बहाने से, कभी पर्यावरण तो कभी लैंगिक-न्याय के नाम पर सवाल उठाओ, और जब ‘माहौल’ बन जाए, अपने प्रेशर ग्रुप तैयार हो जाएँ, तो न्यायिक याचिका डालकर उसे प्रतिबंधित कर दो।
सबरीमाला पर सालों तक मैगज़ीन्स आदि के जरिए सवाल उठा कर सामाजिक रूप से अमान्य करने का माहौल तैयार हुआ; पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के पहले चुन-चुन कर केवल दीपावली के समय वायु प्रदूषण पर लेख लिखे गए ताकि ऐसा लगे कि एक दीपावली का त्यौहार ही सब लोगों के हिस्से की साल भर की ऑक्सीजन हड़प रहा है; दही-हांडी और जल्लीकट्टू को भी प्रतिबंधित करने के पहले ‘इकोसिस्टम’ ने उनपर सालों तक ‘चिंता जाहिर कर’ लोगों को इनमें भाग न लेने की एडवाइज़री जारी की, और अब काले दिल वाले इन असुरों की गिद्ध-दृष्टि पुरी के श्री कृष्ण के रथ पर है। यह हिन्दुओं पर है कि वह इन असुरों को रथ का पहिया तोड़ देने देते हैं, या इनके आसुरिक इरादों को ही रथयात्रा के नीचे कुचल देते हैं…
आज ईडी दफ्तर जाने से पहले रॉबर्ट वाड्रा ने अपने ‘दुख’ को फेसबुक पर शेयर किया। रॉबर्ट ने फेसबुक पर लिखा, ‘जाँच एजेंसियों ने मुझे 13 बार पूछताछ के लिए बुलाया। मैंने हर सवाल का जवाब दिया है, मुझे बेवजह परेशान किया जा रहा है।’ रॉबर्ट के इस पोस्ट के बाद किसी को भी उनसे सहानुभूति हो जाएगी, कि बार-बार कौन से सवाल है जो 13 बार में पूछे नहीं गए। लेकिन हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों रॉबर्ट से ईडी को बार-बार सवाल पूछने के लिए जरूरत पड़ रही है।
दरअसल, ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि रॉबर्ट के सहयोगियों द्वारा लिए बयानों और रॉबर्ट के बयानों में बार-बार विरोधाभास देखने को मिल रहा है। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो एक ही सवाल के जवाब पर रॉबर्ट वाड्रा खुद ही जवाब बदलते पाए गए हैं। अब ईडी द्वारा पूछे गए ये सवाल कौन से हैं और इनका जवाब रॉबर्ट के सहयोगियों ने क्या दिया और रॉबर्ट वाड्रा ने क्या दिया? आइए हम आपको बताएँ।
दरअसल, अपनी पूछताछ के जरिए ईडी कुछ तथ्यों पर स्पष्टता चाहती है। लेकिन रॉबर्ट और उनके बयानों से ऐसा मुमकिन नहीं हो पा रहा है। मसलन कुछ सवाल और विरोधारभास के साथ जवाब निम्नलिखित हैं।
1. तथ्य- क्या रॉबर्ट वाड्रा, पूजा चड्ढा को जानते हैं? इस तथ्य पर स्पष्टता पाने के लिए ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा से दो दिन सवाल किए 7 फरवरी को ईडी के सवाल नं-15 पर रॉबर्ट ने कहा कि वह इस बारे में स्पष्ट नहीं बता सकते (cannot categorically state) जबकि 8 फरवरी को ईडी के सवाल नं-35 पर उन्होंने मना कर दिया कि पूजा चड्ढा को जानते ही नहीं हैं।
2. तथ्य-क्या रॉबर्ट वाड्रा, सुमित चड्ढा को जानते हैं? 7 फरवरी को ईडी के सवाल नं-9 और 11 पर रॉबर्ट ने बयान दिया कि वो सुमित से मिले ही नहीं हैं। जबकि 14 फरवरी को सवाल नं-16 के उत्तर में रॉबर्ट के सहयोगियों के बयान अनुसार वो सुमित चड्ढा को सुमित भंडारी के जरिए जानते हैं।
3. तथ्य- क्या रॉबर्ट वाड्रा, सीसी थंपी को जानते हैं? 6 फरवरी को ईडी के सवाल नं-33 पर रॉबर्ट ने कहा कि वो सीसी थंपी को अमीरात की फ्लाइट में मिले थे। जबकि सीसी थंपी ने 6 अप्रैल 2017 को पूछताछ के दौरान सवाल नं-11 पर जवाब दिया था कि वो सोनिया गाँधी के पीए माधवन के जरिए रॉबर्ट से मिले।
4. तथ्य- क्या रॉबर्ट वाड्रा को 12 ब्राएंस्टन स्क्वायर के बारे में जानकारी थी? 7 फरवरी को सवाल नं-30 के जवाब में रॉबर्ट ने बताया था कि वो उस जगह कभी नहीं रुके हैं। जबकि सीसी थंपी का कहना है कि वह 12 ब्राएंस्टन स्क्वायर में ठहर चुके हैं।
5.तथ्य- रॉबर्ट वाड्रा के पास सुमित चड्ढा और पूजा चड्ढा के ईमेल? 6 फरवरी सवाल नं-6 पर रॉबर्ट ने स्वीकारा कि [email protected] उनकी इमेल आईडी है और 7 फरवरी की पूछताछ में सवाल संख्या 43 से 54 में वो बार-बार नकारते दिखे कि ईमेल उन्हें लिखे ही नहीं गए हैं। वहीं, मनोज अरोड़ा ने 16 फरवरी को सवाल संख्या 8 और 15 के जवाब में बयान दिया कि सुमित चड्ढा द्वारा भेजे गए ईमेल में रॉबर्ट वाड्रा के ही हैं।
6.तथ्य- क्या रॉबर्ट वाड्रा विपुल बेरीवाल और संजीव वर्मा को जानते हैं? 7 फरवरी को सवाल नं- 23 पर रॉबर्ट वाड्रा ने साफ़ मना किया कि वो विपुल बेरीवाल को नहीं जानते हैं। इसके बाद 14 जनवरी को सवाल नं-39 पर और 31 जनवरी को पूछे गए सवाल नं-28 पर मनोज अरोड़ा ने बयान दिया कि वो विपुल बेरीवाल और रॉबर्ट को नहीं जानते हैं। हालाँकि हो सकता है कि उनकी रॉबर्ट के साथ अपॉइंटमेंट थी, जिस कारण उनके मोबाइल में बेरीवाल के नाम से विपुल का नंबर हो सकता है। संजीव वर्मा को भी दो पक्षों ने जानने से इंकार किया।
7. तथ्य- क्या RV का मतलब रॉबर्ट वाड्रा है? 7 फरवरी को हुई पूछताछ में सवाल नं-24 के जवाब में रॉबर्ट ने कहा कि उन्हें RV के नाम से नहीं जाना जाता है, और न ही लोग उन्हें RV कहकर पहचानते हैं। जबकि मनोज अरोड़ा का कहना है कि उनके मोबाइल में रॉबर्ट वाड्रा का नाम MRV के नाम से सेव है। जिसका मतलब मिस्टर रॉबर्ट वाड्रा है।
8. तथ्य- क्या रॉबर्ट वाड्रा जगदीश शर्मा को जानते हैं? 6 फरवरी को दिए बयान में सवाल-22 और 24 में रॉबर्ट वाड्रा ने कहा कि वो जगदीश शर्मा उनके आस-पास मंडराता रहता था, उनको फॉलो करता था और उनसे जुड़ना चाहता था, लेकिन उन्होंने उनके साथ कभी काम नहीं किया था। जबकि 8 दिसंबर 2018 को हुई पूछताछ में सवाल 3 और 5 में जगदीश शर्मा ने बताया था कि वो गाँधी परिवार के करीबियों में से है, लेकिन सबसे ज्यादा वो रॉबर्ट वाड्रा के करीब है। वो रॉबर्ट वाड्रा के लिए पॉलिटिकल प्रोफाइलिंग करते थे और कई मामलों में सलाह भी देते थे।
9.क्या रॉबर्ट वाड्रा को ‘साहब’ के नाम से जाना जाता है? 7 फरवरी 2019 को सवाल नं-24 का जवाब देते हुए रॉबर्ट ने बताया था कि उनके अधीन काम करने वाले उन्हें बॉस कहते हैं, लेकिन 8 मार्च को सवाल नं-24 पर रॉबर्ट ने कहा कि उन्हें रॉबर्ट साहब कहकर नहीं बुलाया जाता। जबकि दिसंबर 12, 2019 की पूछताछ में जगदीश शर्मा का कहना था कि रॉबर्ट साहब कहकर ही बुलाया जाता था।
8 दिसंबर 2018 को अनुज नौटियाल ने अपने बयान में कहा कि जगदीश शर्मा ने उन्हें बतया था कि उनके बॉस ने विदेशी सम्पत्तियों में निवेश कर रखा है। यहाँ जगदीश ने रॉबर्ट वाड्रा के लिए बॉस शब्द का प्रयोग किया गया था। 16 जनवरी की पूछताछ में मनोज अरोड़ा द्वारा भी बताया गया था कि रॉबर्ट वाड्रा को RV कहा जाता है।
कॉन्ग्रेस और इस पार्टी के समर्थकों ने मोदी सरकार के दौरान चर्चा में आने वाली हर दूसरी चीज को गलत बताया लेकिन सच्चाई जानकार आप हैरान रह जाएँगे। वास्तविकता यह है कि जितना लाभ डिजिटल इंडिया और दैनिक सस्ते इंटरनेट का मोदी विरोधियों ने उठाया है, उतना शायद ही किसी और ने उठाया होगा। चाहे कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस के माध्यम से दर्शनशास्त्र सीखकर फेक न्यूज़ को पूरी चौड़ाई से सतसंग बनाकर पढ़ाने वाले सोशल मीडिया विचारक हों, या फिर उदाहरण के लिए आज राजस्थान सचिवालय में घटी एक निंदनीय घटना को ही ले लीजिए।
दरअसल, सोमवार को शासन सचिवालय में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की ओर से वीडियो कॉफ्रेंस का आयोजन किया गया था। उस समय विभाग की सचिव मुग्धा सिन्हा विभाग के अधिकारियों से विभिन्न योजनाओं पर चर्चा कर रही थीं। इसी दौरान स्क्रीन पर अचानक ‘गन्दी’ वीडियो चल गई। यह वीडियो तकरीबन 2 मिनट तक चलता रहा और किसी तरह से टेक्निकल टीम ने वीडियो को बंद किया। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि इस घटना की अब जाँच होनी है। जबकि कॉन्ग्रेस सरकार ‘हुआ तो हुआ’ के ध्येयवाक्य पर काम करती है, ऐसे में जाँच सिर्फ घटिया की जगह अच्छी क्वालिटी की वीडियो तलाशने से ही हो सकता है।
नहीं, राजीव गाँधी इसलिए नहीं लेकर आए थे देश में कम्प्यूटर
टेक्नोलॉजी, कम्प्यूटर का विषय हो और बोफोर्स घोटालों के आरोपित हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जी को याद न किया जाए. यह संभव ही नहीं है। नेहरुघाटी सभ्यता में जन्मे कुछ विचारकों के अनुसार रॉबर्ट वाड्रा के ससुर राजीव गाँधी जी खुद अपने कन्धों पर लादकर कम्प्यूटर इस देश में लेकर आए थे। लेकिन सोमवार को सचिवालय में घटी इस निंदनीय घटना के बाद कुछ अराजक तत्वों ने प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की जगह पर शुक्रिया राजीव के नारे लगाने शुरू कर दिए।
लेकिन, फेकिंग न्यूज़ की ख़बरों का फैक्ट चेक कर के मशहूर हुए कुछ फेक न्यूज़ एक्सपर्ट विचारकों ने तुरंत इसका भी फैक्ट चेक किया और बताया, “नहीं, जिस कम्प्यूटर में यह पॉर्न वीडियो चला, उसे राजीव गाँधी देश में लेकर नहीं आए थे।”
हालाँकि, यह मनन करने लायक बात है कि जब इस देश में लाए गए एक-एक कम्प्यूटर के पीछे राजीव गाँधी का हाथ है, तो आखिर उन्होंने कॉन्ग्रेस के नेताओं को क्यों छोड़ दिया?
वहीं, इस घटना के अरविन्द केजरीवाल के कानों में पड़ते ही उन्होंने तुरंत उच्चस्तरीय कमिटी बैठाकर निर्णय लिया कि राजस्थान में जब भी विधानसभा चुनाव होंगे वो बिना टेक्नीकल मिस्टेक के ही जनता के उत्साह को ध्यान में रखते हुए मुफ्त में ‘गन्दी बात’ उपलब्ध कराएँगे। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे समय में जब लोग जेसीबी की खुदाई के अलावा कुछ और बात करने को तैयार ही नहीं थे, ऐसे में कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान में हुई इस घटना ने लोगों का पूरा ध्यान बटोर लिया।
खैर, हुआ तो हुआ का समय है। कभी दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर हो जाता है, तो कभी राजस्थान के सचिवालय में हो जाता है, कभी-कभी तो संसद में भी चल पड़ा था। लेकिन, इसका मतलब ये नहीं कि एक बार गलती से चला दो और दूसरी बार जाँच करने के लिए। हालाँकि, जो भी हुआ उसमें डिजिटल इंडिया और दैनिक सस्ते इंटरनेट की छाप तो है ही, चाहे गोदी मीडिया कितना भी छुपाने की कोशिश करे।
आप तो नेहरू और राजीव गाँधी को शुक्रिया कहना भूल गए, लेकिन नेहरुघाटी सभ्यता के विचारक नहीं भूले- एक नजर
कश्मीर घाटी में टेरर फंडिंग के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। एनआईए ने तीन अलगाववादी नेताओं शब्बीर शाह, आसिया आंद्राबी, और मशरत आलम को गिरफ्तार कर दिल्ली की एक स्पेशल कोर्ट के सामने पेश किया, जहाँ से उन्हें 10 दिन की एनआईए कस्टडी में भेज दिया गया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बतौर केंद्रीय गृह मंत्री पदभार संभालने के हफ्ते भर के भीतर ही कश्मीर में आतंक के खिलाफ यह पहली बड़ी कार्रवाई है।
NIA gets 10-day custody of separatist Shabbir Shah, Asiya Andrabi, Masarat Alam Bhat. pic.twitter.com/7kSgNAy9gU
दरअसल, यह मामला 2008 के मुंबई आतंकवादी हमले के सरगना और जमात उद दावा प्रमुख हाफिज सईद से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने विशेष न्यायाधीश राकेश स्याल की अदालत में बंद कमरे में चल रही सुनवाई के दौरान तीनों को गिरफ्तार किया और 15 दिनों तक उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की माँग की। आरोपियों के वकील एम एस खान ने बताया कि आसिया और शाह अलग-अलग मामलों में पहले से ही हिरासत में हैं, जबकि आलम को ट्रांजिट रिमांड पर जम्मू- कश्मीर से लाया गया था।
एनआईए ने 2018 में सईद, एक अन्य आतंकवादी सरगना सैयद सलाउद्दीन और दस कश्मीरी अलगाववादियों के खिलाफ घाटी में आतंकवादी गतिविधियों के लिये कथित तौर पर धन मुहैया कराने और अलगाववादी गतिविधियों के मामले में आरोपपत्र दायर किया था। आरोपियों के खिलाफ जिन अपराधों के तहत आरोपपत्र दायर किया गया है, उनमें आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) और गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय अपराध शामिल है।
गौरतलब है कि, 30 मई 2017 को एनआईए ने अलगाववादी नेताओं और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कुछ अज्ञात सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस मामले में पहली गिरफ्तारी 24 जुलाई 2018 को हुई थी। इन पर हिजबुल मुदाहिदीन, दुख्तरन-ए-मिल्लत और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के साथ मिलकर आतंक के लिए धन जुटाने (टेरर फंडिंग) का आरोप है।