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हिंदुओं को वोट देने की अनुमति न दी जाए: तृणमूल सांसद ने जारी किया निर्देश, वीडियो वायरल

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बेहद शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के खाते में 22 सीटें आई। इस चुनाव के दौरान बंगाल में काफी हत्याएँ और मारपीट की घटनाएँ देखने को मिली। कथित तौर पर ये हत्याएँ और मारपीट तृणमूल द्वारा करवाए गए थे। अब तृणमूल राज्यसभा सांसद शुभाशीष चक्रवर्ती का एक चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है,जिसमें वो अपने सहयोगियों से कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि आगामी चुनाव में हिंदुओं को वोट देने की अनुमति न दी जाए।

शुभाशीष चक्रवर्ती दक्षिण 24 परगना के तृणमूल प्रमुख भी हैं। बंगाली पोर्टल ई बंगला 24×7 के अनुसार, उन्होंने हालिया लोकसभा चुनावों के परिणामों का विश्लेषण करते हुए अपनी पार्टी के सहयोगी को यह निर्देश दिया है। तृणमूल ने दक्षिण 24 परगना में चार सीटों-  डायमंड हार्बर, मथुरापुर, जयनगर और जादवपुर पर अच्छे अंतर से जीत दर्ज की। भाजपा ने इन सभी चार निर्वाचन क्षेत्रों में तीसरा स्थान हासिल किया। पूरे बंगाल में भाजपा के बढ़ते ग्राफ को देखते हुए ममता सरकार बौखला गई है और टीएमसी के ऊपर खतरे की घंटी बजता देख सांसद शुभाशीष ने इस तरह का निर्देश दिया है।

दरअसल, तृणमूल के कुछ पदाधिकारी चक्रवर्ती से मिलने से गए थे। इन पदाधिकारियों में अधिकतर मुस्लिम थे। इस दौरान जब चुनावी परिणामों का विश्लेषण किया गया, तो पता चला कि चिलता गाँव के तीन बूथों पर अधिकतर वोट भाजपा के पक्ष में डाले गए थे। इस बात के सामने आने के बाद चक्रवर्ती अपने पार्टी सहयोगियों को गाँव पर नज़र रखने के लिए कहते हैं। वो कहते हैं कि वहाँ के हिंदुओं को वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसे स्पष्ट तौर पर वीडियो में देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हजारों हिंदुओं को डायमंड हर्बर के कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों से जबर्दस्ती भागने के लिए मजबूर किया गया था। इस दौरान मस्जिदों से घोषणा करते हुए हिंदुओं से कहा गया था कि अगर वो अपने घरों को छोड़कर नहीं भागते हैं, तो उन पर हमला किया जाएगा। उनसे कहा गया था कि लोकसभा चुनाव के खत्म होने के बाद ही वो यहाँ पर लौट सकते हैं। खबर के मुताबिक, उन क्षेत्रों से हिंदूओं को भगाने के बाद मतदान में धांधली की गई और सभी हिंदू मतदाता के वोट तृणमूल कॉन्ग्रेस के पक्ष में डाले गए थे।

हमारी सरकार का पहला फैसला रक्षकों को समर्पित: मोदी कैबिनेट

आखिरकार तीन महीने की चुनावी प्रक्रिया खत्म होने के बाद सरकार का गठन हो गया है। बृहस्पतिवार को नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और उनके साथ कुल 58 मंत्रियों ने शपथ ली है। इसमें कुल 25 कैबिनेट मंत्री हैं (PM समेत) जबकि 9 स्वतंत्र प्रभार, 24 राज्य मंत्री शामिल हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कार्यभार संभालने के बाद पहले फैसले के रूप में ‘पीएम स्कॉलरशिप स्कीम‘ में बड़े बदलाव को मंजूरी दी है। इसकी जानकारी नरेंद्र मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल से दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार का पहला बड़ा फैसला लिया है। पीएम मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “हमारी सरकार का पहला फैसला भारत की रक्षा करने वालों को समर्पित है!” पहले फैसले में राष्ट्रीय रक्षा कोष के तहत प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति योजना में बदलाव करते हुए पीएम मोदी ने आतंकी, माओवादी हमलों में बलिदान हुए जवानों के बच्चों की छात्रवृत्ति बढ़ाने का फैसला लिया।

लड़कों के लिए मासिक स्कॉलरशिप 25% बढ़ोत्तरी के साथ ₹2500 कर दी गई है जो कि पहले ₹2000 प्रति माह थी। वहीं, लड़कियों के लिए यह 33.33% बढाकर ₹3000 प्रति माह कर दी गई है, जो कि पहले ₹2250 प्रति माह थी। इस स्कॉलरशिप का दायरा पुलिसकर्मियों के लिए बढ़ा दिया गया है, जो कि किसी भी प्रकार की आतंकी और माओवादी गतिविधियों में बलिदान हुए थे। नई स्कॉलरशिप का कोटा राज्य पुलिस अधिकारियों के लिए 500/वर्ष कर दिया गया है। गृह मंत्रालय इन मामलों की निगरानी करेगा।

शपथ ग्रहण के साथ ही पीएम मोदी ने काम भी शुरू कर दिया है, इसके अलावा सभी मंत्रियों के कामकाज का बँटवारा भी हो गया है। मोदी कैबिनेट की पहली बैठक शुरू हो चुकी है। गृहमंत्री अमित शाह बैठक में पहुँच गए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी और सदानंद गौड़ा भी बैठक में उपस्थित हैं। बैठक दिल्ली के साउथ ब्लॉक में शुरू हुई।

मंत्रियों के जाति-धर्म पर चल रहे मीडिया शोध से आखिर कौन-सी अच्छी बात हो जाएगी?

इतिहास में मौजूद हजारों किस्से-कहानियाँ इस बात का सबूत हैं कि हमारा देश जातिव्यवस्था का भुक्तभोगी रहा है। देश में लोकतंत्र आने के बाद भी जाति/धर्म पर राजनीति लगातार होती रही। नतीजतन आजतक इससे मुक्ति नहीं पाई गई, और जाति का प्रभाव अब भी हमारे समाज में कुरीति की तरह मौजूद है। जाति के नाम पर बनी कई क्षेत्रीय पार्टियाँ इसका जीवंत उदहारण हैं कि संविधान भले ही सभी नागरिकों को समानता का अधिकार औपचारिक रूप से प्रदान करता हो लेकिन व्यवहारिक जिंदगी में समाज की कड़वी सच्चाई अब समाज से उठकर राजनीति की मुख्यधारा बन चुकी है और इसका अनुसरण अब ‘निष्पक्ष’ मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा भी लगातार किया जा रहा है।

हालिया उदहारण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर को पढ़ा जा सकता है। शपथ ग्रहण समारोह को अभी एक दिन भी नहीं बीता है कि मीडिया ने इस तरह की खबर बनानी शुरू की जिसकी शायद ज़रूरत नहीं। 30 मई को जिन मंत्रियों ने शपथ ली, उनकी जाति-धर्म पर शोध हुए और खबरें बना दी गईं। जाति और धर्म का एंगल देकर निष्कर्ष ये निकाला गया कि मोदी सरकार ने भले ही ‘सबका साथ-सबका विकास’ करने की कितनी ही कोशिश क्यों न की हो, लेकिन उनकी मंत्रिपरिषद की सूची में ऊँची जाति वालों का ही आधिपत्य है।

मंत्रियों का नाम और उनकी पार्टी का उल्लेख करके ‘समझाया’ गया कि कौन सा नेता समाज के किस तबके का प्रतिनिधि है। मसलन, अल्पसंख्यक नेता के रूप में सिर्फ़ मुख्तार अब्बास नकवी ने कल शपथ ली, जबकि हरसिमरत कौर और हरदीप पुरी के रूप में दो सिख नेताओं को शपथ दिलवाई गई, अनुसूचित जनजाति के सिर्फ़ 6 नेता कैबिनेट में शामिल हैं और अनुसूचित जनजाति से सिर्फ़ 4 नेताओं को चुना गया है। इन बिंदुओं को खबर में अलग से उल्लेखित किया गया कि मंत्रिपरिषद में नौ ‘ब्राहमण’ नेताओं को जगह दी गई है।

अब सोचने वाली बात है कि खुद को ‘निष्पक्ष’ कहने वाला मीडिया जिन राजनेताओं की जाति/धर्म से जनता को परिचित करवा रहा है, उसका क्या औचित्य है? जिनका जीवन-मरण इन बिंदुओं पर टिका है वो कहीं न कहीं से जाति खोज ही लेंगे, लेकिन सार्वजनिक स्तर पर क्या मीडिया संस्थानों को इस तरह की खबर करनी चाहिए? क्या इसका प्रभाव एक बड़े पाठक वर्ग पर नहीं पड़ेगा जो इस खबर को पढ़ने के साथ ही खुद को सरकार से अलग मान लेगा? क्या होगा अगर निर्वाचित सरकार से सकारात्मक उम्मीद की जगह, नकारात्मक अवधारणा कायम कर ली जाएगी?

तब तो सरकार जो भी करेगी हमें सब हमारे विरोध में ही लगेगा। क्या मीडिया हम से यही चाहता है कि हम आशा में नहीं बल्कि घुटन में पाँच साल गुजारें? ऐसे मुद्दे उठाकर आखिर क्यों नेगेटिव माहौल का निर्माण किया जा रहा है, जब चुने गए मंत्री वहीं निर्वाचित नेता हैं जिनपर जनता ने इन चुनावों में अपना विश्वास दिखाया है। अगर उन्हें जाति-धर्म में उलझना होता, तो वो मतदान के समय ही उलझ चुके होते। फिर अब ऐसी बातों को क्यों उकेरा जा रहा है?

मीडिया में मौजूद ऐसी खबरों को पढ़ने के बाद लगता है कि जाति-धर्म में उलझाने का काम अब सिर्फ़ राजनेताओं का नहीं रहा है बल्कि मीडिया भी इसमें अपनी विशेष भूमिका निभा रहा है। अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से विमुख हो चुका मीडिया ऐसी खबरों को करते समय भूल रहा है कि भाजपा को मिला प्रचंड बहुमत इस बात का सबूत है कि इन चुनावों में जाति-धर्म से उठकर लोगों ने मोदी सरकार को वोट दिया है। मोदी सरकार किसी विशेष जाति के कारण पूरे देश भर में 303 सीटें हासिल कर पाने में सक्षम नहीं हुई है, उनकी ये जीत इस बात का सबूत है कि अब देश की जनता अपने प्रतिनिधि से जाति-धर्म की जगह देश की अखंडता को बनाए रखने की उम्मीद करती है।

ये बात सच है कि एक समय था जब भाजपा पार्टी की विचारधारा को कट्टर हिंदुत्व का आईना माना जाता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। देश में जाति की जकड़ मजबूत होने के बावजूद भी अलग-अलग समुदायों ने मोदी को वोट देकर ये साबित किया है कि वो खुद भी ऐसी सोच से उबर रहे हैं, जो देश को बाँटती है। सीएसडीएस की वेबसाइट पर मौजूद आँकड़े और दलित एवं मुस्लिम बहुल इलाकों में दर्ज हुई मोदी सरकार की जीत बताती है कि इस सरकार पर जनता को यकीन है तभी वो सत्ता में लौटे हैं। (भाजपा ने इस बार 90 ऐसे जिलों में 50% से अधिक सीटों को हासिल किया है, जो अल्पसंख्यक बहुल (Minority Concentration Districts) हैं।)

इस ऐतिहासिक जीत को ‘लहर’ का नाम देकर सीमित नहीं किया जा सकता, व्यक्ति विशेष की ‘लहर’ तभी होती है जब व्यक्तित्व या नीतियाँ प्रभावशाली हो। 2014 में मोदी के व्यक्तित्व में जनता को एक बेहतर विकल्प दिखा और मोदी लहर उमड़ गई, लेकिन 2019 सत्ता में सरकार की वापसी उनके काम को देखते हुए हुई है। पिछले 5 सालों में अगर आप गौर करेंगे तो मालूम चलेगा कि अपराधों को भी राजनैतिक चेहरा देकर मोदी सरकार पर सवाल उठाए जाते थे, ताकि मोदी सरकार की छवि धूमिल हो।

बिलकुल यही काम अब फिर शुरू हो गया है, पहले मंत्रियों की जाति के आँकड़े निकाले गए हैं, फिर बेवजह के सवाल तैयार किए जाएँगे, फिर आपसी रंजिश जैसे मामलों का ठीकरा भी मोदी सरकार की नीतियों के माथे फोड़ दिया जाएगा और फिर घूम-फिरा कर बहस यहाँ रोकी जाएगी कि अगर मोदी सरकार वाकई सबका साथ-सबका विकास चाहती है तो ऊँची जाति वाले नेताओं की संख्या पार्टी में क्यों ज्यादा है?

अंत में एक और बात। गाँव-शहर के वार्ड कमिश्नर से लेकर सांसद तक ‘प्रतिनिधित्व’ ही करते हैं। हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती और बेहतर बात यही है कि हर स्तर पर जन-प्रतिनिधि लोक कल्याण के लिए चुने जाते हैं। अब अगर मंत्रालय में प्रतिनिधित्व देखा जाए तो फिर क्या भारत की हर जाति, जनजाति, धर्म, मज़हब, पेशा आदि को आधार बना कर मंत्रालयों में मंत्री बनाना संभव है? अभी चर्चा ‘दलित-सवर्ण’ का है, कल को ये लोग अपना नया एंगल बनाने के लिए दलितों में भी ‘किस जाति को कितने मंत्रालय मिले’, ‘कौन-सा मंत्रालय ज़्यादा बड़ा है’, ‘किस मंत्रालय का प्रभाव व्यापक है’ आदि मुद्दे चर्चा में नहीं आएँगे?

मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी सकारात्मक तरीके से निभानी चाहिए न कि समाज में पहले से प्रचलित दरारों को और बड़ा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस तरह के लेख जनता के बीच गलत डिबेट की शुरुआत करते हैं जिसकी नकारात्मकता वृहद् तौर पर प्रभाव छोड़ती है।

अल्पसंख्यक बहुल इलाके में भाजपा की जीत के बारे में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-90 जिले अल्पसंख्यक बहुल, 50% से अधिक सीट BJP को: मुस्लिम वोटरों ने फर्जी सेकुलरों को दिखाया ठेंगा

पहली महिला वित्त मंत्री, IFS बने विदेश मंत्री, मंत्रिमंडल 2.0 की ये हैं खास बातें

नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्रियों ने कल शपथ लेने के बाद आज अपने-अपने मंत्रालय में पदभार ग्रहण कर लिया। आइये जानते हैं मोदी सरकार के मंत्रियों के बारे में ख़ास बातें।

निर्मला सीतारमन

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है। देश की पहली रक्षा मंत्री बनकर इतिहास रचने वाली निर्मला सीतारमन ने एक बार फिर से पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री बनने का गौरव अपने नाम कर लिया है। हालाँकि, इससे पहले प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी ने 1970 से 1971 के बीच वित्‍त मंत्री का अतिरिक्‍त कार्यभाल संभाला था।

निर्मला सीतारमन की गिनती उन महिलाओं में होती है, जिन्होंने बेहद कम समय में राजनीति में अपना अलग मुकाम हासिल किया है। बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने कड़ी चुनौतियों का सामना किया। नई सरकार में सीतारमन को वित्त मंत्रालय के साथ-साथ कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय संभालने का जिम्मा भी सौंपा गया है।

सुब्रमण्यम जयशंकर

पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर भारत के नए विदेश मंत्री हैं। वे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रह चुके हैं। पद्मश्री से सम्मानित एस जयशंकर बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बने हैं। जयशंकर को राज्यसभा का सदस्य बनाए जाने की पूरी संभावना है क्योंकि उन्होंने लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा है। दरअसल, केंद्रीय मंत्री को पदभार ग्रहण करने के 6 महीने के भीतर एक सदन का सदस्य होना आवश्यक होता है।

जनवरी 2015 से लेकर जनवरी 2018 तक विदेश सचिव रहते हुए उन्होंने मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान उनकी विदेश नीति को आकार प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। इससे पहले यूपीए सरकार में भी इनका काम काफी अच्छा रहा। जयशंकर ने विदेश सचिव के रूप में अमेरिका, चीन समेत बाकी देशों के साथ भी महत्वूर्ण समझौतों में हिस्सा लिया। चीन के साथ 72 दिन तक चले डोकलाम विवाद को सुलझाने में भी जयशंकर का अहम रोल रहा। डोकलाम विवाद को सुलझाने में जयशंकर, डोभाल और मोदी रात-रात भर जागकर काम किया करते थे

गिरिराज सिंह

भाजपा के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह को पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। मंत्रालय के आवंटन के बाद गिरिराज सिंह ने कहा कि उन्‍हें जो भी जिम्मेदारी दी गई है, उसे वह पूरी जवाबदेही के साथ निभाएँगे। बेगूसराय से कम्युनिस्ट कन्‍हैया कुमार को हराने वाले गिरिराज सिंह ने कहा कि वह पीएम मोदी के रोडमैप को आगे ले जाने के लिए काम करेंगे। उन्होंने बताया कि बिहार सरकार में बतौर मंत्री वह इस विभाग को संभाल चुके हैं।

जनरल वी के सिंह

पिछली सरकार में विदेश राज्य मंत्री का पदभार संभाल चुके जनरल वी के सिंह को सड़क परिवहन मंत्रालय में राज्य मंत्री का ओहदा दिया गया है। इस जिम्मेदारी के मिलने पर वी के सिंह ने सड़क एवं परिवहन मंत्रालय को महत्त्वपूर्ण मंत्रालय बताते हुए नितिन गडकरी के साथ मिलकर काम को आगे बढ़ाने की बात कही। हालाँकि इससे पहले उन्हें विदेश या रक्षा मंत्रालय मिलने के कयास लगाए जा रहे थे क्योंकि उन्होंने 40 साल सेना में और 5 साल विदेश मंत्रालय में बतौर राज्य मंत्री काम किया है।

प्रताप चंद्र सारंगी

ओडिशा के मोदी के नाम से मशहूर प्रताप चंद्र सारंगी को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन राज्य मंत्री बनाया गया है। प्रताप चंद्र सारंगी ने इस बार के लोकसभा चुनाव में बालासोर संसदीय सीट से बीजद प्रत्याशी रबींद्र कुमार जेना को 12,956 मतों से हराया। सारंगी को उनके सादे जीवन के लिए भी जाना जाता है। मंत्रालय का कार्यभार मिलने के बाद उन्होंने पीएम मोदी का आभार जताया और कहा कि आम आदमी और पीएम मोदी का विश्वास जीतने के लिए वह अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे।

गजेंद्र सिंह शेखावत

इस बार की सरकार में एक नए मंत्रालय जल शक्ति का गठन किया गया। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी वादे को निभाते हुए इस मंत्रालय का गठन किया है, ताकि लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके। इस मंत्रालय का कार्यभार जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंपी गई है, जिन्होंने जिन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे को हराया था।

सच हुई गृहमंत्री अमित शाह को लेकर अरविन्द केजरीवाल की भविष्यवाणी

देश में चल कुछ भी रहा हो, लेकिन देश की राजनीति से लेकर मीडिया में कुछ ऐसे लोग आ गए हैं, जिनका जिक्र किए बिना लोगों का दिन गुजरता ही नहीं। आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल भी उन्हीं कुछ चुनिंदा हस्तियों में से एक हैं।

मोदी सरकार और मंत्रिमंडल के शपथग्रहण और विभागों के आवंटन के बाद अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर ट्विटर और सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने लगे। दरअसल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव से पूर्व मतदाताओं के बीच अफवाह और डर का माहौल तैयार करने के लिए अपनी एक चिंता जाहिर कर दी थी। अरविन्द केजरीवाल का डर था कि अगर अमित शाह देश के गृह मंत्री बन गए तो फिर क्या होगा?

आज सुबह ही अमित शाह को गृह मंत्री बनाए जाने की सूचना मिलते ही सोशल मीडिया यूज़र्स ने अरविन्द केजरीवाल के 21 दिन पुराने उस ट्वीट को ढूँढ निकाला और अमित शाह की जगह एक बार फिर सारी अटेंशन अरविन्द केजरीवाल ले गए।

अरविन्द केजरीवाल ने इस ट्वीट में लिखा था, “देशवासियों, वोट देते वक़्त सोचना। अगर मोदी जी दोबारा आ गए तो अमित शाह गृह मंत्री होंगे। जिस देश का गृह मंत्री अमित शाह हो, उस देश का क्या होगा, ये सोच के वोट डालना।”

केजरीवाल के इस ट्वीट को पढ़कर तो यही लगता है कि जनता ने उनकी बात को दिल पर ले लिया था और इसी कारण भाजपा 300 का आँकड़ा पार करने में सफल रही। लेकिन घटनाक्रम कोई भी हो, अरविन्द केजरीवाल का अचानक से प्रासंगिक हो जाना एक कौतुहल का विषय रहता है। मानो राहुल गाँधी और अरविन्द केजरीवाल ने कसम खाई हो कि जनता को पूर्ण मनोरंजन देकर रहेंगे। यही जेसीबी की खुदाई जब सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी तो अरविन्द केजरीवाल उस वक़्त भी प्रासंगिक हो पड़े थे।

‘जल शक्ति’ मंत्रालय बनाकर PM मोदी ने निभाया अपना वादा

केंद्रीय मंत्रियों को आवंटित किए गए पोर्टफोलियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी वादे के अनुरूप, लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए एक नए मंत्रालय ‘जल शक्ति’ का गठन किया गया। जोधपुर से सांसद, गजेंद्र सिंह शेखावत, जिन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे को हराया था, उन्हें जल शक्ति मंत्रालय की कमान सौंपी गई है।

यह मंत्रालय पूर्व में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा कायाकल्प मंत्रालय को पुनर्गठित करके बनाया गया है। इसके अलावा पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय को भी इसमें जोड़ा गया है। पिछले महीने तमिलनाडु में एक चुनावी रैली के दौरान, पीएम मोदी ने आश्वासन दिया था कि अगर वो सत्ता में वापस आए, तो उनकी सरकार एक अलग जल शक्ति मंत्रालय की स्थापना करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था:

“23 मई के बाद, जब मोदी सरकार एक बार फिर पद ग्रहण करेगी, तो जल शक्ति के लिए एक अलग मंत्रालय होगा। यह मंत्रालय पानी से संबंधित कई आवश्यकताओं को पूरा करेगा। NDA सरकार ने जल संसाधनों पर बहुत ध्यान दिया है। जल शक्ति के लिए एक अलग मंत्रालय होगा जो किसानों को स्वच्छ पानी और उच्च श्रेणी की सिंचाई सुविधाओं को सुनिश्चित करेगा।”

देश में पानी के संकट को समाप्त करने के लिए भाजपा के संकल्प पत्र में भी जल मंत्रालय स्थापित करने का वादा किया गया था। गजेंद्र सिंह शेखावत ने मंत्रालय में पदभार ग्रहण भी कर लिया।

हर साल अप्रैल से जुलाई तक देश के कम से कम आठ राज्यों में पानी की विकट स्थिति उत्पन्न होती है। हाल ही में केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु को सूखे के संदर्भ में परामर्श जारी किया गया था। इसमें लोगों से अपील की गई थी कि वो कुछ हफ़्तों के लिए पानी को विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल करें क्योंकि बाँधों में पानी का भंडारण एक महत्वपूर्ण स्तर से नीचे गिर गया था।

कृषि और घरेलू उद्देश्य के लिए लगभग पूरा ग्रामीण भारत मानसून की बारिश पर ही निर्भर करता है, इसलिए आज के समय में जल प्रबंधन की सख़्त ज़रूरत है।

ममता नारेबाजों की चमड़ी उधड़वाने में व्यस्त, बंगाल में एक और नाबलिग का रेप

ममता बनर्जी और उनका प्रसाशन शायद अपनी पूरी ऊर्जा जय श्री राम के नारे लगाने वालों पर ही झोंक चुका है। यही वजह है कि हर दूसरे दिन पश्चिम बंगाल में हिंसा और बलात्कार की घटनाएँ सामने आ रही हैं। देश में बच्चियों के साथ होती रेप की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा प्रकरण में पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान में कालना की कक्षा 10 की एक छात्रा से रेप की घटना सामने आयी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खून से लथपथ छात्रा को बर्दवान मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। गत रात पीड़िता की माँ अपने रिश्तेदार के यहाँ से लौटी तो देखा कि उनकी बेटी बिस्तर पर पड़ी थी। उसके गले में दुपट्टा भी लपेटा हुआ था और सिर पर चोट भी लगी थी। फ़िलहाल पुलिस घटना की छानबीन कर रही है।

प्रगतिशील (सेक्युलर/लिबरल) बुद्धिजीवी बनने के 10 नुस्खे

ये आलेख समर्पित है उन सैकड़ों औसत पम्पलेट बुद्धिजीवियों को जो प्रचार के पर्चे पढ़कर खुद को “भारतीय प्रगतिशील बुद्धिजीवी” घोषित करना चाहते हैं, मगर अफ़सोस कि न तो वो प्रगतिशील हैं, न बुद्धिजीवी, और भारतीय तो हरगिज़ नहीं!

ये चुनाव अभियान ऐसे औसत बुद्धिपिशाचों के योगदान के बिना सफल नहीं हुआ होता। उनके जहर बुझे वचनों के बिना जनमानस को ये याद दिलाना मुश्किल होता कि एक आम नागरिक भारतीयता के पक्ष में खड़ा होता है।

आइये उन दस सरल (किन्तु महत्वपूर्ण) कदमों को देखें जिनके जरिये आप खुद को एक “प्रगतिशील बुद्धिजीवी” के तौर पर पेश कर सकते हैं:

1) जब भी आपको कोई ऐसी ‘पोस्ट’ या लेख दिखे जिसमें ‘हिन्दू’ या ‘हिंदुत्व’ शब्द का उल्लेख सकारात्मक रूप में हुआ हो, उसे फ़ौरन ‘जहरीला’ और ‘घृणित’ घोषित करें। लेख के सन्दर्भ से आपके उद्गार का कोई लेना देना नहीं। लगातार और पूरे मनोयोग से ‘हिंदुत्व’ के प्रति अपनी ‘घृणा’ को प्रकट करते रहें। इसके लिए आप छद्म तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं, या खुलकर भी सामने आ सकते हैं। साथ ही ये कहना न भूलें कि आपके कई ‘हिन्दू’ मित्र भी हैं और आप हिन्दुओं का सम्मान करते हैं।

2) जब भी किसी चर्चा में मौका मिले ‘गुजरात 2002’ का उल्लेख अवश्य करें। भले ही वो चर्चा कांगो बेसिन के वानर प्रजातियों के प्रजनन के तरीकों पर हो! चर्चा के विशेष नियम को हमेशा याद रखें, सभी दंगे बराबर होते हैं लेकिन गुजरात दंगे दूसरे दंगो से ज्यादा बराबर हैं।

3) जिस भी माध्यम से संभव हो मोदी के बारे में अवश्य लिखें- “नरभक्षी”, “आदमखोर”, “हत्यारा”, “फासिस्ट”, “तानाशाह” जैसे शब्दों का खुलकर प्रयोग करें। मोदी विरोधी सभी बैठकों और व्याख्यानों में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करें। पूरे जोशो खरोश से गुजरात के कुपोषित बच्चों की बात करते हुए प्लेट से भुने हुए काजू को ग्लास में मौजूद मुफ्त की व्हिस्की के साथ उदरस्थ करते जाएँ।

4) बीच-बीच में ‘सेक्युलर हिन्दुओं’ के विषय में अच्छी तरह तैयार की गयी अपनी पंक्तियों का छौंक लगाएँ और उनके अहंकार को सहलाते रहें। अपने आप को एक ‘प्रगतिशील मानवतावादी’ सिद्ध करने हेतु यह अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए आप “भारत अपने सर्वसमावेशी हिन्दुओं के कारण ही धर्मनिरपेक्ष है” जैसे वाक्यों का प्रयोग कर सकते हैं।

5) चर्चा के विषय से इतर बीच-बीच में दार्शनिक ज्ञान अवश्य बघारें। जरूरत के हिसाब से नास्तिक की अलग-अलग श्रेणियों यथा ईश्वरद्रोही, ईश्वर को न मानने वाला या सिद्ध होने पर ईश्वर को मान लेने की श्रेणी में कूद-फांद करते रहें, लेकिन साथ ही ये बताएँ कि आप आध्यात्मिक रुझान के हैं किन्तु धार्मिक नहीं, चाहे इसका जो भी अर्थ लिया जाए। अगर आप हिन्दी जैसी भाषा में बात कर रहे हों तो ‘ईश्वर’ या ‘भगवान’ जैसे शब्दों के प्रयोग से बचें। उनके बदले हमेशा ‘ऊपरवाला’ या फिर ‘खुदा’ शब्द का इस्तेमाल करें।

6) जब भी मौका मिले तो चीख-चीख कर सबको बताएँ कि आप ज़ात-पात के बन्धनों से पूरी तरह मुक्त हैं, लेकिन लाभ की संभावना होने पर धीरे से अपनी ज़ात बताने से न चूकें। चतुराई भरे इस्तेमाल से, बहसों में, ये एक महत्वपूर्ण औजार सिद्ध हो सकता है। इससे हिन्दुओं के बीच खाई बनाने में कई बार सफलतापूर्वक परखा जा चुका है।

7) चुन-चुन कर कश्मीर में सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के पोस्ट लिखें और साझा करें। पीड़ित कश्मीरी युवाओं पर घड़ियाली आँसू बहाते समय आरोपों के सच्चे-झूठे होने की चिंता कतई न करें। ध्यान रहे इस पूरे प्रयास में कश्मीरी पंडितों का जिक्र गलती से भी न आ पाए।

8) जब कोई तर्क न चलता दिखे और सारे सफ़ेद झूठ पकड़े जाएँ तो “फासीवादी संघी” होने का आरोप अपने विरोधी के मुँह पर दे मारें। आरोप के झूठे होने या सिद्ध न हो सकने की कोई परवाह करने की आवश्यकता नहीं है। ये केजरीवाल सिद्धांत है जिसमें बार-बार एक ही आरोप मढ़ने से, कभी न कभी, उसके सच मान लिए जाने की संभावना रहती है। इसके भी न चलने पर आप विरोधी को टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अडानी का एजेंट घोषित कर सकते हैं।

9) ढंग के कपड़ों में थोड़ा निवेश करें। अगर आप पुरुष हैं तो फैबइंडिया का एक मुड़ा-तुड़ा सा कुर्ता आपके पास होना ही चाहिए। अगर फ्रेंच कट दाढ़ी रख सकें तो अति उत्तम। अगर आपके दिमाग का आकार शुतुरमुर्ग जितना भी हो तो हुलिए से आपके बुद्धिजीवी दिखने की संभावना काफी बढ़ जाती है। बालों को रंगना भी छोड़ दें, उनमें थोड़ी सफेदी दिखने दें। अगर आप स्त्री हैं तो सूती हथकरघा की साड़ियों को बेरंगे-बेडौल ब्लाउज के साथ पहनें। आपकी बिंदी का आकार कम से कम थाली जितना होना चाहिए। आँखों में कम से कम किलो भर काजल-कोह्ल लगाना कभी न भूलें। ध्यान रहे कि आपको नेवले या उदबिलाव जैसा दिखना है। बालों में सफेदी भी दिखती रहे तो और अच्छा रहेगा।

10) जब आप तर्कपूर्ण बहस में असमर्थ हो जाएँ, जैसा कि हर बहस में होगा ही, तो अपने विरोधी से बात करने से ही इनकार कर दें। कहें कि आप चमचों/भक्तों/ट्रोल से बात करने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते क्योंकि उनकी “सांप्रदायिक सोच” से आपकी “भावना बेन” आहत हो जाती है।

प्रस्तुत लेख शैफाली वैद्य की मूल फेसबुक पोस्ट से लिया गया है। अनुवाद आनंद कुमार ने किया है।

स्मृति ईरानी के करीबी सुरेंद्र सिंह की हत्या का मुख्य आरोपित वसीम गिरफ्तार

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के करीबी और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह की हत्या मामले में पुलिस ने शुक्रवार (मई 31, 2019) को मुख्य आरोपित वसीम को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने वसीम को एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया है। सुरेंद्र सिंह हत्याकांड में शामिल 4 आरोपितों की गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है।

जानकारी के मुताबिक, जामो थाना क्षेत्र में ही पुलिस और वसीम के बीच भिड़ंत हो गई जिसमें दोनों ओर से गोलियाँ चली। इस दौरान वसीम के पैर में गोली लगी। जिसके बाद वसीम को घायल अवस्था में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अपर पुलिस अधीक्षक दयाराम ने वसीम की गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए कहा कि उसे इलाज के लिए जामो सीएचसी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

वसीम की गिरफ्तारी के बाद अब हत्याकांड से जुड़े कई अहम खुलासे हो सकते हैं। सुरेंद्र सिंह हत्याकांड में पुलिस को कई अहम सुराग भी मिले हैं। पुलिस ने हत्या में शामिल एक आरोपित के पास से खून से सना तौलिया भी बरामद किया है। इसके अलावा एक देशी पिस्तौल भी बरामद की है। अमेठी के एसपी के मुताबिक हत्या के पीछे पुरानी रंजिश है।

गौरतलब है कि, अमेठी में शनिवार (मई 25, 2019) देर रात सुरेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतक को स्मृति ईरानी ने खुद कंधा दिया था। रविवार (मई 26, 2019) की शाम सुरेंद्र सिंह के बड़े भाई नरेंद्र सिंह की तहरीर पर जामो पुलिस ने केस दर्ज किया था। जिसके तहत पुलिस ने वसीम, नसीम, गोलू सिंह, रामचंद्र बीडीसी, रामनाथ गुप्ता के खिलाफ नामजद केस दर्ज किया। स्मृति ईरानी के साथ-साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने 12 घंटे के अंदर आरोपितों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था और पुलिस ने एक-एक करके पाँचों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

शपथग्रहण समारोह का मिला था न्योता लेकिन शामिल नहीं हुए शरद पवार

लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल ने गुरुवार (मई 30, 2019) को राष्ट्रपति भवन में पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस शपथ ग्रहण समारोह में देश और दुनियाभर से तकरीबन 8000 मेहमानों ने हिस्सा लिया। इनमें यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी समेत विपक्षी दलों के तमाम वरिष्ठ नेता भी शामिल हुए। मगर इस समारोह में नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) अध्यक्ष शरद पवार शामिल नहीं हुए। जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री के दफ्तर से शरद पवार को शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए न्यौता भी भेजा गया था, लेकिन वो इस समारोह में नहीं पहुँचे।

दरअसल, तय प्रोटोकॉल के अनुसार सीट न मिलने की वजह से शरद पवार प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि 78 वर्षीय पवार वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता हैं और वह मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यालय कर्मियों को जानकारी मिली कि पवार को बैठने के लिए जो सीट दी गई है, वह प्रोटोकॉल के अनुरुप नहीं है। इसलिए वो कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। बताया जा रहा है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री पवार को पाँचवीं पंक्ति में सीट दी गई थी।

इससे पहले, गुरुवार (मई 30, 2019) को शरद पवार और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें शुरू हो गई हैं कि दोनों पार्टियों का विलय हो सकता है, हालाँकि शरद पवार ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि मुलाकात में इस तरह की कोई बातचीत नहीं हुई। उन्होंने इस बारे में ट्वीट करते हुए लिखा कि राहुल उनके आवास पर उनसे मिलने आए। इस दौरान लोकसभा चुनाव के परिणाम और महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई। एनसीपी और कॉन्ग्रेस के विलय की खबर अफवाह है।