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हिंदीभाषियों के विशाल हृदय का सबूत है दक्षिण की फिल्मों का व्यापक बाज़ार

नई शिक्षा नीति पर जो ड्राफ्ट बनी है, उसे फाइनल नीति समझ कर हल्ला मचा रहे दक्षिण के नेता जनता की भावनाओं को समझने में अक्षम रहे हैं। ऐसा नहीं है कि वे उत्तर भारतीय जनता के बात-विचार से दूर हैं, बल्कि वे ख़ुद के प्रदेश की जनता से भी बुरी तरह अनभिज्ञ हैं। यहाँ हम ‘नेशनल एजुकेशन पॉलिसी ड्राफ्ट’ से इतर एक व्यापक स्तर पर चर्चा करेंगे क्योंकि इसे लेकर काफ़ी बहस हो चुकी है और सरकार को बदलाव करने को मजबूर होना पड़ा है। वैसे, यह ड्राफ्ट लाया ही गया था जनता की राय के आधार पर बदलाव करने के लिए, सरकार ने साफ़ कर दिया है कि यह सिर्फ़ एक रिपोर्ट है, फाइनल नीति नहीं है। हिंदी से किसे दिक्कत है? दक्षिण भारतियों को? इसका जवाब है- नहीं, बिलकुल नहीं।

दक्षिण भारतीय नेता हिंदी से दिक्कत होने का दिखावा करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार दक्षिण भारत के लोग अच्छी तरह हिंदी सीख जाएँ तो इन नेताओं का काम काफी कठिन हो जाएगा। इसके लिए हमें 15 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। द्रमुक और अन्नाद्रमुक कई वर्षों से लगातार हिंदी का विरोध करते रहे हैं और करुणानिधि की तो पूरी राजनीति ही हिंदी का विरोध कर के चमकी थी (अन्य आन्दोलनों के अलावा)। आज करुणानिधि के बेटे और डीएमके प्रमुख स्टालिन अपने पिता की ही नीति पर चल रहे हैं, जो सफल रही थी। आज से लगभग 15 वर्ष पहले जब अभिनेता विजयकांत ने राजनीति में एंट्री ली थी, तब उन्होंने हिंदी भाषा पढ़ाए जाने का समर्थन किया था।

तब युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय रहे विजयकांत तमिलनाडु में नेता प्रतिपक्ष बने। हो सकता है कि अब एक फुल टाइम राजनीतिज्ञ के रूप में उनकी राय बदल गई हो लेकिन तब उन्होंने कहा था कि तमिलनाडु के स्कूलों में तमिल को पहली प्राथमिकता देते हुए हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए। विजयकांत का मानना था कि अंग्रेजी से तमिलनाडु के छात्रों के लिए एक वैश्विक दरवाजा खुल जाएगा, वहीं हिंदी भाषा सीखने के बाद उत्तर भारत में या तमिलनाडु से बाहर अन्य कई राज्यों में नौकरी करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। विजयकांत एक सफल अभिनेता रहे हैं, अब उनका राजनीतिक करियर भले ही बुरे दौर से गुज़र रहा हो लेकिन तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में नेता प्रतिपक्ष का राजनीति से परे बयान का अध्ययन ज़रूरी है।

अब सवाल यह उठता है कि जिस राज्य में हिंदी को गालियाँ देने पर वोट मिलते हों, वहाँ कोई उभरता हुआ नेता हिंदी का समर्थन क्यों करेगा? इसका जवाब है- बदलते जमाने के साथ बदलती इंडस्ट्री और बदलती पीढ़ियों के साथ बदलती सोच। फ़िल्म इंडस्ट्री में लम्बे समय तक सक्रिय रहे विजयकांत को इंडस्ट्री की समझ थी और बदलते दौर में उन्हें पता चल गया था कि अगर तमिल फ़िल्मों को राज्य की दहलीज पार करा कर देश-दुनिया में लोकप्रिय बनाना है तो हिंदी में डब्ड फ़िल्मों के बाजार में घुस कर छाना पड़ेगा, अन्यथा तमिलनाडु के कुछ जिलों में छोड़ कर टॉलीवुड का कहीं भी कोई प्रभाव नहीं रह जाएगा।

समझदार विजयकांत को सिनेमा के बदलते दौर का अनुभव था और इसीलिए उन्होंने ऐसा बयान दिया। और देखिए, हुआ भी ऐसा ही। न सिर्फ़ तमिल बल्कि तेलुगु सिनेमा इंडस्ट्री भी इस मामले में काफ़ी आगे निकल गई। आज दक्षिण भारतीय फ़िल्मों का हिंदी डब्ड मार्केट इतना बड़ा है, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते। इसके लिए सबसे पहले बात यूट्यूब से शुरू करते हैं, फिर हिंदी टीवी चैनलों से होकर बॉक्स ऑफिस तक पहुँचेंगे। इसके लिए हम कुछ स्टेप बाय स्टेप प्रक्रिया बता रहे हैं, जिसे आप आजमा कर देख सकते हैं। इसे चरणबद्ध तरीके से कुछ यूँ करें:

  • सबसे पहले तो यूट्यूब पर जाएँ।
  • अब सर्च बॉक्स में लिखें- ‘Movie’ और इंटर दबाएँ।
  • अब फ़िल्टर वाले विकल्प में जाकर ‘Type’ में ‘Video’ चुनें, ‘Duration’ में ‘Long’ चुनें और ‘Sort By’ में ‘View Count’ चुनें।
  • ये सब करने का अर्थ है कि जिस भी वीडियो में ‘Movie’ शब्द का प्रयोग होगा और इसमें से सबसे ज्यादा बार जिसे देखा गया होगा, वो सबसे ऊपर दिखेगी। और, इसी तरह दर्शकों की संख्या के हिसाब से दर्शकों के घटते क्रम में ऐसी फ़िल्में दिखने लगेंगी।

अब आपने क्या देखा? सबसे पहले, नंबर एक पर जो फ़िल्म आती है, उसका नाम है- “सराईनोडू”। आश्चर्य की बात है कि जहाँ विश्व भर में इतनी सारी फ़िल्म इंडस्ट्री है और इनमें हजारों फ़िल्में हर साल बनती हैं, वहाँ एक दक्षिण भारतीय भाषा का हिंदी डब्ड फ़िल्म नंबर एक पर कब्ज़ा जमाए बैठे हैं। आखिर यह संभव कैसे हुआ? किसनें किया? “सराईनोडू” मशहूर तेलुगु स्टार अल्लू अर्जुन की फ़िल्म है और इसे यूट्यूब पर 17 करोड़ से भी अधिक बार देखा गया है। हिंदी भाषा में किसी फ़िल्म को 17 करोड़ बार देखने वाले कौन लोग हैं? इसमें कोई दो राय नहीं कि ये उत्तर भारतीय अथवा हिन्दीभाषी ही हैं, जिन्होंने इसे इतनी बार देखा।

अगर ऐसा भी मान लें कि इस हिंदी डब्ड फ़िल्म को एकाध लाख तेलुगु बोलने वाले लोगों ने देखा, तब भी इसके दर्शकों की संख्या कई करोड़ में होगी। अगर यह मान कर चलें कि एक व्यक्ति ने एक बार इस फ़िल्म को देखा, तो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या इससे बहुत ज्यादा नहीं है। यूट्यूब पर इसी आधार पर देखें तो दूसरे नम्बर पर भी एक तेलुगु फ़िल्म का हिंदी डब्ड वर्जन ही आता है और तीसरे नम्बर पर फिर अल्लू अर्जुन की ही ‘डीजे’ नामक फ़िल्म आती है। यहाँ एक बात ध्यान देने लायक है। अल्लू अर्जुन की इन फ़िल्मों का नामकरण टिपिकल हिंदी डब्ड फ़िल्मों की तरह करने की बजाय उसके ओरिजिनल नामों से ही अपलोड किया गया (जैसे- जीने नहीं दूँगा, मेरा इन्साफ, काट डालूँगा इत्यादि)।

इसका अर्थ यह है कि यह सब कुछ एक्सीडेंटल नहीं है बल्कि सच में दक्षिण भारतीय फ़िल्मों को उत्तर भारतीयों का प्यार मिलता है। यहाँ के लोग बाकायदा वीडियो स्ट्रीमिंग वेबसाइट पर इन फ़िल्मों को सर्च करते हैं, इनका इन्तजार करते हैं और फिर इन्हें देखते हैं। ये बहुत बड़ी बात है। ये उन दक्षिण भारतीय टुटपुँजिया नेताओं की पोल खोलता है, जो हिंदी का विरोध करते हैं और कहते हैं कि हिन्दीभाषी जनता तमिल और तेलुगु को पसंद नहीं करती। अगर ऐसा होता तो शायद सुदूर झारखण्ड के किसी कॉलेज में बैठा चौकीदार अपने फोन में दक्षिण भारतीय फ़िल्म नहीं देख रहा होता। अगर ऐसा होता तो कई दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के हिंदी डब्ड वर्जनों को करोड़ों व्यू नहीं मिलते।

यूपी और बिहार हो या झारखण्ड और उत्तराखंड, यहाँ कहीं भी दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्रति घृणा का भाव देखने को नहीं मिलता। “चेन्नई एक्सप्रेस” जैसी फ़िल्म में तमिल भाषा का बड़े स्तर पर प्रयोग किया गया और इसे दर्शकों का बहुत प्यार मिला, सबका मनोरंजन हुआ। लेकिन, दक्षिण भारतीय नेतागण इन सभी चीजों को कभी भी हाईलाईट नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि इससे सबको यह पता चल जाएगा कि हिन्दीभाषी जनता तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम जैसी भाषाओं से निकल कर आने वाले प्रोडक्ट्स और सर्विस को पसंद करती है, उनसे घृणा नहीं करती। इसका सबूत है हिंदी डब्ड फ़िल्मों को मिले करोड़ों व्यूज।

सिर्फ़ तेलुगु और तमिल ही नहीं, बल्कि मलयालम फ़िल्मों के हिंदी डब्ड वर्जन्स को भी यूट्यूब पर कई मिलियन व्यू मिलते हैं। अगर आप सेट मैक्स या स्टार गोल्ड जैसे बड़े हिंदी सिनेमा चैनल के कार्यकर्मों को देखें तो पता चलता है कि इन पर हिंदी फ़िल्मों से ज्यादा दक्षिण भारतीय फ़िल्में ही चलती रहती हैं। इसे लेकर कभी विरोध प्रदर्शन हुआ क्या? किसी ने कुछ भी कहा क्या? नहीं। ऐसा इसीलिए, क्योंकि जनता इन फ़िल्मों से, इनके अभिनेताओं से प्यार करती है। चैनलों को टीआरपी मिलती है और वे इन फ़िल्मों को बेधड़क चलाते हैं। आज तक किसी ने इसमें राजनीति नहीं घुसाई। लेकिन, अब आप एक बार इसका उल्टा सोच कर देखिए।

मान लीजिए, तमिल भाषा के सभी चैनलों पर दिन भर अमिताभ बच्चन और सलमान खान की फ़िल्में चल रही हों, तब क्या होगा? इन चैनलों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाएँगे, द्रविड़ नेतागण इन्हें ‘Slave Of Hindi’ ठहरा देंगे (जैसा वे हर उस व्यक्ति या संस्थान के साथ करते हैं, जो हिंदी भाषा की जरा सी भी पैरवी करे)। जब उत्तर भारतीय दर्शक हिंदी डब्ड फ़िल्में देख सकता है, तो वह सबटाइटल के साथ अच्छी तमिल और तेलुगु फ़िल्में भी देखता है। दक्षिण भारत के नेता और कथित एक्टिविस्ट्स कभी भी उत्तर भारतीय फ़िल्मों को वहाँ उतना प्यार मिलने नहीं देंगे, जितना वहाँ की फ़िल्मों को देश के अन्य हिंदीभाषी भागों में मिलता है।

इसका उदाहरण समझने के लिए “बाहुबली-द कन्क्लूजन” फ़िल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर एक नज़र डालिए। क्या आपको पता है कि हिंदी भाषा में बॉक्स ऑफिस पर सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली फ़िल्म दक्षिण भारत में बनी थी? क्या आपको पता है कि सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्म दंगल का भारत में बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बाहुबली के हिंदी वर्जन के कलेक्शन से कम है। अर्थात यह, कि तेलुगु फ़िल्म इंडस्ट्री की एक फ़िल्म आज हिंदी भाषा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है। इतना प्यार कहाँ से आता है, कौन से लोग देते हैं और क्यों देते हैं? अब हैदराबाद के लोगों ने रातो-रात पटना पहुँच कर फ़िल्म देख कर तो इसका बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बढ़ाया नहीं होगा न?

ऐसा इसीलिए, क्योंकि उत्तर भारत में दक्षिण भारतीयों के लिए वह हीन भावना नहीं है, जो दक्षिण भारत के नेताओं व एक ख़ास वर्ग में हिन्दीभाषी जनता के लिए है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि बिहार का एक व्यक्ति तमिल या तेलुगु फ़िल्म देखते वक़्त ये नहीं सोचता कि इसे कहाँ बनाया गया है और ये ओरिजिनल किस भाषा में थी, वो बस इसीलिए देखता है क्योंकि उसे यह अच्छी लगती है, हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के फ़िल्मों की तरह। यहाँ तोड़-फोड़ वाली राजनीति घुसाकर उस प्यार के बंधन को तोड़ने का प्रयास नहीं किया जाता। यही बात दक्षिण भारत के लोगों को समझना पड़ेगा। 17 करोड़ के बदले अगर 1 करोड़ लोग भी हिंदी के प्रति प्यार दिखाते हैं, तो इससे देश का ही भला होगा, एकता बढ़ेगी।

तमिलनाडु और आंध्र-तेलंगाना में फ़िल्म इंडस्ट्री और राजनीति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में, कई ऐसे नेता हैं, जो फ़िल्म प्रोड्यूसर भी हैं। ख़ुद कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कई फ़िल्मों का निर्माण किया है। यह ज़ाहिर सी बात है कि कन्नड़ फ़िल्मों में हिंदी का काफ़ी ज्यादा प्रयोग होता है और कन्नड़ फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में एक बात कही जाती है कि वहाँ के गानों में जब तक हिंदी भाषा के शब्द न डाले जाएँ, तब तक वे पूर्ण नहीं होते।ऐसे में, जब कर्नाटक का मुख्यमंत्री कथित ‘Hindi Imposition’ पर बोलता है, तो यह अच्छा नहीं लगता। कमल हासन हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में आकर ‘एक दूजे के लिए’ और ‘सागर’ जैस फ़िल्में करते हैं और सारे अवार्ड्स ले जाते हैं। कभी विरोध हुआ क्या? इसीलिए नहीं हुआ, क्योंकि होना ही नहीं चाहिए और ऐसा यहाँ कोई सोचता ही नहीं।

क्या इसका उल्टा संभव है? अगर किसी हिंदी फ़िल्मों के एक्टर को तमिल फ़िल्मों के सारे अवार्ड्स मिलने लगे तो वहाँ कैसा माहौल होगा? वहाँ के नेता कहने लगेंगे कि ये तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए अपमानजनक है क्योंकि ‘गैरों’ को अवार्ड्स दी जा रहे हैं। जब धनुष ने राँझना फ़िल्म की और उन्हें अवार्ड्स मिले, तब उन्हें इतना प्यार मिला कि वे वापस हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में फ़िल्म करने आए। एक बात जानने लायक है कि यह प्यार इंडस्ट्री के वीआईपी लोगों से नहीं बल्कि आम जनता से मिला था। जब रजनीकांत मुंबई आकर “अँधा कानून” फ़िल्म करते हैं तो उन्हें इस फ़िल्म में उनके को-स्टार अमिताभ जैसा ही प्यार मिलता है, क्यों? क्योंकि यहाँ इन सब बकवास मुद्दों को लेकर उत्पात नहीं मचाया जाता।

इस पूरे लेख का सार यह बताना है कि एक बार अगर जनता किसी चीज से कनेक्ट करने लगे तो उसे उखाड़ फेंकना मुश्किल होता है। दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी पढ़ाने का उद्देश्य भी यही था कि अपनी मातृभाषा के साथ-साथ देश में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा का भी बच्चों को ज्ञान दिया जाए, ताकि इस विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में रह रही जनता के बीच कनेक्शन स्थापित हों, वे एक-दूसरे से और ज्यादा जुड़ें। इससे बिहार और यूपी के बच्चे तेलुगु सीखेंगे और तमिलनाडु के बच्चे हिंदी सीखेंगे और वो एक-दूसरे को और अधिक अच्छी तरह से समझेंगे। इसमें उनका अपना अभी फायदा है क्योंकि वे नौकरी और पढाई के लिए अगर अपने राज्य से बाहर निकलते हैं तो उन्हें भाषा की समझ में दिक्कतें नहीं आएँगी।

अगर फ़िल्में देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने के काम आएँ, तो उसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए। केवल हिंदी, तमिल, तेलुगु और मलयालम ही क्यों, उड़िया, पंजाबी, असमी और मराठी फ़िल्मों को भी हूबहू देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुँचाया जाना चाहिए, ताकि देश के एक हिस्से के लोग दूसरे हिस्से की फ़िल्म इंडस्ट्री से परिचित हो सकें, एक-दूसरे के क्षेत्रों की अच्छी फ़िल्मों से रूबरू हो सकें। नहीं तो कल का भविष्य भयावह हो सकता है। जैसे आज सभी राज्यों के सिलेबस में अंग्रेजी पाँव जमा कर बैठी है, कल को भारतीय फ़िल्मों को स्क्रीन न मिलें और हॉलीवुड फ़िल्में ही चारों तरफ चलती रहें, तब शायद एक-दूसरे की भाषा का विरोध करने वाले नेताओं को अच्छा लगे।

Article 15: यादवों द्वारा किए रेप में ब्राह्मणों को बताया बलात्कारी क्योंकि वही बिकता है

हाल ही में, आयुष्मान खुराना स्टारर फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ का ट्रेलर रिलीज़ किया गया। इस फ़िल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा हैं, जिन्हें फ़िल्म ‘मुल्क’ और ‘रा-वन’ से प्रसिद्धि मिली थी। यह फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित होने का दावा करती है। ट्रेलर को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि इस फ़िल्म की कहानी यूपी में बदायूँ के गाँव में दो युवा लड़कियों की हत्या कर उन्हें पेड़ से लटका देने वाली घटना पर आधारित है।

एक ख़बर में, फ़िल्म के एक कलाकार मनोज पाहवा के हवाले से लिखा गया है, “यह फ़िल्म बदायूँ में हुए जघन्य अपराध पर पूरी तरह से आधारित नहीं है, जहाँ दो लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और उन्हें फाँसी दे दी गई। हम कह सकते हैं कि यह फ़िल्म उस घटना से प्रेरित है और हमने इसमें कुछ अंश शामिल किए हैं।”

ट्रेलर की शुरुआत भारतीय संविधान के आर्टिकल 15 के संदर्भ से होती है जो सभी को समानता का अधिकार देता है। ऐसा लगता है जैसे यह फ़िल्म इस तथ्य से प्रेरित है कि घरों में ‘समानता’ का अर्थ ब्राह्मणों को खलनायक के रूप में दिखाने से है।

फ़िल्म के ट्रेलर में एक गाँव की दो युवा लड़कियों को बेरहमी से बलात्कार और हत्या करते दिखाया गया, उनके शव एक पेड़ से लटके हुए दिखाए गए। यह उस लड़की को दिखाता है, जिसका परिवार हाशिए पर है और उन्हें दिहाड़ी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने अपने दैनिक वेतन में 3 रुपए की बढ़ोतरी की माँग की थी और यह दर्शाता है कि क्षेत्र में जातिगत समीकरण कैसे प्रचलित हैं। ट्रेलर में यह भी दिखाया गया कि अपराध ‘महंत जी के लड़के’ द्वारा किया गया था। महंत जी को सर्वोच्च श्रेणी का ब्राह्मण बताया गया।

ट्रेलर के दृश्य यह भी बताते हैं कि कैसे क्षेत्र के लोगों को लगता है कि दलितों को मजदूरी में बढ़ोतरी की माँग करने का कोई अधिकार नहीं है, और उनकी स्थिति यह है कि ‘उच्च जाति’ के लोगों को जो उपयुक्त लगता है, वो उन्हें (दलितों) वही दर्जा देते हैं।

बदायूँ मामले से ‘प्रेरित’ होने के अपने प्रयास में, फ़िल्म ने तथ्यों के साथ व्यापक स्तर पर छेड़छाड़ की। यूपी की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के लिए शर्म की बात है कि इस मामले को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से देखा गया, क्योंकि इसे दलितों के खिलाफ उच्च जाति के अत्याचार के रूप में उजागर किया गया था।

आरोपितों के नाम पप्पू यादव, अवधेश यादव, उर्वेश यादव, छत्रपाल यादव और सर्वेश यादव था। छत्रपाल और सर्वेश पुलिसकर्मी थे। पुलिस विभाग पर आरोप लगाया गया था कि वो समाजवादी पार्टी के राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, जो यादवों का पक्ष ले रहा था। यहाँ तक ​​कि पुलिस जाँच की भी कड़ी आलोचना हुई थी और लोगों ने सीबीआई जाँच की माँग की थी।

बाद में सीबीआई ने कहा था कि उन्होंने अपनी जाँच में पाया कि 14 और 15 साल की दो लड़कियों ने आत्महत्या की थी, उनका न तो बलात्कार हुआ था और न ही उनकी हत्या हुई थी। इसके बाद पाँचों आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई।

अनुभव सिन्हा, वही व्यक्ति है जो स्वयं के धन को लूटने के प्रयास में उजागर हो चुका है। इसके अलावा उसने पाकिस्तानियों से अपनी ‘मुल्क’ फ़िल्म को अवैध रूप से देखने का अनुरोध किया था। सिन्हा ने अपनी फ़िल्म में व्यापक रूप से सार्वजनिक अपराध करने और इसे जातिवाद के रंगों में रंगने का ख़ूब प्रयास किया है। अदृश्य ‘महंत जी’ (संभावित रूप से योगी आदित्यनाथ) जो एक ब्राह्मण हैं उन्हें फ़िल्म में बुराई के रूप में चित्रित किया गया। साथ ही इस फ़िल्म का मुख्य विषय उच्च जातियों और ब्राह्मणों के अत्याचारों पर केंद्रित है।

एक जघन्य अपराध को दिखाने के लिए बदायूँ घटना को ब्राह्मण-विरोधी, उच्च-जातिवाद के रंगों में रंगने का प्रयास अनुचित है। जबकि सच्चाई यह है कि बदायूँ मामले में कोई ब्राह्मण एंगल नहीं था। इस अपराध की जातीयता और पहचान को बदलना केवल संकीर्ण राजनीतिक एजेंडा है, जो ख़तरनाक होने के साथ-साथ और विभाजनकारी भी हो सकता है।

हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में, उत्तर प्रदेश ने दिखा दिया कि उसने जाति और समुदाय के अपने पुराने राजनीतिक साधनों को अब त्याग दिया है। सपा-बसपा का गठबंधन जिसकी पूरी राजनीति जातिगत विभाजन और विरोध पर आधारित है, जनता ने उसे ख़ारिज कर दिया और भाजपा ने विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर चुनाव लड़ा था उसे (भाजपा) जनता ने भारी जनादेश के साथ चुना। ऐसे समय में जब लोग अपनी ग़लती को सुधारने के लिए तैयार हैं और आगे की तरफ बढ़ रहे हैं, इस तरह की फ़िल्में जातिगत पहचान के पुराने ढकोसले को अपने गले से नीचे उतारने का एक बेशर्म प्रयास है, जिसकी जितनी निंदा की जाए वो कम है।

26-0: पश्चिम बंगाल निकाय चुनावों में BJP ने किया क्लीन स्वीप, TMC को लगा बड़ा झटका

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में हुए निकाय चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की है। भाजपा का बढ़ा हुआ जनाधार न सिर्फ़ लोकसभा चुनाव, बल्कि स्थानीय निकाय चुनावों में भी दिखने लगा है। ये इस बात की पुष्टि करता है कि ज़मीन पर भी भाजपा की लहर है, और यह केवल लोकसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं है। बंगाल के भाटपारा नगरपालिका के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने सभी 26 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की है। इस चुनाव के परिणाम आने के साथ ही भाटपारा नगरपालिका पर भाजपा का कब्ज़ा हो गया है। भाजपा नेता सौरभ सिंह को भाटपारा नगरपालिका का चेयरमैन बनाया गया है।

अभी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 42 में से 18 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज करते हुए तृणमूल के गढ़ में काफ़ी मजबूती से दस्तक दी है। भाजपा ने सभी उम्मीदों को पार करते हुए 40% से भी अधिक वोट शेयर हासिल किया, जो अपने आप में बहुत बड़ी बात है। बंगाल में लगातार 30 सालों से भी अधिक समय तक शासन करने वाले वामदलों की हालत पतली हो गई है और वो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

भाजपा की लोकसभा चुनाव में जीत के बाद हुए सभी कार्यक्रमों में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल का जिक्र कर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सीधी चुनौती दी थी। भाटपारा में मिली जीत के बाद “जय श्री राम” को लेकर भाजपा की चल रही लड़ाई और मजबूत होने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री ममता को कई जगह “जय श्री राम” का नारा लगाती आमजनों की भीड़ का सामना करना पड़ रहा है और चिल्लाती हुई तृणमूल सुप्रीमो के विडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रहे हैं।

विजेंद्र गुप्ता ने केजरीवाल-मनीष सिसोदिया पर किया मानहानि का केस, जाने क्या है मामला

भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता ने अपनी छवि धूमिल करने का आरोप लगाते हुए मंगलवार (जून 4, 2019) को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ पटियाला हाउस कोर्ट में मानहानि का मामला दर्ज कराया है।

दरअसल, कुछ दिनों पहले केजरीवाल और सिसोदिया ने विजेंद्र गुप्ता पर AAP प्रमुख की हत्या की साजिश रचने वालों में शामिल होने का आरोप लगाया था। जिसके बाद विजेंद्र गुप्ता ने लीगल नोटिस देकर दोनों को 7 दिनों के अंदर माफी माँगने के लिए कहा था। मगर इसका जवाब न मिलने के बाद आज उन्होंने केजरीवाल और सिसोदिया के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। अब इस मामले की सुनवाई 6 जून को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में होगी।

गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव के दौरान केजरीवाल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जिस तरह से इंदिरा गाँधी की हत्या की गई थी ठीक उसी तरह भारतीय जनता पार्टी भी उनके (केजरीवाल के) अपने निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) के जरिए उनकी हत्या करवाना चाहती है। इस आरोप के जवाब में गुप्ता ने ट्वीट किया, “4 मई को थप्पड़कांड से पहले अरविंद केजरीवाल ने संपर्क अधिकारी से अपने वाहन के आस-पास मौजूद सुरक्षा घेरे को हटाने का निर्देश दिया था। मुख्यमंत्री का निर्देश रोजनामचे में दर्ज हैं। यह खुलासा मैने किया था, इससे AAP को कोई चुनावी लाभ नहीं मिला। इस बौखलाहट में केजरीवाल यह कह रहे हैं कि उनका पीएसओ भाजपा को रिपोर्ट करता है।”

जिसके बाद सिसोदिया ने भी पलटवार करते हुए कहा कि विजेंद्र गुप्ता के ट्वीट ने साबित कर दिया कि सीएम की डेली सिक्योरिटी की रिपोर्ट रोज़ाना बीजेपी के पास पहुँच रही है और इसके आधार पर भाजपा सीएम की हत्या की साज़िश रच रही है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि इस साजिश में विजेंद्र गुप्ता भी शामिल हैं। बता दें कि, मानहानि का केस दायर करने से एक दिन पहले यानी सोमवार (जून 3, 2019) को इफ्तार पार्टी के दौरान विजेंद्र गुप्ता अपने हाथों से केजरीवाल को खजूर खिलाते हुए नजर आए थे।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 7 प्राथमिकताएँ, जिन पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को खरे उतरना है

लोकसभा चुनाव हाल ही में संपन्न हुए हैं। इस चुनाव में नरेंद्र मोदी की सरकार को दूसरी बार केंद्र में रखकर जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है। और यह स्पष्ट जनादेश भाजपा को मिला है राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे पर। अब जब सरकार बन गई है, नेताओं के मंत्रालयों का फैसला कर लिया गया है, तो ऐसे में नए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के लिए आगे का कार्य बहुत स्पष्ट है।

सेना के साथ-साथ सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का कार्य रक्षा मंत्री की प्राथमिकता होनी चाहिए। मेरी समझ से नीचे के 7 पॉइंट राजनाथ सिंह के एजेंडे में यह सबसे ऊपर होने चाहिए।

1. भारतीय नौसेना के लिए 111 हेलिकॉप्टरों का अनुबंध। इस अनुबंध को ‘रणनीतिक साझेदारी’ मॉडल के तहत जमीन पर उतारा जाएगा। इस अनुबंध के लिए पहले से ही भारतीय और विदेशी कंपनियों के बीच EoI जारी किया जा चुका है। अब अगला क़दम RFP जारी करना है। चूँकि नए मंत्री ने कार्यभार संभाला है, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस प्रक्रिया को अंतिम रूप देने के लिए कैसे तेजी लाई जाए।

2. लड़ाकू जेट की घटती संख्या पर तत्काल निर्णय लेना आवश्यक है। वर्तमान में, भारतीय वायु सेना के एक स्क्वॉड्रन में 30-31 लड़ाकू विमान हैं, जबकि आदर्श स्थिति में यह 42 होने चाहिए। पिछली सरकार द्वारा किए गए 36 राफ़ेल विमानों का सौदा भी अस्थायी रूप से ही इस समस्या को दूर कर सकता है। इसलिए इस पर तत्काल निर्णय की आवश्यकता है।

देश को 114 और फाइटर जेट्स ख़रीदने की तत्काल आवश्यकता है, जिसकी प्रक्रिया भी अभी शुरू नहीं की गई है। ऐसे में, राफ़ेल की ख़रीदारी करना ही एक समझदारी वाला क़दम होगा, लेकिन हाल ही में संपन्न हुए चुनावों को देखते हुए, जहाँ राफ़ेल सौदे को कई बार उछाला गया और केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास किया गया, उससे मुझे शक़ है कि अब शायद ही राजनाथ सिंह उस रास्ते का रुख़ करें। यहाँ फिर से, सरकार ‘एसपी’ मॉडल मतलब रणनीतिक साझेदारी मॉडल का रास्ता अपनाएगी और इतनी बड़ी खरीद के लिए हमारे रक्षा मंत्री को निश्चित तौर पर तेजी दिखानी होगी।

3. हाल ही में, समाप्त हुए एयरो इंडिया 2019 में, भारत के AMCA कार्यक्रम के लिए एक टाइमलाइन दी गई थी। AMCA की सफलता कावेरी इंजन (स्वदेशी) पर निर्भर करती है। दुर्भाग्य से, ऐसा लगता है कि कावेरी इंजन अपनी मौत मर रही है और किसी को भी इसकी परवाह नहीं है। हमारे नए रक्षा मंत्री को इस मामले को अपने हाथ में लेना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि कावेरी इंजन को उचित स्थान मिले और वो वायु सेना के काम आ सके।

4. हिंद महासागर में श्रेष्ठता बनाए रखने और चीन से ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए, भारत को एक मज़बूत नौसेना की आवश्यकता है। और इसके लिए एयरक्राफ्ट कैरियर इन उद्देश्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वर्तमान में, भारतीय नौसेना के पास केवल एक ऑपरेशनल एयरक्राफ्ट कैरियर है और एक निर्माणाधीन है। एक तीसरा विमान वाहक, INS विशाल, बजट के जाल में फँसा हुआ है। एचएमएस क्वीन एलिजाबेथ पर आधारित 65,000 टन का यह INS विशाल, भारतीय नौसेना को मज़बूती प्रदान करेगी। हमारे नए रक्षा मंत्री को इस परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए नए तरीक़े खोजने पड़ेंगे।

5. भारतीय नौसेना को तत्काल सी किंग यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों के अपने बेड़े में शामिल करने की जरूरत है। DAC ने पिछले साल 24 एमएच-60आर की खरीद की मंजरी दे दी थी लेकिन अमेरिकी सरकार ने अपनी तरफ से LoA हाल-फिलहाल ही भेजा है। अब दोनों देशों की सरकारों को अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर करने की ज़रूरत है। हमारे नए रक्षा मंत्री को ऐसे में यह देखना होगा कि डील फाइनल होने में देरी न हो। यह डील काफी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये डील 123 अतिरिक्त मीडियम मल्टी-रोल हेलीकॉप्टरों की खरीद का रास्ता खोलेगी।

6. युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति में, ISR और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद इस व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया। चिंताजनक बात यह है कि हमारे पास AWACS की संख्या पाकिस्तान की अपेक्षा कम है। चीजें अभी पाइपलाइन में हैं, लेकिन इसमें तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है और रक्षा मंत्री अगर हस्तक्षेप करते हैं तो अधिग्रहण में तेजी आएगी।

7. मित्र देशों को रक्षा उपकरणों का निर्यात करना रक्षा मंत्रालय की प्राथमिकताओं में से एक है। साल 2025 तक सालाना ₹35,000 करोड़ का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो कि वर्तमान समय में ₹4000 करोड़ है। हालाँकि, यह एक बेहद ही मुश्किल लक्ष्य है, लेकिन अगर इसे संगठित और अनुकूल तरीके से पूरा करने का प्रयास किया जाए, तो इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इस लक्ष्य को पूरा करने में मित्र देशों को LCA तेजस की बिक्री से मदद मिल सकती है। मलेशिया इस फाइटर जेट को खरीदने की फ़िराक में है और उसे बस आखिरी स्वरूप देने की आवश्यकता है। जहाँ एक तरफ़ एचएएल लागत को नीचे लाने की कोशिश कर रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ़ राजनाथ सिंह को मलेशिया का दौरा करना चाहिए और इस सौदे पर हस्ताक्षर करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

दिवंगत मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी है। उनके कार्यकाल के दौरान एस-400 की खरीद उनकी बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास ऐसे कई अवसर आएँगे और मेरे ख्याल से उनको इन अवसरों को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। इस बार देश की जनता ने देश को सुरक्षित बनाने के लिए भाजपा को वोट दिया है। जाहिर सी बात है कि इस मंत्रालय के प्रदर्शन पर लोगों की खास नजर रहेगी, इस विभाग के काम को बारीकी से देखा जाएगा।

कोर्ट ने दी पत्थरबाज अलगाववादी मसरत आलम, शब्बीर और आसिया अंद्राबी की गिरफ़्तारी की इजाजत

अलगाववादी नेता मसरत आलम भट्ट को मंगलवार को एनआईए कोर्ट में पेश किया गया। जाँच एजेंसी एनआईए ने कोर्ट के सामने कहा था कि कश्‍मीर घाटी में पत्‍थरबाजी के मामलों में अलगाववादी नेताओं आसिया आंद्राबी, शब्बीर शाह और मसरत आलम भट्ट से पूछताछ जरूरी है। कोर्ट ने मंगलवार (जून 04, 2019) को मसरत आलम के साथ शब्बीर शाह और आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी को स्वीकृति दे दी है।

एनआईए ने कोर्ट के सामने कहा था कि कश्‍मीर घाटी में पत्‍थरबाजी के मामलों में तीनों से पूछताछ जरूरी है। इसके बाद कोर्ट ने पत्थरबाजी के मामले में तीनों की गिरफ्तारी की इजाजत दे दी। एनआईए ने तीनों की 15 दिन की कस्टडी की माँग की है।

जाँच एजेंसी एनआईए कोर्ट ने मंगलवार (जून 04, 2019) को मसरत आलम के साथ शब्बीर शाह और आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी को स्वीकृति दे दी है। एनआईए ने कोर्ट के सामने कहा था कि कश्‍मीर घाटी में पत्‍थरबाजी के मामलों में तीनों से पूछताछ जरूरी है। इसके बाद कोर्ट ने पत्थरबाजी के मामले में तीनों की गिरफ्तारी की इजाजत दे दी। एनआईए ने तीनों की 15 दिन की कस्टडी की माँग की है।

अभी एनआईए की कस्टडी की माँग को लेकर कोर्ट में जिरह चल रही है। इससे पहले कोर्ट की इजाजत के बाद एनआईए की टीम ने कोर्ट रूम में ही पत्थरबाजी की घटनाओं में उनकी भूमिका को लेकर तीनों से अलग-अलग पूछताछ की है।

जाँच एजेंसी तीनों आरोपितों से पत्थरबाजी की फंडिंग और उसके पूरे सिस्टम के बारे में जानकारी हासिल करना चाहती है। मसरत आलम के खिलाफ कई गंभीर मामले चल रहे हैं। साल 2008 और 2010 में घाटी में सुरक्षा बलों के खिलाफ पथराव की सिलसिलेवार घटनाओं की अगुवाई मसरत आलम ने ही की थी।

इनके खिलाफ हिज्ब, दुख्तरान-ए-मिल्लत और लश्कर जैसे पेशेवरों के संगठनों के आतंकवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप था। कोर्ट के आदेश के बाद अब तीनों से इस मामले में पूछताछ की जा सकेगी। टेरर फंडिंग मामले में एनआईए की टीम ने अलगाववादी नेता यासीन मलिक, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, अशरफ खान, मशर्रत आलम, जफर अकबर भट और नसीम गिलानी के घरों और दफ्तरों पर छापे मारे।

कॉन्ग्रेस MLA ने ₹50 लाख में खरीदी नाबालिग लड़की, ड्रग देकर करता था रेप

गोवा की सत्र अदालत ने कॉन्ग्रेस विधायक अतानासियो मोनसेराते की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने खुद पर लगे बलात्कार के आरोपों को खत्म करने की अपील की थी। गोवा के कॉन्ग्रेस विधायक अतानासियो मोनसेराते को नाबालिग लड़की से रेप के मामले में अब ट्रायल का सामना करना पड़ेगा। गोवा की एक अदालत ने मुकदमा रद्द करने की उनकी अपील खारिज कर दी है। मोनसेराते पर साल 2016 में लड़की के साथ रेप करने का आरोप है।

पीड़ित लड़की ने अपने बयान में कहा था कि उन्हें मोनसेराते ने ₹50 लाख में खरीदा और यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता ने यौन उत्पीड़न से पहले लड़की को ड्रग देने का आरोप भी लगाया गया था। वहीं, एक अलग मामले में पिछले हफ्ते भी पुलिस ने मोनसेराते और 2 अन्य लोगों के खिलाफ महिला को मॉलेस्ट करने का केस दर्ज किया था।

पार्टियाँ बदलने के लिए जाने जाते हैं मोनसेराते

वर्ष 2016 के मामले में अब कॉन्ग्रेस विधायक को निचली अदालत में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत ट्रायल का सामना करना होगा। हालाँकि, वे लगातार अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताते रहे हैं। वर्ष 2004 में मोनसेराते भाजपा में चले गए और 2007 में फिर लौटकर युनाइटेड गोवा डेमोक्रेटिक पार्टी में आ गए। कुछ साल के बाद वह कॉन्ग्रेस में आए, लेकिन वर्ष 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए पार्टी से निकाल दिए गए। इसके बाद उन्होंने गोवा फॉरवर्ड पार्टी ज्वाइन की थी।

अतानासियो मोनसेराते अप्रैल 2019 में कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। मोनसेराते पार्टियाँ बदलने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपना राजनैतिक करियर युनाइटेड गोवा डेमोक्रेटिक पार्टी से शुरू किया था और विधायक बने।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस: राधाकृष्ण पाटिल के बाद अब्दुल सत्तार ने भी दिया MLA पद से इस्तीफा, BJP में शामिल होने की अटकलें

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कॉन्ग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अब पार्टी को महाराष्ट्र से एक और झटका लगा है, जहाँ पार्टी विधायक राधाकृष्ण विखे पाटिल ने अपने पद से मंगलवार (जून 4, 2019) को इस्तीफा दे दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऐसी सम्भावना है कि वह महाराष्ट्र में कैबिनेट विस्तार से पहले बीजेपी में शामिल हो सकते हैं।

पाटिल महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफा देने के बाद राधाकृष्ण विखे पाटिल ने कहा, “मैंने लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी के लिए प्रचार भी नहीं किया था। मुझे हाईकमान पर संदेह नहीं है। उन्होंने मुझे विपक्ष का नेता बनाकर अच्छा मौका दिया था। मैंने अच्छा काम करने की कोशिश की, लेकिन हालात ने मुझे इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया है।”

एक तरफ कहाँ कॉन्ग्रेस की लोकसभा में हार के बाद राहुल गाँधी के इस्तीफे की चर्चा थी, वह तो नहीं हुआ लेकिन अलग-अलग राज्यों में हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफों का सिलसिला जारी है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि कुछ नेता पार्टी के भविष्य को लेकर सशंकित हैं। इसलिए कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देकर अपने लिए बीजेपी में मुकाम ढूँढ रहे हैं।

कॉन्ग्रेस की समस्या को और बढ़ाते हुए, पाटिल के साथ पूर्व मंत्री अब्दुल सत्तार ने भी कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने तो यहाँ तक दावा किया कि जल्द ही 8-10 और विधायक भी कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इन घटनाओं को देखने से एक बात स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के बेहद ख़राब प्रदर्शन प्रदर्शन से निराश पार्टी नेता महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना के गठजोड़ की लगातार बढ़त को देखते हुए, आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस की डूबती नाव छोड़कर कहीं और ठाँव ढूँढने लगे हैं और इस समय बीजेपी से मजबूत ठिकाना किसी भी नेता को नज़र नहीं आ रहा है। इस तरह से लगातार कॉन्ग्रेस की हालत पतली और बीजेपी मजबूत होती जा रही है।

गौरतलब है कि राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय विखे पाटिल भी कॉन्ग्रेस छोड़कर कुछ समय पहले ही सीएम देवेंद्र फड़नवीस की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हो गए थे। वैसे राधाकृष्ण विखे पाटिल के नेता प्रतिपक्ष के पद छोड़ने की सबसे बड़ी वजह अहमदनगर लोकसभा सीट को बताया जा रहा है। इस सीट से वो अपने बेटे के लिए टिकट माँग रहे थे। लेकिन ये सीट एनसीपी के खाते में चली गई। इसके चलते पहले उनके बेटे ने पार्टी छोड़ी और अब राधाकृष्ण विखे पाटिल ने विधायक पद से भी दे दिया है।

रेप आरोपित पूर्व मंत्री को 1 साल से बचा रही केजरीवाल सरकार, दिल्ली पुलिस को भेजना पड़ा रिमाइंडर

दिल्ली पुलिस ने राज्य के पूर्व मंत्री संदीप कुमार के खिलाफ यौन उत्पीड़न के एक मामले में केजरीवाल सरकार को रिमाइंडर भेजा है। पुलिस की ओर से भेजे गए इस रिमाइंडर में दिल्‍ली सरकार से संदीप कुमार के खिलाफ बनाई गई चार्जशीट को मंजूरी देने की माँग की गई है। पुलिस का कहना है कि केजरीवाल सरकार की ओर से मंजूरी न मिलने के कारण चार्जशीट पिछले एक साल से पेंडिंग है। दरअसल, अगर किसी जनप्रतिनिधि (आरोपी) के खिलाफ पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी होती है, तो इसके लिए राज्य सरकार (अगर आरोपी विधायक हो तो) से अनुमति लेनी पड़ती है।

गौरतलब है कि, संदीप कुमार के खिलाफ राशन कार्ड बनवाने के नाम पर एक महिला से रेप करने का आरोप है। इस मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया था। वीडियो में दिख रही पीड़ित महिला ने आरोप लगाया था कि राशन कार्ड बनवाने और बच्चों को अच्छी नौकरी दिलाने के नाम पर संदीप कुमार ने उसका शारीरिक शोषण किया था। महिला की शिकायत पर साल 2016 में दिल्ली के सुल्तानपुरी थाने में संदीप कुमार के खिलाफ केस दर्ज किया गया था और फिर उनको गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था। हालाँकि, कुछ दिनों बाद ही उन्हें जमानत मिल गई थी। इस घटना के बाद अपनी किरकिरी होते देख केजरीवाल सरकार ने संदीप को मंत्री पद से हटा दिया था और पार्टी से भी निकाल दिया था।

आगामी चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में महिलाओं के लिए मेट्रो और बस सफर मुफ्त करने की घोषणा की है, लेकिन रेप के आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर करने की मंजूरी में देरी को लेकर लोग केजरीवाल पर निशाना साध रहे हैं। लोगों का कहना है कि एक तरफ तो केजरीवाल महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं, वहींं दूसरी तरफ रेप के आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर करने के लिए मंजूरी नहीं दे रहे हैं। ये उनका कैसा दोहरा रवैया है!

नीतीश की इफ्तार Vs नवरात्रि पे फलाहार: ‘हिंदू हृदय सम्राट’ को लोगों ने कहा – आप बनें बिहार के CM

बिहार में इन दिनों सियासी पारा बहुत गरमाया हुआ। चुनावों के दौरान एक दूसरे के विरोधी अब एक दूसरे की इफ्तार पार्टी में शिरकत करने के कारण चर्चा का विषय बन गए हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार पर एक ट्वीट किया है, जिसके बाद लोगों ने नीतीश की आलोचना में और गिरिराज सिंह की तारीफ़ में ट्वीट्स की झड़ी लगा दी।

दरअसल, पटना के हज भवन में जदयू द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टी में ‘हम'(हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के अध्यक्ष जीतनराम माँझी शामिल हुए, और माँझी द्वारा आयोजित इफ्तार में नीतीश कुमार पहुँचे। इसके बाद इफ्तार पार्टी के बहाने मेल-जोल बढ़ाने पर भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने नीतीश पर तीख़ी टिप्पणी करते हुए लिखा, “कितनी खूबसूरत तस्वीर होती जब इतनी ही चाहत से नवरात्रि पे फलाहार का आयोजन करते और सुंदर सुदंर फ़ोटो आते??…अपने कर्म धर्म में हम पिछड़ क्यों जाते और दिखावा में आगे रहते हैं???”

गिरिराज सिंह की इस टिप्पणी पर अधिकांश ट्विटर यूजर उनसे सहमत नजर आए और अप्रत्यक्ष रूप से यूजर्स ने नीतीश के इस मेल-जोल पर खूब तंज कसा। नीतीश पर गिरिराज की दिखावे वाली टिप्पणी पर सबसे पहले तो लोगों ने गिरिराज की बेबाकी की तारीफ़ की।

कुछ लोगों ने यहाँ तक इच्छा जताई कि वो उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं। यूजर्स ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ भी बताया।

अधिकतर यूजर्स सोशल मीडिया पर गिरिराज के समर्थन में नजर आए और उन्होंने नीतीश के इफ्तार को नाटक करार दिया। एक यूजर का ये भी कहना रहा कि अगर अब इन्होंने नवरात्रि में फलाहार का आयोजन नहीं करवाया तो आगामी विधानसभा चुनाव में इन्हें करारा जवाब मिलेगा।